#holipoem #romantic
पवन - झकोरे फागुनी
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देह तुम्हारी कंचन, होंठ भयो रतनार।
नैन तुम्हारे तीखे, जैसे चुभे कटार।।
प्रीत आँचल में भरकर, रख लो अपने पास।
गर न आये पाती तो, होना नहीं उदास।।
होली में भरता जाए, चटख फागुनी रंग।
सराबोर मैं कर दूं, तेरे अंग - प्रत्यङ्ग ।।
लाल चुनरी भींगेगी, कसमस करते अंग।
भर दूँ देह में उष्मा, सांस निभाए संग।।
फूल - देह ज्यों लचके, बिरवा की हो पात।
मेरी बगिया में आए, जैसे नया प्रभात।।
रास - रंग तृप्त नारी, यौवन भार अपार।
चढ़ चली देह-नाव पर, जाती है उस पार।।
पवन - झकोरे फागुनी, नस - नस बसें अनंग ।
पिऊ - पिऊ पुकारती, कोकिल बैन तरंग ।।
