Followers

Saturday, April 14, 2018

पूर्वाग्रह(कविता)

#BnmRachnaWorld
#poem#social

ओपन बुक्स ऑनलाइन साहित्य मर्मज्ञों के द्वारा संचालित एक वेबसाइट है। इसी में इसके ओ बी ओ लाइव उत्सव 90 में  "पूर्वाग्रह" शब्द पर रचनाएँ आमंत्रित की गयी थीं। रचना डालने की समय सीमा थी, 13 से 14 2018 अप्रील तक। मेरी यह रचना काफी चर्चित रही और सराही भी गयी। उस साइट पर सभी रचनाओं का संकलन जारी है।
अगर आपको तुकान्त आधुनिक  के रूप में लिखी गयी यह कविता अच्छी लगती है तो इसे पढें, अपने कमेन्ट दें और शेयर करें:



पूर्वाग्रह

--------------
बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है-

सजाये हुये घर को यूं ना बर्बाद करो।
बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

एक महल जो दे रहा चुनौती
उंचे गगन में सिर उठाये तना है।
उसकी नीवं में पलीता लगाओ मत
कितनों की पसीने की बूंद से बना है।
उसको हवाले मत करो आग के,
जलाना आसान है, बुझाना कठिन है।

सम्बन्धों की सेज पर खुशबुओं को
सुगन्ध भरे फूलों से खूब महकाना है।
पूर्वाग्रहो के हर्फों से उकेरी गयी चादर को
सरहद के पार कहीं दूर फेंक आना है।
रिश्तों की डोर को, हवाले मत करो गांठ के
कि तोड़ना आसान है, जोड़ना कठिन है।

पेड़ की डालों को ऐसे झुकाओ मत
फलों से लदे हैं, सुस्वाद से सराबोर हैं।
लचक गयी डाल तो फल टपक जायेंगे
बांटते हैं स्नेह और ममता पोर पोर हैं।
जड़ों को सींचना कभी ना छोड़ना
सोखना आसान है, सींचना कठिन है।

वातावरण में ब्याप्त हो रहा कोलाहल है,
विष वमन हो रहा, फैल रहा हलाहल है।
क्या हो गया है, हर ओर क्यों शोर है?
कोई तो हो, जो सोचे, क्या फलाफल है?
इस यज्ञ में, दें अपनी आहुति, मिट जाएं,
अब मिटना आसान है, जीना कठिन है।

सजाये हुए घर को यूं ना बिखराओ
कि बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

c@ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र
ता: 12/04/2018, बैशाख कृृष्ण एकादशी
वैशाली सेक्टर 4, दिल्ली एन सी आर।



Monday, February 19, 2018

फागुन अब आ गईल (भोजपुरी कविता)

#poetry#bhojpuri
#BnmRachnaWorld

फागुन अब आ गईल
---------------------------

अरगनी पर धूप अँटक गईल
पछुआ चलत-चलत बौरा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

गेंदा पीअर पीअर फुला गईल,
पलाश के टेसू रन्ग छा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

कोयल अमवां के बगिया में,
कुहू -कुहू के शोर मचा गईल।
लगताs कि फागुन अब आ गईल।

कंत जबसे गईले परदेस में,
मन के झरोखा में याद के हवा
झरझरा गईल।
लगताs कि फागुन अब आ गईल।

इनार पर पनिहारिन के बतिया में,
ननदी के ठिठोली भौजी के भा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

कबूतर अब पंतियो पहुन्चावत नईखे,
एतने में कौआ मुंडेर पर आ गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

का का कहीं ई मौसम के बतियां,
मर्मज्ञ के कलम में इन्दृधनुश के रंग छा गईल।
लगताs की फागुन अब आ गईल।

--मर्मज्ञ

यही कविता मैंने 18 फरवरी 2018 को सिंहभूम भोजपुरी परिषद के वनभोज सह कवि सम्मेलन में स्वर्णरेखा नदी के तट पर स्थित गाँधीघाट पर सुनायी थी। इसका मेरा YouTube वीडियो लिंक इसप्रकार है। मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net को सब्सक्राइब करें, लाइक करे और शेयर भी करें:
लिंक: https://youtu.be/9HrklUInTh0
ब्रजेंद्रनाथ





Thursday, January 25, 2018

इस गण तन्त्र सुलगता सवाल (कविता)

#poem#patriotic
#BnmRachnaWorld





इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।


सांसदों का टास्क था,
बनायेन्गें एक आदर्श ग्राम।
जहाँ होगी स्वच्छता, सम्पन्नता,
मिट जायेगी गरीबी तमाम।
आज तो उसकी ना कोई पड़ताल है।
इस गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

आज भी बन रही, सड़कें कई नई
विद्यालयों में बन रहीं नई दीवारे हैं।
एक वर्ष बीतते-बीतते ही उनमें
क्यों दिख रहीं तिरछी दरारें हैं?

