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Wednesday, June 21, 2017

योग से जुड़ें (कविता)

#poetry#motivational
#BnmRachnaWorld
योग से जुड़ें
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योग से जुड़ें, योग से जोड़ें।
मन को अमन की ओर मोड़ें।

सकारात्मक चिन्तन हो
गुणात्मक परिवर्तन हो।

मन के कुविचारों को छोड़ें।
योग से जुड़ें, योग से जोड़ें।

साँसों को अहसासों में घोलें।
चिंतन के नवीन पट खोलें।

अन्धविश्वासों  के क्रम को तोड़ें।
योग से जुड़े, योग से जोड़ें।

स्नेह से जीवन को सिंचित करें।
प्रेम के पथ को आलोकित करें।

हिंसा के पथ को शांति की ओर मोड़ें।
योग से जुड़े, योग से जोड़ें।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  21-06-2017
  जमशेदपुर।

Thursday, June 15, 2017

कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ (कविता)

#poetry #motivational
#BnmRachnaWorld

 कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।
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इसी कलम से कभी श्रृंगार सजाता हूँ।
इसी कलम से कभी मल्हार गाता हूँ।।
इसी कलम से शब्दों के सुर ताल सुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बन रहा हूँ।

इसी कलम से शब्दों को अंगार बनाता हूँ।
इसी कलम से रणचंडी का त्यौहार मनाता हूँ।
इसी कलम से शब्दों के शैवाल चुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।

इसी कलम से जमा करता हूँ मसान  की राख,
इसी कलम से चुनता  हूँ हड्डियों की शाख।
इसी कलम से जीवन का वैराग्य गुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।।

इसी कलम से खोजता हूँ ठहरी एक छाँव,
इसी कलम से जाता हूँ, अपना छूट गया गांव।
इसी कलम से महुआ का बवाल
सुन रहा हूँ।
इसी कलम से शब्दों के जाल बुन रहा हूँ।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
   जमशेदपुर।


नोट: मेरी हाल में लिखी यह कविता ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-80,  आयोजन अवधि 9-10 जून 2017  में स्थान पाई है। Open Books Online प्रसिद्ध साहित्य सेवियों और अनुरागियों की एक वेबसाइट है, जो हर महीने कविता, छंद और लघुकथाओं का आयोजन करता है। इसबार "कलम/लेखनी" शब्द को केंद्रीय भाव बनाकर कविता लिखनी थी। मैंने "कलम" को ध्यान में रखकर यह कविता लिखी है ।



Monday, May 29, 2017

वो संवरा करें (कविता)

#nazm#poems_bnm

वो संवरा करें
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कहीं नहीं जाया जाए अपना उदास चेहरा लिए
छाँव ऐसी खोजें, जहां न हो कोई पहरा किये।

पुकार लेना, जब डूबती हो नाव किनारे से दूर
कोई साहिल तो मिलेगा जब जब बिखरा किये।

वो डोलती, झूमती आती है, यादों का बादल बनकर
उतरती हैं,  गहरे और गहरे, कहीं बसेरा किये ।

वो पर्वत - पर्वत नाचती है, चाँदनी  बनकर,
मैं निहारता ही रहूं,  वो  बस संवरा करें ।


वो नहीं, तो मैं नहीं, मैं नहीं तो वो कहीं भी नहीं,
ये कैसे अनजाने रास्ते है, जहाँ पहुंचे यूँ चलते हुए।

मैं शब्द ब्रह्म का साधक, वो मेरी सतत साधना
कविता - धारा बन बहती हैं, छल छल करते हुए।

-ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
-- जमशेदपुर

Monday, May 15, 2017

छाँव के सुखभोग कहाँ? (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonstruggle



यह कविता मैंने अपने संघर्ष के दिनों में शायद २००१ से २००८ के बीच लिखी थी | उन दिनों मैं आर्थिक और मानसिक दृष्टि से काफी ब्यथित था |
जब इस फेज़ को मैं पार गया तब मैंने कविता लिखी थी, "छाँव के सुख भोग पथिक" जो इसी ब्लॉग में, अन्य वेबसाइट पर और मेरी  लिखी कहानी  संग्रह "छाँव का सुख" में भी प्रकाशित हो चुकी है |
#BnmRachnaWorld
#poems#motivational


छाँव के सुखभोग कहाँ


धूप से छाले सहे पर,
छाँव के सुखभोग कहाँ?

