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Sunday, June 17, 2018

कैसे धरा को संवार दूँ?(कविता)

# BnmRachnaWorld
#poems#nature

फूलों में रंग कौन भरता है?
पत्तियों में रंग कौन भरता है?
बादलों के संग कौन घिरता है?
हवाओ के संग कौन उड़ता है?

ये वसुंधरा लेकर नयी नयी
रूप राशि, नित सजा रही।

ये किसकी कूचियों से खींचे चित्र हैं।
ये किसके वितान पर मेले विचित्र हैं।

ये कौन कर रही नित शृंगार है।
शृन्गों पर बैठी कर रही विचार है।

कैसे धरा को संवार दूं,
कैसे धरा को संवार दूँ?

गिरि शृन्गों पर बर्फ की चादर
देवदार के पेड़ो की हरियाली
बहते झरनों का शोर छल छल
बुला रही है, थोडी बैठ तो आली।

उँचे- उँचे शिखरों से
खिंची है बर्फ की रेखा
रुई के फाहों से सनी
हवाओं में समय देखा।

ये कौन भर रहा कल कल उमंग है।
पत्थरों में कौन उकेरता तरंग है।

ये कौन मचा रही नित धमाल है।
खुशियाँ दूँ सबको ये मेरे लाल हैं।

कैसे धरा को बुहार दूँ।
कैसे धरा को संवार दूँ।

मैं आ गया हूँ कश्मीर में,
जहाँ वदियाँ विहंस रही हैं।
जहाँ चिनार, खुबानी के पेड़ों में,
जिन्दगी झांकती हुलस रही है।

जहाँ के लोगों में तहजीब है
जहाँ के लोग बांटते हैं खुशियाँ ।
जहाँ प्यार लुटाना जानते हैं
जहाँ नहीं है कोई भी कमियाँ।

जहाँ हर पल साँस लेती है
जीवन खुलने को आतुर है।
जहाँ हर मोड़ पर है चाहतें
जहाँ सौगात लुटाने को नेहातुर हैं।

फिर कौन है जो
वादियों में बारूद बुनता है।
वो कौन है जो
हरियाली में चिंगारियां चुनता है।

जब जानते हो यह सब
खामोश क्यों हो?
क्यों डरे से सहमे हुए
बेहोश क्यों हो?

तुम बुला लो, तुम सम्हाल लो
उन पडोसियों को जिन्हें निष्कासन दिया है।
उठो खडे हो, सत्य के लिये लड़ो
उनके लिये ढाल बनो जिन्हें आश्वासन दिया है।

ये जवाब होगा, जो चाहते हैं बांटना,
ये जवाब होगा, जो चाहते हैं खून चाटना।
चलो धरा को मनुहार दूँ।
चलो धरा को संवार दूँ।
- ब्रजेन्दनाथ
 ता: 01-06-2018
 जम्मु कश्मीर की 10 दिनों की यात्रा से लौटने के बाद 

Friday, June 1, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतांत (प्रथम दिन, Day 1)

#BnmRachnaWorld
#TourtoJammuKashmir
जम्मु कश्मीर यात्रा संस्मरण (प्रथम दिन, Day 1)
मित्रों, मैं अभी जम्मु कश्मीर की यात्रा पर हूँ। इस यात्रा के दौरान जिन अनुभवों से गुजर रहा हूँ, उसे मैं लिपिबद्ध करने की कोशिश कर रहा हूँ। जम्मु कश्मीर में डाटा जाम कर दिये जाने के कारण आज पहला पोस्ट डाल रहा हूँ, जो श्रीनगर के होटल के वाईफाई के मार्फत सम्भव हो पाया है। प्रस्तुत है पहले दिन का  यात्रा वृतांत:




22-05-2018, मंगलवार (प्रथम दिन, Day 1)
ऊँ हौं जुं स:। ऊँ भूर्भव: स्व:।
ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम।
उर्वारुकम बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।
स्व: भूर्भव: ऊँ। स: जुं हौं ऊँ।
जम्मु कश्मीर की यात्रा मेरे वर्तमान निवास स्थान वैशाली सेक्टर 4 से 2बजकर 46 मिनट अपराह्न से आरम्भ हुई। ओला कैब से नयी दिल्ली स्टेशन आकर जमशेदपुर से आये अन्य यात्रा के पथिकों के समूह में, मैं अपनी पत्नी के साथ शामिल हो गया। वे सभी करीब 1 बजे अपराह्न ही पहुंच चुके थे। उनसे ज्ञात हुआ कि उनकी यात्रा कल ही शुरु हो चुकी है। वे जमशेदपुर से बस द्वारा रांची आये और वहां से गरीब रथ ट्रेन से दिल्ली आ गये। ट्रेन दो घन्टे लेट थी। उनका लंच यहीं स्टेशन पर हुआ। मेरे जमशेदपुर निवास सुन्दर गार्डेन कैंपस से श्री ललन प्रसाद सिंह जी अपनी पत्नी, अपनी बहन और जीजा जी के साथ आये हैं। उन सबों से यहीं दिल्ली स्टेशन पर मुलाकात हुयी। मेरी इस यात्रा का उद्देश्य समूह में यात्रा का आनन्द लेना है। दूसरा अभी जब जम्मु कश्मीर में रमजान के महीने में सेना का आतक वादियों के विरुद्ध ओफ्फेन्सिव कार्य कलाप बंद है, तब स्थिति को करीब से जानना! इस यात्रा में यात्रा कोओर्दिनेटर हॉलिडे त्रैवेल्स के श्री उत्तम चौधरी का सहयोग प्राप्त हो रहा है। उन्होने 6 बजे शाम के करीब मिक्चर और पेस्ट्री रोल के पैकेट पेश किया। इसके साथ हमलोगों ने चाय का आनन्द लिया।
आज आठ बजे जो यात्रा पर्ची प्रमाण परीक्षक आये, वे बहुत ही सजग दिखे। उन्होने टिकट का परीक्षण ही नहीं किया बल्कि सबों के आई डी प्रमाण पत्र की भी परीक्षा की। सामान्यत: ट्रेनों में हमलोग जैसे वरिष्ट नागरिकों से यात्रा प्रमाण पर्ची पर आबंटित सीटो की जानकारी लेकर आगे बढ़ जाते हैं। साथ ही अगर मेरी और मेरी पत्नी का एक ही पी एन आर में यात्रा पर्ची(टिकट) है, तो मेरा परिचय प्रमाण पत्र देखकर ही संतुष्ट हो जाते है। इन्होने मेरा और मेरी पत्नी दोनों का परिचय प्रमाण पत्र का परीक्षण किया। यह उनके कर्तब्य निरवहण के प्रति निष्ठा को दर्शाता है। ऐसे कर्तब्य परायण परीक्षक भारतीय रेल के प्रकाश स्तम्भ हैं। हाँ, बहुत से लोग होंगें जो उनके इस ब्यवहार को उनके पदाधिकारी जन्य अहंकार से जोड़ सकते हैं।
बड़ी विचित्र स्थिति है। जब कोई सरकारी पदाधिकारी या कर्मचारी अपने कर्तब्य का निर्वाह चुस्ती से करता है, तो वह आम जन की नजरों में पद का अहंकार दिखा रहा होता है। जब वह ऐसा नहीं करता है तो लोग उसे ढीला ढाला घोषित कर देते हैं।
रात्रि यात्रा तृतीय श्रेणी के शयन स्थान पर श्री शक्ति एक्सप्रेस/मेल से यात्रा करते हुये सम्पन्न हुयी। पूरी ट्रेन लगभग भरी हुयी थी। इससमय स्कूलों में छुट्टियां होने के कारण कफ़ी यात्री वैश्नोदेवी यात्रा के साथ कस्मीर की यात्रा की भी योजना बनाते हैं। हमारे समूह में करीब 31 यात्री और 4 -5 को ओर्दिनेटोर के स्टाफ हैं। जम्मु से कतरा की यात्रा एक नया अनुभव साबित होती अगर यह दिन में होती। इस रेल खण्ड का निर्माण खुद मे एक तकनीक और अभियंत्रण के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। दिन में यात्रा करने पर रेल का पहाडों पर वादियों और सुरंगों को पार करते हुये देखना एक रोमांचकारी अनुभव होता।
क्रमश:,,,

Thursday, May 17, 2018

बेवाकीपन या बेहयापन (विचारोत्तेजक लेख)

#BnmRachnaWorld
#Essay#thoughtprovoking


नोट : यह लेख ' प्रतिलिपि हिन्दी' में अगस्त 2016 में प्रकाशित हुआ था, जिसे पाठकों को अपार स्नेह मिला था। यह "बोलो कि लब आजाद है"  नाम से आयोजित प्रतियोगिता में 4था स्थान प्राप्त कर सकी थी। उसके नामों की सूची नीचे दे  रहा हूं:

बेवाकीपन या बेहयापन 

आज कल एक अजीब चलन चल गया है। शिष्टता की सीमा लांघना, बेवाकीपन और बोल्ड कहा जाने लगा है। अगर उसे कोई स्त्री, स्त्री विमर्श से जोड़कर उसे महिमामंडित करे तो वह बड़ी खबर बन जाती है। उसे वैश्विक स्तर पर भी स्वागत किया जाने लगा है। आप जन लेखक या जनसंवाद स्थापित करने वाले रचनाकार कहलाने लगते हैं, अगर आप ब्यवस्था को इतनी गालियां देते है कि पिछले कई दशकों तक नहीं दी गई होगी। आप लानत मलामत भेजने की होड़ में काफी आगे निकल पाते हैं। रातों रात मशहूर होने के बड़े आसान समीकरण का प्रचलन चल पड़ा है। चली आ रही दस्तूरें, दकियानूसियों से नवाज़ी जाने लगी हैं। मातृभूमि को गाली देना समाचार बन जाता है। मातृभूमि के लिए गोली खाना कोई समाचार नहीं बन पाता। हमें पोर्न अच्छा लगता है, क्योंकि इंटरनेट पर पोर्न 70 प्रतिशत से अधिक छाया हुआ है। अब साहित्य में अश्लीलता की चर्चा ही बेकार है। अब कामायनी, उर्वशी या शाकुन्तलम् में हम श्रृंगार नहीं ढूढते। हम पेटीकोट और dopadi में श्रृंगार ढूढते है। अफ़सोस तब होता है जब समाज को दिशा देने वाले साहित्यकार या प्रबुद्ध वर्ग भी सस्ती लोकप्रियता की चाह में हवा के उसी रुख में उड़ते हुए दीखते हैं। समाज की विद्रूपताओं को स्त्री के अंतरवस्त्रों(मैं यहाँ उनके नाम गिनाने से परहेज़ कर रहा हूँ) से जोड़कर स्त्री रचनाकारों के द्वारा प्रस्तुत किया जाना उन कतिपय तथाकथित लोगों को भले ही चटपटा, तीखा और स्वादिष्ट लगता हो, लेकिन स्त्री विमर्श की वकालत करने वालों को भी शिष्ट तो नहीँ ही लगता होगा। हाल में एक कविता चर्चित हो गई। उसके भाव कुछ इसतरह थे- उसने दरोगा के कहने पर पेटीकोट नहीं उतारा, उसकी दुधमुंही बच्ची अपनी बूढ़ी दादी के सूखे स्तनों को चूसती रही...वगैरह, वगैरह... यहां साहित्य बेवाकीपन का आवरण लिए जनसंवाद स्थापित करने को बेचैन दीखता है, ऐसा ही सन्देश देने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें इसतरह का तथाकथित बेवाकीपन किस हदतक बेहयापन के करीब पहुँच गया लगता है, इसका आभास बहुतों को होते हुए भी वे सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के प्रयास में उस हद तक अपने को गिरने - गिराने में कोई भी संकोच करना नहीं चाहते। इसमें वे बोल्ड, बेवाक का ख़िताब भी हासिल करने में सफल हो ही जाते हैं।

साहित्य अगर न भी कहें तो आजकल का लेखन इस बात में होड़ करने में लगा है कि किसने सेक्स की रोशनाई में अपनी कलम कितनी डुबाई है और उसके बाद उसे कितने बोल्ड ढंग से कागजों पर उतारा है। आज का श्रृंगार रस, श्रृंगार से उतना अलंकृत नहीं होता जितना इरोटिका के रस से ओतप्रोत होता है। मैंने हाल में लिखी अपनी एक श्रृंगार रस की कविता की कुछ पंक्तियों को सोशल साइट FB पर डाली, यह देखने के लिए कि कैसी प्रतिक्रिया मिलती है । पक्तियां थी..

अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें। उत्कंठित मनसे, उद्वेलित तन से, उर्जा के प्रबलतम आवेग के क्षण से, यौवन से जीवन का अविचारित यात्री बन, अंतर में टूटते तटबंध को टटोंलें। अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

इसपर बहुत कम लोगों की प्रतिक्रिया आई। शायद मैंने भारी भरकम शब्दों में कसकर श्रृंगार को ब्यक्त करने की कोशिश की थी जो इस समय की ग्रहणशीलता के अनुरूप नहीं है। अगर मैं उसे ब्यक्त करने के स्तर को थोडा नीचे ले आकर सॉफ़्ट पोर्न के आसपास रखता, तो शायद ज्यादा स्वीकार किया जा सकता था। बड़ी अजीब बात है जहां अभिज्ञान शाकुन्तलम्, कामायनी, उर्वशी जैसे श्रृंगार रस से सराबोर उत्तम रचनाएँ रची गई हों वहां आज का पाठक वर्ग श्रृंगार रस की कतिपय पन्क्तियों के प्रति भी ग्रहणशील नहीं है। इस समय अगर आदरणीय जयशंकर प्रसाद भी अपनी कामायनी को पुनर्मुद्रित करवाने को आएं तो प्रकाशक उन्हें अपने काम सर्ग और वासना सर्ग का नाम बदलकर पोर्न सर्ग और एरोटिक सर्ग करने कहेंगें, तभी उनका काब्य छापने लायक समझा जायेगा। जयशंकर प्रसाद उतने बोल्ड नहीं हो सके न। उर्वशी से राजा पुरुरवा के प्रणय दृश्यों को दिनकर जी खुलकर नहीं लिख सके न। मैंने हाल ही में एक कहानी में BHMB शब्द लिखा देखा जो किसी लड़की पर कसी गई फब्तियों का एक हिस्सा था। बाद में जब लड़की ने अपने सूत्रों से इसका मतलब जानना चाहा तो पता लगा कि इसका मतलब होता है, " बड़ा होकर मॉल बनेगी", और यह मतलब जानने के बाद लड़की शर्मिंदा नहीं महसूस कर , खुश होती है। ...और ऐसी कहानियाँ और किस्से खूब पढी जाती हैं। यह वैसे ही होता है जैसे अगर कहा जाय कि इसे मत देखो, या इसे मत पढ़ो, तो उसे लोग जरूर देखते या पढ़ते हैं। उसी तरह का है बोल्ड लेखन। बेवाकीपन अब बेहयापन की हद पार करने लग गया है। रचनाकर्मियों का भी कोई दायित्व होता है, उसे समझने की जरूरत है। तो इसे आप क्या कहेंगें, " बेवाकीपन या बेहयापन"। बोल्डनेस, फूहड़पन और बेहयापन की सीमा न लाँघ दे इसका खयाल रखा जाय, तो रचनाकार अपने सामाजिक दायित्व के निर्वहन में भी समुचित योगदान दे सकेंगे।
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- ब्रजेन्दनाथ

Thursday, May 10, 2018

एक रैली और निकाली जाये (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poem#patriotic

मैने कुछ दिनों पहले शायद 23/24 अप्रील को एक वीडियो देखा था, जिसमें कुछ भयानक किस्म के बुद्धिजीवी अन्ग्रेजी में शेम शेम के नारे लगा रहे थे। यह स्थान लगता है कि मुंबई का गेटवे औफ इंडिया वाला चौराहा रहा होगा।
उससमय आसिफा वाला काण्ड भी सुर्खियों में था। ये बिल्कुल मेरे अन्दर के स्वप्रेरित भाव हैं। मैं किसी भी वाद के विवाद से दूर रहता हुआ,  कुछ कहने की कोशिश की है।
अभी तक अप्रकाशित कविता है।