सांसदों के मद की राशि-भत्ता बढता रहे,
वे ही होते रहें निरन्तर मालामाल हैं।
इस गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

गलियों में, सडकों पर,
सरकारी जमीनों पर।
दबन्गों का कब्जा है।
हरतरफ मज़ा ही मज़ा है।

फिर भी सब कह रहे
अच्छा है, ठीक हाल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।

नोटबन्दी के समय लगी कतार में,
दिखा नहीं कोई भी नेता।
कोई भी उद्योगपति, ब्यवसायी
या कोई भी सेलिब्रिटी अभिनेता।

जनता तो बनी है, उठाने को परेशानी
नेताजी आराम में हैं, देश खुशहाल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।

आज भी कुछ बच्चे हैं
बीन रहे क्यों कचरे हैं?
कचरा का कैसे हो प्रबन्धन
चल रहा है, चिन्तन-मनन।

फिर भी नहीं समाधान मिल रहा
लोग कहते है, समस्या विकराल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।


जी एस टी गर समाधान है,
तो ब्यापारी क्यों परेशान हैं?
ग्राहक के पॉकेट में सेंध लगी
कीमतो पर क्यों नहीं लगाम है?

आम उपयोग की चीजो के
मूल्य में फिर क्यों इतना उछाल है?
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

संसद, विधान सभाओं में
लोकनीति कहीं पिस रही।
भाई-भतीजों और दागी हैं नेता,
भ्रष्टनीति हर तरफ बिहंस रही।

भ्रष्टाचार मुक्त भारत होगा कब?
इसी सवाल पर मच रहा बवाल है।
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

काला धन कहाँ था?
आया अभी क्यों नहीं?
जनता बाट जोह रही,
बुरे दिन फिरेन्गें कभी?

इन सभी मुद्दों पर जरूरी पड़ताल है।
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

जनसंख्या नियन्त्रण जरूरी है,
देशहित के लिये यह सर्वोपरी है।
तो सरकार क्यों मौन है?
उसे रोक रहा कौन है?

लागू हो सख्ती से राष्ट्र नीति
चुप हो जाएं जो भी वाचाल हैं।
इस गणतन्त्र ये जलता मशाल है।
हल हो जाएं ये सारे सवाल है।
अगला गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।
अगला गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

हर मनुष्य का जीवन स्तर
क्यों नही समान है?
क्यों है इतना कोलाहल
क्यों मच रहा घमासान है?
आओ सुलझाएं ये सारे जलते प्रश्न
सोचें हर नागरिक, तो मिट जाये मलाल है।
अगला गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

तिथि: 25-01-2018
वैशाली, ग़ज़ियाबाद!

इसी कविता के कुछ छंदों के साथ, कुछ नए छंदों को जोड़कर मैंने गणतंत्र दिवस 2019 की पूर्व संध्या पर स्थानीय तुलसी भवन में सिंहभूम हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में आयोजित "काव्य कलश" कार्यक्रम में सुनायी थी, जिसका YouTube वीडियो लिंक इसप्रकार है। आप मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net को सब्सक्राइब करें,  लाइक करें, साझा करें और अपने कम्मेंट भी अवश्य दें।
Link: https://youtu.be/G9QMX1YmIII
ब्रजेंद्रनाथ























Sunday, January 21, 2018

बसन्त-सा मौन (कविता)

#poems#nature
#BnmRachnaWorld




बसन्त-सा मौन, जीवन जिनका सेवा-व्रत है

आज की इस बसन्त पंचमी में, जिस दिन महाप्राण निराला जी का जन्म दिन है, शृंगार, सेवा और शौर्य के मिले जुले रंगों में शब्दों को रंगकर इस कविता का सृजन किया गया है। आप सबों के स्नेह और आशीर्वचन दोनों की अपेक्षा है। सादर!


वे बसन्त - सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है!

वृन्तों पर फूलों का उत्सव,
धरती पहने साड़ी धानी ।
आम्र-पत्र ढँके मन्जरियों से,
भौरें गुन्जाये प्रेम-कहानी।

प्रकृति दे रही है वरदान
कण-कण पसर रहा अमृत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा - व्रत है।

पीली सरसों की क्यारियों से,
झांक रहा, कौन रन्ग बन।
गेंदे के फूलों में विहन्सता,
बरस रहा जीवन-तरंग बन।

धरती जिसका बनी बिछौना,
विस्तार यह सम्पूर्ण जगत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

कोयल बाग में कूक रही है,
गून्ज रही है ध्वनि दिगंत में।
जगा रही वह हूक हृदय में,
कंत दूर हैंं, इस बसन्त में।

