Saturday, July 15, 2017

सावन में झड़ी

#poem#nature
#BnmRachnaWorld

सावन में झड़ी
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सावन में लग रही झड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।

बादलों का शामियाना तान,
सजने लगा है आसमान।
सूरज  छुपा ओट में कहीं,
इंद्रधनुष का है फैला वितान।
धुल गए जड़ चेतन, पुष्प,
सद्यःस्नाता सी लताएं खड़ी हैं।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
सावन में लग रही झड़ी है।

धुल गई धूल भरी पगडंडी,
चट्टानों पर बूंदें बिखर रहीं।
कजरी के गीत गूंज उठे,
पर्दे के पीछे गोरी संवर रही।
झूले पड़ गए अमवां की डालों पर
कोयल की कूक हूक सी जड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
सावन में लग रही झड़ी है।

यक्ष दूर पर्वत पर अभिसप्त
खोज रहा बादल का टुकड़ा।
भेजने को संदेश प्रेयसी को,जो
खड़ी देहरी पर, म्लान है मुखड़ा।
उदास, लटें बिखरीं, तन कंपित,
आंगन की खाट पर बेसुध पड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
पावस में लग रही झड़ी है।

मोर का शोर भर रहा  उपवन में,
उमंगों का नहीं ओर छोर है।
किसान चला खेतों की ओर,
मन में बंध चली आशा की डोर है।
आनंद का मेला लगा है,
गाँव की ओर उम्मीदें मुड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।
पावस में लग रही झड़ी है।

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 10-07-2017
  जमशेदपुर।

Sunday, July 2, 2017

भारतीय संस्कृति के केंद्र विंदु हैं 'राम'

#article#spiritual
#BnmRachnaWorld
भारतीय संस्कृति के केंद्र विंदु हैं 'राम'
इस विषय पर ता: 01-07-2017 को सिंहभूम हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वाधान में उपर्युक्त विषय पर श्री नर्मदेश्वर पांडेय जी की अध्यक्षता और श्री अशोक पाठक 'स्नेही' जी के संयोजन में एक साहित्यिक परिचर्या का आयोजन तुलसी भवन में हुआ, जिसमें जमशेदपुर शहर के गण्यमान्य साहित्यकारों जैसे श्रीराम पांडेय 'भार्गव', श्री यमुना तिवारी 'ब्याथित', श्री कहैयालाल अग्रवाल, श्रीमती माधुरी, श्रीमती वीना, श्री शैलजी, श्री सुमनजी, श्री ग़ाज़ीपुरी जी, श्री तोमर जी, श्री बरुन प्रभातजी के साथ मैंने भी भाग लिया। उससमय निर्धारित समय पांच मिनट में उपरोक्त विषय पर मैंने जिस रचना का पाठ किया वह इसप्रकार है:

भारतीय संस्कृति के केंद्र विंदु हैं "राम".
राम भारतीय संस्कृति के रोम-रोम में बसे हैं। उनका चरित्र पौराणिक गाथा नहीं है, बल्कि पौराणिक से आधुनिक के बीच का पुल है। आज  हमारे अंदर, समाज और राष्ट्र के अंदर जो कुछ भी  उदात्त, आदर्श और मर्यादित है, उसके केंद्र में राम ही स्थित हैं। परिवार में भाई और भाई के बीच, पिता -पुत्र के बीच, माँ -बेटे के बीच, देवर-भाभी के बीच, ससुर-दामाद के बीच, सास-दामाद के बीच, समधियों के बीच या परिवार के अंदर और भी जितने तरह के रिश्ते आपको दिखाई पड़ते है, राम उसे हर जगह संस्कारित करते हुए दिखाई पड़ते है।
हारत खेल जितावै मोही
राम अपने भाइयों के साथ जब बचपन में खेल खेलते हैं, तो जानबूझकर अपने छोटे भाइयों को  जीत दिला देते है, खुद हारकर। यह एक महान नेतृत्व के उभरने की दिशा का संकेत देता है। बचपन से प्रजा का चाहने वाला बनकर उसके हृदय में जगह बना लेना, अपने सुकोमल ब्यवहार से अपनी विमाताओ  के भी हृदय को जीत लेना, अपने गुरु के प्रति पूर्ण निष्ठा, और अपने पिता की आंखों का तारा बन जाना कोई अनायास नहीं होता है। राम खुद को मर्यादा और संयम की कसौटी पर कसते रहते है। तभी तो राजा दशरथ को राम और लक्ष्मण को विस्वमित्र को सौंपने में, और वह भी राक्षसों से यज्ञ की रक्षा करने के लिए, बहुत कष्ट होता है।
यहां से राम का भारतीय संस्कृति, जो राक्षसों के द्वारा निरंतर प्रताड़ित की जा रही थी, की रक्षा के वृहत उत्तरदायित्व के रोल में प्रवेश होता है।
जहां वे ताड़का, सुबाहु, मारीच से निपटने में अपनी क्षमता दिखाते हैं, वहीं अहिल्या उद्धार के द्वारा स्त्रियों के प्रति अपनी संवेदना को प्रकट करते हैं।
सीता से पुष्पवाटिका में मिलन का प्रसंग मर्यादित प्रेम और श्रृंगार का जीवंत उदाहरण है, " गिरा अनयन नयन बिनु वाणी,"
धनुष यज्ञ में पिनाक के भंजन के बाद सीता का वरण, परसुराम से मुलाकात में स्थितियों को सूझबूझ से सम्हालने की क्षमता का परिचय और विस्वमित्र और वशिष्ट जैसे युगपुरुषों के प्रति सम्मान उनके चरित्र को ऊंचाइयों तक ले जाता है।
मंथरा के षड्यंत्र से विपरीत परिस्थितियों में अपने संतुलन कायम रखते हुए वन गमन को  गुह और उसके समाज से मिलकर  संगठनात्मक  अवसर के रूप में बदल देना कोई राम से ही सीख सकता है। वन में वे अश्थि समूह को देखकर आर्य भूमि की संस्कृति का आततायियों द्वारा क्रमिक कुठाराघात के विरुद्ध  सिंहनाद करते हुए घोषणा करते हैं, "निशिचरहीन करौं महि, भुज उठाई पैन कीन्ह" शायद पूरी  लीलायात्रा में राम यहीं पर अपनी मनसा ब्यक्त करते हैं, अन्यथा अन्य सारे स्थलों पर कोई भी निर्णय वह दूसरों पर छोड़ते हैं।
समूह में हर कोई अपने विचार देता है, और राम उन सारे विचारों को उचित स्थान देते हुए, निर्णय लेते हैं। यह उनके नेतृत्व की खूबी है। उच्छऋंखल और चरित्रहीन स्त्री के नाक कान काटने में संकोच नहीं करते है, वहीं सबरी जैसी तपस्विनी से मिलकर उसे सम्मान के उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित करते हैं। समाज को समरस बनाने का इससे बेहतर उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है।
जो स्त्री को सम्मान नहीं देता उसका बध करने से वे नही हिचकते, चाहे वह बाली जैसा बलसाली ही क्यों न हो।
अनुज बधू भगिनी सूत नारी।
सुनु सठ कन्या सम ये चारी।।
इन्हीं कुदृष्टि बिलोकत जोई।
ताहि बधे कछु पाप न होई।।
 रावण के प्रति उनके मन में कोई द्वेष नहीं हैं। लेकिन समाज में रावणत्व की प्रवृत्ति का समूल नाश करने से उन्हें कोई भी नही डिगा सका।
वे अपनो लीला यात्रा में अगर सीता हरण के बाद प्राकृत प्राणी की तरह विलाप करते दिखते हैं,  तो कहीं लक्ष्मण  के शक्तिवाण लगने पर सुधबुध खो बैठते हैं। कभी भक्त के  प्रति भक्तवत्सलता दिखाते हैं, तो  राक्षसों का वध करने से नहीं हिचलते।
भक्त हनुमान के प्रति उनकी प्रीति, केवट के प्रेम लपेटे अटपटे वचनों को सुनकर विहँस उठते हैं।
राम के चरित्र की जितनी भी ब्यख्या की जाय वह विशद कभी नहीं  होती, बस उनके विशाल समुद्र से कुछ मोती चुनने जैसा ही है। इसीलिए राम भारतीय संस्कृति के केंद्र में स्थित है, घुले मिले हुए हैं।
राम के आदर्शों पर चलकर आज भी भारतीय संस्कृति के उत्स को संचयित किया जा सकता है। इसकी बहुत जरूरत है, और इसलिए राम आज भी उतने ही प्रासंगिक है, और हर युग में वे रहेंगें।


Wednesday, June 21, 2017

योग से जुड़ें

#poetry#motivational
#BnmRachnaWorld
योग से जुड़ें
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योग से जुड़ें, योग से जोड़ें।
मन को अमन की ओर मोड़ें।

सकारात्मक चिन्तन हो
गुणात्मक परिवर्तन हो।

मन के कुविचारों को छोड़ें।
योग से जुड़ें, योग से जोड़ें।

साँसों को अहसासों में घोलें।
चिंतन के नवीन पट खोलें।

अन्धविस्वासों के क्रम को तोड़ें।
योग से जुड़े, योग से जोड़ें।

स्नेह से जीवन को सिंचित करें।
प्रेम के पथ को आलोकित करें।

हिंसा के पथ को शांति की ओर मोड़ें।
योग से जुड़े, योग से जोड़ें।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  21-06-2017
  जमशेदपुर

Thursday, June 15, 2017

कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ

#poetry #motivational
#BnmRachnaWorld

 कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।
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इसी कलम से कभी श्रृंगार सजाता हूँ।
इसी कलम से कभी मल्हार गाता हूँ।।
इसी कलम से शब्दों के सुर ताल सुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बन रहा हूँ।

इसी कलम से शब्दों को अंगार बनाता हूँ।
इसी कलम से रणचंडी का त्यौहार मनाता हूँ।
इसी कलम से शब्दों के शैवाल चुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।

इसी कलम से जमा करता हूँ मसान  की राख,
इसी कलम से चुनता  हूँ हड्डियों की शाख।
इसी कलम से जीवन का वैराग्य गुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।।

इसी कलम से खोजता हूँ ठहरी एक छाँव,
इसी कलम से जाता हूँ, अपना छूट गया गांव।
इसी कलम से महुआ का बवाल
सुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
   जामशेदपुर।

Sunday, June 11, 2017

समर्पित
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वो सर्द साँझ थी जब पुष्प को अचानक  सी - बीच पर अंशिका जैसी ही आकृति दिखी थी. वह एक  अदृश्य आकर्षण से खींचता हुआ उस ओर बढ़ गया था. उसे अंशिका के साथ कॉलेज में बिताये हुए दिन रह रहकर याद आ रहे थे. वह भौतिकी के पीजी का छात्र था और अंषि, हाँ इसी नाम से उसे पुकारा करता था, इकोनॉमिक्स की. उसे अच्छी तरह याद है कि अंषि ने कैसे डिबेट में उसे जीतने के लिए अंतिम दिन,  ठीक डिबेट शुरू होने के पहले अपना नाम वापस ले लिया था. इसपर दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ था, और उसके बाद खूब प्यार.
"अंषि, सुनो तो..."
ऐसे कौन परिचित नाम से पुकार सकता था. अंशिका  ने मुड़कर देखा था.
"पुष्प, तुम यहां कैसे, मुंबई में."
"क्यों? मुंबई सिर्फ तुम्हारी है क्या?"
"घूमने आये हो क्या? अकेले हो?" अंषि का मतलब पुष्प की पत्नी,बच्चों से था.
"हां, अकेला तो अकेले ही होगा न."
"तुम्हारी पहेलियाँ बुझाने की आदत गई नहीं."
"तुम्हारे, श्रीमानजी,कहाँ है,  वो?"
"अंषि का तो मन हुआ कि वह कह दे, सामने खड़े हो और पूछ रहे हो कहाँ हैं वे.
"मैं यही छोटी से  इंडियन रेवेन्यू   सर्विस की नौकरी कर रही हूँ."
"तो, इनकम टैक्स में हो? तब तो डरकर रहना होगा. कहीं रेड न करवा दो."
"तुम पर तो रेड करने में मज़ा ही आएगा.  तुम कहाँ हो?"
"तुम्हारी शरारत गई नहीं. मैं यही Bhabha Atomic Research Center में छोटा - सा वैज्ञानिक हूँ."
"तब तो एटम बम लगाकर उड़ा दोगे."
"काश, तुझे तुझसे  उड़ा पाता!"  पुष्प ने हंसकर कहा था.
"तो मैं चलूँ, मुझे जाना होगा."  अंषि  ने अपनी विवशता जताने की मुद्रा में कहा.
"........" पुष्प चुप ही रहा.
अंशिका चल दी. पुष्प जड़वत खड़ा रहा. वह उस ठूँठ की तरह खडा था जिसके सारे पत्ते झड़ चुके थे. जिसके पास देने को कुछ नहीं था, न फल, न पत्ते, न टहनियाँ.
अंशिका ने कुछ दूर जाकर मुड़कर देखा. पुष्प वैसे ही खड़ा था. देखकर वह मुड़ गई थी. उसने पीछे -से पुष्प से लिपटते हुए पूछा था.
"मुझे रोका क्यों नहीं जाने से?"
"मैं तुम्हें चाहता हूँ अंषि. तुझे कैसे रोकता?"
"बुध्धू, जिसे चाहते है, उसे बलपूर्वक रोक लेते है अपने पास."
अंषि, जिसे चाहते हैं उसे कैसे रोक सकते हैं, प्यार में अधिकार  नहीं जताया जाता.  ये तो निरा स्वार्थ हुआ न. ये तो possessive होना हुआ. मैंने  तो तुझे खुद को समर्पित किया है अंषि, तुझे बलात रोक कैसे सकता हूँ?" पुष्प ने अंषि के  सरक गए  समुद्र के जल में भींगते दुपट्टे की छोर को उठाकर  उसके वक्षस्थल पर सजाते हुए कहा था.
"तुम बिलकुल नहीं बदले..." कहकर अंशिका ने उसे और भी पास खींचकर भींच लिया था अपनी बाहों  में.

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर

Monday, May 29, 2017

वो संवरा करें

#nazm#poems_bnm

वो संवरा करें
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कहीं नहीं जाया जाए अपना उदास चेहरा लिए
छाँव ऐसी खोजें, जहां न हो कोई पहरा किये।

पुकार लेना, जब डूबती हो नाव किनारे से दूर
कोई साहिल तो मिलेगा जब जब बिखरा किये।

वो डोलती, झूमती आती है, यादों का बादल बनकर
उतरती हैं,  गहरे और गहरे, कहीं बसेरा किये ।

वो पर्वत - पर्वत नाचती है, चाँदनी  बनकर,
मैं निहारता ही रहूं,  वो  बस संवरा करें ।


वो नहीं, तो मैं नहीं, मैं नहीं तो वो कहीं भी नहीं,
ये कैसे अनजाने रास्ते है, जहाँ पहुंचे यूँ चलते हुए।

मैं शब्द ब्रह्म का साधक, वो मेरी सतत साधना
कविता - धारा बन बहती हैं, छल छल करते हुए।

-ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
-- जमशेदपुर

Monday, May 15, 2017

छाँव के सुखभोग कहाँ?



यह कविता मैंने अपने संघर्ष के दिनों में शायद २००१ से २००८ के बीच लिखी थी | उन दिनों मैं आर्थिक और मानसिक दृष्टि से काफी ब्यथित था |
जब इस फेज़ को मैं पार गया तब मैंने कविता लिखी थी, "छाँव के सुख भोग पथिक" जो इसी ब्लॉग में, अन्य वेबसाइट पर और लिखी कहानी  संग्रह "छाँव का सुख" में भी प्रकाशित हो चुकी है |

#poemsonstruggle_bnm

छाँव के सुखभोग कहाँ?


धूप से छाले सहे पर,
छाँव के सुखभोग कहाँ?

कल्पनाओं के क्षितिज पर,
जो सपन मैं बुन सका था |
जिंदगी की कशमकश में,
भी उसे मैं जीसकूँगा |
परिंदों की तरह,
अपने घोंसले को देखकर,
सूंघकर उसकी सुगंध को
पी सकूंगा |

पत्थरों पर सूर्य - किरणें,
तपिश - सी दे रही,
पांव के छालों को
आराम का संयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

वेदना के शीर्ष पर
सब भाव पिघलते जा रहे |
आशाओं की आस में,
सब अर्थ धुलते जा रहे |

पोर - पोर पीर से
भर उठा है, क्या कहूं?
दर्द के द्वार पर,
आह के उदगार रीते जा रहे |

छीजती इस जिंदगी को,
हँस - हँस कर जी सकूँ,
कोई कोई कर सके तो करे,
मेरे बस में ये प्रयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

दलदल भरी कछार में,
दरार होती नहीं|
बाढ़ में जो बह गए,
उन वृक्षों की शाखों पर,
कभी बहार होती नहीं|

चिड़ियों की चहचहाहट
अब यादों में बसती है |
जड़ से जो उखड गए,
उनमें संवार होती नहीं |

जो खो चुके सबकुछ
इस सफर में उस सफर में |
उन्हें और कुछ भी
खोने का वियोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
जमशेदपुर,
दिनांक: २०-०८-२०१५





Friday, April 28, 2017

जिंदगी जीने का सलीका


#gazalbnm

जिंदगी जीने का सलीका

जिसे खुश रहने का तरीका आ जाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।

तूफान में थपेड़ों से नाव डगमगायेगी जरुर,
मौत भी करीब आकर छू जाएगी जरूर।

ऐसे में किश्ती को जो किनारे लगा पाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।

कैसे कैसे तूफान आयेंगें तेरे हिस्से में।
तू बदल देना उन्हें जांबाजी के किस्से में।

देखें गुर्वत कब तक तेरे साथ टिक पाता है।
जिसे खुश रहने का तरीका आ जाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।

किसी के सीने में अगर अंकुआते है सपन कई,
कोई जीता है अगर इसी जनम में जनम कई।

उसे ही उड़ान भरने का मौका आ जाता है।
जिसे खुश रहने का तरीका आ जाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र, जमशेदपुर।
वर्तमान निवास- सेक्टर 4, वैशाली,
दिल्ली, एन सी आर।

Saturday, April 15, 2017

वंचितों की दुनिया


#gazalbnm

वंचितों की दुनिया
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वंचितों की दुनिया में जिंदगी सहमी हुई है।
नीम अंधेरों में जैसे कोई रोशनी ठहरी हुई है।

गले में तूफ़ान भर लो,चीखें सुनाने के लिए,
शोर में दब जाती है, गूंज भी गूंगी हुई है।

मगरमच्छ हैं पड़े हुए उस नदी में हर तरफ,
जो खुशियों के समन्दर तक पसरी हुई है।

आह उठती है यहाँ,और पत्थरों से बतियाती है।
लहरों से टकराते हुए,ये नाव जर्जर सी हुई है।

रेगिस्तां की आंधियों में इक दिया टिमटिमाता है,
लौ थी थरथराती हुई, अब जाकर स्थिर हुयी है।

खुशबुएँ सिमट कर, किसी कोने में नज़रबंद थीं,
उड़ेंगीं अब, हवाओ के पंख में हिम्मत भरी हुई है।

उम्मीदों के फ़लक पर आ गयी है जिंदगी,
सपनों के जहाँ की नींद भी सुनहरी हुयी है।

वंचितों की दुनिया भी अब है उजालों से भरी,
नीम अंधेरों में भी अब रोशनी पसरी हुई है।


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
जमशेदपुर।

Tuesday, March 21, 2017

दर्द चेहरे पे उभर आये हैं

#bnmpoems

दर्द चेहरे पर उभर आये हैं
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दर्द जो दिल में छुपा रखे थे,
आज चेहरे पे उभर आये हैं।

जिन्होंने देने को संभाले रखा था
ये सारे गम, उसी के कुछ बकाये हैं।

लोगों ने साधे इतने निशाने मुझपर,
 गिरता नहीं खूँ, इतने तीर खाये हैं।

कैसे कह दूं मैं हँसता ही रहूँगा
आंसू भी तो मेरी आँखों में समाये है।

कहीं भी  शबनम सी बिखर जाती हो
कभी झांको मेरे दिल में भी सरमाये हैं।

छुआ था कभी होठों से मेरे होठों को
हम आज भी उसी याद को चिपकाये हैं।

सरमाया - मूलधन, पूंजी।
©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 11-03-2017, वसई ईस्ट, मुम्बई।

Monday, March 20, 2017

राही तू चलता जा

#bnmpoems

राही तू  चलता जा
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राही तू  चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

राहों पर कंकड़ - पत्थर,
टूट - टूटकर धूल बन गए।
वे सहलाती राही के
पैरों के नीचे फूल बन गए।

नहीं रहेगी थकन,
छाँव के नीचे बना है रास्ता।
राही  तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

चिलचिलाती  धूप खिली हो,
सर पर आग है बरस रहा।
तू रुकना मत, तू थकना मत,
तेरी आहट को कोई तरस रहा।

बाधाओं, अवरोधों से तुम,
जोड़ चलो एक रिश्ता।
राही  तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

आंधी में, तूफानों में,
नीरव वन में, सिंह - गर्जन हो।
साथी रुकना नहीं तुम्हें,
भले तड़ित-वाण वर्षण हो।

यादें अपने परिजनों की,
लाद चलो ना जैसा बस्ता।
राही तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

सत्य शपथ  ले, चले चलो तुम,
विजयपथ पर बढे चलो तुम।
अशुभ संकेतों से निडर हो,
रश्मिरथ पर चढ़े चलो तुम।

तन बज्र -सा, मन संकल्पित,
झंझावातों में समरसता।
राही तू चलता जा
चलने से तेरा वास्ता।


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
   जमशेदपुर, तिथि : मई, 2016.

Monday, March 13, 2017

फाल्गुनी दोहे

 #bnmpoems

फागुनी दोहे

कंचन जैसी देह तुम्हारी, होंठ तेरे रतनार।
नैन तुम्हारे तीर सरीखे, जैसे चुभे कटार।।

अंजुरी भरी यह प्रीत तुम, रख लो अपने पास।
गर ना आये पाती तो, मत होना उदास।।

होली में आऊंगा मैं, लेकर फाल्गुनी रंग।
सराबोर  मैं कर दूंगा, सारे अंग - अंग।।

लाल चुनरी भींगेगी, जब कसमस करते अंग।
मैं भर दूंगा उष्णता गर्म सांस के संग।।

फूल जैसी देह लचके ज्यों बिरवा के पात।
अमराई में चहकेगा जैसे नया प्रभात।।

रास रंग से तृप्त सुंदरी, यौवन भार अपार।
रात उतरती देह नाव पर, जाती है उस पार।

--©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
     तिथि: 13-03-2017
     चैत्र प्रतिपदा, होली का दिन!

Sunday, March 5, 2017

अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें

#bnmpoems

अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें
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अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।
उत्कंठित मनसे, उद्वेलित तन से,
उर्जा के प्रबलतम आवेग के क्षण से,
यौवन से जीवन का अविचारित यात्री बन,
अंतर में टूटते तटबंध  को टटोंलें।
 अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

यहाँ प्रेम ज्वर नहीं जीवन का पर्याय है।
खोजता है याचक बन बिखरने का उपाय है।
संचयन में नहीं, अभिसिंचन में अमृत कलश
उड़ेलकर देखे, विस्तार को समों लें।
 अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
--तिथि: 05-03-2017

रक्त उबलता ही जाये

#bnmpoems

रक्त उबलता ही जाये
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बिंधे देह, बिखरा हो रक्त,
लाशें बिछीं हो क्षत विक्षत।
लुटे श्रृंगार, बिखरी चूड़ियां
कैसे करें भावों को ब्यक्त!

बॉर्डर की हरीतिमा हुयी लाल,
सोते हुओं को कर गया हलाल।
 रक्त बह रहा रावी में फिर से
आया है एक नया भूचाल।

ललकारा है, रावी तट से,
सतलज, झेलम जम्मू तवी से
गंगा, यमुना,  ब्रह्मपुत्र को
दो आवाज़ सोन विप्लवी को।

जाओ, जाओ, उन्हें जगाओ
आज़ाद, दत्त, जतिन, सुभाष को
अशफाक, भगत , बिस्मिल, हमीद
राणा, शिवा, मंगल की सांस को।

कैसे सोये और मनाएं,
होली, विजया और दिवाली।
सीमा पर सो गया वीर,
लेकर साथ बंदूकों के नाली।

प्रहरी तेरे साथ मुल्क है
आगे बढ़ो, प्रहार करो।
जाग गया जब शेर वहां,
तब अंदर घुसकर दहाड़ करो।

सीमाएं अब बदलेंगी,
बदलेंगी खींची कृत्रिम रेखाएं
सीमा के पार जो है गुलाम,
आज़ाद उन्हें हम कर पाएं।

आओ हों संकल्पित हम सब
 आग न ठंढी होने पाए,
भारत हो अक्षुण्ण, अखंड
रक्त उबलता ही जाये।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 29-09-2016.

Thursday, March 2, 2017

रात भर निहारता रहा

#bnmpoems

तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे  रात भर निहारता रहा।

तू अनमनी सी खड़ी मोड़ पर
नेत्र -जल भर लिए, नेह तेरे लिए।
आस में सांस को उलझाते हुए,
प्राण को अंतरतम से पुकारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर, निहारता रहा।

कुछ तो ऐसा किया मैंने अनजाने में
जिसकी सजा में तेरी बेरुखी मिली।
मुझे आता नहीं, कैसे मनाऊं तुझे,
 अपलक नीर नैनों में  संवारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

काश! आते मेरी गोद में चाँद-बन
लिपट जाती तुझसे मैं चाँदनी बन।
तू  आये  क्रय मूल्य में आंकनेे मुझे
जैसे सौदागर कोई विचारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

मेरी खता माफ़ कर दो  प्रिय
प्रेम जल से  तुझे मैं सिंचित करूँ।
सोते - सोते, जागते - जागते,
सुस्वप्नों  को मन में पसारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

अन्धकार से खींच कर बांह तेरी
लिख दूँ एक पाती तेरे नाम की।
ओठ रख दूँ तेरे ओठ के छोर पर
अपने नैनों में नींद को विसारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर, 03-03-2017
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Thursday, January 12, 2017

युवा सोच

#bnmarticles
युवा सोच
युवा कौन है ?

 जिसकी उम्र २० से ३० वर्ष के बीच है या जो कॉलेज से अभी - अभी निकला है या इंजीनियरिंग , मेडिकल , या अन्य कोई प्रोफेशनल कोर्स खत्म करके अभी - अभी निकला है ? क्या वे सब युवा हैं?
उनमें से वही  युवा  है जिसकी  सोच युवा है।  अब इसपर विचार करें कि युवा सोच क़्या है ?
बुढ़ापा अतीत का स्मरण कर जीता है , यूवा अतीत से सीख लेकर वर्तमान मैं जीता हुआ या कहें कि वर्तमान को  जीतता  हुआ भविष्य के सपने बुनता है।
 वर्तमान को जीना और जीतने  में फर्क है। जब युवा अकॅडेमिक्स से बाहर  निकालता है तो अपने को जीवन के पथरीले एवं सख़्त धरातल पर खड़ा पाता  है।  बिनोबा जी ने इसे शैक्षणिक जगत से वास्तविक जगत की हनुमान कूद  कहा  है।  इस हनुमान कूद में अगर ठोस , पथरीले, चट्टानी धरती   पर खड़ा होने और उसके शॉक को अब्सोर्ब करने की क्षमता नहीं हुयी तो वह अपने पाँवों के साथ - साथ जीवन को भी लहू - लुहान कर जाता है। फिर जीवन में एक तरह के नैराश्य का  भाव  उसे पलायनवादी बना देता  है।
क्या किया जाय  जो ऍसी स्थिति में जीवन को पहुँचने  हीं दे।  इसके लिए  शिक्षण ग्रहण करणे के समय ही आगे आनेवाले जीवन  को जीने के नजरिये का विकाश करना  जरूऱी है। क्या हमारा परिवारिक और सामाजिक  माहौल एवं शिक्षा - पद्धति इस तरह के नजरिये के विकास में सही योगदान करते है?
शिक्षा  प्रदान करने वालों संस्थानो , आस - पास में फैले समाज और मनुष्य जहाँ बचपन से लेकर युवा होने तक जिस परिवार से जुड़ा होता  है उसका माहौल उसके जीवन को भावनात्मक और चारित्रिक दृढ़ता प्रदान करने में सहायक होता है। 
 आजकल की शिक्षण - पद्धति बचपन से लेकर उच्च - शिक्षा प्राप्त करने तक विविध जानकारियों की वर्षा करती  रहती है।  उसमें से कौन  सी जानकारियां ब्यक्तित्व की पूर्णता की ओर ले जाती  है , इसका नीर - क्षीर - पृथक्कीकरण विवेक के विकास के लिये मौलिक शिक्षा उम्र के वयस्कोन्मुख होने के पड़ाव तक अवश्य प्राप्त हो जानी चाहिए। आजकल वयस्क होने से पहले ही बच्चे के पास इतनी जानकारियों के स्त्रोत उपलब्ध  होते है कि उसे पता नहीं होता कि कौन सी जानकारियां हमारे जीवन और चरित्र के विकास में सहायक हो सकती है।
शक्तियों के पुंज को संघनित करने की वजाय उसके  क्षरण के अधिकाधिक साधन उपलब्ध हैं।  किशोर - मन उनके प्रति आकर्षित  हुये बिना नहीं रहता।  अभी के समय में  वेबजाल पर ७५ % से अधिक सेक्स सम्बंधी जानकारियां होती हैं जो किशोर - मन पर विपरीत प्रभाव ही डालती हैं। ऐसी जानकारियों की उपलब्धता को रोक पाना तो बिल्कुल ही मुश्किल है। 
 
क्या किया जा सकता है?
हमारे आसपास या  अतीत में जो उच्च विकसित ब्यक्तित्व, महापुरुष या विषिश्ट कार्य सम्पन्न करने वाले ब्यक्तियों के जीवन वृत्तान्त को बाइ  डिफ़ॉल्ट वेब जाल पर उप्लब्ध कर दिया जाय।  अभी जैसे साइट खुलते ही सनसनी पैदा करनेवाले समाचर उपलब्ध रहते हैं वैसे ही क्या आजकल के रोल मॉडल बनने लायक महापुरषो के ब्यक्तित्व और कर्तृत्व की जानकारी बाई डिफ़ॉल्ट उपलब्ध नहीं कराई जा सख़्ती ? वेबजाल के द्वारा ऐसी जानकारी निश्चित ही किशोर - किशोरियों को आगे के जीवन की तैयारी में अधिक सहयक होंगे।  इससे जो युवा सोच पैदा होगी वह विधेयात्मक चिंतनपरक होगी और उसके प्रभाव भी दूरगामी सुपरिणाम  देने वाला होगा।
  जब हम युवा वर्ग कहते हैं तो सिर्फ़ पढ़े - लिखे  उच्च शिक्षा प्राप्त युवा ही नहीं अर्धशिक्षित और अल्पशिक्षित युवाओँ की ओर भी ध्यान जाता है।  शिक्षा का अधिकार सबो को है।  किसी भी देश या कौम की उन्नति के मानक वहां  के  जन समुदाय में   शिक्षा के प्रसार  पर निर्भर करता है।  मुठी भर लोग अगर ऊंची शिक्षा , ऊंची - ऊंची डिग्रियां प्राप्त कर लें तो पूरा देश  शिक्षित नही कहलाता। देश का जन - मानस अशिक्षा के घोर अंधकार में पड़ा रहे और शिक्षित एवं  सम्पन्न लोगो का एक छोटा सा  वर्ग उनपर शाशन करता रहे , ऎसा नहीं चल सकता।  हाशिये पर रहने वाले लोग जिन्हे मैनेजमेंट गुरु सी के प्रह्लाद ने Bottom of the pyramid (BOP)  नाम दिए है , अगर शिक्षा और साधन से महरुम  रहेँगे तो उन्का असंतोष एक दिन अवश्य फूटेगा और अराजकता की स्थिति पैदा करेगा।  मैंने अपनी एक कविता में शिक्षा के अप्रसार और साधानों के असंतुलित वितरण से पैदा हुयी स्थिति के विरोधभास को चित्रित करते हुये लिखा है ..
चूल्हे जलते नहीं यहाँ किसी भी घर में,
फिर भी बस्ती से उठता हुआ धुआं तो देख

महलों के कंगूरे गगन को चूमते हैं, मगर
मिलता नहीं यहाँ किसी को आशियाँ तो देख

ये हरियाली जो इस ओर  दीखती है दूर तलक,
नजरें उठा, उस ओर का फैलता रेगिस्तां तो देख

फूटपाथ पर सोये  हैं जो लोग सट - सट  कर,
उनके ऊपर का खुला   आशमां  तो देख

जला चुके थे तुम जिन्हें चुन - चुन कर,
उस राख से उठती हुई चिंगारियाँ तो देख

अब लाशें भी उठकर खड़ी हो गयी हैं,
हवा में उनकी तनी हुयी मुठियाँ तो देख

ढूह में बदल जायेंगें महल दर - बदर ,
खँडहर कहेंगे इन सबों की दास्ताँ तो देख

वे जो सोते हैं भूख से बिलबिलाकर ,
तवारीख के पंख  पर लिखेंगे क्रांतियां तो देख

आज का युवा क्या इस स्थिति के कायम रहने के कारण उत्पन्न परिस्थिति की भयावहता के परिणामों के प्रति संवेदनशील है? शायद युवा आक्रोश ही है जो विद्रोही बनकर हथियार उठाकर या हथीयार से हल ढूढने वाले लोगो की अगुआई में उसका उत्तर ढूढने निकल पड़ता है . मगर सच  तो यह है की यह उत्तर ढ़ूंढ़ना नही उत्तर निकालने  से भागना है।  इसका मतलब है कि यह अशिक्षाअल्पशिक्षा या गलत शीक्षा  का ही परिणाम  जो युवको को अतिवादी उग्रवादी बनने की ओर ले जा रहा है।  इस निराशा के वातावरण से कैसे निकला या निकाला  जाय : परिथितियों को दोष देकर या परिस्थितियों में सुधार का प्रयास कर। 
    यह एक कड़वा सच है कि जिन क्षेत्रों में विकास की स्रोतस्विनी धार पहुंचते - पहुंचते सूख गयी है वहीँ  अतिवादी चिन्तन ने अपनी बाहें फैलाई है।   एक सर्वेक्षण से पता चला है ---भारत के मानचित्र को कानपूर से सीधी दक्षिण की तरफ एक सरल रेखा  से विभाजित किया जाय।  उस रेखा के दायें यानि पूर्व में और पूर्व - उत्तर  के क्षेत्र  में विकास कम हुआ है।  यानि कि इनक्षेत्रों में विकास का पहल नहीं हुआ या विकास की धार पहुंचते - पहुंचते सूख गयी।  उन्ही क्षेत्रों  में  अतिवाद  या उग्रवाद ने अपना पैर पसारा है।  छत्तीसगड़  का बस्तर का इलाका , उससे सटा आंध्र प्रदेश या   अभी का नया नाम सीमांध्रा, उड़ीसा का कलाहान्डी , रायगडा , सूना बेडा का क्षेत्र प्रबल रूप में इन गतिविधियों का केंद्र रहा  है।  यहाँ सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा विशेष पहल  की जरूरत  है।  क्या  किया  जाय ? एकतरफ युवा वर्ग केसामने ग्रामौर और विज्ञापनों के द्वारा मार्केटिंग करके ब्यपारियों और कंपनियों द्वारा लुभाये जाने का निरंतर प्रयास चल रहा है , तो दूसरी तरफ समाज और देश की ओर का कर्तब्य कठोर जीवनके तरफ ले जाने का इशारा करता है।  युवा निश्चित ही पहले जीवन के तरफ आसानी से आकर्षित होते हैं।  देश  और समाज की आवश्यकता कहीं पीछे बैकसीट पर है।  निजी जीवन से जुड़ा स्वार्थ सर्वोपरी हो जाता है। 
यह एकसच   है कि जीवन - यापन के लिए कोई ब्यवसाय ,नौकरी अपनाना जरूरी है।  उसके लिए आवश्यक क्षमता अवस्य विकसित करना चाहिए।  खूब अच्छे अविष्कारों और अन्वेषणों के लिए अभिक्रम विकसित करें।  किन्तु अपने पेटेंट को बेचकर ऐसे असंतुलन को पैदा करने में सहायक बनें जिससे आदमी आदमी का इतना शोषण करे की इन्शानियत ही विलुप्त होने लगे।  जहाँ ऐसा हो रहा है उसका विरोध करे।  यही युवा सोच है।
    हम मनुष्य बनानेवाले धर्म , मनुष्य बनानेवाले सिद्धांत चाहते हैं।  विवेकानंद ने कहा था ,
" आज हमारे देश को जिस चीज की आवश्यकता है, वह है लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्नायु - दुर्दमनीय प्रचंड इक्षाशक्ति जो सृष्टि के गुप्त तथ्यों और रहस्यों को भेद सके और जिस उपाय से भी हो अपने उद्देश्य की पूर्ति में समर्थ हों , फिर चाहे उसके लिए समुद्र तल में क्यों जाना पड़े - साक्षात मृत्यु का सामना क्यों करना पड़े।  मनुष्य बनानेवाली शिक्षा से ही ऐसा हो सकता है।"  
   मनुष्य बनाने वाली इच्छा शक्ति  के लिए एकाग्रता की शक्ति के द्वारा विचारों को पूंजीभूत  कर   स्पष्ट दिशा में लगाना जरूरी है।  इससे जो ज्ञान का अभ्युदय होता है उससे गहनतम रहस्यों तक पहुंचा जा सकता है।  एकाग्रता के लिए ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है।  यह काम शक्ति को आध्यात्मिक शक्ति में परिणत करके ही सम्भव है।  यह ह्य्पोक्रैसी नहीं है, यह मनीषियों के इन्टुशन  द्वारा सिद्ध  किया जा चुका है। आँखे खुली रखे , दृष्टी साफ़ हो तभी अध्यात्म प्रकट हो सकता है ---
एक छोटी सी कहानी है:
 एक बार एक स्वामी जी  अपने कुछ नए शिष्यों को ध्यान के बारे में बताते हुए कह रहे थे , " आप पद्मशन में बैठ जायँ , गर्दन सीधी हो , मेरुदण्ड सीधा हो , आप अपनी दृष्टि नासाग्रे पर टीकाएँ यानि नाक के अग्र भाग को देखें "
इसपर एक शिष्य ने कौतूहलवश पूछा ," स्वामी जी नासाग्र को आँखें बंद कर देखे या खोलकर ?"
इसपर सारे शिष्य हंस पड़े।  तो हमारी दृष्टि भी कहीं ऑंखें बंदकर या खोलकर देखने के संकल्प - विकल्प में तो नहीं झूल रही हैं।  इसपर विचार करना होगा।  तो मेरे युवा मित्रों युवा सोच आध्यात्म चिंतन के बिना उद्भूत हो ही नहीं सकता।
    मैं यहाँ जे पी (जयप्रकाश नारायण ) की पुस्तक "मेरी विचार यात्रा " से कुछ पंकियों को उद्धृत करना चाहता हूँ :
"इस देश का अध्यात्म बूढ़ों की वस्तु नहींजवानों की वस्तु रही है। जब हृषिकेश ने जीवन के कुरुक्षेत्र में अपूर्व अध्यात्म का पाञ्चजन्य फूंका था , तब वह वृद्ध नहीं , युवा थे और वह थे सारथी भारत के उत्कृष्ट तरुणाई के रथ के।  जब अपनी प्रिया के गोद में नवजात राहुल को सोया हुआ छोड़कर सिद्धार्थ अपनी अद्वितीय सांस्कृतिक क्रांति के पथ पर चल पड़े थे , तो वह वृद्ध नहीं , युवा थे।   अद्वैत के अनन्यतम शोधक शंकराचार्य ने जब अपनी दिग्विजय यात्रा की थी , तब वह वृद्ध नहीं , युवा थे।  विवेकानंद ने शिकागो के रंगमंच पर जब वेदान्त के सार्वभौम धर्म का उद्घोष किया था , तब वे वृद्ध नहीं , युवा थे।  गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दावानल में कूदकर जब अध्यात्म का आग्नेय प्रयोग किया था , तब वे वृद्ध नहीं , युवा थे।  अध्यात्म बुढ़ापे की बुढ़भश नहीं है, तरुणाई की उत्तुङ्गतम् उड़ान है।"
       इसलिए  यह देश  जिस अभिनव सांस्कृतिक क्रांति के द्वार   पर खड़ा है उसके सैनिक और सेनापति तरुण ही हो सकते है।  इसलिए मेरे तरुण मित्रों , अपने में विश्वास जगाओ , उठो और सोच को बदलो।  आसपास में विधेयात्मक चिंतन का प्रसार करो, स्थितियों से समझौता  नहीं , उन्हें बदलने का संकल्प लो।  अपने अंदर की आग को बुझने मत दो। 
दिनकर की पक्तियां थोड़े परिवर्तन के साथ :
  तूने दिया जगत को जीवन , जग तुम्हें क्या देगा ,
अपनी आग जगाने को नाम तुम्हारा लेगा।
     उठो और इस घोर अन्धकार में प्रकाश का पुंज बनो।  चारो तरफ रौशनी - ही - रौशनी हो। स्वार्थ के ऊपर उठकर विभेद की नीति का भेदन करो , नयी इबारत लिखो , जमाना तुझे याद करेगा . यही  युवा  सोच  है।

---ब्रजेंद्र नाथ मिश्र,
   जमशेदपुर

सावन में झड़ी

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