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Friday, August 12, 2022

हर घर तिरंगा लहरायेंगे कविता)

 #BnmRachnaWorld

#amritmagotsavpoem

#हर घर तिरंगा फहरायेंगे








परमस्नेही मित्रों,
 आजादी की अमृत महोत्सव के तहत 13 से 15 अगस्त तक हर घर तिरंगा फहराने के अभियान का आरम्भ हो रहा है. इस अवसर पर, स्वतंत्रता को कैसे हासिल किया गया, किन अनाम और गुमनाम वीरों ने उस यज्ञ में आहुति दी और अब स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे कंधों पर कर्त्तव्यो की क्या जिम्मेवारी है, उन्हें रेखांकित करते हुए मेरी कविता सुनें "हर घर तिरंगा लहरायेंगे"

हर घर तिरंगा लहरायेंगे 
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आओ मनायें  आजादी का अमृत महोत्सव

स्वतंत्रता की शौर्य गाथा का विजयोत्सव |

सन सैतालिस में तिरंगा जो लाल किले पे लहराया था.
उसमे शहीदों का लाल लहू पाँचवाँ रंग कहलाया था.

आजादी के संघर्षों का इतिहास याद  कर लो प्यारो,
गोली खाकर खेत हुए,  कुछ शूली पर चढ़ गए यारों.

याद करो आजाद, भगत, सुखदेव, राजगुरु, बिस्मिल को,
याद करो आजाद हिन्द वालों  की क्रांति की बिगुल को.

याद करो जो जालियांवला बाग़ में खून बहाए थे.
याद उन्हें भी कर लेना जो अनाम शहीद कहाए थे.

भूल उन्हें भी मत जाना संथाल क्रांति के वीरों को,
सिद्धू - कान्हू, बिरसा मुंडा, फूलो - झामो के तीरों को.

मंगल पांडे, तात्या टोपे, वीर कुंवर,  लक्ष्मीबाई को,
पीर अली, नाना साहेब, जैसे बांकुरों की अथक लड़ाई को.

बर्फ़ानी, बारिश में, आंधी में, रेतीले तूफ़ानों में,
घहराते युद्धक विमानों में, तोपों के विकट दहानों में.

जो डटे रहे, बढ़ते रहे किंचित भी विचलित नहीं हुए.
जो चढ़ गए चोटियों पर, तनिक थकित भी नहीं हुए.

जो तिरंगे में लिपट गए, राष्ट्र - शक्ति - शौर्य - सम्मान किया,
उन्हें याद करते हैं हम, तिरंगे के पांचवे रंग को मान दिया.

उन्हीं की शान में तिरंगा हर  घर में फहराएँगे,
देशाभिमान निज स्वार्थ से ऊपर, राष्ट्र भक्त कहलाएंगे.

आजादी का अमृत पर्व है राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने का,
सत्य सनातन से सशक्त कर विश्व वंन्धुत्व भाव जगाने का.

स्वतंत्रता प्राप्ति का  विजयोत्सव हर गली मोड़ पर मनाएंगे,
आजादी के अमृत पर्व का संदेश घर घर में फैलाएंगे.

राष्ट्रप्रेम की अलख जगाएं
हर घर तिरंगा लहारायें.
हर घर तिरंगा लहरायें.

©ब्रजेन्द्र नाथ

इस कविता को मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के इस लिंक पर सुने







Thursday, August 4, 2022

पूरण की फसल (कहानी) #लघुकहानी

 #BnmRachnaWorld

#laghukaani #purankifasal










भीषण बाढ़ में एक किसान के  धान की फसल के बर्बाद होने के बाद उस आपदा को अवसर में बदलने की कहानी है "पूरण की फसल". 


पूरण की फसल

बाँध का पानी पिछली रात को छोड़ दिया गया है। पूरण धान की रोपणी के बाद अच्छी फसल के सपने संजोए रात में सोया था। आज सुबह अपने खेत के ऊपर मटमैले पानी के फैलाव को वह देख रहा है और देख रहा है, अपने सपनों को ढहते हुए,  देख रहा है, पानी में हाल में रोपे गए धान के पौधे को धार  में बहते हुए...
देख रहा है अपने बैलों के चारे के अभाव में दम तोड़ते हुए ...देख रहा है अपनी मां की खाँसी के इलाज के अभाव में छटपटाते हुए ...  देख रहा है बिटिया की शादी के लिए पैसे नहीं जुटाने की स्थिति में जमीन को गिरवी रखते हुए ... देख रहा है बैंक के कर्जे की किश्त नहीं जमा करने पर खुद को फंदे से...
नहीं, नहीं वह अपने सपने को पानी की धार में ऐसे बिलाते हुए नहीं देख सकता। उसने बैंक के ऋण से ही उत्तम कोटि के  अच्छे बीज और खाद का इंतजाम कर फसल लगाई थी। खाद अभी बचा ही हुआ था, जिसका इस्तेमाल वह पौधों को खड़ा हो जाने बाद भादो के महीने में करने वाला था।
उसका घर ऊँचे टीले पर बना था, इसलिए घर में पानी नहीं घुसा था। वहीं से छत पर खड़ा हुआ वह चारो ओर फैले समंदर की मानिंद जलजमाव को अपने कातर नयनों से  निहार रहा था।
अपने घर के ऊंचे छत पर, बैठ गगन की  भींगीं छाँह,
पूरण  अपने  भींगे नयनों से देख रहा है प्रलय प्रवाह।
इतने में वह देखता है कि एक बड़े से काठ के कुंदे के एक छोर पर बड़ा सा अजगर और दूसरे छोर पर भींगे पँख लिए मैना बैठी है और कुंदा तेजी से बहा जा रहा है। वह सोचता है अगर सामान्य स्थिति होती तो अजगर मैना को झपटकर निगल जाता। पर  आज उसे अपनी जान बचाने की फिक्र अधिक है, बनिस्वत कि जान लेने की। जब खुद की जान पर बन आती है तो हर जीव में जीजिविषा प्रबल होती है और भयंकर जीव भी अहिंसक हो जाता है। जीजिविषा ने ही दोनों को सहयात्री बना दिया है।
पूरण भी अपनी जीजिविषा को जगा हुआ महसूस करता है। वह जीयेगा और अपने सपने पूरे करेगा... वह अपने सपने को मरने नहीं देगा।
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अब पानी धीरे धीरे उतरने लगा है। खेत में रोपा  हुआ धान का एक भी पौधा नहीं बचा है। पर खेत की मिट्टी के ऊपर भूरे मटमैले मिट्टी की एक और परत पसर गयी है। पूरण ने मन में ठान लिया है खेती को फिर शुरू करेगा। वह पारंपरिक खेती के ढंग को ही बदल देगा।
वह बैंक के ऋण के बचे पैसे से सब्जियों जैसे भिंडी, टमाटर, बैगन, लौकी, नेनुआ, करेला आदि का बीज ले आता है। अपनी डेढ़ एकड़ की जमीन के आधे भाग में वह इन सारे बीज को रोप देता है। आधे भाग को वह छोड़ देता है, जिसमें अगहन में वह गेहूँ लगा देगा। तीन महीने के भीतर ही सब्जियाँ लहलहा उठती हैं।  बाढ़ में बह आई मटमैली मिट्टी की उर्वर गोद में इतनी अच्छी सब्जियों की फसल की संभावना को पहले किसी ने देखा ही नही था। वह किसी तरह के रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं करता है।
इसलिए सब्जियाँ ऑर्गेनिक के नाम दूगने दाम पर बिकने लगती हैं। शहर के मॉल वाले और बड़े-बड़े होटल वाले सीधे पूरण की ऑर्गेनिक सब्जियाँ उसके खेत के पास से ट्रकों में भर-भरकर ले जाते हैं। उसे नकद पैसे मिलते हैं। पूरण अपने सपने को सच होते हुए देखता है।
उसका नैराश्य भाव दूर हो जाता है। उसके जीवन में आशा की कोंपलें बढ़ने लगती है।
©ब्रजेंद्रनाथ


इसे दृश्यों के संयोजन के साथ मेरी आवाज़ में यूट्यूब के इस लिंक पर जाकर सुनें और कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य लिखें. सादर!
यूट्यूब लिंक :
https://youtu.be/igH7WVr3w5g



Thursday, July 28, 2022

शिव समर्पित तन हो मेरा (कविता )

 #BnmRachnaWorld

#shivapoem



सत्य शोधित मन हो मेरा 










शिव समर्पित तन हो मेरा

उदधि में अथाह हो जल,
पतवार तू चलाता चला चल।
उठती लहरों से डरो मत
बाजुओं में भरो हिम्मत।
उत्साह भर नाविक बढ़ो,
पास  देखोगे  किनारा।
बढ़ चलो...