अपने स्वभाव में मस्त मगन
अपनापन लुटा रहे सर्वत्र हैं।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

जो जूझ रहे दुश्मन से
सीमा पर सीना ताने।
उनका हर मौसम बसंत है,
वे रण-चंडी के दीवाने।

मौत से टकराने वालों के,
भाल सजा चन्दन, अक्षत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

राजनीति में देशनीति हो
आओ लें हम आज सपथ।
देश मान ना झूकने देंगें,
भले सजा हो अग्निपथ।

परमार्थ में जीवन अर्पण
स्वयं से उँचा ये जनमत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

ता: 22-01-2018
बसन्त पंचमी
स्थान: वैशाली, गाज़ियाबाद

यही कविता मैंने 2019 में वसंत ऋतु के आगमन पर आप अपनी आवाज में रिकॉर्ड कर अपने YouTube चैनल marmagya net के इस लिंक पर डाली है। आप मेरे यूट्यूब चैनल।marmagya net को सब्सक्राइब करें, लाइक करें, साझा करें और कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य दें। आपके विचार मेरे लिए अमूल्य हैं।
Link: https://youtu.be/r1zLRcNpq8U

ब्रजेंद्रनाथ

माँ के सपूत (कविता)

#poem#patriotic
#BnmRachnaWorld

माँ के सपूत

भूल गए हम सारी रस्में,
चरखा, तकली चलाने की।
बंदूकों को सिरहाने रख,
और तलवार गलाने की।

काल नाचता यहाँ - वहाँ,
और भैरव तांडव करता है।
सीमा पर जब   सेनानी,
गोली खाकर मरता है।

रणभैरवी रणचंडी,
नर्तन करती यहां - वहाँ।
लाशें बिछा दूँ दुश्मन की,
शपथ तेरे चरणों की माँ।

वार किया तुमने पीछे से,
हिम्मत है तो सीधे लड़।
कायर तेरे माँ ने तुझको,
मानव बनाया या विषधर।

सात को मारा है तुमने,
सत लाख लाशें बिछा दूंगा।
सीमा रेखा बदलेगी,
नई रेखा खींचा दूंगा।

बहुत हो चुका मान-मनौअल,
अब वार्ता नहीं रण होगा।
आर-पार के इस समर में,
विकट आयुधों का वर्षण होगा।

बीत चुका वो युग जिसमें,
कपोत उड़ाए जाते थे।
तलवारें तो चमकेंगी अब,
कभी शान्ति गीत हम गाते थे।

हाथ मिलाना छोड़ चुके हम,
कफ़न बाँध कर निकले हैं।
धूल चटाया नहीं तुझे तो,
माँ के सपूत नहीं सच्चे हैं।

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर
  तिथि : 07-01-2016

नोट: यह कविता मैने पिछले वर्ष (2016 ) उरी में सेना की छावनी पर सोते हुए सैनिकों पर  पाकिस्तान के द्वारा भेजे गये आतंकियों द्वारा जब छुपकर वार किया गया था, उसी के बाद लिखी थी।

Thursday, January 18, 2018

वृहत सुख की हो चाह (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poem#motivational



ओ बी ओ (open books online) साहित्य मर्मज्ञों द्वारा संचालित अन्तरजाल है, जो हर महीने ऑन लाईन उत्सव आयोजित कर्ता है। इस बार यह उत्सव 12-13 जनवरी 2018 को आयोजित किया गया था।
यद्यपि उससमय मैं दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेले में अपने "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" नाम से लिखे उपन्यास के लोकार्पण की तैयारी में ब्यस्त था, तथापि मैने प्रदत्त विषय "सुख" पर अपनी तुकान्त कविता पोस्ट की थी। मैं विवेचना में भाग नहीं ले सका, इसका मुझे अफसोस रहेगा।
ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
विषय - "सुख"
आयोजन की अवधि- 12 जनवरी 2018, दिन शुक्रवार से 13 जनवरी 2018दिन शनिवार की समाप्ति तक
(यानि, आयोजन की कुल अवधि दो दिन)
वृहत सुख की हो चाह

वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

उलझा रहता है मानव - मन
कितने झन्झावातों में।
सुलझा कभी नहीं धागा जो,
अझुराया बातों- बातों में ।

अगर चित्त हो शांत, तो ही
इश्वर उसे  सुमति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

सूर्य बिखेरता रश्मियाँ, तभी
कण-कण ज्योतिर्मय होता है।
जो देने में सुख पाते हैं,
उनका सुख अक्षय होता है।

अगर करो विस्तार स्वयं का
चेतन - स्तर विरक्ति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

अपने सुख का देकर भाग
दूसरों में भी नव - संचार भरो।
उनके आंगन में उमंग हो,
सपने उनके साकार करो।

सुधियों को घोल उस समष्टि में
जीवन पावन परिणति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

फूलों को देखो, उसमें
सुगन्ध कौन भर देता है?
मधु संचय करती है मक्खी
पर स्वाद कौन भर देता है?

देने में जो सुख पाते हैं, उनका
जीवन विराट में  विस्मृति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Wednesday, January 17, 2018

उपन्यास "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" का दिल्ली पुस्तक मेले में लोकार्पण




#BnmRachnaWorld
#novel#social
लोकार्पण के समय मोबाइल पर  शूट किए वीडियो का यूट्यूब लिंक इस प्रकार है:
https://youtu.be/HAtUvfvd9Mk

https://youtu.be/0-XGeeZqfB4

https://youtu.be/Xk-8Ky78kcY



उपन्यास "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" का  दिल्ली पुस्तक मेले में लोकार्पण

आज ही यानि १४ जनवरी को  दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले के हाल न. 12 और हिंद युग्म प्रकाशन के स्टाल न . 22, 23,24 में मेरे लिखे उपन्यास "डिभाईडर पर कॉलेज जंक्शन" का लोकार्पण अतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (नागपुर) से प्रकाशित "बहुवचन" पत्रिका के सम्पादक और वरिष्ट पत्रकार आदरणीय श्री अशोक मिश्र जी के कर कमलों द्वारा हुआ। इस समारोह का संचालन बी एस एन एल, दिल्ली में GM और रुचि से साहित्यकार तथा वैशाली के केन्द्रीय पार्क में हर महीने होने वाले "पेड़ों की छाँव तले रचना पाठ" के संयोजक और कवि आदरणीय श्री अवधेश कुमार सिंह जी ने किया। उस समारोह में हिंद युग्म के प्रकाशक श्री शैलेश भारतवासी, मेरे भगिना श्री नरेन्द्र तिवारी जो बल्लभगढ़ में सीमेन्ट और बिल्डिंग मटेरियल रिसर्च में GM हैं तथा मेरी पत्नी ललिता मिश्रा, मेरी बेटी करुणा, नाती ओजेश और नरेन्द्र की पत्नी भी शामिल हुए। 
श्री अशोक मिश्र जी ने पुस्तक में आंचलिक भाषा के प्रयोग की सराहना की। श्री अवधेश जी के कविता से उपन्यास की कठिन और दुरूह और परिवर्तित फ्रेम की यात्रा पर पूछे जाने वाले प्रश्न के उत्तर में रचनाकार ब्रजेन्द्रनाथ ने कहा कि यह एक मुश्किल काम था। परन्तु जब अन्दर का बहुत कुछ एक बडे कैनवास पर बाहर आने की अतुरता लिये होता है, तो उसे उपन्यास के फ्रेम में ही लाना पडता है। उन्होने यह भी कहा कि कालखण्ड जे पी आन्दोलन के आसपास होते हुये भी आज के वातावरण के साथ उसका साम्य है। उसी समय की कुछ तस्वीरें यहाँ दे रहा हूं। एक और तस्वीर साझा करनी रह गई थी। इस अन्तिम तस्वीर में मैं "परिंदे" पत्रिका के सम्पादक, श्री चौबे जी, जो अपने स्टाल नं 274 से यहां पधारे, उन्हें भी पुस्तक की एक प्रति दी गई। 
साथ ही पुस्तक की अमेज़ोन पर प्रि बूकिन्ग शुरु हो चुकी है, उसकी भी सूचना चस्पा की हुई है। 
इसके लिए इस लिंक पर जाएँ: http://amzn.to/2Ddrwm1

नोट: परम स्नेही सुधीजनों, मेरी इस पुस्तक को अपार समर्थन मिल रहा है। 
क्या आपने मेरी पुस्तक "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" (उपन्यास, मूल्य 104 रु, 170 पृष्ठ) मँगाई?
आप amazon के लिन्क:
amzn.to/2Ddrwm1 पर जाकर मन्गायें।
अगर कोई दिक्कत हो तो अपना पता और मोबाइल नम्बर मेरे मेल आई डी brajendra.nath.mishra@gmail.com
पर भेज दें, पुस्तक आपके घर पहुंच जायेगी। पुस्तक का मूल्य पुस्तक मिल जाने पर दें। साथ ही मैं आपको अपनी एक और पुस्तक "छाँव का सुख" (कहानी संग्रह, मूल्य 100रु, पृष्ठ 128) या इसी पुस्तक की एक और प्रति डाक द्वारा मुफ्त भेज दूँगा। आपसे सहयोग की अपेक्षा है।
सादर आभार!
ब्रजेन्द्रनाथ 

Monday, January 1, 2018

सदी का अट्ठारहवाँ साल ! (कविता)

#poem#newyear
#BnmRachnaWorld




सदी का अट्ठारहवाँ  साल !

इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।
उमंग है, उल्लास है,
छाया मधुमास है।
मधुर – रस सिंचित,
यहां हर सांस है।

प्रकृति रस घोल रही,
घूंघट – पट खोल रही।
रंग – बिरंगी फूलों से,
भरा हुआ थाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है.

सूर्य की किरणें भी,
ठंढ को शोध रहीं।
पथ को आलोकित कर,
जीवन को बोध रही।

कुहेलिका के पार भी,
खुला नव संसार भी,
नृत्य कर रहा है,
मचा रहा धमाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।

अंग – अंग में अनंग,
बज रहा जलतरंग।
निहारती घटाओं से,
ढूढती पिया का संग।

रस – रस बरस रहा,
अभ्यंतर भींग रहा।
शब्द – शब्द टांक दिए,
बिछा हुआ रुमाल है।
अट्ठारहवाँ साल है।

चंचल चितवन, नयन खंजन,
रमण करता, मानव- मन।
मस्ती लुटाती, मुस्कुराती,
सकुचाती, संवारती यौवन – धन।
दर्पण निहारती,
इतराती, बलखाती,
नव-पल्लवित लता – सी,
डोलती – सी चाल है।
अट्ठारहवाँ साल है।


श्रृंगार रस के पार भी,
जो विवश विस्तार है।
जहां भय है, भूख है,
जी रहा जीवन, एक लाचार है।
जीना मजबूरी है,
फिर मौत से क्यों दूरी है?

चारो ओर बिखरा, सुलगता सवाल है.
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।

शीर्ष पर जो स्थित हैं,
विवादों से ग्रसित हैं।
संसद में हलचल है,
जनमार्ग ब्यथित है।
कौन कितना बेशरम,
कितना चुराया धन?

इसी पर मचा हुआ,
शोर और बवाल है।
इस सदी  का अट्ठारहवाँ साल है।

क्यों मनुष्य  मानवता का,
बन बैठा ब्यापारी है?
क्या पशुता  का पहनना ताज़,
मनुजता की लाचारी है?

धारा प्रवाह रुक रहा,
अवसर है चुक रहा।
किनारे को घेरकर
फैलता शैवाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।

मन- विहंगम गगन – पथ में,
खोजता संसार है।
हो नहीं नफ़रत जहां पर,
प्यार ही  बस प्यार है।

सहज, सुलभ, विश्वास है,
सहकार है, उजास है।
ईर्ष्या, मद, मोह, मत्सर
का नहीं मकड़-जाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।
***
–ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
जमशेदपुर|

तिथि: 28-12-2015

Sunday, December 31, 2017

नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन! (कविता)

#poem#newyear
#BnmRachnaWorld



नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

प्रकृति भी कर रही नव श्रिंगार  है,
दिशायें भी खोल रही नव पट द्वार हैं।
मधु बरस रहा, हेमन्त भी तरस रहा,
लताओं, पुष्पों से सजा बंदनवार है।

धुंध में घुल रहा सुगन्धित सा - मन ।
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

सांसो को आशों में बंद करने दो,
अहसासों को विश्वासों के छन्द रचने दो।
बारुदें बहुत बो चुके हो तुम सालों से,
हमें नेह- तुलसी के बीजों को भरने दो।

एक नया सन्देशा ला रहा पवन।
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

दिल पर दस्तक, यादों ने दिया,
तन की देहरी पर सांसो का दिया।
झुक गया सूरज लिये धूप सांझ की
पांती भी ना आई जलता रहा जिया।

नेह की बाती जलती रही प्रति क्षण
नव  वर्ष का कैसे करे अभिनन्दन?

जो नित्य असि धार पर चल रहे हैं,
जो प्रतिदिन  तूफानों में भी पल रहे हैं।
चीर कर रख देते अरि की छाती जो,
जो नरसिन्घावतार  बन उबल रहे हैं।

उन राष्ट्र के मतवालों का करते नमन।
नव वर्ष का करते है अभिननदन।

मनाओं उत्सव, तो कर लो याद उनको भी
जो खन्दकों में जीते, बन्दूक का खिलौना  है।
जिनकी सर्द रातें हैं, हवाएँ करती साँय -साँय,
जो ओढते हैं राष्ट्र प्रेम, बर्फ का बिछौना है।

राष्ट्र के उन  वीरों से गुलजार है चमन।
उनके लिये भी नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन।


बीते साल में जो रह गया अधूरा
जो सपने ना हो सके साकार।
आएं इस वर्ष में फिर से जगायें
आगे बढ़कर  दे उन्हें भी आकार।

योजनाओं को सतह पर उतारें
रुके नहीं कभी हमारे बढ़ते चरण!
नव वर्ष का करते हैं  अभिननदन!

