Saturday, July 15, 2017

सावन में झड़ी

#poem#nature
#BnmRachnaWorld

सावन में झड़ी
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सावन में लग रही झड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।

बादलों का शामियाना तान,
सजने लगा है आसमान।
सूरज  छुपा ओट में कहीं,
इंद्रधनुष का है फैला वितान।
धुल गए जड़ चेतन, पुष्प,
सद्यःस्नाता सी लताएं खड़ी हैं।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
सावन में लग रही झड़ी है।

धुल गई धूल भरी पगडंडी,
चट्टानों पर बूंदें बिखर रहीं।
कजरी के गीत गूंज उठे,
पर्दे के पीछे गोरी संवर रही।
झूले पड़ गए अमवां की डालों पर
कोयल की कूक हूक सी जड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
सावन में लग रही झड़ी है।

यक्ष दूर पर्वत पर अभिसप्त
खोज रहा बादल का टुकड़ा।
भेजने को संदेश प्रेयसी को,जो
खड़ी देहरी पर, म्लान है मुखड़ा।
उदास, लटें बिखरीं, तन कंपित,
आंगन की खाट पर बेसुध पड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
पावस में लग रही झड़ी है।

मोर का शोर भर रहा  उपवन में,
उमंगों का नहीं ओर छोर है।
किसान चला खेतों की ओर,
मन में बंध चली आशा की डोर है।
आनंद का मेला लगा है,
गाँव की ओर उम्मीदें मुड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
पावस में लग रही झड़ी है।

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 10-07-2017
  जमशेदपुर।

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