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Friday, April 9, 2021

मास्क लगाना जरूरी है (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#mask #masklaganajaruri









(फ़ोटो गूगल से साभार)

मास्क लगाना जरूरी है

जब कोहरा होने लगा हो घना,
तमिस्रा की फैलने लगी चादर।
टिड्डियों के दल घेरने लगे हो,
शाखों पर आने लगे चमगादड़।

कोई अपशकुन की आशंका से
स्वयं को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।

जब विष व्याप्त होने लगा हो,
नीले अम्बर में धुआँ - धुआँ हो।
कोई भी राह दिख नहीं रही,
उठ रही धूल भरी आँधियाँ हों।

ऐसे में धूल और धुआँ से,
स्वयं को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।

मानव ने किया है अतिक्रमण,
स्रोतों का करता रहा है दोहन।
धरती की कोख से फूटा लावा,
प्रकृति शुरू करेगी विष वमन।

ऐसे में व्याप्त विष प्रवाह से
स्वयं को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है ।

इस संकट काल में उलझन से,
कीटाणुओं के कटीले चुभन से।
कोरोना विषाणु के संक्रमण को,
स्व अनुशासन के अनुसरण से।

सोशल डिस्टेंसिनग रखते हुए
सबको को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।

कोरोना का बढ़ता संक्रमण,
सावधानी का भूले नहीं चलन।
भीड़- भाड़ से दूर- दूर ही रहें,
कोरोना को मत दें निमंत्रण।

हर रोज पांच मिनट भाप लें,
कोरोना को मात देना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।


©ब्रजेन्द्रनाथ

Sunday, April 4, 2021

पात पात विहँस रहा प्रात (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#nature #poemonnature











पात - पात बिहँस रहा प्रात


व्योम की नीलिमा में खोजता पथ,
कौन आ रहा, चढ़ा वह रश्मिरथ।

लालिमा में लुप्त हो रही रात,
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

तरु-शैशवों से फूट रहीं कोंपलें,
क्यारियाँ में केसर के सिलसिले।

कामिनी जाग रही, सो रही रात।
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

अरुणोदय में खुले कमल-दल-पट,
कैद भ्रमर सांस लेने निकला झट।

हरीतिमा में स्वर्णिमा आत्मसात।
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

पर्वतों से सरक रही धवल-धार,
प्रकृति नटी कर रही नित श्रृंगार।

शिखरों से झाँकता अरुण स्यात,
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

वृक्षो से लिपट रही लतायें,
संवाद में रत तरु शाखाएं।

अरुनचूड़ बोल उठा बीत गयी रात।
पात - पात बिहँस रहा प्रात।

©ब्रजेंद्रनाथ


मेरी इस कविता का  मेरे  यूटुब चैनल  maramagya net का लिंक नीचे दे रहा हूँ:

 https://youtu.be/wW6I93dHJik


मेरी इस कविता पर, संस्कृत और हिंदी भाषा के उदभट विद्वान आदरणीय उमाकांत चौबे जी के व्हाट्सएप्प वाल से प्राप्त प्रतिक्रिया मैं यहाँ दे रहा हूँ:

मिश्र जी, यह प्रकृति से सम्बन्धित  अद्भुत रचना है |जिस तरह सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते है, उसी तरह आपने भी इस रचना में प्रकृति की विवेचना की है | सचमुच आप  काव्य प्रतिभा के धनी है |पात पात बिहॅऺस रहा प्रात, इस पंक्ति के माध्यम से आपने प्रकृति की प्रातःकालीन सुन्दरता का वर्णन किया है |मिश्र जी आप साहित्य जगत् के गौरव है | इस सतत साहित्य साधना के लिए मैं शुभकामना देता हूँ |

उमाकांत चौबे







Sunday, March 28, 2021

अलसाया तन बौराया मन.(कविता)

 #BnmRachnaWorld

#poemonholi




फागुनी  (नव)गीत  

अलसाया तन, बौराया मन,
कल्पना का नहीं ओर छोर.
कोयल भी कूक रही मीठी - सी धुन,
बगिया में गदराया अमवां का बौर।


लाल रंग फ़ैल गया यहां - वहाँ,
लहक गया, दहक गया पलाश वन।
आँखें टिकी हुई चौखट पर,
पिऊ संग कब होगा मिलन।


फाग का राग बन आ गई होली भी,
अब तो घर आ जा मेरे सजन।
बयार भी चुभ रही काँटा बन,
मन हुआ बावरा, बिसर गया तन।


आँगन में सास मेरी खाट डाले हुए,
देहरी पर है ससुर जी का पहरा।
मन तो लांघ जाता सारी हदें, 
मर्यादाएं  
कैसे तोडूँ,  पांव ठिठक ठहरा।


आँखे थी टकटकी लगाए हुए,
पड़ती रही ढोलक पर थाप पर थाप।
चुनरी भींगो गयी कोई सहेली मेरी,
पर न मिट पाया मन का संताप।

©ब्रजेंद्रनाथ


Monday, March 22, 2021

कैसी हो देशभक्ति (लेख)

 #BnmRachnaWorld

#patriotic essay










(तस्वीर गूगल से साभार)

कैसी हो देशभक्ति?

सीमा पर लड़ना देशभक्ति है। परंतु सिर्फ सीमा पर लड़ना ही देशभक्ति नहीं है। देश में रहते हुए देश के लिए जीना भी देशभक्ति है। कैसे?

अगर आप सामान्य जीवन जीते हुए निर्धारित नियमों का पालन करते हैं, तो आप देशभक्त हैं। अगर आप अपनी जरूरत के मुताबिक जल का उपयोग करते हैं, अगर आप अनावश्यक बिजली नहीं जलाते हैं, (जिसमें अनावश्यक टीवी देखना भी है), अगर आप छोटे-छोटे काम के लिए थोड़ा चलकर पेट्रोल बचाते हैं, अगर आप सारे पेमेंट डिजिटली करते हैं, अगर आप सरकारी कामों के लिए अतिरिक्त सेवा शुल्क नहीं देते हैं, अगर होटलों में टिप नहीं देते हैं, अगर आप राजधानी या अन्य प्रीमियम ट्रेनों में सर्विस देने वाले को टिप नहीं देते हैं, अगर आप किसी भी दफ्तर में भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध पी एल आई दाख़िल कर संघर्ष करते हैं, अगर आप किसी भी पद पर रहते हुए ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, अगर आप नेता के रूप में देश की सेवा करते हुए सरकारी सुविधाओं का कम से कम उपयोग करते हैं, अगर आप शिक्षक के रूप में अपने आचरण द्वारा विद्यर्थियों में अच्छे आचरण के बीज डालते हैं, अगर आप किसी भी गलत कार्य के विरुद्ध संघर्ष के लिए उठ खड़े होते हैं, अगर उच्च पद पर आप अपने कार्यों के निष्पादन में पारदर्शिता अपनाते हैं, अगर आप अपने व्यवसाय के किसी भी क्षेत्र में ग्राहकों का ख्याल रखते हुए ईमानदारी बरतते हैं, अगर आप देश के अंदर स्थित जयचंदों को समूल नष्ट करने का कड़ा कदम उठाते हैं, अगर आप देश में कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति के लिए सबकुछ करने को तैयार रहते हैं, तो आप देशभक्ति को ओढ़ने, सोने , बिछाने और  हृदय में उतारने वाले सबसे बड़े देशभक्त हैं।

©ब्रजेन्द्रनाथ

Tuesday, March 9, 2021

विश्व महिला दिवस पर (लेख)

 #BnmRachnaWorld

#worldwomenday













यह लेख विश्व महिला दिवस को समर्पित है।

सबसे पहले विश्व महिला दिवस की अशेष शुभकामनाएँ!

मैंने एक कविता लिखी थी जब तीन मगिलायें पहली बार पायलट बनी थीं। उसे साझा करना चाहता हूँ:

चीर नापने नभ को

(भारतीय वायुसेना में तीन महिलाओं, अवनि चतुर्वेदी, मोहना सिंह जितवाल, भावना कंठ  को 2016 में पहली बार पायलट बनने पर।)

चल पड़ी वह लाँघ देहरी,
चीर नापने नभ को,
अग्नि-दाह से भस्म करने
अरि-समूह-शलभ को।

पहन वेश सेनानी का 
वह बनी देश की शान है।
धूल चटाने दुश्मन को
छिड़ा समर - अभियान है।

देखो वह नीले पथ पर,
गगन में भर रहा उडान।
घहरात पवि - सा विराट
स्वर ध्वनित गुंजायमान।

वह वायु-युद्ध की सेनानी,
बरसाएगी अग्निवाण। 
भयाक्रांत विवर्ण शत्रु का
मर्दन करेगी मिथ्या मान। 

अम्बर में गरजा विमान,
घिर गया गिद्धों का झुंड।
ध्वस्त हुए आतंक - शिविर
बिखर गये उनके नर मुंड ।

शत्रु की छाती का शोणित
रण चंडी बन पान करेगी।
भारत माँ की बिन्दी को
पुत्रियाँ प्रभावान करेगी।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

"यंत्र नार्यस्तु पूज्यन्ति रमन्ते तंत्र देवता"
यह शास्त्रों में सिर्फ लिखा नहीं है, इसे मैंने महसूस किया है। भारतीय समाज की उन्नति को स्त्रियों के सम्मान के स्तर पर ही आंका जाता है। स्त्रियों के शोषण पर आधारित मान्यताओं को हमारे सामाज ने ही ध्वस्त किया है। यहां देवताओं का अवतरण भी माँ के गर्भ से ही हुआ है। गार्गी, लीलावती जैसी विदुषी नारियों की जन्मस्थली भी यह देश रहा है।
साहित्य के क्षेत्र में भी नारियों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। मीरा, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, ममता कालिया, कृष्णा सोबती, निर्मला सिन्हा, मालती जोशी आदि। नारियाँ "आँचल में दूध और आंखों में पानी" के युग से "चीर नापने नभ को" के युग में प्रवेश कर चुकी हैं। इस वास्तविकता से पुरूषों को शीघ्र ही अपनी समझ में सुधार, ( अगर जरूरत हो तो), करने की आवश्यकता है।
आपसी समझ से समरसता के विकास और पोषण के द्वारा ही हमारा समाज आगे बढ़ता रहा है। महिलाएँ, पुरुषों की सहभागिनी हैं, इसलिए उनके साथ संवेदना और सहानुभूति की नहीं, सहृदयता और सदाशयता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बढ़ने की जरूरत है।
नारियाँ जिस मंजिल को हासिल करने के लिए आगे बढ़ती हैं, उनकी उड़ान के लिए उन्हें सशक्त बनने की आश्यकता है, नए क्षितिज के नए आसमान स्वयं खुलते चले जायेंगें।

©ब्रजेंद्रनाथ


Monday, February 22, 2021

प्रकृति नटि कर रही श्रृंगार है (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#naturepoem










प्रकृति कर रही श्रृंगार है


सरस शुभ्र, फेनिल जल,
सरित - वारि प्रवाह अविरल
अरुण - किरणों का तरुओं
से हो रहा संवाद अविचल।

जीवनानंद ले रहा विस्तार है। 
प्रकृति नटी कर रही शृंगार है।

पादपों की लंबी कतारें,
गगन को चूमती फुनगियाँ।
धरा ओढ़े पीत चूनर
मगन ज्यों प्यारी दुल्हिनियाँ।

स्वयं समष्टि कर रही संवार है।
प्रकृति नटी कर रही श्रृंगार है।

एकत्र जलराशि अतल तल
ले रहा विस्तार झील ।
अम्बर झाँक रहा दर्पण में,
घुल गयी है जल में नील।

करूँ नर्तन, कर रही विचार है।
प्रकृति नटी कर रही शृंगार है।

मलय पवन, शान्त विचरण
मादक फैल रही गंध है।
भ्रमर स्वर गुंजित प्रतिपल
पुष्प पर शोभित मकरंद है।

सप्तरंगों की छा रही बहार है।
प्रकृति नटी कर रही शृंगार है।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र


मेरी इस कविता पर आदरणीय सुरेश दत्त पाण्डेय जी का फेसबुक पर लिखी गयी समीक्षा देने से मैं अपने को नहीं रोक पा रहा हूँ:

मेरे फेसबुक वाल  से 24 फरवरी 21को प्राप्त:

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जमशेदपुर द्वारा आयोजित "वासंती काव्य-गोष्ठी,"के आयोजन के लिए भाई वसंत जमशेदपुरी को साधुवाद।

कभी कथा-साहित्य के लिए पहचाने जाने वाले प्रियवर ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र इन दिनों शिद्दत के साथ काव्य-मंचों पर भी शिरक़त कर रहे हैं,यह सुखद है। वे वर्षों से साहित्य-साधना में लगे हुए हैं एवं नगर के वरिष्ठ रचनाकारों में शुमार होते रहने के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी जगह बनाने के लिए प्रयासरत हैं।

ब्रजेंन्द्र की  कविता "कर रही श्रृंगार", "वासंती-नवगीत की खुशबू  लिए हुए है।प्रथम चार पंक्तियां पढ़ते हुए ही अपनी लयात्मकता का परिचय दे देती है-

संरस-शुभ्र, फेनिल-जल,

सरित-वारि प्रवाह अविरल

अरुण किरणों के तरुओं से

हो रहे संवाद अविरल ।

स्वयं समष्टि कर रही संवार है,

प्रकृति-नटी कर रही श्रृंगार है।"

क्या खूब लिखा है ब्रजेंद्र जी ने। शब्द कोमल है, प्रकृति-प्रसंगो के संगत एवं अनुकूल अपनी रागात्मकता बनाए रखते हैं। तत्सम शब्दों के उपयुक्त प्रयोग से कविता जीवंत बन पाई है।निराला-जयंती के लगभग रची इस कविता द्वारा प्रकृति का अभिनन्दन करने के साथ-  साथ महाप्राण निराला को श्रृद्धांजलि अर्पित भी की है कविवर ने। बधाई ऐसी सुंदर कविता के लिए ब्रजेंन्द्र भाई को।

*सुरेश दत्त प्रणय।


Tuesday, February 9, 2021

कहानी पर टिप्पणी (लेख) संस्मरणात्मक

 #BnmRachnaWorkd

#laghukatha










कहानी पर टिप्पणी

" अरे भाई साहब, कोई ट्रेन छूट रही थी क्या जो कहानी को एकदम से पूरा कर दिया। क्या यार पता ही नहीं चला।"
हिंदी पाठकों द्वारा सबसे अधिक पढ़े जाने वाले वेबसाइट 'प्रतिलिपि' पर प्रकाशित मेरी कहानी "मुस्कान को घिरने दो" पर आई इस टिप्पणी को पढ़कर पहले मुझे बहुत गुस्सा आया। अभी तक किसी पाठक ने मेरी इस कहानी पर इस तरह की टिप्पणी नहीं दी थी। कुछ पलों बाद मैं संयत हुआ।
वैसे भी मेरी यह आदत है, जब बहुत गुस्सा आ रहा हो, तो न मैं मौखिक रूप से किसी को जवाब देता हूँ और न ही लिखित रूप में। कुछ पलों बाद मैं संयत हुआ और मैने उसका प्रतिउत्तर लिखना शुरू किया:

आदरणीय ........ जी, आपकी टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार! आपकी असंयत, अशिष्ट, असाहित्यिक और अनैतिक टिप्पणी से लगता है कि आपने हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ लेखकों को नहीं पढ़ा है। यह कहानी है, कोई उपन्यास या धारावाहिक सीरियल या वेबसीरिज नहीं है, कि वह रबर की तरह खिंचती जाएगी। कोई भी टिप्पणी करने के लिए आप निर्मल वर्मा, हिमांशु जोशी, नरेंद्र कोहली, आदि कहानीकारों को जरा पढ़ा कीजिये। मैं इन कहानीकारों के करीब भी नहीं हूँ। लेकिन उस ओर मार्ग पर चलने के लिए प्रयत्नशील हूँ। टाइम पास के लिए अगर कहानियाँ पढ़नी हो तो, और भी कई लेखक है। मैंने अपनी कहानी के अंत में नोट में लिख दिया है, कि आपके संयत, शालीन, शिष्ट, नैतिक और साहित्यिक प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। उसमें किसी भी मानक पर आपकी प्रतिक्रिया सही नहीं उतरती। इसलिए प्रतिक्रिया सोच समझकर दिया कीजिये। सादर!
--ब्रजेंद्रनाथ
इस टिप्पणी को लिखते हुए मेरे मन में कई विचार उठ रहे थे। मैं या मेरे जैसे अन्य सज्जन और सकारात्मक विचार रखने वाले लेखक इसे अनदेखा या नजरअंदाज कर सकते थे। परंतु इससे उन पाठक महोदय को इसका ज्ञान कैसे होता कि जब आप कोई साहित्यिक रचना पढ़ रहे हों, तो आपकी ग्रहणशीलता का भी एक स्तर होना चाहिए, जिससे आप रचनाकार की रचना के विभिन्न बिंदुओं को इंगित करते हुए रचना पर अपनी समीक्षा दे सकेें। इसके लिए आप रचना की मौलिकता, कथा-शिल्प, प्रस्तुति, भाव- भूमि, संदेश आदि पर लेखक से अपने संवाद कायम करते हुए, अपने विचार संयत, शालीन और शिष्ट भाषा में रख सकते थे। कविवर मैथिली शरण गुप्त ने अपने काव्य जयद्रथ बद्व में लिखा है:
अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है ।।

न्याय के अर्थ को सुदृढ करना आवश्यक था, इसीलिए इसकी चर्चा आवश्यक थी। परंतु अगर लेखक की सज्जनता और
संतत्व पर विचार किया जाय तो गोस्वामी तुलसी दास की यह चौपाई याद आती है,
"काटहिं परसु मलय सुनु भाई।
निज गुण देही सुगंध बसाई।।"
संत ऐसे होते हैं जैसे चंदन को काटने वाली कुल्हाड़ी में भी चंदन जैसा अपना सुगंध बसा देते हैं। इसके आगे तो यह भी प्रश्न शेष रह जाता है कि क्या कुल्हाड़ी उस गंध को अपने में समाकर रख पाता है? अगर ऐसा होता तो कोई भी कुल्हाड़ी फिर किसी चंदन के तने या डाल पर नहीं चलती। चंदन को कुल्हाड़ियों से अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी, आज के समय का यही युगधर्म है। संत को भी अगर अपने संतत्व को संभालना है, अपने स्वभाव के प्रभाव को सुस्थिर रखते हुए निरंतरता प्रदान करनी है तो राम की तरह पहले अनुनय-विनय और फिर महाप्रलय की तरह टूटना पड़ेगा:
विनय न माने जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होहि न प्रीत।
आगे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है:
शठ सन विनय कुटिल सन प्रीति।
सहज कृपण सन सुंदर नीति।।
ममता रत सन ज्ञान कहानी।
अति लोभी सन विरति बखानी
कामिहि क्रोधिहि सम हरिकथा।
ऊसर बीज बाए फल यथा।।
यही समय सापेक्ष युगधर्म है।
मैं ऐसे विचारों को धारण कर दृढ़ करते हुए उस टिप्पणी को पटल पर पोस्ट करने ही जा रहा था कि मेरे एक वरिष्ट लेखक मित्र का कॉल आया। वे कह रहे थे कि आजकल आपकी कहानियाँ कितनी भी सरल क्यों न हों पाठक का आपकी कहानियों को पढ़ना और पसंद करना आजकल के ट्रेंड पर निर्भर करता है। इसलिए कभी - कभी किसी पाठक की प्रतिक्रिया असंयत भी हो सकती है। इससे हम लेखकों को किंचित भी विचलित नहीं होना चाहिए। हमें पाठकों की रुचि के परिष्कार की भी जिम्मेवारी है। उन्हें समझाना भी हमारी जिम्मेवारी है। उनकी बातों ने लेखकों की जिम्मेवारियों का भी अहसास हमें करवाया। आज हम रचनाकार दोहरे उत्तरदायित्व - बोध से गुजर रहे हैं। हमें पाठकों की वृत्ति और प्रकृति को भी परिष्कृत और प्रक्षालित करते हुए आगे बढ़ना होगा। इस भाव के आते ही मैंने पूर्व लिखित टिप्पणी डिलीट कर दी, हटा दी।
©ब्रजेंद्रनाथ 


नोट: मेरी उक्त कहानी "मुस्कान को घिरने दो" मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस् लिंक पर जाकर मेरी आवाज में सुन सकते हैं:

भाग 1 : https://youtu.be/AAcrg_7O724

भाग 2: 

https://youtu.be/qYvMKDx5bW4

भाग 3:

https://youtu.be/ARNs-NVRrHI




Monday, February 1, 2021

नमन सशत्र बलों के धैर्य को (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#poempatriotic










ऐसे तत्वों का संकट काल आएगा


तिरंगे को लज्जित करने वाले,
तुझमें कोई भी संस्कार नहीं।
तुम अपने जो कुछ भी कह लो,
पर भारत से तुझको प्यार नहीं।

इस ध्वज की खातिर देश के
कितने वीरों ने दी थी कुर्बानी।
कितने माँओं की गोद हुई सूनी,
बहनों की सूनी सुहाग - निशानी।

तुझपे लज्जित होगी माता तेरी,
क्यों ऐसा पुत्र मैंने बड़ा किया?
तुझपे लज्जित होगी कायनात,
क्यों ऐसे शैतान को खड़ा किया?

तूने विदेशी पैसों की लालच में,
माँ का आँचल तार - तार किया।
तू अफीम, हेरोइन के नशे में चूर,
देशहित का सरेआम व्यापार किया।

जो देश का मान मिटाएगा,
जो देश की शान गँवायेगा।
देश के गौरव को गिरायेगा,
वह मिट्टी में मिल जाएगा।

आंदोलन की आड़ लेकर
देशद्रोह को पालने वाला है।
यह किसान नहीं हो सकता है,
उनको लांछित करनेवाला है।

जिसने पत्थर सहकर भी
अपना धैर्य नहीं खोया।
है नमन उन सशस्त्र बलों को
उनका शौर्य नहीं था सोया।

सिरफिरों पर वार नहीं करके,
वर्दी को नहीं किया कलंकित।
कायरों की गीदड़ भभकियों पर,
खामोश रहे, नहीं हुए विचलित।

उन वीरों की धैर्य परीक्षा को
शब्द - सुमन अर्पित करता हूँ।
उन धीर - वीर गंभीरों को अपनी
स्याही का शौर्य समर्पित करता हूँ।

यह देश अब ऐसे कृत्यों को
कभी माफ नहीं कर पायेगा।
ऐसे तत्वों का संकट - काल,
अब आएगा, अवश्य आएगा।

©ब्रजेंद्रनाथ

Monday, January 25, 2021

पराक्रम दिवस और 72 वाँ गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#patriotic poem
















पराक्रम दिवस और गणतंत्र दिवस पर कविता:

अब देश जाग्रत हो रहा,
नेताजी को जल्द बुलाओ।
सो रहा जो युवा आज,
उसे उठाओ, उसे जगाओ।

नई क्रांति की चलो बालो मशाल
इस गणतंत्र नहीं हैं कोई भी सवाल।

पराक्रम दिवस पर नेताजी के
तप को आत्मसात करो।
उस स्वतंत्रता के मतवाले का
युद्ध घोष ले साथ चलो।

जाग रहा है देश  
नाच रहा है अरि पर काल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬

भारत नही त्रिपिटक लेकर
अब शांति प्रस्ताव पढ़ता है।
देश सत्य के लिए जीत की
परिभाषा खुद गढ़ता है।

विश्व समझे भारत की दृष्टि विशाल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

जो रहे अब तक भ्रम में
गंगा- जमुनी तहजीब रटा करते थे।
जो रहे अब तक घात क्रम में,
देश को जर्जर किया करते थे।

उनकी पहचान हुई, टूटा भ्रमजाल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

अब वीर देश की जीत का
मुकुट धारण करता है।
प्रलय के मेघों का मुख मोड़
चट्टानों में राह बनाया करता है।

देश दुश्मनों की ताड़ चुका हर चाल।
इस गणतंत्र नही है कोई भी सवाल।

कुछ छद्म बुद्धिजीवी क्यों,
आस्थाओं पर करते हैं प्रहार?
उन्हें पता होना चाहिए,
नहीं देश को यह स्वीकार।

समझो हमारी भाषा वरना जाओगे पाताल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

आओ देश के लिए जगाओ अंगार को,
आओ देश के लिए स्वर दो हुंकार को।
आओ देश के लिए गुंजाओ दहाड़ को।
आओ देश के लिए झुकाओ पहाड़ को,

जवानियों में धधक रहा है लाल - लाल ज्वाल ।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल ।

©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, January 13, 2021

स्वामी विवेकानंद (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#स्वामी विवेकानंद #swamivivekanand


स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी पर,

मेरे उदगार!







विवेकानंद

वेदांत का सूर्य था वह,
सनातन धर्म का तूर्य था वह।
उसके आनन पर था तेज मनस्वी ,
उसकी वाणी में था आवेग ओजस्वी।

उसने विश्व मंच पर
प्रकट किया भारत का तेज पुंज।
उसके उद्घोष से
सनातन धर्म की फैली थी गूंज।

सम्मोहक था रूप, आंखों में करुणा अपार,
विश्व धर्म संसद में फैला हृदय का विस्तार।

वह युवाओं का करते आह्वान,
भारत हमारा फिर से हो महान।
वह उद्दत थे काटने को
भारत माँ की जंजीरें।
वह ढाहने को सजग थे
गुलामी की खड़ी प्राचीरें।

वह योगी निर्लिप्त, निष्काम,
वह योगी समेटे करुणा तमाम।
वह सन्यास की अग्नि में
स्वयं को तपाया करते थे।
वह युवाओं में आगे बढ़ने को
विश्वास जगाया करते थे।

आएं उनके पद चिन्हों पर
अपना भी चरण बढ़े।
भारत का हो उत्कर्ष
फिर यह विश्व गुरु बने।
©ब्रजेंद्रनाथ √

यही कविता आप यूट्यूब पर मेरी आवाज़ में सुने :



Friday, January 1, 2021

नवर्षगामन पर विशेष (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#poemonnewyear








नव वर्षागमन पर विशेष कविता
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

प्रकृति भी कर रही नव श्रृंगार है,
दिशायें भी खोल रही नव पट-द्वार हैं।
मधु बरस रहा, हेमंत भी तरस रहा,
लताओं, पुष्पों से सजा बंदनवार है।

धुंध में घुल रहा सुगन्धित सा - मन ।
नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन!

साँसों को आशों में बंद करने दो,
अहसासों को विश्वासों के छन्द रचने दो।
बारुदें बहुत बो चुके हो तुम सालों से,
हमें नेह- तुलसी के बीजों को भरने दो।

एक नया सन्देशा ला रहा पवन।
नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन!

दिल पर दस्तक, यादों ने दिया,
तन की देहरी पर सांसो का दिया।
झुक गया सूरज लिये धूप सांझ की
पांती भी ना आई जलता रहा जिया।

नेह की बाती जलती रही प्रति क्षण
नव  वर्ष का कैसे करे अभिनंदन?

जो नित्य असि धार पर चल रहे हैं,
जो प्रतिदिन  तूफानों में भी पल रहे हैं।
चीर कर रख देते अरि की छाती जो,
जो नरसिंहावतार बन उबल रहे हैं।

उन राष्ट्र के मतवालों का करते नमन।
नव वर्ष का करते है अभिनंदन।

मनाओं उत्सव, तो कर लो याद उनको भी
जो खंदकों में जीते, बन्दूक का खिलौना  है।
जिनकी सर्द रातें हैं, हवाएँ करती साँय-साँय,
जो ओढ़ते हैं राष्ट्र प्रेम, बर्फ का बिछौना है।

राष्ट्र के उन  वीरों से गुलजार है चमन।
उनके लिये भी नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन।

बीते साल में जो रह गया अधूरा
जो सपने ना हो सके साकार।
आएं इस वर्ष में फिर से जगायें
आगे बढ़कर  दे उन्हें भी आकार।

योजनाओं को सतह पर उतारें
रुके नहीं कभी हमारे बढ़ते चरण!
नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन!
------------
बीते वर्ष कोरोना के साथ जिये हम,
विषाणुओं का तिक्त विष पिये हम।
हम नीलकंठ बन गए, हमें डर नहीं,
इस वर्ष समूल नष्ट का लिए प्रण।

आएं विचारें, अपनाएँ स्व अनुशासन।
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन।

भारत को विश्व का सिरमौर बनाएं,
देश हित के लिए जियें, देश जगाएं।
कर्तव्य -पथ पर नित कदम बढ़ाएं,
युवा- शक्ति में राष्ट्र प्रेम जगाएं।

जयचंदों का होगा मान - मर्दन।
नव वर्ष करते हैं अभिनंदन।
©ब्रजेंद्रनाथ

Tuesday, December 22, 2020

छिन्न - संशय (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#futility of war









यह कविता मैंने 6 दिसंबर 20 को मारुति सत्संग पुणे के वेबिनार में सुनाई जिसका यूट्यूब लिंक इसप्रकार है:

https://youtu.be/jF0XsqjvAaY

छिन्न – संशय

यह कौन बैठा नदी की तीर पर,
निश्चेष्ट, निश्चल देखता जल - प्रवाह।
टूटना, बिला जाना, तट से मृतिका - कणों का,
और डूब जाना पत्थरों का अतल - जल में।


पत्थर बने जो करते अलंकृत 
स्वयं को मिथ्या अहमन्यता से।
वे ही कहीं तो डूबते नहीं
प्रवाहमान जल के अतल - तल में?

परन्तु अपने उस अभिमान में 
हिंसा का तांडव किया करते हैं वे।
उससे विगलित समाज के तन्तु को,
किस तरह, झकझोर, तोड़ फेंकते अनल में।

ऐसे तत्व भी, (या) ही, इतिहास में स्थान पाते,
झोंक जन को और जग को।
एक भीषण युद्ध की विभीषिका में,
मानवता जहां मृत्यु – शवों को ढूढती विकल हो।


हिंसा का प्रत्युत्तर न दे,
चुपचाप रहकर सहे जाना।
उदारता, सदाशयता का ओढ़ आवरण,
क्लैब्य-दोष-मण्डित कर लेना नहीं तो और क्या है?


फिर क्या हिंसा का प्रत्युत्तर
प्रतिहिंसा के अग्नि-दहन में,
लाशों की अगणित बोटियाँ,
जब बिखर जाएँ धरा - गगन में?

तभी शूरता नियत करती रही है
मुकुट-मणि स्थान जन-जन में?
तभी नर-पुंगव पूजित हुआ है,
उच्च सिंहासन अवस्थित इस भुवन में?


तो क्या शांति हिंसा का ही
एक उप - उत्पाद हमेशा से रहा है?
मरघट पर जलती चिताओं की
आत्माएं विकल नहीं होती विजन में?

युद्ध बाहर का और अंतर का,
मांगता है लाशें रण-चण्डी बना।
सिन्दूर-पुंछी बहनों का भाल
और उनका क्रन्दन करुणा से सना।

या कि समय देना और सहते रहना
उदासीनता, विवशता अपनाना।
आँखें बंद, मुंह मोड़ खड़ा रहना,
चुपचाप ही हालाहल पीते जाना।

इससे नहीं कोई नीलकंठ कहलाता
क्लैब्य ही उसको आ घेरता है।
तांडव कर सकता नहीं, वह काल पर,
आसुरी शक्ति को जीत नहीं सकता है।

इन्हीं प्रश्नों में उलझा हुआ वह,
खड़ा है नदी - तीर पर प्रश्तर बना।
अपने में अनल - दाह पीते हुए
कृत्य गुरु-जनों का नश्तर - सा चुभा।

क्या चाणक्य ने अखण्ड-
भारत-स्थापन के लिए,
हिंसा का सहारा नहीं लिया,
विद्रोह-दमन के लिए?

या कृष्ण ने नहीं दी सीख
छल का प्रतिउत्तर दो छल से,
अगर साध्य है, दुर्भेद्य करना 
राष्ट्र को अरि से, खल से।

विजय का सूर्य अम्बर में
अगर होता देदीप्यमान है।
संत्रास से, अरि अनय से,
दिलाता जन को त्राण है।

तो अरि मर्दन करना
शांति स्थापन हेतु सुकर्म है।
धरा को दिलाकर मुक्ति,
लोकनीति - स्थापन हेतु सद्धर्म है।

प्रलय के बादलों से दिला
अवनि को त्राण है।
नींव रखेगा वह साम्राज्य का, जहां
जन - जन को मिलता मान है।

ब्यथित मन क्षुब्ध है,
गाँठ पड़ी, उलझ गयीं।
बुद्धि स्थिर है मगर,
गुत्थियाँ सुलझ गयीं।

ब्यक्ति कोई अगर शत्रु बना, स्वघोषित
न्याय - दण्ड - निर्धारक बनकर करता कुकर्म है।
उसका मस्तक - भंजन करना
शांति - स्थापन हेतु न्याय - धर्म है।

©ब्रजेंद्रनाथ




Monday, December 7, 2020

मित्रता (कविता) #friendship

 #BnmRachnaWorld

#friendship











मित्रता
मित्र बनाने के पहले विचारना
जरूरी है।
द्रोण और द्रुपद की गुरुकुल में मित्रता
कहाँ निभ पाई थी?
जब द्रोण गए थे,
माँगने सहायता राजा द्रुपद से।
द्रोण की गरीबी का
उड़ाया था मजाक।
इसी ने बो दी थी,
आपसी रंजिश के बीज।
महाभारत में वर्णित कुरुक्षेत्र के युद्ध में
निकली थी सारी खीज।
इसलिए दोस्त को पहचानना जरूरी है।
दोस्त बनाने के पहले विचारना जरूरी है।
----

मित्रता के मिलेंगे वैसे भी उदाहरण
जिन्होंने निभाये दिए हुए वचन।

राम सुग्रीव की मित्रता दृढ़ हुई
सुग्रीव ने सीता की खोज में
सभी दिशाओं में वानर भिजवाये।
राम सुग्रीव की मित्रता में
दृढ़ता थी आयी।
सीता की खोज की थी
सुग्रीव के मंत्री हनुमान ने,
ध्वस्त किये दुर्ग और लंका जलायी।

कृष्ण सुदामा की मित्रता
की दी जाती है मिशाल।
गरीब, दीन-दुखी सुदामा से
द्वारिकाधीश कृष्ण ने मित्रता निभायी।
दे दिए सबकुछ दो मुठ्ठी
चिउड़े के बदले में भाई।

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मित्रता होती नहीं है कोई अनुबंध।

अर्जुन के साथ धनुर्विद्या के
कौशल दिखाने को ।
जुटे थे कौरव और पांडव कुमार।
उसमें कर्ण ने किया प्रवेश,
जिसे भीष्म ने किया था अस्वीकार।
कर्ण को देकर अंग देश का राज्य,
दुर्योधन ने कर्ण को अपनी ओर किया था।
यह मित्रता नहीं थी, था स्वार्थ-संबंध।
मित्रता होती नहीं है कोई अनुबंध।

इसलिए मित्र बनाने से पहले
मित्रता निभाने की सोचिए।
बार-बार त्याग और तप
की लौ पर तप्त कीजिये।
फिर मित्र बनाने पर विचारिये।
एक बार मित्र बन जाने पर,
मित्रता निभाने की सोचिए।
©ब्रजेन्द्रनाथ

Saturday, November 14, 2020

झारखंड की मिट्टी में रवानी है (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#Jharkhandparkavita









15 नवंबर को,

झारखंड दिवस पर झारखंड राज्य के प्रति कुछ उदगार

झारखंड की मिट्टी में रवानी है

स्वर्णरेखा, खरकई, दामोदर,
बराकर, कोयल, संख ,ब्राह्मणि।
नदियों का नित्य प्रवाहित जल
दलमा पहाड़ सा मुकुट मणि।

वसुंधरा की इसपर मेहरबानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।

देवघर में बाबा  बैजनाथ,
बुंडू में  रहती माता देउली।
रजरप्पा में छिन्नमस्तिका
पारसनाथ में जैन तपस्थली।

कण - कण में  माँ तेरी कहानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।

बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हो,
नील-पीताम्बर, मांझी तिलका ।
वीर बाँकुरों  की धरती यह,
तलवार तीर उनका चमका।

फूलो -झानो का कोई नहीं  सानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।।

कोयला, बॉक्साइट, ताम्र,
युरोनियम और लौह अयस्क।
अपार खनिज संपदा  यहाँ,
कुपोषित फिर भी  बच्चे - वयस्क।

समृद्धि है दूर, क्यों छायी वीरानी है?
झारखंड की मिट्टी में कहाँ रवानी है?

धोनी धुरंधर, कप्तान जयपाल,
इम्तियाज, महादेवन, अंजना।
कामिल बुल्के, सलिल सरीखे,
प्रबुद्धजनों से है यह  बना।

अल्बर्ट एक्का जैसा बलिदानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।

आज मचा है भ्रष्टाचार,
नही प्रेम और सदाचार।
राजनेता  है स्वार्थ- लिप्त,
फैल रहा है मिथ्याचार।

हर राज्य की कमो बेस यही कहानी है।
यहां के  मिट्टी की सूख गयी रवानी है।

समृद्धि आएगी हर घर में,
फिर से होगा यहाँ विकास।
धरा गगन गूंजेगा जन गण
जनता का  यही विश्वास।

झारखंड हमारी अस्मिता की निशानी है।
यहाँ की मिट्टी में फिर आयी रवानी है।।
©ब्रजेन्द्रनाथ




Monday, November 2, 2020

अयोध्या में राम के रावण वध कर लौटने पर दिवाली(कहानी)


 #BnmRachnaWorld

#Ayodhyamendipawali




अयोध्या में दीपावली
शत्रुघ्न असमंजस में है। आज भैया राम आनेवाले हैं, भाभी सीता और भैया लक्ष्मण भी आने वाले है। सभी माएँ खुश हैं। प्रजा में उत्साह का समुद्र उमड़ पड़ा है। फिर भैया भरत ने नंदी ग्राम में अपनी कुटिया के सामने चिता क्यों सजाने का आदेश दिया है?
इस असमंजस का उत्तर तो भैया भरत ही दे सकते हैं। उनसे पूछूं तो कैसे? वह तो उनके आदेश का ही पालन करते रहै हैं। जबसे राम भैया की पादुका लेकर भैया भरत चित्रकूट से लौटे है, अयोध्या के महल से दूर, नंदीग्राम की इसी कुटिया में चरण पादुका को स्थापित कर स्वयं पादुका के सतह के सामने बने, नीचे के गड्ढे में सोते रहे हैं। मैं ही अयोध्या और नंदीग्राम के बीच दौड़ लगाता रहा हूँ। अब क्या किया जाय?
सूर्य का गोला पूर्व क्षितिज से धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था। उसकी रश्मियाँ कुटिया में प्रवेश कर रही थी। कुटिया का कोना-कोना आलोकित हो उठा था। इस समय अपने कुलदेव सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के लिए भरत भैया आसन से उठते थे। शत्रुघ्न सोच रहे थे, यही समय सबसे उपयुक्त होगा। यही सोचते हुए वह कुटिया के बाहर इसतरह खड़े हुए थे कि उसकी परछाईं कुटिया में दिख जाए। परछाईं देखकर ही भरत समझ गए थे कि बाहर शत्रुघ्न खड़ा है। कुटिया की सफाई भरत स्वयं करते थे। सफाई करने के पश्चात उन्होंने कुटिया के द्वार के तरफ देखा था। अभी भी वह प्रतिच्छाया वैसी ही स्थिर थी। वे बाहर निकले तो उन्होंने देखा, शत्रुघ्न खड़ा है।
"भैया शत्रुघ्न इतनी देर से यहाँ खड़े किसका इंतजार कर रहे हों?"
"भैया बहुत असमंजस में हूँ। मैं आपसे कुछ पूछने की धृष्टता कैसे कर सकता हूँ? परन्तु अगर नहीं पूछूँ, तो आज के उत्सव के लिए आपके द्वारा दिये गए दिशा निर्देशों का पालन उतने उत्साह से नहीं कर सकूँगा।"
"शत्रुघ्न, उत्साह में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। तुम्हारे उत्साह और जोश को कायम रखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। आज भैया राम आनेवाले हैं। लेकिन अभी तक इसकी कोई सूचना क्यों नहीं आयी?"
भरत व्यथित थे। उनका हृदय इतना बिलख रहा था कि करुणा के अश्रु- जलों से विशाल सागर का निर्माण हो चुका था। एक बार पहले भी उनका हृदय रोया था, जब उन्होंने राम के वन गमन का समाचार अयोध्या आने पर अपनी माँ कैकेयी से सुना था। तब भी वे चिंता की चिता की जलती लपटों के बीच में घिर गए थे। अपनी माता का त्याग कर  उन्होंने चित्रकूट जाने का निर्णय लिया था। उससमय भरत के चारों ओर फैली व्यथा, लोकोपवाद और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला की लपटों से राम ने बचा लिया था। उन्होंने ही अपनी चरण पादुका देकर भरत के जीवन को राममय बना दिया था। पादुकाएं उनके लिए राम का एक प्रतीक- मात्र नहीं है। वह उसमें अपने आराध्य का प्रतिदिन साक्षात्कार करते हैं। उन्होंने सत्ता से अलग रहते हुए, सत्ता के प्रति उत्तरदायित्वों का वहन किया, जिसका उदाहरण दुनिया के किसी भी कथानक और इतिहास में नहीं मिलता है।
शत्रुघ्न का असमंजस दूर नहीं हुआ था।
भरत ने शत्रुघ्न की ओर अपने अवसादग्रस्त हृदय की भावनाओं को छुपाते हुए, उसके असमंजस के कारणों को जानते हुए भी पूछा था, "पूछो, तुम्हारे मन में किस कारण असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई है?"
शत्रुघ्न ने संकोच करते हुए पूछा था, "भैया, इस उत्सव के समय आपने चिता सजाने का आदेश क्यों दिया?"
"मैं जानता था, तुम्हारे मन के असमंजस की स्थिति। बस थोड़ी देर और। तुम्हें इसका समाधान मिल जाएगा।"
राम को भी अवध और भरत की सुधी कभी नहीं विस्मृत हुयी थी। भरत के प्रति अपने प्रेम की प्रतीति राम एक क्षण भी नहीं भूले:
बीते अवध जाऊँ जौं, जियत न पावउँ बीर।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक शरीर।।
भरत मन में विचार कर रहे हैं, "राम के आने की कोई सूचना नहीं मिल रही है। प्रभु ने मुझे कपटी और कुटिल समझा, तभी अपने साथ वन को नहीं ले गए। लक्षमण कितना बड़भागी है, जो राम के चरणारविन्द से कभी अलग नहीं हुए। अगर भैया राम समय पर नहीं आते हैं, तो भरत इसी चिता में समाकर अपना अग्निसंस्कार कर लेगा।"
इसीलिए भरत ने चिता सजाने का भी आदेश दे दिया था।
उधर राम , सीता, लक्षमण विभीषण, सुग्रीव, अंगद और हनुमान सहित प्रयागराज पहुंचते हैं। बाल्मीकि रामायण के अनुसार राम जी हनुमान को निर्देश देते हैं, " तुम भरत को जाकर देखो। उनका मन यदि अयोध्या के राज्य में रम गया हो, तो तुम लौट आना। ऐसी स्थिति में मैं अयोध्या लौटकर नहीं जाऊँगा। भरत ही वहाँ राज्य करें।"
श्री भरत के संदर्भ में यह सत्य नहीं था। तुलसी के राम में क्षण भर के लिए भी संशय नहीं होता कि भरत राज्य पाकर उसमें आसक्त हो गए होंगें। बाल्मीकि जो कहते हैं वह मनुष्य - जाति के अनगिनत अनुभवों का ही परिणाम था। श्री भरत इससे अनभिज्ञ नहीं थे। सिंहासन पर पादुकाओं की प्रतिष्ठा और नंदीग्राम से राज्य का संचालन दोनों ही इस सजगता के परिणाम हैं। वे सत्ता और भोग के दोनों केंद्रों से दूर रहने का निश्चय कर चुके थे।
सत्ता का संबंध मन से है और भोगों का संबंध शरीर से है। मन और शरीर दोनों ही एक दूसरे के प्रति आसक्त हैं। एक का प्रभाव दूसरे पर पड़ता ही है। एक बार मन सत्ता की सुरा का अभ्यस्त होते ही भोग के अन्य उपकरणों की मांग करता है । और यदि शरीर एक बार भोगों का अभ्यस्त हो जाय तो इन भोगों की स्थिरता के लिए उसे सत्ता की आवश्यकता का अनुभव होता है। इस तरह शरीर और मन दोनों मिलकर ऐसा षड्यंत्र करते हैं कि विवेक खड़ा - खड़ा देखता रह जाता है। प्रारंभ में वह चेतावनी देता है, किंतु बाद में वह भी मौन हो जाता है और अंत में वह समर्थन की स्थिति में भी उतर सकता है। देखते ही देखतेे व्यक्ति इतना बदल नाता है कि विश्वास ही नहीं होता कि कभी यही व्यक्ति धर्मात्मा, सदाचारी और शीलवान था। यह इतिहास इतनी बार दुहराया गया है कि इसे सृष्टि का अकाट्य सत्य मान लिया गया-
नहीं कोउ अस जनमा जग माही, प्रभुता पाइ जाहि मद नाही।।
इससे बचने के लिए केवल विवेक ही यथेष्ट नहीं हैं। शरीर और मन पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। यह नियंत्रण वाह्य और आंतरिक दोनों ही रूपों में आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो अपने मन पर अत्यधिक विश्वास करने का धोखा खाये बिना नहीं रहता है।
राम - वियोग के सागर में भरत का मन डूब रहा है। उसी समय हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धरकर इस प्रकार आ गए मानों उस अथाह सागर में उन्हें डूबने से बचाने के लिए कोई पतवार सहित नाव आ गयी हो।
राम विरह सागर मँह भरत मगन मन होत।
विप्र रूप धरि पवनसुत आई गयउ जनु पोत।।
भारत के त्याग, तप, तितिक्षा, तपस्वी का तेज और राम -विरह में बहती अश्रु धारा को देखकर हनुमान जी का सारा संशय दूर हो गया । उन्हें समाचार सुनाने में कोई संकोच नही हुआ,
"रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।"
भरत के यह पूछने पर कि हे,तात तुम कहाँ से आये हो और इतना परम प्रिय वचन सुनाए हो, हनुमान जी अपने स्वरूप में आ जाते हैं ।भरत ने भाव विह्वल होकर उनसे कहा था,
"कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।।"

