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कहानी "अधिकारी की आत्मीयता" का अगला भाग
कुटिल प्रवृत्ति के कर्मचारीगण
जयंत जी ने सदर अस्पताल में तीलू, जो उनके ऑफिस में सफाई का काम करती थी, के पति के इलाज के लिए सारे इंतजाम को स्थिर किया था। (आप मेरी लिखी पूर्व प्रकाशित कहानी ”एक अधिकारी की संवेदनशीलता” पढ़े.)
उन्होंने घड़ी देखी, उसमें चार बज रहे थे। उन्होंने दिन का भोजन भी नहीं लिया था। ऑफिस के लॉन में उन्हें डी एम की गाड़ी दिखी थी। उसे देखते ही जयंत जी मन - ही - मन सोच रहे थे, “इन्हें भी इंस्पेक्शन के लिए आज ही आना था । मैंने आज ही ज्वाइन किया है। इसे उन्होंने नियति माना और अच्छे कार्य करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मन ही मन दुहाराया।”
अन्य सरकारी ऑफिसों की तरह कड़क और थोड़ा ईमानदार अफसर से परेशान रहने वाले कर्मचारी यहाँ भी थे। वे अपने कुटिल और कुत्सित मस्तिष्क में जयंत जी की अनुपस्थिति में डी एम साहब के आने पर व्यंग्यपूर्ण मोहक मुस्कान से अपने मुखमण्डल को दीपित कर रहे थे । उनके मन में लड्डू इसलिए फूट रहे थे कि जयंत सर को आज डी एम साहब डांट पिलायेंगे। यही बात उनके कलेजे में असीम ठंढक देगी । ‘बड़े आए थे ईमानदारी का चोला पहनें। आते ही एक घंटा भी ऑफिस में नहीं रहे । बिना किसी को बताए, पता नहीं कहाँ चले गए। बाद में पता चला कि तीलू (सफाई कर्मचारी) नहीं आ रही है, उसकी खबर लेने स्वयं चल दिए। अगर इतना ही अतिआवश्यक था तो किसी स्टाफ को भिजवा कर उसका हाल - चाल जान लेते। ऑफिस को किसके भरोसे छोड़ कर निकल दिए । अब डी एम साहब, देखिए उनकी कैसे खबर लेते हैं । बड़ा मजा आएगा । डी एम साहब की डांट - पर - डांट पड़ेगी। सिर झुकाए उन्हें सुनना होगा। उनका उतरा हुआ चेहरा देखना बहुत सुकून और शांति प्रदान करने वाला होगा । ऑफिस को एकदम मिलिट्री का कैंटोनमेंट बना दिए है । समय से ऑफिस आना ही होगा । नहीं तो अनुपस्थिति का मार्क लग जायेगा। उस दिन बेचारा खेमू दो घंटे देर से आया। उसने कहा भी कि इस कारण से देर हो गई । लेकिन यह कुछ नहीं माने । बोले तुम्हारा हर दिन कोई - न - कोई बहाना रहता है। उसको घर वापस भेज दिया । यह सब क्या है? यह फ़ौज वाला अनुशासन यहाँ मत लागू कीजिए । ये सरकारी ऑफिस है तो उसे सरकारी ही रहने दीजिए। आपको काम हमसे ही लेना है। तो क्या डंडे के बल से काम लीजिएगा। हम हैं तो ऑफिस चल रहा है। इसलिए हमें ऑफिस की - रानी (किरानी यानी क्लर्क ) कहा जाता है। बिना रानी के राजा महत्वहीन है।’
डी एम साहब ने उनसे हँस कर कहा, “मुझे बड़ा बाबू से मालूम हुआ कि आप किसी कार्य के लिए ऑफिस ज्वाइन करते ही बाहर निकल गए। आपने एक लोअर ग्रेड के स्टाफ की चिंता कर एक सच्चे ऑफिसर के कर्तव्य का पालन किया है।”
‘आपका अचानक इधर कैसे आना हुआ?’ यह प्रश्न जयंत जी के जेहन में ही रह गया । डी एम साहब ने उनके अंदर उठे उस प्रश्न को समझ लिया था ।
उन्होंने ही कहा, “मैं इधर से जा रहा था । सोचा आप काफ़ी दिनों बाद ज्वाइन कर रहे हैं । तो आपसे बैठकर कुछ बाते करूँ । आप तो जान ही रहे हैं कि यु पी से काटकर उत्तराखंड अलग राज्य बना दिया गया है। इससे प्रशासनिक काम अचानक बढ़ गया है । साथ ही कुछ जिलों और तहसीलों का पुनर्गठन भी होगा ।”
इतना कहकर वे रुक गए थे।
जयंत जी के मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि यह सब उन्हें क्यों बताया जा रहा है?
उनके बीच गहन विचार विमर्श हो रहा था । उन्होंने बड़ा बाबू को बेल बजाकर बुलाया । बाहर ‘डु नॉट डिस्टर्ब ‘ की तख्ती टांग देने को कहा था । इस तख्ती के टंगते ही कुटिल प्रवृत्ति वाले कर्मचारी समझ गए कि आज तो जयंत सर की शब्द - कुटाई, डांट - पिलाई सब होने वाली है।
डी एम साहब के साथ जयंत जी भी बाहर निकले थे। पार्किंग तक जाते हुए डी एम साहब जयंत जी से बोल रहे थे, “आपको मैंने जो प्लान बनाने के लिए कहा है, उसे इस तरह से बनाइए जैसे आप ही यहाँ के डी एम हों।”
जयंत जी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, “मैंने कुछ समझा नहीं, सर।”
डी एम सर ने कहा, “आप इस क्षेत्र को जिला के स्टेटस की घोषणा होने दीजिए। आप सब समझ जाएंगे।”
वे दोनों पार्किंग तक आ चुके थे। ड्राइवर ने डी एम के कार का दरवाजा खोला था। डी एम साहब ने हंसते हुए उनसे हाथ मिलाया था।
उनकी कार तो चली गई। जयंत जी उनके कहे गए वाक्य को पुनः दुहरा रहे थे ।
इसका अर्थ हुआ कि उनका प्रमोशन होने की संभावना है । इस पर वे मुस्कुराते हुए अपने चैम्बर में प्रवेश किए। उन्हें मुस्कुराते हुए देखकर जयंत जी के अनुशासन से त्रस्त कुटिल प्रवृत्ति वाले स्टाफ के लोगों पर गेहूंअन साँप लोट गया।
ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र.

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