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Friday, August 1, 2014

वर्तमान केंद्र सरकार क्या कुछ अलग कर सकती है ?

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वर्तमान केंद्र सरकार क्या कुछ अलग कर सकती है ?
केंद्र  सरकार  भारतीय  जनता  पार्टी  के  पूर्ण  बहुमत  से  बनी  है ।  लोगो  ने  काफी  उम्मीदों   से  इस पार्टी  के   हाथों  में  केंद्रीय   नेतृत्व  की  बागडोर  दी  है । 
   यह   सरकार  कुछ  ऐसा  कर   सकने  की  स्थिति  में  है   जो   लोक - लुभावन (पॉपुलस )   होकर लोकहित  और  राष्ट्रहित  को  ध्यान  में  रखकर  किया  जा  सके ।  आज़ादी   के  बाद  आजतक राष्ट्रहित  में  जरूरी  समझे  जानेवाले   निर्णय  ठंढे  बस्ते  में इसलिए   डाले जाते रहे हैं ताकि कोई तबका  नाराज   हो  जाय   इस  लेख  में  मैं  उन्हीं  कुछ  पीछे  की  ओर  धकेले  जाते  रहे  राष्ट्रीय ज्वलंत  समस्याओं  को  सामने  लाने  की  कोशिश  करूंगा , जो  बिलकुल  जरूरी  रहे  हैं , जो  विवाद से   परे  (uncontroversialरहे  हैं , जो  सबों  के  हित  में  रहे  हैं , जो  पंक्ति  में  खड़े  अंतिम  आदमी के  हित  के  लिए  निहायत  जरूरी  रहे  हैं ।  क्या  आज  की  यह  केंद्र  सरकार  स्वकेंद्रित  या आत्मकेंद्रित   घेरे   से  बाहर  निकलकर   इन  मुद्दों  की   ओर  सधे  कदमों  से आगे  बढ़  सकने  की  दृढ़ता  दिखा  पाएगीअगर  दिखा  पाती  है  तो  मोदी  सरकार  को  देश  के  इतिहास  को  बदलने  वाला  माना  जायेगा  और  आगे  आने  वाली  पीढ़ियों  के  लिए  गर्व  का  विषय  होगा ।
   केंद्र  सरकार  ने  इस  बार  चुनकर  आये  सांसदों  के  लिए  संसदीय  आचरण  और  ब्यवहार  पर कार्यशाला  आयोजित  कर  बहुत  अच्छी  शुरुआत  की  है ।  उन  सांसदों  से  भारतीय  जनता  पार्टीअबतक  जो  संसद  में  होता  रहा  है  उससे  कुछ  अलग  आचरण  की  उम्मीद  रखती  है ।  इसके  लिए आवश्यक  प्रशिक्षण  द्वारा  जिम्मेवारियों  का  अहसास  कराने  की  पहल  कर  भारतीय  जनता  पार्टी   ने   अलग    हटकर  एक  काम  किया है , जिसका  असर  संसद  के  कार्यकलाप  को  सुचारू  रूप  से  चलाने  में  और  ज्यादा  वक्त  जनता  और  उनसे  सम्बंधित  मुद्दों  को  उठाने  और  निर्णय  तक  ले  जाने  में  ब्यतीत  होगा । यह  एक  अच्छी  पहल  है । 
जनसँख्या स्थिरीकरण:
  आज  के  भारतवर्ष  की  सबसे  ज्वलंत  समस्या  है  कि  हेड  काउंट  में  हमारी  गणना  १२५ करोड़  हो  गयी  है ।  यह  पिछले  ६७  सालों  से  जनसँख्या  नियंत्रण / स्थिरीकरण  के  लिए  किये जाने  वाले  प्रयासों  की   पोल  खोल   दे  रही  है ।  आंकड़े  क्या  बताते  हैं ? दुनिया  का  1/6th आबादी   2.5%  जमीन   के  हिस्से  पर  रह  रही  है ।  यह  भारतवर्ष  है ।  आबादी  2.1%   प्रतिवर्ष   की  दर  से  बढ़  रही  है ।  क्या  होंगे  बढ़ती  हुयी  आबादी  के  नतीजे ?  यह  देश  के  विकास  की  दर को  हर  स्तर  पर   प्रभावित  कर  रहा  है ।  देश  का  क्षेत्रफल  तो  बढ़ाया  नहीं  जा  सकता ।  इसलिए आबादी  का  स्थिरीकरण (स्टेबिलाइजेशन)  सस्टेनेबल  विकास  की  प्रकिया  के  लिए  जरूरी  है । तभी  आर्थिक  विकास  का  लाभ  भारतीय  आबादी  के  हरेक  ब्यक्ति  के  जीवनस्तर  की गुणवत्ता  में  सुधार  के  रूप  में  प्राप्त  हो  सकता   है ।  केंद्र  सरकार   में  भारतीय  जनता  पार्टी इस  राष्ट्रीय  कार्य  को  करने  में  हर  तरह  से  सक्षम   है ।  इसके  लिए  कही  से  भी  कोई विरोध  का  स्वर  नहीं  उठ  सकता  क्योंकि  आपके  पास  संख्या  बल  है ।
महिलाओं के लिए आरक्षण एवं महिलाओं , बच्चों और बुजुर्गों को संरक्षण :
  महिलाओं   के   लिए  आरक्षण  का  मुद्दा   संसद  में  कई  बार  उठाया  गया , गरमाया  और  फिर ठंढा  हो  गया ।  यह  कहीं - - कहीं  महिलाओं  को  तबकों  में  बांटने  और  तबकों  के  कोटे  सिस्टम के  घेरे  में  घूमते - घूमते  अपनी   आवाज़  खोता  चला  गया ।   अभी  की  केंद्र  सरकार  इसपर त्वरित  और  ठोस  कदम  उठाने  में  सक्षम  है ।  इस  मुद्दे  का  महत्वपूर्ण  होना  ही  मायने  नहीं रखता ।  उसे  संसद  में  पास  करा  लेना  अधिक  मायने  रखता  है । अगर  यह  सरकार  ऐसा  कर  पाती  हैतो  इस  सरकार   का   ऐतिहासिक  कदम  होगा ।   
  इसी तरह कहा जाता है कि किसी  भी समाज , देश का भविष्य  वहां के शासन के महिलाओं , बच्चों और बुजुर्गों के  प्रति रवैये पर निर्भर करता है।  हमारी सरकारें अबतक  इस  तबके  के प्रति  बिलकुल ही संवेदनशील  नहीं रही हैं।  क्या  केंद्र की सरकार महिलाओं  की सुरक्षा, बच्चों  का पोषण  और शिक्षा तथा  बुजुर्गों  को  समाज  का अपनापन  लौटाकर  उन्हें  सम्मानजनक  स्तर  प्रदान  कर  सकेगी ?    केंद्र सरकार  करने में हर तरह से सक्षम  है।  अगर यह कर पाती है , तो कुछ अलग किया , ऐसा दिख सकता है।  अगर नहीं कर पाती है , तो अन्य सरकारों की तरह  यह सरकार भी कुछ हटके करने में असमर्थ है , यही माना जायेगा।
क्षेत्रवाद :
 भारतवर्ष  आज भी आर्थिक रूप से विकसित,  अविकसित  और  अर्धविकसित क्षेत्रीय हिस्सों में बंटा हुआ है।  इन हिस्सों में कभी - जभी स्वघोषित क्षत्रप सर उठाने में सक्षम हो जाते हैं और क्षेत्रीय विवादों को ताजा करके , सतह पर लाकर सस्ती लोकप्रियता भी हासिल करते रहे हैं।  यही नहीं राष्ट्रीय दल सत्ता से चिपकने की ललक में उनके पिछलग्गू होते दिखाई देते रहे हैं।  केंद्र सरकार में भा ज  पा के पास ऐसी मजबूरी नहीं है।  कोई भी क्षेत्रवाद का सहारा लेकर , अपने मुद्दे उछालने के लिए उसे नियंत्रित (डिक्टेट ) करने की  ज़ुर्रत   नहीं कर सकता है क्योंकि उसके पास संख्या का गणित फेवरेबल है।  उन्हें थोड़ा  अलोकप्रिय (अनपॉपुलर) होकर भी ऐसे तत्वों द्वारा क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाली कोशिशों के विरुद्ध  सख्ती से निपटना होगा।  इस पहल का समर्थन पूरे देश से मिलेगा क्योंकि यह देश   की अखंडता और संप्रभुता के लिए जरूरी है।    