शत्रुघ्न के सारे संशय दूर हो जाते है।
राम के आने का सुसमाचार सारी अयोध्या में मीठी सुगंध की तरह व्याप्त हो जाती है।
-----★★★★----
आसमान में पुष्पक विमान दिख रहा है। सरयू के किनारे विशाल मैदान में गुरु वशिष्ठ सहित सभी ऋषि मुनि, भरत, शत्रुघ्न, माताएँ, बहुएँ, अयोध्या के वृद्ध पुरूष-स्त्रियाँ, युवा - युवतियाँ, किशोर - किशोरियाँ सबों का विशाल समूह प्रभु राम की प्रतीक्षा में अधीर हो रहे हैं।
विमान धरती पर उतरता है। राम गुरु के चरणों में शीश नवाकर, सबसे पहले माता कैकेयी से मिलते हैं।
"पग धरि कीन्ह प्रबोध बहोरी। काल कर्म विधि सिर धरि खोरी।।"
राम अपने इस व्यवहार से माता कैकेयी को ग्लानि मुक्त करने का प्रयास करते हैं। इसके लिए उन्होंने काल-कर्म के दार्शनिक सिद्धांत का आश्रय लिया। राम अपने स्वरूप का विस्तार कर सारी प्रजा से एक साथ मिलते है।
मिलते हुए उन्हें इतना आंनद आ रहा है, जैसे सरयू में आनंद की लहरें उठ रही हों। उन्हें अचानक एक बात मन में खटकती है। वे भरत से पूछते हैं,
"भैया भरत, अयोध्या की सारी प्रजा दिख रही है। किशोर और किशोरियाँ भी दिख रही है। क्या तुमने गोद के बालकों सहित माताओं को बाहर निकलकर आने से मना कर रखा है?"
भरत भाव -विह्वल हो प्रजा की ओर इंगित करते हुए कहते है, 
"भैया, आप के वन - गमन के पश्चात अयोध्या में कोई भी उत्सव  नहीं मनाया गया।  सभी अयोध्यावासी तपश्चर्या में लीन थे, किसी भी क्षण आपकी छवि अपने सामने से नहीं हटने देते थे। पुरुषों और स्त्रियों के बीच कभी संपर्क हुआ ही नहीं। सभी  इन चौदह वर्षों तक अखंड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए राक्षसों के साथ आपके रण में जीतने के लिए तप, त्याग, यज्ञ, दान में लीन रहे। भैया, इसीलिए आप अयोध्या की प्रजा के बीच चौदह वर्ष से कम आयु के किसी भी बालक -बालिका को नहीं देख पा रहे हैं।"
भरत का वक्तव्य समाप्त होते ही राम ने अयोध्यावासियों को संबोधित करते हुए कहा, "मेरे सर्व प्रिय अयोध्यावासी, अभी मुझे प्रतीत हो रहा है कि रावण और उसकी सेना से लड़ते हुए मुझे इतनी शक्ति, इतनी ऊर्जा कहाँ से मिल रही थी। वह सारी ऊर्जा मुझे आपके तप, त्याग, तितिक्षा से मिल रही थी। वहाँ दिख तो रहा था कि एक राम लड़ रहा है। वस्तुतः मैं आप सबों के अंदर बसे राम की ऊर्जा के साथ लड़ रहा था। रावण से राम नहीं, पूरी अयोध्या लड़ रही थी। जब पूरी अयोध्या किसी से लड़ेगी तो उसे कौन हरा सकता है। मैंने राक्षसों का नाश नहीं किया है, आपने उन्हें समूल, सपरिवार यमपुर पहुंचाया है। आपके इस तप से निकले तेज को नमन करता हूँ और गुरुजनों तथा भाई भरत की सम्मति से यह घोषणा करता हूँ, पूरी अयोध्या की हर वीथी, चौराहों, खेतों, खलिहानों, कुओ, तालाबों को दीपक के समूहों से और प्रकाश स्तंभों से आलोकित कर दिया जाय। ऐसी दीपावली मनायी जाय, जैसी पहले कभी नहीं मनाई गई हो।"
सारी प्रजा में उत्साह और उमंग की तरंग उठती रही।
©ब्रजेन्द्रनाथ






Monday, October 26, 2020

विजयादशमी राम को आना होगा (कविता)

 #BnmRachnaWrld

#vijayadashamipoem

25 अक्टूबर, विजयादशमी के दिन आ अवधेश कुमार सिंह जी, वैशाली, दिल्ली एन सी आर, द्वारा संचालित "पेड़ों की छाँव तले रचना पाठ" के अंतर्गत आयोजित 68 वीं गोष्ठी में वेबिनार के माध्यम से भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उसी समय ली गयी तस्वीरों के साथ सभी सहभागियों की रचनाओं का अंश सुनते हुए अंत में मेरी रचना का ऑडियो आप सुनेंगें। तो आइये तस्वीरों के माध्यम से उस दिन के गूगल मीट की साहित्यिक यात्रा पर चलते हैं , मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net " के साथ : इस चैनल को अवश्य सब्सक्राइब करें, यह बिलकुल फ्री है। सादर !

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/UA_npwoGaG0












विजयादशमी पर राम का आह्वान
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
जब -जब रावण की शक्ति बढ़ेगी,
राम को आना होगा।
आकाश के नक्षत्रों को मिलकर
विषम - काल सुलझाना होगा।

जब पाप और अनाचार का
राक्षस निर्बाध यूँ धूमेगा।
जब - जब ताकत के मद
में पागल हाथी - सा झूमेगा।

गांडीव उठा, कर संधान
जग को त्राण दिलाना होगा।
राम को आना होगा--2

जब - जब नारी सन्देहों
में घिर शापित होती रहेगी।
जब - जब मूक शिला बनकर
निरानंदित जीती रहेगी।

अपने चरणों के रजकण से
उनका उद्धार कराना होगा।
राम को आना होगा-2

जब - जब संस्कृति के पोषक
का अस्थि - समूह बन जायेगा।
जब - जब सभ्यता कराहेगी,
मानव असहाय बन जायेगा।

तब भुजा उठा प्रण कर
अरि- व्यूहों को ढहाना होगा।
राम को आना होगा, --2

राम इस धरा पर कभी
मानव का रूप नहीं लेंगें।
राम अब दसरथ नंदन बन,
कभी भी लीला नहीं करेंगें।

अब राम - भक्तों को जुटकर,
अंदर का राम जगाना होगा
हृदय में बस जाना होगा। 2

रावण तभी जलेगा , जब
हमारा अहंकार मिट जाएगा।
रावण तभी मिटेगा जब,
लोभ और मोह नहीं सताएगा।

राम भक्त बनने के लिए
मन शुद्ध बुद्ध बनाना होगा।
अंतर का राम जगाना होगा
राम को आना होगा--2

©ब्रजेन्द्रनाथ



Monday, October 19, 2020

प्यार ऐसे क्यों आता है? (कहानी) #laghukatha

 #BnmRachnaWorld

#लचुकथा #laghukatha










प्यार ऐसे क्यों आता है जिंदगी में?

प्रणव अनु का पड़ोसी था। वह गणित, पी जी का विद्यार्थी था। अनु कभी - कभी उससे अर्थशास्त्र में सांख्यिकी (स्टेटिस्टिक्स) के सवालों को हल करने में मदद लिया करती थी। प्रणव उसे इसतरह समझाता था कि अनु को सांख्यिकी से सम्बंधित सवाल बिलकुल आसान लगने लगे थे।  शायद प्रणव की सांख्यिकी की समझ और समझाने के ढंग दोनों  ही अनु को प्रभावित कर रहे थे। कभी - कभी अनु अपने मन की सीमा रेखा के पार कोई अनकही, अपरिभाषित  आकर्षण भी महसूस  करने लगी  थी। परन्तु प्रणव ने अनु के सफ़ेद लिबाश की  असलियत  जाने बिना अपने मन को किसी उलझन में नहीं डालने का मन बना लिया था। 

एक दिन उसने अनु से पूछ दिया, "तुम सफ़ेद सलवार सूट में अच्छी  तो लगती हो, लेकिन क्या  रंगीन शेड के कपड़े तुझे पसंद नहीं?"

