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Wednesday, March 4, 2026

पवन - झकोरे फागुनी (कविता)

 #holipoem #romantic 











पवन - झकोरे फागुनी 

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देह तुम्हारी कंचन, होंठ भयो रतनार।

नैन तुम्हारे तीखे, जैसे चुभे कटार।।


प्रीत आँचल में भरकर, रख लो अपने पास।

गर न आये पाती तो, होना नहीं उदास।।


होली में भरता जाए, चटख फागुनी रंग।

सराबोर मैं कर दूं, तेरे अंग - प्रत्यङ्ग ।।


लाल चुनरी भींगेगी, कसमस करते अंग।

भर दूँ देह में उष्मा, सांस निभाए संग।।


 फूल - देह ज्यों लचके, बिरवा की हो पात।

मेरी बगिया में आए, जैसे नया प्रभात।।


रास - रंग तृप्त नारी, यौवन भार अपार।

चढ़ चली देह-नाव पर, जाती है उस पार।।


पवन - झकोरे फागुनी, नस - नस बसें अनंग ।

पिऊ - पिऊ पुकारती, कोकिल बैन तरंग ।।







Tuesday, February 10, 2026

कामायनी पर मेरे विचार

 




कामायनी पर मेरे विचार 

छायावाद के चार स्तम्भों में से एक श्री जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति 'कामायनी' पर लिखे मेरे लेख को इ पेपर 'राष्ट्रीय नवीन मेल' के साहित्यिकी पृष्ठ पर स्थान मिला है. मुझे आपसे साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है. आपसे निवेदन है कि आप यह लेख पढ़े और अपने विचारों से अवगत कराएं. सादर 🙏❗

(मैं आपकी सुविधा के लिए इस लेख का टेक्स्ट भी यहाँ दे रहा हूँ )

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित काव्य "कामायनी" का लेखन काल ऐसे समय का है, जब समझा जा रहा था कि हिंदी या खड़ी बोली में काव्य रचना नहीं हो सकती है। इसके पहले मैथिली शरण गुप्त का काव्य साकेत आया था। लेकिन मुख्यतः तत्सम शब्दों में कामायनी ही उससमय की एकमात्र एकमात्र रचना थी। इसके पहले ऐसी सुसम्बद्ध, सुरुचिकर, अद्भुत कृति हिंदी साहित्य की काव्य विधा में देखने में नहीं आयी थी।

  "कामायनी" हिंदी साहित्य के छायावाद युग की प्रतिनिधि रचना है। मानव की चित्त वृत्तियों का वैयक्तिकरण करना और उसे काव्य का रूप देना एक दुस्तर कार्य था, जिसे जयशंकर प्रसाद जी ने उससमय पूरा किया, जब हिंदी काव्य- लेखन एक संक्रमण- काल से गुजर रहा था। क्या यह काव्य सामान्य पाठक के बीच लोक व्यापक हो पाया था या अभी है?

इसपर विचार करने के पहले इसकी रचना के मुख्य बिंदुओं पर विचार करें:

वैसे महाप्रलय और उसके बाद जीवन के विकास की कहानी हर पंथ और ग्रंथ का विषय रहा है। यहाँ इस विषय को कवि ने "शतपथ ब्राह्मण" के पौराणिक ग्रंथ के जलप्लावन के प्रसंग से लिया है। जलप्लावन के महाप्रलय के बाद छिन्न - भिन्न हुई देव संस्कृति के पश्चात वैवस्वत मनु ही बचे थे। वे हिमालय के उत्तुंग शिखर पर स्थित हो अस्थिर चित्त से सोच रहे है:

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह,

एक पुरुष भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।

नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन,

एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन।

' एक तत्व की ही प्रधानता' के दर्शन से ही मनु एक ऐसी ही सभ्यता का विकास करना चाह रहे हों...यही उनकी चिंता का विषय है - इसलिए जयशंकर प्रसाद ने पहले अध्याय का नाम 'चिंता सर्ग' रखा है। हर अध्याय मनुष्य की अन्तरवृत्तियों को रूपायित करता है। मानव सभ्यता के पूर्व शायद देव संस्कृति रही हो, जहाँ किसी प्रकार चिंता नहीं होने से 'चिर-यौवन' प्राप्त देवता 'नित्य-विलासी' रहे हों। जब कोई भी सभ्यता आत्म-मंगल, आत्म-आमोद-प्रमोद लीन भोग-विलास में गर्त हो जाती है तो प्रकृति यह अनाचार सहन नहीं कर पाती है और अपनी विनाश लीला से उस सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट कर देती है। फलस्वरूप जलप्लावन और हिमयुग आ जाता है और एकमात्र मनु बचे रहते हैं।

आप कल्पना करें, नीरव एकान्त, चारो तरफ जल-ही-जल, ऊपर हिम, ब्रह्मांड के सतहों का लगातार टकराव, ज्वालामुखियों का भयंकर विस्फोट और लावा के फैलने से ऊंची उठती समुद्र की लहरों के भीषण तांडव के बीच एक जीवधारी मनु के रूप में इन सबका साक्षी बना नयनों के सामने सब देख रहा है। उनकी चिंता का पारावार नहीं है। जब यहाँ से वह एक सभ्यता विकसित करने की सोच रहा है। इसी चिंता से दैवी और आसुरी वृत्तियों का आविर्भाव होता है और उनके घात-प्रतिघात के बीच संतुलन बनाते हुए व्यष्टि और समष्टि दोनों की यात्रा जारी रहती है जबतक आनंद न प्राप्त हो जाय। इसलिए इस काव्य का अंतिम अध्याय आनंद सर्ग है।

मनुष्य की आंतरिक वृत्तियाँ को ही इस काव्य के अध्याय का नाम दिया गया है। एकं ओर आशा, श्रद्धा, लज्जा, इड़ा और निर्वेद जैसी दैवी वृत्तियाँ हैं, तो दूसरी ओर कामवासना, ईर्ष्या आदि आसुरी वृत्तियाँ हैं। जयशंकर प्रसाद जी ने पुस्तक के आमुख में लिखा है, "जलप्लावन की घटना ने मनु को देवों से विलक्षण मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया।"

"छान्दोग्य उपनिषद" में मनु और श्रद्धा की भावमूलक व्याख्या भी मिलती है। श्रद्धा कामगोत्र की बालिका है, इसलिए श्रद्धा नाम के साथ उसे कामायनी भी कहा जाता है। मनु प्रथम पथ-प्रदर्शक और अग्नि-होत्र प्रदर्शित करने वाले और कई वैदिक कथाओं के नायक हैं। जलप्लावन के पश्चात एकाकी मनु का मिलन श्रद्धा के साथ उसी निर्जन प्रदेश में बिखरी हुई सृष्टि को पुनः आरम्भ करने के लिए होती है। परंतु असुर पुरोहित के मिल जाने से वे पशु बलि देते हैं। इस बली के पश्चात मनु जो देव संस्कृति के ही अवशेष मात्र थे, उनमें देव - प्रवृति जाग उठती है - इड़ा के संपर्क में आने से।

इड़ा की उत्पत्ति दही, घी इत्यादि छवियों के पोषण से यज्ञ से होती है, इसलिए इड़ा स्वयं को मनु की दुहिता कहती है। वह प्रजापति मनु की पथ-प्रदर्शिका बनी और बुद्धि-विकास और राज्य स्थापन में उसी का प्रभाव रहा। इन्हीं सब धाराओं से मिलकर 'कामायनी' की मुख्य- कथा- धारा बहती है। परंतु दर्शन इसकी अंतर्धारा है। उसको याद रखकर ही पाठक इस काव्य का पूर्ण आनंद उठा सकते हैं।

  साधारण पाठक से भी इस काव्य के अध्ययन के पहले तत्सम शब्दों के विन्यास की जानकारी के आधार की अपेक्षा की जाती है, तभी इस काव्य के दर्शन को समझ पाना आसान होगा। इसके छंदों की छवि और शब्दों के संयोजन में डूबकर ही आनंद पर्व तक की यात्रा करते हुए आनंद का अनुभव किया जा सकता है।

आनंद पर्व की अंतिम पंक्तियाँ देखें:

वह चंद्र-किरीट रजत नग स्पंदित -सा पुरुष पुरातन,

देखता मानसी गौरी लहरों के कोमल नर्तन।

प्रतिफलित हुई सब आंखें उन प्रेम-ज्योति-विमला से,

सब पहचाने से लगते अपनी ही एक कला से।

समरस के जड़ चेतन, सुंदर साकार बना था,

चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था।


और नारी के नारीत्व की उच्च भाव भूमि को व्याख्यायित करती पंक्तियाँ :

नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग-पग-तल में

पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में

आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा

तुमको अपनी स्मित रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा.

©ब्रजेंद्रनाथ

Tuesday, January 20, 2026

'मैं' का मौन में 'गौण' हो जाना (लेख)

 #bnmrachanaworld 

#tuoughtful #esaay 




मैं’ का मौन में ‘गौण’ हो जाना 

 मैं कहानियों में जो कुछ लिख रहा होता हूँ, मैं वही नहीं होता हूँ। उसके अतिरिक्त भी मैं होता हूँ। उस ‘मैं’ को चुप रखकर आपसे संवाद रत होना चाहता हूँ। मैं को चुप रखने का मतलब 'मैं' को 'मौन' रखकर आपसे संवाद स्थापित करना। जब 'मैं', 'मौन' में प्रवेश करता है, तब अंदर की आवाज सुनाई देती है। 'मौन' रखना 'बोलने' से अधिक कठिन होता है। लेकिन बोलने से अधिक प्रभाव पैदा करता है। 

उसी स्थिति को प्राप्त होकर जब संवाद स्थापित करते हैं, तब वह सार्थक हो जाता है। संवाद का अर्थ बहस नहीं है, समझ विकसित करना है। संवाद वह होता है, जिसमें हम जीतने की कोशिश नहीं करते, जुड़ने की कोशिश करते हैं। शब्दों से ज्यादा भाव बोलते हैं। जब हम सच्चे मन से सुनने लगते हैं, तब आपका दिल स्वतः ही हमारे करीब आ जाता है। कहा जाता है कि बोलना ज्ञान को प्रकाशित करना है, सुनना बुद्धि की क्षमता का विकास करना है। पूरी गहराई से जब आप सुन रहे होते हैं, तो आप स्वयं 'मौन' में उतर जाते हैं और 'मैं' ‘गौण’ होने लगता है। सच्चा संवाद वही होता है, जहाँ संवाद में भाग लेने वाले अपने अहंकार के खोल से बाहर आ जाते हैं। हर बार जब आप किसी को पूर्णतया सुनते हैं, तो कायनात या ब्रह्माण्ड भी आपकी सुनने लगता है।

संवाद की इसी स्थिति में आप और हम उतरना चाहते हैं। एक लेखक या कहानीकार का यही लक्ष्य होता है।

अपूर्णता की अर्थवत्ता से अगर इसे जोड़ें तो कह सकते हैं कि इससे हम अपनी अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाना चाहते हैं। सच कहें तो अपूर्णता, कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होता। यह पूर्णता की ओर थोड़ा बढ़ जाता है, तब अनुभव होता है कि वह थोड़ा और अपूर्ण रह गया है।

संत की अपूर्णता, अर्थवत्ता लिए होता है...

कैसे? इस प्रसंग से समझते है। 

जब महाभारत का युद्ध होना निश्चित हो जाता है, तो अर्जुन और दुर्योधन दोनों भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुँचते है। श्रीकॄष्ण जैसे ही उठते हैं, उठते क्या हैं, वो तो सृष्टि में व्याप्त हैं, सोते ही कब हैं?

सामने अर्जुन को देखकर पूछते हैं, "अर्जुन कैसे आना हुआ?"

तब सिरहाने खड़ा दुर्योधन कहता है, "पहले मैं आया हूँ, आप पहले मेरी बात सुनिए।" वस्तुतः दुर्योधन पहले आकर भगवान श्रीकृष्ण के सिर की ओर खड़ा हो गया था। अर्जुन बाद में आया तो अपने सेवा भाव से भावित भगवान के पावों की ओर खड़ा हो गया।

भगवान ने कहा कि अर्जुन तुम्हारा छोटा भाई है, पहले उसे कहने का मौका मिलना चाहिए। दुर्योधन इसपर अड़ गया कि मैं पहले आया हूँ, इसलिए मुझे पहले कहने का मौका देना होगा। फिर भगवान ने कहा कि ठीक है, बोलो। 

दुर्योधन ने कहा, "युद्ध होना अब तय है। आप किसकी ओर से लड़ेंगे?" 

भगवान इसपर भी द्वंद्व में नहीं थे।

महाकवि दिनकर ने अपने काव्य रश्मिरथी में लिखा है,

"धर्म स्नेह दोनों प्यारे थे,

बड़ा कठिन निर्णय था।

अतः एक को देह

दूसरे को दे दिया हॄदय था।"

उन्होंने अर्जुन से भी पूछा, "तुम किस लिए आये हो?"

अर्जुन ने कहा, "मैं भी इसी उद्देश्य से आया हूँ।"

भगवान श्रीकृष्ण ने साफ - साफ कहा, "देखो, एक मैं हूँ और दूसरी मेरी नारायणी सेना है। मैं जिस ओर भी रहूँगा, युद्ध नहीं करूंगा, हथियार नहीं उठाऊँगा। अर्जुन तुम्हें क्या चाहिए?"

इसपर दुर्योधन ने कहा, "महाराज पहले मैं आया हूँ, इसलिए पहले मुझे मांगने का मौका मिलना चाहिए।"

भगवान ने कहा, "पहले अर्जुन को मांगने दो। यह छोटा है।"

इसपर अर्जुन ने कहा, "मुझे आप चाहिए, प्रभु।"

इसपर दुर्योधन अट्टहास कर उठा, "बहुत बड़ा मूर्ख है तू। इसलिए अभी तक इतना कष्ट में रहा है और आगे भी रहेगा।"

भगवान ने दुर्योधन से कहा, "ठीक है, तुम बोलो।"

दुर्योधन बोला, "मुझे नारायणी सेना चाहिए।" उसने सोचा कि नारायणी सेना इतनी बड़ी है। उससे युद्ध जीता जा सकता है। कृष्ण अकेले क्या कर सकेंगे? 

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, "अर्जुन, तुमने मुझे क्यों मांगा? अकेला निशस्त्र उस युद्ध में मैं क्या कर सकूँगा? तुम्हें नारायणी सेना मांगनी चाहिए थी न।"

इसपर अर्जुन ने जो प्रतिउत्तर दिया उसे ध्यान से पढ़े, " प्रभु, आपके साथ महाभारत युद्ध का हार जाना भी मेरे लिए सबसे बड़ी विजय होगी और आपके बिना महाभारत युद्ध का जीत जाना भी मेरे लिए सबसे बड़ी हार होगी।" अगर भगवान आपके साथ हैं, अगर ईश्वर आपके साथ हैं, तो आपका अभिशाप भी वरदान सिद्ध हो जाएगा। आपकी अपूर्णता पूर्णता की ओर बढ़ जाएगी. लेखक अपने सृजन में इसी सत्य से साक्षात्कार कराता है। जब वह करा पाता है तो उसमें संतत्व का अवतरण होता है। यही संतत्व उसकी अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाता है। तब अपूर्णता भी अर्थ ग्रहण कर लेती है। अर्जुन का नारायण में विश्वास ही युद्ध की सारी परिस्थितियों से निकलने का मार्ग प्रशस्त करता है। वह पूर्णता की ओर एक कदम और बढ़ जाता है, थोड़ा और अपूर्ण रहने के लिए।

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र 

पवन - झकोरे फागुनी (कविता)

 #holipoem #romantic  पवन - झकोरे फागुनी   -------------------------- देह तुम्हारी कंचन, होंठ भयो रतनार। नैन तुम्हारे तीखे, जैसे चुभे कटार।।...