ब्रजेन्द्र नाथ
जमशेदपुर




Tuesday, December 26, 2017

नमन है मेरा शतबार (कविता, मुरलिधर केडिया पर)

#poem#murlidharkedia
#BnmRachnaWorld





कल 25दिसम्बर को जमशेदपुर के प्रतिष्ठित अधिवक्ता, सुविख्यात समाज सेवी, तुलसी भवन, बिष्टुपुर के वर्तमान न्यासी और पूर्व मानद सचिव आदरणीय मुरलीधर केडिया जी के 75वर्ष पूरे होने परआदरनीय डा नर्मदेश्वर पाण्डेय जी के नेतृत्व मे  सिंहभूम जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से अमृत महोत्सव का आयोजन हुआ था। इसमें माननीय मन्त्री जी श्री सरयू राय जी विशिष्ट अतिथि के रूप में मन्चासीन थे। शहर के गन्य्मान्य नागरिकों, साहितीकों और सिंह भूम चैंबर के सदस्यों ने उन्के दीर्घ जीवन की कामना की। इस आयोजन में मैं भी शमील हुआ।
इस अवसर पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से अभिननदन ग्रन्थ के रूप में स्मारिका का विमोचन भी हुआ। उसमें मेरी कविता भी छपी है, जिसे मैं नीचे दे रहा हूं। कुछ तस्वीरें भी प्रस्तुत हैं :


श्री मुरली धर केडिया जी के अमृत महोत्सव ग्रन्थ के लिये लिखी गयी मेरी कविता :

नमन आपका है शतबार!

हे स्मितहास्य, हे मृदुभाषी।
हे सरल चित्त, हे सुखराशि।

हे स्वदेशी आन्दोलन के सूत्रधार।
केडिया जी, नमन आपका है शत बार!

आप तुलसी - भवन के दृढ़ स्तम्भ,
जहाँ साहित्य - सृजन लेता आकार।
आप सहज उप्लब्ध रहते सबको,
जो चाहे आपका        साक्षात्कार।
नमन आपका है       शतबार!

आप कर-प्रणाली-ज्ञान में निष्णात,
आप मानव-सूर्य के अरुण प्रभात।
आपसे आलोकित है पथ हमारा,
आपका निर्देशन हो हमें प्राप्त।

हे प्रेम, करुणा, सहिष्णुता, सेवा के विस्तार,
नमन आपका है शतबार!
हे स्वदेशी आन्दोलन के सूत्रधार,
नमन आपका है शतबार!
नमन आपका है शतबार!

-ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 सुन्दर गार्डन, संजय पथ, डिमना रोड, मानगो।

Friday, December 22, 2017

कोहरा (कविता)

#poem#nature
#BnmRachnaWorld


कोहरा 


कोहरे का नहीं ओर - छोर।

सुबह कर रही साँय - साँय,
सूरज  कहीं छुपा लगता है।
सारा दृश्य, अदृश्य  हो रहा,
अँधेरा अभी पसरा लगता है।

अरुनचूड़ भी चुप बैठा है,
अलसाई - सी लगती भोर।
कोहरे का नहीं ओर- छोर।

सात घोड़ों पर सवार सूर्य भी,
कहाँ भटक गया गगन में?
हरी दूब पर पड़े तुषार हैं,
फूल झूम नहीं रहे चमन में।

नमी  फैला रही, सर्द हवाएँ,
पगडंडी भींग,  हुई सराबोर।
कोहरे का नहीं ओर- छोर।


थी स्याह रात उतरी धरा पर,
कँपकँपाती बदन बेध रही।
रजाई भी ठंढ से हार रही थी,
ठंडी हवाएँ हड्डियां छेद रहीं।

फूस का छप्पर भींग गया ओस से,
टीस भर गई पोर- पोर।
कोहरे का नहीं ओर- छोर।

आसमान, ज्यों तनी  है चादर,
धरती जिनकी बनी बिछौना।
कौन करे है उनकी चिंता,
फूटपाथ पर जिन्हें है सोना।

भाग्य का सूरज अस्त हो रहा,
अँधेरे छा रहे घनघोर।
कोहरे का नहीं ओर - छोर।


ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
जमशेदपुर 

Sunday, December 17, 2017

यायावरी गीत लिखूँ (कविता)

#poem#romantic#emotional
#BnmRachnaWorld





मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाऊँ।

मैं तितली बन फिरूँ बाग में,
फूलों पर कभी ना मडराऊँ ।
मैं गुन्जन करुँ, डाल-डाल पर,
उसको  कभी ना  झुकाउं।

मैं करुँ मधु - संचय और मधु- रिक्त हो जाऊँ।
मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाऊँ।

मैं नदी,  सर्पिल पथ से
इठलाती-सी बही जा रही।
इतने बल कमर में कैसे
कहाँ- कहाँ से लोच ला रही?