कल्पनाओं के क्षितिज पर,
जो सपन मैं बुन सका था।
नयन निलय के नर्तन में
हरीतिमा को चुन सका था।

वे सपन सब खो गए,
प्रकृति के भीषण प्रलय में।
विमूढ़ सा देखा किया,
विस्फोटों के वह्नि - वलय मे।

पथ पर सूर्य - किरणें,
तपिश - सी दे रही,
पाँव के छालों को
आराम का संयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

वेदना के शीर्ष पर
सब भाव पिघलते जा रहे।
आशाओं की आस में,
सब अर्थ धुलते जा रहे।

पोर - पोर पीर से
भर उठा है, क्या कहूं?
दर्द के द्वार पर,
उदगार रीते जा रहे।

छीजती इस जिंदगी को,
हँस - हँस कर जी सकूँ,
कोई कोई कर सके तो करे,
मेरे बस में ये प्रयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

दलदल भरी कछार में,
दरार होती नहीं।
बह गए वृक्षों पर,
कभी बहार होती नहीं।

चिड़ियों की चहचहाहट
अब यादों  में बसती है।
जड़ से जो उखड़ गए,
उनमें संवार होती नहीं।

जो खो चुके सबकुछ
इस सफर में उस सफर में।
उन्हें और कुछ भी
खोने का वियोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

(वह्नि-आग)
©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
जमशेदपुर,
दिनांक: 10-05-2017

नोट: मेरी हाल में लिखी यह कविता ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-79,  आयोजन अवधि 12-13 मई  2017 में स्थान पाई है। Open Books Online प्रसिद्ध साहित्य सेवियों और अनुरागियों की एक वेबसाइट है, जो हर महीने कविता, छंद और लघुकथाओं का आयोजन करता है। इसबार। "छाँव/छाया" शब्द को केंद्रीय भाव बनाकर कविता लिखनी थी। मैंने "छाँव"  को ध्यान में रखकर  कविता लिखी है ।






Friday, April 28, 2017

जिंदगी जीने का सलीका (कविता)


#gazal#motivational
#BnmRachnaWorld

जिंदगी जीने का सलीका


जिसे खुश रहने का तरीका आ जाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।

तूफान में थपेड़ों से नाव डगमगायेगी जरुर,
मौत भी करीब आकर छू जाएगी जरूर।

ऐसे में किश्ती को जो किनारे लगा पाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।

कैसे कैसे तूफान आयेंगें तेरे हिस्से में।
तू बदल देना उन्हें जांबाजी के किस्से में।

देखें गुर्वत कब तक तेरे साथ टिक पाता है।
जिसे खुश रहने का तरीका आ जाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।

किसी के सीने में अगर अंकुआते है सपन कई,
कोई जीता है अगर इसी जनम में जनम कई।

उसे ही उड़ान भरने का मौका आ जाता है।
जिसे खुश रहने का तरीका आ जाता है।
उसे जिंदगी जीने का सलीका आ जाता है।


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र, जमशेदपुर।
वर्तमान निवास- सेक्टर 4, वैशाली,
दिल्ली, एन सी आर।

Saturday, April 15, 2017

वंचितों की दुनिया (कविता)


#gazal#social
#BnmRachnaWorld






वंचितों की दुनिया


वंचितों की दुनिया में जिंदगी सहमी हुई है।
नीम अंधेरों में जैसे कोई रोशनी ठहरी हुई है।

गले में तूफ़ान भर लो,चीखें सुनाने के लिए,
शोर में दब जाती है, गूंज भी गूंगी हुई है।

मगरमच्छ हैं पड़े हुए उस नदी में हर तरफ,
जो खुशियों के समन्दर तक पसरी हुई है।

आह उठती है यहाँ,और पत्थरों से बतियाती है।
लहरों से टकराते हुए,ये नाव जर्जर सी हुई है।