सहज सुभेद्य देश (Easily vulnerable nation) की छवि :
इस केंद्र सरकार को पिछली सरकार द्वारा भारत की सहज सुभेद्य देश (easily वल्नरेबल नेशन )  की छवि  को भी गलत साबित करना है।  यह एक ऐसी चुनौती है जिसे सार्वजनिक तौर पर चुनावपूर्व के भाषणो में मोदी साहब भी स्वीकार कर चुके हैं।  हमारे दो पड़ोसियों,  पाकिस्तान और चीन के तरफ से सीमा पर पिछले दो महीनो से ऐसी हरकतें हो रही हैं , जो उनके पिछले कई सालों से अपनाये जा रहे रवैये में थोड़ा भी परिवर्तन के संकेत नहीं दे रहे हैं।  ऐसा शायद इसलिए है की इधर से भी कोई संकेत नहीं जा रहा है - बदले  निज़ाम का और बदले मिज़ाज का । वे सब अभी भी वही भारत समझ रहे हैं जो मौन होकर सबकुछ सहता हुआ वार्ता की बात और आपसी सहयोग बढ़ाने की  बात करता रहा है।  आपने नेवी में युद्ध पोत में जाकर सैनिकों का और पी इस अल वी (PSLV) लांच के समय जाकर विज्ञानिकों का मनोबल बढ़ने का कार्य किया है,  जो सिद्धांततः सराहनीय है।  आपको डर तो नहीं है किसीसे।  १२५ करोड़ जनता आपके साथ है- देश की अस्मिता के लिए जान कुर्बान करने को।  कारगिल के शहीदो के प्रति  इस   सरकार   की सच्ची श्रद्धांजली यही होगी।  राष्ट्रकवि दिनकर ने १९६२ के चीन युद्ध के बाद अपनी पुस्तक 'परशुराम की प्रतीक्षा' में लिखा था :
गीता  में  जो  त्रिपिटकनिकाय  पढ़ते  हैं ,
तलवार      गलाकर  जो    तकली    गढ़ते    हैं ,
शीतल  करते  हैं  अनल  प्रबुद्ध  प्रजा  का ,
शेरों   को   सिखलाते हैं  धर्म   अजा  का।