मैं संजोती आस, किनारों को लांघूँ, उन्मुक्त हो जाउँ।
मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाउँ।

मेरे गीत उड़ चले अम्बर में,
जहां पतंगें उड़ती जाती।
जहां मेघ सन्देश भेज रहा,
यक्ष- प्रेम में जो मदमाती।

उस आंगन में बरसूं  मेघ बन, जल-रिक्त हो जाऊँ।
मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाउँ।

गीत तरंगें चली लहरों पर
कभी डूबती, कभी उतराती।
कभी बांसुरी की धुन सुनने
यमुना तट पर दौड़ी जाती।

मैं भी चलूँ गोपियों संग, स्नेह-रिक्त हो जाउँ।
मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाउँ।

मैं जाउँ संगम - तट पर
धार समेटूं  आँचल में ।
मैं चांदनी की लहरों पर
गीत लिखूं , हर कल कल में।

मैं जाउँ निराला-तप-स्थल में, छन्द मुक्त हो जाऊँ।
मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाउँ।

मैं घूमूं काशी की गलियां,
पूछूं तुलसी और कबीर से।
आओ कभी गंगा-घाटों पर
पसरे कचरे बीनो तीर से।

तुम्हारे छन्दों, दोहों को दुहराउँ, शोध-युक्त हो जाउँ।
मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाउँ।

मैं गीत लिखूं और तुम टेरो
शहनाई की धुन में कोई राग।
जिसमें से उड़े धूल  मिट्टी की,
जिसमें हो पुरबी लय में फाग।

अणु-वीणा के सप्त सुर गूंजे, बोध युक्त हो जाऊँ।
मैं यायावरी गीत लिखूं और बँध-मुक्त हो जाउँ।


@ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 ता: 27-10-2017
 कोलकाता, निजाम पैलेस।


नोट:  ता: 17-12-2017
आज सिंहभूम हिन्दी सहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में स्थानीय तुलसी भवन में "काब्य कलश" का आयोजन हुआ। इस समारोह की अध्यक्षता तुलसी भवन के  मानद सचिव आदरणीय नर्मदेश्वर पाण्डेय जी ने की और संयोजन श्री यमुना तिवारी ब्यथित जी ने की। आदरणीया मन्जू पाण्डेय उदिता, कवियत्री और उत्तराखंड के शिक्षा पदाधिकारी की गरिमामय उपस्थिति तथा    डा . आशा गुप्ता की विशिष्ट उपस्थिति से इस समारोह ने नई उंचाईयों को छू लिया। अन्य सहित्य अनुरागियों में श्री श्रीराम पाण्डेय भार्गव जी, श्री आनन्द पाठक जी, श्रीमती सुष्मिता पाठक मिश्र, श्रीमती ममता सिंह, श्रीमती नीते, श्रीमती प्रतिभा, श्री अर्देन्दु, श्री देवेन्द्र कुमार, श्री अलबेला  जी, श्री पोद्दार जी, श्री कन्हैयालाल जी, ने अपने काब्य पाठ से उत्सव को सफल बनाया। समारोह में श्री केडिया जी ने भी शिरकत की। मैने भी अपनी कविता "मैं यायावरी गीता लिखूँ और बँध मुक्त हो जाउँ" सुनाई। उसी समय की कुछ तस्वीरें ऊपर दी गयी हैं।

28 अप्रैल, 2019 दिन रविवार, शाम को 5.00 बजे “सेंट्रल पार्क” सेक्टर-4 वैशाली , गाज़ियाबाद (दिल्ली एन सी आर)  में मासिक साहित्यिक गोष्ठी "पेड़ों की छांव तले रचना पाठ" के 55वें संस्करण में “सृजन मेँ प्रकृति प्रेम” विषय से संबन्धित गीत गजल कविताओं का दौर देर शाम तक अनवरत चला। आप सबों को यह बताता चलूँ कि आदरणीय अवधेश सिंह जी, जो हाल ही में बी एस एन एल के उच्च अधिकारी पद से सेवा निवृत्त हुए है और  हृदय से कवि हैं, के संयोजन में पिछले 4 वर्षों से भी अधिक समय से यह सत्र आयोजित किया जाता रहा है।
गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में तैनात सांस्कृतिक व साहित्यिक अटैची रघुवीर शर्मा की उपस्थित विशेष उल्लेखनीय रही , अध्यक्षता डॉ वरुण कुमार तिवारी और संचालन संयोजक अवधेश सिंह ने किया व आभार प्रदर्शन परिंदे साहित्यिक पत्रिका के संपादक ठाकुर प्रसाद चौबे ने किया ।
मैन इसी कविता का पाठ किया उसके यूट्यूब वीडियो का लिंक यहां दे रहा हूँ।

https://youtu.be/sXVz3LARz9U

मेरा यूट्यूब चैनल marmagya net सब्सक्राइब करे और शेयर भी करें। बेल आइकॉन दबा दें, ताकि नया वीडियो अपलोड होने पर उसकी सूचना आपको मिल जाय।


इस गोष्ठी की खबर दिल्ली एन सी आर के नवभारत टाइम्स में भी छपी है:









Friday, December 15, 2017

भूख (कविता)

#poem#social
#BnmRachnaWorld





ओ बी ओ (open books online) साहित्य मर्मज्ञों द्वारा संचालित अन्तरजाल है, जो हर महीने ऑन लाईन उत्सव आयोजित कर्ता है। इस बार यह उत्सव 08-09 दिसंबर  को आयोजित किया गया था।

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
विषय - "भूख"
आयोजन की अवधि- 08 दिसंबर 2017, दिन शुक्रवार से 09 दिसंबर 2017दिन शनिवार की समाप्ति तक
(यानि, आयोजन की कुल अवधि दो दिन)


मैंने भी इस आयोजन में भाग लिया | मैंने जो ग़ज़ल लिखी उसे मैं हु ब हु दे रहा हूँ | इस आयोजन में शिरकत करने वाले ग़ज़लकारों  ने ग़ज़ल के ब्याकरण के अनुसार ग़ज़ल नहीं होने के कारण, इसके भाव को देखकर इसे ग़ज़ल न कहकर एक ग़ज़ल नुमा कविता कहा|
आप पहले  इसे देखें:

भूख
(एक ग़ज़लनुमा कविता)

भूख को आँतों में छुपाकर सो गया।
उम्मीदों  को फिर से  जगाकर सो  गया।

कल की फिकर, मैने कल पर छोड़ दी
आज नारों में ही बहलाकर सो गया।

लोग बहस करते रहे भूख भगाने पर,
मै वह मंजर आंखों में बसाकर सो गया।

वे भूखों को जगाने, तख्तियां ले फिरते रहे,
मैं कूड़ेदान में पड़ी रोटियां सटाकर सो गया।

मेरी हड्डियों  ने चमड़ी की चादर ओढ़ ली,
आंतें जग गयीं, और मैं कुलबुलाकर सो गया

दुनिया में भूखों की जामात अब बढ़ रही है,
अब इन्कलाब आयेगासमझाकर सो गया।

विरासत की सियासत में भी भूखे रोल में होंगे,
मैं विदूषक, मंच पर सबको  हँसाकर  सो गया।

भूखे ही भूख से दिलाएंगे निजात भूखों को,
दिल ए शौक को दिलाशा दिलाकर सो गया।

(मौलिक व अप्रकाशित)
©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
तिथि : ०९-१२-२०१७
जमशेदपुर




इसके बाद इस ग़ज़लनुमा कविता पर साहित्यानुरागियों और ग़ज़ल के सुधि जानकारों के बीच विमर्श का दौर चला| इसमें मैं खासकर जनाब तस्दीक अहमद खान साहब का नाम लेना चाहूंगा जिन्होंने पहले दो तीन शेरों को सुधारकर बताया कि यदि अन्य शेरों का भी सुधार इसीतरह कर लिया जाय तो यह मुकम्मल  ग़ज़ल बन जाएगी | मैंने उसका प्रयास किया |उसका संशोधित संस्करण प्रस्तुत है:


भूख
(एक ग़ज़ल)
भूख आंतों में छुपा कर सो गया ।
आस मैं फिर से जगाकर सो गया ।

फिक्र कल की मैं ने कल पर छोड़ दी।
आज मैं नारे लगा कर सो गया ।

भूख पर सबने बहस की और मैं
आंख में मंज़र बसा कर सो गया ।

तख्तियां ले आ गए वे जगाने
मैं चेहरे को छुपाकर सो गया |

हड्डियों ने ओढ़ ली चमड़ी की चादर,
आंतें जगीं, पर कुलबुलाकर सो गया|

बढ़ रही ज़मात भूखों की,  अब
इंकलाब आएगा, बताकर सो गया|

सियासत में भी भूखे रोल में होंगें,
मैं बिदूषक बन,  हंसाकर सो गया|

दिलाएंगे निजात, भूखे ही, भूख से,
दिल को दिलाशा दिलाकर  सो गया|


(मौलिक व अप्रकाशित)

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
तिथि : 14-12-2017
जमशेदपुर

'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख )

 #bnmrachnaworld  ‘ गुनाहो का देवता’ को एक बार फिर पढ़ना  डॉ धर्मवीर भारती की लिखी और हर वर्ग के पाठकों द्वारा सबसे अधिक पढ़ी गयी कृतियों में ...