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Friday, February 25, 2022

हाथों में जुगनू उगाते है

 #BnmRacbnaWorld

#motivationalpoem

#jugnuugatehain






(एक ग़ज़लनुमा कविता)

जुगनू उगाते हैं


चलो हाथों में कुछ जुगनू उगाते है,

रेखाओं से परे, किस्मत जगाते हैं।


उन्हीं तस्वीरों पर रोया करते है लोग,

जीवन में जो दूसरों के काम आते है।


कोई तो सूरत होगी इस भीड़ में कहीं,

जिन आंखों से आप आंखें मिलाते हैं।


मैं भटकता हूँ नहीं, तिश्नगी में कहीं,

होगा कोई, जो प्यासे के पास जाते हैं।


कुछ लोग तो होंगे सफर में ऐसे भी,

जो दूसरों का बोझ अपने सर उठाते हैं।


चलो हाथों में कुछ जुगनू उगाते है,

रेखाओं से परे, किस्मत जगाते हैं।


©ब्रजेंद्रनाथ



Saturday, February 19, 2022

मधु - सिंचन (कविता) शृंगार के छंद

 #BnmRachnaWorld

#romanticverses

#शृंगारकेछंद






इमेज गूगल से साभार

मधु - रस सिंचन

(शृंगार के छंद)

अरुणाभ क्षितिज हो रहा निमग्न 
कालिमा से ढँक रहा  हो  व्योम।
सोम की बिखर रही धवल रश्मियाँ
नेह - निमंत्रण पा पुलक उठा रोम।

मलय समीर सुरभित प्रवाहित
लता - द्रुमों में झूमते पुष्पाहार।
ह्रदय गति चल रही पवमान, 
बाहों में सिमटता जा रहा संसार।

प्राणों को निमंत्रण दे रहे थे प्राण।
कहाँ से आ गई,  यह विकलता।
समीप आ गया तेरे आकर्षण में,
मन किंचित जा रहा पिघलता।

लताएँ लिपटती जब वृक्षों की डालों से
ताल तलैया का भी हो रहा संगम है।
नदियां घहराती, उफनती, जा रही मिलने 
सागर में विलीन होना ही लक्ष्य अंतिम है।

तब  नाव तट से खोलने से पूर्व ही
अर्थ ढूँढने में क्यों  भटक  जाता है?
क्यों उत्ताल तरंगों पर बढ़ने से पूर्व ही,
अविचारित से प्रश्न में उलझ जाता है?

यौवन से जीवन, या जीवन ही यौवन है,
प्रश्न पर प्रश्नों का लगा प्रश्न - चिन्ह है।
उत्तर ढूंढते  हुए, बुद्धि, ढूढती समत्व है,
वैसे ही जैसे नहीं हिम से जल भिन्न है।

मधु का ही दीपक है, मधु की ही बाती है,
मधु ही प्रकाशित है, मधु का ही ईंधन है।
मधु - यामिनी में मधु - रस बिखर रहा,
मधु - रस का हो रहा, नित्य नव - सिंचन है।

©ब्रजेंद्रनाथ





Friday, February 11, 2022

बढ़ चलो प्रगति पथ पर (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#motivational poem

#बढ़चलो #प्रगति #पथपर











(इमेज गूगल से साभार)

बढ़ चलो प्रगति पथ पर

बड़ चलो प्रगति पथ पर ,
हो तेरा संकल्प न्यारा।

उदधि की उत्ताल तरंगें,
भर रही हैं नव उमंगें।
लहरें देती हैं निमंत्रण,
बढ़ो नाविक ले नया प्रण।
पवन हो   प्रतिकूल,
पर नाविक कब है हारा।

गगन में घहराते बादल,
हवाएं , उन्मत्त पागल।
डरा   रही  हो  आंधियां,
कड़कती हो बिजलियाँ।
उन्मुक्त पक्षी कब रुका,
पंख है उसका सहारा।
बढ़ चलो प्रगति पथ पर,
हो तेरा संकल्प न्यारा।

तम अगर गहरा रहा हो,
गगन अंधियारा भरा हो।
सितारे सब छिप गए हों,
चिराग सारे बुझ गए हों।
देखो,  सूरज की किरणों,
ने रश्मिरथ को है उतारा।
बढ़ चलो प्रगति पथ पर
हो तेरा संकल्प न्यारा।

झूठ ने सच को है घेरा,
पाखंड, प्रपंच का है डेरा।
अभिमन्यु - सा लड़ते रहो
चक्रव्यूह  का भेदन  करो।
हार सकता है नहीं वह
विजय ही हो जिसका नारा।
बढ़ चलो प्रगति पथ पर,
है तेरा संकल्प न्यारा।

भगवतगीता  का  ज्ञान सकल
अविद्या - तम - प्रहार प्रबल।
विज्ञान - पथ - प्रसार  प्रतिपल,
सत्य  ही हो सतत संबल।
जीना उसी का है सार्थक,
जिसने इन्हें जीवन में उतारा।
बढ़ चलो प्रगति पथ पर
हो तेरा संकल्प न्यारा।

©ब्रजेंद्रनाथ

मेरी यह कविता मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के नीचे दिए गए लिंक पर भी मेरी आवाज में सुनें, अगर अभी तक चैनल को सब्सक्राइब नहीं किये हों, तो सब्सक्राइब कर लें, यह बिल्कुल फ्री है, और आगे भी फ्री ही रहेगा।

Link: https://youtu.be/BK1lXN-9iM4

इस रचना को लयबद्ध किया है, वरिष्ट कवि और गीतकार परम श्रद्धेय परम आदरणीय माधव पाण्डेय 'निर्मल' जी ने

https://drive.google.com/file/d/1aZO54yUzQxn0yAmjQEtonMcwJgs50vp5/view?usp=drivesdk



Friday, February 4, 2022

निकला नया सवेरा है (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#onset of spring season

#springseason









परम स्नेही मित्रों,
शिशिर के अवसान और बसंतागमन की आहट पर प्राकृतिक दृश्यों को शब्दों में गुम्फित करते हुए लिखी गईं मेरी कविता  का शीर्षक है :


निकला नया सवेरा है।

निकला नया सवेरा है।
कोहरे की छाती चीर - चीर,
किरणों के चल रहे तीर।
तम की घाटी को बेध बेध
सूरज ने प्राची को घेरा है।
निकला नया सवेरा है।

तुहिनों ने हरियाली पर चांदी
की चादर को बिछा दिया ।
नव किसलय की  कोमल सी
गंधों की मसि से लिखा दिया।
जो अनुबंध उकेरा  है।
निकला नया सवेरा है।

धूप मुंडेर से उतर रही
आंगन में आकर ठिठकी।
बूढ़ी दादी के सर्द दर्द की
कौन सुने  आकर सिसकी।
गौ के अमृत - दुग्ध- पान का
हक सबका तेरा मेरा है।
निकला नया सवेरा है।

नभ को छूती फुनगियों पर
किरणें  आती टिक जाती हैं।
कोयल भी कुहू कुहू कहकर
नव जीवन राग सुनाती है।
बगुलों की  धवल पांत का
तड़ाग तटों  पर डेरा है।
निकला  नया सवेरा है।

शिशिर अब विदा ले रहा,
बसंत के आने की आहट।
मन्मथ के मृदुल राग ले
मदिर समीर की अकुलाहट।
हर्ष का सर्वत्र बसेरा है।
निकला नया सवेरा है।

@ब्रजेंद्रनाथ

मेरी इस कविता को मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस लिंक पर सुनें, चैनल को सब्सक्राइब करें, अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएं! सादर!

Link : https://youtu.be/21-aEDf1Paw






Friday, January 28, 2022

इस गणतंत्र टूट रहे सारे भ्रमजाल (कविता) # गणतंत्र दिवस 2022

 ##BnmRachnaWorld

#poemonrepublicday

#गणतंत्र दिवस








इस गणतंत्र  टूट रहे सारे भ्रम जाल।

🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬


भारत नही त्रिपिटक लेकर
अब शांति प्रस्ताव पढ़ता है।
देश सत्य के लिए जीत की
परिभाषा खुद गढ़ता है।

विश्व समझे भारत की दृष्टि विशाल।
इस गणतंत्र  टूट रहे सारे भ्रम जाल।

जो रहे अब तक भ्रम में
गंगा- जमुनी तहजीब रटा करते थे।
जो रहे अब तक घात क्रम में,
देश को जर्जर किया करते थे।

उनकी पहचान हुई, सुलझे सब सवाल।
इस गणतंत्र  टूट रहे सारे भ्रम जाल।

अब वीर देश की जीत का
मुकुट धारण करता है।
प्रलय के मेघों का मुख मोड़
चट्टानों में राह बनाया करता है।

देश दुश्मनों की ताड़ चुका हर चाल।
इस गणतंत्र  टूट रहे सारे भ्रम जाल।

कुछ छद्म बुद्धिजीवी क्यों,
आस्थाओं पर करते हैं प्रहार?
उन्हें पता होना चाहिए,
नहीं देश को यह स्वीकार।

समझो हमारी भाषा वरना जाओगे पाताल।
इस गणतंत्र  टूट रहे सारे भ्रम जाल।


अमर जवान ज्योति, समर
स्मृति में हो रही है विलीन,
वीर भूमि के अमर शहीदों,
आपकी यादों में हम हैं तल्लीन।
आपके शौर्य से  होली में है रंग गुलाल।
इस गणतंत्र  टूट रहे सारे भ्रम जाल।


आओ देश के लिए जगाओ अंगार को,
आओ देश के लिए स्वर दो हुंकार को।
आओ देश के लिए गुंजाओ दहाड़ को।
आओ देश के लिए झुकाओ पहाड़ को,

जवानियों में धधक रहा है लाल - लाल ज्वाल ।
इस गणतंत्र  टूट रहे सारे भ्रम जाल।

इस कविता को मेरी आवाज में यूट्यूब के इस लिंक पर सुनें:

https://youtu.be/0lsUosOyLLo


Friday, January 21, 2022

वही वीर कहलायेगा (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#motivational poem









वही वीर कहलायेगा


शतरंज के रण में राजा खड़ा,

खोज रहा है साथ,

घोड़े, हाथी, सैनिक दौड़ो,

होगी सह और मात।


आक्रमण की हो रणनीति

कि वह निकल न पाए,

दुश्मन पर करो प्रहार

कि वो फिर सम्हल न पाए।


चाल उसकी भाँपो और

अपनी चल तो ऐसी चाल,

दुश्मन के घोड़े - हाथी मारो,

मचा दो रण में बवाल।


बजाओ नगाड़े, घंटों को,

गूंजे दिशाएं ललकारों  से,

रुंड, मुंड, मेदिनी, अंतड़ियाँ

बेधो तीर- तलवारों से।


ऐसा रण हो, ऐसा रण

फिर कभी नहीं वैसा रण हो,

गिरती रहे बिजलियाँ,

विकट आयुधों का वर्षण हो।


एक युद्ध चल रहा अंतर में,

लड़ें उससे ऐसे रथ पर,

सत्य, शील की ध्वजा,

बल विवेक के घोड़े हो पथ पर।


क्षमा, कृपा , समता की रस्सी,

ईश भजन हो सारथी,

विराग, संतोष का कृपाण हो,

युद्ध में बने रहे परमार्थी।


यह संसार है महारिपु,

उससे युद्ध जो जीत जाएगा,

जिसका ऐसा दृढ़ संकल्प हो,

वही वीर कहलायेगा।

©ब्रजेंद्रनाथ

Friday, January 14, 2022

घड़ी की टिक टिक सुनाता हूँ (कविता)

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#poemmotivational












वक्त के साथ कुछ वक्त बिताता हूँ

आ तुम्हें घड़ी की टिक-टिक सुनाता हूँ,
चलो वक्त के साथ कुछ वक्त बिताता हूँ।

समय जो निकल गया लौट आएगा फिर,
इसी गलत फहमी में खुशियाँ मनाता हूँ।

दस्तक देता है समय, अवसरों के साथ
उनसे अनजान अपनी पहचान बनाता हूँ।

घड़ी का क्या वो तो निकलता जाएगा।
रेत भरी मुट्ठियों में जुगनूयें सजाता हूँ।

समय के पार कोई न निकला है कभी,
उसी दायरे में खुशी के पल चुराता हूँ।

©ब्रजेंद्रनाथ √

Saturday, January 8, 2022

नर्सिगवाड़ी, कोल्हापुर से होते हुए गगनबावड़ा का भ्रमण: (यात्रा संस्मरण)

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#memoirs of journey

#yatrasansmaran
















26 दिसंबर 2021: रविवार

 नर्सिगवाड़ी, कोल्हापुर से होते हुए गगनबावड़ा का भ्रमण: 

सुबह नर्सिघवाडी के मंदिर दर्शन के लिए तैयार होने में सभी लगे थे। साढ़े आठ बजे का समय निर्धारित था। मैंने शेव किया, स्नान किया और परिधान परिवर्तन कर चल दिये, कृष्णा किनारे। वहाँ पहुँचकर शांत दोनों किनारों में जल परिपूरित दक्षिण की ओर प्रवाहमान कृष्णा नदी के दर्शन हुए। भारतवर्ष में नदियों ने सभ्यता और सनातन धर्म के पोषण और परिवर्द्धन में जैसी भूमिका निभाई है, वैसी कहीं और दृष्टि गत नहीं होती है। इसीलिए हमारी सभ्यता को सिंधु सरस्वती सभ्यता कहा जाता है। दक्षिण की चार नदियाँ, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा और कृष्णा निरंतर सलिला हैं। जिनके तटों पर कई धार्मिक और सांस्कृतिक नगर बसे हुए हैं।

कृष्णा नदी महाबालेश्वर से निकलती है। यह महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। 

कृष्णा नदी का यह तट पंचगंगा और कृष्णा नदी का संगम स्थल है। कहा जाता  है कि पञ्चगंगा में पांच नदियाँ और पंच गंगा और कृष्णा यानि सात नदियों का संगम है।  हमलोग कृष्णा के तट पर भगवान दत्तात्रेय के मंदिर का दर्शन किये। पंडित जी ने संकल्प भी करवाये। एक घंटे के अंदर पूजा की सारी प्रक्रिया समाप्त हुई। बाहर निकलकर 'होल्सरे' डोसा होटल में डोसा खाये। होटल में प्रवेश के ठीक पहले वहाँ एक बुजुर्ग को निपुणता और शीघ्रता से होटल में  डोसा बनाते हुए देखकर  मन प्रसन्न हो गया। उनसे मैंने पूछा तो उन्होंने ही बताया कि उनकी उम्र 67 वर्ष है। 

वहाँ से होटल आकर पैकिंग किया और साढ़े ग्यारह  बजे गगनबावड़ा की ओर निकल पड़े। रास्ते में कोल्हापुर में अम्बाई मंदिर के भी दर्शन करने थे। 

कोल्हापुर तो शीघ्र पहुँच गए। बीच में कोल्हापुर के एम आई डी सी क्षेत्र से गुजरना हुआ। उसी के चौराहे पर 'अमृत तुल्य' ब्रांड, जो महाराष्ट्र में हर जगह अपनी आधुनिक टपरी स्थापित कर चुका है, में दो कप चाय एक साथ पी। मूल्य भी सामान्य, दस रुपये कप। सचमुच चाय बहुत अच्छी थी। 

"येवले अमृत तुल्य" की कहानी  पुणे जिल्हा के पुरंदर तहसील के छोटे से गाँव अस्करवाड़ी के दूध बेचने वाले दसरथ येवले के उत्कर्ष की कहानी है, जिसने अमृततुल्य ब्रांड को चाय के मिश्रण के स्पेशल ब्रांड के रूप में "येवले अमृत तुल्य" को स्थापित किया।  इस ब्रांड में, के एफ सी, मैकडोनाल्ड, डोमिनोज, सबवे आदि से आगे निकलने की अपार सम्भावनाएं हैं। हमलोगों ने कोल्हापुर के अम्बाई मंदिर में अम्बा माँ के दर्शन किये। 

लाइन लंबी थी, फिर मैनेज कर दर्शन सुनिश्चित किया गया। 

रामकृष्ण होटल में दिन का भोजन किया ।वहाँ से हमलोग गगनबावड़ा, जो करीब 4500 फीट ऊंचाई पर रत्नागिरी पहाड़ों के एक श्रृंग पर एक गुफा मंदिर है, के लिए चल पड़े। गगनबावड़ा के रास्ते में ही कोल्हापुर में रंगला लेक था। यह काफी दूर में फैला हुआ 75 फीट गहरा लेक है। आठवीं सदी में यह एक स्टोन क्वेरी था। नवीं सदी में एक भयंकर भूकंप में वह क्वेरी  जल से भर गया। साथ ही जल के स्वतः निर्मित श्रोत से भी यह सुंदर लेक परिपूरित हो गया। मन तो इस झील के किनारे घूमने का हो रहा था, लेकिन गगनबावड़ा के उतुंग शिखर पर रात होने के पहले चढ़ जाना आवश्यक था।  गाड़ी भी एक सीमा तक ही जा सकती थी। उसके बाद करीब डेढ़ सौ सीढ़ियों की सीधी चढ़ाई थी। इस चुनौती को पार करना आवश्यक था। सीढ़ियों पर विद्युत प्रकाश की व्यवस्था नहीं थी। इसीलिए लेक घूमने का लोभ संवरण करना पड़ा। 

वहाँ से जंगल और घाट के घुमावदार रास्ते से होते हुए गगनबावड़ा के उस स्थान तक पहुँचे, जहाँ से सीढ़ियों की सीधी चढ़ाई आरम्भ होती थी। हमलोग सूर्यास्त होते - होते ऊपर चोटी तक पहुँच चुके थे। वहाँ पहुँचते ही सारी थकान दूर हो गई। यहाँ के बापू (जो यहां के वर्तमान संचालक है) के यात्रियों के प्रति अद्भुत वात्सल्य देखकर मन आनन्दित हो गया। रात्रि भोजन शुद्ध और सात्विक,  एक आश्रम जैसा। रात्रि विश्राम भी सुखानुभूति से परिपूर्ण। यहां ठंढ बिल्कुल नहीं थी, बस हवाएँ तेज चल रहीं थी। रात में थकावट के कारण गहरी नींद आयी।

Saturday, January 1, 2022

नव वर्ष में नव हर्ष के विस्तार का हो अभिनंदन (कविता)

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#newyearpoem

#2022newyear









परम स्नेही साहित्यान्वेषी सुधीजनों,

नमस्ते👏!

आपको और आपके पूरे परिवार , समस्त कुटुम्बीजनों और मित्रों को नव वर्ष की शुभकामनाएँ💐!

शुद्ध साहित्यिक रचनाओं के मेरे ब्लॉग से जुड़ने  पर मैं ब्रजेन्द्र नाथ आपका हार्दिक नववर्षाभिनन्दन करता हूँ | अंग्रेजी कैलेंडर वर्ष का आरम्भ हो गया है | विगत वर्ष के दंशों और विकारों को विस्मृत कर इस वर्ष के हर्ष और उत्कर्ष के लिए प्रयासों और प्रयत्नों को सुनियोजित कर आगे विकास के उच्च पथ पर आइये बढ़ चलते हैं : मेरी इस रचना के ऐसे ही भाव हैं, आप सुनें --

आपके लिए यह वर्ष उल्लास और उमंगों से ओतप्रोत हो | आप उत्कर्ष के नए शिखरों को प्राप्त करें, यही मेरी शुभकामनाएं हैं |

*नव हर्ष के विस्तार का अभिनंदन*

नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।
नव हर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।

सन इक्कीस के उस
दंश को भूलना है कठिन ।
हमने खाये तीर कई,
जिन्हें भूलना है कठिन ।
फिर भी नव संचार का करते हैं हम सर्जन।
नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।

नव वर्ष की नव रश्मियाँ
दे रहीं संदेश पल - पल।
सुधियाँ वही जो दे खुशी,
हो यही उद्घोष प्रतिपल।

नव स्फूर्ति के नवाचार का करते है संचरण।
नव स्पर्श के विस्तार का करते है अभिनंदन।
नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।

नव पल्लवों पर ओस की
बूंदें टिकती,  जैसे ज्योति।
पवन रचता है  हिंडोला
सीप में पलती है मोती।

नव - प्रकृति - आधार का करते हैं अवलोकन।
नव संस्पर्श के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।
नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।

कोहरा छाया है गगन में,
सूरज का रश्मिरथ रुका।
किरणें फिर भी चीरती है,
लो रथ का पहिया चल पड़ा।

सदप्रयास के प्रचार का रुकता नहीं है कभी चरण।
नव उत्कर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।
नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनन्दन।

इस वर्ष देखेगा जमाना
नया एक हुंकार प्रबल।
इस वर्ष छायेगा जगत में
भारत का नवाचार निश्छल।

विश्व में हम व्यापार का देते है नव संस्करण।
नव अर्श के विस्तार का करते है अभिनंदन।
नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।

स्तुत्य है,  हमारे लिए लीं
सीने पे जिसने गोलियाँ।
उनकी जागती  रहती हैं आँखें
माएँ सुनाएँ लोरियाँ।
 
शौर्य है अपार उनका, करते है नितवंदन।
नव कंदर्प के विस्तार का करते है नित चयन।
नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।

नव स्थापनाओं के लिए
मन्तव्य का  मंथन करो।
शोध में नयी सोच का
विविध विश्लेषण करो।

विमर्श के स्वीकार का, करते हैं अन्वेषण।
नव वर्ष के विस्तार का करते हैं अभिनंदन।
©ब्रजेंद्रनाथ
यूट्यूब लिंक:

https://youtu.be/0FVj0o9qPSg

मेरे इस चैनल को सब्सक्राइब करें, यह बिलकुल निःशुक्ल है और रहेगा | नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ आपका अपना शुभाकांक्षी
ब्रजेन्द्रनाथ


Friday, December 24, 2021

अटल जी और मालवीय जी पर कविता (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#atalji #malwiyaji











परम स्नेही मित्रों,

कल यानि 25 दिसंबर को दो भारतरत्नों  का *अवतरण दिवस है। महामना मदनमोहन मालवीय और अटल विहारी बाजपेयी जी* । दोनों ने भारतीयता और भारतीय राजनीति को दलनीति से ऊपर उठाकर नई दिशा दी। आप उनके बारे में व्यक्त मेरे उदगार मेरी लिखी कविता में सुनें, मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के इस लिंक पर:

https://youtu.be/_JBxeqzU3NU


कविता की कुछ पंक्तियाँ इसप्रकार हैं:

भारत रत्न मदन मोहन मालवीय पर चार पांक्तियाँ: 


याद करते आज तुझको श्रद्धावनत हो

तेरा निर्माण पथ पर अडिग अभियान रचना।

खड़ा कर एक अद्भुत शिक्षा का विशाल केन्द्र

सामान्य जन को दिया विद्या-दान, हे महामना। 


आपकी कीर्ति पताका आज भी लहरा रही है।

कर्मपथ के योगियों को आगे बढ़ो बतला रही है।

आपके चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित हैं मेरे,

आग अन्दर में जलती रहे,  हमें यह समझा रही है। 


---------- 


अटल जी पर मेरी कविता 


मैं अटल हूँ, मैं अटल हूँ 


मैं अग्निशिखा की मशाल हूँ 

मैं सिन्धु के जल का उबाल हूँ 

मैं हूँ केसर की क्यारियों का रंग केसरिया

मैं धरा को तौलता एक भूचाल हूँ। 

बंद करो घुसपैठ की जंग तुम अगर

मैं सहज, सीधा सादा सरल हूँ। 

मैं अटल हूँ, मैं अटल हूँ। 


मैं तेज हूँ बजरंग बली का,

मैं तप हूँ सावरकर का,

मैं तीक्ष्णता हूँ भीष्म के वाणों का,

मैं दाह हूँ दिनकर का।

मैं दोस्तों के लिए दोस्त हूँ,

अरियों के लिए काल हूँ,

मैं प्रहरी सा प्रखर, प्रचंड,

मैं तोपो की दहानों सा विकराल हूँ।

मैं अखंड भारत के सपने लिए

गगन -  नक्षत्र - सा, स्थिर  अचल हूँ।

मैं अटल हूँ, में अटल हूँ। 


मैं भारत वासियों की भावनाओं पर

बेबस हो जाता हूँ।

कन्धार विमान अपहरण पर

आतंकियों को छोड़ने पर विवश हो जाता हूँ।

कारगिल  मे 

घुस आए दुश्मनों के लिए  हूँ

अग्नि -दाह - गोला हूँ।

मैं सर्जक हूँ, शब्द -अंगारों का

नव दधीचियों की खोज में

निकला अकेला हूँ।

मैं मृत्यु में जीवन को खोजता 

पल पल हूँ।

मैं अटल हूँ, मैं अटल हूँ। 


मैं खोज रहा अपना परिचय

रग - रग हिन्दू हूँ, क्या विस्मय?

मैं नाद - स्वर - घंटों में गुंजित

मेरे क्रोधानल में बसा प्रलय।

मैं उदधि - सा शांत, 

मैं जल की उत्ताल तरंग।

मैं नाचता काल- खंड पर,

मैं ही राष्ट्र - रागिनी की उमंग।

मैं जलती बाती की ज्योति

निष्कंप,  निश्चल हूँ।

में अटल हूँ, मैं अटल हूँ। 


मैं नेताओं जैसी लफ्फाजी में नहीं

राजनीति की जीती हुयी बाजी में भी नहीं।

मैं अक्षरों में, शब्दों में,

वाक्यों में, गीतों में।

मैं हार में, व्यवहार में,

अरियों में, मीतों में।

मैं सुधीजनों की सुधियों में

तैरता तरल हूँ।

मैं अटल हूँ, मैं अटल हूँ। 


मैं राजनीति के शिखर में नहीं,

मैं कूटनीति के स्वर मे नहीं।

मैं बन्चितों की चीख में,

मैं भिखुओं की भीख में हूँ।

मै कतार में खड़े हर उस

अन्तिम आदमी की भूख में हूँ।

मिटाने को दारिद्रय-दुख दोष

रहता सदा विह्वल हूँ।

मैं अटल हूँ, मैं अटल हूँ।

©ब्रजेंद्रनाथ

Friday, December 17, 2021

खुद की ही जलधार बनो तुम (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#motivational










खुद की ही जलधार बनों तुम

बून्द नहीं तुम बनो किसीकी
खुद की ही जलधार बनों तुम।

तुमने जीवन पथ में कितने
चट्टानों को पार किया  है।
तुमने कर्म तीरथ में कितने
तूफानों को पार किया है।

अब तो बन जा साथी अपना
मन - वीणा की झंकार बनो तुम।

लोग कहते है, जीवन क्रम में
सुख दुख की है एक कहानी।
जितनी बहती नदिया उतनी
साफ किनारा  बहता पानी।

तुमने कितनों को पार किया है
खुद की भी पतवार  बनो तुम।

बाहर का  शोर बढ़ रहा
ध्वनित तरंग गौण हो गया?
साधना के पथ पर चलकर
मुखरित मन मौन हो गया।

आत्मतत्व से मधुर मिलन कर
जीवन का संस्कार करो तुम।

अनहद को सुनने को आतुर
प्राण - प्राण जब विकल हो उठे।
अमृत आनंद का हो संचरण
हिय गह्वर में कमल खिल उठे।

अंतरतम जब डूब गया हो
अखंड ब्रह्मण्ड विस्तार बनो तुम।
बून्द नहीं तुम बनो किसीकी
खुद की ही जलधार बनों तुम।
©ब्रजेंद्रनाथ

Thursday, December 9, 2021

विपिन रावत सी डी एस की दुर्घटना में मृत्यु पर(कविता)

 #BnmRachnaWorld

#Bipin Rawat












परम स्नेही मित्रों,
नमस्कार!👏
सी डी एस विपिन रावत  जी के दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना में आकस्मिक निधन से हम सब आहत हैं, स्तब्ध हैं। मैं अपने उदगार  इन पंक्तियों में व्यक्त करना चाहता हूँ।  आपके मन में भी कुछ ऐसे ही भाव उठ रहे होंगे। शायद मेरे इन शब्दों में आप भी अपने भावों की अभिव्यक्ति की अनुगूंज सुन सकें...

वह जहाँ निकल जाता था,
वहसी ब्याघ्र विवर्ण हो जाते थे।
वह जिधर था पाँव बढ़ाता,
गिद्धों के गर्व  चूर्ण हो जाते थे।

सिंह के कंधे सा सुपुष्ट 
वज्र- सा था कबंध  उसका।
भारत माता की रक्षा का
एक ही था अनुबंध उसका।

युद्ध में नेतृत्व जिधर किया
मारा अरि को कीट - पतंगे सा।
भूभागों की  रक्षा की उसने,
गगन रंगीन हो उठा तिरंगे - सा।

जबसे वह  तीनों सेनाओं
का  बना मुख्य सैन्य अधिकारी।
अंतर सैन्य सहयोग बढ़ा,
अजेय सेना बन गयी हमारी।

आदेश दिया,उसने दुश्मन के
खेमे में घुसकर वार करो।
आतंकियों के सारे ठिकाने को
ध्वस्त करो, संहार करो।

दुश्मन देशों के सैन्य बल
काँपते थे उसके उद्घोष से।
सेनाओं में खलबली मची ,
मारक राफेल - ब्रह्मोस् से।

हम उस सेनानी के निधन से
आहत है,  पर आंसू नहीं बहाएंगे।
शपथ  लेते हैं आज हम
उस जैसा हर सेनानी को बनाएंगे।
©ब्रजेंद्रनाथ √√

मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस लिंक पर ऊपर दी गयी कविता को अवश्य सुनें...सादर आभार!
https://youtu.be/LB5hxz1kOx0


Monday, November 1, 2021

रिश्तों की रसधार (कहानी) लघुकथा

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रिश्तों की रसधार
आनंद और रीमा दोनों आई टी कम्पनी के अपने ऑफिस के लिए सुबह ही निकलते थे। रीमा पहले निकलती थी और आनंद उसके आधा घंटे बाद।
"रीमा, तूने नाश्ता नहीं लिया।"
सुबह - सुबह ऑफिस के लिए तैयार हो रही रीमा से आनंद ने पूछा था।
"आनंद, नाश्ते के डब्बा सिंक के पास रखा  हैं,  मुझे देर हो रही है, मैं निकल रही हूँ।" रीमा ने तैयार होते हुए ही कहा था।
"ठहरो, उसे धोकर, मैं उसमें तुम्हारा नाश्ता पैक कर देता हूँ।"
आनंद ने अनुरोध किया था।
" रहने दो आनंद, देर हो जाएगी।"
" सिर्फ दो मिनट रुको,  दो मिनट में कोई देर नहीं हो जाएगी।"
आनंद ने सिंक के पास रखे नाश्ते के डिब्बे को खोला था।
"क्या रीमा, तुम भी न। ये बची हुई सब्जियाँ इसी में पड़ी हैं। वहाँ से डिब्बा थोड़ा साफ ही कर लिया करो, इसमें कोई ज्यादा समय और मेहनत तो लगती नहीं।"
आनंद के इस तरह बात करने से रीमा का मन कसैला हो गया था। अनमने भाव से ही आनंद के द्वारा पैक किये गए नाश्ते को उसने लिया था और पैर पटकते हुए ऑफिस के लिए निकल गयी थी।
आनंद रीमा के बाद ऑफिस जाता था। ऑफिस से वह रात को ही लौटता था।
उस दिन रीमा शाम को थोड़ा पहले ही ऑफिस से आ गयी थी।
आनंद के ऑफिस से आते ही रीमा ने उसके बैकपैक से उसके नाश्ते के डिब्बा निकाला था।  सिंक के पास जाकर उसने डिब्बे को खोला था।
उससे बोले बिना रहा नही गया, "क्या आनंद, डिब्बे में सारी बची हुई सब्जियाँ पड़ी हैं। इसे ऑफिस से धोकर या खंगालकर नहीं ला सकते?"
आनंद समझ गया था, यह रीमा का प्रतिउत्तर था, सुबह के उसके व्यवहार के लिए। आनंद चुप ही रहा।
जब हिसाब बराबर कर दोनों बेड पर गए, तो आनंद के पिता जी का फोन आया था,
"बेटे, मैं, तुम्हारी माँ, और तुम्हारी दीदी तुमसे मिलने आ रहे हैं।"
आनंद को कोई जवाब नही सूझ रहा था। वह क्या कहे? उसने कहा था, "पिताजी,  बहुत दिक्कत हो जाएगी।"
पिताजी बोले, "हमें, काहे को कोई दिक्कत होगी।"
"पिताजी, आपको नहीं, हमें दिक्कत हो जाएगी।"
"अच्छा बेटे, हमलोग नहीं आएंगे।"
आनंद और रीमा बेड के दो किनारे सो गए थे, नदी के दो किनारे ही गए थे।
सुबह रीमा पहले उठी। उठने के बाद उसने पहला काम किया, आनंद के पिताजी को कॉल किया था, "प्रणाम पिताजी, मैं रीमा बोल रही हूँ। आपलोगों ने यहाँ आने का प्रोग्राम बनाया है, उसे कैंसिल मत कीजिए। आपलोग जरूर आइए। शादी के बाद आपलोगों के साथ ज्यादा दिन नहीं रह सकी। माँ और दीदी को लेकर यहाँ आएंगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा।"
आनंद ये सारी बातें सुन रहा था।
उसकी आँखों के कोर भींग गए। उसने पीछे से आकर रीमा को बाहों में भर लिया।
"रीमा, हमलोगों के बीच प्रेम की धारा कभी नहीं सूखेगी। मेरा ये वादा रहा।"
और  नदी के दोनों किनारों के बीच रसधार  बहती रही...।
©ब्रजेंद्रनाथ

Sunday, October 24, 2021

अलिखित रिश्ता (कहानी) लघु कहानी

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अलिखित रिश्ता
कृष्णचन्द्र वैसे कवि नहीं था। परंतु दोस्तों के बीच वह तुकबंदी कर कुछ - कुछ सुना दिया करता था। लोग भी इतने बेवकूफ थे या वह उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाने में सफल हो गया था कि वे उसे कवि समझने लगे थे। लोगों को क्या मालूम कि कविता मात्र तुकबंदी नहीं होती है। जब भावों के घनीभूत बादल शब्दों के जलकण के रूप में बरसते हैं, तभी कविता की अजस्र सरिता प्रवाहित होती है। उसके  मित्र इन सभी स्थापनाओं से अनभिज्ञ होते हुए भी कृष्णचन्द्र को कवि मान बैठे थे। इसीलिए उन्होंने उसका नाम कृष्णचन्द्र से बदलकर कविकृष्ण कर दिया था।
कविकृष्ण की रुचि कविताएँ पढ़ने में थी। उसे गद्य लिखना अच्छा लगता था। उसे कथा - साहित्य का फलक अधिक पसन्द था। इसीलिए उसने कथा - साहित्य के विभिन्न आयामों को समझने के लिए हिंदी पाठकों के बहुचर्चित वेबसाइट पर  "पाठकों से संवाद" धारावाहिक के द्वारा स्वातंत्र्योत्तर भारत में कथा - साहित्य के विकास और ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी प्रेमचन्द की कहानियों और रेणु की आंचलिकता पर अपने दृष्टिकोण को रख रहा था। इस संवाद के क्रम को काफी पाठकों द्वारा सराहना मिल रही थी।
एक पाठक या कहें पाठिका की  टिप्पणी कविकृष्ण के  "पाठकों के संवाद" के पिछले 50 (पचास) सप्ताहों से लिखे जा रहे धारावाहिक लेख पर तुरंत आ जाया करती थी। इस बार उसकी टिप्पणी जब इस सप्ताह के प्रकाशित भाग के तीसरे दिन दिन भी नहीं आयी, तो कविकृष्ण का मन विचलित हो उठा। कई आशंकाएं मन में घिरने लगी। क्या हो सकता है? कहीं उसकी तबियत तो खराब नहीं हो गयी? वह कितनी अच्छी समीक्षा लिखती थी, उसके लेखों पर।
पिछले अप्रील में जब कोविड संक्रमण के हल्के लक्षण से ग्रस्त होने के कारण दो सप्ताह तक वह अपने "पाठकों से संवाद" के क्रम को जारी नहीं रख सका था, तब  उसके कितने मैसेज आ गए थे-
"आपका लेख क्यों नहीं आ रहा है? आपके लेख से मैं ऊर्जा प्राप्त कर पूरे सप्ताह मनोयोगपूर्वक अपने कार्य सम्पन्न करती हूँ। लग रहा है, कहीं कुछ दरक रहा है, जिंदगी में...कहीं अधूरेपन की आशंका घेर रही है...कहीं कुछ अदृश्य - सा, अनकहा - सा रह जा रहा है...कुछ तंतु चटक रहे हैं...बहुत खाली - खाली - सा लग रहा है...और भी बहुत सारे मैसेज कविकृष्ण ने देखे थे, जब वह स्वस्थ होकर लिखने और पढ़ने की स्थिति में आ गया था।
कविकृष्ण ने अपनी अस्वस्थता के बारे में सीधे और सहज ढंग से अपने संदेश में लिख डाला था।
उसपर उसके उत्तर से वह हतप्रभ रह गया था, "आपको पता है कि आपकी लेखनी से निकले शब्दों को जबतक मैं अंतरतम में उतार नहीं लेती, तबतक मेरा सारा अध्ययन अधूरा लगता है। आपने नए शब्दों से मेरा परिचय कराया है। मैं साहित्य में रुचि नहीं रखती थी, आपने रुचि जगा दी है। उस रुचि के अंकुर को आपने पोषण दिया है। आप इसतरह 'लेखनी का मौन' नहीं धारण कर सकते। आपको लिखना होगा...लिखते रहना होगा...जबतक मेरा लेखन परिपक्व नहीं हो जाता..."
कविकृष्ण ने  लिखते रहने का निश्चय किया। उसे मैसेज कर दिया था, "मेरी लेखनी नहीं रुकेगी... "पाठकों से संवाद" का यह क्रम तबतक आगे  बढ़ता रहेगा जबतक मेरी लेखनी चलती रहेगी..."
इस सप्ताह उसी की टिप्पणी नहीं आयी।
कविकृष्ण की लेखनी में थरथराहट सी होने लगी...कुछ भी आगे लिखने का मन नहीं कर रहा था...वही आशंकाएं घेरने लगी थी...अनावश्यक अनहोनी के अनकहे आख्यान अनायास मन के आकाश में मंडराने लगे थे...इनमें सबसे अधिक तबियत खराब होना, यह भी उतना बड़ा कारण नहीं लगा था...तबियत इतना खराब हो जाना कि लिखने की ऊर्जा भी नहीं बची हो...मोबाइल पर भी टंकण की स्थिति न हो...इससे उसका मन अधिक विचलित हो गया था।
कविकृष्ण ने भी दृढ़ निश्चय कर लिया था कि पिछले भाग पर जबतक उसकी कोई टिप्पणी नहीं आती है, वह आगे का भाग प्रकाशित नहीं करेगा... भले  ही "पाठकों  से संवाद" के इस क्रम को यहीं विराम देना पड़ जाय।
"पाठकों से संवाद" धारावाहिक में कितनी अच्छी चर्चा चल रही थी। कविकृष्ण आँचलिकता पर अपने विचार लिख रहे थे।
फणीश्वरनाथ रेणु जी की कहानी "मारे गए गुलफाम" (जिसपर सन 1966 में 'तीसरी कसम' नामक फ़िल्म भी बन चुकी थी) के परिदृश्यों पर संवाद के क्रम का यह सिलसिला आगे बढ़ रहा था। हीराबाई और हिरामन के बीच पनपता अलिखित प्रेम कितना जीवंत हो उठा था...हिरामन की पीठ में उठती गुदगुदी से आरंभ होती कहानी...हीराबाई का मीता कहने का आग्रह और हिरामन के मुँह से एक शब्द निकलना ...'इस्स'...आँचलिकता पर यह विवेचन रेणु के "मैला आँचल" उपन्यास तक पहुँचने ही वाला था कि उसकी टिप्पणी के नहीं आने से "संवाद की धारा" अवरुद्ध होती - सी लगी थी...
इस सप्ताह के भाग के प्रकाशन के चौथे दिन उसका मेसेज आया था,
"मेरा मोबाइल हैंग हो गया था...मैं न कुछ पढ़ पा रही थी, न लिख पा रही थी...उसके बाद मोबाइल डिस्चार्ज हो गया...रिपेयर के लिए देना पड़ा...उसका चार्जिंग पोर्ट खराब हो गया था...अभी ठीक है...मैंने आज ही आपके लेख पर टिप्पणी लिखी है...
आप आँचलिकता पर अपनी विवेचना जारी रखें...मैं ऊर्जस्वित हूँ...हर्षित हूँ...सादर!"
कविकृष्ण के अंतर्मन में उठ रहीं सारी आशंकाओं की विपरीत दिशाओं पर विराम लग गया था।
कविकृष्ण  "पाठकों से संवाद" के आगे के क्रम को बढ़ाने के पहले अपनी उद्विग्नता के बारे में सोचने लगा...कोई बंधन या अनुबंध तो है नहीं, फिर मात्र टिप्पणी नहीं आने से वह चिंतित क्यों हो गया?...कुछ तो रेशे हैं जो अदृश्य होते हुए भी बाँधने लगते हैं...
उसे जब कुछ नहीं लिखने का मन होता है तो वह एफ एम के रेडियो चैनल पर गाने सुनने लगता है...उसने एफ एम रेडियो चालू कर लिया था...एक गीत आ रहा था..
"हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू,
हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो।
सिर्फ अहसास है ये, रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।"
कविकृष्ण ने लिखना शुरू किया 'पाठकों से संवाद' लेकिन लिख गया...
"अलिखित रिश्ते को अघोषित ही रहने दो..."
©ब्रजेंद्रनाथ

'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख )

 #bnmrachnaworld  ‘ गुनाहो का देवता’ को एक बार फिर पढ़ना  डॉ धर्मवीर भारती की लिखी और हर वर्ग के पाठकों द्वारा सबसे अधिक पढ़ी गयी कृतियों में ...