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Thursday, January 12, 2017

युवा सोच (लेख)

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#BnmRachnaWorld 
नोटः मेरा यह लेख भोपाल से प्रकाशित "रुबरु दुनिया" में स्थान पाई है।
युवा सोच
युवा कौन है ?

 जिसकी उम्र २० से ३० वर्ष के बीच है या जो कॉलेज से अभी - अभी निकला है या इंजीनियरिंग , मेडिकल , या अन्य कोई प्रोफेशनल कोर्स खत्म करके अभी - अभी निकला है ? क्या वे सब युवा हैं?
उनमें से वही  युवा  है जिसकी  सोच युवा है।  अब इसपर विचार करें कि युवा सोच क़्या है ?
बुढ़ापा अतीत का स्मरण कर जीता है , यूवा अतीत से सीख लेकर वर्तमान मैं जीता हुआ या कहें कि वर्तमान को  जीतता  हुआ भविष्य के सपने बुनता है।
 वर्तमान को जीना और जीतने  में फर्क है। जब युवा अकॅडेमिक्स से बाहर  निकालता है तो अपने को जीवन के पथरीले एवं सख़्त धरातल पर खड़ा पाता  है।  बिनोबा जी ने इसे शैक्षणिक जगत से वास्तविक जगत की हनुमान कूद  कहा  है।  इस हनुमान कूद में अगर ठोस , पथरीले, चट्टानी धरती   पर खड़ा होने और उसके शॉक को अब्सोर्ब करने की क्षमता नहीं हुयी तो वह अपने पाँवों के साथ - साथ जीवन को भी लहू - लुहान कर जाता है। फिर जीवन में एक तरह के नैराश्य का  भाव  उसे पलायनवादी बना देता  है।
क्या किया जाय  जो ऍसी स्थिति में जीवन को पहुँचने  हीं न दे।  इसके लिए  शिक्षण ग्रहण करणे के समय ही आगे आनेवाले जीवन  को जीने के नजरिये का विकाश करना  जरूऱी है। क्या हमारा परिवारिक और सामाजिक  माहौल एवं शिक्षा - पद्धति इस तरह के नजरिये के विकास में सही योगदान करते है?
शिक्षा  प्रदान करने वालों संस्थानो , आस - पास में फैले समाज और मनुष्य जहाँ बचपन से लेकर युवा होने तक जिस परिवार से जुड़ा होता  है उसका माहौल उसके जीवन को भावनात्मक और चारित्रिक दृढ़ता प्रदान करने में सहायक होता है। 
 आजकल की शिक्षण - पद्धति बचपन से लेकर उच्च - शिक्षा प्राप्त करने तक विविध जानकारियों की वर्षा करती  रहती है।  उसमें से कौन  सी जानकारियां ब्यक्तित्व की पूर्णता की ओर ले जाती  है , इसका नीर - क्षीर - पृथक्कीकरण विवेक के विकास के लिये मौलिक शिक्षा उम्र के वयस्कोन्मुख होने के पड़ाव तक अवश्य प्राप्त हो जानी चाहिए। आजकल वयस्क होने से पहले ही बच्चे के पास इतनी जानकारियों के स्त्रोत उपलब्ध  होते है कि उसे पता नहीं होता कि कौन सी जानकारियां हमारे जीवन और चरित्र के विकास में सहायक हो सकती है।
शक्तियों के पुंज को संघनित करने की वजाय उसके  क्षरण के अधिकाधिक साधन उपलब्ध हैं।  किशोर - मन उनके प्रति आकर्षित  हुये बिना नहीं रहता।  अभी के समय में  वेबजाल पर ७५ % से अधिक सेक्स सम्बंधी जानकारियां होती हैं जो किशोर - मन पर विपरीत प्रभाव ही डालती हैं। ऐसी जानकारियों की उपलब्धता को रोक पाना तो बिल्कुल ही मुश्किल है। 
 
