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Wednesday, June 25, 2014

ठगाने का संकल्प (कहानी) (हास्य व्यंग्य)

#hindi#story#satire
#BnmRachnaWorld
#chhanvkasukh : यह हास्य - ब्यंग्य की रचना  मेरी पुस्तक "छाँव का सुख" में सम्मिलित की गई है.  
मेरी लिखी कहानी संग्रह "छांव का सुख" प्रकाशित हो चुकी है. सत्य प्रसंगों पर आधारित जिंदगी के करीब दस्तक देती कहानियों का आनंद लें.अपने मन्तब्य अवश्य दे.
यह पुस्तक अमेज़ॉन पर उपलब्ध है. मात्र 80 रुपये में पुस्तक आपके घर तक पहुंच जाएगी.  Link: http://www.amazon.in/Chhanv-Sukh-Brajendra-Nath-Mishra/dp/9384419265 
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ठगाने का संकल्प

    मैं संकल्प - विकल्प के बीच नहीं झूलता हूँ।  मैंने रात में ही निस्चय कर लिया था।  आज के दिन को यादगार बना के ही रहूंगा।  इससे मुझे कोई नहीं रोक सकता।  इससे  मुझे सिर्फ एक ही आदमी रोक सकता है , वह सिर्फ मैं।  और मैं अपने को रोकना नहीं चाहता।  इसलिए सवेरे उठते ही मैंने जब अपने हाथों को देखकर कहा ,
                                       कराग्रे बसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती, 
                  करमूले स्थितौ ब्रह्मः, प्रभात करदर्शनम्।
तो मैंने मन - ही - मन यह निश्चय भी दुहराया था कि आज मैं निकलूंगा ठगाने  के लिए या अपने को ठगे जाने के लिए पूर्णतया समर्पित  करने के लिए। अपने इस संकल्प को और भी दृढ़ता प्रदान करने के लिए शौच - स्नानादि से निवृत होने के  बाद जब भगवान के सामने पूजा करने को बैठा तो मैंने उनसे कातर स्वर में प्रार्थना की ," हे भगवन ,आज जो निश्चय  किया है उसमें मुझे अवश्य सफलता मिले।  आपने अनेक भक्तों को , जैसे संत तुकाराम, नरसी मेहता, मीरा, सूर, कबीर,तुलसी, रैदास को इसी कलयुग के ज़माने में ठगा है,  नहीं  - नहीं ठगाते रहने की संकल्प - शक्ति दी है , तभी तो वे संत - शिरोमणि कहलाये। उन्हें अतिसाधारण से अति विशिस्ट बना दिया। कम  - से - कम मुझ अति साधारण को अति साधारण तरीके से, अति सहज रास्ते पर आगे चलकर, अति निम्न कोटि के ही भक्त बन जाने दो और ठगाने दो।  आप तो अपनी मोहिनी मूरत , सोहिनी सूरत से अनेकों को ठगते रहे हैं या जो अत्यंत अंतरतम में आपको अनुभव करते है वे ठगे - से रह गए हैं , तो क्या मुझ अकिंचन को ठगाने का  लाभ प्राप्त करने का सुयोग नहीं उपलब्ध कराएँगे , प्रभु?"
       मैंने ईश्वर को मन - ही - मन धन्यवाद दिया क्योंकि मुझे लगा कि उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर ली है।  क्योंकि मैं अपने में अतुलित बल के संचार  का अनुभव कर रहा था जैसे हनुमान जी को जामवंत जी ने कहा हो ,'का चुप साध रहे बलवाना ' और 'राम काज हेतु तव अवतारा ' और हनुमान जी समुद्र लाँघ गए एक ही छलांग में।  मैं भी निकल पड़ा आज ठगाने  के लिए यानि ठगे जाने  के लिए......। मैंने आज के पंचांग में भी देखा था की राहु काल का समय दिन में १० बजे से १२ बजे तक है।  इसलिए मैं उसी समय निकला ताकि मेरे ठगाने में राहुकाल का भी योगदान उसी दिशा में हो और मेरे ठगाने का काम बनता रहे।
   मैं अपनी कार से निकला।  राश्ते में पेट्रोल पंप मिला।  मैं वहां पेट्रोल भराने के लिए गाड़ी खड़ी की। वहां कोई भी लाइन नहीं थी।  मेरी एकलौती कार पेट्रोल भराने के लिए  खड़ी  थी।  यहाँ ठगाने का एक सुनहरा मौका इससमय यानि ऑफिस जाने के भीड़ - भाड़ के समय होता है जब आप मीटर नहीं देख रहे होते हैं बल्कि पीछे वाले के हॉर्न की आवाज के साथ आपका दिमाग कहीं और होता है।  तो आपने अगर जीरो नहीं देखा तो पेट्रोल भरने वाले से  ठगाने की  पूरी संभावना होती है।  मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है।  आज तो ये नहीं हो सका इसलिए मैं जरा निराश हुआ क्योंकि मेरा संकल्प पूरा होता हुआ नहीं  दीख रहा था।  मैं अपने ठगाने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहता था।  मुझे थोड़ा संतोष इससे मिला कि आगे ठगाने के और भी मौके हैं।  यह तो शुरुआत है। मेरी कार में पेट्रोल भरना शुरू किया गया।  पेट्रोल भरने वाले लड़के को पेट्रोल मारने की नायाब कला का कामयाब  प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त होता है।  वे अगर पेट्रोल भरने  के दरम्यान हैंडल से पेट्रोल के फ्लो को दो तीन बार थ्रॉटटल करें तो  समझ लें आपका तीन - चार पॉइंट पेट्रोल मार लिया गया।  इसके अलावा भी उनके पेट्रोल मारने के अन्य कई तरीके होते होंगे जो मुझे भी नहीं मालूम।  लेकिन आज तो गजब हो गया।  पेट्रोल भरने वाले लड़के ने अनवरत प्रवाह स्थापित रखते हुए पेट्रोल भरा।  साथ ही मैंने देखा की उतने ही पैसे में उसने ज्यादा पेट्रोल भर दी।  मेरे आस्चर्यमिश्रित दृष्टि से देखने पर उसने कहा था , ' सर , कल रात से पेट्रोल  ढाई रुपये प्रति लीटर सस्ता हो गया है। इसीलिये आपको उतने ही रुपये में थोड़ा ज्यादा पेट्रोल मिला है। ' .... अरे..रे…।, ये क्या हो गया? मैं तो ठगाने के लिए पेट्रोल भरवाने गया था। यहाँ तो शुरू में ही मेरी तकदीर ने मेरी इच्छा पर आघात कर दिया और मैं ठगाते - ठगाते रह गया। 
                वहां से मुझे बैंक जाना था।  बैंक के पास गाड़ी पार्क करने की सोच रहा था।  जैसा  कि अक्सर होता रहा है बैंक के पास पार्किंग स्पेस नहीं रहने और नहीं मिलने के कारण वहां से एक किलोमीटर दूर गाड़ी पार्क करनी पड़ती है।  लेकिन आज मुझे बिलकुल नजदीक ही पार्किंग की जगह मिल गयी।  गाड़ी पार्क कर मैं सीढ़ियां चढ़कर बैंक जो दूसरे माले पर है , पहुंचा तो समय ठीक १० बजकर ०५ मिनट हुआ था।  मैं इस उम्मीद से ऊपर गया था कि बैंक तो अभी खुला नहीं होगा तो चलो दूसरी जगह इन्तजार करने से अच्छा है कि उन्ही सीढ़ियों पर इन्तजार कर लिया जाय।  इसी बहाने और भी इन्तजार करने वाले लोगों से बातें हो जायगी।  लेकिन वहां जो कुछ   मैंने अपनी आँखों से देखा उसे देखकर मेरी आँखे देखती रह गयी।  यह क्या ? बैंक के मुख्य द्वार का ग्रिल वाला दरवाजा खुला था जो अक्सर साढ़े दस बजे तक बंद रहता था।  मैंने ऑंखें मलकर फिर घड़ी को हिलाडुलाकर फिर घड़ी  देखी। घड़ी चल रही थी और समय वही था जो मैंने अभी से ठीक थोड़ी देर पहले देखा था।  बैंक के सारे बाबू (ऑफिस की रानी यहाँ बाबू कहलाते हैं ) अपनी - अपनी जगहों पर बैठे ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे थे।  मैं इसी समय पहले जब भी आया हूँ तो बैंक के कैशियर और बाबुओं को सवा दस बजे के बाद धीरे - धीरे बारी - बारी से बैंक में घुसते देखा है मानो अगर थोड़ा पहले आ गए तो सबसे बड़ा पापी होने का दोष लग जायेगा।  लेकिन आज तो सारे ही दोष - ग्रहण करने को तैयार बैठे थे और ग्राहकों का इन्तजार कर रहे थे।  जो पहले उल्टा होता था यानि ग्राहक बाबू लोगों का इन्तजार किया करते थे।  मैं दूसरा या तीसरा ग्राहक रहा होऊंगा।  मैंने सिक्योरिटी से दबे स्वर में पूछा था , "क्या बात है आज बाबू लोग बड़े सवेरे से ग्राहकों की सेवा में डटे है। " उसने बस मुस्कराकर रह जाने को ही अपना जवाब समझने की समझाईस  मेरी ओर फेंकी थी।  मैं भी आगे कोई सवाल करने की जुर्रत नहीं जुटा सका।
     साढ़े दस तक जब ग्राहकों की संख्या अच्छी (सीज़बल) हो गयी तब बैंक मैनेजर ने घोषणा की ,"आप सभी कस्टमर्स से रिक्वेस्ट है कि आपलोग कहीं नहीं जाइये।  आज आप लोगों की उपस्थिति में हमारी रीजनल मैनेजर साहब केक काटेंगे। " यह क्या हो रहा है ? मुझे समझ नहीं आ रहा था क्योंकि वहां वह सबकुछ हो रहा था जैसा पहले कभी नहीं हुआ था।  बड़ा - सा केक आया।  उसी समय एक और ओफ्फिसरनुमा अफसर टाई लगाये हुए आये।  पता चला की ये उस बैंक के रीजनल हेड  हैं। उन्होंने केक काटा और छोटे - से अल्प शब्दों में बैंक के इस ब्रांच को शुभकामनायें दी।  तब कहीं मुझे पता चला  कि आज इस ब्रांच का वार्षिक  जन्मदिन है।  मैंने भी केक , बिस्कुट , सॉफ्ट ड्रिंक लिया और ठगाने की बात लगभग भूल ही गया था।  फिर स्वयंम को चिकोटी काटते हुए बात याद दिलाई , 'क्यों बेटे , ठगाने चले थे आज और केक सॉफ्ट ड्रिंक के मजे ले रहे हो ' मैं स्वयं ही स्वयं के सामने झेंपता हुआ सोचता रह गया। …मै यहाँ भी, जहाँ हमें घंटो लम्बी लाइन में खड़ा रहना पड़ता था , सिंगल विंडो सर्विस होने पर भी , कभी स्क्रॉल के लिए लाइन , फिर पैसे जमा करने एक बार और लाइन में लगना पड़ता था।  लेकिन आज तो सब काम इतनी सुविधा से हो रहा था कि मन - ही - मन में  बड़ी असुविधा महसूस हो रही थी , क्योकि  हम इतनी सुविधाजन्य सुविधा के अभ्यस्त नहीं थे।  लगा कि किसी और ज़माने या युग में तो नहीं पहुँच गए।  हे भगवान , यहाँ भी मैं नहीं ठगा सका, न वक्त के द्वारा और न इस ऑफिस की सेवा - विलम्ब - प्रदाता - पद्धति द्वारा।
     वहां से निकलकर मैं लाइफ इन्शुरन्स का प्रीमियम जमा करने गया। यह क्या? काउंटर पर कोई लाइन नहीं।  मैं बाहर आकर फिर बोर्ड पढ़ा , हाँ भई, इन्शुरन्स ऑफिस  ही  है  यह।  हालाँकि मैं प्रीमियम सिस्टम द्वारा ऑनलाइन भी जमा कर सकता हूँ।  लेकिन मेरे एक मित्र ने मुझे मुफ्त परामर्श दिया था ,”प्रीमियम आपको भी ऑफिस में जाकर ही जमा करना चाहिए , इसलिए नहीं कि मैं भी ऑफिस जाकर ही जमा करता हूँ बल्कि इसलिए कि  ऑफिस जाते हुए , आते हुए ऑफिस में या ऑफिस के बाहर कुछ परिचित - अपरिचित से मिलने - जुलने, बातचीत करने का मौका मिलेगा।  और आप तो साहित्यिक रूचि रखने वाले पुरुष हैं।  हो सकता है आपको कोई वाकया या प्रसंग ऐसा मिल जाये जिसे आप कहानी में फिट कर सकते है या  परिवर्तित कर   कोई नयी कहानी गढ़ सकते हैं।“     वैसे मैं अभी तक यह नहीं समझ पाया हूँ कि उनका यह परामर्श मुझे मेरी परेशानी थोड़ी बढ़ा देने के लिए था या मुझे सही में मदद करने के लिए।  उनका यह परामर्श मैं अबतक मानते हुए प्रीमियम ऑफिस में जाकर काउंटर पर लाइन लगकर ही जमा करता हूँ।  मेरी कई कहानियों का प्लाट या कहानी के प्लाट के अंदर प्लाट गढ़ने की सामग्री मिल जाया करती है।  कभी - कभी आपके (अ) शुभचिंतक मित्र के भी गलती से जानबूझकर दिए गए गलत परामर्श भी गलती  से  सही निकल जाते है। मैं सही में इन्शुरन्स ऑफिस में ही काउंटर पर खड़ा था और कोई लाइन नहीं थी।  आश्चर्य हुआ।  यहाँ भी काम इतनी जल्दी से हो जाएगा , विश्वास नहीं हो रहा था।  मैं कहाँ ठगा गया , यह सोचने का भी वक्त नहीं मिल रहा था क्योंकि मैं कहीं ठगा ही नहीं रहा था।  यह क्या हो गया है ज़माने को!!! कोई एक अदना - सा अति साधारण आदमी के ठगाने की तुच्छ - सी इच्छा को पूरी करने की किसी में तमन्ना नहीं जाग रही थी, न वक्त को, न ऑफिस के लोगो को, न ऑफिस की लाइन को!!!
      मैं वहां से ठेले वाले के पास फल खरीदने गया, पूरी गारंटी के साथ कि यहाँ तो ठगाना  निश्चित है।  ठेले पर जो फल बेचते है और जो दूकान पर बेचते हैं , उनमे तौल का अंतर होता है, यह एक अकाट्य सत्य है।  इस सत्य के सत्यापन की किसी से जरूरत नहीं है।  तो मेरे ठगाने की इच्छा की पूर्ति यहाँ तो होनी ही है , ऐसा सोचकर मैंने ठेले वाले से एक किलो आम खरीदे।  यह भी नहीं पूछा कि एक किलो के  पूरे   एक किलो है न। ठेले वाले ने ही बिना मेरे पूछे कहा ," बाबू , ठेका वाला समझकर यह मत सोचियेगा की मैं आपको तौल में कम दे रहा हूँ।  देखिये मेरे पास भी डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक तराजू है।  मेरा चैलेंज है की आप इसको जहाँ भी तौलवा लें, अगर एक किलो से काम हुआ तो मैं आपको दो किलो दूंगा। '
मैंने बड़ी विनम्रता से कहा ,"आपको मैंने कुछ कहा क्या ?" ठेलावाला मुस्कराया , लेकिन मैं तो मुरझा गया न।  मैंने यह सोचकर ही खासकर ठेले पर से बिना चुने आम लिया ताकि वह मुझे दो तरह से ठगे- एक तौल में कम देकर , दूसरे कुछ सड़े आम को अच्छे आमों के साथ मिलाकर।  मेरी संशयात्मक स्थिति को भांप कर वह फिर बोला," बाबू, आमों को भी चेक कर लीजिये।  अगर एक आम भी ख़राब निकला तो एक - के - बदले दो आम ले जाइये।  उसके आत्मविश्वास ने मुझे अंदर तक हिला दिया।  हे भगवान, यह हो क्या रहा है? मैं अपनी ठगीच्छा (ठगाने की इच्छा) पूरी करने के लिए ठेले पर से फल लिए। वहां भी घोर निराशा ही हाथ लगी। मेरी इच्छा पूरी होते - होते रह गयी। ऐसा कैसे हो सकता है ? क्या दुनिया से अचानक परस्पर ठगने - ठगाने का ब्यापार ख़त्म हो गया है? मैं विश्वास ही नहीं कर पा रहा था। 
                  देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान ,
                   कितना बदल गया इंसान.
         कल तक जो ठगा करते थे,
         आज उनका बदल गया ईमान,
         वे बन गए इंसान,
         कितना बदल गया ये जहान,
         कितना बदल गया इंसान। 
 ऐसे गुनगुनाने का मन हो रहा था लेकिन तीर घुसा जा रहा था मेरे कलेजे में, कलेजा छलनी हो रहा था, क्योंकि मेरे ठगाने की इच्छा अधूरी रह रही थी।
    मैं ठगाने की इच्छा लिए ऑफिस - ऑफिस , मार्केट - मार्केट, बाजार - बाजार , ठेला - ठेला घूमते - घूमते थक चूका था।  कभी - कभी आपके साथ जब वो - वो होने लगता है जो - जो आपने कभी सोचा ही नहीं, चाहे अच्छा या बुरा तो आपके साथ अच्छा होना भी आपको खलने लगता है।  आपमें ऊर्जा का अभाव होने लगता है।  जैसे अगर निरंतर प्रदूषित खाद्य भक्षण करने वाले को शुद्ध दूध, दही, घी खिला दिया जाय तो उसे  बदहजमी या डेसेंटरी होने लगती है और ऊर्जा समाप्त होने लगती है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बुझे मन से वापस घर आया, खाना खाया और लेटने के बहाने सोचने लगा।  ऐसा क्यों हो रहा है?  मैं ठगा क्यों नहीं रहा हूँ?  क्या मेरा इस ज़माने का या पूर्व ज़माने का कोई पुण्य मुझे ठगाने नहीं दे रहा है? फिर मैंने दृढ निश्चय किया कि ऐसे पुण्य करने की इच्छा होने पर भी मैं उनसे तौबा करूँगा।
   मैंने कितनी दुआएं मांगी ईश्वर से और एक सच्चे , ईमानदार इंसान की तरह वे सारी दुआएं पड़ोसी और मोहल्ले वालों के लिए भी मांगी।  पड़ोसी और मोहल्ले वालों के लिए मांगी गयी वे दुआएं कबूल हो गयी और मेरे लिए वह दुआ, दुआ ही रह गयी।  कुछ वर्ष पहले की ही बात है , मैंने ईश्वर से प्रार्थना की थी , " हे ईश्वर, मेरे पड़ोसी के लड़के , लड़की का आई आई टी एंट्रेंस परीक्षा या प्री मेडिकल परीक्षा में चुनाव हो जाय और मेरे बच्चे का भी हो जाय।"  मैंने एक सीधे - साधे सबका भला सोचने वाले, सबका ख्याल रखने वाले इंसान की तरह पड़ोसी के लड़के या लड़की को प्राथमिकता में पहले रखा और फिर अपनी संतान को रखा।  भगवान ने सुनी और खूब सुनी। मेरी प्राथमिकता के अनुसार पड़ोसी के लड़के - लड़कियों का चुनाव हो गया और मेरे लड़के , लड़की का नहीं हुआ।  यहाँ मैं ठगा रह गया और ठगाने का मेरा संकल्प दुगना हो गया। 
  वैसा ही जहाँ मैं काम करता हूँ वहां मेरे प्रमोशन और इन्क्रीमेंट को लेकर होता रहा है।  मैं अक्सर बॉस के लिए पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन तैयार करता हूँ।  काफी मेहनत करनी पड़ती  है उसपर। इधर - उधर से डेटा खंगाल कर बॉस के बताये अनुसार  टू द पॉइंट अर्रेंज करने के बाद कही वह प्रेजेंटेशन प्रेसेंटेबुल बनता है।  बॉस उस प्रेजेंटेशन को दिखला कर अपनी विद्वत्ता और विश्वसनीयता पैदा करने में सफल हो जाते हैं।  उनको इन्क्रीमेंट, प्रमोशन और अच्छी जगह स्थानांतरण भी  मिलता है।  वे दूसरे विभाग में स्थानांतरित होते - होते मुझे आश्वासन देते जाते है ,"मैं आपकी सिफारिश आनेवाले बॉस से करके जा रहा हूँ।  आपको इसबार इन्क्रीमेंट और प्रमोशन दोनों अवश्य मिलेगा। " मैं इस आश्वासन के साथ फिर दूने उत्साह से काम में लग जाता हूँ।  ठगाने के एक और दौर के लिए तैयारी में जुट जाता हूँ ताकि साल - दो - साल के अंत में फिर कोई इन्क्रीमेंट और प्रमोशन का आश्वासन मिले और मैं फिर ठगाने के आनंद में ओत - प्रोत होता हुआ अपने प्रोफेशनल कैरियर की नाव को वक्त के धार (या मंझधार ) के हवाले करता रहूँ।   
   ठगाने के इसी आनंद को भक्त सुदामा ने ताउम्र प्राप्त किया।  वे  भगवान श्री कृष्ण के बाल - सखा थे . श्री कृष्ण द्वारिकाधीश  हो गए।  श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न सुदामा और उनका परिवार गरीबी की मार झेलता हुआ भी भक्ति के अटल मार्ग पर दृढ विस्वास का दामन थामे रहा।  उनकी श्रद्धा में थोड़ी भी कमी नहीं आयी।  भले ही दरिद्रता के साथ उनका अन्योन्याश्रय सम्बन्ध स्थापित हो गया।  यानि वो दरिद्रता के लिए बने थे और दरिद्रता उनके लिए।  'कभी तो सुध लोगे भगवन'  ऐसे लोग कितनी आसानी से ठगे जाते हैं। कभी कभी तो लगता है कि ठगने के धंधे की शुरुआत भगवान ने ही की होगी।  भगवान के द्वारा जो ठगे गए वे दीन - हीन, दरिद्र, दुःख - क्लेश में जीवन बिताते हुए संत लहलाये या संत के नाम से महिमामंडित हुए।  और जो नहीं ठगाए या जिन्होंने भगवान को ही ठगना चाहा वे हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, भस्मासुर, महिषासुर,वृत्रासुर, मधु- कैटभ , रक्तबीज, जालंधर, रावण  कहलाये और ठाट से  अपने जमाने के  वर्तमान को जीया और ईश्वर के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए।  अरे भई, ये तो सच ही है कि ईश्वर ही सबको   जीवन देते है और वे ही मृत्यु प्राप्त कराते हैं।  यानि कि जिन्होंने ईश्वर को ठगा उन्हें मृत्यु प्राप्त कराने के लिए ईश्वर को साक्षात,ख़ुद  आना पड़ा।
       तो मेरी समझ में जबसे मानव सभ्यता का विकास हुआ है तभी से ठगने और ठगाने का ब्यापार भी शुरू हो गया।  इसलिए डार्विन के मानव सभ्यता के विकास के सिद्धांत 'survival of the fittest' में अगर 'चीटर' जोड़ दिया जाय तो वह 'survival of the fittest cheater ‘ हो जाएगा' जो इस ब्यापार की सच्चाई से मानव - सभ्यता के विकास के तंतुओं के जुड़े होने को स्थापित करता है।  यानि जो ठगने में सबसे फिट वही survive कर सका है और आज के समय में कर सकता है।  मुझे याद नहीं जबसे मैंने होश संभाला है तभी  से मैंने देखा है कि फिल्म जगत की सुंदरियों में जो सबसे सुन्दर रही है हर दशक में उन्होंने उसी ब्रांड के साबुन का उपयोग किया है जिस ब्रांड के साबुन का उपयोग आजतक इस ज़माने के फिल्म जगत की सुंदरियाँ करती रही है।  साबुन के उत्पादक ने सुंदरियों को ठगा या सुंदरियों ने उन्हें , यह तो विशेष चर्चा जा विषय हो सकता है किन्तु इतना तो अकाट्य सत्य है की दोनों ने मिलकर पिछले कई दसकों से ग्राहकों को और इस्तेमालकर्ताओं को बखूबी ठगा है।  इसे इसतरह  से समझें कि कोई भी इस्तेमालकर्ता आजतक उस साबुन को लगाकर वैसी सुंदरी नहीं बना जैसी सुंदरी विज्ञापनों में दिखाई जाती है या दिखाई जाती  रही है। आजतक कोई भी ऐसा क्रीम या साबुन नहीं निकला है जिसने नाओमी कैम्पबेल की त्वचा को कटरीना कैफ की त्वचा जैसा रंग दे दे।  जो निखरा हुआ है उसी में निखार लाने का काम ये सारे क्रीम और साबुन करते हैं।   इसलिए मेरी समझ में यह एक साजिश है ग्राहकों को ठगने के लिए। 
       भगवान भी वही काम करते हैं।  जो संपन्न है उसी की सम्पन्नता  और बढ़ा देते है।  ऐसा नहीं था तो सुदामा पूरी जिंदगी संत बने सम्पन्नता का इन्तजार नहीं करते रहते।  भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें सम्पन्नता तब दी जब वे  विपन्नता का दुःख सहते - सहते बूढ़े हो चुके थे।  उससमय उनके लिये सम्पन्नता और विपन्नता का कोई अंतर नही रह गया था।  वे समभाव  में स्थित हो चुके थे। नहीं तो रावण जैसा छीनकर अपने को संपन्न बना लेते तो कौन रोक लेता उन्हें।  उन्हें ईश्वर - प्रेम और भगवद  भक्ति  ने  दुर्बल बना दिया था।
मैं तो कहता हूँ कि इस पूरे संसार का ब्यापार ही ठगाने के chain से संचालित हो रहा है। सुंदरियाँ कभी कोल्ड ड्रिंक की बोतल की गर्दन को देखने को कहती हैं, तो कभी कीमती गैजेट्स के इस्तेमाल करने की सलाह देती हैं. इस सलाह के पीछे उस ब्रांड और सुंदरी के साझा प्रयास द्वारा ग्राहकों की जेब ढीली करने का इरादा ही रहता है।  मैं तो बहुत खुश होता हूँ जब ऐसे गैजेट्स की कीमत बहुत अधिक रखी जाती है।  चलो भई,  मैं तो अफ़्फोर्ड नहीं कर सकता।  मेरे इतने रुपये तो बचे साथ - ही - साथ मैं ठगाने से भी बच गया। लेकिन मेरे ठगाने की इच्छा की पूर्ती नहीं हुयी।  क्या करता मन मारकर रह जाना पड़ा। 
          मैं तो अब कस्टमर यानि ग्राहक का नाम बदलने की अनुशंसा करता हूँ।  उसे कई नामों से पहले भी पुकारा जा चूका है , मसलन , कष्ट से मरनेवाला या सीधे - सीधे कष्ट से मर इत्यादि।  लेकिन  मैं कस्टमर यानि ग्राहक को ठगेच्छु कहना ज्यादा पसंद करूंगा।  ठगेच्छु यानि ठगाने की इच्छा रखने वाला।  सप्प्लायर से लेकर होलसेल्लर और रिटेलर तक का पूरा चैन ठगात्मकता का ही विस्तार कहा जायेगा।  पूरे सेल्स - एडमिनिस्ट्रेशन को  ठग- विद्या के ही एक अंश का विस्तार और  ब्यवहारिक क्रियान्वयन  का अभिक्रम माना जा सकता है।  
 मेरा यह दिन जो बीता, जब मैं ठगाने के आनंद से बंचित रह गया, ऐसा ही दिन सबका बीते। सबों के ठगाने की इच्छा पर थोड़ा पानी ही नहीं टैंकर का पानी पड़ जाय। 

पूरी रचना आप इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं.
http://yourstoryclub.com/short-stories-funny/sarcastic-hindi-story-thagane-ka-sankalp/

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र , 25-06-2014
   जमशेदपुर

मेतल्लुर्गी*(धातुकी)  में इंजीनियरिंग ,  इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (IGNOU) से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन मार्केटिंग मैनेजमेंट। टाटा स्टील में 39 yrs कार्यरत . जनवरी 2014 से सेवानिवृति के बाद हिन्दी साहित्य की सेवा में रत।


Tuesday, June 10, 2014

न हो उदास बचपन (कविता)

#bnmpoems
#BnmRachnaWorld



 


न हो उदास बचपन

ओढ़कर ये टोकरी ,
ढूढती  हूँ     सपन,
खुले  आसमान  में,
खोया  कहीं  है  मन,
उदास बचपन ,
उदास  बचपन।

होश संभाला जबसे, मेरे
सूखे होंठ   पपड़ियाते ,
क्योंकि  माँ  तो रहती ,
काम  का बोझ उठाते.

न  कोई    खिलौना,
न  कोई     बिछौना ,
न  कोई         लोरी ,
खाली कोना - कोना।
न   कोई      प्रीत,
न   कोई      मीत,
न   कोई मुस्कान ,
न   कोई     गीत।
न कोई  उपासना,
न कोई    प्रार्थना,
न कोई      फुहार,
न कोई   मनुहार।
बचपन रीता ही रहा ,
क्रंदन   ही    क्रंदन ,
खोया कहीं है  मन ,
उदास बचपन,
उदास बचपन।

मन     है     निराश ,
तन     है     हताश ,
बिखरा पांत - पांत,
न कोई विश्वास।
मेरी गली   आया
न सूरज    कभी ,
अँधेरा ही अँधेरा
पसरा हुआ यहीं।
कौन जोत लेकर
आएगा      यहाँ,
दूध की   नदिया
बहायेगा    यहाँ?
आशा की नयी पौध,
कौन      लगाएगा ,
कौन          करेगा
भविष्य में सिंचन ,
खोया कहीं है मन,
उदास      बचपन
उदास      बचपन।

न हो अत्याचार ,
न हो बलात्कार ,
मेरा  भी है वजूद,
करो तुम स्वीकार।
न खौफ हो मन में
न लगे कहीं ग्रहण।
खिला - खिला हो मन ,
खिला - खिला बचपन।
न हो   उदास   मन ,

न हो उदास बचपन,
न हो उदास बचपन।


This poem is also published on the site link:
"न हो उदास बचपन", को प्रतिलिपि पर पढ़ें :
https://hindi.pratilipi.com/story/%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%89%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8-%E0%A4%AC%E0%A4%9A%E0%A4%AA%E0%A4%A8-zd199msohf9j?utm_source=android&utm_campaign=content_share
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Wednesday, May 21, 2014

अथक उड़ान हो (कविता)

#BnmRachnaWorld 

#bnmpoems#motivational

अथक उड़ान हो

परिंदे,  तू क्यों   गुमशुम   है ,
किन ख्यालों  में गुम है?
                                                             
गगन पुकारता, धरा निहारती ,
 भरो पंखों  में असीम शक्ति। 
नभ में तेरा अथक  उड़ान  हो,
तेरा प्रण    महान  हो ।
 तेरा प्रण     महान हो। 

भूल जा वो   घटना,
घटाओं का    घिरना,
हवाओं का तूफ़ान में बदलना,
तिनको से बने घोसले   का ,
झूलना , डोलना , टूटना,
अन्डो का गिरना , बिखरना,

ये तो आपदा है , विपत्ति है ,
तेरी नियति तुझसे छल करती है।

तू उन्हें पुकार  ले,
झुकाओ ललकार   ले,
पथ में काँटों पर सेज बना ,
फिर उठ जिंदगी संवार ले।

तू रुकना मत , थकना मत।
आशाओं से  भरा वितान हो ,
तू  चल, अथक उड़ान हो ,
तेरा   प्रण महान हो,
तेरा   प्रण महान हो। 

घटायें हो काली, मतवाली ,
हवाएँ रोकती  हो       बाहें  ,
तिमिर - घन में, तड़ित - प्रभा
से   खोजों   अपनी    राहें ।

जाना वहां,  पार क्षितिज है ,
हो न जहाँ नफरत की कोई आँच,
प्यार ही प्यार बसा हो दिलों में,
प्रेम धुन पर हो मधुर - मधुर नाच।

ऐसा ही नया जहाँ बसाना है,
ऐसा ही नया पैगाम सुनाना है।
तू चल वहां पर , भले अथक उड़ान हो ,
तेरा प्रण महान हो, तेरा प्रण महान हो।


---ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
    जमशेदपुर

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Wednesday, April 23, 2014

राष्ट्रीय चुनाव और भारत का भविष्य

राष्ट्रीय चुनाव और भारत का भविष्य   
  भारत में २०१४ का यह राष्ट्रीय चुनाव पूरे विश्व में प्रजातंत्र का सबसे बड़ा पर्व है । इसमे भाग लेने वाले मतदाताओं की संख्या, उम्मीदवारों की संख्या और राष्ट्रीय चुनाव मशीनरी पर खर्च होने वाली राशि तथा इसमें सम्मिलित प्रचार माध्यमों की भागीदारी सम्भवतः पूरे विश्व के अन्य राष्ट्रों की तुलना में सबसे अधिक है । यह चुनाव भारत का भविष्य तय करेगा अवश्य, पर भविष्य क्या होगा यह अनिर्णीत है । यह चुनाव 16 वॆ लोकसभा का गठन करेगा । पिछली लोकसभा के चुनाओं में जैसे उम्मीदवार चुने जाकर आए हैं उनकी गुणवत्ता में निरंतर ह्रास होता रहा है ,   यह एक निर्विवाद सत्य है । आज़ादी के बाद की पहली लोकसभा में सांसदो के चरित्र की गुणवत्ता से अगर पिछली लोकसभा के सांसदो की तुलना की जाय तो उसमें जमीन - असमान का अंतर मिलेगा । इसीलिए हमें पिछली लोकसभा में काली मिर्ची कांड से लेकर अभद्रव्यहार , मर्यादाओं का उलंघन तथा भाषा पर अनियंत्रण सांसदों की स्तरहीनता को दर्शाता है।
     ऐसा क्यों हो रहा है?  आज़ादी की लड़ाई में भाग लेकर और उसमें तपाये जाकर जो नेता बाहर निकले थे और उनसे जो संसद बनी थी उसकी मर्यादा और उसकी कार्यवाही की मिशाल दी जा सकती है । आज़ादी की लड़ाई के समय कांग्रेश एक दल नहीं एक आंदोलनका नेतृत्व करनेवाला , आम जनता को शिक्षित, अनुशाषित तथा निडर बनाने का कार्य करने वाला एक प्रतिनिधि संगठनथा । इसके नेता जमीन से जुड़े थे और इसके नेताओं का जनता के साथ सीधा सम्बन्ध था। वे अपने को नेता से अधिक जनता का सेवक समझते थे। फिर भी प्रजातंत्र में सत्ताधारी दल का एकाधिकार नहीं हो जाय इसीलिए कांग्रेस से ही एक घटक अलग होकर प्रजा सामाजवादी पार्टी , स्वतंत्र पार्टी बनाकर विपक्ष में बैठना स्वीकार किया। ऐसा प्रजातंत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के सामान महत्व को स्थापित करने के लिए भी बहुत जरूरी था। संसद सत्र में विपक्ष में बैठे आचार्य नरेंद्रदेव , कृपलानी , लोहिया आदि नेता जब बोलते थे तो उनकी बातें नेहरूजी , गोविन्द बल्लभ पंत आदि नेता भी दत्त चित्त होकर सुनते थे। यह पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच की मर्यादाओं की रेखा थी जिसका सम्मान दोनों करते थे। सत्ता पक्ष अपने उत्तरदायित्तवों को निभाने में विपक्ष के सुझाओं का भी सम्मान करता था। विपक्ष भी सत्ता पक्ष का सिर्फ विरोध ही नहीं करता था बल्कि उसके अच्छे कार्यों की प्रशंशा भी की जाती थी। यह एक आदर्श प्रजातंत्र के संसदीय कार्यकलाप का रूप था जो दुनिया के सामने एक मिशाल बन गया। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि भारत के साथ जितने भी अन्य राष्ट्र आज़ाद हुए वहाँ या तो कोई तंत्र ही कायम नहीं हो सका या अगर प्रजातंत्र कायम हुआ भी तो वह धीरे – धीरे अधिनायक तंत्र में तब्दील हो गया और तानाशाही कायम हो गयी।
      भारत में यह दलीय प्रजातंत्र का आदर्श स्वरुप था जो आज़ादी के बाद के सरकार के गठन , विपक्ष की भूमिका और नीतियों के निर्धारण , कार्यान्वन , और नेताओं के सभ्य आचरण के रूप में परिलक्षित हुआ। सरकार में बने रहकर सुविधा और सत्ता के भोगी सांसदों और पार्षदों के आचरण और चरित्र में धीरे – धीरे क्षरण शुरू हो गया। यह आज़ादी के तुरंत बाद स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेनेवाले नेताओं के शीर्ष वर्ग में कम हुआ। किन्तु जैसे ही सत्ता दूसरी पंक्ति के नेताओं के हाथ में पहुँची , जनतांत्रिक मूल्यों का ह्रास तेजी से हुआ। सत्तर के दशक में यह अधिक हुआ। भारत के संविधान का निर्माण भी अमेरिका और इंग्लैंड के संविधान के अंशों को जोड़कर हुआ। यह नीतियों के निर्धारण के लिए तो ठीक – ठाक था,  किन्तु नीतियों का कार्यान्वन जिस नौकरशाही के हाथों था, उसका ढांचा अंग्रेजों के द्वारा उस समय के शासन चलाये जाने के लिए बनाये ढांचे जैसा ही था। यही नौकरशाही नीतियों को कागज़ पर उतारती रही है जिसे जनता के नुमाइंदे थोड़े बहुत फेरबदल के साथ पास करते रहे हैं। इसके लिए संविधान में कहीं भी इसतरह के संसदीय प्रजातंत्र के दोषरहित ढांचे के निर्माण की स्पष्ट रूपरेखा नहीं बन सकी जिससे राज्य सत्ता सर्वोत्तम लोगो के हाथ में रहे और वे लोग उचित नीतियों , कार्यक्रमों एवं योजनाओं के क्रियान्वन और संसाधनो के सम्यक उपयोग करने के नियम बनायें। मानव कल्याण पथ के अविरल अनुसंधान के तरफ दलों और दलीय ढांचे का झुकाव रहे , यह सुनिश्चित कर पाना संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आता है।
      अब मैं इतिहास में विश्व स्तर पर घटित क्रांतियों और उसके परिणामों की चर्चा करता हुआ आज भारत में प्रचलित दलीय प्रजातंत्र के ऊपर प्रकाश डालते हुए इन दिनों के चुनाव की समीक्षा करना चाहूंगा। भारत ने संविधान में समाजवाद की स्थापना को अपना लक्ष्य स्वीकार कियाहै। लेकिन समाजवाद का रास्ता किसी प्रकार भी तानाशाही से होकर नहीं गुजरता है। सामाजिक क्रांति में लोगों की इच्छा क्या है इसका पता क्रांति का नेतृत्व करनेवालों को अवश्य होना चाहिए। जनता की स्वाभाविक प्रवृत्ति सदैव स्वतंत्रता और जनतंत्र के पक्ष में ही होती है। जान बूझकर तानाशाही स्वीकार करने की प्रवृति जनता में हरगिज नहीं होती। सोवियत रूसमें लेनिन और ट्राटस्की के नेतृत्व में जार के शोषणोन्मुख शासन का खात्मा और फिर लेनिन के नेतृत्व में राज्य – केंद्रित समाजवादी शासन व्यवस्था का स्थापित होना उससमय विश्व की एक बहुत बड़ी क्रांतिकारी घटना थी। लेकिन क्या वास्तविक समाजवाद स्थापित हो सका ? क्या वहाँ की जनता के हाथों में सत्ता पहुँची ? क्या वहाँ की जनता को अपने प्रतिनिधि के सीधे चुनाव करने की छूट मिली ? जार का पूंजीवाद तो समाप्त हो गया किन्तु समाजवाद फिर भी दूर रह गया। समाजवाद पूंजीवाद का अभाव मात्र नहीं है। उद्योग, वाणिज्य ,  बैंक , कृषि आदि का राष्ट्रीयकरण और समूहीकरण तो हो गया किन्तु असली समाजवाद फिर भी दूर रह गया। सोवियत रूस में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को जिस तरह राज्य मशीनरी द्वारा सीमित और नियंत्रित किया गया उससे तो लगा कि सामाजिक न्याय और समतामूलक समाज के निर्माण के जिस मूलभूत सिद्धांत पर समाजवाद टिका है उससे ही कहीं और भटक गया। अफसरशाह शासको के एक नए वर्ग का निर्माण, दुष्प्रभाव तथा शोषण के नए अवतार का नया चेहरा भी देखा गया। इसी व्यवस्था से स्टॅलिन जैसे अधिनायक का जन्म हुआ जो समाजवादी खोल में तानाशाहका ही एक नया रूप था। राजनैतिक और आर्थिक सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण और संपूर्ण राज्यवाद ही इस बुराई की जड़ में था। इससे स्पष्ट हो गया कि राज्य वाद सच्चे समाजवाद का विकल्प नहीं हो सकता।
