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‘मैं’ का मौन में ‘गौण’ हो जाना
मैं कहानियों में जो कुछ लिख रहा होता हूँ, मैं वही नहीं होता हूँ। उसके अतिरिक्त भी मैं होता हूँ। उस ‘मैं’ को चुप रखकर आपसे संवाद रत होना चाहता हूँ। मैं को चुप रखने का मतलब 'मैं' को 'मौन' रखकर आपसे संवाद स्थापित करना। जब 'मैं', 'मौन' में प्रवेश करता है, तब अंदर की आवाज सुनाई देती है। 'मौन' रखना 'बोलने' से अधिक कठिन होता है। लेकिन बोलने से अधिक प्रभाव पैदा करता है।
उसी स्थिति को प्राप्त होकर जब संवाद स्थापित करते हैं, तब वह सार्थक हो जाता है। संवाद का अर्थ बहस नहीं है, समझ विकसित करना है। संवाद वह होता है, जिसमें हम जीतने की कोशिश नहीं करते, जुड़ने की कोशिश करते हैं। शब्दों से ज्यादा भाव बोलते हैं। जब हम सच्चे मन से सुनने लगते हैं, तब आपका दिल स्वतः ही हमारे करीब आ जाता है। कहा जाता है कि बोलना ज्ञान को प्रकाशित करना है, सुनना बुद्धि की क्षमता का विकास करना है। पूरी गहराई से जब आप सुन रहे होते हैं, तो आप स्वयं 'मौन' में उतर जाते हैं और 'मैं' ‘गौण’ होने लगता है। सच्चा संवाद वही होता है, जहाँ संवाद में भाग लेने वाले अपने अहंकार के खोल से बाहर आ जाते हैं। हर बार जब आप किसी को पूर्णतया सुनते हैं, तो कायनात या ब्रह्माण्ड भी आपकी सुनने लगता है।
संवाद की इसी स्थिति में आप और हम उतरना चाहते हैं। एक लेखक या कहानीकार का यही लक्ष्य होता है।
अपूर्णता की अर्थवत्ता से अगर इसे जोड़ें तो कह सकते हैं कि इससे हम अपनी अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाना चाहते हैं। सच कहें तो अपूर्णता, कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होता। यह पूर्णता की ओर थोड़ा बढ़ जाता है, तब अनुभव होता है कि वह थोड़ा और अपूर्ण रह गया है।
संत की अपूर्णता, अर्थवत्ता लिए होता है...
कैसे? इस प्रसंग से समझते है।
जब महाभारत का युद्ध होना निश्चित हो जाता है, तो अर्जुन और दुर्योधन दोनों भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुँचते है। श्रीकॄष्ण जैसे ही उठते हैं, उठते क्या हैं, वो तो सृष्टि में व्याप्त हैं, सोते ही कब हैं?
सामने अर्जुन को देखकर पूछते हैं, "अर्जुन कैसे आना हुआ?"
तब सिरहाने खड़ा दुर्योधन कहता है, "पहले मैं आया हूँ, आप पहले मेरी बात सुनिए।" वस्तुतः दुर्योधन पहले आकर भगवान श्रीकृष्ण के सिर की ओर खड़ा हो गया था। अर्जुन बाद में आया तो अपने सेवा भाव से भावित भगवान के पावों की ओर खड़ा हो गया।
भगवान ने कहा कि अर्जुन तुम्हारा छोटा भाई है, पहले उसे कहने का मौका मिलना चाहिए। दुर्योधन इसपर अड़ गया कि मैं पहले आया हूँ, इसलिए मुझे पहले कहने का मौका देना होगा। फिर भगवान ने कहा कि ठीक है, बोलो।
दुर्योधन ने कहा, "युद्ध होना अब तय है। आप किसकी ओर से लड़ेंगे?"
भगवान इसपर भी द्वंद्व में नहीं थे।
महाकवि दिनकर ने अपने काव्य रश्मिरथी में लिखा है,
"धर्म स्नेह दोनों प्यारे थे,
बड़ा कठिन निर्णय था।
अतः एक को देह
दूसरे को दे दिया हॄदय था।"
उन्होंने अर्जुन से भी पूछा, "तुम किस लिए आये हो?"
अर्जुन ने कहा, "मैं भी इसी उद्देश्य से आया हूँ।"
भगवान श्रीकृष्ण ने साफ - साफ कहा, "देखो, एक मैं हूँ और दूसरी मेरी नारायणी सेना है। मैं जिस ओर भी रहूँगा, युद्ध नहीं करूंगा, हथियार नहीं उठाऊँगा। अर्जुन तुम्हें क्या चाहिए?"
इसपर दुर्योधन ने कहा, "महाराज पहले मैं आया हूँ, इसलिए पहले मुझे मांगने का मौका मिलना चाहिए।"
भगवान ने कहा, "पहले अर्जुन को मांगने दो। यह छोटा है।"
इसपर अर्जुन ने कहा, "मुझे आप चाहिए, प्रभु।"
इसपर दुर्योधन अट्टहास कर उठा, "बहुत बड़ा मूर्ख है तू। इसलिए अभी तक इतना कष्ट में रहा है और आगे भी रहेगा।"
भगवान ने दुर्योधन से कहा, "ठीक है, तुम बोलो।"
दुर्योधन बोला, "मुझे नारायणी सेना चाहिए।" उसने सोचा कि नारायणी सेना इतनी बड़ी है। उससे युद्ध जीता जा सकता है। कृष्ण अकेले क्या कर सकेंगे?
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा, "अर्जुन, तुमने मुझे क्यों मांगा? अकेला निशस्त्र उस युद्ध में मैं क्या कर सकूँगा? तुम्हें नारायणी सेना मांगनी चाहिए थी न।"
इसपर अर्जुन ने जो प्रतिउत्तर दिया उसे ध्यान से पढ़े, " प्रभु, आपके साथ महाभारत युद्ध का हार जाना भी मेरे लिए सबसे बड़ी विजय होगी और आपके बिना महाभारत युद्ध का जीत जाना भी मेरे लिए सबसे बड़ी हार होगी।" अगर भगवान आपके साथ हैं, अगर ईश्वर आपके साथ हैं, तो आपका अभिशाप भी वरदान सिद्ध हो जाएगा। आपकी अपूर्णता पूर्णता की ओर बढ़ जाएगी. लेखक अपने सृजन में इसी सत्य से साक्षात्कार कराता है। जब वह करा पाता है तो उसमें संतत्व का अवतरण होता है। यही संतत्व उसकी अपूर्णता को पूर्णता की ओर ले जाता है। तब अपूर्णता भी अर्थ ग्रहण कर लेती है। अर्जुन का नारायण में विश्वास ही युद्ध की सारी परिस्थितियों से निकलने का मार्ग प्रशस्त करता है। वह पूर्णता की ओर एक कदम और बढ़ जाता है, थोड़ा और अपूर्ण रहने के लिए।
--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

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