लौलुप्य -लालसा  जहाँ ,  वहीं  पर  क्षय  है,
आनंद  नहीं  जीवन  का  लक्ष्य  विजय  है ।

     "मुख  में  वेद ,  पीठ  पर  तरकस,  कर  में  कठिन  कुठार,
   सावधान !   ले  रहा  परशुधर  फिर     नवीन    अवतार।"
इसका अहसास दुनिया को हो जाना चाहिए कि भारत का एक अजेय शक्ति के रूप में उदय हो चूका है . इसके बढ़ते कदम को रोक सको तो रोक लो.... . इसके लिए भारत को अंदर से मजबूत होना होगा।  हमारी अंदर से खोखली करनेवाली प्रवृतियों को सख्ती से कुचलना होगा।  उसे टेढ़े से सीधा करना होगा , इसके लिए थोड़ा अलोकप्रिय भी बनना पड़ सकता है।
आरक्षण:
ऐसा   ही  एक   दुश्चक्र  में  डालने  का  काम  आरक्षण  को  लेकर  और  उसके  वर्तमान  स्वरुप  में  लागू कर  वोट  बैंक  की  राजनीति  ने  देश  की  अस्मिता   और   अखंडता  के  साथ   किया  है ।  उसे उलटकर  सीधा  करना  होगा ।  ऐसा  कहा  जाता  है   कि संविधान  बनाने  के  समय  संविधान निर्माताओं  ने  कसम  खायी  थी  कि आरक्षण  आगे   आनेवाले   सिर्फ  दस  सालों  तक  ही  रहेगा ।  संविधान  के  मुख्य  प्रारूप  बनाने  वाले  डाक्टर  अम्बेडकर  भी    आरक्षण  के  विरुद्ध  थे ।  लेकिन आज  ६७  वर्षोँ   बाद  भी  आरक्षण  ने  एक  राजनीतिक  हथियार  का  रूप  ले  लिया  है ।  क्षेत्रीय दल  तो  आरक्षण  की  नीति  पर  ही  अपने  वोट  की  राजनीति  करते  रहे  हैं ।  लेकिन  जब  राष्ट्रीय दल  भी  इसी  आरक्षणनीति  को  सम्पोषित  करते  हुए  और  कुछ  क्षेत्रों  में  कभी  इस  तबके , कभी  उस  तबके  को  खुश  करने  के  लिए , उनका  वोट  प्राप्त  करने  के  लिए  आरक्षण  को  अस्त्र बनाने  लगते  हैं ,  तो   वे   एक  राष्ट्रघात  या  देशद्रोह   जैसा   पाप  करने  की  भूमिका   में  लगे  हुए प्रतीत  होते  हैं ।  आजतक  आरक्षण  का  लाभ  जिन  लोगों  ने  प्राप्त  किया  है , वह  स्पष्टतः  उन जातियों  में  जो  संपन्न  तबका  है  उसी  को  मिला  है ।  इसका  लाभ  क्रीमी  लेयर  (नवनीत सतह प्राप्त)  लोगों  को  क्यों  मिले  ?  क्या  इस  सरकार  में  दम  है ,  इसको  उलटकर  सीधा  करने  कादेश  का  प्रबुद्ध,  मननशील ,  उदार,  सहनशील   नागरिक  आजादी  की  दूसरी  फुहार  की  प्रतीक्षा  में टकटकी  लगाये  खड़ा  है ।
 कुछ   उम्मीद  लगा  बैठे  हैं  लोग,  कुछ  आस  लगा  बैठे  हैं  लोग,  क्या  बदलाव  की  बयार  बहेगी ?
चुनाव प्रक्रिया  का  शुद्धीकरण :

चुनाव  भारतीय  राजनीति  और  संसदीय  लोकतंत्र  का  वो  पर्व  है  जो  सांसद   जो  संसद  के  मंदिर  तक  पहुँचने    का  अवसर  प्रदान  करता  है ।  वहां  हत्या,  बलात्कार ,  डकैती ,  चोरी  आदि अपराधों  के  नामजद  या  सजाभोगी  ब्यक्ति  नहीं  पहुंचे ,  इसके  लिए  सभी  दलों  को  मिलकर  कठोर  कदम  उठाने  की  जरूरत  है ।  अबतक  सारे  दल  इसपर  सिद्धांततः  सहमत  होते  देखे  गए हैं ।   लेकिन  संसद  और  बिधान सभाएं  अभी  भी  ऐसे  लोगों  के  पहुँचने  का  स्थान   बना   हुआ  है ,  क्योंकि  सारे  दल  इसतरह  के  प्रत्याशी  खड़े  करते  रहे  हैं ।     इसके  लिए  कठोर  कानून  बनाये  जाने की  जरूरत  है ।  अगर  संविधान  में  संशोधन  की  जरूरत  है  या  अध्यादेश  के  द्वारा  कोई कानून  पास  कराया  जाना  है ,  तो  वह  कार्य  शीघ्र  होना  चाहिए ।  संसदीय  लोकतंत्र  चुनाव  के बाद  भी  जनता  की  भागीदारी  में  चले ,  इसका  प्रयास  होना  चाहिए ।  सांसदों  को  अपने  क्षेत्र  के विकास  के  लिए  एक  पूरी  रूपरेखा  देने  को  कहा  जाना  चाहिए ।  संसदीय  क्षेत्र  विकास  कार्यक्रम  के तहत  दिए  गए  राशि  का  समुचित  उपयोग  हो ,  इसके  लिए  कठोर  कदम  और  सटीक  ऑडिट भी  होना  चाहिए ।  नॉन  परफार्मिंग  नुमाईंदों  को  जनता  कैसे  वापस  बुला  सकती  है ,  इसके  लिए  बैठकर  चुनाव - प्रक्रिया  शुद्धीकरण  के  बिन्दुओं  पर  विचार  होना   चाहिए ।  बी जे पी  इसे  कर  सकती  है  क्योंकि  उसके  पास  पर्याप्त  बहुमत  है ।  इसके  लिए  इक्षा  शक्ति  को  एकत्र  करना  होगा  और  उसतरफ  सधे  कदमों  से  बढ़ना  होगा ।
शिक्षा   का   ब्यवसायीकरण :
शिक्षा  के  बढ़ते  ब्यवसायीकरण  के  कारण  शिक्षा  के  क्षेत्र  में  कॉर्पोरेट  वर्ल्ड  का  मुनाफा  कमाने  के  लिए  बढ़ती  भागीदारी  बहुत  बड़ी  चिंता  का  विषय  है ।  जो  लाखों  रुपये  केपिटैषण  फी  देकर डाक्टर   या  इंजीनियर  बनेगा ,  वह   नौकरी  मिलने  पर  सबसे  पहले  करोड़ों  कमाकर  उसकी  भरपाई  करना  चाहेगा ।  यह  भ्रष्टाचार   की  राह  के  नए  पथिकों  के  निर्माण  करने  जैसा  है ।  अभी  तो  यह  भी  देखा  जा  रहा  है  कि  थोक  ब्यापारी ,  मॉल   के  मालिक,  बिल्डर  आदि  भी  स्कूल   से    लेकर  उच्च  शिक्षा   के     नएनए  शिक्षण  संस्थान  खोलकर   उसके  प्रशासनिक निकाय    के   चेयरपर्सन  बन  गए   हैं ।  अब  ऐसे  लोग  अगर  शिक्षा  की  दिशा  और  दशा  तय  करेंगे तो  भगवान  ही  मालिक  है ।  केंद्र  सरकार  का  मानव  संसाधन  मंत्रालय  इसपर  रोक  लगाने  के लिए  कठोर  कदम  उठा  सकता   है  ताकि  शिक्षा  के  निजीकरण  और  कॉर्पोरेटिजेसन  पर  तुरत     विराम  लगाया  जा  सके ।  शिक्षा  की  गुणवत्ता  पर  किसी  तरह  का  कोई  भी  समझौता  नहीं  होना चाहिए ।  हर  तबके  के  मेधावी  छात्र/ छात्राओं  को    ऊंची  से  ऊंची  शिक्षा  के  अवसर  प्राप्त  हों,  इसके लिए  कानून  बनाने  चाहिए  या  वर्तमान  कानून  में  उचित  फेरबदल  होने  चाहिए । 

इन  सबों  के  अतिरिक्त  कुछ  ऐसे  कदम  भी  सरकार  को  उठाने  होंगे  जिससे   लोगों  को   लगे   कि यह  कुछ  अलग  करना  चाहती  है ।   इस  सरकार   को  चलाने  वालों  के  अंदर  एक  आग  है  जो बदलाव  लाना  चाह  रही  है  और  उस  बदलाव  को  स्थाई  बनाना  चाह  रही  है ।
पिछले  दो  महीनों  के  अंदर  ऐसा  कुछ  दिखाई  नहीं  दे  रहा  है ।   लोग  कहने  लगे  हैं  कि  अगर यह  सरकार  भी  ऐसी  ही  है  तो  पिछली  सरकार  क्या  बुरी  थी ।  क्या  केंद्र  सरकार  अपनी  इस तश्वीर  को  बदल  सकेगी  ?  जितना   जल्द  तश्वीर (इमेज)  बदले  उतना  ही  अच्छा  होगा ,  वरना जनता  का  भ्रम  अगर  टूट  गया  तो  पता  नहीं  क्या - क्या  होगा  ?? 

  तिथि :  01-09-2014
575463_402545343209558_1544328495_n   --- ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र, 3A, सुन्दर गार्डन, संजय पथ, डिमना रोग, मानगो, जमशेदपुर।
मेतल्लुर्गी*(धातुकी)   में इंजीनियरिंग ,   पोस्ट  ग्रेजुएट  डिप्लोमा  इन  मार्केटिंग मैनेजमेंट ।  टाटा स्टील  में  39  साल  तक   कार्यरत । पत्र पत्रिकाओं में टेक्निकल और  साहित्यिक  रचनाओं  का  प्रकाशन । सम्प्रति  जनवरी  से  'रूबरू दुनिया ' भोपाल  से  प्रकाशित  पत्रिका  से जुड़े है । जनवरी 2014 से सेवानिवृति के  बाद  साहित्यिक  लेखन कार्य  में  निरंतर  संलग्न ।
E-mail: brajendra.nath.mishra@gmail.com, Blog:http://marmagyanet.blogspot.com
Mob No: +919234551852




Thursday, July 17, 2014

Dew drops (poem)

#bnmpoems
Dew drops

                                                                                                                                                                 
Dew drops look like pearls
Sleeping on the grasses green.


I want to touch them with  ​​fingers,
I want to close them in my fist within.


Stars in the night come from the sky,
They spread them on earth around,
Gust of wind come, strokes,
Opened, uncover and dispersed.

Bathed in those droplets,
Trick - trick comes the dawn,
Falling on the leaves, brightening them,
Fill with life – juice everyone.

  
Apparently stayed drops on flowers,
Touch, kiss, dance,
Staying, tap - tap, was falling,
Carry away pollen with glance.


Come to the finger tip,
Should capture, taking away,
Ask a little bit of  
 Pearl from the sky.

--Brajendra Nath Mishra
  Jamshedpur

This poem is published on the site link:
http://www.poemhunter.com/brajendra-nath-mishra/poems/

ओस की बूँदें (कविता)

#bnmpoems
ओस  की बूँदें
ओस      की   बूँदें   मोती  -  सी लगें ,
दूबों पर टिकती हुयी सोती - सी लगें

उन्हें उँगलियों से छूना चाहूँ ,
मुठियों में बंद करना चाहूँ   

रात सितारे आते अम्बर से ,
उन्हें धरा पर बिखरा जाते ,
झोंके पवन के आते, सहलाते  ,
पसारते ,     छितरा       जाते

नहलाई हुयी उन बूंदों में ,
छल - छल करती आती भोर ,

पत्तों पर गिरती , चमकाती,
जीवन - रस से करती सराबोर। 

 
फूलों पर बूंदे ठहरी हुयी ,
छूती  , चूमती, नाचती हैं ,
टिकती, टप - टप गिरती हुयी ,
पराग चुरा ले जाती हैं।


आओ उंगली के पोरों में ,
कर लूँ कैद , ले    भागूं ,
उनके बदले थोड़ी - सी ,
मोती   गगन से मैं मांगू।  

-- --ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
    जमशेदपुर
'18/07/2014, Vaishali, Delhi NCR'
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Tuesday, July 15, 2014

संघर्ष के जज्बे को सलाम (कहानी)

#chhanvkasukh : यह कहानी मेरी पुस्तक "छाँव का सुख" में सम्मिलित की गई है.

मेरी लिखी कहानी संग्रह "छांव का सुखप्रकाशित हो चुकी है. सत्य प्रसंगों पर आधारित जिंदगी के करीब दस्तक देती कहानियों का आनंद लें.अपने मन्तब्य अवश्य दे.
यह पुस्तक अमेज़ॉन पर उपलब्ध हैमात्र 80 रुपये में पुस्तक आपके घर तक पहुंच जाएगी.  Link: http://www.amazon.in/Chhanv-Sukh-Brajendra-Nath-Mishra/dp/9384419265 
इंफीबीम पर भी ऑनलाइन बुकिंग करें:        
My mob no: +919234551852


 संघर्ष के जज्बे को सलाम
    (Salute to the Spirit of Strugggle)
   कभी - कभी  यात्रा  करते  हुए  जिंदगी  के  पन्नों  से  संघर्षशीलता  की  ऐसी  कहानी  छन  कर निकलती है  जिसे  बस  सैलूट   करने  का  मन  करता  है । एक  ऐसी  ही  जीवन  की  सच्चाई  सेजिसमें  संघर्ष, सहिष्णुता  और  आगे  बढ़ने  का  अदम्य  साहस   है ,  मैं  आपको  रूबरू  कराना  चाहता  हूँ ।
    मैं 23-05-2014, दिन शुक्रवार को लोकमान्य तिलक टर्मिनस (कुर्ला) , मुंबई से बैंगलोर के लिए मुंबई - कोयंबटूर एक्सप्रेस , जो रात्री में साढ़े दस बजे खुलती है , पत्नी  के साथ मीरा रोड से ओला कैब (टैक्सी) द्वारा करीब सात बजकर पैंतालीस मिनट शाम में रवाना हुआ।  करीब २ किलोमीटर ड्राइव के बाद मुझे याद आया कि मेरा ID PROOF (पैन कार्ड को मैं  आई दी प्रूफ के रूप में प्रयोग करता हूँ ), डेरे पर ही छूट गया है।  ड्राइवर को मैंने अनुरोध कर वापस  चलने को कहा। मेरा डेरा सातवीं मंजिल पर था।  ड्राइवर ने सिर्फ इतना ही कहा की फोन पर बात करके किसी को ID PROOF कार्ड लेकर नीचे उतरकर इन्तजार करने को कह दें।  इसतरह हम समय बचा सकते है।  ठीक ऐसा ही हुआ।  नीचे कार्ड लेकर मेरी बहु खड़ी थी।  बिना कोई समय बर्बाद किये आई दी प्रूफ लेकर हमलोग चल दिए।  इसमें करीब दस मिनट समय बर्बाद हुआ होगा।
   ड्राइवर के बात बात करने के लहजे, और ऐसी स्थिति को बिना झिझक और नानुकुर के निपटने के तरीके ने हमलोगों को आकर्षित किया। ऐसे समय में मेरी पत्नी को एक rapport chord connect करने में कोई असुविधा नहीं होती है। इसलिए उन्होंने ही बात की शुरुआत की थी।   
उसके  बात  करने  के  एक्सेंट  से  लग  रहा  था  कि  वह  बिहार,  यु पी  या  एम पी  का  ही  रहने  वाला  होगा । 
"कहाँ  घर  हुआ  आपका ?", पत्नी ने पूछा था।
  अचानक  पूछे  गए  इसतरह  के  प्रश्न  से  बिना आशंकित हुए और बिना चौंकते हुए  उसने  विधेयात्मक प्रतिउत्तर  दिया  "मोतिहारी  का  रहने  वाला  हूँ ।  यह  बिहार  में  है ।"
"कबसे  मुम्बई  में  हो ?"  फिर पत्नी ने पूछा था।
"आंटी,  मैं  अपनी  पूरी  कहानी  सुनाऊँ  तो  शायद  उसपर  फिल्म  बन  जाये । आपको  शायद  विश्वास  नहीं हो,  मैं  १५  वर्ष  की  उम्र  में  मुंबई    गया  था  और  तब  से  अबतक  यानि  करीब  १६  वर्ष  से  अधिक  मुंबई में  बिता  चूका  हूँ ।  अभी  मेरी  उम्र  करीब  ३२  वर्ष  है ।उसने  कहा  था ।
    मैंने  थोड़ी  जिज्ञासु  धृष्टता  के  साथ  बात  को  आगे  बढ़ाने  से  अधिक  उसकी  जिंदगी  की  गुत्थियों को खोलने  के  लिए  कहा  था,  " तो  भई,  अगर  आपको  तकलीफ   हो  और  हमसे  अपनी  जिंदगी  के  कुछ खट्टेमीठे  अनुभवों  को  बताकर  मन  के  भारीपन  को  कुछ  कम  करना  चाहते  हों  तो  अपनी  जीवन - संघर्ष - गाथा  को  मेरे  साथ  शेयर  कर  सकते  है,  यदि  आपको  कोई  आपत्ति   हो । इससे  सफर  के  सन्नाटे  का  बोझ  भी  थोड़ा  हल्का  हो  जाएगा ।
वह  शायद  मेरे  इसी  इशारे  का  इंतजार  कर  रहा  था ।  उसके  अब  तक  के  जीवन  के  संघर्ष  की  कहानी उसी  की  जुबानी  हूबहू  दे  रहा  हूँ :
 " मेरा  नाम   संतोष  है,   मेरा  घर  मोतिहारी  के  पास  एक  गांव  में  है।   मेरा  मुंबई  में  भटकाव  और  संघर्ष परिवार  के  एक  ईमानदार  आदमी  की  देन  है।  उस  आदमी  ने  पूरे  परिवार  और  अपने  भाइयों  को  अपना सबकुछ  देकर  सांवरा ।  जब  उन्हें  जरुरत  हुयी  तो   सभी  साथ  छोड़कर  किनारे  हो  गए।   इसी  विस्वासघात  से  उपजे  संघर्ष  के  कारण  उस  ईमानदार  आदमी  के  मिटने  की  कहानी  है, मेरा  जीवन ।  मेरे  पिताजी  तीन  भाई  हैं ।  परिवार  के  सबसे  बड़े  भाई  होने के कारण दोनों छोटे भाइयों की भी परवरिश  एवं पढ़ाई की जिम्मेवारी उनकी ही थी ।  मेरा उस्समय जन्म भी नहीं हुआ था।  पिताजी की आमदनी जमीन – जायदाद  से  उतनी  नहीं  थी कि  भाइयों  को अच्छी शिक्षा दिला सकें।  भाई दोनों पढने में मेधावी  थे।   गावं  के  स्कूल  के  मास्टर  साहब  कहते  थे , इन्हें  अच्छा  से  पढ़ाओ ,  आगे चलकर  नाम  करेंगे ।  पिताजी को भी अपने परिवार को फलता - फूलता , आगे निकलता हुआ देखने और दिखाने का जूनून सवार था।  वे गावं की जमीन को बटाई पर लगाकर खुद आर्मी  में नौकरी के लिए  लिखित और  शारीरिक  परीक्षा दी,  जिसमें वे चुन लिए गए।  घर में खाने के लिए जमीन की पैदावार काफी थी।  भाईयों की पढाई के खर्चे के लिए पिताजी की नौकरी से पैसे आने लगे।  मेरी माँ ने भी अकेले पिताजी के नौकरी पर रहते हुए भी  घर का पूरा भार उठाया ताकि अपने दोनों देवर को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने में कोई ब्यवधान न हो। 
