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Thursday, August 6, 2026

अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld 

#story #affection#GovernmentOfficer




अधिकारी की आत्मीयता 


ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद के एस डी ओ के रूप में पदस्थापित जयंत नागर लम्बी छुट्टी के बाद ज्वाइन करने आ रहे थे.


सभी लोग सजग हो गए थे। उन्होंने बड़ा बाबू (पी ए ) को बुलाया था। उन्होंने सारे स्टाफ के बारे में पूछा था। स्टाफ में किसी ने तीलू के बारे में नहीं बताया ।


बड़ा बाबू से उन्होंने पहला सवाल यही किया, “तीलू कहीं दिख नहीं रही है? छुट्टी पर है क्या?”

तीलू ऑफिस की साफ - सफाई का काम करती थी। 

बड़ा बाबू ने कहा, “वह कुछ दिनों से नहीं आ रही है। किसी ने बताया नहीं कि वह क्यों नहीं आ रही है।”

जयंत जी लगभग डांटते हुए ही बोले, “किसी ने नहीं बताया, तो आप में से कोई उसके यहाँ जाकर पता नहीं कर सकता था। उसने छुट्टी ली है या नहीं? “

“उसने तो तीन दिनों की छुट्टी ली थी।”

“उसके अनुपस्थित रहते हुए कितने दिन हो गए?”

“करीब दस दिन तो हो ही गए होंगे।”

“तीन दिन की छुट्टी लेकर अनुपस्थित हुई। दस दिन होने जा रहे हैं। किसी ने अभी तक कोई खबर नहीं ली कि वह क्यों इतने दिनों से अनुपस्थित है। आप लोग भी संवेदनाविहीन हो गए हैं।”


बड़े बाबू ने दबी आवाज में कहा, “सर, वह पहाड़ी से नीचे उतरने वाली घाटी के बीच बने घरों में से किसी एक में रहती है। वहाँ हमारे स्टाफ में से कोई भी पास नहीं रहता है जो उसके यहाँ जाकर पता करता और हमें बताता।”

“वाह, बड़ा बाबू, हमारे बीच का कोई उसके पास के किसी घर में नहीं रहता है इसलिए उसके बारे में पता रखने का हमारा कोई फ़र्ज नहीं होता है। आपलोग भी अजीब हैं।” 

जयंत जी ने सारे स्टाफ को बुलाया। उनसे उन्होंने कहा था, “आप लोगों को मैंने इसलिए बुलाया है कि आप ने एक सामूहिक अपराध किया है। आपके बीच पिछले कई वर्षों से साथ - साथ काम करने वाली एक महिला साथी ऑफिस नहीं आ रही है। आप में से किसी को उसकी खबर लेने की सुध नहीं है। मुझे बहुत अफ़सोस हो रहा है।”

थोड़ी देर रुक कर उन्होंने ड्राइवर को बुलवाया था। उन्होंने बड़ा बाबू से कहा था, “मैं तीलू के घर उससे मिलने जा रहा हूँ। आप ऑफिस में किसी को कुछ भी नहीं कहिएगा।”


जयंत जी ड्राइवर को लेकर तीलू के घर की ओर चल पड़े थे। करीब दो किलोमीटर ड्राइव करने के बाद एक स्थान पर गाड़ी रोक दी गई थी। वहाँ से सड़क छोड़कर नीचे घाटी में उतरना था। उन्होंने ड्राइवर को वहीं रहने को कहा। एक बॉडीगार्ड के साथ वे पैदल नीचे घाटी में उतरने लगे। 


ऊँचे पहाड़ से नीचे उतरना कठिन और रोमांचक दोनों लग रहा था। चट्टानों के बीच से नीचे उतरते हुए, उन्हें हाथ से चट्टान के छोर को पकड़ना पड़ रहा था । बार - बार ऐसा करने से हथेलियाँ कीचड़ से सनी लगने लगी थी । एक स्थान पर बहते प्राकृतिक झरने में उन्होंने हाथ धोया था। चट्टान को पकड़कर ऊपर चढ़ने के बाद एक घर नजर आया था । वहाँ उन्होंने पूछा था कि तीलू का घर कौन सा है। उन्होंने वहाँ से थोड़ी हलकी चढ़ाई के बाद एक घर की ओर संकेत किया था। 



जयंत जी तीलू के घर के सामने पहुँच गए थे। घर में किसी के कराहने की आवाज आ रही थी, “तीलू, कहाँ चली गई? पानी, पानी!” 

