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Wednesday, April 23, 2014

राष्ट्रीय चुनाव और भारत का भविष्य

राष्ट्रीय चुनाव और भारत का भविष्य   
  भारत में २०१४ का यह राष्ट्रीय चुनाव पूरे विश्व में प्रजातंत्र का सबसे बड़ा पर्व है । इसमे भाग लेने वाले मतदाताओं की संख्या, उम्मीदवारों की संख्या और राष्ट्रीय चुनाव मशीनरी पर खर्च होने वाली राशि तथा इसमें सम्मिलित प्रचार माध्यमों की भागीदारी सम्भवतः पूरे विश्व के अन्य राष्ट्रों की तुलना में सबसे अधिक है । यह चुनाव भारत का भविष्य तय करेगा अवश्य, पर भविष्य क्या होगा यह अनिर्णीत है । यह चुनाव 16 वॆ लोकसभा का गठन करेगा । पिछली लोकसभा के चुनाओं में जैसे उम्मीदवार चुने जाकर आए हैं उनकी गुणवत्ता में निरंतर ह्रास होता रहा है ,   यह एक निर्विवाद सत्य है । आज़ादी के बाद की पहली लोकसभा में सांसदो के चरित्र की गुणवत्ता से अगर पिछली लोकसभा के सांसदो की तुलना की जाय तो उसमें जमीन - असमान का अंतर मिलेगा । इसीलिए हमें पिछली लोकसभा में काली मिर्ची कांड से लेकर अभद्रव्यहार , मर्यादाओं का उलंघन तथा भाषा पर अनियंत्रण सांसदों की स्तरहीनता को दर्शाता है।
     ऐसा क्यों हो रहा है?  आज़ादी की लड़ाई में भाग लेकर और उसमें तपाये जाकर जो नेता बाहर निकले थे और उनसे जो संसद बनी थी उसकी मर्यादा और उसकी कार्यवाही की मिशाल दी जा सकती है । आज़ादी की लड़ाई के समय कांग्रेश एक दल नहीं एक आंदोलनका नेतृत्व करनेवाला , आम जनता को शिक्षित, अनुशाषित तथा निडर बनाने का कार्य करने वाला एक प्रतिनिधि संगठनथा । इसके नेता जमीन से जुड़े थे और इसके नेताओं का जनता के साथ सीधा सम्बन्ध था। वे अपने को नेता से अधिक जनता का सेवक समझते थे। फिर भी प्रजातंत्र में सत्ताधारी दल का एकाधिकार नहीं हो जाय इसीलिए कांग्रेस से ही एक घटक अलग होकर प्रजा सामाजवादी पार्टी , स्वतंत्र पार्टी बनाकर विपक्ष में बैठना स्वीकार किया। ऐसा प्रजातंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के सामान महत्व को स्थापित करने के लिए भी बहुत जरूरी था। संसद सत्र में विपक्ष में बैठे आचार्य नरेंद्रदेव , कृपलानी , लोहिया आदि नेता जब बोलते थे तो उनकी बातें नेहरूजी , गोविन्द बल्लभ पंत आदि नेता भी दत्त चित्त होकर सुनते थे। यह पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच की मर्यादाओं की रेखा थी जिसका सम्मान दोनों करते थे। सत्ता पक्ष अपने उत्तरदायित्तवों को निभाने में विपक्ष के सुझाओं का भी सम्मान करता था। विपक्ष भी सत्ता पक्ष का सिर्फ विरोध ही नहीं करता था बल्कि उसके अच्छे कार्यों की प्रशंशा भी की जाती थी। यह एक आदर्श प्रजातंत्र के संसदीय कार्यकलाप का रूप था जो दुनिया के सामने एक मिशाल बन गया। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि भारत के साथ जितने भी अन्य राष्ट्र आज़ाद हुए वहाँ या तो कोई तंत्र ही कायम नहीं हो सका या अगर प्रजातंत्र कायम हुआ भी तो वह धीरे – धीरे अधिनायक तंत्र में तब्दील हो गया और तानाशाही कायम हो गयी।
      भारत में यह दलीय प्रजातंत्र का आदर्श स्वरुप था जो आज़ादी के बाद के सरकार के गठन , विपक्ष की भूमिका और नीतियों के निर्धारण , कार्यान्वन , और नेताओं के सभ्य आचरण के रूप में परिलक्षित हुआ। सरकार में बने रहकर सुविधा और सत्ता के भोगी सांसदों और पार्षदों के आचरण और चरित्र में धीरे – धीरे क्षरण शुरू हो गया। यह आज़ादी के तुरंत बाद स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेनेवाले नेताओं के शीर्ष वर्ग में कम हुआ। किन्तु जैसे ही सत्ता दूसरी पंक्ति के नेताओं के हाथ में पहुँची , जनतांत्रिक मूल्यों का ह्रास तेजी से हुआ। सत्तर के दशक में यह अधिक हुआ। भारत के संविधान का निर्माण भी अमेरिका और इंग्लैंड के संविधान के अंशों को जोड़कर हुआ। यह नीतियों के निर्धारण के लिए तो ठीक – ठाक था,  किन्तु नीतियों का कार्यान्वन जिस नौकरशाही के हाथों था, उसका ढांचा अंग्रेजों के द्वारा उस समय के शासन चलाये जाने के लिए बनाये ढांचे जैसा ही था। यही नौकरशाही नीतियों को कागज़ पर उतारती रही है जिसे जनता के नुमाइंदे थोड़े बहुत फेरबदल के साथ पास करते रहे हैं। इसके लिए संविधान में कहीं भी इसतरह के संसदीय प्रजातंत्र के दोषरहित ढांचे के निर्माण की स्पष्ट रूपरेखा नहीं बन सकी जिससे राज्य सत्ता सर्वोत्तम लोगो के हाथ में रहे और वे लोग उचित नीतियों , कार्यक्रमों एवं योजनाओं के क्रियान्वन और संसाधनो के सम्यक उपयोग करने के नियम बनायें। मानव कल्याण पथ के अविरल अनुसंधान के तरफ दलों और दलीय ढांचे का झुकाव रहे , यह सुनिश्चित कर पाना संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आता है।
      अब मैं इतिहास में विश्व स्तर पर घटित क्रांतियों और उसके परिणामों की चर्चा करता हुआ आज भारत में प्रचलित दलीय प्रजातंत्र के ऊपर प्रकाश डालते हुए इन दिनों के चुनाव की समीक्षा करना चाहूंगा। भारत ने संविधान में समाजवाद की स्थापना को अपना लक्ष्य स्वीकार कियाहै। लेकिन समाजवाद का रास्ता किसी प्रकार भी तानाशाही से होकर नहीं गुजरता है। सामाजिक क्रांति में लोगों की इच्छा क्या है इसका पता क्रांति का नेतृत्व करनेवालों को अवश्य होना चाहिए। जनता की स्वाभाविक प्रवृत्ति सदैव स्वतंत्रता और जनतंत्र के पक्ष में ही होती है। जान बूझकर तानाशाही स्वीकार करने की प्रवृति जनता में हरगिज नहीं होती। सोवियत रूसमें लेनिन और ट्राटस्की के नेतृत्व में जार के शोषणोन्मुख शासन का खात्मा और फिर लेनिन के नेतृत्व में राज्य – केंद्रित समाजवादी शासन व्यवस्था का स्थापित होना उससमय विश्व की एक बहुत बड़ी क्रांतिकारी घटना थी। लेकिन क्या वास्तविक समाजवाद स्थापित हो सका ? क्या वहाँ की जनता के हाथों में सत्ता पहुँची ? क्या वहाँ की जनता को अपने प्रतिनिधि के सीधे चुनाव करने की छूट मिली ? जार का पूंजीवाद तो समाप्त हो गया किन्तु समाजवाद फिर भी दूर रह गया। समाजवाद पूंजीवाद का अभाव मात्र नहीं है। उद्योग, वाणिज्य ,  बैंक , कृषि आदि का राष्ट्रीयकरण और समूहीकरण तो हो गया किन्तु असली समाजवाद फिर भी दूर रह गया। सोवियत रूस में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को जिस तरह राज्य मशीनरी द्वारा सीमित और नियंत्रित किया गया उससे तो लगा कि सामाजिक न्याय और समतामूलक समाज के निर्माण के जिस मूलभूत सिद्धांत पर समाजवाद टिका है उससे ही कहीं और भटक गया। अफसरशाह शासको के एक नए वर्ग का निर्माण, दुष्प्रभाव तथा शोषण के नए अवतार का नया चेहरा भी देखा गया। इसी व्यवस्था से स्टॅलिन जैसे अधिनायक का जन्म हुआ जो समाजवादी खोल में तानाशाहका ही एक नया रूप था। राजनैतिक और आर्थिक सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण और संपूर्ण राज्यवाद ही इस बुराई की जड़ में था। इससे स्पष्ट हो गया कि राज्य वाद सच्चे समाजवाद का विकल्प नहीं हो सकता।
      यूरोप में साम्यवाद असफल हुआ और फेबियन की परिकल्पना के अनुसार लोकतान्त्रिक समाजवाद को भी कोई ख़ास सफलता नहीं मिली। कल्याणकारी राज्य का सिद्धांत समाजवाद का बहुत ही कमजोर स्वरुप सिद्ध हुआ है। सबके सामूहिक पुरुषार्थ से जो अच्छी चीजे उपलब्ध हो उन्हें सबके साथ बांट कर खाने का तरीका समाजवादी जीवन मार्ग है। लेकिन इस प्रक्रिया को अनुशाषित करने के लिए राज्य – सत्ता के द्वारा नियमन जरूरी है। फिर राज्य – सत्ता के नियमन करने वालों को अनुशासित कौन करेगा ? इसी से राज्य – सत्ता के अधिनायकवाद का जन्म होता है। एकदलीय व्यवस्था में यह शोषण के चरम विन्दु तक पहुँच सकता है। भारत ने इसीलिए सोवियत रूस से प्रेरित समाजवादी समाज बनाने का लक्ष्य तो रखा किन्तु उसके लिए बहुदलीय प्रजातंत्र की स्थापना की व्यवस्था की गयी।
     बहुदलीय प्रजातंत्र के कारण एकदल के अधिनायकवादी होने और कार्यपालिका तथा न्यापालिका पर नियंत्रण का खतरा कुछ हद तक टल गया। परन्तु बहुदलीय व्यवस्था में दलीय राजनीति के परंपरागत टकराव और सत्तापर काबिज होने की होड़ ने स्थितियों को और भी जटिल बना दिया। दलीय राजनीति के स्वभावमें ही यह निहित होता है कि सत्ता को येन - केन – प्रकारेण हस्तगत किया जाय। इसके लिए पिछले कई चुनावों से नए – नए हथकंडे अपनाये जाते रहे हैं। उनकी फेहरिश्त बहुत लम्बी है किन्तु कुछेक को उद्धृत करना जरूरी होगा। राष्ट्रीय दलों द्वारा क्षेत्रीय स्तरपर क्षेत्रीय दलों के साथ सिद्धांतविहीन गठबंधन , जनता को धर्मं, जाति,क्षेत्रीयता, प्रांतीयता, भाषा आदि के नाम पर विभिन्न वर्गों में बांटकर और प्रचार – माध्यमों द्वारा अनावश्यक वादों के साथ लगातार प्रचार के द्वारा अधिकमत प्राप्त करने की ललक ने प्रजातंत्र को दलीयतंत्र में तब्दील कर दिया है। इस बार सारे राष्ट्रीय नेता भी अपनी उपलब्धियों को गिनाने से अधिक दूसरों की कमज़ोरियों को गिनाने में ज्यादा वक्त बर्बाद कर रहे हैं। कुछ नेता तो मतदान केंद्र नियंत्रण और बोगस वोटिंग तक की सलाह खुलेआम दे रहे हैं। हालाँकि निर्वाचन आयुक्त को अधिकार है कि ऐसी प्रक्रिया की वकालत करने वाले नेताओं पर सीधे आपराधिक मामलों के अंतर्गत कार्रवाई की जा सके किन्तु फिर भी नेताओं की जुबान कितनी गंदी और नियंत्रणहीन हो गयी है , इससे इसका पता चलता है।
      दलीय राजनीति में चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवारों की खोज में सारेदल रहते हैं। अमुक क्षेत्र में किस जाति, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र वालों का मत है तथा किस उम्मीदवार को खड़ा करने से ऐसे मत प्राप्त किये जा सकते है , इसपर सभी दलों की नज़र रहती है। इन मतों को हासिल करने के लिए ऐसे उम्मीदवार जिनपर आपराधिक मुक़दमा चल रहा है उसे भी उम्मीद वार बनाने में किसी भी दल को कोई परहेज नहीं होता है। 