Saturday, December 17, 2016

राजनीतिक भ्रष्टाचार, एक ज्वलंत प्रश्न

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ता: 17-12-2016
राजनीतिक भ्रष्टाचार, एक ज्वलंत प्रश्न
एक ज्वलंत प्रश्न अभी सामने आया है जो पूरे जनमानस को उद्वेलित कर रहा है। यह प्रश्न भारत के सारे सियासी पार्टियों के द्वारा चंदे और अन्य श्रोतों से उगाहे गए धन से सम्बंधित है।
अभी के IT नियमों के तहत कोई भी सियासी दल
₹20000 तक का चंदे की राशि नकद रूप में बिना श्रोत की घोषणा किये ले सकता है। इससे सियासी पार्टियां अकूत धन इकठ्ठा करने में सफल हो जाती है। इस राशि का मनमाने ढंग से चुनावों में खर्च किया जाता है, जिसका सीधा असर काले धन के संग्रह और विस्तार के रूप में होता रहा है। अभी की एक घोषणा के अनुसार सियासी पार्टियां पुराने नोट जमा करा सकती हैं, जिसके श्रोत के बारे में बताने और जताने की जरूरत नहीं है। जिसपर किसी भी दल ने आम सभा नहीं की और न ही भारत बंद का आह्वान किया। यानि सभी दलों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहमति है।
जनता के लिए अलग नियम और राजनीतिक दलों के लिए अलग नियम, यह दुहरा मापदंड नहीं चल सकता। यह सत्ता पक्ष के हित में होगा, अगर वे जल्दी से जल्दी सियासी दलों के चंदा उगाही कानून में आमूल सुधार की घोषणा करें, अन्यथा इतना क्रांतिकारी कदम लेने के बावजूद भी वे चुनाव में हो रहे घोटालों के द्वेष से अपने को मुक्त नहीं के पाएंगें।
आगे का कदम और रास्ता सता पक्ष के लिए दुधारी तलवार पर चलने जैसा है। क्या वह चुनाव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए 8 नवम्बर को नोटबंदी की अचानक की गई घोषणा की तरह ही किसी क्रांतिकारी, आमूल परिवर्तन लाने वाले सधे कदम की तत्काल प्रभाव से कोई निर्णय लेने का उदहारण पेश कर सकते है? यह प्रश्न आमजन को उद्वेलित कर रहा है, झकझोर रहा है।
मैंने केंद्र में बीजेपी की सरकार आने पर एक लेख लिखा था, जो जागरण जंक्शन.कॉम पर दी गयी थी। साथ ही यह उससमय भोपाल से प्रकाशित पत्रिका, "रूबरू दुनिया" में भी प्रकाशित हुई थी।
मैंने उसमे चुनाव सुधारों के बारे में क्या लिखा

चुनावों का शुद्धिकरण:
चुनाव  भारतीय  राजनीति  और  संसदीय  लोकतंत्र  का  वो  पर्व  है  जो  सांसद   जो  संसद  के  मंदिर  तक  पहुँचने    का  अवसर  प्रदान  करता  है ।  वहां  हत्या,  बलात्कार ,  डकैती ,  चोरी  आदि अपराधों  के  नामजद  या  सजाभोगी  ब्यक्ति  नहीं  पहुंचे ,  इसके  लिए  सभी  दलों  को  मिलकर  कठोर  कदम  उठाने  की  जरूरत  है ।  अबतक  सारे  दल  इसपर  सिद्धांततः  सहमत  होते  देखे  गए हैं ।   लेकिन  संसद  और  बिधान सभाएं  अभी  भी  ऐसे  लोगों  के  पहुँचने  का  स्थान   बना   हुआ  है ,  क्योंकि  सारे  दल  इसतरह  के  प्रत्याशी  खड़े  करते  रहे  हैं ।     इसके  लिए  कठोर  कानून  बनाये  जाने की  जरूरत  है ।  अगर  संविधान  में  संशोधन  की  जरूरत  है  या  अध्यादेश  के  द्वारा  कोई कानून  पास  कराया  जाना  है ,  तो  वह  कार्य  शीघ्र  होना  चाहिए ।  संसदीय  लोकतंत्र  चुनाव  के बाद  भी  जनता  की  भागीदारी  में  चले ,  इसका  प्रयास  होना  चाहिए ।  सांसदों  को  अपने  क्षेत्र  के विकास  के  लिए  एक  पूरी  रूपरेखा  देने  को  कहा  जाना  चाहिए ।  संसदीय  क्षेत्र  विकास  कार्यक्रम  के तहत  दिए  गए  राशि  का  समुचित  उपयोग  हो ,  इसके  लिए  कठोर  कदम  और  सटीक  ऑडिट भी  होना  चाहिए ।  नॉन  परफार्मिंग  नुमाईंदों  को  जनता  कैसे  वापस  बुला  सकती  है ,  इसके  लिए  बैठकर  चुनाव - प्रक्रिया  शुद्धीकरण  के  बिन्दुओं  पर  विचार  होना   चाहिए ।  बी जे पी  इसे  कर  सकती  है  क्योंकि  उसके  पास  पर्याप्त  बहुमत  है ।  इसके  लिए  इक्षा  शक्ति  को  एकत्र  करना  होगा  और  उसतरफ  सधे  कदमों  से  बढ़ना  होगा ।

Monday, November 21, 2016

आतंरिक सशक्तिकरण के लिए नुकीला निर्णय

21-11-2016...
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आतंरिक सशक्तिकरण के लिए नुकीला निर्णय
मैंने अभी से एक घंटे पहले, जब दिन में दोपहर बाद औंघी, जिसे आफ्टरनून नैप कहा जाता है, सी लगी, तो मैंने एक ख्वाब देखा। उसे मैं हू - ब - हू दे रहा हूँ। कुछ शब्द छूट भले ही जाँय, अधिक एक भी नहीं हैं।
मैं कोर्ट के एक जज से अपॉइंटमेंट लेता हूँ। उनसे मैं उनके चैम्बर में मिल रहा हूँ। वे सामने बैठे हैं।
उनकी प्रश्नवाचक दृष्टि मेरे ऊपर पड़ती है, शायद वे जानना चाह रहे हैं, " क्या वे मुझे पहले से जानते हैं? या क्या काम से आये हैं?"
मैं, इन सारे प्रश्नों पर पूर्णविराम लगाते हुए उनसे बाते करना शुरू करता हूँ, " मैं आपको सीधे तौर पर नहीं जानता हूँ। और न मैं किसी काम को लेकर आपसे मिलने आया हूँ। मेरे भगिना नरेंद्र ने कहा था कि आप उसके स्कूल के दोस्त रह चुके हैं।"
वे याद करने की कोशिश करने लगे, "शायद, स्कूल में हमलोग साथ पढ़े हों।" वे अतीत में खोकर याद करने के यत्न में लग गए, कि मुझे लगा कि अब वातावरण थोड़ा अनौपचारिक हो गया है, तो कुछ ज्वलंत प्रश्न पर चर्चा की जा सकती है।
मैं, "आप तो जज हैं। आप का मन भी इस प्रश्नों से उद्वेलित होता होगा। आज देश किस सबसे  बड़ी समस्या से जूझ रहा है?"
"कोई एक हो तो बताऊँ। कहाँ से शुरू करूँ?"
"जहाँ से आपको उचित लगे शुरू कीजिए।"
"मेरी समझ में देश का प्रजातंत्र ही देश की सबसे बड़ी समस्या है?"
"वह कैसे?"
"प्रजातंत्र में कानून बनाने का अधिकार लेजिस्लेटिव को है। लेजिस्लेटिव यानि विधायिका, यानि स्टेट सब्जेक्ट्स पर स्टेट असेम्बली और केंद्रीय विषयों पर सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली या लोकसभा और राज्य सभा। उन जगहों पर कौन बैठे हैं? या कौन जाते हैं?"
मैं चुप ही रहा।
"नेता जाते है, सर। आप जनता हैं, साफ़ - साफ़ क्यों नहीं स्वीकार करते?"
"मैं जज हूँ। मेरे सिलेक्शन की एक प्रक्रिया है, जिससे हमें गुजरना पड़ा है, तब मैं जाकर चयनित हुआ हूँ और यहां इस जगह पर हूँ।"
"हाँ, तो इससे legislative को आप कैसे कनेक्ट कर रहे हैं?"
"सर, आप जनता हैं। आपको यह नहीं समझने दिया गया है। हमें उस क़ानून को पालन करने या करवाने के लिए नियुक्त किया गया है, जिस कानून को बनाने वालों के लिए कोई विशेष पढाई, लिखाई, या ज्ञान की जरूरत नहीं है। और न ही विशेष ब्यक्तित्व या चरित्र की जरूरत है।"
मैं, "इसलिए विधायिकाओं में एक तिहाई से अधिक जगहों पर अपराधियों ने कब्ज़ा कर लिया है, एक तिहाई पर स्थापित नेताओं के परिवार वाले।"
"बिलकुल सही। और चुनाव में धन की जरूरत होती है, इसलिए बाकी की जगहों पर धनपतियों का प्रभाव है। ऐसे में क़ानून किसके लिए बनेंगें? जनता के लिए या उनके लिए जो क़ानून बनानेवाले है।"
मैं, "तो क्या आप भी मानते है कि चुनावों में खड़ा होने वाले प्रतिनिधियों को एक मिनिमम प्रशिक्षण से होकर गुजरना जरूरी होना चाहिए, जहां उन्हें संविधान, लोकल सेल्फ गोवर्नमेंट, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन आदि के बारे में ज्ञान दिया जाय।"
"यह तो तत्काल प्रभाव से जरूरी है, तभी हमलोग प्रजातंत्र के इस स्वरुप को झेलते हुए देश को बचाये रख सकेंगे।"
मैं तन्द्रा से जाग गया था।
मेरे मन में कई तूफ़ान उठ रहे थे। मुझे रतन टाटा के जीवन की वह कहानी याद आ रही थी, जब उन्होंने26/11, मुम्बई की घटना के बाद ताज होटल के पुनरुद्धार के लिए आमंत्रित निविदाओं में पाकिस्तान के दो ब्यावसायियों के टेंडर इसलिए अमान्य कर दिए थे, क्योंकि वे पकिस्तान के थे। यह उन्होंने दिल्ली के एक मंत्री के दबाव देने के बावजूद यह कहकर अमान्य किया था, "आप इस हद तक निर्लज़्ज़ हो सकते है , मैं नहीं।"
देश के परवर्ती, ऊँचे स्थान पर बैठा नेता जब देश की कीमत पर कोई भी ऐसा समझौता करने को तैयार हो , तो हम कोई हंगामा नहीं करते। परंतु देश की आंतरिक स्थिति को मजबूत करने के लिए आज अगर कोई सशक्त और दुश्मनों के लिए नुकीला, चुभने वाला निर्णय लिया गया हो, तो कुछ लोग तिलमिला क्यों रहे हैं? अगर ऐसे शलाका पुरुष से  हम देश को बचाने की उम्मीद लगा बैठे हैं, तो उसके ऐसे निर्णय के लिये उसे साधुवाद भी नहीं दे सकते क्या?
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--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 तिथि :  22-11-2016.
 ह

Friday, October 28, 2016

राख में अनल - कण होता है

#bnmpoems

राख में अनल - कण होता है

बुझी हुई राख में भी
अनल - कण होता है|

राख जो दिखती है
मटमैली निःशेष - सी,
इंधन जल चुकने पर,
पड़ी हुयी अवशेष - सी|
उससे भी दूर रहो,
उसको भी छूना मत
ऊपर से शीतल वह,
अन्दर में छुपा हुआ
दाह कठिन होता है|
बुझी हुयी राख में भी
अनल - कण होता है|

जीवन के कुरुक्षेत्र में
शर शैय्या पर पड़ा हुआ,
बिंधता जो रोज है|
उसकी शिराओं में
रक्त निःशेष हुआ,
अब तो सिर्फ अग्निधार
प्रवाहमान तेज है|
फटता नहीं वह ज्वालामुखी बन
फिर भी अंगार - सा
क्षण - क्षण दहकता है|
बुझी हुयी राख में भी
अनल - कण होता है|

चुपचाप देखकर
भूल मत कोई कर|
दहाड़ेगा सिंह बन
नियति को तोलकर|
शक्ति संचयन में लगा हुआ साधक,
टूटेगा मृगराज - सा, अभी
वन - वन डोलता है|
बुझी हुयी राख में भी
अनल - कण होता है|

स्यारों की हुआ - हुआ
कुकुरों का कुकुरहाव|
कौओं का कांव - काँव
चापलूसों का हावभाव|
इन सबसे निरपेक्ष
अपनी  धुन में मग्न |
एक पथ, एक लक्ष्य
देश - सेवा का एक प्रण|
दुश्मनों की छाती तोड़ेगा, भीम बन
अभी बाजुओं का बल
मन - ही - मन तोलता है|
बुझी दिखी राख में भी
अनल - कण होता है|

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 तिथि : 03/05/2016
वैशाली, एन सी आर, दिल्ली.
👌👌

यह कविता उनके लिए प्रेरक सिद्ध हो सकती है, जो यह मान बैठे हैं, कि उनके अंदर की आग ठंढी हो चुकी है। परंतु उसी आग में चिंगारी भी छुपी होती है।

Friday, October 7, 2016

मानव कौल द्वारा लिखी कहानी संवृह "ठीक तुम्हारे पीछे" की समीक्षा

मानव कौल लिखी और हिन्द युग्म से प्रकाशित कहानी संग्रह "ठीक तुम्हारे पीछे" की अंतिम कहानी को छोड़कर सारी कहानियां अभी ख़त्म की हैं। मानव कौल कहानियां नहीं लिखते है, वे शब्दों और वाक्यों के रंगों से पन्नों पर एक मॉडर्न पेंटिंग बनाते हैं। इस पेंटिंग में शुरू में आप को रंगों के छींटें यहां - वहां बिखरे लगते हैं। जैसे - जैसे आप आगे बढ़ते है, थोड़ी तश्वीर उभरनी शुरू होती है। ये तश्वीरें कैनवास पर अपना रूप बदलती हैं। और कहानी के अंततक पहुंचते - पहुंचते पूरे कैनवास पर छा जाती है। कभी आपको सबकुछ स्पष्ट और आवरणविहीन होता हुआ दीखता है तो कभी - कभी आपको स्पष्टता खोजनी पड़ती है। इसे आप अपने करीब कहीं घटित हुआ पाते है, या घटित हुआ होने की संभावना ढूढने लगते हैं। तभी आपको लगता है कि ये ठीक हमारे पीछे ही घट रहा है, घट चूका है या घटने वाला है।
अगर किसी कहानी में शुरू में स्पष्ट दृश्य नज़र आ रहे हो तो निश्चित मानिये अंत आते - आते आप उलझ जायेंगें और आपको अर्थ खोजने के लिए छोड़ दिया जाएगा , अकेला ही।
आप सोच रहे होंगे  कहानियों के बारे में लिखते हुए कहीं मैं खुद ही कहानियां तो रचने नहीं लग गया। नहीं , ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरे यह सब लिखने का एक ही अभिप्राय है कि इन कहानियों को पढ़ना शुरू करने के पहले आपका भी एक स्तर होना चाहिए जो कहानियों के स्तर तक पहुंचकर उसे महसूस कर सके। टाइम पास के लिए पढी जाने वाली कहानियां नहीं है ये। कहानियां ख़त्म होते - होते आपको कुछ सोचने पर मजबूर करती है। अगर बिना कुछ सोचे आप दूसरी कहानी पर शिफ्ट कर जाते हैं, तो आप कहानियों के उद्देश्य को पूरा नहीं करके खुद ही कहीं भटक जा रहे है और इसीलिये आपकी टिप्पणी होगी कि ये कहानियां भटका देती हैं। यह टिप्पणी बिलकुल सतही और भ्रम पैदा करने वाली है। सारे पात्र जैसे जीवन, अंतिमा, मुमताज़ भाई, लकी , सिमोन, कमल  हमारे आपके इर्दगिर्द से लिए गए है। इन्हीं पात्रों की कूचियों से जिंदगी के कई रंग मानव जी ने गढ़े हैं जो बेहद सजीले है।
--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 6-10-2016.

Friday, September 30, 2016

बहना के दिल में रहना

#bnmpoems
बहना के दिल में रहना

भैया तुम जाओ दूर देश पर,
बहना के दिल में रहना।
तुम्हे होगा याद मगर
मेरे में मन में बसी हुई हैं
बचपन की यादों की छाया।
धींगा मस्ती, दौड़ा दौड़ी,
गलती करना, फिर दुहराना,
पापा के डाँट के डर से
माँ के पल्लू में छुप जाना।
छत पर जाना, पतंग उड़ाना,
पतंग अगर काट जाए तो,
एक नया फिर पतंग बनाना।

साथ लिए बचपन की यादें,
मैं गई अपने घर जैसे,
एक पराये घर में
यहाँ नहीं वह धींगा मस्ती,
नहीं वहां का मस्तनापन
मर्यादाओं में बाँध दी गई,
पाना नहीं मगर फिर भी
देना है, बस देना है,
सबको अपना अपनापन।

मैं भी लेकर बैठ गई
तुझे सुनाने अपनी कहानी।
दुखी नहीं होना तुम सुनकर
मैं सुख से हूँ, हरी भरी हूँ,
नहीं कहीं है वीरानी।
एक मेरी ,बस विनती मेरी
माँ पापा की उम्र हो गई,
उनके संघर्षो की कहानी
नई आई भाभी से कहना,
कैसे वे फांके करके भी
हमें दे सके राह नई
जीने को अपना सपना।

उनको कोई क्लेश नहीं हो
हम सब उन्हें विश्वास  दिला दें।
जी तो नहीं सके वे जीवन
मर तो सकें चैन से सुख से,
उनको यह अहसास करा दें।
इन्ही भावों को धागों में पिरोकर
भेज रही हों मैं ये राखी
रोड़ी को माथे पे लगाकर,
बांध कलाई पर ये राखी।
याद कर लेना इस बहना को
मन में कोई बात रखना
भले बसे हो दूर देश पर
बहना के दिल में रहना।
बहना के दिल में रहना।

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
   जमशेदपुर, तिथि: 11-08-2016.


द्रष्टब्य: यह कविता मैंने  सन  2016 के रक्षाबंधन के पहले लिखकर ओपन बुक्स ऑनलाइन जो एक साहित्यिक रूचि रखने वालों की वेब साइट है उसके उत्सव 72 में पोस्ट की थी। इसे वहां काफी सराहा गया. उसके बाद मैंने इस रचना को प्रतिलिपि के साइट पर  प्रकाशित किया। इसे मैं अपने ब्लॉग में भी डाल रहा हूँ ताकि यह सुरक्षित रहे।

Tuesday, September 27, 2016

Where you and me become we

#bnmpoems

Where you and me become we

But I also want to write
 a poem for you .
 I  will stick it on that part of your body which I like most,
though all parts of your body
are dearest to me
 more than my own.

I want to take advantage
Of your simplicity
I want to break my arrogance
And embrace your serenity.

But all this not to teach me,
Neither to preach me,
My moral lessons
And not to ruin my amorous sessions.

Where you and me
Me and you become we
And I prick your chest
With the nipples of my breast.

Where you make me feel
Where all my clothes peel
Off my body parts
Where journey to bliss starts.

Where you embrace me
Take me in your arms
Where you make me feel
The sweaters warms.