आइये एक रैली और निकाली जाये


कसाब, दाउद, हाफिज को
सर कहकर आदर भाव देने वालों!
आओ लाखो कश्मीरी हिन्दुओं के घर बार छोड़
शरणार्थी की बदहाल जिन्दगी जीने वालों
के लिये भी थोड़ी करुणा दिखाई जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।

कल्बुर्गी, व्ल्मुल्ला, गौरी लंकेश, पर
कैन्डील जला-जला अश्रुधार बहाने वालों!
एक बार बस्तर, दान्तेवाड़ा, गढ़चिरौली में
शहीद हुये सुरक्षा बलों के नौजवानों
के लिये भी थोड़ी नेत्रों में नमी लायी जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।

मक़बूल बट्ट, बानी, गुरु अफजल, अजादी गैंग को
नारे लगा - लगा महिमामंडित करने वालों!
एक बार शहीद फैयाज़ और युसुफ पण्डित
के घरों में कोहराम के बाद पसरे सन्नाटे के
लिये भी थोड़ी सान्त्वना दिखाई जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।

भारत के विभाजन के सूत्रधार
मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगा उच्चासन देने वालों!
एक बार विभाजन के समय लाखों परिवारों
के घर बार उजड़ने पर रोते बिलखते, लाशें ढोते
लोगों के लिये भी दिल में संवेदना जगायी जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।


उन्नीस सौ सैन्तलीस में कबायली के वेश में
पाकिस्तानी सेना द्वारा मारे गये हिन्दु मुसलमां के परिवार वालों!
इस बार उनके लिये मुट्ठियाँ बांधो, हाथों से हाथ मिलाकर
आओ जम्मु कश्मीर की मिट्टी की सौगन्ध ले,
पाक अधिकृत क्षेत्र को वापस लेने की कसम दुहराई जाये।
आइये इस कसम के नाम एक रैली और निकली जाये।

-ब्रजेन्द्रनाथ, तिथि 05/05/2018
दिल्ली एन सी आर, वैशाली।

Tuesday, May 1, 2018

कविता निकलकर आ रही है (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemmotivational



कविता निकलकर आ रही है

कोई कविता निकल कर आ रही है।

प्रसव वेदना की पीर सी
चुभ रही है नुकीली तीर सी
बाहर निकलने को देखो तो
वह कितनी छटपटा रही है।
कोई कविता निकलकर आ रही है।

अंतरावेगों को संवारती सी,
वाह्य-आवेगों को विचारती सी।
बाहर निकलने को देखो तो,
वह कितनी अकुला रही है।
कोई कविता निकलकर आ रही है।

कहीं चुपके से झांकती सी,
उस पार की पीर को आन्कती सी।
गुमसुम सी हुई देखो तो
वह कितनी पिघलती जा रही है।
कोई कविता निकलकर आ रही है।

गौरैया की चोंच की नोक सी
कुन्जों में कोयल की कूक सी
कौऔं के कांव कांव के मध्य भी
कितनी चहकती जा रही है।
कोई कविता निकलकर गा रही है।

वह विशिख-दन्त-कराल-ब्याल सी
कुन्डली कसती जा रही महाकाल सी
दुश्मनों को झपटने दबोचने को
देखो अपना फ़न फैला रही है।
मेरी कविता निकल कर गा रही है।

वह रण मत्त हो विषवाण सी
रक्त-दन्त-रंजित विषपाण सी
सीमा पर अरि मर्दन करने को
शोणित थाल देखो सजा रही है।
मेरी कविता रण राग सुना रही है।
मेरी कविता निकलकर गा रही है।

-ब्रजेन्द्रनाथ
कोलकता, भवानीपुर, निजाम पैलेस
ता: 24-03-2017,

नोट:  दिनांक 29-04-2018, दिन रविवार को अपराह्न 5 बहे से स्थानीय दिल्ली एन सी आर, वैशाली सेक्टर 4 स्थित हरे भरे मनोरम सेन्ट्रल पार्क में "पेड़ों की छाँव तले रचना पाठ" की 43वीं गोष्ठी में रचना पाठ का सुअवसर प्राप्त हुआ।
यह अनौपचारिक साहित्यिक गोष्ठी प्रिय अवधेश कुमार सिंह, असिस्टेंट जनरल मैनेजर बी एस एन एल, दिल्ली, जो ब्यवसाय से भले ही तकनीकी प्रबन्धन से जुड़े हों, पर हृदय से कवि हैं, के संयोजन में पिछले तीन वर्षों से अधिक से निरन्तर आयोजित किया जा रहा है। यह गोष्ठी संवेदनात्मक, कोमल, भावपूर्ण अनुभूति की अभिब्यक्ति को प्रस्तुत करने का वह नैसर्गिक, प्राकृतिक मंच है, जो आज अपने मासिक आयोजन के 43वें पायदान पर सभी नियमित रचनाकारों और श्रोता बंधुओं का एक पारिवारिक आयोजन सा लगने लगा है।
इस रचना का पाठ मैने इसी आयोजन में किया है।
इस गोष्ठी में मेरे द्वारा किये गये कविता पाठ के विडियो का यू टयूब लिन्क:
link: https://youtu.be/4NW4CME5XEw
इस लिंक को कॉपी करें, गूगल सर्च ंंमें पेस्ट करे  सर्च बटन दबायें, आप ंंमेरे youtube चैनेल पर जायेंगे। आप विडियो का आनन्द लें। इसके बाद ंंमेरे यूट्यूब चैनेल BnmRachnaWorld को लाइक करे और subscribe भी करें।

Saturday, April 14, 2018

पूर्वाग्रह(कविता)

#BnmRachnaWorld
#poem#social

ओपन बुक्स ऑनलाइन साहित्य मर्मज्ञों के द्वारा संचालित एक वेबसाइट है। इसी में इसके ओ बी ओ लाइव उत्सव 90 में  "पूर्वाग्रह" शब्द पर रचनाएँ आमंत्रित की गयी थीं। रचना डालने की समय सीमा थी, 13 से 14 2018 अप्रील तक। मेरी यह रचना काफी चर्चित रही और सराही भी गयी। उस साइट पर सभी रचनाओं का संकलन जारी है।
अगर आपको तुकान्त आधुनिक  के रूप में लिखी गयी यह कविता अच्छी लगती है तो इसे पढें, अपने कमेन्ट दें और शेयर करें:



पूर्वाग्रह

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बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है-

सजाये हुये घर को यूं ना बर्बाद करो।
बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

एक महल जो दे रहा चुनौती
उंचे गगन में सिर उठाये तना है।
उसकी नीवं में पलीता लगाओ मत
कितनों की पसीने की बूंद से बना है।
उसको हवाले मत करो आग के,
जलाना आसान है, बुझाना कठिन है।

सम्बन्धों की सेज पर खुशबुओं को
सुगन्ध भरे फूलों से खूब महकाना है।
पूर्वाग्रहो के हर्फों से उकेरी गयी चादर को
सरहद के पार कहीं दूर फेंक आना है।
रिश्तों की डोर को, हवाले मत करो गांठ के
कि तोड़ना आसान है, जोड़ना कठिन है।

पेड़ की डालों को ऐसे झुकाओ मत
फलों से लदे हैं, सुस्वाद से सराबोर हैं।
लचक गयी डाल तो फल टपक जायेंगे
बांटते हैं स्नेह और ममता पोर पोर हैं।
जड़ों को सींचना कभी ना छोड़ना
सोखना आसान है, सींचना कठिन है।

वातावरण में ब्याप्त हो रहा कोलाहल है,
विष वमन हो रहा, फैल रहा हलाहल है।
क्या हो गया है, हर ओर क्यों शोर है?
कोई तो हो, जो सोचे, क्या फलाफल है?
इस यज्ञ में, दें अपनी आहुति, मिट जाएं,
अब मिटना आसान है, जीना कठिन है।

सजाये हुए घर को यूं ना बिखराओ
कि बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

c@ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र
ता: 12/04/2018, बैशाख कृृष्ण एकादशी
वैशाली सेक्टर 4, दिल्ली एन सी आर।



Monday, February 19, 2018

फागुन अब आ गईल (भोजपुरी कविता)

#poetry#bhojpuri
#BnmRachnaWorld

फागुन अब आ गईल
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अरगनी पर धूप अँटक गईल
पछुआ चलत-चलत बौरा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

गेंदा पीअर पीअर फुला गईल,
पलाश के टेसू रन्ग छा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

कोयल अमवां के बगिया में,
कुहू -कुहू के शोर मचा गईल।
लगताs कि फागुन अब आ गईल।

कंत जबसे गईले परदेस में,
मन के झरोखा में याद के हवा
झरझरा गईल।
लगताs कि फागुन अब आ गईल।

इनार पर पनिहारिन के बतिया में,
ननदी के ठिठोली भौजी के भा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

कबूतर अब पंतियो पहुन्चावत नईखे,
एतने में कौआ मुंडेर पर आ गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

का का कहीं ई मौसम के बतियां,
मर्मज्ञ के कलम में इन्दृधनुश के रंग छा गईल।
लगताs की फागुन अब आ गईल।

--मर्मज्ञ





Thursday, January 25, 2018

इस गण तन्त्र सुलगता सवाल (कविता)

#poem#patriotic
#BnmRachnaWorld





इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।


सांसदों का टास्क था,
बनायेन्गें एक आदर्श ग्राम।
जहाँ होगी स्वच्छता, सम्पन्नता,
मिट जायेगी गरीबी तमाम।
आज तो उसकी ना कोई पड़ताल है।
इस गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

आज भी बन रही, सड़कें कई नई
विद्यालयों में बन रहीं नई दीवारे हैं।
एक वर्ष बीतते-बीतते ही उनमें
क्यों दिख रहीं तिरछी दरारें हैं?

सांसदों के मद की राशि-भत्ता बढता रहे,
वे ही होते रहें निरन्तर मालामाल हैं।
इस गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

गलियों में, सडकों पर,
सरकारी जमीनों पर।
दबन्गों का कब्जा है।
हरतरफ मज़ा ही मज़ा है।

फिर भी सब कह रहे
अच्छा है, ठीक हाल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।

नोटबन्दी के समय लगी कतार में,
दिखा नहीं कोई भी नेता।
कोई भी उद्योगपति, ब्यवसायी
या कोई भी सेलिब्रिटी अभिनेता।

जनता तो बनी है, उठाने को परेशानी
नेताजी आराम में हैं, देश खुशहाल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।

आज भी कुछ बच्चे हैं
बीन रहे क्यों कचरे हैं?
कचरा का कैसे हो प्रबन्धन
चल रहा है, चिन्तन-मनन।

फिर भी नहीं समाधान मिल रहा
लोग कहते है, समस्या विकराल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।


जी एस टी गर समाधान है,
तो ब्यापारी क्यों परेशान हैं?
ग्राहक के पॉकेट में सेंध लगी
कीमतो पर क्यों नहीं लगाम है?

आम उपयोग की चीजो के
मूल्य में फिर क्यों इतना उछाल है?
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

संसद, विधान सभाओं में
लोकनीति कहीं पिस रही।
भाई-भतीजों और दागी हैं नेता,
भ्रष्टनीति हर तरफ बिहंस रही।

भ्रष्टाचार मुक्त भारत होगा कब?
इसी सवाल पर मच रहा बवाल है।
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

काला धन कहाँ था?
आया अभी क्यों नहीं?
जनता बाट जोह रही,
बुरे दिन फिरेन्गें कभी?

इन सभी मुद्दों पर जरूरी पड़ताल है।
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

जनसंख्या नियन्त्रण जरूरी है,
देशहित के लिये यह सर्वोपरी है।
तो सरकार क्यों मौन है?
उसे रोक रहा कौन है?

लागू हो सख्ती से राष्ट्र नीति
चुप हो जाएं जो भी वाचाल हैं।
इस गणतन्त्र ये जलता मशाल है।
हल हो जाएं ये सारे सवाल है।
अगला गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।
अगला गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

हर मनुष्य का जीवन स्तर
क्यों नही समान है?
क्यों है इतना कोलाहल
क्यों मच रहा घमासान है?
आओ सुलझाएं ये सारे जलते प्रश्न
सोचें हर नागरिक, तो मिट जाये मलाल है।
अगला गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

तिथि: 25-01-2018
वैशाली, ग़ज़ियाबाद!























Sunday, January 21, 2018

बसन्त-सा मौन

#poems#nature
#BnmRachnaWorld




बसन्त-सा मौन, जीवन जिनका सेवा-व्रत है

आज की इस बसन्त पंचमी में, जिस दिन महाप्राण निराला जी का जन्म दिन है, शृंगार, सेवा और शौर्य के मिले जुले रंगों में शब्दों को रंगकर इस कविता का सृजन किया गया है। आप सबों के स्नेह और आशीर्वचन दोनों की अपेक्षा है। सादर!


वे बसन्त - सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है!

वृन्तों पर फूलों का उत्सव,
धरती पहने साड़ी धानी ।
आम्र-पत्र ढँके मन्जरियों से,
भौरें गुन्जाये प्रेम-कहानी।

प्रकृति दे रही है वरदान
कण-कण पसर रहा अमृत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा - व्रत है।

पीली सरसों की क्यारियों से,
झांक रहा, कौन रन्ग बन।
गेंदे के फूलों में विहन्सता,
बरस रहा जीवन-तरंग बन।

धरती जिसका बनी बिछौना,
विस्तार यह सम्पूर्ण जगत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

कोयल बाग में कूक रही है,
गून्ज रही है ध्वनि दिगंत में।
जगा रही वह हूक हृदय में,
कंत दूर हैंं, इस बसन्त में।

अपने स्वभाव में मस्त मगन
अपनापन लुटा रहे सर्वत्र हैं।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

जो जूझ रहे दुश्मन से
सीमा पर सीना ताने।
उनका हर मौसम बसंत है,
वे रण-चंडी के दीवाने।

मौत से टकराने वालों के,
भाल सजा चन्दन, अक्षत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

राजनीति में देशनीति हो
आओ लें हम आज सपथ।
देश मान ना झूकने देंगें,
भले सजा हो अग्निपथ।

परमार्थ में जीवन अर्पण
स्वयं से उँचा ये जनमत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

ता: 22-01-2018
बसन्त पंचमी
स्थान: वैशाली, गाज़ियाबाद

माँ के सपूत

#poem#patriotic
#BnmRachnaWorld

माँ के सपूत

भूल गए हम सारी रस्में,
चरखा, तकली चलाने की।
बंदूकों को सिरहाने रख,
और तलवार गलाने की।

काल नाचता यहाँ - वहाँ,
और भैरव तांडव करता है।
सीमा पर जब   सेनानी,
गोली खाकर मरता है।

रणभैरवी रणचंडी,
नर्तन करती यहां - वहाँ।
लाशें बिछा दूँ दुश्मन की,
शपथ तेरे चरणों की माँ।

वार किया तुमने पीछे से,
हिम्मत है तो सीधे लड़।
कायर तेरे माँ ने तुझको,
मानव बनाया या विषधर।

सात को मारा है तुमने,
सत लाख लाशें बिछा दूंगा।
सीमा रेखा बदलेगी,
नई रेखा खींचा दूंगा।

बहुत हो चुका मान-मनौअल,
अब वार्ता नहीं रण होगा।
आर-पार के इस समर में,
विकट आयुधों का वर्षण होगा।

बीत चुका वो युग जिसमें,
कपोत उड़ाए जाते थे।
तलवारें तो चमकेंगी अब,
कभी शान्ति गीत हम गाते थे।

हाथ मिलाना छोड़ चुके हम,
कफ़न बाँध कर निकले हैं।
धूल चटाया नहीं तुझे तो,
माँ के सपूत नहीं सच्चे हैं।

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर
  तिथि : 07-01-2016

नोट: यह कविता मैने पिछले वर्ष (2016 ) उरी में सेना की छावनी पर सोते हुए सैनिकों पर  पाकिस्तान के द्वारा भेजे गये आतंकियों द्वारा जब छुपकर वार किया गया था, उसी के बाद लिखी थी।

कैसे धरा को संवार दूँ?(कविता)

# BnmRachnaWorld #poems#nature फूलों में रंग कौन भरता है? पत्तियों में रंग कौन भरता है? बादलों के संग कौन घिरता है? हवाओ के संग कौन उ...