'सत्यमेवजयते' के ३१ मार्च २०१४ के एपिसोड के अनुसार राष्ट्रीय संसद में ३०% और राज्य सभाओं के ३१ % चुने हुए प्रतिनिधि ऐसे हैं जिनकी या तो सजा हो चुकी है या जिनपर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। यदि धीरे – धीरे इनकी संख्या बढती गयी तो कोई आश्चर्य नहीं होगा जब यह कानून ही बन जाये जिसमें नेताओं द्वारा संगीन अपराध करने पर भी कोई नहीं सजा या बिलकुल कम सजा के प्रावधानका बिल पास कर दिया जाय। हम लोगों ने पिछली लोकसभा की कार्यवाही में देखा है कि सारे प्रतिनिधि या पक्ष और विपक्ष दोनों वैसे प्रस्तावों को तुरत पास कर देते हैं जिनमें प्रतिनिधियों के वेतन, पेंसन, या भत्ता आदि बढ़ाने का प्रावधान होता है। इसी दलीय राजनीति से क्षेत्रीय स्तर पर ऐसे दलों या नेताओं का उदय हुआ  है जिन्होंने क्षेत्रीय भावनाएं भड़का कर मत प्राप्त किया और राज्य या केंद्र में कुछ मतों के जोड़ – तोड़ करने में खरीद  - फरोख्त के द्वारा इस या उस दल को सरकार बनाने में समर्थन करने के लिए काफी धनराशि ली। इस धनराशि की व्यवस्था की फंडिंग में कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों का भी परोक्ष हाथ रहा है ताकि बाद में अपने अनुकूल बिल पास करवाकर अधिक मुनाफा कमाने का मार्ग प्रशस्त किया जा सके।
      इसतरह आज का प्रजातंत्र सिर्फ दलीय राजनीती का अखाडा बन कर रह गया है। संसद और राज्य विधान सभा में जिसतरह का आचरण और दृश्य देखने में आ रहे हैं चुनकर आये नुमाइंदों के चरित्र और गुणवत्ता के कारण इससे बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। सिर्फ मतदाताओं द्वारा डाले गए मतों की संख्या के आधार पर सिमटते जनतंत्र में कुल मतदाताओं की संख्या या कुल डाले गए मतों की संख्या का कम प्रतिशत लगभग ३० या ३५ % लाने वाला उम्मीदवार भी विजयी घोषित हो जाता है। इससे तो सबों के मताधिकार का अधिकार भी अवास्तविक और अप्रासंगिक लगने लगता है। दलीय पद्धति लोगो को कायर और दब्बू भी बना रही है। समाज रूपी तालाब में संकीर्ण भावनाओं की जो गन्दगी और बदबू तल में बैठी रहती है चुनाव के समय उम्मीदवार लोग उसमें कंकड़ मार – मार कर ऊपर ले आते हैं ताकि समाज मैं गन्दगी फैले और उससे मतों के विभाजन का फायदा मिले। जो काम अंग्रेजों ने शासन स्थापित करने और चलाने के लिए तथा आज़ादी के समय भारत को विभाजित कर किया वही काम नेता लोग आज़ादी के बाद चुनाव के समय करते हैं। इस तरह से तो दलीय पद्धति द्वारा जनता और भी डरपोक और नपुंसक बनती जा रही है। इस पद्धति ने जनता की शक्ति और अभिक्रम (initiative) को बढ़ाकर स्वराज्य स्थापित करने और अपनी व्यवस्था अपने आप सम्भालने के लिए सशक्त नहीं किया है। वह ऐसा करना चाहती भी नहीं है। दलों को तो सिर्फ इससे मतलब है कि सत्ता उनके हाथ में आये और वे जनता पर राज्य कर सके। इस तरह इस दलीय पद्धति ने लोगों को भेड़ों की स्थति में ला दिया है जिसका अधिकार केवल नियत समय पर गड़ेरियों को चुन लेना है जो उनके कल्याण की चिंता करेंगे। यानि आज का प्रजातंत्र वो व्यवस्था है जिसमें  'बकरे या भेड़ें अपने हिस्से के कसाई को खुद चुनती है। 'इसीलिये तो उम्मीदवार चुनाव जीत जाने के बाद जनता से कह सकता है ' मैं व्यभिचारी , भ्रष्टाचारी , दुराचारी और न जानेक्या – क्या बीमारी हूँ , ऐसा मैंने सुना है, किन्तु क्या करूँ मुझे तो आप ही ने चुना है।' इस दलीय तंत्र में एक ही मूल मंत्र है कि आप अपने मत का उपयोग सावधानी से करें , विवेक से करें। सच पूछिए तो यह ऊपरवाले का चमत्कार ही है कि इस सबके वावजूद भी भारत का अखंड और समरस वज़ूद काफी हद तक बना हुआ है।
      क्या यह स्थिति बदल सकती है? अभी इस चुनाव पद्धति में यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र से कई उम्मेदवार खड़े हो और मतों का विभाजन होता है तो हम देखेंगे कि सबसे अधिक मत पाकर जीतनेवाला उम्मीदवार भी उस क्षेत्र के कुलमतों या कुल डाले गए मतों के २५ या ३० %  पाकर विजयी हो जाता है। यानि जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार भी अल्पमतों से जीतकर आते है और परिणामतः ५०% से काफी कम मत वाली जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। भारत में प्रचलित चुनाव पद्धति में सुधार, जिसमें मतदान करना सबों के लिए अनिवार्य कर दिया जाय, के द्वारा इस समस्या का हल प्राप्त किया जा सकता है। अभी ईवीऍम में नोटा बटन का प्रावधान किया जाना उचित दिशा में उठाया गया कदम है। अगर किसी चुनाव क्षेत्र  में खड़े उम्मीदवारों में मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो नोटा (Non of the above)बटन को दबाया जा सकता है। इस समय मोबाइल करीब- करीब सभी जगह उपलब्ध है। मोबाइल के द्वारा पैसों का भी आदान – प्रदान होने लगा है। मोबाइल के द्वारा ऑनलाइन मतदान की तकनीक का विकास कर चुनाव प्रक्रिया को कम खर्चीला और आसान बनाया जा सकता है। इससे चुनाव प्रक्रिया में सुरक्षा - दल , मतदान करने वाले कर्मचारियों तथा मतदान सामग्री के पहुचाने आदि में होने वाले खर्चे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। दागी उम्मीदवार को किसी भी स्थिति में चुनाव में खड़ा होने से बंचित करने पर उम्मीदवारों की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सबसे अधिक प्रभावोत्पादक वह कदम होगा जिसमें जीते गए उम्मीदवारों को चुनाव के दरम्यान किये गए वादों को पूरा नहीं करने पर उनके कार्य काल पूरा होने से पहले मतदाताओं द्वारा वापस बुलाने का प्रावधान किया जा सके। लेकिन इसके लिए संविधान में संसोधन की जरूरत होगी। यह संसोधन कोई भी दल नहीं लाना चाहेगा। अगर कोई व्यक्ति या दल इसे ले भी आता है तो दूसरे दलों या सांसदों के विरोध के कारण कभी पास नहीं होगा ।
       इस तरह हम देखते हैं कि इस चुनाव पद्धति में सुधार कर दूरगामी परिणाम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कुछ और चिंतन और मंथन किया जाय। क्या दुनिया में अब तक हुई क्रांतियों से इस समस्या का हल निकल सकता है? दुनिया में बड़ी – बड़ी क्रांतियां, इंकलाब हुए हैं। फ्रांसमें, रूसमें, चीन में क्रांतियां हुई। अमेरिका में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संग्राम भी एक क्रांति ही थी। लेकिन उसके बाद क्या हुआ? उस क्रांति का सबसे बड़ा नेता अपने देश के सर्वोच्च सिंहासन पर जा बैठा , उसने सरकार की बागडोर अपने हाथ में ले ली। क्रांति की उद्देश्यपूर्ति, परिवर्तन के लक्ष्य और नए समाज के निर्माण करने के नाम पर सबों ने सत्ताग्रहण की। केवल भारत में गांधीजी ही ऐसे निकले जिन्होंने सत्ता ग्रहण नहीं की। गांधीजी जिन्होंने स्वराज्य प्राप्ति के आंदोलनका नेतृत्व किया , जो सबसे सम्मानित , सर्वसम्मत नेता हो सकते थे , सत्ता से दूर रहे। वे सत्ता में जाकर देश की बागडोर सम्हाल सकते थे। लेकिन उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उनके उद्देश्यों की पूर्ति सत्ता द्वारा नहीं हो सकती थी। जिस कांग्रेस ने आंदोलन चलाकर आज़ादी प्राप्त की थी , जो पूरे देश की आवाज बनी थी , उसी कांग्रेस के लिए गांधीजी ने कहा था कि उसका विसर्जन करो और उसकी जगह उन्हीं लोगों को लेकर 'लोकसेवकसंघ ' बनाओ। गांधीजी के पी.ऐ.प्यारेलालजी द्वारा लिखी गयी पुस्तक 'लास्ट विल एंड टेस्टामेंट ' में इसकी चर्चा की गयी है।
     स्वराज्य के बाद हमारे देश की गाड़ी विपरीत दिशा में कैसे मुड़ गयी , इसके कारण जानने होंगे। भारतीय संविधान बनाने काम मुख्य रूप से देश के सर्वोच्च विधिवेत्ताओं के सिर पर दाल  दिया गया था। नया संविधान बनाने का काम आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वालों के हाथ में होना चाहिए था। शायद सोचा गया कि संविधान बनाना कानून विदों का काम है ताकि प्रावधानों को उचित भाषा और परिभाषा में निबद्ध किया जा सके। पर गांधीजी चाहते थे कि भारतीय राज्य की बुनियाद में ग्राम – स्वराज्य हो। जब संविधान का पूरा मसविदा तैयार हो गया , तब श्री संतानम या श्री टी. प्रकाशम्ने ध्यान आकृष्ट किया कि गांधीजी ने जिस ग्राम – स्वराज्य की कल्पना को स्वराज्य के ढांचे की बुनियाद माना था,  संविधान में तो उसका जिक्र ही नहीं है। जब इसका जिक्र संविधान सभा के अध्यक्ष डाक्टर राजेंद्र प्रसाद से किया गया तो उन्हें धक्का – सा लगा। इस बात को संविधान सभा में विचार के लिए रखा गया तो डाक्टर राव ने कहा कि अब यदि ग्राम – स्वराज्य को बुनियाद बनाकर सुधारने बैठेंगे तो पूरी चुनाव पद्धति सहित सारा स्वरुप बदलना पड़ेगा। नेहरूजी और सरदार पटेल के कानो तक यह बात पहुचाई गयी तो कुछ चर्चाओं के बाद संविधान में एक धारा और जोड़ दी गयी जिसमें राज्यों को यह निर्देश दिया गया कि ' संविधान के मूल मार्गदर्शक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ग्राम – पंचायत को स्वशासन की इकाई माना जाय।'  १९५९ में पंचायती राज का कार्यक्रम लागू किया गया।किन्तु उसके पीछे ग्राम – स्वराज्य की मूल अवधारणा नहीं बल्कि सामुदायिक विकास योजना मद की राशि के आवंटन के लिए गांव के स्तर पर एक सरकारी ढांचा खड़ा करना था। इसीलिये पंचायत आज स्वशासन की इकाई नहीं बल्कि राज्य सरकार की एक इकाई बनकर रह गयी है।
      गांधीजी राज्य – शक्ति के विकल्प के रूप में लोक – शक्ति को खड़ा करना चाहते थे। लोक – शक्ति के उदय के लिए ग्राम – सभाओं और मोहल्ला – सभाओं के गठन और उन्हें ही ऍम एल ये और ऍम पी चुनने का सीधा अधिकार दिया जाना पूर्ण स्वराज्य की ओर सशक्त कदम हो सकता था । आज की दलगत राजनीती और दलतंत्र से मुक्ति का मंत्र भी यह साबित होता। आज के समय में संविधान में इसका प्रावधान करना और उसे विभिन्न दलों के द्वारा चुने हुए नुमाइंदों द्वारा संसद में पास किया जाना असम्भव – सा लगता है। आज की प्रचलित दलीय और सत्ता की राजनीती के अलावा भी जनता के प्रत्यक्ष व्यवहारिक जीवन की असली राजनीती का कितना विशाल क्षेत्र पड़ा है और इसमें कितना अधिक काम करना बाकी है इसे सत्ता की राजनीती में रमे हुए लोगों को समझ नहीं आ सकता । इसे सत्ता की राजनीती में लिप्त लोगों की अपेक्षा टतष्ट लोग ही कर सकते हैं। इसीलि ये ऐसे लोकनीतिमूलक सवालों को जब तक दलीय तथा सत्तामूलक राजनीतिक लाभ की दृष्टि से सोचने के बदले देश – हित की दृष्टि से सोचा जाता , तब तक इनका हल नहीं ढूढ़ा जा सकता। राजनीती का अपना क्षेत्र है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन वही एकमात्र ऐसा क्षेत्र जहाँ सारी समस्याओं का समाधान होगा , ऐसा सोचना भी बिलकुल गलतहै। वास्तव में इस प्रचलित राजनीती के बाहर ही असली राजनीती का विशाल क्षेत्र पड़ा है जिसमें काम करके नयी लोकनीति को विकसित किया जा सकता है। इसीलिये दलगत राजनीती का एकमात्र विकल्प ग्राम – स्वराज्य आधारित लोकनीति ही हो सकती है आज की प्रचलित राजनीती (दलनीति ) नहीं।


----ब्रजेन्द्रनाथमिश्र

Monday, April 21, 2014

लोकसभा चुनावों के बाद क्या अपेक्षाएं हैं निकट भविष्य में?

लोकसभा चुनावों के बाद क्या अपेक्षाएं हैं निकट भविष्य में ?
लोकसभा चुनाव की गहमागहमी और शोर गुल के खत्म हो जाने के बाद का माहौल कुछ ऐसा होता है। मेरी लिखी कविता की कुछ पंक्तियाँ  ....
नेताजी की चली गयी गाड़ी,
जनता छूट गयी पीछे बेचारी .
प्रचार का अंत , ठंढी होती बयार है,
पीछे उड़ रहा गुबार ही ग़ुबार है।
अब दर्शन होंगे पांच वर्ष बाद ,
बाई बाई गुड बाई, धन्यवाद - धन्यवाद।
इसी तरह हमें सहयोग देते रहे,
आप दिन काटे, हम मलाई काटते रहें।
दलतंत्र चढ़ गया प्रजातंत्र की नाव है,
चुनाव ही चुनाव है।

चुनाव में किसी संसदीय क्षेत्र से  किसी किसी उम्मीदवार की जीत होती है।  जीता हुआ उम्मीदवार ,
) किसी राष्ट्रीय दल का उम्मीदवार होता है, किसी क्षेत्रीय दल का उम्मीदवार होता हैया ) निर्दलीय उम्मीदवार होता है। 
संसद में जाने पर उपरोक्त तीनो तरह के सांसदों के अलग अलग परिश्थितियों में अलग - अलग रोल होते हैं जिनमें तत्काल का राजनीतिक एजेंडा , शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म पर्सनल एजेंडा और आगे की संसद और देश की परिश्थितियों पर नज़र रखते हुए तय एजेंडा होता है। 
इन सारे अजेण्डाओं के बीच में अपने क्षेत्र की जनता से किये हुए वादे का एजेंडा कहाँ फिट होता है यह देखने वाली  बात होगी , भविष्य में।
संसद में चुनकर आये प्रतिनिधियों के द्वारा नयी संसद के गठन का कार्यक्रम शुरू हो जाता है।  इसमें किस राष्ट्रीय दल , दलों के गठबंधन और गठबंधन रहित दलों के गणितीय आंकड़े सत्ता के गलियारे तक के राश्ते की ओर ले जाने वाले होते हैं , यह चुने हुए प्रतिनिधियों की संख्या और उनकी दलों और समूहों के प्रति निष्ठां पर निर्भर करता है।  सत्ता तक पहुँचाने के लिए जादुई आंकड़े जताने का खेल शुरू हो जाता है।  अगर गठबंधन वाले दलों को कुछ ही संख्या से पूर्ण बहुमत प्राप्त करने में कसर रह जाता है तो फिर छोटे क्षेत्रीय   दलों  तथा निर्दलीयों  के वारे - न्यारे  होने  की संभावना प्रबल हो जाती  है।  इस जोड़ - तोड़ में उनका मोहरा सबसे बड़ा रोल प्ले करने वाला जाता है।  इसीमे मंत्री - पदों , सत्ता के अन्य पदों जैसे सरकारी कार्पोरेशन आदि में भागीदारी तथा पैसों का लेन - देन तक किया जाता है।  पैसों के स्थांतरण में धन - कुबेरों का भी रोल होता जो ऐसे कार्यों का फंडिंग करते हैं।  बाद में वे अपने अनुरूप बिल पास करवाकर अधिक मुनाफा कमाने के लिए अपनी परोक्ष और छद्म चाल चल रहे होते हैं। 
   राष्ट्रीय दलों और बड़े दलों के मैनिफेस्टो बनाने में किया गए कागज़ी   और मस्तिष्कीय व्यायाम धरे - के धरे रह जाते हैं।  सिर्फ एक ही लक्ष्य सामने होता है-- सिद्धांतों,  वादों, नीयतों और इरादों की कितनी बार बलि दी जाय, कितना तराशा , काटा - छांटा   और छोटा किया जाय ताकि सत्ता प्राप्त करने में कोई कोर – कसर न रहे।  हम पिछली लोकसभाओं में ऐसी कवायतों के चश्मदीद रहे हैं।  इस बार के संसद में चयनित उम्मीदवारों द्वारा कोई बेहतर चारित्रिक रुझान का दर्शन हो सकेगा , इसकी संभावना  कम ही है।  ऐसे समय में सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व पर निर्भर करेगा की सांसदोंको कैसी दिशा  दें ताकि सदन की मर्यादा बनी रहे।  साथ ही सत्ता प्राप्ति के जोड़ - तोड़ में सिधान्तो और नीतियों की कीमत एक सीमा से अधिक नहीं गिराई जाय। इसमें राष्ट्रीय मुद्दों, मसलन सर्वांगीण विकाश , भ्रष्टाचार मुक्ति , नौकरियों का सृजन , और राष्ट्रीय गौरव और अस्मिता  के उच्च आदर्शों की प्राप्ति जिनपर इसबार का चुनाव केंद्रित था , का निरंतर प्रयास हो।
  इस लोकसभा के गठन में दलों के गणितीय आंकड़ों की तश्वीर साफ़ हो जाने के बाद सत्ता के कैसे समीकरण बनते हैं , इसपर निर्भर करेगा कि जनता की अपेक्षाओं पर यह लोकसभा कितनी खरी उतरती है।  जनता की अपेक्षाओं में कोई विरोधाभास नहीं है।  चुनौतियां साफ़ हैं , परिश्थितियां भी किसी से छिपी नहीं है। 
राष्टीय स्तर पर अपेक्षाएं :
राष्ट्रीय स्तर पर आधारभूत सुविधाओं के लिए आवश्यक संरचना का विकास   प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है।  इसमें वर्तमान रेल , रोड में सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम के साथ पूरे देश में रेल और रोड लिंक का जाल बिछाया जाना शामिल है। विमान - सेवा भी हर जगह उपलब्ध हो।  इसके लिए विमान - पट्टियों का निर्माण जरूरी है।  साथ ही विमान सेवा की दरें ऐसी हो जिससे आम आदमी भी अगर हमेशा न सही किन्तु विशेष परिस्थितियों में उसका उपयोग कर सके।  अगर गुड गवर्नेंस को इसमें मिलाया जाय तो इन सबों के विकाश के मद में आवंटित राशि का पूरा उपयोग उसी में होना चाहिय।  इसके लिए अभी तक की प्रचलित पद्धति में ठीकेदार , अफसर, मंत्री के स्तर पर आवंटित राशि के अनावश्यक लीकेज को बंद करना जरूरी होगा।  क्या ऐसा सम्भव है? जो निर्वाचित प्रतिनिधि करोडो खर्च कर चुनाव जीत कर आया है , उससे वित्तीय रिसाव की इस परिपाटी को बदल दिए जाने की अपेक्षा करना बेमानी है।  चाहे कोई भी सरकार आये , किसी भी दल का सत्ता पर अधिकार हो , इस स्थिति में अंशतः भी सुधार लाना नामुमकिन है। वास्तव में क्या सम्भव है? जनता के सामने बहुत ही कम खुले विकल्प हैं।   सभी विकल्पों को अगर देखा जाय तो  आम आदमी इसी में बेईमानी की केटेगरी तय कर सकता है , जैसे यह आदमी या दल कम बेईमान है , इसलिए इससे अपेक्षाओं की पूर्ती किसी हद तक अधिक प्रतिशत में हो सकती  है। ऐसे ही आधारभूत संरचनाओं के विकास के तहत नए - नए शहरों के निर्माण की भी परिकल्पना राष्ट्रीय दल के मैनिफेस्टो में की गयी है।  ये शहर विकाश के न्यूक्लियस होंगे जिनके चारो तरफ विकास का महल खड़ा कर अधिक नौकरियों के सृजन की परिकल्पना को धरातल पर उतारा जाएगा ।  आज तक गावों  की  कीमत पर शहरों का विकास होता रहा है।  शहर आधारित गावों का विकास या गावों  आधारित शहर का विकास , इनमें किस मॉडल को अपनानायेजाने की जरूरत है , यह तय करना होगा।  अभी तक गावों के कम विकास के कारण गावों से लोगों का पलायन शहरों की और होता रहा है।  इसी वजह से शहरों के अनियोजित ,  अनपेक्षित , बेतरतीव विकास  और  आवश्यक सुविधाओं की कमी तथा सुविधाओं की उपलब्धता पर अनावस्यक दबाव देखा जा रहा है।  शहरों में स्लम्स का फैलता दायरा इसीका परिणाम है।  इस असंतुलित विकास के कारकों पर विराम लगन पड़ेगा . धरा जो उल्टी बाह रही है उसे उलटकर सीधा करना होगा। इसे कर पाने की नीयत और प्रतिबद्धता किसी भी दल या ब्यक्ति में अभी दिखाई नहीं दे रही है। 

गावों के विकास की संभावनाएं :
राष्ट्रीय स्तर पर गावों के विकास की कोई ठोस नीति नहीं है।  गावों कैसे स्वावलम्बी हो कि वहां से लोगों का शहरों की और पलायन रुके।  गावों के किसान , मज़दूरों की हालत में कैसे सुधर लाया जय ताकि सबों को हमेशा काम मिले।  इसके लिए खेती की स्थिति में मूलभूत सुधार की आवश्यकता है।  सभी खेतों के लिए पानी की जरूरत की अनिवार्यता को स्वीकारना होगा। इसके लिए अगर राष्ट्रीय स्तर पर नदियों को जोड़ने जरूरत हो तो उसे युद्ध स्तर पर पूरा करना होगा।  साथ ही गावों में उत्पादित वस्तुओं की उचित मूल्य पर बिक्री भी सरकार की राष्ट्रीय नीति का मुख्य मुद्दा होना चाहिए।  गावों का किसान ही एक ऐसा बेचारा होता है जो अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं का मूल्य वह खुद नहीं तय करता।  उसका मूल्य ब्यापारी और बाजार तय करता है।  इसके कारन जब कोई फसल कटती है और वह बाजार में आती है उससमय उसका मूल्य सबसे काम होता है।  यानी ब्यापारी उसे काम दामों पर लेकर उसका भण्डारण कर कुछ दिनों बाद उसे ऊँचे मूल्य पर बेच कर मुनाफा कमाता है।  सरकार के द्वारा उदपादित वस्तुओं के भण्डारण की कोई उचित नीति नही है जिसके कारन सकरी गोदमोंब में पड़ा अन्न भी साद जाता है।  और जरूरत पड़ने पर सरकारें उन वस्तुओं का आयात कर उपलब्धता बढाने की कोशिश करती रही है।  गावों में उत्पादित वस्तुओं के भण्डारण गाओं में ही किसान कोआपरेटिव बनाकर किया जा सकता है।  सरकार इसमें मददगार साबित हो सकती है। 
गावों में हर घर में शौचालय की ब्यवस्था, चिकित्सा सुविधा की उपलब्धता, पीने के पानी की पर्याप्तता, स्कूल, कॉलेज की ब्यवस्था गावों के समेकित विकास के लिए जरूरी है। शिक्षण ब्यवस्था में ऐसे पैरामीटर हों तथा ऐसे प्रेरक तत्व हों जिससे वहां से शिक्षित युवक और युवतियां गावों के विकास के लिए कार्य करने को उत्सुक हों। वे प्रेरणा के  श्रोत बने, अपने लिए और आगे आनेवाली पीढ़ी के लिए भी, ताकि स्वावलम्बी गावों की परिकल्पना को धरती पर उतरा जा सके।
      वास्तविकता क्या है?  आज की परिश्थिति में चुनावी  माहौल ने ही पूरे समाज, जिसमे गावों का समाज भी शामिल है , को जाती , धर्म , संप्रदाय , मज़दूर,  किसान आदि वर्गों में इसतरह बांटा है कि वहां की समरसता की धारा सूखती - सी दिखाई दे रही है।  जहाँ एक - दूसरे से सहयोग हुआ करता था , वहां एक - दूसरे के प्रति ईर्षा और घृणा का भाव पनप रहा है , जहाँ का कारोबार और  सरोकार एक - दूसरे के परस्पर मिले हाथों के सहकार द्वारा संपन्न होता था , वहां एक - दूसरे के विरुद्ध उठे हुए हाथ नज़र आएंगे।  ऐसा यहाँ की प्रचलित राजनीतिक ब्यवस्था के नैतिक क्षरण के कारण हुआ है।  इसकी धारा को उलटने शक्ति आज के चुने हुए किसी प्रतिनिधि या दल में कतई  नहीं है। वे क्या कर सकते है ?  वे सिर्फ इतना कर दे , की गावों तक सड़कें , बिजली , सिंचाई के साधन , स्वास्थ्य और शिक्षा की ब्यवथा कर दे , इतने से गावों खुद अपना विकास कर लेंगे। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां बन जाँय , प्रांतीय स्तर से लेकर ब्लॉक स्टार और गावों तक आवंटित राशि सही - सही पहुँच जाँय , इतना ही बहुत होगा।

रिपोर्ट कार्ड तैयार हो :       
सरकार का राष्ट्रीय स्तर पर, और चुने हुए प्रतिनिधियों का चुनाव - क्षेत्र स्तर पर एक रिपोर्ट कार्ड तैयार हो। इस रिपोर्ट कार्ड में कैलेंडर के अनुसार टाइम बाउंड ( तय समय सीमा के अंदर ) कार्यक्रम के तहत सार्वजनिक कार्यों की सूची हो जिसे चुने गए प्रतिनिधि द्वारा संपन्न किया जाना जरूरी है।  इस रिपोर्ट कार्ड की समीक्षा हर तीन या छह महीने पर जनता की पंचायत या ग्राम - सभाएं करे . अगर निर्वाचित उम्मीदवार उस रिपोर्ट कार्ड में वर्णित कार्यों को समय पर पूरा नहीं कर सका हो उन कार्यों का विलम्बित होना उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर हो तभी उसे और समय देकर पूरा करने के लिए कहा  जाय।  जनता के प्रति उत्तरदायी होना उसकी अनिवार्यता बना दी जय।  रिपोर्ट कार्ड में उल्लिखित कार्यों का निरन्तरअधूरा रहना उस प्रतिनिधि की अक्षमता दर्शाता है।  ऐसी स्थिति में जनता की पंचायत या ग्राम सभा उसे वापस बुलाने का प्रस्ताव पास करसकती है।  जनता को यह अधिकार कंस्टीटूशन   द्वारा प्रदान  किया जाना जरूरी है।  इसके लिए सम्भवतः आज़ादी की एक और लड़ाई की जरूरत हो।  लेकिन यह प्रतिनिधियों की जनता के प्रति चुनाव के बाद अगले चुनाव तक ब्याप्त उदासीनता दूर करने के लिएअत्यावश्यक है।  उदहारण के लिए अगर विद्यार्थी लहगतार किसी पेपर में दो या तीन बार फेल हो जाता है तो उसे दूसरे क्लास में प्रमोशन नहीं मिलता और वह उसी क्लास में रह जाता है।  इसीतरह यहाँ जनता के कार्य को नहीं करने वाले उम्मीदवारों को कार्यकाल पूरा होने के पहले बुला लिया जाय और फिर नए उम्मीदवार का चयन हो , उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए।  एक या दो स्थानों पर अगर ऐसा हुआ तो निश्चित ही दूसरे प्रतिनिधि अपने कर्तब्यों के प्रति अधिक सजग हो जायेंगे।
क्या ऐसा हो सकता है ? ऐसा होने के  लिए  जनता , सरकार और राजनीती से जुड़े लोगों की मनःस्थिति में बदलाव की जरूरत है।  लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि अगर बदलाव अभी नहीं हुआ तो गिरावट उस स्तर तक पहुँच जाएगा जहाँ से उठना और उठकर निकालना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा।

  चुनाव में जीते हुए उम्मीदवारों से काफी अपेक्षाएं , उम्मीदे लगा बैठती है जनता।  लेकिन जनता से भी कुछ अपेक्षाएं है।  क्या हैं वे ? यह तो कतई नहीं है की मत दान कर आराम से सो जाये।  भाई और भी काम है मेरे . वोट दिया मैंने अब संसद या एम एल ए जाने।  अब जो करेंगे जनता के प्रतिनिधि करेंगे।  मेरा रोल समाप्त हुआ।  ऐसी स्थिति में प्रतिनिधि अपनी निधि बढ़ाने में लग जाता है , यानि की जनता के पैसे से अपनी तिजोरी भरना शुरू कर देता है।  इसलिए यह जान जाये की अगर जनता सोयेगी तो उसके प्रतिनिधि उसके कफ़न का इंतजाम जरूर कर देंगे।  यह परिस्थिति बहुत ही भयावह होगी . जनता अपने अधिकारों को जाने, यानि अपने को शिक्षित करे , कर्तब्यों का पालन करे , संगठित हो , और सजग हो।  सूचना के अधिकार , उचित मांगो के रिड्रेसल का अधिकार का यथासमय उपयोग करे।  अपना संगठन बनाये और प्रतिनिधियों तथा सरकारी कर्मचरियों को उनके उत्तरदायित्वों के सजग रखे।  सेल्फ हेल्प ग्रुप बनायें और उन समूहों को उपलब्ध ऋण की सुविधा के द्वारा घर - घर कुटीर उद्योगों का विकास हो।  तभी विकास की जो लहर दिल्ली में उठी हो वह गावों के धरातल से होते हुए उस अंतिम आदमी तक पहुंच सकती है जो आजतक विकास की लहर से अछूता रह गया है।


--- ब्रजेंद्र नाथ मिश्र


Friday, April 11, 2014

अनावृत जिस्म

अनावृत जिस्म

अनावृत जिस्म कब  निढाल हो
सो जाता है , गर्दन झुकाये।
जैसे सच्चाई अनावृत हो,
किन्तु सो जाती है उसकी आवाज
बिन चिल्लाये।

शरीर निर्वसना हो,
कहीं सड़क किनारे या पार्क में पड़ा हो,
सभी राहगीरों की सायकिल
स्कूटर, मोटर साइकिल या कारें,
अक्सर वहीं होती ब्रेकडाउन हैं ,
जैसे आदमी का हर दम
डाउन होता ईमान है।

और वो जो पडी है वहां पर
निर्वसना कहाँ है वह,
ऊपर तो पड़ी  चमड़ी की चादर है।
उससे नीचे झांकने की
 नहीं किसी की ब्यग्रता है ,
क्योकि वहां सच पिघल - पिघल कर
हड्डियों के बोन मेरो में ढलता है।
इसलिए आंतें नहीं कुलबुलाती,
किडनी नहीं रक्त - शोधन करता है ,
हाँथ- पाँव सुन्न से हैं ,
सिर्फ जिगर धड़कता है।
और ऑंखें देखती हैं,
की कौन - कौन उसे देखता है,                               
और आगे बढ़ जाता है।


---ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
   जमशेदपुर

Thursday, April 3, 2014

चुनाव है, चुनाव है

चुनाव है, चुनाव है


रैलियां है, रेले हैं,
सभाओं के मेले हैं।
नेताओं की दहाड़ है ,
माइक पर चिघाड़ है।
शामियाने है , कनाते हैं ,
झूठ और फरेब  की बातें है।
नेता जी जनता को सब्जबाग दिखाते हैं ,
चलो फिर से जनता को मनाते हैं।
इसीलिए सारा कावं-कावं हैं,
चुनाव है चुनाव है।


नेताजी हाथ जोड़े हैं,
मुहं खोले हैं, दांत निपोड़े हैं,
सिर गर्दन से झुकाये  है,
वोट माँगने जो आये हैं।
सभी स्त्रियों को बहनजी बताते हैं ,
सभी पुरुषों को जीजा जी बनाते है।
पगड़ी निकालते हैं ,
लोगों के पैरो पर डालते हैं।
बड़े विनम्र और शर्मीले हैं,
शील स्वभाव से पूरे गीले हैं।
पूरा शाष्टांग  कर बोल रहे,
जनता जी कहाँ आपका पावँ है,
भई,  चुनाव  है चुनाव है।


नेताजी  नेता पर आरोप लगाते हैं,
विफलता का दोष दूसरे पर डालते हैं,
आपस की भाषा में देते हिदायतें है,
एक दूसरे से करते गंदी- गंदी बातें हैं।
जुबान पर नहीं कोई मर्यादा है ,
कोई कम तो  कोई ज्यादा  है।
चुनावी जंगल में बने रंगे सियार  हैं,
चुनाव के मौसम की अलमस्त बयार है।
नफ़रत की खेती है ,
सियासी रेगिस्तां की रेती  है।
शतरंज की बिछी बिसात है ,
शह   है और मात है।
इसीलिए सभी चल रहे
अपने - अपने दावं है।
चुनाव है चुनाव है।


नेताजी आये हैं ,
फल फूल लाये हैं,
टूटी खाट पर बैठ जाते है,
कभी जमीन पर लोट जाते हैं ,
यहाँ वहाँ जहान की धूल खाते हैं,
जनता का असली सेवक बताते हैं।
पांच वर्ष बाद हुए दर्शन है,
कितना बड़ा महापरिवर्तन है।
फिर वोट ले जायेंगे
मतदान बाद ठेंगा दिखाएंगे .
नेताजी रामू की मड़ैया में टिके हैं,
कहते हैं मेरा यही घर हम यहीं के हैं।
आज रामू का बढ़ गया भाव है ,
चुनाव है चुनाव है।


नेताजी की चली गयी गाड़ी,
जनता छूट गयी पीछे बेचारी .
प्रचार का अंत , ठंढी होती बयार है,
पीछे उड़ रहा गुबार  ही ग़ुबार है।
अब दर्शन होंगे पांच वर्ष बाद ,
बाई बाई, गुड  बाई, धन्यवाद - धन्यवाद।
इसी तरह हमें सहयोग देते रहे,
आप दिन काटे, हम मलाई काटते रहें।
दलतंत्र चढ़ गया प्रजातंत्र की नाव  है,
चुनाव ही चुनाव है।


अंततः:
प्रजातंत्र का महापर्व है ,
इस पर हमें गर्व है।
संसद की मजबूत प्राचीर है ,
सांसद भी धीरे - धीरे बनते अमीर हैं।
बस , सिर्फ गरीब होता गाँव  है,
चुनाव है, चुनाव है ,
चुनाव है , चुनाव है।

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
    जमशेदपुर      

उजाला दे दूंगी (लघुकथा)

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