Where you pierce me
To make me feel the sweetness of pain.
Where all my existence melts,
And amalgamates with you to become one.
Where you and me
And I and you become we
Become we...become we...

--Brajendra Nath Mishra
   Jamshedpur,
   Now in Vaishali, Gaziabad.
  Date: 24-09-2016.
.
This poem has also been published on the popular site for poems of all languages whose link is:
http://m.poemhunter.com/poem/where-you-and-me-become-we/


Thursday, September 22, 2016

इन्टरनेट साईट पर रचनाएँ

#bnmthoughts
21-09-2016:
मैंने अपनी खुशी अपनी पत्नी से जाहिर की, "देखिये आज फलां साइट पर मेरी रचनाओं को हजार से अधिक लोगों ने पढ़ा।"
पत्नी पूछी, "कितना पैसा मिलेगा?"
मैंने कहा, "कुछ नही, बस लोग प्रशंसा करेंगे, जानेंगे, यही क्या कम है?"
"जानने और समझने से भूख नहीं मिटती है।"
मैं न खुश हो सका और न मायूस। क्या कहेंगे इस भाव को!!!

Saturday, August 6, 2016

जगाने आ रहा हूँ…

#bnmpoems
इस कविता के द्वारा कवि इस युग की युवा पीढ़ी को जगाने के लिए  स्वयं तत्पर होता है. युवा पीढ़ी सजग, सशक्त और सुदृढ़ होकर ज़माने की  विद्रूपताओं  को सुधारने के लिए आगे बढ़ता चले, कवि का ब्यथित मन युवाओं को इसके लिए प्रेरित करना चाहता है. यह कविता इस लिंक  पर भी देखी और पढी जा सकती है.

आप भी पढ़ें और फेसबुक, ट्विटर पर अपने लाइक और कमेंट्स अवश्य दें. इसे आप फेसबुक पर शेयर भी कर सकते हैं.

This poem in Hindi calls upon the youths to rise from the slumber, muster strength and root out the evils in the system and the society.
लिंक: http://yourstoryclub.com/poetry-and-poem/hindi-poem-jagaane-aa-raha-hun/
FB एड्रेस: https://www.facebook.com/brajendranath.mishra



जगाने आ रहा हूँ…

लोरियाँ सुन - सुन कर,
सो चुके बहुत तुम,
रास के सपनों में,
खो चुके बहुत तुम।
जवानियाँ उठो तुझे,
जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत,
सुनाने आ रहा हूँ।

मैं एक हाथ से उठाके,
सूर्य को उछाल दूँ,
मैं चाँद को भींचकर,
पीयूष को निकाल दूँ।
धरती की काया है प्यासी,
फैलती जा रही घोर उदासी,
अमृत - रस कण - कण में,
बहाने आ रहा हूँ,
जवानियाँ उठो तुझे,
जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत,
सुनाने आ रहा हूँ। 

सावधान, मिलावटी,
मुनाफाखोरों,
सावधान, बेईमानों,
रिश्वतखोरों,
शोणित भरे थाल से,
काल के कपाल से,
लाल - लाल रक्त - कण  
बहाने आ रहा हूँ,
जवानियाँ उठो तुझे,
जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत
सुनाने आ रहा हूँ।

कौन टोक  सकता है,
सत्य - सपथ मेरा?
कौन रोक सकता है,
विजय - रथ  मेरा?
ले मशाल हाथ में,
अग्नि - पुंज साथ में,
क्रांति का प्रयाण गीत,
गाने आ रहा हूँ,
जवानियाँ उठो तुझे,
जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत,
सुनाने आ रहा हूँ।

अनाचार, अत्याचार देख,
जो भी चुप रहता है,
उसकी रगों में रक्त नहीं,
ठंढा - जल बहता है,
तेरी शिराओं में खून का,
उबाल उठाने आ रहा हूँ,
जवानियाँ उठो तुझे,
जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत,
सुनाने आ रहा हूँ।

तेरी नसों में खून,
शिवा का महान  है।
सोच ले, दबोच ले,
यहाँ जो भी शैतान है।
उठा खड्ग तू छेदन कर,
ब्यूह का तू भेदन कर,
तेरे साथ  शौर्य - गान,
गाने  आ रहा हूँ,
जवानियाँ उठो तुझे,
जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत,
सुनाने आ रहा हूँ।

तेरी   लेखनी से,
सिर्फ प्रेम - रस ही झरता,
तुझे वेब जाल पर,
सिर्फ पोर्न - रस ही दिखता,
जवानी के दिनों को,
मत यूँ ही निकाल दो,
मांसपेशियों को कसो तुम,
फौलाद - सा ढाल दो,
तुझे मैं सृजनधर्मा,
बनाने आ रहा हूँ,
जवानियाँ उठो तुझे,
जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत
सुनाने आ रहा हूँ। 

- --ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
तिथि: 04-06-2015

जमशेदपुर।

Saturday, July 23, 2016

मैं हूँ लंगूर, मैं हूँ लंगूर

#bnmpoems

मेरी यह कविता इस साइट पर भी प्रकाशित हो चुकी है. आप भी पढ़ें और फेसबुक, ट्विटर पर अपने लाइक और कमेंट्स अवश्य दें. इसे आप फेसबुक पर शेयर भी कर सकते हैं. 

लिंक: http://yourstoryclub.com/poetry-and-poem/hindi-poem-jal-ki-boonden-aur-jeewan/

FB एड्रेस: https://www.facebook.com/brajendranath.mishra
This poem is about the feelings of an ape (monkey) who has lost his way and entered the big city which has become a jungle of concrete. 

मैं हूँ  लंगूर, मैं हूँ लंगूर

वनों, बागों , बागीचों से ,
भागता , फिरता पहुंचा हूँ ,
कंक्रीट के जंगल में ,
भटकता इतनी  दूर।
मैं हूँ  लंगूर, मैं हूँ लंगूर। 

पेड़ों  की  डालों पर चढ़ता ,
झूलता, झूमता उन झूलों पर ,
 इतराता , इठलाता , मटकता चलता,
सुगंध  लेता उन फूलों पर,
लय में  नाचता जैसे मयूर।
मैं हूँ लंगूर, मैं हूँ  लंगूर।

तेरे  इशारों  पर नाचा 
मैं तो  हूँ सीधा - साधा ,
कूदता, फांदता   और  हंसाता,
अपना मजाक बना डाला।
क्या  मेरी अदायें भायी मेरे हुजूर ?
मैं हूँ लंगूर , मैं हूँ लंगूर।

राम की सेना का अंग बना,
लड़ा   क्रूर रावण से युद्ध,
मेरा  बल अतुलित ब्याप्त  है ,
आसुरी शक्तियों  के विरुद्ध।
जहाँ   भी अत्याचार हुआ,
मैं जा पहुंचता हूँ जरूर।
मैं हूँ लंगूर , मैं  हूँ लंगूर।

वन उजाड़  डाले मानव ने ,
और  उजड़ते  ही  जा रहे ,
कहाँ रहूँ मैं , कैसे रहूँ मैं ,
समाधान कोई भी नहीं पा  रहे।
क्यों   मनुष्य बन गया क्रूर?
मैं हूँ लंगूर , मैं  हूँ लंगूर।

अब  मैं  जाता नहीं राम
की कथा जहाँ होती है ,
पीले  पत्तों  के   बीच  मौन,
मेरी ऑंखें बस यूँ रोती हैं।
जी  लिया  बहुत अब मेरे राम,
अब  चला  यहाँ  से बहुत दूर।
मैं हूँ लंगूर , मैं  हूँ लंगूर।

--- ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र, 3A, सुन्दर गार्डन, संजय पथ, डिमना रोग, मानगो, जमशेदपुर। E-mail: brajendra.nath.mishra@gmail.com,

सावन में झड़ी

#poem#nature #BnmRachnaWorld सावन में झड़ी ---–-----------–- सावन में लग रही झड़ी है। बूंदों की लहराती लड़ी है। बादलों का शामियाना तान...