रेगिस्तां की आंधियों में इक दिया टिमटिमाता है,
लौ थी थरथराती हुई, अब जाकर स्थिर हुयी है।

खुशबुएँ सिमट कर, किसी कोने में नज़रबंद थीं,
उड़ेंगीं अब, हवाओ के पंख में हिम्मत भरी हुई है।

उम्मीदों के फ़लक पर आ गयी है जिंदगी,
सपनों के जहाँ की नींद भी सुनहरी हुयी है।

वंचितों की दुनिया भी अब है उजालों से भरी,
नीम अंधेरों में भी अब रोशनी पसरी हुई है।


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
जमशेदपुर।


नोट: मेरी हाल में लिखी यह कविता ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-78,  आयोजन अवधि  14-15 अप्रैल   2017 में स्थान पाई है। Open Books Online प्रसिद्ध साहित्य सेवियों और अनुरागियों की एक वेबसाइट है, जो हर महीने कविता, छंद और लघुकथाओं का आयोजन करता है। इसबार "वंचित" शब्द को केंद्रीय भाव बनाकर कविता लिखनी थी। मैंने उसी को ध्यान में रखकर  कविता लिखी है ।

Monday, March 13, 2017

फाल्गुनी दोहे (कविता)

 #poems#love
#BnmRachnaWorld

फागुनी दोहे


कंचन जैसी देह तुम्हारी, होंठ तेरे रतनार।
नैन तुम्हारे तीर सरीखे, जैसे चुभे कटार।।

अंजुरी भरी यह प्रीत तुम, रख लो अपने पास।
गर ना आये पाती तो, मत होना उदास।।

होली में आऊंगा मैं, लेकर फाल्गुनी रंग।
सराबोर  मैं कर दूंगा, सारे अंग - अंग।।

लाल चुनरी भींगेगी, जब कसमस करते अंग।
मैं भर दूंगा उष्णता गर्म सांस के संग।।

फूल जैसी देह लचके ज्यों बिरवा के पात।
अमराई में चहकेगा जैसे नया प्रभात।।

रास रंग से तृप्त सुंदरी, यौवन भार अपार।
रात उतरती देह नाव पर, जाती है उस पार।

--©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
     तिथि: 13-03-2017
     चैत्र प्रतिपदा, होली का दिन!

Sunday, March 5, 2017

अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें (कविता)

#poems#love
#BnmRachnaWorld


अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें

उत्कंठित मनसे, उद्वेलित तन से,
उर्जा के प्रबलतम आवेग के क्षण से,
बांध को सुदृढ कर, पसरती जलराशि के
अपार विस्तार पर पतवार के नर्तन से।
यौवन से जीवन का अविचारित यात्री बन,
अंतर में टूटते तटबंध  को टटोंलें।
अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

यहाँ प्रेम ज्वर नहीं जीवन का पर्याय है।
खोजता है याचक बन बिखरने का उपाय है।
समर्पण में स्नेह का विस्तार अगर होता है, 
क्या प्रेम बरसाकर तन होता निरुपाय है?
संचयन में नहीं, अभिसिंचन में अमृत कलश
उड़ेलकर देखे, विस्तार को समों लें।
अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

देह, तरंग - सी विचरती अथाह में।
त्वचा और रोम - रोम सूंघते है प्रणय - जल।
लहरे  कहीं उठती है और कहीं गिरती हैं।
थाह - सी लेती हुई,  खोजती हैं अतल  तल।
आँखों क़ी तराई में डूबने दो आँखों को,
सांसों में सांसों को मिलाकर भींगो लें।
अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो  लें।

चाँद भी देता है लहरों को नेह निमंत्रण,
चांदनी लुटाती है सम्पूर्ण अपना यौवन।
है डूबकर ही जाना, जाना है डूबकर ही,
अस्तित्व को मिटाकर होता है पूर्ण जीवन।
दिल जहाँ मिलता है शून्य से साकार में
अनन्त राग के उद्रेक को, धडकनों में घोलें।

अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

नींद नहीं है आती, गिन गिन कर तारों को
करवटें बदलकर सोयें, फैला धरा का आँचल।
मलयानिल भी हो चला शांत, बहो धीरे - धीरे,
प्रकृति नटी के पैरों की शिथिल हो चली पायल।
निमिष अरण्य के नयन - निलय - निधि में
पलकों को कर बंद, रस - कलश टटोलें।
अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

यौवन का भार वहन करता है नारि - तन,
पुरुष तो खेल समझ खेलता ही जाता है।
क्यों नारी के हिस्से में है सिर्फ समर्पण ही?
प्रकृति का ये चक्र कभी समझ नहीं आता है।
इन सवालों के घेरे से मुक्त रहें हम दोनों,
आलिंगन करें, छा जाएँ, ओष्ठ - रस निचोड़ें।।
अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
--तिथि: 05-03-2017

रक्त उबलता ही जाये (कविता)

#poems#patriotic
#BnmRachnaWorld

रक्त उबलता ही जाये


बिंधे देह, बिखरा हो रक्त,
लाशें बिछीं हो क्षत विक्षत।
लुटे श्रृंगार, बिखरी चूड़ियां
कैसे करें भावों को ब्यक्त!

बॉर्डर की हरीतिमा हुयी लाल,
सोते हुओं को कर गया हलाल।
 रक्त बह रहा रावी में फिर से
आया है एक नया भूचाल।

ललकारा है, रावी तट से,
सतलज, झेलम जम्मू तवी से
गंगा, यमुना,  ब्रह्मपुत्र को
दो आवाज़ सोन विप्लवी को।

जाओ, जाओ, उन्हें जगाओ
आज़ाद, दत्त, जतिन, सुभाष को
अशफाक, भगत , बिस्मिल, हमीद
राणा, शिवा, मंगल की सांस को।

कैसे सोये और मनाएं,
होली, विजया और दिवाली।
सीमा पर सो गया वीर,
लेकर साथ बंदूकों के नाली।

 प्रहरी तेरे साथ मुल्क है
आगे बढ़ो, प्रहार करो।
जाग गया जब शेर वहां,
तब अंदर घुसकर दहाड़ करो।

सीमाएं अब बदलेंगी,
बदलेंगी खींची कृत्रिम रेखाएं
सीमा के पार जो है गुलाम,
आज़ाद उन्हें हम कर पाएं।

आओ हों संकल्पित हम सब
 आग न ठंढी होने पाए,
भारत हो अक्षुण्ण, अखंड
रक्त उबलता ही जाये।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 29-09-2016.

Thursday, March 2, 2017

रात भर निहारता रहा (कविता)

#poems#love
#BnmRachnaWorld
आज 04-11-2017 दिन शनिवार को कार्तिक पूर्णिमा है। यह तस्वीर मैनें अपने मानगो,  जमशेदपुर के अपने छत के टेरेस से मोबायील के कैमरे से लिया था।

रात भर निहारता रहा

तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे  रात भर निहारता रहा।

तू अनमनी सी खड़ी मोड़ पर
नेत्र -जल भर लिए, नेह तेरे लिए।
आस में सांस को उलझाते हुए,
प्राण को अंतरतम से पुकारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर, निहारता रहा।

कुछ तो ऐसा किया मैंने अनजाने में
जिसकी सजा में तेरी बेरुखी मिली।
मुझे आता नहीं, कैसे मनाऊं तुझे,
 अपलक नीर नैनों में  संवारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

काश! आते मेरी गोद में चाँद-बन
लिपट जाती तुझसे मैं चाँदनी बन।
तू  आये  क्रय मूल्य में आंकनेे मुझे
जैसे सौदागर कोई विचारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

मेरी खता माफ़ कर दो  प्रिय
प्रेम जल से  तुझे मैं सिंचित करूँ।
सोते - सोते, जागते - जागते,
सुस्वप्नों  को मन में पसारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

अन्धकार से खींच कर बांह तेरी
लिख दूँ एक पाती तेरे नाम की।
ओठ रख दूँ तेरे ओठ के छोर पर
अपने नैनों में नींद को विसारता रहा।
तू ताकती ही रही चाँद को,
मैं तुझे रात भर निहारता रहा।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर, 03-03-2017
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Thursday, January 12, 2017

युवा सोच (लेख)

#articles#social 
#BnmRachnaWorld 
नोटः मेरा यह लेख भोपाल से प्रकाशित "रुबरु दुनिया" में स्थान पाई है।
युवा सोच
युवा कौन है ?

 जिसकी उम्र २० से ३० वर्ष के बीच है या जो कॉलेज से अभी - अभी निकला है या इंजीनियरिंग , मेडिकल , या अन्य कोई प्रोफेशनल कोर्स खत्म करके अभी - अभी निकला है ? क्या वे सब युवा हैं?
उनमें से वही  युवा  है जिसकी  सोच युवा है।  अब इसपर विचार करें कि युवा सोच क़्या है ?
बुढ़ापा अतीत का स्मरण कर जीता है , यूवा अतीत से सीख लेकर वर्तमान मैं जीता हुआ या कहें कि वर्तमान को  जीतता  हुआ भविष्य के सपने बुनता है।
 वर्तमान को जीना और जीतने  में फर्क है। जब युवा अकॅडेमिक्स से बाहर  निकालता है तो अपने को जीवन के पथरीले एवं सख़्त धरातल पर खड़ा पाता  है।  बिनोबा जी ने इसे शैक्षणिक जगत से वास्तविक जगत की हनुमान कूद  कहा  है।  इस हनुमान कूद में अगर ठोस , पथरीले, चट्टानी धरती   पर खड़ा होने और उसके शॉक को अब्सोर्ब करने की क्षमता नहीं हुयी तो वह अपने पाँवों के साथ - साथ जीवन को भी लहू - लुहान कर जाता है। फिर जीवन में एक तरह के नैराश्य का  भाव  उसे पलायनवादी बना देता  है।
क्या किया जाय  जो ऍसी स्थिति में जीवन को पहुँचने  हीं दे।  इसके लिए  शिक्षण ग्रहण करणे के समय ही आगे आनेवाले जीवन  को जीने के नजरिये का विकाश करना  जरूऱी है। क्या हमारा परिवारिक और सामाजिक  माहौल एवं शिक्षा - पद्धति इस तरह के नजरिये के विकास में सही योगदान करते है?
शिक्षा  प्रदान करने वालों संस्थानो , आस - पास में फैले समाज और मनुष्य जहाँ बचपन से लेकर युवा होने तक जिस परिवार से जुड़ा होता  है उसका माहौल उसके जीवन को भावनात्मक और चारित्रिक दृढ़ता प्रदान करने में सहायक होता है। 
 आजकल की शिक्षण - पद्धति बचपन से लेकर उच्च - शिक्षा प्राप्त करने तक विविध जानकारियों की वर्षा करती  रहती है।  उसमें से कौन  सी जानकारियां ब्यक्तित्व की पूर्णता की ओर ले जाती  है , इसका नीर - क्षीर - पृथक्कीकरण विवेक के विकास के लिये मौलिक शिक्षा उम्र के वयस्कोन्मुख होने के पड़ाव तक अवश्य प्राप्त हो जानी चाहिए। आजकल वयस्क होने से पहले ही बच्चे के पास इतनी जानकारियों के स्त्रोत उपलब्ध  होते है कि उसे पता नहीं होता कि कौन सी जानकारियां हमारे जीवन और चरित्र के विकास में सहायक हो सकती है।
शक्तियों के पुंज को संघनित करने की वजाय उसके  क्षरण के अधिकाधिक साधन उपलब्ध हैं।  किशोर - मन उनके प्रति आकर्षित  हुये बिना नहीं रहता।  अभी के समय में  वेबजाल पर ७५ % से अधिक सेक्स सम्बंधी जानकारियां होती हैं जो किशोर - मन पर विपरीत प्रभाव ही डालती हैं। ऐसी जानकारियों की उपलब्धता को रोक पाना तो बिल्कुल ही मुश्किल है। 
 
क्या किया जा सकता है?
हमारे आसपास या  अतीत में जो उच्च विकसित ब्यक्तित्व, महापुरुष या विषिश्ट कार्य सम्पन्न करने वाले ब्यक्तियों के जीवन वृत्तान्त को बाइ  डिफ़ॉल्ट वेब जाल पर उप्लब्ध कर दिया जाय।  अभी जैसे साइट खुलते ही सनसनी पैदा करनेवाले समाचर उपलब्ध रहते हैं वैसे ही क्या आजकल के रोल मॉडल बनने लायक महापुरषो के ब्यक्तित्व और कर्तृत्व की जानकारी बाई डिफ़ॉल्ट उपलब्ध नहीं कराई जा सख़्ती ? वेबजाल के द्वारा ऐसी जानकारी निश्चित ही किशोर - किशोरियों को आगे के जीवन की तैयारी में अधिक सहयक होंगे।  इससे जो युवा सोच पैदा होगी वह विधेयात्मक चिंतनपरक होगी और उसके प्रभाव भी दूरगामी सुपरिणाम  देने वाला होगा।
  जब हम युवा वर्ग कहते हैं तो सिर्फ़ पढ़े - लिखे  उच्च शिक्षा प्राप्त युवा ही नहीं अर्धशिक्षित और अल्पशिक्षित युवाओँ की ओर भी ध्यान जाता है।  शिक्षा का अधिकार सबो को है।  किसी भी देश या कौम की उन्नति के मानक वहां  के  जन समुदाय में   शिक्षा के प्रसार  पर निर्भर करता है।  मुठी भर लोग अगर ऊंची शिक्षा , ऊंची - ऊंची डिग्रियां प्राप्त कर लें तो पूरा देश  शिक्षित नही कहलाता। देश का जन - मानस अशिक्षा के घोर अंधकार में पड़ा रहे और शिक्षित एवं  सम्पन्न लोगो का एक छोटा सा  वर्ग उनपर शाशन करता रहे , ऎसा नहीं चल सकता।  हाशिये पर रहने वाले लोग जिन्हे मैनेजमेंट गुरु सी के प्रह्लाद ने Bottom of the pyramid (BOP)  नाम दिए है , अगर शिक्षा और साधन से महरुम  रहेँगे तो उन्का असंतोष एक दिन अवश्य फूटेगा और अराजकता की स्थिति पैदा करेगा।  मैंने अपनी एक कविता में शिक्षा के अप्रसार और साधानों के असंतुलित वितरण से पैदा हुयी स्थिति के विरोधभास को चित्रित करते हुये लिखा है ..
चूल्हे जलते नहीं यहाँ किसी भी घर में,
फिर भी बस्ती से उठता हुआ धुआं तो देख

महलों के कंगूरे गगन को चूमते हैं, मगर
मिलता नहीं यहाँ किसी को आशियाँ तो देख

ये हरियाली जो इस ओर  दीखती है दूर तलक,
नजरें उठा, उस ओर का फैलता रेगिस्तां तो देख

फूटपाथ पर सोये  हैं जो लोग सट - सट  कर,
उनके ऊपर का खुला   आशमां  तो देख

जला चुके थे तुम जिन्हें चुन - चुन कर,
उस राख से उठती हुई चिंगारियाँ तो देख

अब लाशें भी उठकर खड़ी हो गयी हैं,
हवा में उनकी तनी हुयी मुठियाँ तो देख

ढूह में बदल जायेंगें महल दर - बदर ,
खँडहर कहेंगे इन सबों की दास्ताँ तो देख

वे जो सोते हैं भूख से बिलबिलाकर ,
तवारीख के पंख  पर लिखेंगे क्रांतियां तो देख

आज का युवा क्या इस स्थिति के कायम रहने के कारण उत्पन्न परिस्थिति की भयावहता के परिणामों के प्रति संवेदनशील है? शायद युवा आक्रोश ही है जो विद्रोही बनकर हथियार उठाकर या हथीयार से हल ढूढने वाले लोगो की अगुआई में उसका उत्तर ढूढने निकल पड़ता है . मगर सच  तो यह है की यह उत्तर ढ़ूंढ़ना नही उत्तर निकालने  से भागना है।  इसका मतलब है कि यह अशिक्षाअल्पशिक्षा या गलत शीक्षा  का ही परिणाम  जो युवको को अतिवादी उग्रवादी बनने की ओर ले जा रहा है।  इस निराशा के वातावरण से कैसे निकला या निकाला  जाय : परिथितियों को दोष देकर या परिस्थितियों में सुधार का प्रयास कर। 
    यह एक कड़वा सच है कि जिन क्षेत्रों में विकास की स्रोतस्विनी धार पहुंचते - पहुंचते सूख गयी है वहीँ  अतिवादी चिन्तन ने अपनी बाहें फैलाई है।   एक सर्वेक्षण से पता चला है ---भारत के मानचित्र को कानपूर से सीधी दक्षिण की तरफ एक सरल रेखा  से विभाजित किया जाय।  उस रेखा के दायें यानि पूर्व में और पूर्व - उत्तर  के क्षेत्र  में विकास कम हुआ है।  यानि कि इनक्षेत्रों में विकास का पहल नहीं हुआ या विकास की धार पहुंचते - पहुंचते सूख गयी।  उन्ही क्षेत्रों  में  अतिवाद  या उग्रवाद ने अपना पैर पसारा है।  छत्तीसगड़  का बस्तर का इलाका , उससे सटा आंध्र प्रदेश या   अभी का नया नाम सीमांध्रा, उड़ीसा का कलाहान्डी , रायगडा , सूना बेडा का क्षेत्र प्रबल रूप में इन गतिविधियों का केंद्र रहा  है।  यहाँ सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा विशेष पहल  की जरूरत  है।  क्या  किया  जाय ? एकतरफ युवा वर्ग केसामने ग्रामौर और विज्ञापनों के द्वारा मार्केटिंग करके ब्यपारियों और कंपनियों द्वारा लुभाये जाने का निरंतर प्रयास चल रहा है , तो दूसरी तरफ समाज और देश की ओर का कर्तब्य कठोर जीवनके तरफ ले जाने का इशारा करता है।  युवा निश्चित ही पहले जीवन के तरफ आसानी से आकर्षित होते हैं।  देश  और समाज की आवश्यकता कहीं पीछे बैकसीट पर है।  निजी जीवन से जुड़ा स्वार्थ सर्वोपरी हो जाता है। 
यह एकसच   है कि जीवन - यापन के लिए कोई ब्यवसाय ,नौकरी अपनाना जरूरी है।  उसके लिए आवश्यक क्षमता अवस्य विकसित करना चाहिए।  खूब अच्छे अविष्कारों और अन्वेषणों के लिए अभिक्रम विकसित करें।  किन्तु अपने पेटेंट को बेचकर ऐसे असंतुलन को पैदा करने में सहायक बनें जिससे आदमी आदमी का इतना शोषण करे की इन्शानियत ही विलुप्त होने लगे।  जहाँ ऐसा हो रहा है उसका विरोध करे।  यही युवा सोच है।
    हम मनुष्य बनानेवाले धर्म , मनुष्य बनानेवाले सिद्धांत चाहते हैं।  विवेकानंद ने कहा था ,
" आज हमारे देश को जिस चीज की आवश्यकता है, वह है लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्नायु - दुर्दमनीय प्रचंड इक्षाशक्ति जो सृष्टि के गुप्त तथ्यों और रहस्यों को भेद सके और जिस उपाय से भी हो अपने उद्देश्य की पूर्ति में समर्थ हों , फिर चाहे उसके लिए समुद्र तल में क्यों जाना पड़े - साक्षात मृत्यु का सामना क्यों करना पड़े।  मनुष्य बनानेवाली शिक्षा से ही ऐसा हो सकता है।"  
   मनुष्य बनाने वाली इच्छा शक्ति  के लिए एकाग्रता की शक्ति के द्वारा विचारों को पूंजीभूत  कर   स्पष्ट दिशा में लगाना जरूरी है।  इससे जो ज्ञान का अभ्युदय होता है उससे गहनतम रहस्यों तक पहुंचा जा सकता है।  एकाग्रता के लिए ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है।  यह काम शक्ति को आध्यात्मिक शक्ति में परिणत करके ही सम्भव है।  यह ह्य्पोक्रैसी नहीं है, यह मनीषियों के इन्टुशन  द्वारा सिद्ध  किया जा चुका है। आँखे खुली रखे , दृष्टी साफ़ हो तभी अध्यात्म प्रकट हो सकता है ---
एक छोटी सी कहानी है:
 एक बार एक स्वामी जी  अपने कुछ नए शिष्यों को ध्यान के बारे में बताते हुए कह रहे थे , " आप पद्मशन में बैठ जायँ , गर्दन सीधी हो , मेरुदण्ड सीधा हो , आप अपनी दृष्टि नासाग्रे पर टीकाएँ यानि नाक के अग्र भाग को देखें "
इसपर एक शिष्य ने कौतूहलवश पूछा ," स्वामी जी नासाग्र को आँखें बंद कर देखे या खोलकर ?"
इसपर सारे शिष्य हंस पड़े।  तो हमारी दृष्टि भी कहीं ऑंखें बंदकर या खोलकर देखने के संकल्प - विकल्प में तो नहीं झूल रही हैं।  इसपर विचार करना होगा।  तो मेरे युवा मित्रों युवा सोच आध्यात्म चिंतन के बिना उद्भूत हो ही नहीं सकता।
    मैं यहाँ जे पी (जयप्रकाश नारायण ) की पुस्तक "मेरी विचार यात्रा " से कुछ पंकियों को उद्धृत करना चाहता हूँ :
"इस देश का अध्यात्म बूढ़ों की वस्तु नहींजवानों की वस्तु रही है। जब हृषिकेश ने जीवन के कुरुक्षेत्र में अपूर्व अध्यात्म का पाञ्चजन्य फूंका था , तब वह वृद्ध नहीं , युवा थे और वह थे सारथी भारत के उत्कृष्ट तरुणाई के रथ के।  जब अपनी प्रिया के गोद में नवजात राहुल को सोया हुआ छोड़कर सिद्धार्थ अपनी अद्वितीय सांस्कृतिक क्रांति के पथ पर चल पड़े थे , तो वह वृद्ध नहीं , युवा थे।   अद्वैत के अनन्यतम शोधक शंकराचार्य ने जब अपनी दिग्विजय यात्रा की थी , तब वह वृद्ध नहीं , युवा थे।  विवेकानंद ने शिकागो के रंगमंच पर जब वेदान्त के सार्वभौम धर्म का उद्घोष किया था , तब वे वृद्ध नहीं , युवा थे।  गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दावानल में कूदकर जब अध्यात्म का आग्नेय प्रयोग किया था , तब वे वृद्ध नहीं , युवा थे।  अध्यात्म बुढ़ापे की बुढ़भश नहीं है, तरुणाई की उत्तुङ्गतम् उड़ान है।"
       इसलिए  यह देश  जिस अभिनव सांस्कृतिक क्रांति के द्वार   पर खड़ा है उसके सैनिक और सेनापति तरुण ही हो सकते है।  इसलिए मेरे तरुण मित्रों , अपने में विश्वास जगाओ , उठो और सोच को बदलो।  आसपास में विधेयात्मक चिंतन का प्रसार करो, स्थितियों से समझौता  नहीं , उन्हें बदलने का संकल्प लो।  अपने अंदर की आग को बुझने मत दो। 
दिनकर की पक्तियां थोड़े परिवर्तन के साथ :
  तूने दिया जगत को जीवन , जग तुम्हें क्या देगा ,
अपनी आग जगाने को नाम तुम्हारा लेगा।
     उठो और इस घोर अन्धकार में प्रकाश का पुंज बनो।  चारो तरफ रौशनी - ही - रौशनी हो। स्वार्थ के ऊपर उठकर विभेद की नीति का भेदन करो , नयी इबारत लिखो , जमाना तुझे याद करेगा . यही  युवा  सोच  है।

---ब्रजेंद्र नाथ मिश्र,
   जमशेदपुर

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