      यूरोप में साम्यवाद असफल हुआ और फेबियन की परिकल्पना के अनुसार लोकतान्त्रिक समाजवाद को भी कोई ख़ास सफलता नहीं मिली। कल्याणकारी राज्य का सिद्धांत समाजवाद का बहुत ही कमजोर स्वरुप सिद्ध हुआ है। सबके सामूहिक पुरुषार्थ से जो अच्छी चीजे उपलब्ध हो उन्हें सबके साथ बांट कर खाने का तरीका समाजवादी जीवन मार्ग है। लेकिन इस प्रक्रिया को अनुशाषित करने के लिए राज्य – सत्ता के द्वारा नियमन जरूरी है। फिर राज्य – सत्ता के नियमन करने वालों को अनुशासित कौन करेगा ? इसी से राज्य – सत्ता के अधिनायकवाद का जन्म होता है। एकदलीय व्यवस्था में यह शोषण के चरम विन्दु तक पहुँच सकता है। भारत ने इसीलिए सोवियत रूस से प्रेरित समाजवादी समाज बनाने का लक्ष्य तो रखा किन्तु उसके लिए बहुदलीय प्रजातंत्र की स्थापना की व्यवस्था की गयी।
     बहुदलीय प्रजातंत्र के कारण एकदल के अधिनायकवादी होने और कार्यपालिका तथा न्यापालिका पर नियंत्रण का खतरा कुछ हद तक टल गया। परन्तु बहुदलीय व्यवस्था में दलीय राजनीति के परंपरागत टकराव और सत्तापर काबिज होने की होड़ ने स्थितियों को और भी जटिल बना दिया। दलीय राजनीति के स्वभावमें ही यह निहित होता है कि सत्ता को येन - केन – प्रकारेण हस्तगत किया जाय। इसके लिए पिछले कई चुनावों से नए – नए हथकंडे अपनाये जाते रहे हैं। उनकी फेहरिश्त बहुत लम्बी है किन्तु कुछेक को उद्धृत करना जरूरी होगा। राष्ट्रीय दलों द्वारा क्षेत्रीय स्तरपर क्षेत्रीय दलों के साथ सिद्धांतविहीन गठबंधन , जनता को धर्मं, जाति,क्षेत्रीयता, प्रांतीयता, भाषा आदि के नाम पर विभिन्न वर्गों में बांटकर और प्रचार – माध्यमों द्वारा अनावश्यक वादों के साथ लगातार प्रचार के द्वारा अधिकमत प्राप्त करने की ललक ने प्रजातंत्र को दलीयतंत्र में तब्दील कर दिया है। इस बार सारे राष्ट्रीय नेता भी अपनी उपलब्धियों को गिनाने से अधिक दूसरों की कमज़ोरियों को गिनाने में ज्यादा वक्त बर्बाद कर रहे हैं। कुछ नेता तो मतदान केंद्र नियंत्रण और बोगस वोटिंग तक की सलाह खुलेआम दे रहे हैं। हालाँकि निर्वाचन आयुक्त को अधिकार है कि ऐसी प्रक्रिया की वकालत करने वाले नेताओं पर सीधे आपराधिक मामलों के अंतर्गत कार्रवाई की जा सके किन्तु फिर भी नेताओं की जुबान कितनी गंदी और नियंत्रणहीन हो गयी है , इससे इसका पता चलता है।
      दलीय राजनीति में चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवारों की खोज में सारेदल रहते हैं। अमुक क्षेत्र में किस जाति, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र वालों का मत है तथा किस उम्मीदवार को खड़ा करने से ऐसे मत प्राप्त किये जा सकते है , इसपर सभी दलों की नज़र रहती है। इन मतों को हासिल करने के लिए ऐसे उम्मीदवार जिनपर आपराधिक मुक़दमा चल रहा है उसे भी उम्मीद वार बनाने में किसी भी दल को कोई परहेज नहीं होता है। 'सत्यमेवजयते' के ३१ मार्च २०१४ के एपिसोड के अनुसार राष्ट्रीय संसद में ३०% और राज्य सभाओं के ३१ % चुने हुए प्रतिनिधि ऐसे हैं जिनकी या तो सजा हो चुकी है या जिनपर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। यदि धीरे – धीरे इनकी संख्या बढती गयी तो कोई आश्चर्य नहीं होगा जब यह कानून ही बन जाये जिसमें नेताओं द्वारा संगीन अपराध करने पर भी कोई नहीं सजा या बिलकुल कम सजा के प्रावधानका बिल पास कर दिया जाय। हम लोगों ने पिछली लोकसभा की कार्यवाही में देखा है कि सारे प्रतिनिधि या पक्ष और विपक्ष दोनों वैसे प्रस्तावों को तुरत पास कर देते हैं जिनमें प्रतिनिधियों के वेतन, पेंसन, या भत्ता आदि बढ़ाने का प्रावधान होता है। इसी दलीय राजनीति से क्षेत्रीय स्तर पर ऐसे दलों या नेताओं का उदय हुआ  है जिन्होंने क्षेत्रीय भावनाएं भड़का कर मत प्राप्त किया और राज्य या केंद्र में कुछ मतों के जोड़ – तोड़ करने में खरीद  - फरोख्त के द्वारा इस या उस दल को सरकार बनाने में समर्थन करने के लिए काफी धनराशि ली। इस धनराशि की व्यवस्था की फंडिंग में कॉर्पोरेट जगत के दिग्गजों का भी परोक्ष हाथ रहा है ताकि बाद में अपने अनुकूल बिल पास करवाकर अधिक मुनाफा कमाने का मार्ग प्रशस्त किया जा सके।
      इसतरह आज का प्रजातंत्र सिर्फ दलीय राजनीती का अखाडा बन कर रह गया है। संसद और राज्य विधान सभा में जिसतरह का आचरण और दृश्य देखने में आ रहे हैं चुनकर आये नुमाइंदों के चरित्र और गुणवत्ता के कारण इससे बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। सिर्फ मतदाताओं द्वारा डाले गए मतों की संख्या के आधार पर सिमटते जनतंत्र में कुल मतदाताओं की संख्या या कुल डाले गए मतों की संख्या का कम प्रतिशत लगभग ३० या ३५ % लाने वाला उम्मीदवार भी विजयी घोषित हो जाता है। इससे तो सबों के मताधिकार का अधिकार भी अवास्तविक और अप्रासंगिक लगने लगता है। दलीय पद्धति लोगो को कायर और दब्बू भी बना रही है। समाज रूपी तालाब में संकीर्ण भावनाओं की जो गन्दगी और बदबू तल में बैठी रहती है चुनाव के समय उम्मीदवार लोग उसमें कंकड़ मार – मार कर ऊपर ले आते हैं ताकि समाज मैं गन्दगी फैले और उससे मतों के विभाजन का फायदा मिले। जो काम अंग्रेजों ने शासन स्थापित करने और चलाने के लिए तथा आज़ादी के समय भारत को विभाजित कर किया वही काम नेता लोग आज़ादी के बाद चुनाव के समय करते हैं। इस तरह से तो दलीय पद्धति द्वारा जनता और भी डरपोक और नपुंसक बनती जा रही है। इस पद्धति ने जनता की शक्ति और अभिक्रम (initiative) को बढ़ाकर स्वराज्य स्थापित करने और अपनी व्यवस्था अपने आप सम्भालने के लिए सशक्त नहीं किया है। वह ऐसा करना चाहती भी नहीं है। दलों को तो सिर्फ इससे मतलब है कि सत्ता उनके हाथ में आये और वे जनता पर राज्य कर सके। इस तरह इस दलीय पद्धति ने लोगों को भेड़ों की स्थति में ला दिया है जिसका अधिकार केवल नियत समय पर गड़ेरियों को चुन लेना है जो उनके कल्याण की चिंता करेंगे। यानि आज का प्रजातंत्र वो व्यवस्था है जिसमें  'बकरे या भेड़ें अपने हिस्से के कसाई को खुद चुनती है। 'इसीलिये तो उम्मीदवार चुनाव जीत जाने के बाद जनता से कह सकता है ' मैं व्यभिचारी , भ्रष्टाचारी , दुराचारी और न जानेक्या – क्या बीमारी हूँ , ऐसा मैंने सुना है, किन्तु क्या करूँ मुझे तो आप ही ने चुना है।' इस दलीय तंत्र में एक ही मूल मंत्र है कि आप अपने मत का उपयोग सावधानी से करें , विवेक से करें। सच पूछिए तो यह ऊपरवाले का चमत्कार ही है कि इस सबके वावजूद भी भारत का अखंड और समरस वज़ूद काफी हद तक बना हुआ है।
      क्या यह स्थिति बदल सकती है? अभी इस चुनाव पद्धति में यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र से कई उम्मेदवार खड़े हो और मतों का विभाजन होता है तो हम देखेंगे कि सबसे अधिक मत पाकर जीतनेवाला उम्मीदवार भी उस क्षेत्र के कुलमतों या कुल डाले गए मतों के २५ या ३० %  पाकर विजयी हो जाता है। यानि जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार भी अल्पमतों से जीतकर आते है और परिणामतः ५०% से काफी कम मत वाली जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। भारत में प्रचलित चुनाव पद्धति में सुधार, जिसमें मतदान करना सबों के लिए अनिवार्य कर दिया जाय, के द्वारा इस समस्या का हल प्राप्त किया जा सकता है। अभी ईवीऍम में नोटा बटन का प्रावधान किया जाना उचित दिशा में उठाया गया कदम है। अगर किसी चुनाव क्षेत्र  में खड़े उम्मीदवारों में मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो नोटा (Non of the above)बटन को दबाया जा सकता है। इस समय मोबाइल करीब- करीब सभी जगह उपलब्ध है। मोबाइल के द्वारा पैसों का भी आदान – प्रदान होने लगा है। मोबाइल के द्वारा ऑनलाइन मतदान की तकनीक का विकास कर चुनाव प्रक्रिया को कम खर्चीला और आसान बनाया जा सकता है। इससे चुनाव प्रक्रिया में सुरक्षा - दल , मतदान करने वाले कर्मचारियों तथा मतदान सामग्री के पहुचाने आदि में होने वाले खर्चे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। दागी उम्मीदवार को किसी भी स्थिति में चुनाव में खड़ा होने से बंचित करने पर उम्मीदवारों की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सबसे अधिक प्रभावोत्पादक वह कदम होगा जिसमें जीते गए उम्मीदवारों को चुनाव के दरम्यान किये गए वादों को पूरा नहीं करने पर उनके कार्य काल पूरा होने से पहले मतदाताओं द्वारा वापस बुलाने का प्रावधान किया जा सके। लेकिन इसके लिए संविधान में संसोधन की जरूरत होगी। यह संसोधन कोई भी दल नहीं लाना चाहेगा। अगर कोई व्यक्ति या दल इसे ले भी आता है तो दूसरे दलों या सांसदों के विरोध के कारण कभी पास नहीं होगा ।
       इस तरह हम देखते हैं कि इस चुनाव पद्धति में सुधार कर दूरगामी परिणाम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कुछ और चिंतन और मंथन किया जाय। क्या दुनिया में अब तक हुई क्रांतियों से इस समस्या का हल निकल सकता है? दुनिया में बड़ी – बड़ी क्रांतियां, इंकलाब हुए हैं। फ्रांसमें, रूसमें, चीन में क्रांतियां हुई। अमेरिका में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संग्राम भी एक क्रांति ही थी। लेकिन उसके बाद क्या हुआ? उस क्रांति का सबसे बड़ा नेता अपने देश के सर्वोच्च सिंहासन पर जा बैठा , उसने सरकार की बागडोर अपने हाथ में ले ली। क्रांति की उद्देश्यपूर्ति, परिवर्तन के लक्ष्य और नए समाज के निर्माण करने के नाम पर सबों ने सत्ताग्रहण की। केवल भारत में गांधीजी ही ऐसे निकले जिन्होंने सत्ता ग्रहण नहीं की। गांधीजी जिन्होंने स्वराज्य प्राप्ति के आंदोलनका नेतृत्व किया , जो सबसे सम्मानित , सर्वसम्मत नेता हो सकते थे , सत्ता से दूर रहे। वे सत्ता में जाकर देश की बागडोर सम्हाल सकते थे। लेकिन उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उनके उद्देश्यों की पूर्ति सत्ता द्वारा नहीं हो सकती थी। जिस कांग्रेस ने आंदोलन चलाकर आज़ादी प्राप्त की थी , जो पूरे देश की आवाज बनी थी , उसी कांग्रेस के लिए गांधीजी ने कहा था कि उसका विसर्जन करो और उसकी जगह उन्हीं लोगों को लेकर 'लोकसेवकसंघ ' बनाओ। गांधीजी के पी.ऐ.प्यारेलालजी द्वारा लिखी गयी पुस्तक 'लास्ट विल एंड टेस्टामेंट ' में इसकी चर्चा की गयी है।
     स्वराज्य के बाद हमारे देश की गाड़ी विपरीत दिशा में कैसे मुड़ गयी , इसके कारण जानने होंगे। भारतीय संविधान बनाने काम मुख्य रूप से देश के सर्वोच्च विधिवेत्ताओं के सिर पर दाल  दिया गया था। नया संविधान बनाने का काम आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वालों के हाथ में होना चाहिए था। शायद सोचा गया कि संविधान बनाना कानून विदों का काम है ताकि प्रावधानों को उचित भाषा और परिभाषा में निबद्ध किया जा सके। पर गांधीजी चाहते थे कि भारतीय राज्य की बुनियाद में ग्राम – स्वराज्य हो। जब संविधान का पूरा मसविदा तैयार हो गया , तब श्री संतानम या श्री टी. प्रकाशम्ने ध्यान आकृष्ट किया कि गांधीजी ने जिस ग्राम – स्वराज्य की कल्पना को स्वराज्य के ढांचे की बुनियाद माना था,  संविधान में तो उसका जिक्र ही नहीं है। जब इसका जिक्र संविधान सभा के अध्यक्ष डाक्टर राजेंद्र प्रसाद से किया गया तो उन्हें धक्का – सा लगा। इस बात को संविधान सभा में विचार के लिए रखा गया तो डाक्टर राव ने कहा कि अब यदि ग्राम – स्वराज्य को बुनियाद बनाकर सुधारने बैठेंगे तो पूरी चुनाव पद्धति सहित सारा स्वरुप बदलना पड़ेगा। नेहरूजी और सरदार पटेल के कानो तक यह बात पहुचाई गयी तो कुछ चर्चाओं के बाद संविधान में एक धारा और जोड़ दी गयी जिसमें राज्यों को यह निर्देश दिया गया कि ' संविधान के मूल मार्गदर्शक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ग्राम – पंचायत को स्वशासन की इकाई माना जाय।'  १९५९ में पंचायती राज का कार्यक्रम लागू किया गया।किन्तु उसके पीछे ग्राम – स्वराज्य की मूल अवधारणा नहीं बल्कि सामुदायिक विकास योजना मद की राशि के आवंटन के लिए गांव के स्तर पर एक सरकारी ढांचा खड़ा करना था। इसीलिये पंचायत आज स्वशासन की इकाई नहीं बल्कि राज्य सरकार की एक इकाई बनकर रह गयी है।
      गांधीजी राज्य – शक्ति के विकल्प के रूप में लोक – शक्ति को खड़ा करना चाहते थे। लोक – शक्ति के उदय के लिए ग्राम – सभाओं और मोहल्ला – सभाओं के गठन और उन्हें ही ऍम एल ये और ऍम पी चुनने का सीधा अधिकार दिया जाना पूर्ण स्वराज्य की ओर सशक्त कदम हो सकता था । आज की दलगत राजनीती और दलतंत्र से मुक्ति का मंत्र भी यह साबित होता। आज के समय में संविधान में इसका प्रावधान करना और उसे विभिन्न दलों के द्वारा चुने हुए नुमाइंदों द्वारा संसद में पास किया जाना असम्भव – सा लगता है। आज की प्रचलित दलीय और सत्ता की राजनीती के अलावा भी जनता के प्रत्यक्ष व्यवहारिक जीवन की असली राजनीती का कितना विशाल क्षेत्र पड़ा है और इसमें कितना अधिक काम करना बाकी है इसे सत्ता की राजनीती में रमे हुए लोगों को समझ नहीं आ सकता । इसे सत्ता की राजनीती में लिप्त लोगों की अपेक्षा टतष्ट लोग ही कर सकते हैं। इसीलि ये ऐसे लोकनीतिमूलक सवालों को जब तक दलीय तथा सत्तामूलक राजनीतिक लाभ की दृष्टि से सोचने के बदले देश – हित की दृष्टि से सोचा जाता , तब तक इनका हल नहीं ढूढ़ा जा सकता। राजनीती का अपना क्षेत्र है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन वही एकमात्र ऐसा क्षेत्र जहाँ सारी समस्याओं का समाधान होगा , ऐसा सोचना भी बिलकुल गलतहै। वास्तव में इस प्रचलित राजनीती के बाहर ही असली राजनीती का विशाल क्षेत्र पड़ा है जिसमें काम करके नयी लोकनीति को विकसित किया जा सकता है। इसीलिये दलगत राजनीती का एकमात्र विकल्प ग्राम – स्वराज्य आधारित लोकनीति ही हो सकती है आज की प्रचलित राजनीती (दलनीति ) नहीं।


----ब्रजेन्द्रनाथमिश्र

श्रीदुर्गासप्तशती का प्रतीकात्मक रहस्य

 #Dasahara #ShriDurgaSaptashati  आपके और आपके समस्त परिवार को विजया दशमी और दशहरा की असीम शुभकामनाएं! 20 अक्टूबर 26: श्री दुर्गा सप्तशती पर ...