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20 अक्टूबर 26:
श्री दुर्गा सप्तशती पर प्रकाशित मेरा लेख पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएं 🙏!
यह लेख 18 अक्टूबर को जमशेदपुर- रांची से प्रकाशित होने वाले मुख्य अखबार 'विहान भारत' #VihanBharat के साहित्य विशेष पृष्ठ पर ''श्री दुर्गासप्तशती का प्रतीकत्मक रहस्य" शीर्षक से प्रकाशित हुई है. आप इसे पढ़ें और अपना विचार व्यक्त करें. सादर!
मूल टेक्स्ट:
दुर्गासप्तशती का प्रतीकात्मक रहस्य
दुर्गासप्तशती की प्रतीक कथा बड़ी आनंदपूर्ण है। इसमें मानवीय व्यावहारिक मूल्यों की प्रतिस्थापना हेतु आसुरी वृत्तियों के संहार की गाथा है ।
प्रथम चरित्र में महामाया महाकाली की महिमा है। यहाँ योगनिद्रा ही काली है। महामाया भगवती ही नित्य हैं। इस चरित में मधु और कैटभ क्रमशः प्रमाद और जड़ता है। विष्णु के अंतःकरण में योगनिद्रा मोह का आवरण है। ब्रह्मा तत्त्वज्ञानी हैं और कमल परमात्मा और ब्रह्मा का संबंध सूचक है।
ब्रह्मा और मधु- कैटभ क्रमशः विष्णु के नाभि और कर्ण-मल से प्रकट होते हैं। अर्थात् देव और असुर दोनों एक ही स्थान से उत्पन्न होते हैं। हमारे अंतःकरण में शुभ और अशुभ संकल्प – विकल्प उठते रहते हैं।
महामाया की स्तुति मोह के आवरण को छिन्नभिन्न कर देता है। ब्रह्मा स्तुति में कहते हैं - हे महामाया!आप ही कालरात्रि, महारात्रि और दारुणा मोह रात्रि हैं । ये तीनों रात्रि दारुण हैं। परंतु ब्रह्म विद्या के बिना मोह रात्रि से त्राण नहीं पा सकते। अतः इसे दारुण कहा गया है।
एक विशेष बात यह है कि जीव इन्हीं तीन रात्रियों में भ्रमण करता रहता है। जीव जब मृत्यु के बाद यात्रा करता है तो परलोक में इतस्ततः भ्रमण करता रहता है, वही कालरात्रि है। पुनः जब वह मनुष्यादि योनियों में आता है, तो गर्भकाल महारात्रि है । मुनुष्य योनि में आने पर वह नौ महीने तक अंधकार में पड़ा रहता है । फिर जन्म लेने पर हम मोह रात्रि में सोये रहते हैं -
मोह निशा सब सोवनहारा।
देखहिं स्वप्न अनेक प्रकारा॥
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी।
परमारथी प्रपंच बियोगी॥
इसी तीन रात्रि में मुक्ति पर्यंत जीव भटकता रहता है। इस प्रकार प्रथम चरित्र का प्रतीकात्मक और दार्शनिक पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मध्यम चरित्र में महिषासुर अहंकार है । अहंकार का जनक धन, ऐश्वर्य, बलादि हैं और इस मध्यम चरित के केन्द्र में महालक्ष्मी हैं । एक बात और इस देवी भगवती की निर्मिति (उत्पत्ति ) में सभी दैवी गुणों का समाहार है। और वही देवी महिषासुर के वध के लिए सक्षम हुई।
आज के संदर्भ में यह प्रसंग अत्यंत प्रासंगिक है कि जब हम अपने राष्ट्रीय दैवी गुणों को समुन्नत करेंगे तभी राष्ट्र को बाधित करने वाला महिषासुर का बध संभव है।