अनु ने हंसकर जवाब दिया था,
"मैं चाहती तो नहीं कि कोई आग सुलग जाए,  
गर सादगी मेरी जलाये, तो मैं क्या करूँ?"
और यह चर्चा इसी तरह टल गई थी या टाल दी गई थी।
●●●
अनु के पिताजी का स्थानांतरण दूसरे दूर के शहर में हो गया था। अनु भी कॉलेज में अर्थशास्त्र आनर्स के फाइनल के परीक्षाफल में अब्बल रही थी। अब उसके आगे की पढ़ाई दूर के ही शहर में होगी। आज अनु आख़िरी बार प्रणव से मिलने आई थी। उसी ने प्रणव का हाथ पकड़कर कहा था, "प्रणव, मेरी शादी छह महीने पहले ही हो गई थी जब मैं हैदराबाद में थी। मेरे पति आई पी एस अफसर थे। उन्हें एक दिन कमिश्नर से फोन आया, 'आप नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जवानों की एक टुकड़ी लेकर रेड करें। वहाँ खूखार जोनल कमांडर के होने की पक्की सूचना मिली है। वे रात में ही निकल गए। जब वे एक दिन के बाद लौटे तो तिरंगा में लिपटे हुए थे। यही है मेरी सफ़ेद लिबाश का राज, प्रणव।"

वह प्रणव का हाथ अपने हाथ में लिए आंसुओं से तर करती रही, और प्रणव सोचता रहा, "क्या प्यार ऐसे आता है, जिंदगी में? अगर प्यार ऐसे आता है, तो प्यार क्यों आता है जिंदगी में?"
©ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र

Thursday, October 8, 2020

फेसबुक पर टैगाने की आत्मविभोरता (हास्य व्यंग्य)

 #BnmRachnaWorld

#hasyavyangya#हास्य व्यंग्य











टैगाने की आत्मविभोरता
आजकल अंतर्जाल में फेसबुक नामक सामयिक साइट पर डाला जाने वाला पोस्ट अपने दोस्तों और करीबियों से अनदेखा न रह जाय, इसके लिए उससे उन दोस्तों और करीबियों के नाम टैग यानि संलग्नित करने का चलन बहुत जोरों पर है।
इसके आशीत, आशातीत और अप्रत्याशित परिणाम देखने को मिलते रहे हैं। यह सुखदायी भी हो रहा है, और दुखदायी भी।
आपने इस रचना के शीर्षक में एक शब्द पढ़ा होगा , "टैगाना"। इसका अर्थ अगर नहीं समझ पाए तो अनर्थ भी हो सकता है।इसीलिये इसे समझना जरूरी है।
अगर किसी कन्या या महिला ने अपने पोस्ट से आपको टैग किया है, तो आप अपने को भाग्यशाली समझने लगते हैं। आप अपने को साधारण से असाधारण, या अगर विशिष्ट समझते हैं तो अतिविशिष्ट समझने का वहम पालने लगते हैं। वैसे भी आप इतनी कवितायें, कहानियां सोशल साइट पर डालते रहते है, कि लोग अजीज आकर लाइक वगैरह डाल देते हैं, तो आप अपने को विशिष्ट समझ लें, इसमें आपका दोष भी नहीं है। जमाना ही ऐसा है। वैसे भी लेखक और वह भी हिंदी के लेखक नामक प्राणी को कोई घास तो डालता नहीं, पढ़ने की तो बात ही दीगर है। हिन्दी में पाठकों का अकाल पड़ गया है या आप का लिखा ही इतना घटिया है कि लोग पढना तो दूर झांकना भी पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में अगर कोई कन्या या महिला आपको अपने लेखकीय कर्तृत्व के साथ टैग कर देती है तो आपकी बांछे खिलनी ही चाहिए। अगर नहीं खिलती हैं, तो यह सोचने पर विवश होना पड़ेगा कि आप किस श्रेणी में आएंगे। बिना खुश हुए तो गदहा भी नहीं रहता होगा।
हमलोग "टैगाना" शब्द पर चर्चा कर रहे थे। टैगाना शब्द मूलतः टैग धातु से आया है। टैग धातु वह धातु है जो धातु नहीं होते हुए भी धातु है। यह आँग्ल भाषा में अंतर्जाल के फेसबुक नामक सामाजिक कर्तृत्व किये जाने वाले स्थल पर अक्सर प्रयोग किया जाने लगा है। यह एक साथ सकर्मक और अकर्मक दोनों ही क्रिया रूपों में प्रयुक्त होता है। इसको अकर्मक क्रिया रूप में प्रयोग किया जाय तो उसे "टैगना" कहा जाएगा। टैगना यानि फेसबुकीय मित्रमंडलीय विस्तार में स्त्रीलिंगीय या पुलिंगीय या दोनों लिंगीय या अलिंगीय प्राणी को टैग यानि संलग्नित किये जाने से संबंध रखता है।
जैसे: माला ने श्रीमाली को फेसबुक पर डाले गए पोस्ट से टैग कर दिया।
इसी वाक्य पर अगर यह प्रश्न उठाया जाए, जो जमाने से उठाया जाता रहा है कि माला ने श्रीमाली को ही क्यों टैग किया?
या श्रीमाली ने माला से ही क्यों टैगाया? तो यह टैगना क्रिया का सकर्मक रूप कहा जाएगा।
इसका सकारात्मक पहलू यह हो सकता है कि माला ने श्रीमाली को ही टैगने के लिये पसंद किया?
क्या माला और श्रीमाली के बीच " कुछ-कुछ होने जैसा" अरसे से हो रहा है?
या श्रीमाली ही ऐसा था जिसने माला से "टैगाने" के लिए अपने को प्रस्तुत किया?
यह विश्लेषण यहां पर इसलिए बेमानी हो जाता है क्योंकि फेसबुक में श्रीमाली जैसे कई मित्रों और मित्राणियों का फेस उभर आता है, जिसमें से माला जैसियाँ किसी को भी टैग कर सकती हैं। वहाँ न खाप पंचायतों का डर है और न टैगाने से कोई भाग सकता है।
तो इससे यह स्पष्ट होता है कि टैगने और टैगाने के लिए यहाँ हर कोई स्वतंत्र है। परंतु यहां पर एक भयंकर और दारुण लोचा उत्पन्न हो रहा है जिसकी चर्चा मैं उदहारण के साथ करूँगा। आप जरा ध्यान दीजियेगा।
मैंने हाल ही में फेसबुक पर एक महिला का एलान देखा, "अगर किसी ने मुझे टैगने की कोशिश की, तो मैं उसे अमित्र या अन्फ़्रेंड कर दूंगी।"
टैगमुक्ति के लिए वैसे उनका यह ऐलान काबिलेतारीफ है, लेकिन इसमें इसकी भी संभावना बन सकती है कि वे अगर खुद भी किसी को टैग करना चाहें तो प्रतिक्रिया स्वरुप उन्हें भी अमित्र किया जा सकता है। टैगमुक्ति का यह तरीका प्रभावी होते हुए भी विपरीत परिणाम उत्पन्न करने वाला हो सकता है। अतः टैग किये जाने पर टैगाने का सुख प्राप्त करना इस कलियुग में परमसुख की तरह है। हाँ , इसके लिए अगर टैगने वाला या वाली आकर्षक ब्यक्तित्व का हो और उनकी पोस्ट भी आपकी रुचि का हो, तो टैगाने का सुख और आनंद कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए इस सुख का लाभ लेना चाहिए। हाँ, आपके अनुसार अगर आपको किसी आपत्तिजनक पोस्ट के साथ टैग किया गया हो, तो आप पोस्ट की गुणवत्ता के बारे में रिपोर्ट कर सकते है और उन जनाब का अकाउंट ही गोल करवा सकते है। यह एक वैधानिक चेतावनी भी है और वैसे पोस्ट से साइट के लिए स्वच्छता अभियान का आगाज़ भी कर सकते हैं।
आजकल फेसबुक पर अक्सर यह चेतावनी पोस्ट करते हुए लोग टैग करने वालों को विभिन्न उपाधियां जैसे "टैगासुर" या "टैगादैत्य" से नवाज़ने लगे हैं। आप अगर स्वच्छता अभियान में लग जायेंगे तो आप को इन उपाधियों से कभी नहीं अलंकृत किया जाएगा। इसकी पूरी गारंटी है। हाँ, भविष्य में आपको "टैगश्री", "टैगभूषण", "टैगविभूषण" या "टैगरत्न" आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया जा सकता है।

