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Monday, November 21, 2016

आतंरिक सशक्तिकरण के लिए नुकीला निर्णय(लेख)



21-11-2016...
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आतंरिक सशक्तिकरण के लिए नुकीला निर्णय
मैंने अभी से एक घंटे पहले, जब दिन में दोपहर बाद औंघी, जिसे आफ्टरनून नैप कहा जाता है, सी लगी, तो मैंने एक ख्वाब देखा। उसे मैं हू - ब - हू दे रहा हूँ। कुछ शब्द छूट भले ही जाँय, अधिक एक भी नहीं हैं।
मैं कोर्ट के एक जज से अपॉइंटमेंट लेता हूँ। उनसे मैं उनके चैम्बर में मिल रहा हूँ। वे सामने बैठे हैं।
उनकी प्रश्नवाचक दृष्टि मेरे ऊपर पड़ती है, शायद वे जानना चाह रहे हैं, " क्या वे मुझे पहले से जानते हैं? या क्या काम से आये हैं?"
मैं, इन सारे प्रश्नों पर पूर्णविराम लगाते हुए उनसे बाते करना शुरू करता हूँ, " मैं आपको सीधे तौर पर नहीं जानता हूँ। और न मैं किसी काम को लेकर आपसे मिलने आया हूँ। मेरे भगिना नरेंद्र ने कहा था कि आप उसके स्कूल के दोस्त रह चुके हैं।"
वे याद करने की कोशिश करने लगे, "शायद, स्कूल में हमलोग साथ पढ़े हों।" वे अतीत में खोकर याद करने के यत्न में लग गए, कि मुझे लगा कि अब वातावरण थोड़ा अनौपचारिक हो गया है, तो कुछ ज्वलंत प्रश्न पर चर्चा की जा सकती है।
मैं, "आप तो जज हैं। आप का मन भी इस प्रश्नों से उद्वेलित होता होगा। आज देश किस सबसे  बड़ी समस्या से जूझ रहा है?"
"कोई एक हो तो बताऊँ। कहाँ से शुरू करूँ?"
"जहाँ से आपको उचित लगे शुरू कीजिए।"
"मेरी समझ में देश का प्रजातंत्र ही देश की सबसे बड़ी समस्या है?"
"वह कैसे?"
"प्रजातंत्र में कानून बनाने का अधिकार लेजिस्लेटिव को है। लेजिस्लेटिव यानि विधायिका, यानि स्टेट सब्जेक्ट्स पर स्टेट असेम्बली और केंद्रीय विषयों पर सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली या लोकसभा और राज्य सभा। उन जगहों पर कौन बैठे हैं? या कौन जाते हैं?"
मैं चुप ही रहा।
"नेता जाते है, सर। आप जनता हैं, साफ़ - साफ़ क्यों नहीं स्वीकार करते?"
"मैं जज हूँ। मेरे सिलेक्शन की एक प्रक्रिया है, जिससे हमें गुजरना पड़ा है, तब मैं जाकर चयनित हुआ हूँ और यहां इस जगह पर हूँ।"
"हाँ, तो इससे legislative को आप कैसे कनेक्ट कर रहे हैं?"
"सर, आप जनता हैं। आपको यह नहीं समझने दिया गया है। हमें उस क़ानून को पालन करने या करवाने के लिए नियुक्त किया गया है, जिस कानून को बनाने वालों के लिए कोई विशेष पढाई, लिखाई, या ज्ञान की जरूरत नहीं है। और न ही विशेष ब्यक्तित्व या चरित्र की जरूरत है।"
मैं, "इसलिए विधायिकाओं में एक तिहाई से अधिक जगहों पर अपराधियों ने कब्ज़ा कर लिया है, एक तिहाई पर स्थापित नेताओं के परिवार वाले।"
"बिलकुल सही। और चुनाव में धन की जरूरत होती है, इसलिए बाकी की जगहों पर धनपतियों का प्रभाव है। ऐसे में क़ानून किसके लिए बनेंगें? जनता के लिए या उनके लिए जो क़ानून बनानेवाले है।"
मैं, "तो क्या आप भी मानते है कि चुनावों में खड़ा होने वाले प्रतिनिधियों को एक मिनिमम प्रशिक्षण से होकर गुजरना जरूरी होना चाहिए, जहां उन्हें संविधान, लोकल सेल्फ गोवर्नमेंट, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन आदि के बारे में ज्ञान दिया जाय।"
"यह तो तत्काल प्रभाव से जरूरी है, तभी हमलोग प्रजातंत्र के इस स्वरुप को झेलते हुए देश को बचाये रख सकेंगे।"
मैं तन्द्रा से जाग गया था।
मेरे मन में कई तूफ़ान उठ रहे थे। मुझे रतन टाटा के जीवन की वह कहानी याद आ रही थी, जब उन्होंने26/11, मुम्बई की घटना के बाद ताज होटल के पुनरुद्धार के लिए आमंत्रित निविदाओं में पाकिस्तान के दो ब्यावसायियों के टेंडर इसलिए अमान्य कर दिए थे, क्योंकि वे पकिस्तान के थे। यह उन्होंने दिल्ली के एक मंत्री के दबाव देने के बावजूद यह कहकर अमान्य किया था, "आप इस हद तक निर्लज़्ज़ हो सकते है , मैं नहीं।"
देश के परवर्ती, ऊँचे स्थान पर बैठा नेता जब देश की कीमत पर कोई भी ऐसा समझौता करने को तैयार हो , तो हम कोई हंगामा नहीं करते। परंतु देश की आंतरिक स्थिति को मजबूत करने के लिए आज अगर कोई सशक्त और दुश्मनों के लिए नुकीला, चुभने वाला निर्णय लिया गया हो, तो कुछ लोग तिलमिला क्यों रहे हैं? अगर ऐसे शलाका पुरुष से  हम देश को बचाने की उम्मीद लगा बैठे हैं, तो उसके ऐसे निर्णय के लिये उसे साधुवाद भी नहीं दे सकते क्या?
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--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 तिथि :  22-11-2016.
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