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Tuesday, March 10, 2026

कइसे खेलब होली (कविता)

 #BnmRachnaWorld 

#magahikavita 











कइसे खेलब होली 

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कागा न आइल मुंडेर हो, कइसे खेलब होली?

सजना जबसे गेलन विदेशवा,
पतियो न भेजलन देलन संदेशवा.

जियरा घड़ी घड़ी धक् धक् कर हई
(मनवा में उठ हई मरोड़ हो, कैसे खेलब होली?)
मुरझाईल मनवा के कनेर हो, कइसे खेलब होली?

देहरी पर घड़ी घड़ी जा हई धेयनवा,
जैसे हो आहट अइलन सजनवा.

कमवा में कहीं कोई मनवा न लग हई
केकरा से कही, भगिया के फेर हो, कइसे खेलब होली?

अब पूछे लगलन सब लोग लुगाई,
खमबा धरि खाड़ खाड़ गोड़वा पिराई.


कितनो जतन करs दुखवा के अंत न हई,
छछनल जियरा के, के समझतई अंधेर हो, कइसे खेलब होली?

देहरी पर जैसे कोई आहट होलई हे ,
हियरा में जैसे कोई घबराहट होलई हे.

अंगना में देखली खाड़ हथिन सजनवा
कागा  कइलकई बड़ी देर हो, अब खेलब होली.
कागा अब अइलई मुंडेर हो, हम खेलब होली.

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र 


फेसबुक लिंक : https://www.facebook.com/share/v/1FN5Efyd53/

49 मिनट बाद मेरी प्रस्तुति देखे. (तारीख 7 अप्रैल तक )

यूट्यूब लिंक :

https://youtu.be/GN2NMP_YCxY?si=9Ha7LVGqN9VKoPtK



Wednesday, March 4, 2026

पवन - झकोरे फागुनी (कविता)

 #holipoem #romantic 











पवन - झकोरे फागुनी 

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देह तुम्हारी कंचन, होंठ भयो रतनार।

नैन तुम्हारे तीखे, जैसे चुभे कटार।।


प्रीत आँचल में भरकर, रख लो अपने पास।

गर न आये पाती तो, होना नहीं उदास।।


होली में भरता जाए, चटख फागुनी रंग।

सराबोर मैं कर दूं, तेरे अंग - प्रत्यङ्ग ।।


लाल चुनरी भींगेगी, कसमस करते अंग।

भर दूँ देह में उष्मा, सांस निभाए संग।।


 फूल - देह ज्यों लचके, बिरवा की हो पात।

मेरी बगिया में आए, जैसे नया प्रभात।।


रास - रंग तृप्त नारी, यौवन भार अपार।

चढ़ चली देह-नाव पर, जाती है उस पार।।


पवन - झकोरे फागुनी, नस - नस बसें अनंग ।

पिऊ - पिऊ पुकारती, कोकिल बैन तरंग ।।







'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख )

 #bnmrachnaworld  ‘ गुनाहो का देवता’ को एक बार फिर पढ़ना  डॉ धर्मवीर भारती की लिखी और हर वर्ग के पाठकों द्वारा सबसे अधिक पढ़ी गयी कृतियों में ...