जयंत जी ने देखा कि घर के बाहर लकड़ी के ही पटरों को बांधकर दरवाजे का ढांचा तैयार किया गया था। उसे ही घर के बाहर भिड़का दिया गया था। कराहने की आवाज अभी भी आ रही थी। तीलू कहीं दिख नहीं रही थी । जयंत जी से रहा नहीं गया। वे अंदर चले गए। अंदर आँगन जैसा था । उसके पार करने के बाद सामने के एक घर से कराहने की आवाज आती हुई लगी । उनके अंदर आते ही आवाज आनी बंद हो गई ।


इतने में हाथ में पत्तों का एक बंडल लिए हुए तीलू ने प्रवेश किया था। वह तो अपने घर के आँगन में अपने साहब को देखकर किंकर्त्तव्यविमूढ़, मूर्तिवंत ठिठकी रह गई। जिसे आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा हो, वह अचानक जब प्रत्यक्ष दिख जाय तो स्थिति कैसी हो सकती है, उसकी कल्पना भर की जा सकती है। तीलू की सांसे क्षण भर के लिए रुक गई । तब अचानक उसे ध्यान आया कि हमारे साहब हमारे आंगन में खड़े हैं, हम उन्हें बैठने के लिए भी नहीं कह रहे हैं ।


वह भूल गई कि वे पत्ते लाने क्यों गई थी। पत्तों को उसने आँगन के एक कोने में फेंका और वह दौड़कर घर के अंदर गयी। वहाँ से खाट उठा लाई। आँगन में खाट बिछा दी। नीचे बैठ कर वह अपने साहब के मुख मंडल को देखते हुए देखे ही जा रही थी, जैसे उसने ऑफिस में काम करते हुए साहब को कभी देखा ही नहीं हो। वह समझ नहीं पा रही थी, कि क्या बोलूं, या क्या पूछूँ। साहब ने यहाँ आने का कष्ट क्यों उठाया? यही पूछना चाहती थी वह।


जयंत जी उसके द्वारा बिछाए गए खाट पर बैठ गए। उन्होंने उसे भी खाट के पायताने 

बैठने को कहा। उसने संकेत से ही कहा कि वह वहीं ठीक है। तब तक उनका बॉडीगार्ड भी आँगन में आ गया था। उसने उसे समझाया कि साहब की बात उसे मान लेनी चाहिए। वह अपने भाग्य को मन - ही - मन हजार बार सराहने में लगी हुई चुप - सी हो गई थी । आपके साथ जब ऐसा घटने लगे, जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की हो, तब शरीर के अवयव भी अपनी सक्रियता भूल जाते हैं, मन में मूढ़ भाव आ जाता है। 


जयंत जी तो उस घर में प्रवेश करते ही सारी स्थिति समझ गए थे। तीलू अपने पति की बीमारी के कारण ऑफिस नहीं आ रही थी। 

उन्होंने पूछा था, “तुम्हारे पति बीमार हैं और तुमने इसके बारे में ऑफिस में किसी को खबर नहीं दिया। यह तुम्हारी गलती ठहरी।” 

तीलू तो और भी सकपका कर स्वयं में सिमट गई।

उन्होंने आगे कहा, “तुम्हारे तीन दिन की छुट्टी लेने के बाद तुम्हारे ऑफिस नहीं आने पर हम लोगों में से किसी ने तुम्हारी खबर नहीं ली, यह हमारी गलती रही। हम अपनी गलती सुधारने के लिए स्वयं आए हैं।”


तब तक अंदर से उसके पति की आवाज आई, “तीलू, कौन आया है?”

तीलू जल्दी से अपने पति के कमरे की ओर भागी। उसके मन में शायद आशंका रही हो कि उसका पति कुछ अनावश्यक बात नहीं बोल दे। उसने अंदर जाकर अपने पति को पानी पिलाया और उसे सारी बातें बताई । पति चुप हो गया था।

तीलू फिर आँगन में आई। जयंत जी ने कहा, “मैं तुम्हारे पति को लेने आया हूँ ।”


जयंत जी बाहर आए। गाँव के लोगों को पता चल गया था कि शहर के बड़े ऑफिसर गाँव में आए हैं। सभी के मन में कुछ - न - कुछ भाव होंगे, इसलिए वे बाहर एकत्रित हो गए थे। जयंत जी ने उन लोगों से कहा, “आपके गाँव से सरकारी अस्पताल दूर है। सरकारी अस्पताल पहुंचाने के लिए चिकित्सा - वाहन की व्यवस्था है। उसे बुलाने के लिए भी पास के किसी कालिंग बूथ (पी सी ओ) तक जाना होगा। मैं आपके गाँव में एक सरकारी कॉलिंग बूथ की स्थापना करवा दे रहा हूँ। वहाँ से आप कॉल कर चिकित्सा वाहन को बुला लेंगे । उसी वाहन से वीमार को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा सकेंगे। अभी आप तीलू के पति को ऊपर सड़क तक पहुंचने क़ी व्यवस्था कीजिए। वहां मैं अपनी गाड़ी से उसे अस्पताल पहुँचाऊंगा ।”


वहाँ उपस्थित लोगों में आपस में बात चीत आरम्भ हो गई । उन लोगों ने तुरंत एक खाट को पलट कर, उसके चारों पायों में रस्सियां लपेटकर सुरक्षित किया था। उसी पर उन्होंने तीलू के पति को लिटाया और चारों ओर चार लोगों ने उठा लिया। उबड़ - खाबड़ रास्तों और चट्टानों के कारण उसे थोड़े लम्बे रास्ते से लेकर चले। जयंत जी और उनका बॉडीगार्ड भी उनके पीछे - पीछे पैदल ही चले। उन्हें वहाँ तक पहुंचने में पंद्रह मिनट लगे होंगे। गाँव वालों की मदद से उसके पति को गाड़ी में पिछली सीट पर सुला दिया गया था। 


तीलू बाहर खड़ी सब देख रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके पति के साथ क्या हो रहा था। आगे क्या होने वाला है, यह भी उसे पता नहीं था। 

जयंत जी ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठ गए। वहाँ से सड़क ऊपर की ओर जाती थी। गाड़ी थोदी देर के बाद अस्पताल के सामने रुकी थी। जयंत जी वाहन से उतर कर सीधे अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर के चैम्बर में गए। वहाँ उन्होंने उनसे बात की। सारे डॉक्टर और नर्सिंग स्टॉफ एक साथ सक्रिय हो गए। जनपद के एस डी एम उनके अस्पताल के इंस्पेक्शन के लिए आए हैं, ऐसा उन्होंने समझा।


तीलू के पति को जयंत जी की गाड़ी से उतार कर स्ट्रेटचर में लाद कर सीधे इंटेंसिव केयर यूनिट में ले जाया गया। वहाँ इलाज आरम्भ हो गया। जयंत जी वहीं रुके रहे ।

आधे घंटे बाद डॉक्टर ने उन्हें कहा कि चेस्ट में इंफेक्शन है। एक्यूट निमोनिया जैसा लग रहा है। कुछ दिन अस्पताल में ही रहना होगा। जयंत जी ने डॉक्टर को दवाइयों का बिल बनाकर उन्हें भेज देने के लिए कहा। जयंत जी ने तीलू को बुलाया था । उसे सब कुछ समझा दिया । जब तक ठीक नहीं हो जाए तब तक उसे अस्पताल में ही रहना होगा। या तुम्हारी जगह पर कोई रिश्तेदार या गाँव का कोई आदमी रह सकता है । रात में कोई औरत साथ में नहीं रहेगी।

इतनी व्यवस्था करने के बाद वे अपने ऑफिस लौट गए थे. उन्हें संतोष था कि आज उन्होंने अधिकारी से इतर मानव होने का फ़र्ज निभाया है.





Friday, April 17, 2026

'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख )

 #bnmrachnaworld 



गुनाहो का देवता’ को एक बार फिर पढ़ना 

डॉ धर्मवीर भारती की लिखी और हर वर्ग के पाठकों द्वारा सबसे अधिक पढ़ी गयी कृतियों में से एक "गुनाहों का देवता" मैंने एक बार फिर पढ़ी. पढ़ी हुई किताब की सुनी - सुनायी कहानी को एक बार फिर पढ़ने का क्या मायने होता है या हो सकता है? आज से साठ वर्ष पूर्व या कहें कि टी वी के दौर के पूर्व इसे पढ़ते हुए, इसके प्रसंगों, पात्रों के बीच घटती घटनाओं और 'इसके बाद क्या' की स्थिति को जानने के लिए ही पढ़ा होगा. आज जब टी वी, मोबाइल, व्हाट्सप्प, इंस्टा, फेसबुक, विकिपीडिया सब कुछ हमारे सामने है, फिर क्यों पढ़ने का मन किया या करता है? 

मित्रों, यह 'मन किया या किया करता है', इसी में इसका उत्तर खोजने का प्रयास करता हूँ :

यह उपन्यास 1949 में पहली बार प्रकाशित हुआ था. अभी तक इसके सौ से अधिक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. अभी भी यह उतने ही चाव से पढ़ा जाता हैं. आज के आधुनिक दौर में जब कई ब्रेक - अप और प्यार में गिरने - गिराने के बाद सच्चा प्यार खोजने का चलन चल पड़ा है, क्यों चंदर और सुधा के प्रेम के आदर्श को प्रेमीजन आज भी खोजने का प्रयास करते हैं? 

चंदर में दोहरा व्यक्तित्व है, ऐसा लग सकता है. जब वह सुधा के सानिध्य में होता है, तो उसके अंदर का देवता जगा हुआ होता है. सुधा की आत्मीयता, निकटता और समर्पण भी उसे वहाँ तक बढ़ने से रोकता है, जहाँ तक वह पम्मी के प्रयास मात्र से पहुँच जाता है. एक ही व्यक्तित्व में देवता और दानव दोनों निवास करते हैं. सम्बन्धों के रेशे इतने बारीक़ होते हैं कि कब देवता वाला रेशा मजबूत हो जाय और कब टूट जाय, पता ही नहीं चलता है. चन्दर का सुधा के प्रति निःस्वार्थ और आदर्शवादी प्रेम सामाजिक मान्यताओं और परंपराओ की मर्यादा को अक्षुण रखते हुए, सुधा की डोली को सजाने - संवारने और विदा करने में परिणति पाते हुए, अपूर्ण ही रह जाता है. 

अपूर्ण या अर्धपूर्ण प्रेम ही सफल प्रेम कहानी बनती है, यह उपन्यास उसे साबित करते - करते रह जाता है, क्योंकि अपूर्णता के खालीपन को पूरा करने के लिए उस व्यक्ति का दानव जग जाता है या जगा दिया जाता है. उसका पूर्णता की खोज में पम्मी के सानिध्य में आना और उसके साथ अपने देवत्व को पृष्ठभूमि में धकेल देहसंसर्ग द्वारा संसार के सारे प्रेम की परिभाषा ढूढ़ने का प्रयास, सुधा का विवाह दूसरे से हो जाने की प्रतिक्रिया स्वरुप था या सहज, इस मनोवैज्ञानिता का चित्रण डॉ धर्म वीर भारती ही कर सकते थे, ऐसा लगता है. 

उन्होंने पात्रों के मनोवैज्ञानिक पहलू और उनकी भावनात्मक उथल-पुथल को बेहद संवेदनशील तरीके से चित्रित किया है।

प्रेमचंद के सामाजिक कहानियों और उपन्यासों के दौर के बाद, प्रेम की नई परिभाषा का दौर समसामयिक साहित्य में आरम्भ करने का श्रेय डॉ धर्मवीर भारती को ही जाता है. 

कहानी सीधी सादी है. कहानी के तीन मुख्य पात्र हैं : चन्दर , सुधा और बिनती। पूरी कहानी मुख्यतः इन्ही पात्रों के इर्दगिर्द घूमती रहती है। चन्दर सुधा के पिता यानि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के प्रिय छात्रों में है और प्रोफेसर भी उसे पुत्र तुल्य मानते हैं। चन्दर का सुधा के यहाँ बिना किसी रोकटोक के आना-जाना, सुधा का उसके साथ बाल सुलभ व्यवहार चन्दर के लगाव को बढ़ा तो देता है, लेकिन वह सजग भी रहता है कि सुधा डॉ शुक्ला, जिनकी छत्र छाया ही उनका जीवन है, की वह बेटी है. धीरे-धीरे सुधा कब दिल दे बैठती है, यह दोनों को पता नहीं चलता। लेकिन यह कोई सामान्य प्रेम नहीं था। सुधा चन्दर से सम्मोहित नहीं है. वह चन्दर को देवता की तरह पूजती है, एक भक्त की तरह ही उसे सम्मान देती है।


चंदर सुधा से प्रेम तो करता है, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए अहसान और व्यक्तित्व पर हावी उसके आदर्श कुछ ऐसा ताना-बाना बुनते हैं कि वह चाहते हुए भी कभी अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाता। सुधा की नजरों में वह देवता बने रहना चाहता है और होता भी यही है। सुधा से उसका नाता वैसा ही है, जैसा एक देवता और भक्त का होता है। प्रेम को लेकर चंदर का द्वंद्व उपन्यास के ज्यादातर हिस्से में बना रहता है। नतीजा यह होता है कि सुधा की शादी कहीं और हो जाती है और अंत में उसे दुनिया छोड़कर जाना पड़ता है।


सुधा के विवाह के बाद आए उसके पत्र को पढ़ने के बाद चन्दर की स्थिति का वर्णन:

कभी - कभी रोते - रोते आदमी की उदासी थक जाती है और आदमी करवट बदलता है. ताकि हंसी की छाँह में कुछ विश्राम कर फिर वह आंसुओं की कड़ी धूप में चल सके.

भावनात्मक और गहरे प्रेम का ताना - बाना इस उपन्यास में इतनी बारीकी से बुना गया है कि इसमें कहीं कहीं अंतरंगता होते हुए भी अश्लीलता नहीं है, इसमें सिहारन तो है लेकिन उत्तेजना नहीं है. 

यही इस उपन्यास और उपन्यासकार को महान बनाता है.  


---ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र 





Tuesday, March 10, 2026

कइसे खेलब होली (कविता)

 #BnmRachnaWorld 

#magahikavita 











कइसे खेलब होली 

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कागा न आइल मुंडेर हो, कइसे खेलब होली?

सजना जबसे गेलन विदेशवा,
पतियो न भेजलन देलन संदेशवा.

जियरा घड़ी घड़ी धक् धक् कर हई
(मनवा में उठ हई मरोड़ हो, कैसे खेलब होली?)
मुरझाईल मनवा के कनेर हो, कइसे खेलब होली?

देहरी पर घड़ी घड़ी जा हई धेयनवा,
जैसे हो आहट अइलन सजनवा.

कमवा में कहीं कोई मनवा न लग हई
केकरा से कही, भगिया के फेर हो, कइसे खेलब होली?

अब पूछे लगलन सब लोग लुगाई,
खमबा धरि खाड़ खाड़ गोड़वा पिराई.


कितनो जतन करs दुखवा के अंत न हई,
छछनल जियरा के, के समझतई अंधेर हो, कइसे खेलब होली?

देहरी पर जैसे कोई आहट होलई हे ,
हियरा में जैसे कोई घबराहट होलई हे.

अंगना में देखली खाड़ हथिन सजनवा
कागा  कइलकई बड़ी देर हो, अब खेलब होली.
कागा अब अइलई मुंडेर हो, हम खेलब होली.

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र 


फेसबुक लिंक : https://www.facebook.com/share/v/1FN5Efyd53/

49 मिनट बाद मेरी प्रस्तुति देखे. (तारीख 7 अप्रैल तक )

यूट्यूब लिंक :

https://youtu.be/GN2NMP_YCxY?si=9Ha7LVGqN9VKoPtK



Wednesday, March 4, 2026

पवन - झकोरे फागुनी (कविता)

 #holipoem #romantic 











पवन - झकोरे फागुनी 

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देह तुम्हारी कंचन, होंठ भयो रतनार।

नैन तुम्हारे तीखे, जैसे चुभे कटार।।


प्रीत आँचल में भरकर, रख लो अपने पास।

गर न आये पाती तो, होना नहीं उदास।।


होली में भरता जाए, चटख फागुनी रंग।

सराबोर मैं कर दूं, तेरे अंग - प्रत्यङ्ग ।।


लाल चुनरी भींगेगी, कसमस करते अंग।

भर दूँ देह में उष्मा, सांस निभाए संग।।


 फूल - देह ज्यों लचके, बिरवा की हो पात।

मेरी बगिया में आए, जैसे नया प्रभात।।


रास - रंग तृप्त नारी, यौवन भार अपार।

चढ़ चली देह-नाव पर, जाती है उस पार।।


पवन - झकोरे फागुनी, नस - नस बसें अनंग ।

पिऊ - पिऊ पुकारती, कोकिल बैन तरंग ।।







Tuesday, February 10, 2026

कामायनी पर मेरे विचार (लेख)

 




कामायनी पर मेरे विचार 

छायावाद के चार स्तम्भों में से एक श्री जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति 'कामायनी' पर लिखे मेरे लेख को इ पेपर 'राष्ट्रीय नवीन मेल' के साहित्यिकी पृष्ठ पर स्थान मिला है. मुझे आपसे साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है. आपसे निवेदन है कि आप यह लेख पढ़े और अपने विचारों से अवगत कराएं. सादर 🙏❗

(मैं आपकी सुविधा के लिए इस लेख का टेक्स्ट भी यहाँ दे रहा हूँ )

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित काव्य "कामायनी" का लेखन काल ऐसे समय का है, जब समझा जा रहा था कि हिंदी या खड़ी बोली में काव्य रचना नहीं हो सकती है। इसके पहले मैथिली शरण गुप्त का काव्य साकेत आया था। लेकिन मुख्यतः तत्सम शब्दों में कामायनी ही उससमय की एकमात्र एकमात्र रचना थी। इसके पहले ऐसी सुसम्बद्ध, सुरुचिकर, अद्भुत कृति हिंदी साहित्य की काव्य विधा में देखने में नहीं आयी थी।

  "कामायनी" हिंदी साहित्य के छायावाद युग की प्रतिनिधि रचना है। मानव की चित्त वृत्तियों का वैयक्तिकरण करना और उसे काव्य का रूप देना एक दुस्तर कार्य था, जिसे जयशंकर प्रसाद जी ने उससमय पूरा किया, जब हिंदी काव्य- लेखन एक संक्रमण- काल से गुजर रहा था। क्या यह काव्य सामान्य पाठक के बीच लोक व्यापक हो पाया था या अभी है?

इसपर विचार करने के पहले इसकी रचना के मुख्य बिंदुओं पर विचार करें:

वैसे महाप्रलय और उसके बाद जीवन के विकास की कहानी हर पंथ और ग्रंथ का विषय रहा है। यहाँ इस विषय को कवि ने "शतपथ ब्राह्मण" के पौराणिक ग्रंथ के जलप्लावन के प्रसंग से लिया है। जलप्लावन के महाप्रलय के बाद छिन्न - भिन्न हुई देव संस्कृति के पश्चात वैवस्वत मनु ही बचे थे। वे हिमालय के उत्तुंग शिखर पर स्थित हो अस्थिर चित्त से सोच रहे है:

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह,

एक पुरुष भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।

नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,

एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन।

' एक तत्व की ही प्रधानता' के दर्शन से ही मनु एक ऐसी ही सभ्यता का विकास करना चाह रहे हों...यही उनकी चिंता का विषय है - इसलिए जयशंकर प्रसाद ने पहले अध्याय का नाम 'चिंता सर्ग' रखा है। हर अध्याय मनुष्य की अन्तरवृत्तियों को रूपायित करता है। मानव सभ्यता के पूर्व शायद देव संस्कृति रही हो, जहाँ किसी प्रकार चिंता नहीं होने से 'चिर-यौवन' प्राप्त देवता 'नित्य-विलासी' रहे हों। जब कोई भी सभ्यता आत्म-मंगल, आत्म-आमोद-प्रमोद लीन भोग-विलास में गर्त हो जाती है तो प्रकृति यह अनाचार सहन नहीं कर पाती है और अपनी विनाश लीला से उस सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है। फलस्वरूप जलप्लावन और हिमयुग आ जाता है और एकमात्र मनु बचे रहते हैं।

आप कल्पना करें, नीरव एकान्त, चारो तरफ जल-ही-जल, ऊपर हिम, ब्रह्मांड के सतहों का लगातार टकराव, ज्वालामुखियों का भयंकर विस्फोट और लावा के फैलने से ऊंची उठती समुद्र की लहरों के भीषण तांडव के बीच एक जीवधारी मनु के रूप में इन सबका साक्षी बना नयनों के सामने सब देख रहा है। उनकी चिंता का पारावार नहीं है। जब यहाँ से वह एक सभ्यता विकसित करने की सोच रहा है। इसी चिंता से दैवी और आसुरी वृत्तियों का आविर्भाव होता है और उनके घात-प्रतिघात के बीच संतुलन बनाते हुए व्यष्टि और समष्टि दोनों की यात्रा जारी रहती है जबतक आनंद न प्राप्त हो जाय। इसलिए इस काव्य का अंतिम अध्याय आनंद सर्ग है।

मनुष्य की आंतरिक वृत्तियाँ को ही इस काव्य के अध्याय का नाम दिया गया है। एकं ओर आशा, श्रद्धा, लज्जा, इड़ा और निर्वेद जैसी दैवी वृत्तियाँ हैं, तो दूसरी ओर कामवासना, ईर्ष्या आदि आसुरी वृत्तियाँ हैं। जयशंकर प्रसाद जी ने पुस्तक के आमुख में लिखा है, "जलप्लावन की घटना ने मनु को देवों से विलक्षण मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया।"

"छान्दोग्य उपनिषद" में मनु और श्रद्धा की भावमूलक व्याख्या भी मिलती है। श्रद्धा कामगोत्र की बालिका है, इसलिए श्रद्धा नाम के साथ उसे कामायनी भी कहा जाता है। मनु प्रथम पथ-प्रदर्शक और अग्नि-होत्र प्रदर्शित करने वाले और कई वैदिक कथाओं के नायक हैं। जलप्लावन के पश्चात एकाकी मनु का मिलन श्रद्धा के साथ उसी निर्जन प्रदेश में बिखरी हुई सृष्टि को पुनः आरम्भ करने के लिए होती है। परंतु असुर पुरोहित के मिल जाने से वे पशु बलि देते हैं। इस बली के पश्चात मनु जो देव संस्कृति के ही अवशेष मात्र थे, उनमें देव - प्रवृति जाग उठती है - इड़ा के संपर्क में आने से।

इड़ा की उत्पत्ति दही, घी इत्यादि छवियों के पोषण से यज्ञ से होती है, इसलिए इड़ा स्वयं को मनु की दुहिता कहती है। वह प्रजापति मनु की पथ-प्रदर्शिका बनी और बुद्धि-विकास और राज्य स्थापन में उसी का प्रभाव रहा। इन्हीं सब धाराओं से मिलकर 'कामायनी' की मुख्य- कथा- धारा बहती है। परंतु दर्शन इसकी अंतर्धारा है। उसको याद रखकर ही पाठक इस काव्य का पूर्ण आनंद उठा सकते हैं।

  साधारण पाठक से भी इस काव्य के अध्ययन के पहले तत्सम शब्दों के विन्यास की जानकारी के आधार की अपेक्षा की जाती है, तभी इस काव्य के दर्शन को समझ पाना आसान होगा। इसके छंदों की छवि और शब्दों के संयोजन में डूबकर ही आनंद पर्व तक की यात्रा करते हुए आनंद का अनुभव किया जा सकता है।

आनंद पर्व की अंतिम पंक्तियाँ देखें:

वह चंद्र-किरीट रजत नग स्पंदित -सा पुरुष पुरातन,

देखता मानसी गौरी लहरों के कोमल नर्तन।

प्रतिफलित हुई सब आंखें उन प्रेम-ज्योति-विमला से,

सब पहचाने से लगते अपनी ही एक कला से।

समरस के जड़ चेतन, सुंदर साकार बना था,

चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था।


और नारी के नारीत्व की उच्च भाव भूमि को व्याख्यायित करती पंक्तियाँ :

नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग-पग-तल में

पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में

आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा

तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा.

©ब्रजेंद्रनाथ

Tuesday, January 20, 2026

'मैं' का मौन में 'गौण' हो जाना (लेख)

 #bnmrachanaworld 

#tuoughtful #esaay 




मैं’ का मौन में ‘गौण’ हो जाना 

 मैं कहानियों में जो कुछ लिख रहा होता हूँ, मैं वही नहीं होता हूँ। उसके अतिरिक्त भी मैं होता हूँ। उस ‘मैं’ को चुप रखकर आपसे संवाद रत होना चाहता हूँ। मैं को चुप रखने का मतलब 'मैं' को 'मौन' रखकर आपसे संवाद स्थापित करना। जब 'मैं', 'मौन' में प्रवेश करता है, तब अंदर की आवाज सुनाई देती है। 'मौन' रखना 'बोलने' से अधिक कठिन होता है। लेकिन बोलने से अधिक प्रभाव पैदा करता है। 

उसी स्थिति को प्राप्त होकर जब संवाद स्थापित करते हैं, तब वह सार्थक हो जाता है। संवाद का अर्थ बहस नहीं है, समझ विकसित करना है। संवाद वह होता है, जिसमें हम जीतने की कोशिश नहीं करते, जुड़ने की कोशिश करते हैं। शब्दों से ज्यादा भाव बोलते हैं। जब हम सच्चे मन से सुनने लगते हैं, तब आपका दिल स्वतः ही हमारे करीब आ जाता है। कहा जाता है कि बोलना ज्ञान को प्रकाशित करना है, सुनना बुद्धि की क्षमता का विकास करना है। पूरी गहराई से जब आप सुन रहे होते हैं, तो आप स्वयं 'मौन' में उतर जाते हैं और 'मैं' ‘गौण’ होने लगता है। सच्चा संवाद वही होता है, जहाँ संवाद में भाग लेने वाले अपने अहंकार के खोल से बाहर आ जाते हैं। हर बार जब आप किसी को पूर्णतया सुनते हैं, तो कायनात या ब्रह्माण्ड भी आपकी सुनने लगता है।

संवाद की इसी स्थिति में आप और हम उतरना चाहते हैं। एक लेखक या कहानीकार का यही लक्ष्य होता है।

अपूर्णता की अर्थवत्ता से अगर इसे जोड़ें तो कह सकते हैं कि इससे हम अपनी अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाना चाहते हैं। सच कहें तो अपूर्णता, कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होता। यह पूर्णता की ओर थोड़ा बढ़ जाता है, तब अनुभव होता है कि वह थोड़ा और अपूर्ण रह गया है।

संत की अपूर्णता, अर्थवत्ता लिए होता है...

कैसे? इस प्रसंग से समझते है। 

जब महाभारत का युद्ध होना निश्चित हो जाता है, तो अर्जुन और दुर्योधन दोनों भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुँचते है। श्रीकॄष्ण जैसे ही उठते हैं, उठते क्या हैं, वो तो सृष्टि में व्याप्त हैं, सोते ही कब हैं?

सामने अर्जुन को देखकर पूछते हैं, "अर्जुन कैसे आना हुआ?"

तब सिरहाने खड़ा दुर्योधन कहता है, "पहले मैं आया हूँ, आप पहले मेरी बात सुनिए।" वस्तुतः दुर्योधन पहले आकर भगवान श्रीकृष्ण के सिर की ओर खड़ा हो गया था। अर्जुन बाद में आया तो अपने सेवा भाव से भावित भगवान के पावों की ओर खड़ा हो गया।

भगवान ने कहा कि अर्जुन तुम्हारा छोटा भाई है, पहले उसे कहने का मौका मिलना चाहिए। दुर्योधन इसपर अड़ गया कि मैं पहले आया हूँ, इसलिए मुझे पहले कहने का मौका देना होगा। फिर भगवान ने कहा कि ठीक है, बोलो। 

दुर्योधन ने कहा, "युद्ध होना अब तय है। आप किसकी ओर से लड़ेंगे?" 

भगवान इसपर भी द्वंद्व में नहीं थे।

महाकवि दिनकर ने अपने काव्य रश्मिरथी में लिखा है,

"धर्म स्नेह दोनों प्यारे थे,

बड़ा कठिन निर्णय था।

अतः एक को देह

दूसरे को दे दिया हॄदय था।"

उन्होंने अर्जुन से भी पूछा, "तुम किस लिए आये हो?"

अर्जुन ने कहा, "मैं भी इसी उद्देश्य से आया हूँ।"

भगवान श्रीकृष्ण ने साफ - साफ कहा, "देखो, एक मैं हूँ और दूसरी मेरी नारायणी सेना है। मैं जिस ओर भी रहूँगा, युद्ध नहीं करूंगा, हथियार नहीं उठाऊँगा। अर्जुन तुम्हें क्या चाहिए?"

इसपर दुर्योधन ने कहा, "महाराज पहले मैं आया हूँ, इसलिए पहले मुझे मांगने का मौका मिलना चाहिए।"

भगवान ने कहा, "पहले अर्जुन को मांगने दो। यह छोटा है।"

इसपर अर्जुन ने कहा, "मुझे आप चाहिए, प्रभु।"

इसपर दुर्योधन अट्टहास कर उठा, "बहुत बड़ा मूर्ख है तू। इसलिए अभी तक इतना कष्ट में रहा है और आगे भी रहेगा।"

भगवान ने दुर्योधन से कहा, "ठीक है, तुम बोलो।"

दुर्योधन बोला, "मुझे नारायणी सेना चाहिए।" उसने सोचा कि नारायणी सेना इतनी बड़ी है। उससे युद्ध जीता जा सकता है। कृष्ण अकेले क्या कर सकेंगे? 

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, "अर्जुन, तुमने मुझे क्यों मांगा? अकेला निशस्त्र उस युद्ध में मैं क्या कर सकूँगा? तुम्हें नारायणी सेना मांगनी चाहिए थी न।"

इसपर अर्जुन ने जो प्रतिउत्तर दिया उसे ध्यान से पढ़े, " प्रभु, आपके साथ महाभारत युद्ध का हार जाना भी मेरे लिए सबसे बड़ी विजय होगी और आपके बिना महाभारत युद्ध का जीत जाना भी मेरे लिए सबसे बड़ी हार होगी।" अगर भगवान आपके साथ हैं, अगर ईश्वर आपके साथ हैं, तो आपका अभिशाप भी वरदान सिद्ध हो जाएगा। आपकी अपूर्णता पूर्णता की ओर बढ़ जाएगी. लेखक अपने सृजन में इसी सत्य से साक्षात्कार कराता है। जब वह करा पाता है तो उसमें संतत्व का अवतरण होता है। यही संतत्व उसकी अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाता है। तब अपूर्णता भी अर्थ ग्रहण कर लेती है। अर्जुन का नारायण में विश्वास ही युद्ध की सारी परिस्थितियों से निकलने का मार्ग प्रशस्त करता है। वह पूर्णता की ओर एक कदम और बढ़ जाता है, थोड़ा और अपूर्ण रहने के लिए।

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र 

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