क्या किया जा सकता है?
हमारे आसपास या  अतीत में जो उच्च विकसित ब्यक्तित्व, महापुरुष या विषिश्ट कार्य सम्पन्न करने वाले ब्यक्तियों के जीवन वृत्तान्त को बाइ  डिफ़ॉल्ट वेब जाल पर उप्लब्ध कर दिया जाय।  अभी जैसे साइट खुलते ही सनसनी पैदा करनेवाले समाचर उपलब्ध रहते हैं वैसे ही क्या आजकल के रोल मॉडल बनने लायक महापुरषो के ब्यक्तित्व और कर्तृत्व की जानकारी बाई डिफ़ॉल्ट उपलब्ध नहीं कराई जा सख़्ती ? वेबजाल के द्वारा ऐसी जानकारी निश्चित ही किशोर - किशोरियों को आगे के जीवन की तैयारी में अधिक सहयक होंगे।  इससे जो युवा सोच पैदा होगी वह विधेयात्मक चिंतनपरक होगी और उसके प्रभाव भी दूरगामी सुपरिणाम  देने वाला होगा।
  जब हम युवा वर्ग कहते हैं तो सिर्फ़ पढ़े - लिखे  उच्च शिक्षा प्राप्त युवा ही नहीं अर्धशिक्षित और अल्पशिक्षित युवाओँ की ओर भी ध्यान जाता है।  शिक्षा का अधिकार सबो को है।  किसी भी देश या कौम की उन्नति के मानक वहां  के  जन समुदाय में   शिक्षा के प्रसार  पर निर्भर करता है।  मुठी भर लोग अगर ऊंची शिक्षा , ऊंची - ऊंची डिग्रियां प्राप्त कर लें तो पूरा देश  शिक्षित नही कहलाता। देश का जन - मानस अशिक्षा के घोर अंधकार में पड़ा रहे और शिक्षित एवं  सम्पन्न लोगो का एक छोटा सा  वर्ग उनपर शाशन करता रहे , ऎसा नहीं चल सकता।  हाशिये पर रहने वाले लोग जिन्हे मैनेजमेंट गुरु सी के प्रह्लाद ने Bottom of the pyramid (BOP)  नाम दिए है , अगर शिक्षा और साधन से महरुम  रहेँगे तो उन्का असंतोष एक दिन अवश्य फूटेगा और अराजकता की स्थिति पैदा करेगा।  मैंने अपनी एक कविता में शिक्षा के अप्रसार और साधानों के असंतुलित वितरण से पैदा हुयी स्थिति के विरोधभास को चित्रित करते हुये लिखा है ..
चूल्हे जलते नहीं यहाँ किसी भी घर में,
फिर भी बस्ती से उठता हुआ धुआं तो देख।

महलों के कंगूरे गगन को चूमते हैं, मगर
मिलता नहीं यहाँ किसी को आशियाँ तो देख।

ये हरियाली जो इस ओर  दीखती है दूर तलक,
नजरें उठा, उस ओर का फैलता रेगिस्तां तो देख।

फूटपाथ पर सोये  हैं जो लोग सट - सट  कर,
उनके ऊपर का खुला   आशमां  तो देख।

जला चुके थे तुम जिन्हें चुन - चुन कर,
उस राख से उठती हुई चिंगारियाँ तो देख।

अब लाशें भी उठकर खड़ी हो गयी हैं,
हवा में उनकी तनी हुयी मुठियाँ तो देख।

ढूह में बदल जायेंगें महल दर - बदर ,
खँडहर कहेंगे इन सबों की दास्ताँ तो देख।

वे जो सोते हैं भूख से बिलबिलाकर ,
तवारीख के पंख  पर लिखेंगे क्रांतियां तो देख।

आज का युवा क्या इस स्थिति के कायम रहने के कारण उत्पन्न परिस्थिति की भयावहता के परिणामों के प्रति संवेदनशील है? शायद युवा आक्रोश ही है जो विद्रोही बनकर हथियार उठाकर या हथीयार से हल ढूढने वाले लोगो की अगुआई में उसका उत्तर ढूढने निकल पड़ता है . मगर सच  तो यह है की यह उत्तर ढ़ूंढ़ना नही उत्तर निकालने  से भागना है।  इसका मतलब है कि यह अशिक्षा ,  अल्पशिक्षा या गलत शीक्षा  का ही परिणाम  जो युवको को अतिवादी य उग्रवादी बनने की ओर ले जा रहा है।  इस निराशा के वातावरण से कैसे निकला या निकाला  जाय : परिथितियों को दोष देकर या परिस्थितियों में सुधार का प्रयास कर। 
    यह एक कड़वा सच है कि जिन क्षेत्रों में विकास की स्रोतस्विनी धार पहुंचते - पहुंचते सूख गयी है वहीँ  अतिवादी चिन्तन ने अपनी बाहें फैलाई है।   एक सर्वेक्षण से पता चला है ---भारत के मानचित्र को कानपूर से सीधी दक्षिण की तरफ एक सरल रेखा  से विभाजित किया जाय।  उस रेखा के दायें यानि पूर्व में और पूर्व - उत्तर  के क्षेत्र  में विकास कम हुआ है।  यानि कि इनक्षेत्रों में विकास का पहल नहीं हुआ या विकास की धार पहुंचते - पहुंचते सूख गयी।  उन्ही क्षेत्रों  में  अतिवाद  या उग्रवाद ने अपना पैर पसारा है।  छत्तीसगड़  का बस्तर का इलाका , उससे सटा आंध्र प्रदेश या   अभी का नया नाम सीमांध्रा, उड़ीसा का कलाहान्डी , रायगडा , सूना बेडा का क्षेत्र प्रबल रूप में इन गतिविधियों का केंद्र रहा  है।  यहाँ सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा विशेष पहल  की जरूरत  है।  क्या  किया  जाय ? एकतरफ युवा वर्ग केसामने ग्रामौर और विज्ञापनों के द्वारा मार्केटिंग करके ब्यपारियों और कंपनियों द्वारा लुभाये जाने का निरंतर प्रयास चल रहा है , तो दूसरी तरफ समाज और देश की ओर का कर्तब्य कठोर जीवनके तरफ ले जाने का इशारा करता है।  युवा निश्चित ही पहले जीवन के तरफ आसानी से आकर्षित होते हैं।  देश  और समाज की आवश्यकता कहीं पीछे बैकसीट पर है।  निजी जीवन से जुड़ा स्वार्थ सर्वोपरी हो जाता है। 
यह एकसच   है कि जीवन - यापन के लिए कोई ब्यवसाय ,नौकरी अपनाना जरूरी है।  उसके लिए आवश्यक क्षमता अवस्य विकसित करना चाहिए।  खूब अच्छे अविष्कारों और अन्वेषणों के लिए अभिक्रम विकसित करें।  किन्तु अपने पेटेंट को बेचकर ऐसे असंतुलन को पैदा करने में सहायक न बनें जिससे आदमी आदमी का इतना शोषण करे की इन्शानियत ही विलुप्त होने लगे।  जहाँ ऐसा हो रहा है उसका विरोध करे।  यही युवा सोच है।
    हम मनुष्य बनानेवाले धर्म , मनुष्य बनानेवाले सिद्धांत चाहते हैं।  विवेकानंद ने कहा था ,
" आज हमारे देश को जिस चीज की आवश्यकता है, वह है लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्नायु - दुर्दमनीय प्रचंड इक्षाशक्ति जो सृष्टि के गुप्त तथ्यों और रहस्यों को भेद सके और जिस उपाय से भी हो अपने उद्देश्य की पूर्ति में समर्थ हों , फिर चाहे उसके लिए समुद्र तल में क्यों न जाना पड़े - साक्षात मृत्यु का सामना क्यों न करना पड़े।  मनुष्य बनानेवाली शिक्षा से ही ऐसा हो सकता है।"  
   मनुष्य बनाने वाली इच्छा शक्ति  के लिए एकाग्रता की शक्ति के द्वारा विचारों को पूंजीभूत  कर   स्पष्ट दिशा में लगाना जरूरी है।  इससे जो ज्ञान का अभ्युदय होता है उससे गहनतम रहस्यों तक पहुंचा जा सकता है।  एकाग्रता के लिए ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है।  यह काम शक्ति को आध्यात्मिक शक्ति में परिणत करके ही सम्भव है।  यह ह्य्पोक्रैसी नहीं है, यह मनीषियों के इन्टुशन  द्वारा सिद्ध  किया जा चुका है। आँखे खुली रखे , दृष्टी साफ़ हो तभी अध्यात्म प्रकट हो सकता है ---
एक छोटी सी कहानी है:
 एक बार एक स्वामी जी  अपने कुछ नए शिष्यों को ध्यान के बारे में बताते हुए कह रहे थे , " आप पद्मशन में बैठ जायँ , गर्दन सीधी हो , मेरुदण्ड सीधा हो , आप अपनी दृष्टि नासाग्रे पर टीकाएँ यानि नाक के अग्र भाग को देखें "
इसपर एक शिष्य ने कौतूहलवश पूछा ," स्वामी जी नासाग्र को आँखें बंद कर देखे या खोलकर ?"
इसपर सारे शिष्य हंस पड़े।  तो हमारी दृष्टि भी कहीं ऑंखें बंदकर या खोलकर देखने के संकल्प - विकल्प में तो नहीं झूल रही हैं।  इसपर विचार करना होगा।  तो मेरे युवा मित्रों युवा सोच आध्यात्म चिंतन के बिना उद्भूत हो ही नहीं सकता।
    मैं यहाँ जे पी (जयप्रकाश नारायण ) की पुस्तक "मेरी विचार यात्रा " से कुछ पंकियों को उद्धृत करना चाहता हूँ :
"इस देश का अध्यात्म बूढ़ों की वस्तु नहीं,  जवानों की वस्तु रही है। जब हृषिकेश ने जीवन के कुरुक्षेत्र में अपूर्व अध्यात्म का पाञ्चजन्य फूंका था , तब वह वृद्ध नहीं , युवा थे और वह थे सारथी भारत के उत्कृष्ट तरुणाई के रथ के।  जब अपनी प्रिया के गोद में नवजात राहुल को सोया हुआ छोड़कर सिद्धार्थ अपनी अद्वितीय सांस्कृतिक क्रांति के पथ पर चल पड़े थे , तो वह वृद्ध नहीं , युवा थे।   अद्वैत के अनन्यतम शोधक शंकराचार्य ने जब अपनी दिग्विजय यात्रा की थी , तब वह वृद्ध नहीं , युवा थे।  विवेकानंद ने शिकागो के रंगमंच पर जब वेदान्त के सार्वभौम धर्म का उद्घोष किया था , तब वे वृद्ध नहीं , युवा थे।  गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दावानल में कूदकर जब अध्यात्म का आग्नेय प्रयोग किया था , तब वे वृद्ध नहीं , युवा थे।  अध्यात्म बुढ़ापे की बुढ़भश नहीं है, तरुणाई की उत्तुङ्गतम् उड़ान है।"
       इसलिए  यह देश  जिस अभिनव सांस्कृतिक क्रांति के द्वार   पर खड़ा है उसके सैनिक और सेनापति तरुण ही हो सकते है।  इसलिए मेरे तरुण मित्रों , अपने में विश्वास जगाओ , उठो और सोच को बदलो।  आसपास में विधेयात्मक चिंतन का प्रसार करो, स्थितियों से समझौता  नहीं , उन्हें बदलने का संकल्प लो।  अपने अंदर की आग को बुझने मत दो। 
दिनकर की पक्तियां थोड़े परिवर्तन के साथ :
  तूने दिया जगत को जीवन , जग तुम्हें क्या देगा ,
अपनी आग जगाने को नाम तुम्हारा लेगा।
     उठो और इस घोर अन्धकार में प्रकाश का पुंज बनो।  चारो तरफ रौशनी - ही - रौशनी हो। स्वार्थ के ऊपर उठकर विभेद की नीति का भेदन करो , नयी इबारत लिखो , जमाना तुझे याद करेगा . यही  युवा  सोच  है।

---ब्रजेंद्र नाथ मिश्र,
   जमशेदपुर

Tuesday, January 3, 2017

नए वर्ष का करें अभिनन्दन (कविता)

#bnmpoems
इस वर्ष यानि 2017 के आगमन के पूर्व संध्या पर मैं हैदराबाद के katriya होटल में था। उसी समय मैं होटल के Jioनेट से किसी तरह इस कविता को FB पर पोस्ट कर पाया। लोगों ने इसे काफी सराहा। आपको अच्छा लगे तो अपना मन्तब्य अवश्य दे और इसे शेयर भी करें।

नव वर्ष 2017 के आगमन पर लिखी गयी मेरी ताज़ी कविता...

नए जोश से ओतप्रोत रहे हमारा जीवन,
नए उल्लास से नए वर्ष का करें अभिनन्दन!

कुछ ख़ास मंज़िलें, कुछ ख़ास रास्ते,
कुछ खास कर सकें आप इस जहाँ के वास्ते।
नए मुकाम पर, नए साल का करें  वरण।
नए उल्लास से नए वर्ष का करें अभिनन्दन।

जीत अगर सको, तो जीतो दुःख को।
मिटा अगर सके तो, मिटाओ भूख को।
नए वर्ष में उत्कर्ष के तय करें नये चरण।
नए उल्लास से नए वर्ष का करें अभिनन्दन।

हम मना रहे यहां पर  नव  वर्ष की  खुशियां
 और सीमा पर सेनानी झेल रहा है गोलियां
संगीनों के साए में जो तपा रहे तन मन
उनके लिए भी नए वर्ष का करें अभिनन्दन।

देश लगा है कतार में, बदलाव की है ये दस्तक।
भ्रष्टाचार पर है आघात, अर्थ क्रांति के लिए सजग।
जयजयकार नहीं हम करते, हम इसे करें नमन।
नए उल्लास से नए वर्ष का करें अभिनन्दन।

स्वच्छ हो देश, शुचिता ब्याप्त हो अंदर बाहर
क्लेश, द्वेष मिट जाएँ, स्नेह सिंचन हो आठों प्रहर।
चमन रहे महफूज हमेशा, गूंजता रहे  अज़ान भजन
नए उल्लास से नए वर्ष का करें  अभिनन्दन।
--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 तिथि : 31-12-2016.
 संप्रति : हैदराबाद में।

Saturday, December 17, 2016

राजनीतिक भ्रष्टाचार, एक ज्वलंत प्रश्न

#bnmarticles

ता: 17-12-2016
राजनीतिक भ्रष्टाचार, एक ज्वलंत प्रश्न
एक ज्वलंत प्रश्न अभी सामने आया है जो पूरे जनमानस को उद्वेलित कर रहा है। यह प्रश्न भारत के सारे सियासी पार्टियों के द्वारा चंदे और अन्य श्रोतों से उगाहे गए धन से सम्बंधित है।
अभी के IT नियमों के तहत कोई भी सियासी दल
₹20000 तक का चंदे की राशि नकद रूप में बिना श्रोत की घोषणा किये ले सकता है। इससे सियासी पार्टियां अकूत धन इकठ्ठा करने में सफल हो जाती है। इस राशि का मनमाने ढंग से चुनावों में खर्च किया जाता है, जिसका सीधा असर काले धन के संग्रह और विस्तार के रूप में होता रहा है। अभी की एक घोषणा के अनुसार सियासी पार्टियां पुराने नोट जमा करा सकती हैं, जिसके श्रोत के बारे में बताने और जताने की जरूरत नहीं है। जिसपर किसी भी दल ने आम सभा नहीं की और न ही भारत बंद का आह्वान किया। यानि सभी दलों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहमति है।
जनता के लिए अलग नियम और राजनीतिक दलों के लिए अलग नियम, यह दुहरा मापदंड नहीं चल सकता। यह सत्ता पक्ष के हित में होगा, अगर वे जल्दी से जल्दी सियासी दलों के चंदा उगाही कानून में आमूल सुधार की घोषणा करें, अन्यथा इतना क्रांतिकारी कदम लेने के बावजूद भी वे चुनाव में हो रहे घोटालों के द्वेष से अपने को मुक्त नहीं के पाएंगें।
आगे का कदम और रास्ता सता पक्ष के लिए दुधारी तलवार पर चलने जैसा है। क्या वह चुनाव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए 8 नवम्बर को नोटबंदी की अचानक की गई घोषणा की तरह ही किसी क्रांतिकारी, आमूल परिवर्तन लाने वाले सधे कदम की तत्काल प्रभाव से कोई निर्णय लेने का उदहारण पेश कर सकते है? यह प्रश्न आमजन को उद्वेलित कर रहा है, झकझोर रहा है।
मैंने केंद्र में बीजेपी की सरकार आने पर एक लेख लिखा था, जो जागरण जंक्शन.कॉम पर दी गयी थी। साथ ही यह उससमय भोपाल से प्रकाशित पत्रिका, "रूबरू दुनिया" में भी प्रकाशित हुई थी।
मैंने उसमे चुनाव सुधारों के बारे में क्या लिखा

