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Saturday, December 17, 2016

राजनीतिक भ्रष्टाचार, एक ज्वलंत प्रश्न

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ता: 17-12-2016
राजनीतिक भ्रष्टाचार, एक ज्वलंत प्रश्न
एक ज्वलंत प्रश्न अभी सामने आया है जो पूरे जनमानस को उद्वेलित कर रहा है। यह प्रश्न भारत के सारे सियासी पार्टियों के द्वारा चंदे और अन्य श्रोतों से उगाहे गए धन से सम्बंधित है।
अभी के IT नियमों के तहत कोई भी सियासी दल
₹20000 तक का चंदे की राशि नकद रूप में बिना श्रोत की घोषणा किये ले सकता है। इससे सियासी पार्टियां अकूत धन इकठ्ठा करने में सफल हो जाती है। इस राशि का मनमाने ढंग से चुनावों में खर्च किया जाता है, जिसका सीधा असर काले धन के संग्रह और विस्तार के रूप में होता रहा है। अभी की एक घोषणा के अनुसार सियासी पार्टियां पुराने नोट जमा करा सकती हैं, जिसके श्रोत के बारे में बताने और जताने की जरूरत नहीं है। जिसपर किसी भी दल ने आम सभा नहीं की और न ही भारत बंद का आह्वान किया। यानि सभी दलों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहमति है।
जनता के लिए अलग नियम और राजनीतिक दलों के लिए अलग नियम, यह दुहरा मापदंड नहीं चल सकता। यह सत्ता पक्ष के हित में होगा, अगर वे जल्दी से जल्दी सियासी दलों के चंदा उगाही कानून में आमूल सुधार की घोषणा करें, अन्यथा इतना क्रांतिकारी कदम लेने के बावजूद भी वे चुनाव में हो रहे घोटालों के द्वेष से अपने को मुक्त नहीं के पाएंगें।
आगे का कदम और रास्ता सता पक्ष के लिए दुधारी तलवार पर चलने जैसा है। क्या वह चुनाव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए 8 नवम्बर को नोटबंदी की अचानक की गई घोषणा की तरह ही किसी क्रांतिकारी, आमूल परिवर्तन लाने वाले सधे कदम की तत्काल प्रभाव से कोई निर्णय लेने का उदहारण पेश कर सकते है? यह प्रश्न आमजन को उद्वेलित कर रहा है, झकझोर रहा है।
मैंने केंद्र में बीजेपी की सरकार आने पर एक लेख लिखा था, जो जागरण जंक्शन.कॉम पर दी गयी थी। साथ ही यह उससमय भोपाल से प्रकाशित पत्रिका, "रूबरू दुनिया" में भी प्रकाशित हुई थी।
मैंने उसमे चुनाव सुधारों के बारे में क्या लिखा

चुनावों का शुद्धिकरण:
चुनाव  भारतीय  राजनीति  और  संसदीय  लोकतंत्र  का  वो  पर्व  है  जो  सांसद   जो  संसद  के  मंदिर  तक  पहुँचने    का  अवसर  प्रदान  करता  है ।  वहां  हत्या,  बलात्कार ,  डकैती ,  चोरी  आदि अपराधों  के  नामजद  या  सजाभोगी  ब्यक्ति  नहीं  पहुंचे ,  इसके  लिए  सभी  दलों  को  मिलकर  कठोर  कदम  उठाने  की  जरूरत  है ।  अबतक  सारे  दल  इसपर  सिद्धांततः  सहमत  होते  देखे  गए हैं ।   लेकिन  संसद  और  बिधान सभाएं  अभी  भी  ऐसे  लोगों  के  पहुँचने  का  स्थान   बना   हुआ  है ,  क्योंकि  सारे  दल  इसतरह  के  प्रत्याशी  खड़े  करते  रहे  हैं ।     इसके  लिए  कठोर  कानून  बनाये  जाने की  जरूरत  है ।  अगर  संविधान  में  संशोधन  की  जरूरत  है  या  अध्यादेश  के  द्वारा  कोई कानून  पास  कराया  जाना  है ,  तो  वह  कार्य  शीघ्र  होना  चाहिए ।  संसदीय  लोकतंत्र  चुनाव  के बाद  भी  जनता  की  भागीदारी  में  चले ,  इसका  प्रयास  होना  चाहिए ।  सांसदों  को  अपने  क्षेत्र  के विकास  के  लिए  एक  पूरी  रूपरेखा  देने  को  कहा  जाना  चाहिए ।  संसदीय  क्षेत्र  विकास  कार्यक्रम  के तहत  दिए  गए  राशि  का  समुचित  उपयोग  हो ,  इसके  लिए  कठोर  कदम  और  सटीक  ऑडिट भी  होना  चाहिए ।  नॉन  परफार्मिंग  नुमाईंदों  को  जनता  कैसे  वापस  बुला  सकती  है ,  इसके  लिए  बैठकर  चुनाव - प्रक्रिया  शुद्धीकरण  के  बिन्दुओं  पर  विचार  होना   चाहिए ।  बी जे पी  इसे  कर  सकती  है  क्योंकि  उसके  पास  पर्याप्त  बहुमत  है ।  इसके  लिए  इक्षा  शक्ति  को  एकत्र  करना  होगा  और  उसतरफ  सधे  कदमों  से  बढ़ना  होगा ।

उजाला दे दूंगी (लघुकथा)

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