कामायनी पर मेरे विचार
छायावाद के चार स्तम्भों में से एक श्री जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति 'कामायनी' पर लिखे मेरे लेख को इ पेपर 'राष्ट्रीय नवीन मेल' के साहित्यिकी पृष्ठ पर स्थान मिला है. मुझे आपसे साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है. आपसे निवेदन है कि आप यह लेख पढ़े और अपने विचारों से अवगत कराएं. सादर 🙏❗
(मैं आपकी सुविधा के लिए इस लेख का टेक्स्ट भी यहाँ दे रहा हूँ )
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित काव्य "कामायनी" का लेखन काल ऐसे समय का है, जब समझा जा रहा था कि हिंदी या खड़ी बोली में काव्य रचना नहीं हो सकती है। इसके पहले मैथिली शरण गुप्त का काव्य साकेत आया था। लेकिन मुख्यतः तत्सम शब्दों में कामायनी ही उससमय की एकमात्र एकमात्र रचना थी। इसके पहले ऐसी सुसम्बद्ध, सुरुचिकर, अद्भुत कृति हिंदी साहित्य की काव्य विधा में देखने में नहीं आयी थी।
"कामायनी" हिंदी साहित्य के छायावाद युग की प्रतिनिधि रचना है। मानव की चित्त वृत्तियों का वैयक्तिकरण करना और उसे काव्य का रूप देना एक दुस्तर कार्य था, जिसे जयशंकर प्रसाद जी ने उससमय पूरा किया, जब हिंदी काव्य- लेखन एक संक्रमण- काल से गुजर रहा था। क्या यह काव्य सामान्य पाठक के बीच लोक व्यापक हो पाया था या अभी है?
इसपर विचार करने के पहले इसकी रचना के मुख्य बिंदुओं पर विचार करें:
वैसे महाप्रलय और उसके बाद जीवन के विकास की कहानी हर पंथ और ग्रंथ का विषय रहा है। यहाँ इस विषय को कवि ने "शतपथ ब्राह्मण" के पौराणिक ग्रंथ के जलप्लावन के प्रसंग से लिया है। जलप्लावन के महाप्रलय के बाद छिन्न - भिन्न हुई देव संस्कृति के पश्चात वैवस्वत मनु ही बचे थे। वे हिमालय के उत्तुंग शिखर पर स्थित हो अस्थिर चित्त से सोच रहे है:
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह,
एक पुरुष भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।
नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन।
' एक तत्व की ही प्रधानता' के दर्शन से ही मनु एक ऐसी ही सभ्यता का विकास करना चाह रहे हों...यही उनकी चिंता का विषय है - इसलिए जयशंकर प्रसाद ने पहले अध्याय का नाम 'चिंता सर्ग' रखा है। हर अध्याय मनुष्य की अन्तरवृत्तियों को रूपायित करता है। मानव सभ्यता के पूर्व शायद देव संस्कृति रही हो, जहाँ किसी प्रकार चिंता नहीं होने से 'चिर-यौवन' प्राप्त देवता 'नित्य-विलासी' रहे हों। जब कोई भी सभ्यता आत्म-मंगल, आत्म-आमोद-प्रमोद लीन भोग-विलास में गर्त हो जाती है तो प्रकृति यह अनाचार सहन नहीं कर पाती है और अपनी विनाश लीला से उस सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है। फलस्वरूप जलप्लावन और हिमयुग आ जाता है और एकमात्र मनु बचे रहते हैं।
आप कल्पना करें, नीरव एकान्त, चारो तरफ जल-ही-जल, ऊपर हिम, ब्रह्मांड के सतहों का लगातार टकराव, ज्वालामुखियों का भयंकर विस्फोट और लावा के फैलने से ऊंची उठती समुद्र की लहरों के भीषण तांडव के बीच एक जीवधारी मनु के रूप में इन सबका साक्षी बना नयनों के सामने सब देख रहा है। उनकी चिंता का पारावार नहीं है। जब यहाँ से वह एक सभ्यता विकसित करने की सोच रहा है। इसी चिंता से दैवी और आसुरी वृत्तियों का आविर्भाव होता है और उनके घात-प्रतिघात के बीच संतुलन बनाते हुए व्यष्टि और समष्टि दोनों की यात्रा जारी रहती है जबतक आनंद न प्राप्त हो जाय। इसलिए इस काव्य का अंतिम अध्याय आनंद सर्ग है।
मनुष्य की आंतरिक वृत्तियाँ को ही इस काव्य के अध्याय का नाम दिया गया है। एकं ओर आशा, श्रद्धा, लज्जा, इड़ा और निर्वेद जैसी दैवी वृत्तियाँ हैं, तो दूसरी ओर कामवासना, ईर्ष्या आदि आसुरी वृत्तियाँ हैं। जयशंकर प्रसाद जी ने पुस्तक के आमुख में लिखा है, "जलप्लावन की घटना ने मनु को देवों से विलक्षण मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया।"
"छान्दोग्य उपनिषद" में मनु और श्रद्धा की भावमूलक व्याख्या भी मिलती है। श्रद्धा कामगोत्र की बालिका है, इसलिए श्रद्धा नाम के साथ उसे कामायनी भी कहा जाता है। मनु प्रथम पथ-प्रदर्शक और अग्नि-होत्र प्रदर्शित करने वाले और कई वैदिक कथाओं के नायक हैं। जलप्लावन के पश्चात एकाकी मनु का मिलन श्रद्धा के साथ उसी निर्जन प्रदेश में बिखरी हुई सृष्टि को पुनः आरम्भ करने के लिए होती है। परंतु असुर पुरोहित के मिल जाने से वे पशु बलि देते हैं। इस बली के पश्चात मनु जो देव संस्कृति के ही अवशेष मात्र थे, उनमें देव - प्रवृति जाग उठती है - इड़ा के संपर्क में आने से।
इड़ा की उत्पत्ति दही, घी इत्यादि छवियों के पोषण से यज्ञ से होती है, इसलिए इड़ा स्वयं को मनु की दुहिता कहती है। वह प्रजापति मनु की पथ-प्रदर्शिका बनी और बुद्धि-विकास और राज्य स्थापन में उसी का प्रभाव रहा। इन्हीं सब धाराओं से मिलकर 'कामायनी' की मुख्य- कथा- धारा बहती है। परंतु दर्शन इसकी अंतर्धारा है। उसको याद रखकर ही पाठक इस काव्य का पूर्ण आनंद उठा सकते हैं।
साधारण पाठक से भी इस काव्य के अध्ययन के पहले तत्सम शब्दों के विन्यास की जानकारी के आधार की अपेक्षा की जाती है, तभी इस काव्य के दर्शन को समझ पाना आसान होगा। इसके छंदों की छवि और शब्दों के संयोजन में डूबकर ही आनंद पर्व तक की यात्रा करते हुए आनंद का अनुभव किया जा सकता है।
आनंद पर्व की अंतिम पंक्तियाँ देखें:
वह चंद्र-किरीट रजत नग स्पंदित -सा पुरुष पुरातन,
देखता मानसी गौरी लहरों के कोमल नर्तन।
प्रतिफलित हुई सब आंखें उन प्रेम-ज्योति-विमला से,
सब पहचाने से लगते अपनी ही एक कला से।
समरस के जड़ चेतन, सुंदर साकार बना था,
चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था।
और नारी के नारीत्व की उच्च भाव भूमि को व्याख्यायित करती पंक्तियाँ :
नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग-पग-तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में
आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा
तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा.
©ब्रजेंद्रनाथ