चुनावों का शुद्धिकरण:
चुनाव  भारतीय  राजनीति  और  संसदीय  लोकतंत्र  का  वो  पर्व  है  जो  सांसद   जो  संसद  के  मंदिर  तक  पहुँचने    का  अवसर  प्रदान  करता  है ।  वहां  हत्या,  बलात्कार ,  डकैती ,  चोरी  आदि अपराधों  के  नामजद  या  सजाभोगी  ब्यक्ति  नहीं  पहुंचे ,  इसके  लिए  सभी  दलों  को  मिलकर  कठोर  कदम  उठाने  की  जरूरत  है ।  अबतक  सारे  दल  इसपर  सिद्धांततः  सहमत  होते  देखे  गए हैं ।   लेकिन  संसद  और  बिधान सभाएं  अभी  भी  ऐसे  लोगों  के  पहुँचने  का  स्थान   बना   हुआ  है ,  क्योंकि  सारे  दल  इसतरह  के  प्रत्याशी  खड़े  करते  रहे  हैं ।     इसके  लिए  कठोर  कानून  बनाये  जाने की  जरूरत  है ।  अगर  संविधान  में  संशोधन  की  जरूरत  है  या  अध्यादेश  के  द्वारा  कोई कानून  पास  कराया  जाना  है ,  तो  वह  कार्य  शीघ्र  होना  चाहिए ।  संसदीय  लोकतंत्र  चुनाव  के बाद  भी  जनता  की  भागीदारी  में  चले ,  इसका  प्रयास  होना  चाहिए ।  सांसदों  को  अपने  क्षेत्र  के विकास  के  लिए  एक  पूरी  रूपरेखा  देने  को  कहा  जाना  चाहिए ।  संसदीय  क्षेत्र  विकास  कार्यक्रम  के तहत  दिए  गए  राशि  का  समुचित  उपयोग  हो ,  इसके  लिए  कठोर  कदम  और  सटीक  ऑडिट भी  होना  चाहिए ।  नॉन  परफार्मिंग  नुमाईंदों  को  जनता  कैसे  वापस  बुला  सकती  है ,  इसके  लिए  बैठकर  चुनाव - प्रक्रिया  शुद्धीकरण  के  बिन्दुओं  पर  विचार  होना   चाहिए ।  बी जे पी  इसे  कर  सकती  है  क्योंकि  उसके  पास  पर्याप्त  बहुमत  है ।  इसके  लिए  इक्षा  शक्ति  को  एकत्र  करना  होगा  और  उसतरफ  सधे  कदमों  से  बढ़ना  होगा ।

Monday, November 21, 2016

आतंरिक सशक्तिकरण के लिए नुकीला निर्णय(लेख)



21-11-2016...
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आतंरिक सशक्तिकरण के लिए नुकीला निर्णय
मैंने अभी से एक घंटे पहले, जब दिन में दोपहर बाद औंघी, जिसे आफ्टरनून नैप कहा जाता है, सी लगी, तो मैंने एक ख्वाब देखा। उसे मैं हू - ब - हू दे रहा हूँ। कुछ शब्द छूट भले ही जाँय, अधिक एक भी नहीं हैं।
मैं कोर्ट के एक जज से अपॉइंटमेंट लेता हूँ। उनसे मैं उनके चैम्बर में मिल रहा हूँ। वे सामने बैठे हैं।
उनकी प्रश्नवाचक दृष्टि मेरे ऊपर पड़ती है, शायद वे जानना चाह रहे हैं, " क्या वे मुझे पहले से जानते हैं? या क्या काम से आये हैं?"
मैं, इन सारे प्रश्नों पर पूर्णविराम लगाते हुए उनसे बाते करना शुरू करता हूँ, " मैं आपको सीधे तौर पर नहीं जानता हूँ। और न मैं किसी काम को लेकर आपसे मिलने आया हूँ। मेरे भगिना नरेंद्र ने कहा था कि आप उसके स्कूल के दोस्त रह चुके हैं।"
वे याद करने की कोशिश करने लगे, "शायद, स्कूल में हमलोग साथ पढ़े हों।" वे अतीत में खोकर याद करने के यत्न में लग गए, कि मुझे लगा कि अब वातावरण थोड़ा अनौपचारिक हो गया है, तो कुछ ज्वलंत प्रश्न पर चर्चा की जा सकती है।
मैं, "आप तो जज हैं। आप का मन भी इस प्रश्नों से उद्वेलित होता होगा। आज देश किस सबसे  बड़ी समस्या से जूझ रहा है?"
"कोई एक हो तो बताऊँ। कहाँ से शुरू करूँ?"
"जहाँ से आपको उचित लगे शुरू कीजिए।"
"मेरी समझ में देश का प्रजातंत्र ही देश की सबसे बड़ी समस्या है?"
"वह कैसे?"
"प्रजातंत्र में कानून बनाने का अधिकार लेजिस्लेटिव को है। लेजिस्लेटिव यानि विधायिका, यानि स्टेट सब्जेक्ट्स पर स्टेट असेम्बली और केंद्रीय विषयों पर सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली या लोकसभा और राज्य सभा। उन जगहों पर कौन बैठे हैं? या कौन जाते हैं?"
मैं चुप ही रहा।
"नेता जाते है, सर। आप जनता हैं, साफ़ - साफ़ क्यों नहीं स्वीकार करते?"
"मैं जज हूँ। मेरे सिलेक्शन की एक प्रक्रिया है, जिससे हमें गुजरना पड़ा है, तब मैं जाकर चयनित हुआ हूँ और यहां इस जगह पर हूँ।"
"हाँ, तो इससे legislative को आप कैसे कनेक्ट कर रहे हैं?"
"सर, आप जनता हैं। आपको यह नहीं समझने दिया गया है। हमें उस क़ानून को पालन करने या करवाने के लिए नियुक्त किया गया है, जिस कानून को बनाने वालों के लिए कोई विशेष पढाई, लिखाई, या ज्ञान की जरूरत नहीं है। और न ही विशेष ब्यक्तित्व या चरित्र की जरूरत है।"
मैं, "इसलिए विधायिकाओं में एक तिहाई से अधिक जगहों पर अपराधियों ने कब्ज़ा कर लिया है, एक तिहाई पर स्थापित नेताओं के परिवार वाले।"
"बिलकुल सही। और चुनाव में धन की जरूरत होती है, इसलिए बाकी की जगहों पर धनपतियों का प्रभाव है। ऐसे में क़ानून किसके लिए बनेंगें? जनता के लिए या उनके लिए जो क़ानून बनानेवाले है।"
मैं, "तो क्या आप भी मानते है कि चुनावों में खड़ा होने वाले प्रतिनिधियों को एक मिनिमम प्रशिक्षण से होकर गुजरना जरूरी होना चाहिए, जहां उन्हें संविधान, लोकल सेल्फ गोवर्नमेंट, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन आदि के बारे में ज्ञान दिया जाय।"
"यह तो तत्काल प्रभाव से जरूरी है, तभी हमलोग प्रजातंत्र के इस स्वरुप को झेलते हुए देश को बचाये रख सकेंगे।"
मैं तन्द्रा से जाग गया था।
मेरे मन में कई तूफ़ान उठ रहे थे। मुझे रतन टाटा के जीवन की वह कहानी याद आ रही थी, जब उन्होंने26/11, मुम्बई की घटना के बाद ताज होटल के पुनरुद्धार के लिए आमंत्रित निविदाओं में पाकिस्तान के दो ब्यावसायियों के टेंडर इसलिए अमान्य कर दिए थे, क्योंकि वे पकिस्तान के थे। यह उन्होंने दिल्ली के एक मंत्री के दबाव देने के बावजूद यह कहकर अमान्य किया था, "आप इस हद तक निर्लज़्ज़ हो सकते है , मैं नहीं।"
देश के परवर्ती, ऊँचे स्थान पर बैठा नेता जब देश की कीमत पर कोई भी ऐसा समझौता करने को तैयार हो , तो हम कोई हंगामा नहीं करते। परंतु देश की आंतरिक स्थिति को मजबूत करने के लिए आज अगर कोई सशक्त और दुश्मनों के लिए नुकीला, चुभने वाला निर्णय लिया गया हो, तो कुछ लोग तिलमिला क्यों रहे हैं? अगर ऐसे शलाका पुरुष से  हम देश को बचाने की उम्मीद लगा बैठे हैं, तो उसके ऐसे निर्णय के लिये उसे साधुवाद भी नहीं दे सकते क्या?
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--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 तिथि :  22-11-2016.
 ह

Friday, October 7, 2016

मानव कौल द्वारा लिखी कहानी संवृह "ठीक तुम्हारे पीछे" की समीक्षा

मानव कौल लिखी और हिन्द युग्म से प्रकाशित कहानी संग्रह "ठीक तुम्हारे पीछे" की अंतिम कहानी को छोड़कर सारी कहानियां अभी ख़त्म की हैं। मानव कौल कहानियां नहीं लिखते है, वे शब्दों और वाक्यों के रंगों से पन्नों पर एक मॉडर्न पेंटिंग बनाते हैं। इस पेंटिंग में शुरू में आप को रंगों के छींटें यहां - वहां बिखरे लगते हैं। जैसे - जैसे आप आगे बढ़ते है, थोड़ी तश्वीर उभरनी शुरू होती है। ये तश्वीरें कैनवास पर अपना रूप बदलती हैं। और कहानी के अंततक पहुंचते - पहुंचते पूरे कैनवास पर छा जाती है। कभी आपको सबकुछ स्पष्ट और आवरणविहीन होता हुआ दीखता है तो कभी - कभी आपको स्पष्टता खोजनी पड़ती है। इसे आप अपने करीब कहीं घटित हुआ पाते है, या घटित हुआ होने की संभावना ढूढने लगते हैं। तभी आपको लगता है कि ये ठीक हमारे पीछे ही घट रहा है, घट चूका है या घटने वाला है।
अगर किसी कहानी में शुरू में स्पष्ट दृश्य नज़र आ रहे हो तो निश्चित मानिये अंत आते - आते आप उलझ जायेंगें और आपको अर्थ खोजने के लिए छोड़ दिया जाएगा , अकेला ही।
आप सोच रहे होंगे  कहानियों के बारे में लिखते हुए कहीं मैं खुद ही कहानियां तो रचने नहीं लग गया। नहीं , ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरे यह सब लिखने का एक ही अभिप्राय है कि इन कहानियों को पढ़ना शुरू करने के पहले आपका भी एक स्तर होना चाहिए जो कहानियों के स्तर तक पहुंचकर उसे महसूस कर सके। टाइम पास के लिए पढी जाने वाली कहानियां नहीं है ये। कहानियां ख़त्म होते - होते आपको कुछ सोचने पर मजबूर करती है। अगर बिना कुछ सोचे आप दूसरी कहानी पर शिफ्ट कर जाते हैं, तो आप कहानियों के उद्देश्य को पूरा नहीं करके खुद ही कहीं भटक जा रहे है और इसीलिये आपकी टिप्पणी होगी कि ये कहानियां भटका देती हैं। यह टिप्पणी बिलकुल सतही और भ्रम पैदा करने वाली है। सारे पात्र जैसे जीवन, अंतिमा, मुमताज़ भाई, लकी , सिमोन, कमल  हमारे आपके इर्दगिर्द से लिए गए है। इन्हीं पात्रों की कूचियों से जिंदगी के कई रंग मानव जी ने गढ़े हैं जो बेहद सजीले है।
--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 6-10-2016.

श्रीदुर्गासप्तशती का प्रतीकात्मक रहस्य

 #Dasahara #ShriDurgaSaptashati  आपके और आपके समस्त परिवार को विजया दशमी और दशहरा की असीम शुभकामनाएं! 20 अक्टूबर 26: श्री दुर्गा सप्तशती पर ...