पहले आप अनगिनत लोगों को टैग कर सकते थे। परंतु अभी मार्क जुकरबर्ग को लगा होगा कि एक ही ब्यक्ति या ब्याक्तिन इतने लोगों को एक साथ टैग कर दे, यह बिलकुल नाइंसाफी है, इसलिए उसकी अधिकतम संख्या की सीमा निर्धारित कर दी गयी है। इस सीमा में आप आ जाते हैं, यह फख्र की बात है। इसलिए टैगने का यह परम पुनीत कार्य सभी मित्रों और मित्राणियों द्वारा जारी रहे यही मेरी हार्दिक इच्छा है।
टैग शब्द के हिंदी शब्द कोष में प्रवेश ने एक तहलका मचा दिया है। कुछ नयी शब्दावलियों पर ब्याख्यासाहित गौर फरमाएं:
टैगना और टैगाना क्रिया रूप है, इससे कुछ अन्य शब्द विस्तार इस तरह दिए जा सकते हैं:
टैगाहट: टैगने के अकुलाहट को टैगाहट कहा जाता है- उसने टैगाहट पूर्ण नज़रों से हमें देखा। विशेष अर्थ- उसकी नज़रें मुझे टैगने को ब्याकुल थी।
टैगात्मक : टैग किये जाने लायक, इसके जैसे शब्द हैं, रचनात्मक। हम सबों को उनके टैगात्मक विचारों से लाभान्वित होना चाहिए।
टैगाभास: यानि दो टैग किये जाने वाले पोस्टों के बीच का विचारांतर। वाक्य - रमेश और रानी के पोस्टों में टैगाभास परिलक्षित होता है।
वैसे कई सामासिक शब्द भी बनाये जा सकते है या आगे जिनके बनाये जाने की संभावना है।
टैगाभ्यास: टैग करने के लिए आवश्यक प्रैक्टिस या पूर्वाभ्यास।
टैगाचार और टैगाचरण: टैग किये जाने के कृत्य को टैगाचार और आचरण को टैगाचरण कहा जायेगा। इस टैगाचार या टैगाचरण शब्द का प्रयोग सकारात्मक या नकारात्मक सन्दर्भ में किया जाए, यह उस पोस्ट के गुणात्मक अर्थ पर निर्भर करेगा।
उदाहरणस्वरूप एक वाक्य देखें: उस कन्या या उस महिला ने अपने बॉस के टैगाचार अथवा टैगाचरण से तंग आकर इसकी शिकायत थाने में कर दी। अब थानेदार को यह सोचना पड़ेगा कि शिकायत को किस धारा के अंतर्गत दर्ज किया जाय।
माएँ और पिताएँ अपने बच्चों की फेसबुकीय प्रतिभा का भविष्यालोकन करते हुए उनका नाम भी इसप्रकार रख सकते है:
टैगेश, टैगेंद्र, टैगेश्वर, टैगाग्र, टैगागार, टैग शरण, टैगचरण, टैगनंदन, टैगुद्दीन, टैगलक, टैगार्डिन, टैगार्क, टैगीन, टैगानंद, टैगलीन आदि।
अगर यह शब्द आज से 20-25 साल पहले चलन में आया होता तो फ़िल्मी संगीत में एक तहलका मच गया होता:
दीदी तेरा देवर दीवाना, चाहे कुड़ियों को टैगाना।
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मेरे जीवन साथी टैग किये जा, .जवानी दीवानी खूबसूरत..जिद्दी पड़ोसन, टैग किये जा।
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तब तो हद ही हो जाएगी, जब गाने के बोल "गोली मार भेजे में...." बदलकर, " टैग कर फेसबुक में..."
हो जाएगा।

प्रिय पाठकों जब भी मुझे फेसबुक में टैग किया जाता है तो मैं "टैगाने की आत्ममुग्धता" में कई दिनों तक विभोर रहता हूँ। उस विभोरपने से अपने को निकालने में बड़ी दिक्कत होती है। आप भी टैगाने पर अपने चरमानंद की स्थिति को अवश्य जाहिर करें।
©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Monday, October 5, 2020

गाँधी और शास्त्री जी की याद में (कविता)

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#gandhipoem #shastrijipoem

परम स्नेही साहित्यान्वेषी ब्लॉग से जुड़े परिजनों,

अभिवादन! अभिनन्दन!💐!

कृपया यह संदेश अवश्य पढ़ें:

 २ अक्टूबर को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की जमशेदपुर इकाई की ऑनलाइन काव्य गोष्टी गूगल मीट के माध्यम से संपन्न हुई।  उस गोष्ठी की तस्वीरों, और भाग  लेने वाले कलमकारों के द्वारा सुनाई  गयी कविताओं की पूरी  रिपोर्ट पर आधारित यह वीडियो अवश्य देखें और अपने विचारों से अवगत कराएं।आपके विचार बहुमूल्य हैं। इसमें मेरे द्वारा कविता पाठ का ऑडीयो भी है। 

--ब्रजेन्द्रनाथ

Link: https://youtu.be/9t2DOtKfyEQ








गाँधी जी और शास्त्री जी की याद में

गाँधी की आँधी चली,
उड़ गया इंगलिस्तान।
शास्त्री जी के ब्रह्मास्त्र से,
उखड़ा पाकिस्तान।

गाँधी जी की अहिंसा,
नहीं कायरों की भाषा।
मौका देता है अरि को,
सुधरने कीअभिलाषा।

नहीं सुधरे तो शास्त्री जी
का शस्त्र झेलना होगा,
विषधर को क्यों दूध पिलाना,
अस्त्र बेधना होगा।

आज भी गाँधी प्रासंगिक है,
समरस समाज बनाना है।
भेद भाव, रंग भेद, युद्ध
का उन्माद मिटाना है।

सत्य ही है ईश्वर
गांधी ने था सिखलाया।
प्रेम का परिचय सबसे गहरा,
सबको था बतलाया।

गाँधी बोले थे देश का,
होगा मेरे शव पर विभाजन।
भारत अखंड है, रहेगा
मंजूर नहीं विखंडन।

परन्तु जिन्ना की शर्तों पर,
देश हुआ विभाजित ।
जब नेता मना रहा थे,
जश्ने आजादी दिल्ली में,
गाँधी थे नोआखाली में,
देश हुआ रक्त रंजित।

गाँधी के मूल्यों को कांग्रेस,
आजादी मिलते मोड़ चुकी,
गाँधी बापू को तस्वीरों में,
दीवालों पर छोड़ चुकी।

गाँधी के सपनो का भारत ,
आज बिलखता है।
गांधी के सपनों का भारत
कहीं नहीं दिखता है।

जनपथ को संघर्षों में आज,
कौन सुलगाता है?
लोगों का सुखभाग वह,
कहाँ छुपाता है?

भारत को आत्मनिर्भर बना,
उन्नत करना है स्वाभिमान को।
लोकल को वोकल करना है
ताकत देना है जवान और किसान को।
©ब्रजेन्द्रनाथ

Thursday, October 1, 2020

मैं क्यों आयी हूँ ये बता दे साथी (कविता)

 #BnmRachnaWorld

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मैं क्यों आयी हूँ, ये बता दे साथी

मैं ही दर्द हूँ, मैं ही जलन हूँ
मैं ही नींद हूँ मैं ही सपन हूँ।
मैं ही जिश्म हूँ, मैं ही हूँ तड़पन,
मैं ही जान हूँ, मैं ही चुभन हूँ ।

इस दर्द की कोई दवा  दे साथी।
मैं क्यो आयी हूँ, ये  बता दे साथी।

मैं ही बिस्तर हूँ, मैं ही निंदिया हूँ।।
मैं ही सूरत हूँ, मैं ही बिंदिया हूँ।
मैं बह ना सकी अपने गुमान में
मैं निश्चल, ठहरी हुई एक नदिया हूँ।

इस नदिया को फिर से बहा दे साथी।
मैं क्यों आयी हूँ, ये  बता दे साथी।

मैं ही आँगन हूँ, मैं ही धूल हूँ।
मैं ही डाली भी हूँ, मैं ही फूल हूँ।
मैं ही हूँ हरियाली, पत्तियों की
मैं ही रास्ते में पड़ी हुई शूल हूँ।

इस शूल को समूल मिटा दे साथी।
मैं क्यों आयी हूँ ये बता दे साथी।

मैं ही ईंट हूँ, मैं ही मकान हूँ।
मैं हवा भी हूँ, मैं ही तूफान हूँ।
मैं ही हूँ पतंग की डोर थामे हुए
अजनबी के लिए इक पहचान हूँ।

इस पहचान को गहरा बना दे साथी।
मैं क्यों आयी हूँ, ये बता दे साथी।


मैं ही स्वर हूँ, मैं ही गीत हूँ।
मैं ही तार हूँ, मैं ही संगीत हूँ।
मैं न खींची गयी हूँ हद से ज्यादा
इसलिए मैं ही, बन गयी प्रीत हूँ।


इस प्रीत की रीत निभा दे साथी।
मैं क्यों आयी हूँ ये बता दे साथी।


गान ज्यों मिल रहे हैं महागान से।
ज्ञान ज्यों मिल रहे हैं महाज्ञान से।
ब्यक्ति भी मिल रहा है महासमष्टि से
जैसे प्राण मिल रहे हों महाप्राण से।


यही है जीवन का सच जान ले साथी।
ये  बताने आयी हूँ,   जान ले साथी।


मैं क्यों आयी हूँ, ये जान  ले साथी।
मैं क्यों आयी हूं, ये जान ले  साथी।

©ब्रजेन्द्रनाथ

यह कविता मेरे कविता संग्रह "कौंध" से ली गयी है।



अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld  #story #affection#GovernmentOfficer अधिकारी की आत्मीयता  ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद ...