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अधिकारी की आत्मीयता
ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद के एस डी ओ के रूप में पदस्थापित जयंत नागर लम्बी छुट्टी के बाद ज्वाइन करने आ रहे थे.
सभी लोग सजग हो गए थे। उन्होंने बड़ा बाबू (पी ए ) को बुलाया था। उन्होंने सारे स्टाफ के बारे में पूछा था। स्टाफ में किसी ने तीलू के बारे में नहीं बताया ।
बड़ा बाबू से उन्होंने पहला सवाल यही किया, “तीलू कहीं दिख नहीं रही है? छुट्टी पर है क्या?”
तीलू ऑफिस की साफ - सफाई का काम करती थी।
बड़ा बाबू ने कहा, “वह कुछ दिनों से नहीं आ रही है। किसी ने बताया नहीं कि वह क्यों नहीं आ रही है।”
जयंत जी लगभग डांटते हुए ही बोले, “किसी ने नहीं बताया, तो आप में से कोई उसके यहाँ जाकर पता नहीं कर सकता था। उसने छुट्टी ली है या नहीं? “
“उसने तो तीन दिनों की छुट्टी ली थी।”
“उसके अनुपस्थित रहते हुए कितने दिन हो गए?”
“करीब दस दिन तो हो ही गए होंगे।”
“तीन दिन की छुट्टी लेकर अनुपस्थित हुई। दस दिन होने जा रहे हैं। किसी ने अभी तक कोई खबर नहीं ली कि वह क्यों इतने दिनों से अनुपस्थित है। आप लोग भी संवेदनाविहीन हो गए हैं।”
बड़े बाबू ने दबी आवाज में कहा, “सर, वह पहाड़ी से नीचे उतरने वाली घाटी के बीच बने घरों में से किसी एक में रहती है। वहाँ हमारे स्टाफ में से कोई भी पास नहीं रहता है जो उसके यहाँ जाकर पता करता और हमें बताता।”
“वाह, बड़ा बाबू, हमारे बीच का कोई उसके पास के किसी घर में नहीं रहता है इसलिए उसके बारे में पता रखने का हमारा कोई फ़र्ज नहीं होता है। आपलोग भी अजीब हैं।”
जयंत जी ने सारे स्टाफ को बुलाया। उनसे उन्होंने कहा था, “आप लोगों को मैंने इसलिए बुलाया है कि आप ने एक सामूहिक अपराध किया है। आपके बीच पिछले कई वर्षों से साथ - साथ काम करने वाली एक महिला साथी ऑफिस नहीं आ रही है। आप में से किसी को उसकी खबर लेने की सुध नहीं है। मुझे बहुत अफ़सोस हो रहा है।”
थोड़ी देर रुक कर उन्होंने ड्राइवर को बुलवाया था। उन्होंने बड़ा बाबू से कहा था, “मैं तीलू के घर उससे मिलने जा रहा हूँ। आप ऑफिस में किसी को कुछ भी नहीं कहिएगा।”
जयंत जी ड्राइवर को लेकर तीलू के घर की ओर चल पड़े थे। करीब दो किलोमीटर ड्राइव करने के बाद एक स्थान पर गाड़ी रोक दी गई थी। वहाँ से सड़क छोड़कर नीचे घाटी में उतरना था। उन्होंने ड्राइवर को वहीं रहने को कहा। एक बॉडीगार्ड के साथ वे पैदल नीचे घाटी में उतरने लगे।
ऊँचे पहाड़ से नीचे उतरना कठिन और रोमांचक दोनों लग रहा था। चट्टानों के बीच से नीचे उतरते हुए, उन्हें हाथ से चट्टान के छोर को पकड़ना पड़ रहा था । बार - बार ऐसा करने से हथेलियाँ कीचड़ से सनी लगने लगी थी । एक स्थान पर बहते प्राकृतिक झरने में उन्होंने हाथ धोया था। चट्टान को पकड़कर ऊपर चढ़ने के बाद एक घर नजर आया था । वहाँ उन्होंने पूछा था कि तीलू का घर कौन सा है। उन्होंने वहाँ से थोड़ी हलकी चढ़ाई के बाद एक घर की ओर संकेत किया था।
जयंत जी तीलू के घर के सामने पहुँच गए थे। घर में किसी के कराहने की आवाज आ रही थी, “तीलू, कहाँ चली गई? पानी, पानी!”
जयंत जी ने देखा कि घर के बाहर लकड़ी के ही पटरों को बांधकर दरवाजे का ढांचा तैयार किया गया था। उसे ही घर के बाहर भिड़का दिया गया था। कराहने की आवाज अभी भी आ रही थी। तीलू कहीं दिख नहीं रही थी । जयंत जी से रहा नहीं गया। वे अंदर चले गए। अंदर आँगन जैसा था । उसके पार करने के बाद सामने के एक घर से कराहने की आवाज आती हुई लगी । उनके अंदर आते ही आवाज आनी बंद हो गई ।
इतने में हाथ में पत्तों का एक बंडल लिए हुए तीलू ने प्रवेश किया था। वह तो अपने घर के आँगन में अपने साहब को देखकर किंकर्त्तव्यविमूढ़, मूर्तिवंत ठिठकी रह गई। जिसे आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा हो, वह अचानक जब प्रत्यक्ष दिख जाय तो स्थिति कैसी हो सकती है, उसकी कल्पना भर की जा सकती है। तीलू की सांसे क्षण भर के लिए रुक गई । तब अचानक उसे ध्यान आया कि हमारे साहब हमारे आंगन में खड़े हैं, हम उन्हें बैठने के लिए भी नहीं कह रहे हैं ।
वह भूल गई कि वे पत्ते लाने क्यों गई थी। पत्तों को उसने आँगन के एक कोने में फेंका और वह दौड़कर घर के अंदर गयी। वहाँ से खाट उठा लाई। आँगन में खाट बिछा दी। नीचे बैठ कर वह अपने साहब के मुख मंडल को देखते हुए देखे ही जा रही थी, जैसे उसने ऑफिस में काम करते हुए साहब को कभी देखा ही नहीं हो। वह समझ नहीं पा रही थी, कि क्या बोलूं, या क्या पूछूँ। साहब ने यहाँ आने का कष्ट क्यों उठाया? यही पूछना चाहती थी वह।
जयंत जी उसके द्वारा बिछाए गए खाट पर बैठ गए। उन्होंने उसे भी खाट के पायताने
बैठने को कहा। उसने संकेत से ही कहा कि वह वहीं ठीक है। तब तक उनका बॉडीगार्ड भी आँगन में आ गया था। उसने उसे समझाया कि साहब की बात उसे मान लेनी चाहिए। वह अपने भाग्य को मन - ही - मन हजार बार सराहने में लगी हुई चुप - सी हो गई थी । आपके साथ जब ऐसा घटने लगे, जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की हो, तब शरीर के अवयव भी अपनी सक्रियता भूल जाते हैं, मन में मूढ़ भाव आ जाता है।
जयंत जी तो उस घर में प्रवेश करते ही सारी स्थिति समझ गए थे। तीलू अपने पति की बीमारी के कारण ऑफिस नहीं आ रही थी।
उन्होंने पूछा था, “तुम्हारे पति बीमार हैं और तुमने इसके बारे में ऑफिस में किसी को खबर नहीं दिया। यह तुम्हारी गलती ठहरी।”
तीलू तो और भी सकपका कर स्वयं में सिमट गई।
उन्होंने आगे कहा, “तुम्हारे तीन दिन की छुट्टी लेने के बाद तुम्हारे ऑफिस नहीं आने पर हम लोगों में से किसी ने तुम्हारी खबर नहीं ली, यह हमारी गलती रही। हम अपनी गलती सुधारने के लिए स्वयं आए हैं।”
तब तक अंदर से उसके पति की आवाज आई, “तीलू, कौन आया है?”
तीलू जल्दी से अपने पति के कमरे की ओर भागी। उसके मन में शायद आशंका रही हो कि उसका पति कुछ अनावश्यक बात नहीं बोल दे। उसने अंदर जाकर अपने पति को पानी पिलाया और उसे सारी बातें बताई । पति चुप हो गया था।
तीलू फिर आँगन में आई। जयंत जी ने कहा, “मैं तुम्हारे पति को लेने आया हूँ ।”
जयंत जी बाहर आए। गाँव के लोगों को पता चल गया था कि शहर के बड़े ऑफिसर गाँव में आए हैं। सभी के मन में कुछ - न - कुछ भाव होंगे, इसलिए वे बाहर एकत्रित हो गए थे। जयंत जी ने उन लोगों से कहा, “आपके गाँव से सरकारी अस्पताल दूर है। सरकारी अस्पताल पहुंचाने के लिए चिकित्सा - वाहन की व्यवस्था है। उसे बुलाने के लिए भी पास के किसी कालिंग बूथ (पी सी ओ) तक जाना होगा। मैं आपके गाँव में एक सरकारी कॉलिंग बूथ की स्थापना करवा दे रहा हूँ। वहाँ से आप कॉल कर चिकित्सा वाहन को बुला लेंगे । उसी वाहन से वीमार को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा सकेंगे। अभी आप तीलू के पति को ऊपर सड़क तक पहुंचने क़ी व्यवस्था कीजिए। वहां मैं अपनी गाड़ी से उसे अस्पताल पहुँचाऊंगा ।”
वहाँ उपस्थित लोगों में आपस में बात चीत आरम्भ हो गई । उन लोगों ने तुरंत एक खाट को पलट कर, उसके चारों पायों में रस्सियां लपेटकर सुरक्षित किया था। उसी पर उन्होंने तीलू के पति को लिटाया और चारों ओर चार लोगों ने उठा लिया। उबड़ - खाबड़ रास्तों और चट्टानों के कारण उसे थोड़े लम्बे रास्ते से लेकर चले। जयंत जी और उनका बॉडीगार्ड भी उनके पीछे - पीछे पैदल ही चले। उन्हें वहाँ तक पहुंचने में पंद्रह मिनट लगे होंगे। गाँव वालों की मदद से उसके पति को गाड़ी में पिछली सीट पर सुला दिया गया था।
तीलू बाहर खड़ी सब देख रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके पति के साथ क्या हो रहा था। आगे क्या होने वाला है, यह भी उसे पता नहीं था।
जयंत जी ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठ गए। वहाँ से सड़क ऊपर की ओर जाती थी। गाड़ी थोदी देर के बाद अस्पताल के सामने रुकी थी। जयंत जी वाहन से उतर कर सीधे अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर के चैम्बर में गए। वहाँ उन्होंने उनसे बात की। सारे डॉक्टर और नर्सिंग स्टॉफ एक साथ सक्रिय हो गए। जनपद के एस डी एम उनके अस्पताल के इंस्पेक्शन के लिए आए हैं, ऐसा उन्होंने समझा।
तीलू के पति को जयंत जी की गाड़ी से उतार कर स्ट्रेटचर में लाद कर सीधे इंटेंसिव केयर यूनिट में ले जाया गया। वहाँ इलाज आरम्भ हो गया। जयंत जी वहीं रुके रहे ।
आधे घंटे बाद डॉक्टर ने उन्हें कहा कि चेस्ट में इंफेक्शन है। एक्यूट निमोनिया जैसा लग रहा है। कुछ दिन अस्पताल में ही रहना होगा। जयंत जी ने डॉक्टर को दवाइयों का बिल बनाकर उन्हें भेज देने के लिए कहा। जयंत जी ने तीलू को बुलाया था । उसे सब कुछ समझा दिया । जब तक ठीक नहीं हो जाए तब तक उसे अस्पताल में ही रहना होगा। या तुम्हारी जगह पर कोई रिश्तेदार या गाँव का कोई आदमी रह सकता है । रात में कोई औरत साथ में नहीं रहेगी।
इतनी व्यवस्था करने के बाद वे अपने ऑफिस लौट गए थे. उन्हें संतोष था कि आज उन्होंने अधिकारी से इतर मानव होने का फ़र्ज निभाया है.