महिषासुर अहंकार से आतंकवादी हिंसक प्रवृत्ति का होकर संपूर्ण मानवीय जगत का विध्वंस कर देना चाहता है। इस चरित की कथा का मर्म यही है कि ऐसी स्थिति में जब सभी सात्विक दैवी गुणों का समाहार होता है तो वह समुच्चित शक्ति ऐसे असुर का वध कर राष्ट्र और जगत का कल्याण करती है ।
अतः स्पष्ट है कि संघशक्ति से ही हम अहंकारी का मद चूर्ण करने में सक्षम हो सकते हैं । चाहे वह मनुष्य, महिष, हाथी जिस रूप में आये, हमारी जाग्रत संघशक्ति के समक्ष उसकी एक माया नहीं चलेगी। मानस का भी उद्घोष है -जहाँ सुमति तहँ संपति नाना ।
प्रथम और मध्यम चरित्र के बाद उत्तर चरित्र का प्रतीकात्मक विश्लेषण महत्त्वपूर्ण है । उत्तर चरित षष्ठ अध्याय से त्रयोदश अध्याय तक है । षष्ठ अध्याय का धूम्रलोचन मोह है । सप्तम अध्याय का चंड-मुंड मद-मत्सर है । अष्टम अध्याय का रक्तबीज लोभ है, जो फैलता ही जाता है । नवम अध्याय का निशुंभ क्रोध है ।
दशम अध्याय का शुंभ काम है । ये सब असुर हैं । यहाँ तक असुर वध का वर्णन है । एकादश अध्याय देवताओं की स्तुति है । द्वादश अध्याय देवी चरित्रों के पाठ का माहात्म्य है। त्रयोदश अध्याय में सुरथ और वैश्य को देवी के वरदान का वर्णन है ।
दुर्गासप्तशती के तेरह अध्यायों में चतुर्थ, एकादश में देवी की स्तुति एवं द्वादश, त्रयोदश अध्यायों में उपर्युक्त विषयों का वर्णन है । शेष नौ अध्यायों में नौ असुरों का वध देवी ने भिन्न -भिन्न स्वरूपों में किया है। वैसे देवी मूलतः एक ही हैं । वे असुर की प्रकृति, उसकी मायावी आकृति तथा अत्यंत दुष्ट प्रवृत्ति को सदा के लिए विनष्ट करने के लिए भिन्न -भिन्न रुपों में अवतरित हुई हैं ।
ये असुर-जनित बाधाएँ, आएँगी भू पर जब-जब।
असुरों का नाश करूँगी, मैं प्रकटित होकर तब-तब।
ये नौ असुर मूलतः हमारी आसुरी वृत्ति मूढता, प्रमाद, अहंकार, मोह, मद, मत्सर, लोभ, क्रोध और काम के स्वरूप हैं।
हम नौ दिनों में क्रमशः उन-उन महाशक्तियों की दिव्य शक्ति प्राप्तकर इन नौ आसुरी वृत्तियों से जब मुक्त होते हैं, तभी नवरात्रि -पूजन की सार्थकता सिद्ध होती है। अतः विजय दशमी, इन नौ आसुरी वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के विजय की प्रतीक है । फिर तो हम महाशक्ति की साधना से शिव स्वरूप हो जाते हैं । फिर तो बाह्य मूर्ति विसर्जित हो जाती है, क्योंकि, हम आंतरिक ऊर्जा प्राप्तकर शिव बन जाते हैं।
ऐसे भी अंतिम असुर, जिसका वध किया जाता है, वह शुंभ है। शुंभ काम है और शंभु कामारि (काम के दुश्मन अर्थात् काम रहित) हैं । शुंभ को अंत में हत करके ही साधक शंभु हो सकता है अर्थात् साधक की ऐहिक आमुष्मिक कामना की पूर्ति हो सकती है ।
निष्कर्षतः यही है दुर्गासप्तशती का प्रतीकात्मक रहस्य। इसके साधनात्मक बोध से ही साधक के भीतर सभी सकारात्मक शक्तियों का अवतरण होता है। इसी से साधक का सर्वविध कल्याण होता है।



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