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Friday, October 27, 2017

समर्पित (लघु कथा)

#shortstory#love 
#BnmRachnaWorld

समर्पित
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वो सर्द साँझ थी जब पुष्प को अचानक  सी - बीच पर अंशिका जैसी ही आकृति दिखी थी. वह एक  अदृश्य आकर्षण से खींचता हुआ उस ओर बढ़ गया था. उसे अंशिका के साथ कॉलेज में बिताये हुए दिन रह रहकर याद आ रहे थे. वह भौतिकी के पीजी का छात्र था और अंषि, हाँ इसी नाम से उसे पुकारा करता था, इकोनॉमिक्स की. उसे अच्छी तरह याद है कि अंषि ने कैसे डिबेट में उसे जीतने के लिए अंतिम दिन,  ठीक डिबेट शुरू होने के पहले अपना नाम वापस ले लिया था. इसपर दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ था, और उसके बाद खूब प्यार.
"अंषि, सुनो तो..."
ऐसे कौन परिचित नाम से पुकार सकता था. अंशिका  ने मुड़कर देखा था.
"पुष्प, तुम यहां कैसे, मुंबई में."
"क्यों? मुंबई सिर्फ तुम्हारी है क्या?"
"घूमने आये हो क्या? अकेले हो?" अंषि का मतलब पुष्प की पत्नी,बच्चों से था.
"हां, अकेला तो अकेले ही होगा न."
"तुम्हारी पहेलियाँ बुझाने की आदत गई नहीं."
"तुम्हारे, श्रीमानजी,कहाँ है,  वो?"
"अंषि का तो मन हुआ कि वह कह दे, सामने खड़े हो और पूछ रहे हो कहाँ हैं वे.
"मैं यही छोटी से  इंडियन रेवेन्यू   सर्विस की नौकरी कर रही हूँ."
"तो, इनकम टैक्स में हो? तब तो डरकर रहना होगा. कहीं रेड न करवा दो."
"तुम पर तो रेड करने में मज़ा ही आएगा.  तुम कहाँ हो?"
"तुम्हारी शरारत गई नहीं. मैं यही Bhabha Atomic Research Center में छोटा - सा वैज्ञानिक हूँ."
"तब तो एटम बम लगाकर उड़ा दोगे."
"काश, तुझे तुझसे  उड़ा पाता!"  पुष्प ने हंसकर कहा था.
"तो मैं चलूँ, मुझे जाना होगा."  अंषि  ने अपनी विवशता जताने की मुद्रा में कहा.
"........" पुष्प चुप ही रहा.
अंशिका चल दी. पुष्प जड़वत खड़ा रहा. वह उस ठूँठ की तरह खडा था जिसके सारे पत्ते झड़ चुके थे. जिसके पास देने को कुछ नहीं था, न फल, न पत्ते, न टहनियाँ.
अंशिका ने कुछ दूर जाकर मुड़कर देखा. पुष्प वैसे ही खड़ा था. देखकर वह मुड़ गई थी. उसने पीछे -से पुष्प से लिपटते हुए पूछा था.
"मुझे रोका क्यों नहीं जाने से?"
"मैं तुम्हें चाहता हूँ अंषि. तुझे कैसे रोकता?"
"बुध्धू, जिसे चाहते है, उसे बलपूर्वक रोक लेते है अपने पास."
अंषि, जिसे चाहते हैं उसे कैसे रोक सकते हैं, प्यार में अधिकार  नहीं जताया जाता.  ये तो निरा स्वार्थ हुआ न. ये तो possessive होना हुआ. मैंने  तो तुझे खुद को समर्पित किया है अंषि, तुझे बलात रोक कैसे सकता हूँ?" पुष्प ने अंषि के  सरक गए  समुद्र के जल में भींगते दुपट्टे की छोर को उठाकर  उसके वक्षस्थल पर सजाते हुए कहा था.
"तुम बिलकुल नहीं बदले..." कहकर अंशिका ने उसे और भी पास खींचकर भींच लिया था अपनी बाहों  में.

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर

1 comment:

Lalita Mishra said...

Prem ki sarvottam abhibyakti tyaag aur samarpan men hai...is kathya ko sthapit karti sundar laghukatha...

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