   वहां उनलोगों ने भी पूरी तैयारी कर प्री मेडिकल की एंट्रेंस परीक्षा दी।  बारी - बारी से दोनों ही परीक्षा  में चयनित हुए और दोनों ही दो साल के अंतर पर एम बी बी एस की परीक्षा पास कर डॉक्टर बनकर निकल  गए।  यह आज से ४० साल पहले की बात है।  इंटर्नशिप  खत्म  होते  - होते पिताजी ने दोनों की धूम - धाम से शादी करवाई।  पूरे इलाके में मेरे परिवार का रूतबा काफी बड़ा हो गया।  इससे पिताजी की छाती गर्व से और चौड़ी हो गयी।  उस समय मैं सात - आठ साल का रहा होऊंगा।“
    इसके बाद उसने थोड़ा अल्पविराम लिया। कार अपनी गति से ट्रैफिक सिब्नल, टोल नाका   पर   रुकते हुए फिर गति पकड़ते हुए बढ़ी जा रही थी। 
" मेरी कहानी में मोड़ यहाँ से  आता  है। मेरी  चाचियाँ यानि की दोनों डॉक्टर चाचों की पत्नियां घर में आती है।   वे दोनों जिस परिवार से मेरे परिवार में आई थी उसके संस्कार यहाँ के रहन - सहन के संस्कारों से मेल नहीं खाते थे।  मेरी चाचियों को उनके पतियों यानि मेरे चाचों को यहाँ तक सफलता दिलवाने में परिवार के किन लोगों ने कैसे और कितना संघर्ष कर कितना योगदान दिया , इसे न वे मालूम करना चाहती थी और न मालूम होने पर भी उसके प्रति संवेदनशील होना चाहती थी। वे जिस परिवार से आई थी उसके संस्कारगत दोष हो सकते है।  या फिर कहा जा सकता है कि उनकी शादी तो एक पढ़े - लिखे नौजवान , जिसने डाक्टरी पास की थी उससे हुयी थी न कि उसके पूरे परिवार से ।  उन्हें इससे क्या मतलब  कि उनके पतियों  को  डॉक्टर बनाने में उनके बड़े भाई ने फ़ौज की नौकरी कर कितनी रातें जमती हुयी बर्फ की ठिठुरन में गोलियों की बौछारों के बीच , या फिर आंधी , तूफ़ान में जंगली पशुओं और साँपों की फुंकारों के बीच काटी थी। उन्हें तो बनी - बनाई रियासत मिली।  अब बस हुकूमत चलानी  है। आते ही एक दो सालों के अंदर मेरी चाचियों ने चाचा  जी को भड़का कर जमीन और घर के बंटवारे का षड़यंत्र शुरू कर दिया।  पिताजी  ने भी  फ़ौज की नौकरी में पेंसन आदि चालू करने के लिए कम - से -  कम  १५ वर्षो तक की अवधि पूरी कर सेवा - निवृति ले लिया और घर आ गए।  उनकी  शायद  इच्छा रही होगी  कि दोनों भाई डॉक्टर होकर पैसे कमाएंगे और वे घर के मुखिया बनकर घर चलाएंगे और पूरे परिवार को नयी ऊंचाइयों  तक पहुंचाएंगे। घर आते ही उन्होंने स्त्रियों के बीच जो कलह और कोहराम देखा,  साथ ही इन सबों के प्रति अपने भाइयों का जो रुख देखा उससे उनके सारे सपने चकनाचूर हो गए।   तबतक मेरी एक  बहन ने जन्म ले लिया।
   घर में रोज - रोज की चिख -चिख से तंग आकर उन्होंने जमीन और घर का बंटवारा कर दिया।  इस बंटवारे का उनके मन - मस्तिस्क पर ऐसा  गहरा प्रभाव पड़ा जिसे वे झेल नहीं सके और चल बसे।  उस्समय मेरी उम्र १५ वर्ष थी और मैंने मेट्रिक की परीक्षा पास  की थी।  वैसी स्थिति में मेरे किसी चाचा ने मेरी ओर कोई भी मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।  मैंने भी किसी से कोई भी मदद  नहीं  मांगने  की ठान ली थी। पिताजी का थोड़ा - सा पेंसन जो माँ के नाम आता था और जमीन की पैदावार से घर में खाने - पीने का खर्च चल जाता था।  लेकिन इतनी आमदनी से मेरी पढ़ाई के लिए आगे का खर्च चलाना मुश्किल था।  मैं उसी समय सीधा मुंबई चला आया।  और पिछले १६ साल से मैं यहीं हूँ।  अभी मेरी उम्र करीब ३२ वर्ष होगी।"
इसके बाद उसने अपनी नम हो आई आँखों को एक हाथ से पोंछा और आगे कहना शुरू किया ," मुंबई में मैंने हर रोज १८ - २० घंटे तक लगातार टैक्सी  चलाई है।  अब मुंबई के अपने संघर्ष के तरफ आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ।  यहाँ आते ही एक सरदारजी के यहाँ नौकरी कर ली।  सामान उठाने और लोड  करने का काम था।  किसी तरह खाने और रहने का खर्च चल जाता था।  एक दिन की बात है : सरदारजी ऑफिस में नहीं थे, और छोटी गाड़ी जिससे सामान पहुँचाना था,  उसका ड्राइवर  नहीं आया।  सामान ग्राहक के पास पहुँचाना जरूरी था,  क्योंकि उसका कई बार फ़ोन आ चूका था। इसके पहले मुझे कोई भी गाड़ी चलाने अनुभव नहीं था , सायकिल को छोड़कर।   मैंने सामान लोड किया , गाड़ी स्टार्ट की और चल दिया।  रस्ते में दो - तीन जगह गाड़ी रुकी।  एक जगह तो भीड़ - भाड़ में गाड़ी रुक गयी।  स्टार्ट करके फिर आगे बढ़ने  में थोड़ी देर हुयी।  सड़क पर टेम्पो ड्राइवर  और टैक्सी ड्राइवर  ने दम भरकर कोसा और गलियां दी। सामान ग्राहक तक पंहुचा कर अनलोड किया।  रिसीविंग की रसीद पर साइन करवाई और वापस गाड़ी लेकर चला आया।  वापसी में गाड़ी कहीं नहीं रुकी। वहां देखा कि सरदारजी गुस्से में पैर पटकते हुए  ऑफिस के बरामदे में तेजी से घूम रहे थे।  मेरा आज जमकर क्लास लिया जायेगा इसका मुझे पूरा विश्वास हो गया। सरदारजी ने चिल्लाकर पूछा ,' गाड़ी लेकर कहाँ गया था ?'  मैंने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया ,'आज ड्राइवर नहीं आया था , कई बार कस्टमर का फोन आ चूका था , मैंने समझा सामान की डिलिवरी बहुत जरूरी है  , इसीलिये मैं गाड़ी में सामान लोडकर  ………' जैसे आगे कहने जा रहा था सरदारजी ने  रोकते हुए कहा ,'बस , बस बहुत बहादुरी किये , किसी को धक्का नहीं मारा न। मैंने तुरत जवाब दिया , ' नहीं बिलकुल नहीं , और गाड़ी में भी कोई खरोंच तक नहीं लगी है। '
'ठीक है, ठीक है, कल तुम्हें जाकर ड्राइविंग लाइसेंस के लिए इंटरव्यू देना है, जरा ट्रैफिक सिग्नल पहचानने का अभ्यास कर लो ', और उन्होंने ट्रैफिक सिग्नल की एक बुकलेट थमा दी। 
इसके बाद मैंने इंटरव्यू और टेस्ट दिया और इसतरह मुझे ड्राइविंग लाइसेंस मिल गया। मैं सरकारी रिकॉर्ड में भी ड्राइवर बन गया। तभी से मैं टैक्सी चला रहा हूँ। खा - पीकर भी ३० हजार रुपये बचा लेता हूँ। घर पर अभी मैंने काफी काम करवाया है। पक्का घर बनवाया, बहन की धूम - धाम से शादी की।"
"आपके बाल - बच्चे?" पत्नी ने पूछा था,
उसने कहा " इस संघर्ष में बाल तो बहुत कम बचे हैं। हाँ घर पर मेरा एक वर्ष का बच्चा है, उसका पहला जन्मदिन मनाने इसी महीने जाऊंगा। खूब तैयारी की है। बहुत दिनों के बाद थोड़ी खुशी मिली है, क्यों न उसे समेट कर रखा जाय। " उसके चेहरे पर अब थोड़ी मुस्कान तैर रही थी," अब सोच लिया है, घर पर ही एक बस खरीदूंगा और लम्बे रूट पर चलाऊंगा।"
कार मोड़ते हुए स्टेशन के पार्किंग में गाड़ी रोक दी," लीजिये आंटी आपका स्टेशन आ गया। देखिये वक्त से ४५ मिनट पहले पहुंच गए और रस्ते भी बातचीत करते हुए कट गए।"
"कितना हुआ, भई?"  मेरे पूछने पर उसने कहा, "जी, 967 रुपये"
मैंने 500 रुपये के दो नोट उसे थमाए। उसने सामान डिक्की से निकाला और 10 – 10 रुपये के तीन नोट वापस किए। इसके साथ ही तीन रुपये के सिक्के भी लौटाए। अक्सर टैक्सीवाले छुट्टे नहीं है, सर जी, कहकर तीन रुपये रख लेने को अपना अधिकार समझते हैं। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और पूरे छुट्टे सहित बाकी पैसे वापस कर दिए। 
मेरे मन में कई  विचार उठ रहे थे , इस  नौजवान की   कहानी सुनने के बाद।  पूरे परिवार के घोंसले को तिनका - तिनका जोड़कर , समेटकर पूरी जिंदगी परिवार का ईमानदार मुखिया हौसले के साथ खड़ा करता है ताकि उसके परिवार को लोग समाज, गावों और इलाके में मिशाल के तौर पर जान सकें।  लेकिन जब खुद उसे परिवार के सदस्यों के सहयोग की जरूरत होती है, तो जो सदस्य उसके सहयोग से आगे बढे हैं वे एक कतरा मदद देने से क्यों क़तरा जाते हैं। संयुक्त परिवार जो मनुष्य में सेवा , सहिष्णुता , त्याग , प्रेम और मर्यादा के पाठ सीखने की पहली पाठशाला हुआ करता था, आज टूटने और छिन्न - भिन्न होने की स्थिति में पहुँच रहा है। यह हर एक संयुक्त परिवार के टूटने की कहानी कहता है और कहता है मनुष्य के संस्कारों में गिरावट की कहानी , उसके अंदर बढ़ती संवेदनहीनता की कहानी।
    इस सबके बावजूद कुछ तो दम था इस नौजवान टैक्सीवाले में जिसने बचपन से संघर्ष को अपना हमसफ़र बनाया।  अपने चाचाओं के विश्वासघात के कारण पिता जी की मृत्यु हो जाने पर भी  परिवार की गाड़ी को अकेले अपने बलबूते पर दलदल से निकालकर पक्की सड़क पर दौड़ने के लिए  खड़ा कर दिया है।  ऐसे जज्बे को मेरा सल्यूट है , सलाम है !!!!
 वाह! नौजवान!! वाह! नौजवान!!
पूरी कहानी आप इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं.
http://yourstoryclub.com/short-stories-social-moral/hindi-social-story-spirit-of-struggle/

---- ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र, जमशेदपुर.
मेतल्लुर्गी*(धातुकीमें इंजीनियरिंग , पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन मार्केटिंग मैनेजमेंट। टाटा स्टील में 39 yrs कार्यरत। पत्र पत्रिकाओं में टेक्निकल और साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन। सम्प्रति जनवरी से 'रूबरू दुनिया ' से जुड़े है। जनवरी 2014 से सेवानिवृति के बाद साहित्यिक लेखन कार्य में निरंतर संलग्न।   

अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

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