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कइसे खेलब होली
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कागा न आइल मुंडेर हो, कइसे खेलब होली?
सजना जबसे गेलन विदेशवा,
पतियो न भेजलन देलन संदेशवा.
जियरा घड़ी घड़ी धक् धक् कर हई
(मनवा में उठ हई मरोड़ हो, कैसे खेलब होली?)
मुरझाईल मनवा के कनेर हो, कइसे खेलब होली?
देहरी पर घड़ी घड़ी जा हई धेयनवा,
जैसे हो आहट अइलन सजनवा.
कमवा में कहीं कोई मनवा न लग हई
केकरा से कही, भगिया के फेर हो, कइसे खेलब होली?
अब पूछे लगलन सब लोग लुगाई,
खमबा धरि खाड़ खाड़ गोड़वा पिराई.
कितनो जतन करs दुखवा के अंत न हई,
छछनल जियरा के, के समझतई अंधेर हो, कइसे खेलब होली?
देहरी पर जैसे कोई आहट होलई हे ,
हियरा में जैसे कोई घबराहट होलई हे.
अंगना में देखली खाड़ हथिन सजनवा
कागा कइलकई बड़ी देर हो, अब खेलब होली.
कागा अब अइलई मुंडेर हो, हम खेलब होली.
--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
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49 मिनट बाद मेरी प्रस्तुति देखे. (तारीख 7 अप्रैल तक )
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