गीता ज्ञान का नित्य चिंतन
नीति पथ  पर धर चरण।
अविद्या - तम का हो विनाश,
सत्य का  फैला हो प्रकाश।

जीना उसी का है सार्थक,
जिसने इन्हें जीवन में उतारा।
बढ़ चलो प्रगति पथ पर
हो तेरा संकल्प न्यारा।

शिव समर्पित तन हो मेरा,
सत्य शोधित मन हो मेरा।
तपस्वी की हो तितीक्षा,
प्रखरता की हो परीक्षा।
कल्याणकारी पथ के राही
चलो निरंतर सबका प्यारा।
बढ़ चलो प्रगति पथ पर
हो तेरा संकल्प न्यारा।

ताम्र पात्र में भर गंगाजल
चल काँवरिया चल चला चल.
बोल बम का स्वर निनादित,
अभिषेक का बीते न पल.
शिव शंभू, औघड़ दानी
देंगे हर पल तुझे सहारा.
बढ़ चलो...

सावन में  हो रुद्राभिषेक
शंभू की होंगी कृपा विशेष
दूर होंगी सब बाधाएं
लक्ष्य पर दृढ हो निगाहें.
शिव आराधन में मगन मन
दृष्टि पथ में  ध्रुवतारा.
बढ़ चलो...

©ब्रजेन्द्र नाथ


मेरी आवाज में इस रचना को मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के इस लिंक पर सुनें :

https://youtu.be/PkgIw7YRzyw




Friday, July 22, 2022

पुरस्कार मिलने के बाद की परीक्षा (कहानी )

 #BnmRachnaWold

#inspiringstory








पुरस्कार मिलने के बाद की परीक्षा

जनवरी की सुबह पाँच बजे की ठिठुराती ठंढ... साँय - साँय करती हवा...पहाड़ की तलहटी से गुजरना....पैर तो कटा जा रहा था क्योंकि उसमें हवाई चप्पल पहने ही मैं जल्दी - जल्दी में निकल गया था...बर्फीली हवा ज्यादा तेजी से चलने को विवश कर रही थी...शायद रफ्तार बढ़ाने से शरीर में गर्मी आ जाय...इससे लगभग दौड़ते हुए ही स्टेशन की तरफ सुबह साढ़े छः बजे की ट्रेन पकड़ने जा रहा था। बात सन 1964 की है, जब मैं नवीं में था। अवसर था, 26 जनवरी को ब्लॉक स्तर पर आयोजित  निबंध प्रतियोगिता में भाग लेने का।
हमलोग वजीरगंज स्टेशन उतरकर प्रतियोगिता स्थल पर सुबह ही सुबह पहुँच गए। दस बजने वाले थे,  लाउडस्पीकर पर प्रतियोगियों को कमरे में जाने की घोषणा हुयी। हमलोग एक कमरे में  निर्धारित स्थान पर बैठ गए। निरीक्षक द्वारा घोषणा की गयी कि अभी आपलोगों के लिए सामने के श्याम पट पर विषय लिखा जाएगा। उसी समय से आपकी प्रतियोगिता का समय प्रारम्भ हो जाएगा। नियत समय 45 मिनट था। एक दूसरे अधिकारी आये। उन्होंने बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में विषय अंकित किया। मैंने विषय देखा और लिखना शुरू कर दिया। कब 45 मिनट समाप्त हो गए, पता ही नहीं चला। निरीक्षक ने स्टॉप राइटिंग की घोषणा की और आकर पुस्तिका एकत्रित कर चले गए।
चार बजे अपराह्न से पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम आरम्भ हुआ। उस क्षेत्र के कलेक्टर पुरस्कार वितरण के लिए पधारे थे। सबसे पहले खेलों और दौड़ आदि प्रतियोगिताओं के पुरस्कार वितरण किये जा रहे थे। पर हमें तो इंतजार था, निबंध प्रतियोगिता के पुरस्कार की घोषणा की। सभी पुरस्कार जब वितरित हो गए, तब एक अन्य उदघोषक, जिन्होंने श्याम पट पर निबंध प्रतियोगिता का विषय लिखा था, आकर बोलना शुरू किये। निबंध प्रतियोगिता के आयोजन के बारे में भाग लेने वाले कुल विद्यालयों और विद्यार्थियों की संख्या के बारे में विवरण देते हुए उन्होंने बताया कि निबंध लेखन की जाँच भाषा की शुद्धता, शब्दों के चयन, विषय प्रवेश की सार्थकता, विषय के विस्तार तथा हस्तलेखन की सुंदरता आदि मानकों पर की गयी।
इसमें मेरे गांव के हाई स्कूल, के प्रतियोगी सारे मानकों पर अन्य विद्यालय के प्रतियोगियों से ऊपर थे। और उन सबों में तृतीय रहे मेरे विद्यालय के ही एक विद्यार्थी का नाम लिया गया, द्वितीय आये मेरे विद्यालय के ही दूसरे विद्यार्थी का नाम लिया गया। ...और प्रथम आये उसी विद्यालय के ब्रजेंद्रनाथ मिश्र! सारा जनसमूह तालियों से गूंज रहा था। हमलोगों को पुस्तकें, जिसमें मुझे याद है कि एक मोटी सी अंग्रेजी हिंदी डिक्शनरी थी और उसके साथ अन्य पुस्तकें भी थी, जिसका वजन तीन किलो के करीब अवश्य रहा होगा, मिलीं। उसके साथ-साथ प्रमाणपत्र भी मिला था। विद्यालय के लिए एक ट्रॉफी मिला जिसे विद्यार्थियों के साथ प्रधानाध्यापक और हिंदी शिक्षक ने एक साथ ग्रहण किया। अधिकारी महोदय के साथ समूह में हमलोगों की तस्वीर भी ली गयी।
◆◆◆◆◆
अब पुरस्कार प्राप्ति के बाद की परीक्षा आगे आने वाली थी। पारितोषिक वितरण समारोह समाप्त होते - होते शाम के साढ़े पाँच बज गए थे। जाड़े के दिनों में सूर्यास्त जल्दी हो जाता है। हमलोग स्टेशन की ओर चले ताकि शाम को साढ़े चार बजे वाली ट्रेन अगर लेट हुई तो मिल जाएगी।  ट्रेन सही समय पर आयी और हमारे स्टेशन पहुँचने के पहले ही निकल गयी। अगली ट्रेन रात में दो बजे के बाद ही आती थी। स्टेशन पर ठंड में ठिठुरन भरी रात काटनी कितना कष्टकर होता, इसकी कल्पना से ही मन सिहर गया। जो थोड़े लोग बचे थे, सभी मेरे ही गाँव के तरफ जानेवाले थे। कुछ स्कूल के शिक्षक भी साथ में थे। गाँव यहाँ से ढाई कोस यानि 5 मील से थोड़ा अधिक था। इतनी दूर तक की पैदल यात्रा और वह भी जनवरी की ठंढी रात में चप्पल पहनकर मैंने पहले नहीं की थी।  अँजोरिया रात थी, इसलिए उसमें भी पैदल चलने में ज्यादा कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा, इसी सोच के साथ सभी लोग आगे बढ़ चले।
मेरे साथ समस्या यह थी कि मेरे एक हाथ में तीन किलों के करीब पुरस्कार में मिले पुस्तकों वाला झोला था और पैर में हवाई चप्पल थी  जिसे पहनकर चलते हुए अन्य लोगों के साथ गति कायम रखने में कठिनाई पेश आ रही थी। लोग जल्दी पहुँचने की जल्दी में तय रास्तों से न होकर खेतों के बीच से निकलते जा रहे थे। खेतों की जुताई हुई थी जिसमें बड़े-बड़े ढेले पड़े हुए थे। मेरी हवाई चप्पल कभी-कभी उसमें फँस जाया करती थी। आगे बबूलों के छोटे से जंगलनुमा विस्तार से गुजरना था। उसके पास आने के ठीक पहले मेरा एक चप्पल टूट गया। वह अंगूठे के पास से ही उखड़ गया था। मैं चप्पल को झोले में नहीं रख सकता था। मन में यह संस्कार कहीं बैठा हुआ था कि पुस्तकों में विद्यादायिनी माँ सरस्वती का वास होता है। उसके साथ अपनी चप्पलें कैसे रख सकता था? मेरे लिए कोई दूसरा उपाय नहीं था। किसी को मैं मदद के लिए पुकार भी नहीं सकता था। हर कोई जल्दी घर पहुँचने के धुन में तेजी से कदम-दर-कदम बढ़ा जा रहा था। मैं पिछड़ना नहीं चाहता था।
रास्ते में बीच में बबूल-वन पड़ता था। ये बबूल लगाए तो नहीं गए थे पर संरक्षित अवश्य थे।
जैसे ही मैं बबूल - वन में आगे की ओर बढ़ा, तो पगडंडी देखकर मुझे खुशी हुई। लोग भी लकीर पकड़कर ही चल रहे थे। मैं बबूल-वन को करीब आधा से अधिक पार कर चुका था, कि मेरा खाली पाँव बबूल के कांटे पर पड़ा। कांटा मेरे पैर में घुस गया था। मैं थोड़ा रुका, टूटे चप्पल को दूसरे हाथ में लिया, और चुभ गए कांटे को खींचकर बाहर निकाला। खून की धारा निकलने लगी। पॉकेट से रुमाल निकाला और जोर से पैर में बाँध दिया। मन तो किया कि टूटे हुए चप्पल को किताबों वाले झोले में डाल दूँ। पर मन के अंदर बैठी हुई यह मान्यता कि पुस्तकों में वीणा पुस्तक धारिणी माँ सरस्वती का वास होता है, मैने टूटे हुए चप्पल को पुस्तकों के झोले में न डालकर, दूसते हाथ में लिया और भटकते हुए दौड़ लगायी, ताकि आगे निकल गए समूह के लोगों को पकड़ सकूँ।  आखिर बबूल-वन का क्षेत्र हमलोग पार कर गए। अब पहाड़ की तलहटी से होकर उबड़-खाबड़ पत्थरों पर से होकर गुजरना हुआ। पहले से ही छिल गए पैरों की बाहरी त्वचा पर नुकीले पत्थरों का चुभना मेरे लिए दर्द की एक और इम्तहान से गुजरने जैसा था। मैं रुका नही, और न ही मैंने हार मानी। मैं बढ़ता रहा जबतक घर नहीं पहुंच गया।
घर पहुंचते ही पहले घायल पैर में बँधे खून और धूल-मिट्टी से सने रुमाल को खोलकर पॉकेट में रखा और बिना लंगड़ाते हुए आंगन में प्रवेश किया ताकि माँ मेरे पुरस्कार पाने की खुशी का आनन्द तो थोड़ी देर मना पाए, न कि मेरे पैरों के घाव को सहलाने बैठ जाए। मेरे खाट पर बैठते ही माँ गरम पानी से मेरे पैर धोने को बढ़ ही रही थी कि मैंने उसके हाथ से लगभग झपटते हुए लोटा अपने हाथ में ले लिया। माँ मेरे इस व्यवहार पर थोड़ी आश्चर्यचकित जरूर हुई, पर मैंने लोटा हाथ में लिए हुए ही जब उसे सुनाया कि मुझे पूरे प्रखंड में निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, तो उसका ध्यान मेरे घायल पाँव से लगभग हट गया । मैं निर्भीक होकर आँगन के चापानल के तरफ पाँव धोने के लिए बढ़ गया। मुझे इस बात का संतोष था कि अपने जख्मों को छिपाकर में मैं माँ की आंखों में खुशी के कुछ कणों को तैरते हुए  देख सका।
©ब्रजेंद्रनाथ


यह कहानी मैंने 29 मई को सिंहभूम जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन/तुलसी भवन, जमशेदपुर द्वारा आयोजित "कथा मंजरी" कार्यक्रम में भी सुनाई थी. आइये दृश्यों का दर्शन करते हुए कहानी का आनंद लेते हैं --
यूट्यूब लिंक :
https://youtu.be/os1A1v2MJGA

Wednesday, July 20, 2022

और कितने तीखे मोड़ (कहानी ) उपन्यास

 #BnmRachnaWorld

#novelaurkitaneteehemod

#और कितने #तीखेमोड़













और कितने तीखे मोड़ (उपन्यास):

Amazon Link:

Aur Kitane Teekhe Mod (Hindi Edition) https://www.amazon.in/dp/B0B6FG3JQJ/ref=cm_sw_r_apan_0752920J2ZJFQ1C5SCQJ

Shortened link:

amzn.to/3REqS7K


परमस्नेही साहित्यान्वेषी सुधीजनों,

सादर नमस्ते 🙏❗️

कृपया इस संदेश को अवश्य पढ़ें :

मेरा लिखा उपन्यास "और कितने तीखे मोड़" (133 पृष्ठ ) अमेज़न किंडल के ऊपर दिए गए लिंक पर प्रकाशित हो चुका है.  18 जुलाई से 22 जुलाई तक इसे "फ्री बुक प्रमोशन" के अंतर्गत मुफ्त डाउनलोड किये जाने की सुविधा दी जा रही है. अभी डाउनलोड कर लें बाद में ज़ब मन होगा तब पढ़ लीजियेगा (देखें लिंक )

इस पुस्तक के बारे में मेरा आत्मनिवेदन :

इस उपन्यास में सामाजिक व्यवस्था में अंतर्निहित समरसता को रेखांकित करते हुए पात्रों और कथानक का ताना बाना बुना  गया है |  सामाजिक परिवर्तन के लिए संकल्पित और समर्पित व्यक्ति के सार्थक पहल को किन निःस्वार्थ और निष्कलुष शक्तियों का समर्थन मिलता है और किन स्वार्थी और कुटिल तत्वों से संघर्ष करना पडता है, उसका जीवंत चित्रण इसमें हुआ है | मुझे लगा कि सभी पात्र मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि मैं उन्हें शब्दों की किरणों में नहला दूँ ताकि गुमनामी में नीँव की पत्थर की तरह पड़ी दलित महिला रोहिणी भी परिवर्तन की माशाल को लेकर सबसे आगे -. आगे कदम बढ़ाती चली जाय |  कुछ और नहीं कहते हुए आपसे इस उपन्यास से जुड़ने का और अमेज़न किंडल पर, मेरे मोबाइल और इ मेल पर अपने विचारों से अवगत कराने का आग्रह करता हुआ मैं हूँ आपसे आपका थोड़ा समय चुराने वाला

स्नेहास्पद

ब्रजेन्द्र नाथ

मोबाइल : 7541082354

इ मेल : brajendra.nath.mishra@gmail.com

अमेज़न के किंडल इ बुक को कैसे डाउनलोड करें?

अमेज़न का अकाउंट बना ले. इस लिंक पर वीडियो को देखकर सारे स्टेप्स फॉलो करें :

Link:

https://youtu.be/bAdDArZppOI

Sunday, July 17, 2022

क्यों मचा रहे हो घमासान? (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#poemonunmad







15 जुलाई 2022:

पिछले कुछ दिनों से घट रही घटनाओं से ह्रदय व्यथित, चेतना उद्वेलित और मन आक्रोशित है. इन्हीं भावों को समाहित करते हुए प्रस्तुत कर रहा हूँ, अपनी लिखी कविता जिसका शीर्षक है, "क्यों मचा रहे हो घमासान?"  कविता मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के नीचे दिए गए लिंक पर भी सुनें. चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है, तो सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर करें. सादर!

क्यों मचा रहे हो घमासान?

मैं ही सही और सभी गलत,
बेवजह  फैलाते हो  नफरत.
सब कुछ सहते ही रहते हैं वे,
मत रहना पाले ऐसी ग़फ़लत.
बेमानी परिभाषायें गढ़कर
कहते हो यही है महाज्ञान.
क्यों मचा रहे हो घमासान?

बिगड़े बोल, बोल बोल कर,
माहौल  प्रदूषित करते हो.
शब्द ब्रह्म को लज्जित कर,
विष वमन किया करते हो.
सहन नहीं अब रंच मात्र भी
देवी देवताओं का अपमान.
क्यों मचा रहे हो घमासान?

जो नहीं मानते बात तेरी
उनको काफिर तुम कहते हो,
हऱ मतभिन्नता रखने वाले को
वाजिब ए क़त्ल तुम कहते हो.
हथियारों से हल होते मसले तो
धरती बन गई  होती कब्रिस्तान.
क्यों मचा रहे हो घमासान?

चराचर जगत का सत्य एक है,
कर्मों का फल पाता है मानव.
जो दुष्कर्म में लिप्त रहते हैं,
उनको कहते हैं हम दानव.
इसलिये सुन ले ये चेतावनी
मत खोल अपनी जहरीली जुबान
क्यों मचा रहे हो घमासान?

छिन्न भिन्न किया ताने बाने को
कठिन कुठार  गर निकल गया,
शोणित का प्यासा  वाण  अगर
तरकश से बाहर निकल गया.
तो कोई क्या अंदर रख पायेगा
घर में छुपाकर असि और म्यान.
क्यों मचा रहे हो घमासान?

सही समझ नहीं है अगर तुम्हें
मिल बैठ मसलों पर संवाद करो.
उन्मादी, उपद्रवी बनकर तुम,
राष्ट्र धन को मत बर्बाद करो.
इसकी कड़ी सजा मिलेगी,
अब नहीं सहेगा हिन्दुस्तान
क्यों मचा रहे हो घमासान?

©ब्रजेन्द्र नाथ 


यूट्यूब लिंक :
https://youtu.be/WdvaPzJv4rI


Thursday, July 7, 2022

दवाई (कहानी)

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#dawaihindistory









दवाई

  हालाँकि बारिश की रफ़्तार थोड़ी कम हो गयी थी, इसीलिये मैंने बूढ़े बाबा को मेन. रोड से अपनी कार मोड़ने के पहले उतार कर कहा था, "बाबा ठीक से घर तो पहुँच जाओगे,…" ,

'हाँ बाबू, तूने इस बारिश में मेरे लिए इतना कर दिया यही काफी है। अब ये दवाई मेरी पोती की जान जरूर  बचा लेगी ।"

मैं घर पहुंच कर भी थोड़ा  अन्यमन्यस्क  सा था। पत्नी ने देखते ही समझ लिया था कि जरूर कोई गंभीर समस्या से परेशान हो रहे हैं। पतियों के चेहरे के भाव पढ़कर ही पत्नियां अक्सर उनकी परेशानियों से खुद को परेशान करने लगती हैं। मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है।
इस परेशानी की  ज्यादा बात नहीं करते हुए मैंने कहा , “अरे भई ,  वारिश में आया हूँ , गरमा- गरम चाय का तलबगार हूँ, और आप पूछ भी नहीं रही हैं." मैंने हंसकर कहा तो पत्नी मान गयी और चाय की तैयारी में लग गयी. लेकिन मैं बड़ी सफाई से अपनी परेशानी को छुपाने में सफल रहा था।

मैंने जैसे -  तैसे चाय ख़त्म की. कार बाहर ही खड़ी थी। कार को मोड़कर मैं फिर मेन रोड के तरफ चल पड़ा जहाँ पर आते समय मैंने बूढ़े बाबा को छोड़ा था ।

   ड्राइव करते हुए आज  की सारी घटनाएँ घूम रही थी। 
   मुझे कारखाने से निकलते - निकलते रात के नौ बज गए थे। पिछले दो दिनों की लगातार वारिश के कारण कारखाने में जगह - जगह जल जमाव को ठीक करना जरूरी था ताकि उसके कारण  कररखाने  में कच्चे माल की सप्लाई में कोई बाधा न हो।  साथ ही  रात भर बिना ब्रेकडाउन के कारखाना चलता रहे और  मैं आज की रात अच्छी नींद ले सकूँ।

    बारिश के दिनों में पहाड़ियों से घिरे इस शहर का सौंदर्य दुगना हो जाता है। हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़ और उसपर झुके हुए बादल जैसे किसी नयी - नवेली दुल्हन को आगोश में लिए हुए हों।  प्रकृति का यह संवरा -  निखरा रूप किसी भी प्रकृति प्रेमी को भाव - विह्वल किये बिना नहीं रह सकता ।  किन्तु जब यही बारिश लगातार कई दिनों तक होती रहे तो पहाड़ काल से प्रतीत होते हैं। 
  आज भी ऐसा ही हुआ। रात की नौ बजे मैं   जैसे ही कारखाने के गेट से बाहर निकला कि काले बादलों से आकाश भर उठा था।  जोर की बारिश के संकेत आने लगे थे।  जैसे - जैसे मैं घर के तरफ बढ़ने लगा, अचानक तेज बौछारें शुरू हो गयी, तेज हवाएँ भी साथ आ रही थी, तूफानी मंजर था, पेड़ झूम रहे थे और कार पर  लगातार  पड़ती तेज बूंदों को वाइपर से किसी तरह काटते हुए हेड - लाइट के प्रकाश में मैं  धीरे - धीरे बढ़ रहा था।
मैं एक दो किलोमीटर ही आगे बढ़ा था कि मैंने देखा सारी दुकाने बंद हो
चुकी थी। कुछ दवा की दुकाने खुली थी।  उनकी अपनी प्रकाश व्यवस्था के कारण  प्रकाश नजर आ रहा था।  इतने में अचानक बीच सड़क पर हेड लाइट के प्रकाश में एक व्यक्ति दिखाई दिया।  कार के नजदीक पहुचने पर  मैंने देखा कि वह अपनी धोती आधी ऊपर उठाये, टूटे हुए छाते जिसकी कमानी लगता  है इस आँधी तूफ़ान में टेढ़ी हो गयी थी और उसपर चढ़ा कपड़ा तार - तार हो गया था, किसी तरह बाहों और छाती के बीच समेटे बीच सड़क पर चला जा रहा था।  मैं बिलकुल नजदीक साइड में कार करके अचानक कार रोकी, शीशे को थोड़ा नीचे करके जोर से आवाज दी, " बीच सड़क पर क्यों चल रहे हो ? इस तेज बरसात में किसी गाड़ी से कुचलकर जान देने का इरादा है क्या?"
उस व्यक्ति ने मेरी आवाज सुनकर जब अपनी गर्दन घुमाई तो मैंने देखा कि सत्तर वर्ष के आसपास का एक बूढा आदमी अपने चश्मे पर पड़ी बूंदो को, उन्हें पहने हुए ही हाथ से साफकर बोला, "माफ़ करना बाबू ! पानी चारो तरफ इतना भरा है कि सड़क का कहीं पता ही नहीं चल रहा है।
फिर वह मन - ही - मन  बुदबुदाने लगा,  " नहीं बचेगी, लगता है नहीं बचेगी। ……"

मैंने फिर शीशा नीचे किया और पूछा, "क्या हुआ? क्या बुदबुदा रहे हो बाबा ?"

" बाबू यह दवा नहीं मिली तो वह नहीं बचेगी.."

फिर पता नहीं क्यों मेरे भीतर से एक आवाज आई और उसे मैंने कार के अंदर आ जाने को कहा,  कार की सीट पर मैंने आफिस के पुराने  कुछ पेपर और पुराने अख़बार के टुकड़े बिछा दिए ताकि सीट अधिक गीला न हो जाय ," बाबा कार के अंदर आ जाओ। "
कुछ झिझकते हुए बूढ़े बाबा अंदर आ गए। वारिश अभी भी उसी गति से लगातार जारी थी। सड़क पर घुटना भर पानी जमा हो गया था। इस स्थिति में कार ड्राइव करना मुश्किल हो रहा था।
चार या पांच मीटर से आगे कुछ नजर नहीं आ रहा था। पहाड़ो पर लगातार वारिश की विकरालता का सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता था। बौछारों का जोर और कार के शीशे पर पड़ने वाली बूंदों का शोर दोनों ही इस तूफानी रात का साथ दे रहे थे।
"बाबा क्या हुआ ? आप बुदबुदा रहे थे..., नहीं बचेगी , नहीं बचेगी। " मैंने अपनी उत्सुकता जताई थी ।
"बाबू क्या आप मेरी मदद करोगे? " उसके सवाल में अनुरोध और निराशा - मिश्रित जवाब की तैयारी दोनों ही दिखाई दे रहे थे।
"जरूर , आप बोलो तो सही... ।" मैं उसकी कातर नेत्रों से झांकते मदद के लिए  मौन निमंत्रण को ठुकरा नहीं सका।
 "मैं अपनी पोती के लिए दवा लेने निकला था। शाम को डाक्टर को दिखाया था। उसने कहा था कि क़फ़ बहुत ज्यादा है। जल्दी से यह दवा लेकर दीजिये नहीं तो रात में अगर साँस लेने में दिक्कत बढ़ गयी तो जान भी जा सकती है।"  बाबा एक ही साँस में बोल गए थे।
मैंने पूछा " कोई दूकान में दवा नहीं मिली क्या? "
"बहुत सारी दुकानें बंद मिली। अब मैं कहाँ से दवा लाऊँ ?" उनकी आवाज थरथरा रही थी।
मेरा मन द्रवित हुए बिना नहीं रहा। मैंने ठान लिया कि कम – से - कम दवा खरीदने में तो इनकी जरूर मदद करूंगा।
मैंने कार मोड़ दी। मैं जानता था कि ऐसे मौसम में दो ही जगह दवा मिल सकती थी.  एक गुरु नानक देव क्लिनिक के दवा काउंटर पर और दूसरे स्माइल लाइन मेडिकल में।  क्लीनिक नजदीक होने के कारण  मै उसी तरफ कार मोड़ कर बढ़ता गया।
" कहाँ रहते हो बाबा?" मैंने बाबा के अंदर चल रहे विचारों की हलचल के मौन को तोड़ते हुए पूछा था।
" बस 'नीहारिका' टावर कैंपस के बगल से जो रोड नीचे के तरफ बस्ती में गयी है उसी में रहता हूँ। "
बाबा ने कहा था।
"घर में और कौन - कौन है?" 
मेरे यह पूछने पर जब बाबा ने कहा कि चार वर्ष पहले ठेका मजदूर के रूप में काम करते हुए दुर्घटना में उसके बेटे की मौत हो गयी और पिछले साल कोरोना में उसकी पत्नी भी चल बसी, तो इस सवाल के पूछने पर मुझे खुद को कोसने का मन कर रहा था.
फिर बाबा चुप हो गए।  उनके अंदर की और बाहर की बारिश दोनों में थोड़ा ठहराव जैसा लग रहा था। क्लीनिक नजदीक आ गया था।  मैंने वहीं पर गाड़ी रोकी।  बाबा के साथ जाकर काउंटर पर दवा ली।  सारी दवाईयां और डाक्टर का लिखा पुर्जा एक गुलाबी रंग की पॉलिथीन की थैली में डालकर बाबा के साथ आकर गाड़ी में बैठ गया।
चलो बाबा मैं भी 'नीहारिका' टावर कैंपस के तरफ ही जा रहा हूँ। आगे तक छोड़ देता हूँ।

" बाबा आपकी पोती बिलकुल ठीक हो जाएगी, आप निश्चिंत हो  जाईये , बहादुर बच्ची है।  ठीक हो जाएगी। "
मैंने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए कहा था।
वारिश की रफ़्तार थोड़ी कम होने के कारण मैं गाड़ी तेजी से चला रहा था। निहारिका टावर से एक मोड़ पहले मैंने कार रोक दी। यहाँ से मुड़कर मैं अपने घर की ओर जल्दी पहुँचना चाह रहा था।
"बाबा, यहाँ से तो चले जाओगे न।"
"हाँ बाबू यहाँ से तो बिलकुल नजदीक है, अब मेरी पोती को कुछ नहीं होगा। वह बच जायेगी।"
बाबा के आँखों में विश्वास देखकर मुझे भी उनके उतर कर जाने के अनुरोध को बेमन से ही स्वीकार करना पड़ा।
" बाबा, सुबह मैं आऊंगा पूछने कि बिटिया कैसी है ?"
"बाबू मैं मोड़पर वाली चाय की दूकान पर ही सुबह मिल जाऊंगा। वहीं मैं आपको खबर दे दूंगा।"
बाबा आगे बढ़ गए। तब मैं अपनी कार मोड़कर घर की ओर चल दिया था।
घर पर पहुँच कर जब मुझे चाय पीने के बाद भी अच्छा नहीं लगा तो मैं कार लेकर फिर उसी जगह पर पंहुचा जहाँ मैंने बाबा को छोड़ा था।  रात के करीब साढ़े दस बज रहे थे सड़क सुनसान थी।  मैंने कार जैसे ही आगे बढ़ायी  कार के हेडलाइट की रोशनी में एक पिंक कलर का पॉलिथीन गिरा हुआ दिखाई दिया।  मेरा मन अनिष्ट आशंका से काँप उठा।  कार की हेडलाइट मैंने ऑन कर  रखी थी।  कार वहीं रोककर पैदल आगे बढ़ा तो सामने गटर का ढक्कन खुला था।  गटर के बगल में एक चप्पल पडी थी।  और सामने वही पिंक कलर का पॉलिथीन पड़ा था जिसमें अभी - अभी बाबा के साथ जाकर मैंने दवाईयां दिलवायी थी।
मैंने कांपते हाथों से पालीथीन उठाया था और बाबा के बताये हुए बस्ती की गली में उनके मकान को याद करने लगा। जल्दी से गाड़ी स्टार्ट की और गली के मोड़ पर टीम - टीम लाइट की गुमटी की और बढ़ कर बाबा, पूर्णो बाबा हाँ, यही नाम था उनका, मकान पूछा था।
"यहाँ से तीसरा मकान जो खपड़ैल का है, वही है उनका मकान, अभी तो थोड़ी देर पहले दवा लाने निकले हैं, लगता है लौटे भी नहीं हैं।"
बस्ती में हर आदमी को हर आदमी की खबर होती है, खासकर जब कोई बच्चा या बच्ची बीमार हो तो अवश्य होती है।
मैंने तीसरे खपड़ैल के मकान में कुण्डी खटखटाई। दरवाजा एक वृद्धा ने खोला था। अपने कांपते हांथों से "दवाई है " कहकर दवा देते ही जल्दी से वहां से लौट गया, अपने को लगभग बचाते हुए ताकि कोई यह न पूछ दे कि बाबा कहाँ रह गए? इस सवाल का मैं क्या जवाब देता?
मैं घर पहुंच कर रात में सोते हुए भी जागते रहा। लोकल न्यूज़ चैनल में खबर आ रही थी, " सुरेखा नदी  में जलस्तर बढ़ जाने के कारण नदी के किनारे के रिहायसी क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गयी है।  नदी का जलस्तर स्लूस गेट से ऊपर आ जाने के कारण इसे बंद कर दिया गया है। स्लूस गेट बंद किये जाने से शहर के नाले का पानी भी नहीं निकल रहा है...... इसीलिये      शहर के निचले इलाके में भी जल जमाव बढ़ गया है।"
दूसरे दिन शाम को खबर आई की जलस्तर कम हो रहा है और बाढ़ का खतरा टल गया है। इसमें वारिश के थम जाने से अधिक प्रशासन की मुस्तैदी का हाथ था।
तीसरे दिन सुबह के अखबार के तीसरे पन्ने पर जिसमें शहर की सारी अप्रमुख और महत्वहीन खबरे होती हैं ... लिखा था, " निचले इलाके में नाले के मुहाने पर वाले स्लूस गेट के खोलने पर एक सड़ी हुयी लाश मिली है।  लगता है दो दिन पहले नीचे के इलाके में पानी घुसने के कारण यह मौत हुयी होगी।“
यह खबर फिर कहीं दब गयी कि खुला हुआ गटर एक और जान लील गया।


©ब्रजेन्द्र नाथ

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Thursday, June 23, 2022

पावस की प्रथम बूंदें बन (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#rainyseasonpoem

#पावस# प्रथमबूंदें








पावस की प्रथम बूंदें बन

मेरे सूने तप्त धरा - तन
पावस की प्रथम बूंदें बन.
शीतल, सलिल छुवन सी
स्नेह - सिक्त होकर सहलाना ...
तेरा आना...ऐसा आना

ऊँगली की कोमल पोरों,
पर बूँदों की आतुर अधरों,
का अविरल, अविकल, सहम
- सहम, सिंचित कर जाना ...
तेरा आना...ऐसा आना

पावस के पावन प्रवाह सम,
झड़ती झड़ी झम झमाझम.
हवा हिंडौले का हौले हौले
लहर लहर लहराते जाना...
तेरा आना... ऐसा आना...

मेरे आँगन में जल - प्लावन
सद्य:स्नाता सम मम चितवन
बरस बरस बरसो वर्षों तक
मन प्राण प्लावित कर जाना...
तेरा आना... ऐसा आना...

पाहुन बनकर मत आना,
उर को उर्वर कर बस जाना.
तुझे निहारूं क्षण क्षण, पल पल,
ऐसा सुसंयोग बनाना...
तेरा आना...ऐसा आना...
ब्रजेन्द्र नाथ

दृश्यों  के समिश्रण से इस कविता पर आधारित बने वीडियो को मेरी आवाज में सुने : यूट्यूब लिंक :

https://youtu.be/RZxr7IbHOIU







Tuesday, June 7, 2022

बाबा नागार्जुन की सृजन यात्रा (लेख )

 #BnmRachnaWorld

#BabaNagarjun







सिंहभूम जिला हिंदी साहित्य सम्मलेन, जमशेदपुर के तत्वावधान में साहित्य समिति, तुलसी भवन द्वारा होने वाले मासिक कार्यक्रमों के अन्तर्गत रविवार, ५ जून को संध्या ४ बजे से काव्य कलश  सह साहित्यकार बाबा नागार्जुन की जयंती कार्यक्रम आयोजित की गई , जिसकी अध्यक्षता संस्थान के न्यासी श्री अरुण कुमार तिवारी ने की । जबकि संचालन, साहित्य समिति मार्गदर्शक मण्डल के सदस्य श्री श्रीराम पाण्डेय 'भार्गव' तथा धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम कसंयोजक श्री अशोक पाठक 'स्नेही' द्वारा किया गया ।

कार्यक्रम के आरंभ में समिति के कार्यकारी अध्यक्ष श्री यमुना तिवारी 'व्यथित' के औपचारिक स्वागत वक्तव्य के बाद साहित्यकार बाबा नागार्जुन के चित्र पर सामुहिक पुष्पार्पण एवं उनकी साहित्यिक जीवन परिचय श्री ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र द्वारा प्रस्तुत किया गया।




उस समय मेरा दिया गया वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है...



बाबा नागार्जुन 

फक्कड़ लेकिन फिक्रमंद, तल्ख तेवर, तीक्ष्णता, तेज धार, तिलमिलाहट, बैचैनी और बेबाकी का मूर्त रूप, बाबा नागार्जुन, हिंदी कविता के लिए रखा गया नाम, और यात्री मैथिली कविता के लिए, महान यायावर बैजनाथ मिश्र, अपने ननिहाल मधुबनी के सतलखा गाँव में जन्मे  और दरभंगा के अपने पुश्तैनी गाँव तरौनी  में पले - बढ़े छः संतानों में एकमात्र बचे संतान थे. इसीलिये बचपन में नाम रखा गया था ठगकर या ठक्कर. माँ शायद सोचती थी, ऐसा नहीं यह भी उन्हें 'ठग कर' चला जाय. माँ द्वारा देवघर में बाबा भोलेनाथ की पूजा के बाद उनका जन्म हुआ था, इसलिए उनका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र है। वे शुरूआती दिनों में यात्री उपनाम से भी रचनाएं लिखते रहे हैं। नागार्जुन एक कवि होने के साथ-साथ उपन्यासकार और मैथिली के श्रेष्ठ कवियों में जाने जाते हैं।
उनके काव्य में प्रगतिशीलता और प्रयोगशीलता दोनों ही दृष्टिगत होती हैं। उनकी कविताओं में यथार्थ की विरूपताओं के अंकन के साथ-साथ मानव-मन की रागात्मक और सौंदर्यमयी छवियों का बखूबी अंकन हुआ है। वे कवितायें अपनी संवेदना और कलात्मकता की दृष्टि से अलग पहचान बनाती हैं।
इनकी कविताओं में सहजता, आक्रोश, व्यंग्य, अक्खड़ता, हुंकार एवं ललकार है।
शोषण के विरुद्ध आवाज उठाकर शोषितों के प्रति सहानुभूति दिखाकर तथा अन्याय का विरोध करने वाली कविताओं की रचना करके उन्होंने पीड़ित मानवता को स्वर प्रदान कर कवि के उत्तरदायित्व को भली-भाँति निबाहा है।
महान आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने कहा- जो नामवर सिंह द्वारा सम्पादित पुस्तक नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ के आवरण पृष्ठ में उद्धृत है- ‘जहाँ मौत नहीं बुढ़ापा नहीं है, जनता के असन्तोष और राज्यसमाई जीवन का संतुलन नहीं है वह कविता है नागार्जुन की। ढाई पसली के घुमन्तु जीव, दमे के मरीज, गृहस्थी का भार- फिर भी क्या ताकत है, नागार्जुन की कविताओं में! अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है, क्रांतिकारी अवस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ-चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आयी है। उनकी कविताएँ लोक-संस्कृति के इतना नजदीक हैं कि उसी का एक विकसित रूप मालूम होती हैं। किन्तु वे लोकगीतों से भिन्न हैं, सबसे पहले अपनी भाषा-खड़ी बोली के कारण, उसके बाद अपनी प्रखर राजनीतिक चेतना के कारण और अंत में बोलचाल की भाषा की गति और लय को आधार मानकर नये-नये प्रयोगों के कारण। हिंदी भाषी किसान और मजदूर जिस तरह की भाषा समझते और बोलते हैं, उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप नागार्जुन के यहाँ है।

नागार्जुन सत्ता, व्यवस्था एवं पूंजीवाद के प्रति आक्रोश व्यक्त करने में निरंतर अग्रणी रहे। उनकी कविता में राष्ट्रप्रेम तथा यथार्थ भारत की तस्वीर झलकती है। उन्होंने युगीन यथार्थ एवं समसामयिक गतिविधियों को अपने काव्य का विषय बनाया। समाज के विभिन्न शोषित वर्गों का बारीकी से अध्ययन किया और परखा कि किस प्रकार शोषित वर्ग अभावों की चक्की में पिस रहा है, श्रमिक भरपेट भोजन नहीं जुटा पा रहा, किंतु उच्च वर्ग भोग-विलास में पानी की तरह धन बहा रहा है। लोग मुखौटा लगाए हुए दोहरी जिंदगी जी रहे हैं। बाहर से खद्दर-

धारी हैं पर भीतर से कसाई। इसी संदर्भ में ‘सच न बोलना’ नामक कविता से निम्न पंक्तियाँ उद्धृत हैं -

‘जमींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्यापारी है,
अन्दर-अन्दर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!’

कविवर नागार्जुन राजनीतिक व्यवस्था से उपजी विकृति को भी दर्शाते हैं। वे कहते हैं कि अभी भी भारत औपनिवेशिक मानसिकता से ऊबर नहीं पाया है। देश के नए नीति-नियामक के रगों में लोकतंत्र की महक कम और राजसत्ता की भूख ज्यादा आकर्षित करती है। 1961 में इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ के भारत आगमन पर स्वागत में बिछे जवाहरलाल पर कविवर यह खेद प्रकट करते हुए ‘आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी’ नामक कविता में लिखते हैं:

‘आओ रानी हम ढोएंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहर लाल की

रफू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहर लाल की।

आओ रानी हम ढोएंगे पालकी!’

मैथिली काव्य संग्रह "पत्रहीन नग्न गाछ" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित।

• छः से अधिक उपन्यास, एक दर्जन कविता संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली;(हिन्दी में भी अनूदित)

• कविता संग्रह, एक मैथिली उपन्यास, एक संस्कृत काव्य "धर्मलोक शतकम" तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियों के रचयिता।

उनके मुख्य कविता-संग्रह हैं: सतरंगे पंखों वाली, हज़ार-हज़ार बाहों वाली इत्यादि। उनकी चुनी हुई रचनाएं दो भागों में प्रकाशित हुई हैं।

नागार्जुन एक घुमंतू व्यक्ति थे। वे कहीं भी टिककर नहीं रहते और अपने काव्य-पाठ और तेज़-तर्रार बातचीत से अनायास ही एक आकर्षक सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण कर देते थे। आपात्काल के दौरान नागार्जुन ने जेलयात्रा भी की थी।

साथ ही कवि ने रचना में यथार्थ का चित्रण अपनी पूरी नग्नता एवं सच्चाई के साथ की है। उन्होंने कुछ भी छिपाने का प्रयास नहीं किया। कवि वर्त्तमान और भावी
संभावनाओं के परिप्रेक्ष्य में इस बात को उद्घाटित करते हैं कि सत्य बोलना पाप है, और चापलूसी करना झूठ बोलना युगधर्म बन गया है उक्त संदर्भ में उनकी चंद पंक्तियाँ निम्न हैं :-

सपनों में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुँचे, मेवा-मिसरी पाओगे।

माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसान का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमान का!
शिक्षा प्रणाली की स्थिति से पाठकों को अवगत कराते हुए नागार्जुन ‘मास्टर’ नामक कविता में लिखते हैं :-

‘घुन-खाए शहतीरों पर की बाराखड़ी विधाता बाँचे

कटी भीत है, छत चूती है, आले पर बिसतुइया नाचे

बरसाकर बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पाँच तमाचे

दुखहरन मास्टर गढ़ते रहते किसी तरह आदम के साँचे।’

नागार्जुन समाज के सूक्ष्म पारखी थे, उन्होंने समाज को समग्रता के साथ अध्ययन किया। उनकी विहंगम दृष्टि का ही परिणाम है कि लोकजीवन में दिखने वाली समान वस्तु औरों की संवेदना को अछूती छोड़ जाती है, वहीं उनकी रचना-भूमि बन जाती हैं। इस दृष्टि से काव्यात्मक साहस में नागार्जुन अप्रतिम हैं। उन्हीं की बीहड़-प्रतिभा एक मादा सुअर पर ‘पैने दाँतों वाली’ नामक कविता में उद्धृत की है :

‘जमना-किनारे
मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
यह भी तो मादरे हिंद की बेटी है।’

1966 में बिहार के अकाल के बाद उन्होंने ‘अकाल और उसके बाद’ नामक कविता में अकाल के वीभत्स रूप का चित्रांकन किया है कि किस प्रकार अनाज के अभाव में प्राणीजन त्राहिमाम कर उठते हैं, वसुधा की सजीवता शून्य निर्जनता के घोर संताप में तब्दील हो जाती है। कवि की मर्मस्पर्शी चेतना यहीं तक नहीं ठहरती; बल्कि उन्होंने निम्न पंक्तियों के माध्यम से चूल्हा-चक्की, कानी-कुतिया, छिपकली, चूहा की त्रासदी को भी दर्शाते हैं :-

‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

उनकी निराला जी पर लिखी कविता :
बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न तन
किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन ।

उनकी एक और व्यंग्य रचना की धार देखें :
पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाक़ी बच गए दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाक़ी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झण्डा
पुलिस पकड़कर जेल ले गई, बाकी बच गया अण्डा.
अंत में उनकी कालिदास पर लिखी इस कविता के साथ अपना वक्तव्य सम्माप्त करना चाहूंगा.
कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!

ब्रजेन्द्र नाथ

🙏!

Saturday, May 7, 2022

उत्सव मना ले (कविता)

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#motivational poem









उत्सव मना ले

कौन बैठा है एकांत,
खंडहर के अवशेष में।
रोकता हुआ स्वयं की
छाया को इस परिवेश में।

लो उतरती बादलों के
बीच से पंखों वाली परी।
बाँट ले उससे तू अपनी
चिंताओं, अवसादों की घड़ी।

भूल जा वो क्षण जो
थे तुम्हें विच्छिन्न करते।
लासरहित, निरानंदित
श्रमित, थकित, व्यथित करते।

लेकर है आयी एक नव
उल्लास तुझमें जगाने।
तेरे मन से विषाद के
फैले हुए घेरे मिटाने।

जीवन में उमंगों के,
खुशियों के पल चुरा ले।
मिलेगी ना दुबारा जिंदगी
मस्ती भरा तू उत्सव मना ले।

©ब्रजेंद्रनाथ

Sunday, May 1, 2022

देश में नए आए हो.(कहानी) लघुकथा

 #BnmRachnaWorld

#laghukatha









देश में नए आए हो

मैं आयरलैंड  पहली बार गया था। कुछ दिन होटल में बिताने के बाद मुझे अपार्टमेंट में आवास मिल गया था। यहाँ की तुलना में वहां का मौसम बहुत प्रतिकूल और क्षण क्षण परिवर्तित होने वाला था। जनवरी के महीने में मौसम की उच्छृंखलता और भी बढ़ जाती थी। तेज ठंढी हवाएं, तापमान 9 डिग्री सेंटीग्रेड से -16 डिग्री सेंटीग्रेड तक परिवर्तित होता रहता था। बाहर में निकलने के पहले हाथों में ग्लोव्स पैर में पूरा कवर करता हुआ शूज और चार - पांच तह विशेष गर्म कपड़ों को पहनकर निकलना आवश्यक होता था।
ऐसे ही एक दिन मैं पूरे  कपड़ों से सुसज्जित होकर वहाँ से आधा  किलोमीटर दूर  मेट्रो पकड़कर  एक मॉल गया था। वहाँ भारतीय खाद्य सामग्रियाँ भी मिलती थी। समान लेकर  मैं मेट्रो के लिए  पैदल ही निकला था। मेट्रो स्टेशन के पास पहुंचने पर पता चला कि मेट्रो बंद है। कब चलेगा इसकी कोई निश्चित सूचना नहीं थी।
दूसरा विकल्प बस थी। सुनसान सड़क पर वाक करते हुए करीब 70 वर्ष से अधिक उम्र के  बुजुर्ग दंपति से मैंने पूछा था कि बस स्टैंड कितनी दूर है। उन्होंने कहा कि बस स्टैंड यहाँ से 2 किलोमीटर पर होगा। थोड़ी ही देर में शाम घिरने वाली थी। शाम होते ही तेज हवाएँ चलनी शुरू हो जाती थी।  हड्डियों को गला देने वाली ठंढ के बढ़ने के साथ मौसम की भयावहता बढ़ जाती थी। मुझे शीघ्र ही अपने आवास पहुंचना आवश्यक था।
मैं बस पकड़ने के लिए  एक दिशा में बढ़ गया था। वहाँ पर नेट भी नहीं था, जिससे गूगल मैप की मदद ली जा सके। मुझे लगा था कि उस सुनसान सड़क पर मेरे पीछे कोई आ रहा है। मैं ने डरते - डरते पीछे मुड़कर देखा तो वे बुजुर्ग दंपति लगभग दौड़ते हुए ही आ रहे थे। मैंने समझा उन्हें किसी तरह  की मदद की आवश्यकता होगी इसीलिये वे तेजी से हमारी तरफ आ रहे हैं। वे मेरे करीब आ गए, तब मैंने पूछा,  "क्या आपको कोई मदद चाहिए?"
उन्होंने कहा था, "लगता है आप इस देश में  नए आये हो। मदद हमें नहीं आपको चाहिए।"
मैंने कहा, "मैंने समझा नहीं।"
"आप जिस ओर जा रहे हो, बस स्टैंड उसकी विपरीत दिशा में है।"
मैं तो हतप्रभ था। वे मुझे सही दिशा निर्देश देने के लिये तेजी से मेरी ओर आ रहे थे।
उन्होंने कहा, "आप मेरे साथ आओ। मैं आपको  बस स्टैंड तक छोड़ देता हूँ।"
वे आगे - आगे चलते रहे। मैं उनके पीछे- पीछे चल रहा था। जब बस स्टैंड करीब आ गया, उन्होंने मुझे उस स्थान पर छोड़ दिया। मैंने समझा था कि उन्हें भी इसी ओर आना था, इसलिए वे मुझे साथ लिए हुए आ गए।
मैंने पूछा था, "आप को किस ओर जाना है?"
वे बोले थे, "जहां से मैं आपके साथ आ रहा हूँ, उसकी दूसरी ओर मुझे जाना है। आप चिंतित नहीं हो हमलोगों को इतना चलने की आदत है। हमलोग चले जायेंगे। आप मेरे देश में नए हो। आप अगर कहीं भटक गए, खो गए, तो मेरे देश के नागरिकों के  प्रति आपके मन में अमैत्री पूर्ण (अन्फ़्रेंडली) व्यवहार करने वाली  छवि बैठ जाएगी।"
इतना कहकर, हंसते हुए, 'फिर मिलेंगे' कहकर उन्होंने विदा लिया था। उनकी छवि आज भी मन में बसी हुई है।
ब्रजेंद्रनाथ

Thursday, April 21, 2022

चैत में (कविता )

 

#BnmRachnaWorld

#magahi #मगही काविता N









चैत में

निमवा  के पतिया, निमन लगs हइ,चैत में।
सहजन के सहेज के रख लिह चैत में,
पीली घंटी के फुलवा
गोकर्ण के  सफेद, गुलाबी
आउर बैंगनी रंग चैत में।
गंधराज के सफेद रंग भाव हइ चैत में।
लाल पैगोडा के लाल रंग,
विरुचि के लाल, सफेद
पीला आउर गुलाबी रंग
बेला के सफेद रंग भरमाव हइ चैत में।
अमावां के टिकोरवा, इमलिया के खटतुरुष
स्वाद मन - भाव s हइ चैत में।
भोरे भिनुसरवा ,
अमवां के बगिया में,
कोयलिया के कुहू कुहू
सुतल पियवा के,
जगावs हइ चैत में।

पिपरा के पतवा  जैसन मनवा कांप हइ,
हियरा में हिलकोर उठाव हइ चैत में।

गर्मी में लू के थपेड़न से
सत्तू और अमवां के स्वाद ,
पियास मिटावs हइ चैत में।

राम भक्त  के टोली, हनुमान भक्त के बोली
रामनवमी में जोश जगावs हइ चैत में।
देवी मइया के अंचरा में
भक्त लोग के जियरा
नेह से सराबोर  ठौर पावs हइ चैत में।
नेह  से सराबोर ठौर पावs हइ चैत में।
©ब्रजेंद्रनाथ

Friday, March 18, 2022

होली के रंग (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#holiparkavita





परम स्नेही मित्रों,
आपको और आपके समस्त परिवार को होली की अनंत, असीम, अशेष शुभकामनाएँ!

होली में इस बार अलग रंग जमायें

होली में इसबार अलग रंग जमायें
होली को इसबार कुछ खास बनायें।

 ऐसे रंग पोत लिए अपने चेहरों पर ,
हो गए जुदा उनसे जो हैं बसे अंदर।
अन्दर के रंगों में विश्वास जगायें।
होली को इस बार कुछ खास बनायें।

अफसाने गा चुके  मुहब्बतों के
कसीदे सजा चुके उल्फतों के।
होली में प्रेम का पुख्ता अहसास जगायें।
होली को इस बार कुछ खास बनायें।

वो झोपड़ी जो है गली के मुहाने पर
कोई बेरंग सवाल  है, जमाने पर।
इस होली वहां का सन्त्रास मिटाएं।
होली को इस बार कुछ खास बनायें।

गेंदे, गुलाब, जूही,  चम्पा और चमेली
चमन में हैं रंगों का मेला मेरी सहेली।
चलो इस बार कुछ  पलाश उगायें।
होली को इस बार कुछ खास बनायें।

वे बच्चे जो बीन रहे बचपन में कचरे,
उनको लौटा दें उनके सपने सुनहरे।
उनके उड़ान का एक आकाश बनायें।
होली को इस बार कुछ खास बनायें।

सीमा पर जो डटे हैं देश के प्रहरी
उनसे ही होली है हमारी रंगों भरी
उनके लिये सीने में आग धधकाएँ।
होली को इस बार कुछ खास बनायें।

सड़कों पर बैठ जाते हैं, भ्रम से जो ग्रस्त हैं, 
सियासत में फंसकर जो झूठ में व्यस्त हैं।
उनके दिलों में सच का सुवास बसाएँ।
होली को इसबार कुछ खास बनायें।

सियासत में मिटे  विवाद, राष्ट्र हो प्रथम,
आपस में प्रेम हो, नहीं हो कोई बेशरम।
दिलों में निष्कामता का उजास फैलाएं।
होली को इसबार कुछ खास बनाये।

©ब्रजेंद्रनाथ


Friday, March 11, 2022

दिल से बजाना (कहानी) # लघुकथा

 #BnmRachnaWorld

#laghukatha #दिलसेबजाना











दिल से बजाना
ऋषभ अब आठवीं में आ चुका था। वह बहुत अच्छा वायलिन बजाता था। इसी उम्र में वह इतनी प्रवीणता प्राप्त कर चुका था, जिसे कई वर्षों तक अभ्यास करने के बाद भी लोग नहीं प्राप्त कर पाए थे। वह हर दिन अपने  गुरु जी से  वायलिन सीखने जाता था। घर में वह सीखे हुए पाठ का दो घंटे अभ्यास करता। उसके बाद ही वह अपने पाठ्यक्रम की पुस्तकों को पढ़ने बैठता। यही क्रम कई वर्षों से चल रहा था।
आखिर वह दिन आ ही गया जिसका उसे इंतज़ार था। एक दिन बाद शहर के सबसे बड़े हॉल में उसका वादन आयोजित किया गया था। देश के प्रसिद्ध वायलिन वादक इस बालक की प्रतिभा के साक्षी बनने वाले थे। वह अपने गुरु जी से आशीर्वाद प्राप्त करने गया। गुरु जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा था कि दिल से वायलिन बजाना। उसके हाथों में एक कागज का टुकड़ा थमाते हुए कहा कि इसे वायलिन बजाने के पहले खोलना और अपने सामने रख लेना।
वह बहुत असमंजस में था। वह तो हाथों और उँगलियों की मदद से वायलिन बजाना जानता था। दिल से कैसे बजा सकता था। दिल को तो निकालना मुश्किल था। अगर दिल निकाल भी लिया जाय, तो उसके हाथ और उंगलियाँ तो होती नहीं। उससे कैसे वायलिन बजेगा। उसकी समझ में  नहीं आ रहा था, वह क्या करे? इसी उधेड़बुन में आज उसने अभ्यास भी नहीं किया था।
पूरा हॉल दर्शकों से भर चुका था। बड़े से मंच के बीच में एक और छोटा मंच बनाया हुआ था। प्रसिद्ध वायलिन वादक हॉल के आगे की प्रथम पंक्ति में बैठे थे। उसका नाम पुकारा गया था। वह उदास और थके कदमों से छोटे से मंच की ओर बढ़ रहा था। उसे गुरु जी याद आ रहे  थे। उनकी बात  "दिल से बजाना।" उसके कानों में गूंज रहे थे। वह मंच पर चढ़कर निर्धारित स्थान पर बैठ गया। वह गुरु जी के दिये हुए कागज के टुकड़े को सामने खोलकर बैठ गया। कागज के टुकड़े में एक तितली की तस्वीर बनाई हुई थी।
उसके हाथ कांप रहे थे। उसकी उंगलियाँ सुन्न हो रही थी। उसने वायलिन को अपनी ठुड्डी के नीचे टिकाया ही था कि एक तितली उड़ती हुई आयी और उसके कंधे पर आकर बैठ गयी। उसके हाथों और उँगलियों में ऊर्जा आ गयी। उसने बो को  हाथ में लिया उसकी उंगलियाँ तारों पर चलने लगी थी। तितली धुन गुनगुना रही थी। उसके संकेत गुरुजी के दिये हुए कागज पर उभर रहे थे। तितली की धुन पर वायलिन से निःसृत  संगीत लहरियों से हॉल गूंज रहा था। लोग स्तब्ध थे। पूरे सभागार में वायलिन के तारों से निकले स्वर थे और श्रोताओं की सांसें थी। एक घंटे से अधिक तक  स्वरों और सुरों की गंगा बहती रही और लोग उसमें  अवगाहन करते रहे, डूबते-उतराते रहे। उसने वायलिन वादन को विराम दिया। सभागार में स्तब्धता छायी थी। लग रहा था कि वायलिन की ध्वनि अभी भी गूंज रही हो।
जब आमंत्रित प्रासिद्ध वायलिन वादक मंच पर आ गए तब ऋषभ ने उनके  चरणों में झुककर प्रणाम किया। उन्होंने उसे हृदय से लगा लिया। अपने घुटनों पर बैठे हुए और उसको हॄदय से लगाये हुए ही उन्होंने माइक पर कुछ कहा  था। लेकिन उसे तीन ही शब्द याद रहे। "आज ऋषभ ने 'दिल से बजाया' है।" हॉल में तालियाँ बजती रहीं। अब उसे गुरुजी के सूत्र - वाक्य "दिल से बजाना" का अर्थ समझ में आ गया था।
©ब्रजेन्द्रनाथ

Friday, March 4, 2022

तुम आ गए मीता (कहानी) #मारे गए गुलफाम

 #BnmRacbnaWorld

#teesarikasam

#maregayegulfam

#मारेगएगुलफाम #तीसरी कसम








तुम आ गए मीता

 04  मार्च को जब हम फणीश्वर नाथ रेणु को उनके 101 वें जन्मदिन पर याद करते हैं, तब उनकी कहानी "मारे गए गुलफाम" का अंतिम दृश्य अभी तक मर्मान्तक पीड़ा से अश्रुविगलित कर जाता है। क्या है वह दृश्य, एक बार उसे पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा हूँ। सादर!

हीराबाई वापस जा रही है। स्टेशन पर जनाना मोसाफिरखाने के फाटक पर हाथ - मुँह ढँककर उसी का इंतजार कर रही थी। लालमोहर से हिरामन को खबर मिलती है, वह अपने तेज धड़कते दिल को थामे हुए मुसाफिर खाने की ओर जाता है कि फाटक पर ही उसे हीराबाई मिल जाती है। हीराबाई तमाम दर्द की तड़प को  अपनी ओढ़नी से जज्ब किये हुए कहने का प्रयत्न करती है, " लो! हे भगवान, तुम आ गए मीता! मैं तो उम्मीद छोड़ चुकी थी। तुमसे भेंट हो गई। अब भेंट नहीं हो सकेगी। मैं जा रही हूँ, गुरुजी!"

उसने उसके रुपयों की थैली अपने कुर्ते के अंदर से निकाल कर उसकी ओर बढ़ाते हुए यही कहा था। "उसकी थैली चिड़िया के  देह की तरह गर्म है। "  यही लिखा है रेणु जी ने। इसमें कई संकेत छिपे है। हीराबाई ने अपने चिरई के जैसी धड़कन को उसमें अनुस्यूत कर दिया है। दूसरा संकेत उसकी बेबसी की ओर है। चिड़िया की क्या बिसात,  पिंजरे में बंद, उन्मुक्तता को तरसता , कमजोर -  पंख  में उड़ान की ताकत भी कहाँ होती है। 

हिरामन थैली की गर्माहट से हीराबाई के दिल के  करीब पहुंचने की कल्पना में खो जाता है। बक्सा ढोने वाला आज कोट पैंट पहनकर बाबू बना हुआ सबों को आदेश दे रहा है।  

'गाड़ी आ रही है'

हीराबाई की  चंचलता बढ़ गयी है। 

वह हिरामन को अंदर बुलाती है, "हिरामन इधर आओ, मैं फिर जा रही हूँ, अपने देश की कंपनी मथुरा मोहन में...बनैली मेला  आओगे न!"

इसबार हीराबाई ने हिरामन के  दाहिने कंधे पर  हाथ रखा, और अपनी थैली से पैसा निकलते हुए बोली, "ये लो गरम चादर खरीद लेना।"

अब हिरामन के सब्र का बांध टूट गया, "इस्स! हमेशा रुपये पैसे के बात!  रखिये रुपया, क्या करेंगे चादर?"

हिरामन के पूरे अस्तित्व पर छा गए क्षोभ , संताप, वेदना, यंत्रणा, को हीराबाई ने अपने अंतर में उतरते हुए  और उबलते हुए , चुभते हुए महसूस किया था, "तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया, क्या मीता?  महुआ घटवारिन को सौदागर ने  जो खरीद लिया है, गुरुजी!"

हीराबाई का गला रुँध गया, गाड़ी आ गयी थी, हिरामन बाहर आ गया, गाड़ी ने सीटी दी और उसी के साथ उसके अंदर की कोई आवाज उसी के साथ ऊपर की ओर चली गयी... कु - ऊ - ऊ - ऊ...

रेणु जी की ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति ने इस कहानी को चारमोत्कर्ष की ओर ले जाने की घोषणा कर दी है। 

"महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद लिया है, गुरु जी!" 

कितनी बेबसी है, इस वक्तव्य में। बाजार सजा है, खरीददार जिगर भी खरीद रहे है और जिगर के अंदर की भावनाओं को भी इंजन से भाप के साथ निकलती सीटी की तरह उड़ा  दे रहे हैं। किसका क्या चिथड़े - चिथड़े बिखर रहा है, किसकी चिन्दियाँ कहां उड़ रही हैं, किसके तीर किसके जिगर के पार हो रहे हैं, किसका वार किसको लहुलुहान कर रहा है, इससे उसे क्या मतलब? 

शायद प्रेम की परिणति यही है कि वह अधूरा रह जाय, उसका अधूरापन ही उसकी पूर्णता है, उसके अधूरेपन से उत्पन्न दर्द की छटपटाहट ही  इसकी गहराई है।  लहरों का उठना, तरंगों में तब्दील होना और किनारे जाकर टूटकर लौट जाना ही उसकी पूर्णता है। 

ब्रजेंद्रनाथ





अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld  #story #affection#GovernmentOfficer अधिकारी की आत्मीयता  ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद ...