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Monday, December 4, 2017

डिवाईडर पर कॉलेज जंक्शन (अध्याय एक से सात तक)

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ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र







डिवाईडर पर कॉलेज जंक्शन






हमारे परिवार की नई पीढ़ी को समर्पित जिसमें ओजेश, केशव और ऋषभ आ गए हैं...
साथ ही इस जमाने की नई पीढ़ी को भी जिसमें स्थितियों को उलटकर सीधा करने का जज्बा है और जोश भी।





प्रस्तावना
मनस्वीनुमा मनसाईन बतियाँ

  यह उपन्यास चौबीस अध्यायों में अपना फैलाव लिए हुए है। जिंदगी भी तो हर रोज चौबीस घंटों में पल - पल सिमटती हुई, क्षण - क्षण में खनकती हुई सुगन्धित, पुष्पित, फलित होती है। कोई इसे छककर काटता है और किसी से काटे नहीं कटती।
वैसे पूरी कथा एक डिग्री कॉलेज से सम्बन्ध रखती है। पृष्ठभूमि में 70 का दशक, कहानी का कालखण्ड है लेकिन रैंडम मेमोरी पर आज की ही रची बसी, गुँथी, सुलझी, उलझी तंतुओं में गढ़ी लगती है। इसका नायक पुष्प शायद संशयग्रत हो सोच रहा है:

यह कौन बैठा नदी की तीर पर,
निश्चेष्ट, निश्चल देखता जल - प्रवाह।
टूटना, बिला जाना, तट से मृतिका - कणों का,
और डूब जाना पत्थरों का अतल - जल में।

पत्थर बने जो करते अलंकृत
स्वयं को मिथ्या अहमन्यता से।
वे ही कहीं तो डूबते नहीं
प्रवाहमान जल के अतल - तल में?

परन्तु अपने उस अभिमान में
हिंसा का तांडव किया करते हैं वे।
उससे विगलित समाज के तन्तु को,
किस तरह, झकझोर, तोड़ फेंकते अनल में।

ऐसे तत्व भी (या) ही इतिहास में स्थान पाते,
झोंक जन को और जग को।
एक भीषण युद्ध की विभीषिका में,
मानवता जहां मृत्यु – शवों को ढूढती विकल हो।

हिंसा का प्रत्युत्तर न दे,
चुपचाप रहकर सहे जाना।
उदारता, सदाशयता का ओढ़ आवरण,
क्लैब्य-दोष-मण्डित कर लेना नहीं तो और क्या है?

इन्हीं सवालों का जवाब ढूढने को मजबूर करता यह कथानक पुस्तक रूप में पाठकों के सामने खुला पड़ा है। कथ्य में हास्य - ब्यंग्य का पुट भी है। इसलिए ऊपर दी गई, सोचने को विवश करती पक्तियों को मस्तिष्क के पिछले हिस्से में रखकर पढ़े और कथा प्रवाह का आनंद लें।
                                     
                                             




अनुक्रम

शीर्षक                               अध्याय – क्रम                पृष्ठ संख्या
कॉलेज के फनी सर                एक - सात                      6 - 52           
प्रेम जागल, मनवाँ भींग गईल    आठ - चौदह                53 - 105     
हलचल और चुनावी उथल – पुथल पंद्रह - बीस           106 - 140         
अंजुरी भर, आसुरी – रक्त        इक्कीस - चौबीस        141 - 167             
         













कॉलेज के फनी सर 


एक
              डिग्री कॉलेजों यानि जिन कॉलेजों  में कला, विज्ञान, वाणिज्य एवं अन्य संकायों में ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन की  डिग्री  के  लिए  पढाई  होती  है और अभियंत्रण या इंजीनियरिंग कॉलेजों में मौलिक अंतर होता है। डिग्री  कॉलेजों  में सही अर्थों  में  अधिकांश विद्यार्थी  विद्या की अर्थी उठाने आते हैं और अभियंत्रण कॉलेजों में विद्यार्थियों की  बड़ी संख्या को पढ़ना ही पड़ता है।  डिग्री कॉलेजों के छात्र / छात्राओं का समीपतम लक्ष्य किसी तरह से डिग्री हासिल करना होता है।
       वहां के विद्यार्थियों को तीन खानों में विभक्त किया जा सकता है : प्रथम खाने में  वे डाले जा सकते हैं  जो एडमिशन तो ले लेते हैं, परन्तु  वे कॉलेज में क्लास नहीं जाकर कोचिंग क्लास में  आल इंडिया इंजीनियरिंग, आई आई टी या प्री मेडिकल परीक्षाओं की तैयारी में लगे होते हैं।  ऐसे छात्र / छात्राएं कॉलेज  में एडमिशन लेने के बाद फीस जमा करने के लिए जाया करते हैं।  इनका कोचिंग की पढ़ाई के बाद,  इंजीनियरिंग या मेडिकल में एडमिशन नहीं होता है या मन माफिक कॉलेज नहेीं मिलने के कारण एडमिशन नहीं लेते हैं या प्राइवेट कॉलेजों की ऊंची फीस के कारण भी उनमें एडमिशन नहीं ले पाते हैं तो वे हारे हुए योद्धा के रूप में डिग्री कॉलेज में एडमिशन लेकर आगे की पढाई में लगे रहने के लिए आ जाते हैं।
       दूसरे खाने  में वे विद्यार्थी होते हैं जो अभिभावक  के दबाव में एडमिशन तो ले लेते हैं परन्तु उनका मन पढने का कभी - कभी कुछ - कुछ  हो जाता है।  अगर वे  पढ़ लिए या  किसी तरह डिग्री भी हासिल कर लिए तो यह अहसान उनका अपने ऊपर से अधिक अपने अभिभावकों पर ज्यादा होता है।  इनके कारण ही कॉलेजों में छात्र / छात्राएं दिखाई देते हैं।  छात्र लेटेस्ट फैशन द्वारा अपनी इमेज संवारने में लगे होते हैं और छात्राएं कॉलेज में रौनक बिखेरने का काम कर रही होती हैं।  यदि कॉलेज को - एड नहीं हो तो ऐसे छात्र कॉलेज आने के लिए वही रूट तय करते हैं जिसमें रास्ते में वीमेन या महिला महाविद्यालय अवश्य पड़े।
       तीसरे खाने में वे विद्यार्थी होते हैं जो सचमुच में पढने इसलिए आते हैं क्योंकि उनके पास पढने की अदम्य इच्छा और प्रतिभा होने पर भी वे इंजीनियरिंग या मेडिकल की फीस नहीं  जुटा पाते  या नहीं अफ्फोर्ड  कर पाते।  इसलिए  अन्य किसी  विकल्प की अनुस्पथिति में पढाई के द्वारा विषय - ज्ञान प्राप्त करने के  लिए प्रवेश लेते हैं।  ऐसे छात्र - छात्राओं  में कॉलेज के  गण्यमान्य, विद्वत्ताप्राप्त, कर्तब्यनिष्ठ मुठ्ठी भर विभिन्न संकायों में बिखरे प्रोफेसर अपने पहले ही सम्बोधन में सिविल सर्विस, बैंक पी ओ, स्टाफ सिलेक्शन कमीशन, स्टेट सिविल सर्विसेज, रेलवे आदि नौकरियों के लिए उत्साह और ललक  पैदा करते  हुए पढाई और विषय - ज्ञान के महत्व को घुट्टी की तरह पिला देते हैं। ऐसे ही छात्रों और छात्राओं के प्रवेश लेने से कुछ - कुछ कॉलेजों में पढाई हो जा रही है, वरना  काफी कॉलेज तो इसलिए खोले जा रहे हैं ताकि अमुक क्षेत्र के नेता की अमुक क्षेत्र में नेतागिरी के लिए उनके गुर्गों को नौकरी मिल जाये।  विद्यार्थी परीक्षा के नाम पर नक़ल करके डिग्रियां हासिल करते जाँय और विद्या की अर्थी पुनः ढोने के काबिल बनते जाँय।
       आज से चालीस - पचास साल पहले  कम - से - कम जिला मुख्यालय के शहरों के  डिग्री कॉलेजों की ऐसी ख़राब स्थिति नहीं  थी। उस समय सारे संकायों में पढाई होती थी।  उन कॉलेजों में से निकले छात्र - छात्राएं सिविल सर्विसेज की सर्वोच्च परीक्षाओं में, रेलवे और बैंक की परीक्षाओं में काफी तायदाद में सफल होते थे।  मैं आपको एक ऐसे कॉलेज या महाविद्यालय के प्रांगण में लिए चलता हूँ  जहाँ पढाई, अनुशासन, ब्यवहार और विचार सभी कुछ छात्र मन लगाकर सीखते थे।  प्रोफेसरों और ब्याख्याताओं  का सम्मान था, विद्यार्थी उनकी इज्जत करते थे क्योंकि वे कॉलेज की कक्षा में पढ़ाते थे।  आज की तरह  कुकुरमुत्तों जैसे उग आये  कोचिंग क्लासेज  का रुख नहीँ  करते थे।  उन दिनों कोचिंग क्लास के  संस्थान  भी  न के बराबर थे।  कॉलेज में ही छोटे - छोटे ग्रुप में ट्यूटोरियल क्लास आयोजित किये जाते थे और विद्यार्थियों को उनकी समस्याओं का समाधान बताया जाता था।
       इस कॉलेज का अपना परिसर था, अपनी बिल्डिंग थी।  कला, वाणिज्य और विज्ञान संकायों में विद्यार्थी भरे पड़े थे।  इस परिसर की खासियत यह थी कि परिसर मुख्य रेलवे स्टेशन से नजदीक ही रेलवे लाइन से  सटे  हुए था।  विद्यार्थी  कॉलेज की घंटियों से अधिक ट्रेन की आवाजों को पहचानते  थे।  गाड़ियों के आने से ही क्लास, प्रोफेसरों और ब्याख्याताओं का मेल बिठाकर लेक्चर रूम में जाया करते थे।  उन दिनों गाड़ियां भी सामान्यतः सही समय पर चलती थीं।  कॉलेज के विद्यार्थियों के  बीच  में इस तरह की वार्ता आपको सुनने को मिल जाएगी, "अरे, चल एलेवेन अप वही डेल्ही मेल का क्लास है, इसके पहले पंजाब मेल का क्लास बंक कर दिया क्या बे ? शट्टल वाला क्लासबा केकर बा हो? ई तो बहुते इम्पॉर्टेन्ट क्लास बा, पाण्डेयजी के। …’आर्म्स एंड दी मैन’ पढ़इहें।" इसतरह जैसे प्रोफेसर कभी - कभी क्लास लिया करते थे, बाकी समय तो ट्रेन ही जैसे क्लास लेने आ गया हो। अर्थात ट्रेन, क्लास और ब्याख्याताओं का मेल बिठाकर विद्यार्थी क्लास में उपस्थिति जताते और पढाई भी करते।
       यहाँ के प्रिंसिपल (प्रधानाचार्य) परमानन्द राय हुआ करते थे। लोग कहते कि वे टॉप टू बॉटम अर्थात 'आकंठपदमूल' गांधीवादी थे।  खादी की धोती और कुरता पहनते।  उनके जूते भी खादी भण्डार के ही होते।  वे कॉलेज के प्रिंसिपल से अधिक स्कूल के हेडमास्टर जैसा लगते, आज के मानदंडों के अनुसार। वे कॉलेज को भी हाई स्कूल या हायर सेकेंडरी स्कूल जैसा ही चलाने की पहल करते।  कॉलेज में खूब पढाई होती।  सभी ब्याख्याता पढाई का पूरा सिलेबस सत्र के अनुसार जरूर पूरा करते।  उनके इसी गांधीवादी और सर्वोदय कनेक्शन के कारण उन्हें १९६६ - ६७ में बिहार में पड़े भीषण अकाल के समय जिले में गेहुँ की दलिया और विदेशी पावडर दूध के वितरण की जिम्मेवारी दी गई थी। इन सामग्रियों का सारा स्टॉक कॉलेज के ही बिल्डिंग के अंदर रखा गया था। यह एक राज्यब्यापी विपत्ति थी जिसका सबमिल कर  सामना करना था।  इस पुण्य कार्य में योगदान करने से  भला परमानन्द राय जी अपने को कैसे रोक सकते थे।  उसी दलिया और पाउडर दूध के वितरक राय जी को भगवान समझते थे।  वितरक वितरण के बाद  दलिया के पैकेट के कपडे को शामियाना और टेंट हाउस वाले को बेचकर अपना कर्तब्य भलीभांति निभाते और राय जी को भी उचित चढ़ावा चढ़ाते।  इसतरह गांधी जी के  उसूलों के अंदर सेवा और पब्लिक  के लिए  प्राप्त मेवा में से अपने - अपने हिस्से के  मेवा का लाभ उठाते चलते।  इसीलिये भी इस कॉलेज में पढाई होती और  विद्यार्थी  इस कॉलेज में पढ़ने  आते।
    उनके बाद प्रिंसिपल की लाइन में जे सी दास थे।  वे विचार - धारा में सेन्टर से थोड़ा हट के लेफ्ट की तरफ झुके हुए लगते थे और कद में थोड़ा आगे के तरफ। अंगरेजी के विद्वान थे और क्लास लेना और क्लास में पढ़ाना अपने धर्म की तरह निभाते थे।  उनके ब्यक्तित्व से विद्यार्थी  प्रभावित थे।  उनके कर्तृत्व का भी प्रभाव उनके ब्यक्तित्व के अनुरूप ही था।  लोग कहते थे कि अभी तक़ वे कुंवारे  थे और कुंवारे ही रह गए। अपनी  युवावस्था में ही वे वाम आंदोलन के दरम्यान किसी  कामरेडिनी से दिल लगा बैठे थे। घर के लोगों की जातीय रूढ़िवादिता के कारण उनका घर उस कामरेडिनी के साथ नहीं बस सका। उसी के बाद उन्होंने पूरी जिंदगी शादी के बंधन से मुक्त रहने का भीष्म - संकल्प ले लिया था। ऐसे प्रोफेसरों के कारण ही इस कॉलेज में पढाई होती और विद्यार्थी पढने आते।
       अब योगेश पाण्डेय जी को ही लीजिये।  वे अंगरेजी के गण्यमान प्रोफेसर थे।  वे सामने वाले की समझ को समझते हुए अपनी अंगरेजी की शब्दावली को कठिन या सरल बनाकर बात किया करते थे।  वे अगर पास कोर्स की  कक्षा में होते तो  अति सरल अंगरेजी की शब्दावली में  विद्यार्थियों को समझा रहे होते और अगर ऑॅनर्स  या पोस्टग्रेजुएट की कक्षा में होते तो शब्दावली बदल जाती और थोड़े  कठिन शब्द उनकी जगह ले लेते।  कभी – कभी, जब खासकर वे बर्नार्ड शॉ द्वारा लिखित मशहूर नाटक 'आर्म्स एंड दी मैन'  पढ़ा रहे होते तो विज्ञान और वाणिज्य की हायर क्लासेज यानि ऑनर्स और पोस्टग्रेजुएट के अंगरेजी साहित्य और अंगरेजी भाषा में रूचि रखने वाले विद्यार्थी भी उनकी कक्षा में बैठकर उनके ब्याख्यान सुना करते थे।  मजा आ जाता था। उनकी अंगरेजी  भाषा और  साहित्य में ऐसी  पकड़ और पैठ के पीछे भी एक कहानी थी जिसे लोग कहा करते थे।  अपने विद्यार्थी जीवन में जब वे बी एच यु, बनारस में अंगरेजी साहित्य की पढाई कर रहे थे तब किसी वाह्य प्रेरणा के कारण दालमंडी जा पहुँचे  थे। दालमंडी बनारस में वैसी जगह थी जहाँ दाल यानि किसी अनाज की मंडी नहीं थी बल्कि  वह जगह  नृत्य, संगीत और श्रृंगार - रसास्वादन के लिए पुराने ज़माने में राजा महाराजाओं के द्वारा  बनाई गई  थी।  उन दिनों वहां का  स्वरूप बदल गया था  और  नृत्य, संगीत की आड़ में जिस्मफरोशी के ब्यापार को पनपाने की कोशिश होने लगी थी।
      बस वहां से पहली ही बार बहुत ही ब्यथित दिल होकर, मन में टनो बोझ लिए हुए वे लौटे थे। वहां किसी कामिनी की नृत्यकला और उसके जीवन की कहानी ने उनके युवा - मन को ऐसे वृत्तों में घेर लिया था कि वे पढाई करते - करते काब्य - रचना करने लगे। यह मशहूर अभिनेता धर्मेन्द्र और अभिनेत्री हेमामालिनी के द्वारा अभिनीत इसी कथानक पर बने 'शराफत' फिल्म के पहले की बात है। उन दिनों भी वही प्रेरणा उनके साहित्य - प्रेम की अन्तर्धारा बनी हुई थी।
      वे जब क्लास में पढ़ा रहे होते तो उनका ध्यान हर विद्यार्थी पर होता था। वे विद्यार्थियों के मन के भावों को पढ़कर जान जाते थे कि वे कितने समझ पा रहे हैं। उसी के  अनुसार वे भाषा में सरल या कठिन शब्दों का प्रयोग किया करते थे।  एक बार वे क्लास ले रहे थे।  एक विद्यार्थी जो संभवतः नया - नया उनके क्लास में आया था, पीछे वाली खिड़की के पास बैठा हुआ था।  उस विद्यार्थी का रंग कोयले से कम और जामुन के आसपास  था।  उन्हें पढ़ाते हुए ही ऐसा लगा होगा कि उस लड़के  का ध्यान उनके लेक्चर के तरफ नहीं था।  उन्होंने उसे खड़ा करके पूछा, "विल यु रिपीट व्हाट आई  टोल्ड जस्ट नाउ?" उस लडके का ध्यान उस ओर था ही नहीं, इसलिए वह आँ, ऊँ, करने लगा।  उन्होंने कहा, "ओके, आई  विल एक्सप्लेन अगेन फॉर यु ।"  उन्होंने पुनः उन्हीं शब्दों  का प्रयोग करते हुए विषय को एक बार फिर वर्णित किया।  थोड़ी देर बाद फिर उन्होंने उससे वही सवाल किया, "विल यु रिपीट अ फ्यू वर्ड्स आई हैव टोल्ड जस्ट नाउ ?" वह लड़का पुनः शून्य के तरफ ताकता रहा और कुछ नहीं बोल सका।  वे फिर उस विषय को उन्हीं शब्दों की पुनरावृत्ति करते हुए उसकी सीट के तरफ घूमकर चलते हुए वापस आ गए।  उन्होंने उससे इस बार फिर सवाल किया, "यस यंगमैन, क्या मैंने अभी जो कुछ कहा उसे आप पूरे क्लास को बताएँगे ?"
लड़का जब इस बार भी कुछ भी बताने में असमर्थ हो गया, तब उन्होंने उसे कहा, "आप खड़े हो जाइये। आपका ध्यान किधर था, क्या आप पूरे क्लास को बताएँगे?"
लड़का बिलकुल खामोश, चुप। पाण्डेय जी लडके की ओर इशारा करके हँसते हुए बोले, "इनके मौन का रहस्य मैं आपको बताता हूँ। ये जिस खिड़की के पास बैठे हैं वहाँ से गर्ल्स कॉमन रूम का गेट दिखाई दे रहा है। वहां कुछ लड़कियां खड़ी हैं और कुछ आ जा रही हैं। ये उन्हीं पर नजर टिकाये हैं।"
थोड़े अंतराल के बाद उन्होंने कहा, "क्यों यही बात हैं न। इन्हें नहीं मालूम कि उस तरफ़ से इनके चेहरे पर कोई थूक भी फेंकने में शर्म करेंगी । मगर इन्हें कुछ शर्म नहीं है।" पूरा क्लास जोर से हंस पड़ा। उस दिन के बाद से वह लड़का पाण्डेय जी के क्लास में भूल से भी खिड़की के पास कभी भी बैठा हुआ नहीं दिखाई दिया। 
एक बार कॉलेज में एक समारोह आयोजित किया गया था।  उसमें मुख्य अतिथि के रूप में पटना से प्रकाशित अंगरेजी अखबार "सर्चलाईट" के मुख्य संपादक सरकार बाबू को बुलाया गया था।  समारोह में सरकार बाबू की उपस्थिति में पाण्डेयजी से दो - चार शब्द कहने का अनुरोध प्रधानचार्य जी ने किया था।  पाण्डेयजी ऐसी अंगरेजी बोल रहे थे, ऐसी शब्दावलियों का प्रयोग कर रहे थे कि उनका पूरा सम्बोधन सारे उपस्थित विद्यार्थियों के सर के ऊपर से गुजर रहा था।  अपने अभिभाषण के अंत में उन्होंने विद्यार्थियों से खेद प्रकट करते हुए कहा था कि ये सारी शब्दावलियाँ आपके लिए नहीं बल्कि सम्माननीय संपादक सरकार बाबुको समझाने के लिए प्रयुक्त हुई हैं।  सरकार  बाबू अभिभूत होकर नतमस्तक हो गए।  इसीलिये विद्यार्थी यहां इस कॉलेज में पढाई करने आते थे।
       एक और पाण्डेय जी थे, द्वारिका पाण्डेय। वे गणित पढ़ाया करते थे। वे काफी लम्बे डील - डॉल के भारी भरकम शरीर वाले स्थूलकाय पुरुष थे। उनका गाँव कॉलेज से ज्यादा दूर नहीं था। कभी - कभी तो वे सुबह - सुबह खेतों का निरीक्षण करने निकलते थे। क्लास का समय होने से वहीं से वे सायकिल चलाते हुए सीधे क्लास में प्रवेश कर जाते थे। एक बार तो उनके क्लास में प्रवेश करते ही गणित के सारे विद्यार्थी हँसने लगे। वे थोड़ा क्रोधित होते हुए ब्यँग्यपूर्वक पूछे, "क्या हुआ? आपलोगों को गणित जैसे सूखे, नीरस विषय में हास्यरस कहाँ दिखाई दिया।" एक लड़का थोड़ा धृष्ट था। खड़ा हो कर बोला, "सर, आपके जूतों में काली मिट्टी बहुत अधिक लगी हुई है।"
द्वारिका जी भी अपनी झेंप मिटाने के लिए हँसने लगे, "हो, हो, हो!!!  खेत पर से होते हुए निकला था कि क्लास का समय हो गया। वहां से सीधे यहीं चला आ रहा हूँ। धोने का समय नहीं मिला।"
क्लास के लडके फिर भी हँसे जा रहे थे, "अच्छा ठीक है, गणित जैसे नीरस, बेजान विषय में भी आपको थोड़ा हास्यरस का रसास्वादन करा दिए। अब चलिए पढाई पर ध्यान दीजिये।"
ये, पाण्डे जी अपने पहनावे में भी विचित्र थे।  वैसे गणित पढ़ाने वाले प्रोफेसर अपने पहनावे पर कम ही ध्यान दिया करते थे।  उनमें भी पाण्डे जी  बिलकुल ही अनौपचारिक थे।  शर्ट हमेशा  अपने ढीले - ढाले पैंट के ऊपर ही  रखते थे।  इसका भी एक रहस्य था।  एक दिन यह रहस्य भी प्रकट हो गया।  उस दिन वे हाफ शर्ट पहन कर आये थे। शर्ट थोड़ा टाइट फिट था।  अपनी पीठ विद्यार्थियों के क्लास की तरफ करके वे ब्लैक बोर्ड पर मैथ लिख रहे थे कि शर्ट चुस्त होने की वजह से थोड़ा ऊपर की ओर खिंच गया।  पूरा क्लास हंसी मुंह में दबाये हुए सर नीचे किये हुए हँसे जा रहा था।  हँसने का कारण बाद में विद्यार्थियों के बीच चर्चा का विषय बन गया।  उस दिन पाण्डेय जी अपने पैंट के ऊपर बेल्ट की जगह पगहा (जिससे जानवर को खूंटे से बाँधा  जाता है) की रस्सी लपेटे हुए थे।
गणित के फैकल्टी के हेड थे दिलबहार चौधरी।  वे हमेशा धोती ही पहनते थे।  वे भी प्रिंसिपल बनने के लिए सीनियरिटी के अनुसार लाइन  में थे।  गणित के एक और प्रोफेसर थे, अरुण बाबू।  उन्हें आजतक किसी ने मुस्कराते हुए भी नहीं देखा, हँसने की तो बात ही छोड़ दें।  ये  जिस दिन मुस्करा दिए  उस दिन समझ लीजिये कि सूर्यास्त पूरब के तरफ हुआ है या सूर्योदय पश्चिम के तरफ हुआ है।  या आसपास में  बिन बादल बरसात हुई  है।  या मुर्गे ने सुबह में बांग देना छोड़ दिया है।  या स्वयं अरुण बाबू क्लास में दस मिनट लेट से आये हैं। लेकिन ऐसा दिन कभी नहीं आया।









दो
हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष थे, सीताराम प्रभाष । प्रभाष उनका तखल्लुस या उपनाम था।  वे जब भी किसी वर्ग में  ब्याख्यान देने जाते तो विद्यर्थियों की उपस्थिति  लेने के बाद अपनी कोई ताजी या पुरानी कविता जरूर सुनाते। लोग कहते थे कि प्रभाष जी अच्छे कवि थे।  इतने अच्छे कवि थे कि  उनकी कविता बहुत कम लोगों को समझ में आती थी।  उन्हें कवि सम्मेलनों के आयोजक बुलाना चाहते थे।  कोई - कोई आयोजकों ने उन्हें बुलाया भी।  लेकिन जब वे कविता सुनाने लगते तो श्रोताओं की समझ से ऊपर - ऊपर गुजर जाने के कारण वे हूट कर दिए  जाते। इसके बाद आयोजन में आये अन्य कवियों की कविताएँ सुनने का श्रोताओं का  मूड खराब हो जाता।  इसलिए आयोजक  कवि - सम्मलेन की सफलता सुनिश्चित करने के लिए प्रभाष जी को बुलाने  से  परहेज करने लगे।  अगर किसी आयोजक को प्रभाष जी को बुलाना आयोजन के लिए मजबूरी होती तो उन्हें बोलने का और कविता - पाठ करने का  अवसर अंत में दिया जाता ताकि उनके हूट हो जाने पर अन्य कवियों की प्रस्तुति  प्रभावित न हों।  जाहिर है, अंत में टेंट और लाइट या पेट्रोमैक्स वाले ही उनकी गूढ़ विषयों पर लिखी गई रहस्यवादी  कविताओं का रसास्वादन के लिए बचे रहते थे।
यही हाल उनकी कविताओं के प्रकाशन के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है।  बहुत से प्रकाशकों को उनकी कविताएँ समझ में नहीं आती थी।  इसलिए वे उनकी रचनाओं को खेद सहित वापस कर दिया करते थे।  एक ही जगह से उनकी कविताएँ कभी वापस नहीं हुईं।  वो जगह थी कॉलेज मैगज़ीन।  हर वर्ष कॉलेज मैगज़ीन जिसका नाम "अभियान" था, छपती थी। इसके संपादक तो बाल्मीकि प्रसाद जी थे, लेकिन संपादक मंडल में  प्रभाष जी थे, इसीलिये उनकी कविताएँ छापने की मजबूरी थी।  लेकिन इसी मजबूरी  से बाल्मीकि प्रसाद अपना काम निकालने में अक्सर प्रभाष जी का इस्तेमाल करते थे। बाल्मीकि प्रसाद लेट - फेट भी कॉलेज आते या बिना सूचना के अनुपस्थित रहते तो प्रभाष जी कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करने  से हिचकते। उन्हें मैगज़ीन में अपनी कविताएँ जो छपवानी थी।  वे तो चाहते थे साल में जो अंक कॉलेज मैगज़ीन का निकलता था उसमें सिर्फ उनकी अप्रकाशित कविताओं का विशेषांक ही निकले।  परन्तु कॉलेज की प्रशासनात्मक सभा के पत्रिका निकालने के कुछ दिशा - निर्देश दिए गए थे जिनका पालन आवश्यक था।  इसलिए प्रभाष जी की एक या दो कविताओं को ही उसमें स्थान मिलता था। अब ऐसे कवि को जिसे न कवि - सम्मेलनों के आयोजक कविताएँ सुनाने के लिए बुलाते और न कोई प्रकाशक ही प्रकाशन के लायक समझता,  उसके लिए विद्यर्थियों के ब्याख्यान लेने के समय अपनी कविता सुनाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा था। विद्यार्थियों को हिन्दी विषय के बर्ग की ब्याख्यान माला में उपस्थिति का न्यूनतम प्रतिशत अनिवार्य था।  इसलिए  वे सभी  प्रभाष जी की दुरूह, अबोधगम्य  और सर के ऊपर से निकल जाने वाली कविताओं को सुनने के लिए मजबूर थे।
उसी विभाग में एक और प्रोफेसर रमेशजी तिवारी  थे।  वे बड़े जुगाड़ू किस्म के इंसान थे।  उनकी पहुँच विश्वविद्यालय से लेकर राज्य शिक्षा मंत्रालय तक थी।  वे अपनी लिखी एक निहायत ही साधारण स्तर के हास्य - ब्यंग्य पर आधारित  ब्यक्तिगत निबंध की रचना जिसका शीर्षक था 'मेरी ब्यक्तिगत यात्रा', को कॉलेज के पाठ्यक्रम  के लिए निर्धारित पुस्तक में सम्मिलित करवाने में सफल हो गए थे।  इसतरह उनकी गैर पाठ्यक्रम की  ब्यक्तिगत निबंधों की संग्रह की पुस्तिका भी मशहूर हो गई थी।  वह खासकर नवयुवकों और नवयुवतियों के बीच तथा उनके माता - पिताओं के बीच खूब बिकी।  अपने प्रकाशन के चंद महीनों में ही वह हिन्दी की उस वर्ष की प्रकाशित पुस्तकों में बेस्ट - सेलर हो गई।
इन्हीँ  तिवारी जी  के  एक सुपुत्र थे बिंदु सत्यवर्धन।  यह विचित्र किस्म का नाम तिवारी जी के साहित्यिक रूचि का आभास देता है परन्तु इसके पीछे भी उनका विशेष  प्रयोजन छिपा हुआ था। सबसे पहले कि टाइटल से उसकी जाति का पता नहीं चलता था।  वर्धन लगाने से दक्षिण भारतीय होने का भी अहसास देता था।  बिंदु भी अपने पिताजी की ही तरह तेज बुद्धि, चालाक और जुगाड़ू बालक था।  उनके पिताजी ने बिंदु के लिए उसका भविष्य तय कर दिया था, "मेरा बेटा तो  आई ए एस ही बनेगा।"  बस उसीके बाद बिंदु लग गया था अपना भविष्य संवारने में।  सारे विषयों में विलक्षण प्रतिभासम्पन्न होने के बावजूद भी उसने ग्रेजुएशन के लिए राजनीतिशास्त्र विषय ही चुना।  इसके पीछे मुख्य प्रयोजन  आई ए एस  की परीक्षा के लिए राजनीतिशास्त्र को विषय के रूप में रखकर परीक्षा पास करने की जुगत भिड़ाना था।  लोग कहते थे कि राजनीति शास्त्र  को विषय के रूप में रखकर आई ए एस में सफल होना अपेक्षाकृत  अन्य विषयों के साथ सफल होने से आसान होता है।  राजनीति और राजनीतिशास्त्र दोनों में बिंदु की विशेष रूचि थी।  उसने  तो स्थानीय एम पी  (संसद सदस्य) के चुनाव में एक पार्टी के कैंडिडेट के लिए चुनाव प्रचार भी किया था।
     एक बार तो हद ही हो गई।  रमेशजी को भी इस बात का पता नहीं था। सन १९७१ में, उनदिनों  भारत और पाकिस्तान के बीच दूसरा युद्ध चल रहा था।  भारत बंगला देश में (उन दिनों उसका नाम पूर्वी पाकिस्तान था) मुक्ति सेना के साथ मिलकर युद्ध जीतने के करीब पहुंच चुका था। बंगला देश की मुक्ति सेना के सुप्रीम कमांडर शेख मुजीबुर्रहमान थे। जैसे ही पाकिस्तान की करीब नब्बे हजार फौजों के कमांडर जनरल नियाजी ने भारतीय जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के  सामने आत्मसमर्पण किया, पूरे देश में जीत और जोश की लहर दौड़ गई। नौजवानों  ने इस जीत का जश्न मनाने की तैयारी कर दी।  बिंदु ने भी इस जीत के उपलक्ष्य में अपने यहाँ  सत्यनारायण की पूजा रखवाई।  पूजा जब शुरू हुई तो पूजा स्थल पर  ही उसने जनरल नियाजी की आत्मसमर्पण करते हुए तश्वीर और उसके बगल में मुजीबुर्रहमान की तश्वीर भी रखवा दी।  जो - जो पूजा में शरीक हुए वे पूजा स्थल पर रखी तश्वीरों को देखकर तो समझ गए कि पूजा भारत की पाकिस्तान पर विजय को सेलिब्रेट करने के लिए ही आयोजित की गई है, लेकिन  पूजा स्थल पर रखी  शेख मुजीबुर्रहमान की तश्वीर देखकर लोग आपस में काफी कानाफूसी करने लगे। प्रो रमेशजी भी इसपर नाराज दिखे।  बाद में उस तश्वीर को पूजा स्थल से हटाकर भोजन स्थल जहाँ डिनर पार्टी चल रही थी, वहां स्थानांतरित किया गया।  इससे बिंदु थोड़ा नाराज भी दिखे। लेकिन इस आयोजन में, इस प्रदर्शन से, बिंदु मिडिया में मशहूर अवश्य हो गए।  आगे चलकर उनके नेशनल और इंटरनेशनल विषयों पर कई आर्टिकल  कम स्तरीय  होने पर भी अखबारों  में छपे  और खूब सराहे गए।  विद्यार्थी जीवन में ही उनकी ऐसी सफलता  ने  उनकी बहुमुखी प्रतिभा के झंडे गाड़ दिए।
      बिंदु राजनीति शास्त्र विभाग में उभरते हुए सितारे थे, जिसकी प्रोफेसर भी इज्जत करते थे।  सबों की  यह उम्मीद थी कि अपने आगे की करियर में अवश्य सफलता के ऐसे झंडे गाड़ेगा कि विभाग और कॉलेज दोनों का नाम ऊंचाइयों पर पहुँच जायेगा।  उसी विभाग में कुछ फनी फैकल्टी भी थे।  एक थे मुरली बाबू।  मुरली बाबू लम्बा कुरता  पहनते थे।  वे संभवतः  वस्त्रालय  से  थान में से कुर्ते का कपड़ा थोड़ा अधिक कटवाते होंगे।  दरजी अगर बोलता होगा कि कपड़ा थोड़ा अधिक है, तो वे बोलते होंगे कि ठीक है उसे भी इसी कुर्ते में लगा दो। और इसतरह जो कुरता बनकर तैयार होता था, वह  थोङा  ओवरसाइज़ जरूर होता था लेकिन मुरली बाबू उसे शान से पहकर चलते थे।  लोग उनसे कहते कि मुरली  बाबू अंदर में अंडरवियर, धोती वगैरह कुछ पहने  हैं या नहीं ?  इसपर वे मुस्करा देते और अपने को गौरवान्वित महसूस करते।
कला संकाय में एक और प्रोफेसर थे।  वे संस्कृत और प्राकृत के प्राध्यापक थे, डॉ  नेमिशरण शात्री।  उन दिनों अक्सर कॉलेजों के अध्यापकों को इन्क्रीमेंट या प्रोन्नति के लिए पी एच डी की डिग्री की जरुरत पड़ती थी। इसके लिए सस्ता और सुविधाजनक तरीका और स्थान नेमिशरण शास्त्री जी  की शरण में जाना था।  बस शास्त्री जी के पास जाइये।  अपनी समस्या और रूचि के अनुसार आवश्यक सेवा - शुल्क  जमा कीजिये।  बाकी सब शास्त्री जी पर छोड़ दीजिये। शास्त्र जी तय - सीमा के अंदर आपको  पी एच डी की डिग्री दिलवा देंगे।  अगर आपको बहुत जल्दी डिग्री हासिल करना बहुत जरूरी है तो उसके लिए पासपोर्ट की तत्काल सेवा की तरह विशेष शुल्क की अनौपचारिक अदायगी के साथ औपचारिकताएं पूरी करनी होगी।  तो वे सारी सुविधाओं के साथ  सारी सेवाओं के अनुसार  तय सेवा - शुक्ल की विभिन्न श्रेणियाँ बनाये हुए थे।  आपको अगर पी एच डी की डिग्री चाहिए तो आप कहीं - न - कहीं फिट हो ही जायेंगे।  इसतरह कहें तो डॉ शास्त्री पी एच डी के सिंगल मैन  प्रोडक्शन हाउस थे।  उनके लिए यह सब इतना सहज इसलिए था क्योंकि वही सारी पी एच डी की थीसिस को सबमिशन के बाद शोध के लायक करार देते।  फ़ाइनल सबमिशन  की  वही जाँच करते और पी एच डी की डिग्री भी वही प्रदान करते। इसलिए यहाँ पढाई होती  और विद्यार्थी यहाँ पढने आते। 
अगर विज्ञान संकाय के तरफ बढ़ें तो बहुत सारे प्राध्यापक विचित्र, परिहासमय और हास्यात्मक कर्तृत्वों के लिए विद्यार्थियों के बीच चर्चाओं में विशेष रूप से चर्चित रहते थे। इनमें विशेष रूप से बॉटनी और जूलॉजी जिसे सयुक्त रूप में बायोलॉजी कहा जाता था, के प्रोफेसर लाला आशुतोष शरण थे। इनका क्रिकेट से जन्मजात प्रेम था। पता नहीं ये जन्म के समय भी क्रिकेट कमेंटरी सुनते ही बाहर आ गए थे क्या? इनकी माँ भी इन्हें सुलाने के लिए क्रिकेट कमेन्टरी, जो उससमय ट्रांजिस्टर पर आया करता था, सुनाकर ही सुलाया करती थी। इसलिए ये बचपन में रात में स्कोर गिनते हुए जागते और दिन में कमेन्टरी सुनते हुए सोते। इन्होने भी जैसे ही अपना होश  सम्हाला  अपने नाम के आगे लाला लगाने की जिद पकड़ ली। उन दिनों भारत के क्रिकेट के  कप्तान लाला अमरनाथ का काफी नाम था। बस उन्हीं के नाम की कापी बुक फैशन में इन्होने भी अपने नाम के पहले 'लाला' लगवा लिया।  वे कॉलेज की क्रिकेट की टीम से खेलते।  अपने खेल का सिक्का वे इसतरह स्थापित करते थे कि लोग चाहकर भी कॉलेज की क्रिकेट टीम से इन्हें बाहर नहीं रख पाते थे।   वे कद में औसत से कम ऊंचाई के थे और ओपनर के रूप में खेलने आते थे।  इन्हीं दोनों समानताओं के कारण वे अपने को गावस्कर के समकक्ष समझते थे।  हालाँकि उम्र में वे गावस्कर से बारह साल बड़े थे लेकिन वे अक्सर इस बात की चर्चा किये बिना नहीं रहते कि 'गावस्कर को कवर ड्राइव में महारत हासिल करने के पीछे उन्हीं के द्वारा दिए गए प्रशिक्षण और टिप्स का हाथ था।'  यह प्रशिक्षण और टिप्स उन्होंने गावस्कर को कब और कहाँ दिया इस प्रश्न पर चर्चा को वे टाल जाते। क्रिकेट से इतर वे एक और कारण से विद्यार्थियों  ही  नही कॉलेज के प्रोफेसरों और पूरे स्टाफ के बीच चर्चित थे।  वे अपनी पत्नी की असामयिक मृत्यु की बाद खूब आंसू बहाये थे।  परन्तु एक वर्ष के अंदर ही वे अपनी सगी साली के साथ लिव - इन रिलेशनशिप में चले गए थे। आज से पचास साल पहले ऐसे प्रेम - सम्बन्ध को शरीर के स्तर पर जीने की  इतनी खुलेआम हिमाकत कोई बिरला ही कर सकता था।
बायोलॉजी सेक्शन वाले विद्यार्थी और ब्याख्याता भी अपने को भाग्यशाली समझते थे क्योंकि लड़कियों की संख्या वहां काफी अधिक रहती थी। बायोलॉजी के अलावा साइकोलॉजी ही ऐसा विभाग  था जहाँ लड़कियों की संख्या अच्छी खासी थी। साइकोलॉजी  में तो फैकल्टी भी लेडीज ही थी।  केमिस्ट्री और कला तथा वाणिज्य के कुछ विभागों में भी कतिपय छींटों  के तौर पर कुछ कुछ संख्या लड़कियों की थी। इस दृष्टि से फिजिक्स और गणित विभाग बिलकुल ही ड्राई थे।  कुछ भी हरियाली नहीं। बस वियावान, सुखाड़। क्लास में जबतक लड़कियां नहीं हो तो उस क्लास की रौनक ही क्या? फीका,  लौकी की सब्जी की तरह।  कॉलेज जीवन नीम और करेले जैसे। … या तो बेस्वाद या फिर कड़वे स्वाद। जब भी क्लास ख़त्म होती तो फिजिक्स विभाग के लडके और प्रोफेसर अपने रूम से बाहर अवश्य निकलते ताकि बायोलॉजी की लड़कियों को केमिस्ट्री विभाग की तरफ जाते  हुए ही देख तो सकें।  बायोलॉजी से केमिस्ट्री तरफ जाने में बीच में ही फिजिक्स विभाग पड़ता था जिसे क्रॉस करके जाना पड़ता था।  वही गलियारा ही था जो विभागों के निर्माणकर्ता की भविष्य की कल्पना के रोमांटिक सुझबूझ का  बहुत ही अच्छा नमूना था।  इससे फिजिक्स जैसे सुखाड़ग्रस्त  विभाग - क्षेत्र  में भी कुछ पलों तक रौनक छा जाती थी।  इसी रौनक की चर्चा  छात्र दिन भर करते नहीं अघाते थे।
एक और चर्चा अक्सर विद्यार्थियों के बीच होती रहती थी। किस लेक्चरर ने किस लड़की को किस (kiss) दृष्टि से देखा। अकेले में फ्लाइंग kiss फेंकते हुए फलां बाबू लेक्चरर देखे गए। यह अक्सर नौजवान, खूबसूरत और कुंवारे लेक्चरर के विषय में जारी की गई अफवाहें चटकारे ले - लेकर चर्चे में आती रहती थीं।









तीन
    उन दिनों नए नौजवान लेक्चरर भौतिकी विभाग में अक्सर बहाल किये जाते थे मगर टिकते नहीं थे।  साल छह महीने काम करते - करते कहीं - न - कहीं सिविल सर्विस की परीक्षाओं में कम्पीट  करते और वहाँ की नौकरी छोड़ देते। गोस्वामी एक बहुत ही खूबसूरत, लम्बे, गोरे - चिट्टे  लेक्चरर भौतिकी विभााग में नियुक्त  किये गए थे। उनका ड्रेस सेन्स  भी गजब  का  था। वे हमेशा पैंट, कोट  और टाई लगाकर ही महाविद्यालय आतें। कक्षा  में आते  ही  वे अपने कोट को,  किनारे रखी कुर्सी जिसे  वे  चपरासी से साफ़ करवाते,  में  टांग देते, इसके बाद ही पढ़ाना शुरू करते। पूरी पीरियड में वे अंगरेजी भाषा का  ही प्रयोग  करते। इससे नीचे की कक्षाओं में हिन्दी मीडियम से  पढ़कर आये छात्र /  छात्रों (क्योंकि भौतिकी विभाग में छात्राएं नीचे के वर्गों में ही थी, नगण्य संख्या में)  को  काफी परेशानी होती।
जिसे अब तक दोलन पढ़ते आये थे यहाँ आकर pendulum कहना था। दोलन में जो भाव था, वह pendulum में कहाँ मिल सकता था। जिसे रिसाव लिखते आये थे अब leakage कहना था। क्षरण को erosion कहना था। जो अब तक अवशिष्ट था, यहाँ precipitate कहना था। मैथ्स में भी बिंदु point में, सीधी रेखाएं straight line में और तिर्यक रेखाएं diagonal line में बदल गई थीं। परवलय parabola, अपरवलय hyperbola हो गया था। कुछ नई शब्दावलियाँ भी जुड़ गई थीं। Co ordinate maths, quadratic equations, Bianomial equations आदि, आदि...
यानी हिंदी माध्यम से मेट्रिक पास छात्रों को अंग्रेजी के टर्म्स सीखने में खासी मेहनत करनी पड़ रही थी। उन दिनों अंगरेजी माध्यम से पढ़कर आये छात्र बहुत कम होते थे। अगर वे होते भी थे तो माइनॉरिटी में होने के कारण किसी कोने में पड़े रहते थे।
बीच में अगर अंग्रेजी में कोई टिपोरी छाँटने लगता था तो सारे छात्र उसे घेरकर बोलना शुरू कर देते, "देख, ज्यादा बन मत, साले, देसी मुर्गी बिलायती बोल।"
इसके बाद तो उसकी अंगरेजी बोलती बंद ही हो जाती। उसकी अगली कई पीढ़ियां भी अंगरेजी बोलना भूल जाती अगर थोड़े दिन इस कॉलेज में पढ़ लेतीं। यहाँ तो लेक्चरर भी कभी - कभी क्लास में अंगरेजी बोलते - बोलते सीधे भोजपुरी बोलने लगते।..और अगर अंगरेजी बोलते भी तो हर अंगरेजी के वाक्य के बाद "ठीक बा नु", "बुझाता", "सम्झा तार न" आदि तकिया कलाम लगाना  नहीं भूलते थे।
     भौतिकी की ऑनर्स क्लास की लेबोरेटरी ऊपर में थी, यानि दूसरे मालेपर। ऑनर्स और पोस्ट ग्रेजुएट  में दो - तीन थ्योरी क्लासेज  के बाद सप्ताह के चार या पांच दिन  बाकी समय लेबोरेटरी यानि प्रयोगशाला में ही बीतता  था। इसमें प्रोफेसर भी लगे होते और विद्यार्थी भी लगे रहते थे।  प्रोफेसर लोगों को लेट  तक भी कभी- कभी विद्यार्थियों के साथ रुकना पड़ता था।  जाड़े की गुनगुनी धूप दोपहर बाद सीधे दूसरे माले पर की प्रयोगशाला के वराण्डे में आती थी।  जाड़े की धूप लेने की बड़ी ही उपयुक्त  और माकूल जगह थी। वहां कभी - कभी दूसरे विभागों के लेक्चरर  भी आकर धूप  का  आनंद लिया करते थे। गोस्वामी, सोमनाथ और उनके ही साथ अन्य विभागों में नियुक्त किये गए नए लेक्चरर दोपहर बाद करीब चार बजे की आसपास भौतिकी विभाग के दूसरे माले के वराण्डे की जाड़े की  धूप का आनंद लेते हुए नजर आते थे।
उसी गुनगुनी धूप में नए ज्वाइन किये  हुए  नौजवान  लेक्चरर अपने कॉलेज के दिनों के चटपटे, चुलबुले  संस्मरणों  और अनुभवों  को एक दूसरे से शेयर करके हास्यरसमय  वातावरण  को थोड़ी देर जी लिया करते।  अन्यथा भौतिकी विभाग वैसे भी नीरस विभाग था जिसके विभागाध्यक्ष अग्निहोत्री  अपने कड़क मिजाज, शुष्क अनुशासन और सख्त स्वभाव के लिए इस कॉलेज  में ही नहीं पूरे विश्वविद्यालय  में मशहूर  थे। वे भौतिकी की कक्षा में सबसे नए आये छात्रों का पीरियड जरूर लेते।  बाकी सारे क्लास ऑनर्स में लेते थे।  प्रैक्टिकल्स  में वे अवश्य शरीक होते।  खुद लड़कों, लड़कियां तो भौतिकी ऑनर्स में थी ही नहीं (अफ़सोस) के साथ प्रयोग  के उपकरणों  को  चेक करते और रिजल्ट निकलने के सही तरीके भी बताते।  उनकी अभिरुचि आत्मलीनता की स्थिति तक पहुँच जाया करती थी।
एक बार वे लोकल टाउन के ही किसी कॉलेज में एक्सटर्नल बनकर गए थे। वहां एक एक्सपेरिमेंट का उपकरण नही था। उस सामान को इस कॉलेज से मँगाकर उस एक्सपेरिमेंट को करने के लिए विद्याथियों की प्रैक्टिकल परीक्षा में सेट कर ही दिए। अब सोचिये जिस कॉलेज में वह उपकरण ही नहीं हो वहां का विद्यार्थी कैसे उस प्रयोग को कर सकेगा?  लेकिन उन्होंने परीक्षा में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को साफ़ - साफ़ बता  दिया  कि   विद्यार्थी  भले  ही  प्रयोग पूरा नहीं कर सकें, रिज़ल्ट भले ही नहीं निकाल सकें, लेकिन प्रयोग को कैसे किया जाता है अगर बता देंगे तो उन्हें फुल मार्क्स मिलेगा।  इससे वे  ये भी जानना चाहते  थे कि कॉलेज में इस प्रयोग के बारे में इस चैप्टर  के पढ़ाने  के समय परिचर्चा  हुई है या नहीं। यह उनकी शिक्षा और शिक्षण के प्रति प्रतिबद्धता ही थी जिसके लिए वे पूर्णतया समर्पित  थे। इसलिए यहाँ पढाई होती  और विद्यार्थी यहाँ पढने आते।
उनके इसी अनुशासन और जीवन - पद्धति के कारण कॉलेज में भौतिक विभाग का विशेष स्थान था।  उनकी  सख्ती से भौतिकी विभाग के सारे ब्याख्याता तो मार्ग दर्शन ग्रहण करते ही थे।  सभी लोगों   को  अपने विभागाध्यक्ष  पर  गर्व था।  सिर्फ जूनियर स्टाफ खासकर लैब असिस्टेंट और चपरासी लोगों को इतना बंधन बड़ा नागवार लगता   था।  उन्हीं लोगों के बीच में बहुत - सी कहानियां प्रसारित की जाती थी या उड़ाई जाती थी।  इसमें  कुछ  विद्यार्थी  ख़ास रूचि लेते थे और चपरासियों को उस्का - उस्काकर पूछते  थे,  "हां, तो धरीक्षण भाई दुबे जी का स्कूटर कहाँ लगा हुआ देखे?"  भुनेशर को यही सब चीज गपियाने में ज्याद मन लगता था और चटपटा मनोरंजन मुफ्त में हो जाता था। भुनेशर जो ऑनर्स का छात्र था चपराशियों के रूम में दोपहर में खाने के समय पूछ रहा था, "पहले दरवाजा बंद कीजिये, टाइगर आ गया तँ हमारा तो पैंटवे उतरवा लेगा।" अग्निहोत्री को सभी ने उनके अनुशासनात्मक कड़ाई को ‘आतंक’ का नाम और उन्हें ‘टाइगर’ का उपनाम दे दिया था।
"अरे चिंता कौनो बात के नइखे, टाइगर एजुकेशन ट्रिप में बनारस गइल बाड़े।" इतने में भुनेशर के दो – तीन दोस्त और आ गए।
"अच्छा, ओही से कहीं कि आज दुबे जी के स्कूटर टाइगर के रेजिडेंस के आगे काहे लागल बा?"
धरीक्षण ने विषय को और भी चटपटा बनाने के लिए उसमें थोड़ा और भी मसाला डाला।
 "सचमुच, झूठ ना नु बोलs तारs?"  भुनेशर ने बात को और भी क्लियर करने के लिए पूछा था।
"अरे, कोनो आझे के बात बा? ई  कॉलेज  में  सब  केहु  जानेला। तू लोग नया - नया बाड़s न, एहीसे तू लोग के पूरा बात नइखे मालूम।"  धरीक्षण  ने बात में रहस्य का डोज़ देते हुए कहा था। किशोर - मन  और युवा तन में उत्सुकता बढ़ती  जा रही  थी।
"अच्छा ई बतावs कि टाइगर के बीबी कइसन बाड़ी?"
"खूब भरा - पूरा गदराईल बदन वाली एकदम गोर दप - दप, अँधरिया में इंजोर लेखा मस्त पर्सनालिटी बा। तुहु लोग देखब तs देखते रह जइबा।"
"और अँधरिया के बा?"
"वही तहर टाइगर। देखत नइख, कइसन भयंकर चेहरा बा?"
"थोड़ा डार्क कलर हैं लेकिन चेहरा तो ठीक ही है।" भुनेशर के एक दोस्त ने कहा था।
"उनकर बाल - बच्चा?"
"देखत नइख टाइगर के सर में एको बाल बाँचल बा? अब का होई बाल - बच्चा?"
"अरे नहीं भाई, देखते नहीं कॉलेज में कितना समर्पण के साथ सारे कार्यों में ब्यस्त रहते हैं। इसीलिये घर पर थोड़ा कम समय दे पाते होंगे। आगे सब ठीक हो जाएगा।" उनमें से एक समझदार जैसी समझ रखने वाला भुनेशर का दोस्त बोला था।
"अच्छा, तू आपन विश्लेषणात्मक विवरण अपने पास रखs। तहरा से कोउ पूछता?"
अब धरीक्षण के बोलने की बारी थी, "अरे ई बुढऊ जेकरा के तू लोग टाइगर कहेलs, कॉलेज में पढ़ाते रह जैंहे और माल केहु और चाभले जाइ।"
एक हलका - सा ठहाका गूंजा था।
 "जा, जा तू लोग पढ़ाई करs। ई सब पर  ध्यान नइखे  देवेके। और ई  सब बात बाहर  जाके  केहु  से मत  कहिअ कि  धरीक्षण ऐसे  बोल  रहा था। "  धरीक्षण ने जबरदस्ती उन लोगों को वहाँ  से भगाया था।

दुबे जी हॉस्टल नंबर 3 के वार्डन थे।  दुबे जी अकेले ही हॉस्टल में रहते थे।  उनकी पत्नी गाँव में रहती थी। उनका एक भतीजा भी उनके साथ उसी हॉस्टल में रहता था।  हॉस्टल से कॉलेज आने के रास्ते में ही अग्निहोत्री जी का रेजिडेंस पड़ता था।  दुबे जी का स्कूटर  पहले वहां पर रुकता था तो लोग समझते थे कि साहब के साथ  कंसल्टेशन के लिए रुक गए हैं।  कभी - कभी दुबे  जी  के  पीछे बैठकर अग्निहोत्री साहब कॉलेज भी आते थे। लेकिन यही बात, जब बात पर और बात बनकर आगे बढ़ती गयी तो दुनिया के जैसे  अन्य जगह पर लोग  होते हैं कि उनको अपने काम से फुर्सत - ही - फुर्सत होती है और दूसरों पर  नजर रखने की बड़ी बुरी आदत होती है, वैसे ही लोग यहाँ पर भी थे। बस तभी से  दुबे जी और उनका वेस्पा स्कूटर आ गया उनकी नज़रों के स्कैन के रेंज में।
"अरे, आज दुबे जीवा तो साहब के एब्सेंस में भी उनके घर पर कंसल्टेशन कर रहा था … हम भी उनके घर के पास वेस्पा ऐश कलर का स्कूटर लगा देखे थे” ... जितने लोग उतनी बातें। …तरह - तरह के लोग तरह - तरह की बातें ... लोगों   को तो बस मसाला चाहिए। सच और अफवाह में उतना ही अंतर होता है जितनी बार उनकी पुनरावृत्ति होती है। अगर अफवाह की पुनरावृत्ति की संख्या बढ़ती जाय तो सच धुंधला पड़ने लगता है।

*****

…तो फिर वहीं भौतिकी विभाग के दूसरे माले पर दोपहर बाद जाड़े की गुनगुनी धूप, हल्की - सी ठंढक, अलसाया सूरज, मादकता भरी साँझ को आलिंगनबद्ध करने के लिए अस्ताचल की और दौड़ लगाता सूरज और वहां  नौजवान लेक्चररों  के  बीच  हँसने - हँसाने का चलता दौर। … उस दिन सूरज  के क्रोमोस्फेयर और स्पेक्ट्रम स्टडी के लिए पावरफुल टेलिस्कोप को अरसे बाद बाहर निकालकर बरामदे में सेट किया गया  था।  इसमें गोस्वामी काफी रूचि  ले  रहे  थे। अचानक सूर्य के तरफ से टेलिस्कोप  का एंगल  थोड़ा बदला  और  पता नहीं कैसे सामने के तरफ चला गया।
"अरे, ये क्या फोकस हो गया?" गोस्वामी चिल्ला उठे, "जल - परी या चन्द्र - परी तो सुना था, ये सूर्य - परी सूर्य के उत्तप्त और उष्ण वातावरण में कैसे प्रकट हो गई?"
"गोस्वामी जी आपको हिंदी का श्रृंगार - रस ‘सन’ के स्पेक्ट्रम, में कहाँ दिखाई दे गया। जरा हम भी देखें।" गोस्वामी को हटाते हुए सोमनाथ सिंह बोले।
सोमनाथ देखे जा रहे थे, चुपचाप, कुछ बोल भी नहीं रहे थे। 
"क्या हुआ? चुप क्यों हो?" गोस्वामी की उत्सुकता चरम पर पहुँच रही थी।
"अरे रुको भी, जरा सा रुको।"
सामने गर्ल्स कॉमन रूम था।  वहां का एक - एक परिदृश्य, कण  - कण उभरते विस्तार  के साथ उजागर होता  हुआ समीप  आ  गया।  कॉमन रूम की दीवारों से सरकती सूर्य की  किरणें वहां के मैदान पर बिखरती जाती थी।  वहां लड़कियां कोई दुपट्टे  में कोई  दुपट्टे से बाहर एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले, एक - दूसरे पर लेटी - अधलेटी  खिलखिलाती दीख रही थी।  आवाज तो कुछ सुनाई नहीं  दे रही थी।  वहां के मैदान में ही कहीं दो - चार के समूह  में  बैडमिंटन खेल रही थीं, तो  कहीं दस - बारह के  समूह  में  वॉलीबाल।  बॉल या बैडमिंटन के कॉर्क  के उछालों के साथ उनके वक्ष - प्रदेश की उछाल लेती गेंदें, शोख अदाएं, सबकुछ इतना विस्तृत रूप में अचानक  पास  आ जाएगा यह  तो कल्पना  से परे था। ऐसा लग रहा  था जैसे दिन में ही तारे, नहीं, नहीं, तारिकाएं,  अप्सराओं की वेशभूषा  और  अदाओं के  साथ  जमीन पर उतरी हों। इसके बाद  तो  सारे बैठे नौजवान लेक्चररों की टेलिस्कोप के तरफ बारी - बारी से  देखने की होड़ -  सी लग गई।
"वाह! आप अकेले - अकेले ही नजारा लिया करते थे, मिस्टर गोस्वामी? दिस इज़ नॉट फेयर।" प्रो राजाराम ने शरारत - भरे लहजे में कहा था।
"राजाराम बाबू, आपको तो इस सबमें रूची नहीं थी। भाभी जी जानेंगी तो क्या सोंचेंगी? दिस इस आल्सो नॉट फेयर सर।" गोस्वामी जी ने कहा था। एकमात्र राजाराम बाबू ही वहां पर शादी - शुदा थे।
उनमें से कइयों ने विशेष जगहों में, विशेष स्थानों पर फोकस करने के लिए टेलिस्कोप के एंगल को चेंज करना शुरू कर दिया।
सोमनाथ जी ने भी एंगल घुमाना शुरू ही किया था । ऐसा करते हुए वे बोले भी जा रहे थे, "मैं जहाँ पर फोकस करना चाह रहा हूँ, वहां तो हो ही नहीं रहा है।"
"कहाँ फोकस करना चाह रहे हैं, सर?"
"अबे, तू अपनी आवाज बदल कर क्यों बोल रहा है? तुम्हारी यही अदाएं तुम्हें बिलकुल अलग खड़ा कर देती हैं, अन्य लोगो से।"
पीछे उनके कंधे पर एक थपकी - सी पडी, "लाइए मैं ही फोकस कर देता हूँ।"
"अच्छा, तू ही कर।" कहकर जैसे ही उन्होंने गर्दन घुमाई, तो जो कुछ उन्होंने देखा उससे तो उनके होश ही उड़ गये। काटो तो खून नहीं। पीछे ड़ॉ अग्निहोत्री, दी टाइगर, विभागाध्यक्ष खड़े थे।
"अच्छा, तो इसीलिये आपलोग देर शाम तक इधर रुक रहे हैं। मैं समझ रहा था कि आपलोगों का कोई रिसर्च चल रहा   है और निकट भविष्य में किसी अन्तर्राष्ट्रीय मैगज़ीन में आपलोगों का कोई शोध - पत्र छपा हुआ देखने को मिलेगा। आइये जरा मेरे चैम्बर में आइये।"
चैम्बर में सारे लेक्चरर के आने के बाद दरवाजा बंद कर दिया गया। "क्या राजाराम बाबू आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। ये सभी तो नौजवान हैं। नई उमंगें हैं। जवानी में कुछ - कुछ गलतियां हो जाया करती हैं। आप तो शादी - शुदा हैं, बाल - बच्चे वाले हैं। आपको यह सब शोभा देता है?"
राजाराम बाबू सोच रहे थे, "किस मुहूर्त में वहां पर गए थे? जो कुछ कहना था वो बॉस को ही कहना था। वे तो आज रिसीविंग एंड में खड़े थे।
"और आपलोग, मेरी  टीम के  नौजवान सदस्य। आपलोगों के ऐसे आचरण पर मुझे शर्म आ रही है।  पता नहीं आपलोगों को आ रही है या नहीं।  आपलोग  फिल्म एक्टिंग और प्रोडक्शन के प्रोफेसन  में  नहीं हैं।  आपलोग  शिक्षण के ब्यवसाय से जुड़े हैं।  आपलोगों को वह बनके  दिखाना होगा जो आप दूसरे को बनते हुए  देखना चाहते हैं।  आदतों से आचरण बनता है, आचरण से चरित्र बनता है और चरित्र से ब्यक्तित्व बनता है।  आप दूसरों के ब्यक्तित्व को संवारने के कार्य में लगे हैं और अपनी  आदतों को नहीं सुधारेंगे तो दूसरे  को सुधारने  में क्या भूमिका निभाएंगे। आप चाहें तो ये सारी बातें भोजपुरी, अंगरेजी, तमिल सारी भाषाओं में समझाऊं, अगर नहीं समझ आया हो तो।"
सारे लेक्चरर चुपचाप सुन रहे थे। इसके अलावा कोई उपाय भी नहीं था।
"जाइये, आगे से इसका ख्याल रहे। और जो सारी बातें यहाँ हुई हैं वे यहाँ से बाहर नहीं जाएँ, इसका भी ख्याल रहे।"

सारे नौजवान ब्याख्याता सर झुकाये निकले थे। सोमनाथ सिंह मन - ही - मन बुदबुदा रहे थे, "बड़े आये हमलोगों को ज्ञान देने वाले। । दुबेजीवा के सामने ये चरित्र - ज्ञान का गान कहाँ चला जाता है? हमेशा इनके शहर से बाहर जाते ही इनके घर पर कंसल्टेशन करने पहुँच जाता है।"
गोस्वामी अपने कमीज के कालर को ठीक करते हुए और बाँहों को झाड़ते हुए, जैसे कुछ हुआ ही नहीं बोले, "प्रोफ. सोमनाथ, आप कुछ बोल रहे थे क्या?"
"नहीं नहीं, हम क्या बोलेंगे? सारा चरित्र - निर्माण का जिम्मा यही उठाये हुए हैं। इसीलिये तो दुबइया चरित्र - निर्माण में लगा.... खैर छोड़िये, चलिए, ये सब तो होता ही रहता है...।"
इस लम्बी क्लास के बाद फिर कभी भौतिक विभाग के दूसरे माले के बरामदे में टेलिस्कोप नजर नहीं आया।





चार
रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. रामपाल बहादुर थे। वे सबों से कहा करते थे कि वे अंग्रेजों  के जमाने के भूतपूर्व  दनियाँव  महाराज के अभूतपूर्व वंशजों में से एक हैं। उस कॉलेज की यही खासियत थी,  जिसके टाइटल में सिंह लगा होता था वह अपने को  दनियाँव महाराज का वंशज घोषित कर देता   था।  पता  नहीं दनियाँव महाराज  का खानदान कितना बड़ा था और उससे कितने  लोग जुड़े थे? लेकिन लोग तो कहते हैं कि दनियाँव महाराज की कोई वारिस ही नहीं थी इसलिए बहुत सारी प्रॉपर्टी डलहौजी के "डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स" के तहत अंग्रेजों के कब्जे में चली गई थी। यह तो वही बात हुई जैसे लखनऊ का रिक्शा वाला भी अपने को अवध के नवाब के खानदान का ही वारिस मानता है।
अगर आप उसके रिक्शे पर बैठे है तो वह रिक्शा चलाते  हुए ही बोलेगा, “अभी केस चल रहा है, प्रॉपर्टी का डिस्ट्रीब्यूशन वाला केस जैसे ही फाइनल होता है कि वह रिक्शा चलाना छोड़ देगा।“ रसायन  विभाग  में  हालाँकि सत्पति सहाय, नियोगी, यु एस पाण्डेय आदि अन्य प्रोफेसर भी थे, लेकिन सभी रामपाल बहादुर जी की छत्रछाया का गुणगान  किया करते  थे।  तभी तो यु एस पाण्डेय जी की प्राइवेट ट्यूशन जबरदस्त चल रही थी।  हर वर्ष उनके रेजिडेंस की बिल्डिंग में एक तल्ला और बढ़  जाता  था।  मगर वे क्लास में भी उतनी  ही मेहनत और तन्मयता के साथ  पढ़ाते थे जितना कि ट्यूशन में।  वे बोलते थे कि आपलोगों  को मेरे यहां ट्यूशन आने की जरुरत नहीं है।  वह तो दूसरे कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए है।  आप लोग क्लास में ही जो चाहे मुझसे पूछ सकते हैं, जितनी बार  चाहे पूछ सकते हैं।  फिजिकल केमिस्ट्री तो  वे घुट्टी की तरह पिला देते थे।  इसीलिये इस कॉलेज में पढाई होती और लोग पढने आते।
इसी तरह और भी ब्याख्याता थे। जैसे के डी तिवारी।  वे हिन्दी के ब्याख्याता थे मगर मिलिट्री साइंस जो उन दिनों पार्ट वन तक छात्रों  के लिए  अनिवार्य था,  की पढाई की  भी जिम्मेवारी उठाये  हुए  थे। मिलिट्री साइंस में थ्योरी क्लासेज के अलावा प्रैक्टिकल क्लासेज हुआ करता था।  प्रैक्टिकल में ड्रील करना अनिवार्य था।  वे ड्रील के समय किसी भी छात्र  में तत्परता  या चपलता की कमी देखते तो उसका भेजा ही रेन्यू करने की सलाह देने लगते।
वैसे और भी ब्याख्याता थे जिनकी कई कहानियां मशहूर थी।  लेकिन यहाँ पर मैं डॉ. भरत मिश्र, जो राजनीति शास्त्र पढ़ाते थे, उनका नाम ख़ास तौर पर लेना चाहूंगा।  वे आँखों से ज्योतिविहीन थे लेकिन उनकी मन की आँख बहुत ही तेज  थी।  मजाल है कि  कोई उनके क्लास में प्रॉक्सी में अटेंडेंस किसी और से बनवा ले।  सबों की आवाज पहचानते थे, वे सबों को नाम से पुकारते थे। वैसे आदमी से किसी बिहारी महिला  ने शादी नहीं की।  एक बंगाली महिला के साथ उन्होंने अपने  दांपत्य जीवन में  भी खुशियों की बेल को जीवन के मुंडेर पर लहलहा रखा था।
वैसे और  भी ब्याख्याता  थे जिनकी कहानियां कहने  लगूँ  तो  जिस  विषय  के  बारे  में  बतलाने के लिए,  जिसतरफ  कहानी  को मोड़कर ले  जाना चाहता  हूँ,  उधर  नहीं जाकर यह सिर्फ ब्याख्याताओं के रहन - सहन और जीवन  का  चरित्र - चित्रण भर रह जाएगा।  विद्यार्थियों  के बारे  में जो - जो और जितना - जितना लिखना चाह रहा हूँ वह लिख  नहीं सकूंगा। और अगर लिख नहीं सका तो कहानी अधूरी रह जाएगी। 
*****
  बाकी समय  में  तो  पढने वाले विद्यार्थी पढने में, खेलनेवाले खिलार्थी विद्यार्थी, क्रिकेट की या हॉकी की या फिर एथेलेटिक्स  की  दौड़, छलांग वाली  टीम  में लगे रहते  थे.... लेकिन दो समयों  में  काफी  गहमागहमी होती थी। एक: होली उत्सव के एक सप्ताह पहले और दूसरे यूनियन के चुनाव के समय।
होली  के पहले  की  गहमागहमी और हलचल  ख़ास थी।  छात्राओं का एक सप्ताह पहले  से ही कॉलेज  आना बंद  हो जाता था।  कॉलेज के  मुख्य द्वार के बाद खेल  का  बड़ा  मैदान  और  उसमें छोटा स्टैडियमनुमा दर्शक दीर्घा  भी बनी हुयी थी। उसके  बाद ऑफिस बिल्डिंग और उसी से लगा प्रिंसिपल   का चैम्बर था।  उससे आगे बढ़ने  पर  विभिन्न संकायों की कक्षाओं के ब्लॉक्स थे। उसी के बीच में एक बड़ा  - सा गोल परिधि लिए हुए पानी की टंकी बनी हुई थी जिसमें चारों तरफ नल लगे थे। इसमें गर्मियों  में  ठंढे पानी की  भी  ब्यवस्था रहती थी। इसे वहाँ  की  भाषा में 'जलदा सर्किल'  कहा जाता था। होली के  ठीक  पहले  जलदा सर्किल के नलों के लेवेल  के ठीक ऊपर के खाली स्थान पर चारो तरफ से प्रश्न - पत्र छापकर चिपकाए हुए दिखाई दे जाते  थे।  जरा प्रश्न - पत्रों पर एक नजर डालें .....
सभी प्रश्न अनिवार्य हैं। सभी प्रश्नों को एक अलग  सफ़ेद कागज के शीट पर उतार लें।  उसी पर  उत्तर लिखकर  अपना कोड नंबर फलां दिन (जो होली का दिन होता था) को ऑफिस से एक चुटकी गुलाल के  साथ  लें और उनके उत्तर लिखकर प्राचार्य  के चैम्बर  के सामने के  शिकायत  बॉक्स  में  डाल दें। विशिष्टता के साथ उत्तीर्ण (pass with distinction) छात्रों को सम्मानित किया जाएगा :
(उत्तर में ब्याख्याताओं के नाम या टाइटल का पहला अक्षर लिखने पर भी पूर्ण अंक मिलेंगें)
प्रश्न संख्या 1:  सबसे उत्तम गाल बजैया?  ..........
प्रश्न संख्या 2: सबसे तगड़ा नजर लड़वैया? ………
प्रश्न संख्या 3: सबसे निपुण आँख गड़ैया? ………
प्रश्न संख्या 4: सबसे मजेदार दारु पीबैया? ..........
प्रश्न संख्या 5: सबसे अब्बल दिल फेंकवैया? ..........
प्रश्न संख्या 6: सबसे बहके - बहके कदम चलैया? ………
प्रश्न संख्या 7: सबसे बढ़के फ़्लाइंग किश फेंकवैया? ..........
प्रश्न संख्या 8: सबके बहनजी टाइप रिश्ते में भैया? ..........
प्रश्न संख्या 9: सबसे बड़ा हडकवैया? …………
प्रश्न संख्या 10: सबसे रोमांटिक गवैया? ..........
प्रश्न संख्या 11: सबसे फेंकू कविता ठुंसवैया? ..........
प्रश्न संख्या 12: सबसे बड़ा फेंकू कहानी कहवैया? ..........
प्रश्न संख्या 13: सबसे बड़ा छुपा - छुपी खेलवैया? ………।
कृपया अपना कीमती समय निकाल कर सभी प्रश्नों के उत्तर निस्संकोच, बेख़ौफ़ होकर दें और विशिष्टता का इनाम पाएँ:---
जलदा सर्किल के पास छात्र जमा होते, ये प्रश्न - पत्र पढ़ते और उसके संभावित उत्तर की चर्चा कर खूब हँसते। इन प्रश्नों  को चयनित  करने और छापने में किसकी मुख्य भूमिका रही होगी यह भी सब गेस करने में लगे रहते। कोई कहता, "अबे, ई सब प्रश्न के तो उत्तर कोनो शर्मा गेस पेपर में भी  ना मिली।"  तो कोई दूसरा कहता, "सब दिमाग के खेल बा। एकरो में कोनो कम दिमाग लागल  बा।"
  सबको मालूम था कि इसमे 'बेनीमाईया', हाँ, बेनी माधव ईसुरी को लोग इसी नाम से बुलाते थे, का जरूर हाथ है।  उसके बिना किसी और का काम हो ही नहीं सकता था।  उसे इन सब कामों  में बहुत  मन  लगता था और लोगों की हंसी देखकर उसका आनंद दुगना हो जाता था।  उसका हंसी का सृजन करने का यह तरीका कितना नैतिक था, कितने लोगों को अच्छा लगता था, कितने लोगों को बुरा, ये सब चर्चा और बहस का विषय जरूर बन जाता था, लेकिन होली के वातावरण में थोड़ी - सी भाँग घोलने का काम यह जरूर करता था। … और इसी में इस प्रयास की सार्थकता निहित थी। 

















पांच
बेनीमाई, खगेन्द्र मोहन सेन की बंगाल में फ़ैली बड़ी जमींदारी का एकमात्र वारिश था। वह सेन बाबू की बहन  का लड़का  था। सेन बाबू को अपनी कोई  संतान नहीं  थी। उनकी पत्नी के स्वर्गवास हुए  बीस वर्ष बीत चुके थे। सेन बाबू की उम्र भी 80 के करीब पहुँच रही थी। बस पके फल की तरह  पेड़  पर  लगे  थे, कभी भी टपक सकते  थे। इसलिए सेन बाबू ने भी अपना सारा लाड़ - प्यार  बेनीमाई  पर ही उड़ेल दिया था। इससे बेनीमाई बिगड़ गया था, या कितना बिगड़ गया था, पता नहीं, लेकिन उसके तीव्र दिमाग ने कोई और दिशा पकड़ ली थी।
उसकी  सोच में शोखी, करतूतों में शरारत और बचपन की चंचलता अभी - भी थी।  वह चंचल था, लेकिन उद्दंड नहीं था। वह  बेफ़िक्र था,  लेकिन उच्छृंखल नहीं था। और उसके यही गुण सेन बाबू की बूढ़ी आँखों में जीजिविषा के अमृत - कण टपका देते  थे। सेन बाबू कोर्ट में अपनी जमीन - जायदाद    पर चल रहे केस के बारे में अपने वकील से चर्चा और विचार - विमर्श करने जाते तो वकीलों से बेनीमाई की चर्चा जरूर करते। वे अक्सर कहते, उसे भी मैं बड़ा वकील बनाऊंगा।  इतने बड़े एस्टेट की रक्षा के लिए कुछ दांव - पेंच तो सीखना ही पड़ेगा, वरना कुछ नहीं बचेगा। लेकिन बेनी था कि अलमस्त और बेपरवाह जीवन जीने को ही अपना लक्ष्य बना चुका था। बस जीना है तो मस्ती में, खुलेपन के साथ, बिंदास।
उस दिन भी अन्य दिनों की तरह हम सभी दोस्त नदी के किनारे वाले टीले पर मिले थे। मैंने बेनी से पूछा था, "इतना बिंदासपन, जीवन को मस्ती से जीने को ही एकमात्र लक्ष्य समझने का दर्शन तुझे किसने सिखलाया? तुम्हें नारी - देह का भी बहहुत ही अंदरुनी ज्ञान मालूम है। कहाँ से हासिल किया तूने यह सब?"
“यह सब अंदर की बात है। मैंने आज तक किसी के सामने यह रहस्य नहीं खोला है। चलो, अंदरुनी ज्ञान का उदघाटन आज तुमलोगों के सामने करता हूँ। मेरे नाना सेन बाबू से मत कहना।"
थोड़े विश्राम के बाद लम्बी सांस लेकर उसने अपना कहना जारी  रखा, "मैं जब भी नारी देह का  दर्शन करता हूँ, तो मेरा ध्यान उसके ऊपरी सौंदर्य में अटक कर स्पर्श - सुख आदि में नहीं उलझ जाता।  मेरा ध्यान  तो उस देह के ऊपरी आवरण को उघारते हुए उसके अंदर, बिल्कुल अंदर उतर  जाता है और मन शारीरिक संपर्क की कल्पना में डूब जाता है, ऊपरी सतह पर ठहर कर रुकना ही नहीं  चाहता। अभी भी नारी देह को मैं सिर्फ श्रृंगार की अनुभूति नहीं मानता हूँ, शारीरिक उपभोग ही उसकी अंतिम परिणति है, यही मेरे दर्शन का अघोषित सत्य है।"
"अबे साले, ज्यादा फिलोसोफी मत झाड़, असली चटपटी चीज जल्दी सुना।"
"इतने अधीर मत हो वत्स, जब बेनी बाबा से ज्ञान लेने आये हो तो तुम्हें निराश नहीं होना पड़ेगा। बाबा ने कहाँ से पायी यह दर्शन - दृष्टि, सुनो बाबा की कहानी बाबा की ज़ुबानी। मैं मैट्रिक की परीक्षा देने के  बाद एक बार माँ के साथ मासी के ग़ाँव महिषापुर गया  था। वह ग़ाँव  और क़स्बा का मिलाजुला रूप था। शहर नहीं होते हुए भी शहर में बसा लगता था। सुन्दर - सुन्दर लड़कियां दो - दो छोटी आगे लटकाये घूमती  नजर आती  थी।  मेरा मन उनकी चोटियों से चोटिल होता रहता  था।  मैं अपनी बहनों के साथ लुका - छिपी,  आइस - पाइस, पीटो, लूडो आदि खेल खेलकर टाइम पास करता रहता था।  पड़ोस में एक भाभी रहती थी।  खूब हंसमुख, सुन्दर मुखड़ा,  ललाट पर बड़ी बिंदी, उभरी हुई छातियाँ, पतली कमर लेकिन भारी नितम्ब, और उसके अंदर की कल्पना मैं उससमय नहीं कर पाया था।  कभी - कभी मेरे वयस्कोन्मुख  कल्पना - लोक में  किसी रात को कोई बिल्ली मेरे सीने पर चढ़ जाती, वह बिल्ली धीरे - धीरे अपना स्वरुप बदलने लगती, बदलते - बदलते वह छातियों के गोल  - गोल  गुम्बद की शक्ल लेने लगती,  धुंध - सी छाई होती चारो ओर, जैसे - जैसे धुंध छँटता एक चेहरा उभरता, अरे, यह तो पड़ोसवाली भाभी हैं, वे मुझे अपनी छातियों से क्यों सटाये जा रही हैं … मैं खुद को छुड़ाकर भाग खड़ा होता … भाभी कहती, अरे, सुन तो … और मेरा सपना टूट जाता … ."
वह थोड़ी देर तक चुप हो गया। सारे लोग चुप।
 "अबे, साले, मैं क्या लोरी गा रहा हूँ। सभी सो गए क़्या?" 
“आँ…”, मैंने अकचकाकर चुप्पी तोड़ी, “नहीं, नहीं, जागा हुआ हूँ। तुम्हारे कहानी कहने का ढंग ही ऐसा है कि हमलोग उसी के ख्यालों में डूब गए थे। चलो यार आगे की कहानी कहो, बहुते मजा आ रहा है।"
"देखो आगे की कहानी ध्यान से सुनो। एक भी शब्द मिस किये तो आगे - से मैं कोई कहानी नहीं सुनाऊंगा।
एक दिन वही भाभी, माँ से पूछी, "दीदी, मैं बेनी को अपनी ड्योढ़ी दिखा लाऊँ?" और  अपने साथ अपने घर ले आईं। मेरा हाथ पकड़े वह ऊपर के कोठे पर ले आईं। पुराने ज़माने की बनी कोठी। चूना और सुर्खी से पाटा हुआ उनका कोठा। ऊपर आने पर भी उस अप्रील के महीने में भी खूब ठंढा घर था। वहाँ उन्होंने बड़े प्रेम से मुझे सूखे मेवे दिए। मैंने भी बड़े प्रेम - भाव से उसे खाया।
"क्यों, बेनी चुप क्यों है?" उन्होंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा था, "क्या तुम भी यही सोच रहे हो कि यहाँ कोई बच्चा क्यों नहीं है? मेरी कोई संतान नहीं है रे। तुम्हारे भैया भी यहाँ से दूर बारिसात में नौकरी करने गए हुए हैं। उनका यहाँ आना कभी - कभी ही होता है। मैं अकेली हूँ इतने बड़े घर में, नौकरों - चाकरों के बीच।"
इतने में एक महरी की आवाज आई थी, "मैं जाती हूँ, मेम साहब।"
"ठीक है, जाओ, दरवाजा बाहर से भिड़का देना।"
फिर मेरी तरफ देखकर बोलीं, "क्यों तुमको अच्छा नहीं लग रहा है?"
मैंने "हाँ" में सर हिलाया था।
मैं बस यूं ही खड़ा होकर सामने वाली खिड़की जो घर के पीछे की ओर खुलती थी, के पार झांकने लगा था।  सामने नदी का किनारा … कल - कल, छल - छल, बहती नदी, नीरवता में घुलता शोर, इस खिड़की  तक आते - आते उसका कम होता जोर, … अप्रील के महीने में दोपहर बाद का समय कितना अलसाया हुआ लगता है … सामने आम के पेड़ों में छोटी - छोटी निबौरियां भी आ गई थीं। नदी के किनारे से जल का स्पर्श पाकर उठते हुए हवा के झोंके में सोंधी ठंढक बदन को उद्वेलित कर  दे रहा था। सहजन  के पेड़ में भी गदराई हुई सहजन की फलियां लटक रही थीं। नदी के किनारे के पलाश के पेड़ों में लाल - लाल टेशु  के फूल पूरे वातावरण को लहका दे रहे थे।
  मैं यह सब देख ही रहा था कि पता नहीं चला कि भाभी कब नीचे प्लेट रखकर आ गई थी। वे मेरे करीब खड़ी हो गई थी।
"अरे, क्या देख रहा है, बेनी, पलाश का निर्जन वन, नदी का किनारा, कितना उदास है यह वन, लाल - लाल टेषु के फूल अपनी पूरी तरुणाई में खिले हुए, लेकिन कोई छूने वाला नहीं, कोई तोड़ने वाला नहीं। फूलों को कैसी खुशी जब उसे कोई छुए ही नहीं।  फूलों को रंग तो इसीलिये मिला है कि लोग उसे देखें, छुएं, और छूकर खुश हो जांय। इसी में फूलों को खुशी  है, है न।" भाभी कहे जा रही  थी।  मैं "हाँ" "हूँ"  में सर हिला रहा था, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा  था।
भाभी मुझे नदी की तरफ इशारा करके कुछ दिखाने लगीं, "देखो, नदी में वह लट्ठ, पिलर जैसा जो गाड़ा हुआ दीख रहा है, वह किसलिए है, बताओ तो।"
"मुझे क्या मालूम?" मैंने अपनी अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा था।
"अरे, बुध्धू, वह नदी में पानी की गहराई नापने के लिए गाड़ा गया है।"
इतने में भाभी को कुछ दिखा। 
"बेनी, आ, आ, तुझे मैं एक अच्छी चीज दिखाता हूँ। यह सब तुझे अपने शहर में थोड़े ही देखने को मिलता होगा?"
भाभी आगे आ गई। खिड़की के पास बैठ गई। उन्होंने मुझसे कहा, "आ, उधर मत खड़ा रह, मेरे पीछे आ जा।" मैं भाभी के पीछे आ गया। 
"अरे, मेरे पीछे से मेरे ऊपर झुक जा। अपना हाथ मुझे दे।"
मैंने अपना दायाँ हाथ भाभी की ओर बढाकर उनके हाथ में थमा दिया। 
उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर गली के किनारे के छोर पर फैले खंड के तरफ इशारा किया। मेरी नजर भी उधर मुड़ गई। 
भाभी ने पूछा, "क्या देखा?"
मैंने कहा, "एक गाय है और उसके पीछे साँढ़ है।"
भाभी ने कहा, "अब देखो साँढ़ गाय के साथ क्या करता है?"
धीरे - धीरे मैंने देखा कि साँढ़ गाय को सूँघ रहा है, पीछे से … और उसके बाद साँढ़ दोनों पैर ऊपर करने वाला ही था कि भाभी सी… सी … सीत्कार करती हुई चिल्लाई, "अब, देख बेनी।"
और उन्होंने मेरा हाथ जोर से खींचकर अपनी छातियों के बीच दबा लिया। 
मेरा मन कुछ अजीब - सा होने लगा … तन में झुरझुरी - सी दौड़ गई। 
भाभी मेरे हाथ दबाये हुए ही उठीं कि मेरे पजामे का नाड़ा उनके जुड़े के क्लिप में  फंस गया। । पजामा का नाड़ा खींचा गया।  भाभी वैसे ही मेरी तरफ मुड़ी।  मेरे नाड़ा उनके जुड़े में फंसा हुआ और वे मुझे ताके जा रही थी। उन्होंने मुझे और पास सटा लिया और मेरे नाड़े को जुड़े से निकालने की कोशिश करने लगी। नाड़ा जैसे ही जुड़े से निकला, मेरा पजामा नीचे आ  गया  फर्श पर।
उन दिनों मैं अंडरवियर भी नहीं पहनता था। भाभी हँसने लगी। मैं पजामा उठाने के लिए नीचे झुक ही रहा था कि उन्होंने मुझे पकड़ लिया। 
"अरे, बेनी तुम्हारी लम्बाई तो बड़ी जबरदस्त है, रे ... चलो गीता - ज्ञान का 'एल जी' खेल खेलते हैं।"
मैं डरा - डरा कुछ समझ नहीं पा रहा था। 
वे मुझे पकड़े हुए, सटाए हुए पलंग पर ले आई।
"जानते हो बेनी, 'एल जी ' क्या खेल है?'
मैंने तो एल जी ब्रांड का फ्रीज़, टी वी, ए सी आदि के बारे में सुन रखा था।  'एल जी' कोई खेल  भी  होता है इससे मैं बिलकुल अनभिज्ञ  था। मैंने "ना" में सर हिलाया।
"एल जी' माने लम्बाई - गहराई। यानि कोई लम्बी वस्तु जैसे नदी का लट्ठ, मैंने दिखाया था, उससे नदी के पानी के बहाव की गहराई नापते हैं, उसी तरह गहराई नापने का खेल। चल, चल खेलते हैं।"
मैंने पूछा, "मेरा पजामा?"
"अरे, उसे वहीं रहने दे, बुद्धू।"
मैंने फिर डरते - डरते पूछ लिया, "और गीता - ज्ञान?"
वे खूब जोर - जोर से हँसने लगी, हँसते - हँसते उनकी साड़ी का कोर उनके घुटने से ऊपर जांघों तक आ गया। उनकी गोरी - गोरी जांघें साफ़ - साफ़ दीख रही थीं।
फिर वे बोलीं, "तो सुनो गीता – ज्ञान: गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है,
 'कूर्म ज्यों निज अंगों को इन्द्रियों को समेट ले,
सर्वशः विषयों से जो, प्रज्ञा है उसकी स्थिरा।'
यानि कछुआ जैसे सारे अंगों को अपने में समेट लेता है वैसे ही सभी इन्द्रियों को जो सारे तरफ से समेट ले उसे स्थिर - बुद्धि, प्रज्ञावान और विद्वान कहा जाता है। अब देखो तुम्हारी इंद्री को कैसे मैं कछुआ के अंदर की गहराई में समेटती हूँ आ, नजदीक आ।" और ऐसा कहकर उन्होंने मुझे जोर से भींच लिया । उनकी साड़ी जांघों से ऊपर आ चुकी थी।
 "अब तुम्हारी लम्बाई से अपनी गहराई नापूंगी। चल, चल जल्दी नाप, एल जी खेल शुरू करो। नदी बह रही है। उसकी जलधार में पिलर नहीं होगा तो धारा की गहराई कैसे पता चलेगी?" कहते हुए वह पलंग पर लेट गई और मुझे अपने ऊपर खींच लिया।
मैं जैसे ही गहराई में उतरा वह मुस्काई और बोली, "अब तुम्हारी लम्बाई मुझे पता चल गई है। कछुआ खुश हुआ। जल्दी - जल्दी गहराई नाप।"
और वह जोर - जोर से मुझे अपने ऊपर खींचने लगीं। मुझे भी कुछ - कुछ अच्छा और कुछ - कुछ अजीब लगने लगा। मन में एक संतोष था कि गीता - ज्ञान तो सीख रहा हूँ। 
लेकिन  मन  में एक अपराध - बोध जैसा भी लग रहा था।  भाभी बोले जा रही थीं, "मैं ही गीता हूँ, मेरा ही  नाम गीता है।  तू मुझसे  पूरा  ज्ञान ले ले।  विद्वान बन जा।  जोर - जोर से गहराई में उतर तभी असली ज्ञान मिलेगा।"  मुझे वे जोर - जोर से खींचने लगी। 
तभी मुझे लगा कि कुछ खाली हो रहा है। कुएं से जैसे पानी से भरी बाल्टी निकाली जा रही हो और ऊपर आ जाने के बाद जैसे रस्सी छूट गई हो। कुछ वैसा ही लग रहा था। 
भाभी ने मुझे खूब जोर से भींचकर अपने में सटा लिया और काफी देर तक सटाए रहीं। 
मैं अचानक उठा, पाजामा उठाया, जल्दी से पहना और भाग खड़ा हुआ। 
भाभी चिल्लाई, "अरे, सुनो तो, किसी से कुछ कहना मत, फिर आना।“
यह हमारे नारी - देह - ज्ञान का पहला पाठ था।
एक 14 - 15 वर्ष का वयस्कोन्मुख किशोर 30 - 32 साल की स्त्री द्वारा अचानक, उम्र से पहले ही पुरुष बना दिया गया। नाभी- केंद्र से अधोगामी क्षरण, रिसाव, स्खलन का शिकार भोला - भाला पीड़ित बलि – पशु, बलि चढ़ गया।
  हम सब शांत, साँसें रुकी हुई, धड़कन तेज, बेनी की कथन - शैली से चमत्कृत, आनंद की अनुभूति में डूबे हुए धीरे - धीरे शांत होकर सम पर पहुंचते हुए वास्तविकता के धरातल पर आ गए।
"तभी तुम होली में इतने अच्छे प्रश्न लिखते हो?"
"सालों, मुझे बदनाम करोगे क्या?" और एक जोर का ठहाका गूंजा था।
"अबे धीरे, नदी के किनारों के भी कान होते हैं।"
हमलोग नदी की बहती धार में कंकड़ फेंककर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे।
बेनी ने कहा, "उस दिन से मैं जब भी किसी स्त्री को देखता हूँ तो लगता है कि मैं उसे उसके रूप, बनाव - श्रृंगार, केशराशि, बदन की बनावट और वस्त्राभूषणों की बुनावट पर नहीं टिककर शारीरिक स्तर पर भोगूँ।“
"तू तो बड़ा शातिर निकला रे। साले, अपना गीता - ज्ञान अपने पास रख वरना पिटेगा किसी दिन, बुरी तरह पिटेगा।"









चार

Thursday, November 30, 2017

बेखौफ

#poem#social
#BnmRachnaWorld

बेखौफ़


झूठ चिल्लाता रह गया,  शोर मचाता रह गया,
साथियों ने मेरा हाथ पकड़ा, और मैं आगे बढ़ गया।

दीवार पर टंगे थे इश्तेहार कई, सच छिपाने के लिए,
उन्हीं में से कुछ कूद गए, मेरा हाथ बढ़ाने के लिए।

लोगों ने लाठियां भांजी आँखों में खूँ लिए हुए,
मैं बेख़ौफ़ निकल गया, रूह में एक जुनूँ लिए हुए।

आपने मुझे खरोंच दिए इसका मुझे मलाल नहीं,
आपकी सोच बदल जाये, फिर कोई सवाल नहीं।

गर लड़ाई होगी सीधे, तो मेरे साथियों हो जाने दो,
कफ़न सर पर बंधे है, जिद्द पूरी अब हो जाने दो।

जिसका आगाज़ किया है, उसे अंजाम तक पहुंचा के दम लूंगा,
जिन्होंने साथ दिया  है, उन्हीं के साथ  मंज़िल पा के दम लूंगा।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र,
तिथि: 25-03-2017.
ऐरोली, नवी मुंबई।

नोट: यह कविता मैने इसी वर्ष मार्च में अपने मुंबई प्रवास के दौरान लिखी थी। इसे अपने ब्लॉग  पर आज डाल रहा हूं। इसके पहले यह कविता और कहीं भी प्रकाशित नहीं हुयी है।

Thursday, November 2, 2017

उजाला दे दूंगी (लघुकथा)


#shortstory#social
#BnmRachnaWorld

नोट: मेरी हाल में लिखी यह लघुकथा "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-30, आयोजन अवधि 29-30 सितम्बर   2017 में स्थान पाई है। Open Books Online प्रसिद्ध साहित्य सेवियों और अनुरागियों की एक वेबसाइट है, जो हर महीने कविता, छंद और लघुकथाओं का आयोजन करता है। इसबार "उजाला" शब्द को केंद्रीय भाव बनाकर लघुकथा लिखनी थी। मैंने "उजाला दे दूंगी"  शीर्षक से यह लघुकथा लिखी  है ।


उजाला दे दूंगी 

"माँ, आज साहब के बंगले में इतनी भीड़  क्यों है?" रोहित बाबु के बंगले के आउट हाउस में अपनी माँ के साथ रहने वाली छोटी  बच्ची रानी ने अपनी माँ अहिल्या से पूछा था।
अहिल्या जानती थी कि साहब के यहां नवरात्र में दुर्गा जी की पूजा होती है। आज उसी की पूर्णाहुति पर कुंवारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है। उसके बाद दक्षिणा के रूप में उपहार भी दिया जता है।
"वहां माँ दुर्गा जी की पूजा हो रही है।"
"उससे क्या होता है?"
"उससे दुर्गा जी सद्बुद्धि देती हैं। और सद्बुद्धि से जीवन में उजाला आ जाता है। उसके प्रकाश में जीवन जीने से कोई भय नहीं होता है।"
"माँ, हम भी दुर्गा जी की पूजा क्यों नहीं करते?"
"करती हूं न। जहां दुर्गा जी की पूजा होती है, वहां की सफाई तो मैं ही रोज करती हूं। हमारी यही पूजा है।"
"तो फिर कन्या को बुलाकर खिला भी देंगे और दक्षिणा भी देंगें।"
"मैं तो रोज खिलाती हुँ कन्या को।"
"मैने तो किसी को आते हुये नहीं देखा।"
"तुम जो मेरी कन्या हो।"
"तुम दक्षिणा क्या दोगी?"
"मैं दुर्गा जी के पूजा स्थल की सफाई करते हुए पूजा भी करती रहती हूँ| वहाँ से .... "
"हां, तो वहां से दक्षिणा लायेगी क्या?
"हां, वहीं से सद्बुद्धि का उजाला लेकर तुम्हें उसमें से थोड़ा  सा उजाला दे दूंगी।"
"तुम्हारी यही बात मेरी समझ में नही आती।"
अहिल्या अपनी रानी को गले लगा लेती है।


Sunday, October 29, 2017

तवरीख के पंख पर क्रांतियाँ

#poem#social
#BnmRachnaWorld

चूल्हे जलते नहीं यहाँ किसी भी घर में,
फिर भी बस्ती से उठता हुआ धुआं तो देख।
महलों के कंगूरे गगन को चूमते हैं, मगर
मिलता नहीं यहाँ किसी को आशियाँ तो देख.

ये हरियाली जो दीखती है दूर तलक,
नजरें उठा, दूसरे तरफ का फैलता रेगिस्तां तो देख.

फूटपाथ पर सोये हैं जो लोग सट - सट कर,
उनके ऊपर का खुला आशमां तो देख.

जला चुके थे तुम जिन्हें चुन - चुन कर,
उस राख से उठती हुई चिंगारियाँ तो देख.

अब लाशें भी उठकर खड़ी हो गयी हैं,
हवा में उनकी तनी हुयी मुठियाँ तो देख.

ढूह में बदल जायेंगें महल दर - बदर,
खँडहर कहेंगे इन सबों की दास्ताँ तो देख.

वे जो सोते हैं भूख से बिलबिलाकर,
तवारीख के पंख पर लिखेंगे क्रांतियां तो देख.आ

by Brajendra Nath Mishra

Friday, October 27, 2017

दर्द चेहरे पे उभर आये हैं

#gazal#love
#BnmRachnaWorld

दर्द चेहरे पर उभर आये हैं

दर्द जो दिल में छुपा रखे थे,
आज चेहरे पे उभर आये हैं।

जिन्होंने देने को संभाले रखा था
ये सारे गम, उसी के कुछ बकाये हैं।

लोगों ने साधे इतने निशाने मुझपर,
 गिरता नहीं खूँ, इतने तीर खाये हैं।

कैसे कह दूं मैं हँसता ही रहूँगा
आंसू भी तो मेरी आँखों में समाये है।

कहीं भी  शबनम सी बिखर जाती हो
कभी झांको मेरे दिल में भी सरमाये हैं।

छुआ था कभी होठों से मेरे होठों को
हम आज भी उसी याद को चिपकाये हैं।

सरमाया - मूलधन, पूंजी।
©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  तिथि: 11-03-2017, वसई ईस्ट, मुम्बई।

समर्पित (लघु कथा)

#shortstory#love 
#BnmRachnaWorld

समर्पित
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वो सर्द साँझ थी जब पुष्प को अचानक  सी - बीच पर अंशिका जैसी ही आकृति दिखी थी. वह एक  अदृश्य आकर्षण से खींचता हुआ उस ओर बढ़ गया था. उसे अंशिका के साथ कॉलेज में बिताये हुए दिन रह रहकर याद आ रहे थे. वह भौतिकी के पीजी का छात्र था और अंषि, हाँ इसी नाम से उसे पुकारा करता था, इकोनॉमिक्स की. उसे अच्छी तरह याद है कि अंषि ने कैसे डिबेट में उसे जीतने के लिए अंतिम दिन,  ठीक डिबेट शुरू होने के पहले अपना नाम वापस ले लिया था. इसपर दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ था, और उसके बाद खूब प्यार.
"अंषि, सुनो तो..."
ऐसे कौन परिचित नाम से पुकार सकता था. अंशिका  ने मुड़कर देखा था.
"पुष्प, तुम यहां कैसे, मुंबई में."
"क्यों? मुंबई सिर्फ तुम्हारी है क्या?"
"घूमने आये हो क्या? अकेले हो?" अंषि का मतलब पुष्प की पत्नी,बच्चों से था.
"हां, अकेला तो अकेले ही होगा न."
"तुम्हारी पहेलियाँ बुझाने की आदत गई नहीं."
"तुम्हारे, श्रीमानजी,कहाँ है,  वो?"
"अंषि का तो मन हुआ कि वह कह दे, सामने खड़े हो और पूछ रहे हो कहाँ हैं वे.
"मैं यही छोटी से  इंडियन रेवेन्यू   सर्विस की नौकरी कर रही हूँ."
"तो, इनकम टैक्स में हो? तब तो डरकर रहना होगा. कहीं रेड न करवा दो."
"तुम पर तो रेड करने में मज़ा ही आएगा.  तुम कहाँ हो?"
"तुम्हारी शरारत गई नहीं. मैं यही Bhabha Atomic Research Center में छोटा - सा वैज्ञानिक हूँ."
"तब तो एटम बम लगाकर उड़ा दोगे."
"काश, तुझे तुझसे  उड़ा पाता!"  पुष्प ने हंसकर कहा था.
"तो मैं चलूँ, मुझे जाना होगा."  अंषि  ने अपनी विवशता जताने की मुद्रा में कहा.
"........" पुष्प चुप ही रहा.
अंशिका चल दी. पुष्प जड़वत खड़ा रहा. वह उस ठूँठ की तरह खडा था जिसके सारे पत्ते झड़ चुके थे. जिसके पास देने को कुछ नहीं था, न फल, न पत्ते, न टहनियाँ.
अंशिका ने कुछ दूर जाकर मुड़कर देखा. पुष्प वैसे ही खड़ा था. देखकर वह मुड़ गई थी. उसने पीछे -से पुष्प से लिपटते हुए पूछा था.
"मुझे रोका क्यों नहीं जाने से?"
"मैं तुम्हें चाहता हूँ अंषि. तुझे कैसे रोकता?"
"बुध्धू, जिसे चाहते है, उसे बलपूर्वक रोक लेते है अपने पास."
अंषि, जिसे चाहते हैं उसे कैसे रोक सकते हैं, प्यार में अधिकार  नहीं जताया जाता.  ये तो निरा स्वार्थ हुआ न. ये तो possessive होना हुआ. मैंने  तो तुझे खुद को समर्पित किया है अंषि, तुझे बलात रोक कैसे सकता हूँ?" पुष्प ने अंषि के  सरक गए  समुद्र के जल में भींगते दुपट्टे की छोर को उठाकर  उसके वक्षस्थल पर सजाते हुए कहा था.
"तुम बिलकुल नहीं बदले..." कहकर अंशिका ने उसे और भी पास खींचकर भींच लिया था अपनी बाहों  में.

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर

रौशनी का गान सूरज

#poem#nature
#BnmRachnaWorld

ओ बी ओ (open books online) साहित्य मर्मज्ञों द्वारा संचालित अन्तरजाल है, जो हर महीने ऑन लाईन उत्सव आयोजित कर्ता है। इस बार यह उत्सव 13-14 अक्टूबर को आयोजित किया गया था।

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
विषय - "सूर्य/सूरज"
आयोजन की अवधि- 13 अक्टूबर 2017, दिन शुक्रवार से 14 अक्टूबर 2017, दिन शनिवार की समाप्ति तक
(यानि, आयोजन की कुल अवधि दो दिन)

उपरोक्त उत्सव में मैने भी अपनी रचना भेजी थी। अभी आज सूर्योपासना का महान पर्व "छठ" का समापन हुआ है। "सूर्य/सूरज" विषय पर मैने अपनी रचना डाली थी उसे दे रहा हूँ।

रौशनी का गान सूरज

रौशनी का गान सूरज।
प्राणियों का प्राण सूरज।

सुबह की पसरी ओस,
किरण की एक डोर।
ठहरती उन बूंदों पर ,
बिखरती चहुँ  ओर।

सुनहरी मोतियों का
खड़ा करता मचान सूरज।
रौशनी का गान सूरज।
प्राणियों का प्राण सूरज।

पंछियों को, पादपों को,
मनुजों को, तलैया को।
किरणों  की बूंदें बरसाता,
नहाने को, गौरैया को।

समष्टि  का मान सूरज।
प्राणियों का प्राण सूरज।
रौशनी का गान सूरज।

सूर्य- रश्मियों में नहाई,
प्रकृति कैसे विचर रही!
झूम रहा कदम्ब-तरु भी,
तान- मुरली पसर रही।

डोलता बहती उर्मियों संग,
यमुना को देता सम्मान सूरज।
प्राणियों का प्राण सूरज।
रौशनी का गान सूरज।

दोपहर की धूप
जलाती है बदन।
सूखते ताल, नलकूप,
चैन देता, डोलता पवन।

सन्ध्या संग मिलन को
जाता वेगवान सूरज।
रौशनी का गान सूरज।
प्राणियों का प्राण सूरज।


@ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 ता: 08-10-2017
 वैशाली, दिल्ली एन सी आर।

Thursday, October 26, 2017

डिवाईडर पर कॉलेज जंक्शन (उपन्यास की एक झलक)

#novel#youth
#BnmRachnaWorld
#dividerparcollegejunction

मेरी प्रकाशनाधीन पुस्तक " डिवाईडर पर कॉलेज जंक्शन" की प्रस्तावना के कुछ अंश प्रस्तुत हैं:


मनस्वीनुमा मनसाईन बतियाँ

  यह उपन्यास चौबीस अध्यायों में अपना फैलाव लिए हुए है। जिंदगी भी तो हर रोज चौबीस घंटों में पल - पल सिमटती हुई, क्षण - क्षण में खनकती हुई सुगन्धित, पुष्पित, फलित होती है। कोई इसे छककर काटता है और किसी से काटे नहीं कटती।
वैसे पूरी कथा एक डिग्री कॉलेज से सम्बन्ध रखती है। पृष्ठभूमि में 70 का दशक, कहानी का कालखण्ड है लेकिन रैंडम मेमोरी पर आज की ही रची बसी, गुँथी, सुलझी, उलझी तंतुओं में गढ़ी लगती है। इसका नायक पुष्प शायद संशयग्रत हो सोच रहा है:

यह कौन बैठा नदी की तीर पर,
निश्चेष्ट, निश्चल देखता जल - प्रवाह।
टूटना, बिला जाना, तट से मृतिका - कणों का,
और डूब जाना पत्थरों का अतल - जल में।

पत्थर बने जो करते अलंकृत
स्वयं को मिथ्या अहमन्यता से।
वे ही कहीं तो डूबते नहीं
प्रवाहमान जल के अतल - तल में?

परन्तु अपने उस अभिमान में
हिंसा का तांडव किया करते हैं वे।
उससे विगलित समाज के तन्तु को,
किस तरह, झकझोर, तोड़ फेंकते अनल में।

ऐसे तत्व भी (या) ही इतिहास में स्थान पाते,
झोंक जन को और जग को।
एक भीषण युद्ध की विभीषिका में,
मानवता जहां मृत्यु – शवों को ढूढती विकल हो।

हिंसा का प्रत्युत्तर न दे,
चुपचाप रहकर सहे जाना।
उदारता, सदाशयता का ओढ़ आवरण,
क्लैब्य-दोष-मण्डित कर लेना नहीं तो और क्या है?

इन्हीं सवालों का जवाब ढूढने को मजबूर करता यह कथानक पुस्तक रूप में पाठकों के सामने खुला पड़ा है। कथ्य में हास्य - ब्यंग्य का पुट भी है। इसलिए ऊपर दी गई, सोचने को विवश करती पक्तियों को मस्तिष्क के पिछले हिस्से में रखकर पढ़े और कथा प्रवाह का आनंद लें।
                                     
                                                      --ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
#dividerparcollegejunction
#BnmRachnaWorld
POSTED ON FB GROUP "FRIENDS WHO LIKE HIND YUGM PUBLICATION " ON 01-11-2017
आज फिर मैं अपने प्रकाशनाधीन उपन्यास "डिवाईडर पर कॉलेज जंक्शन" में उल्लिखित एक प्रसंग से आप सबों को रुबरु कर रहा हूं:

हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष थे, सीताराम प्रभाष । प्रभाष उनका तखल्लुस या उपनाम था।  वे जब भी किसी वर्ग में  ब्याख्यान देने जाते तो विद्यर्थियों की उपस्थिति  लेने के बाद अपनी कोई ताजी या पुरानी कविता जरूर सुनाते। लोग कहते थे कि प्रभाष जी अच्छे कवि थे।  इतने अच्छे कवि थे कि  उनकी कविता बहुत कम लोगों को समझ में आती थी।  उन्हें कवि सम्मेलनों के आयोजक बुलाना चाहते थे।  कोई - कोई आयोजकों ने उन्हें बुलाया भी।  लेकिन जब वे कविता सुनाने लगते तो श्रोताओं की समझ से ऊपर - ऊपर गुजर जाने के कारण वे हूट कर दिए  जाते। इसके बाद आयोजन में आये अन्य कवियों की कविताएँ सुनने का श्रोताओं का  मूड खराब हो जाता।  इसलिए आयोजक  कवि - सम्मलेन की सफलता सुनिश्चित करने के लिए प्रभाष जी को बुलाने  से  परहेज करने लगे।  अगर किसी आयोजक को प्रभाष जी को बुलाना आयोजन के लिए मजबूरी होती तो उन्हें बोलने का और कविता - पाठ करने का  अवसर अंत में दिया जाता ताकि उनके हूट हो जाने पर अन्य कवियों की प्रस्तुति  प्रभावित न हों।  जाहिर है, अंत में टेंट और लाइट या पेट्रोमैक्स वाले ही उनकी गूढ़ विषयों पर लिखी गई रहस्यवादी  कविताओं का रसास्वादन के लिए बचे रहते थे।

             यही हाल उनकी कविताओं के प्रकाशन के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है।  बहुत से प्रकाशकों को उनकी कविताएँ समझ में नहीं आती थी।  इसलिए वे उनकी रचनाओं को खेद सहित वापस कर दिया करते थे।  एक ही जगह से उनकी कविताएँ कभी वापस नहीं हुईं।  वो जगह थी कॉलेज मैगज़ीन।  हर वर्ष कॉलेज मैगज़ीन जिसका नाम "अभियान" था, छपती थी। इसके संपादक तो बाल्मीकि प्रसाद जी थे, लेकिन संपादक मंडल में  प्रभाष जी थे, इसीलिये उनकी कविताएँ छापने की मजबूरी थी।
            लेकिन इसी मजबूरी  से बाल्मीकि प्रसाद अपना काम निकालने में अक्सर प्रभाष जी का इस्तेमाल करते थे। बाल्मीकि प्रसाद लेट - फेट भी कॉलेज आते या बिना सूचना के अनुपस्थित रहते तो प्रभाष जी कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करने  से हिचकते। उन्हें मैगज़ीन में अपनी कविताएँ जो छपवानी थी।  वे तो चाहते थे साल में जो अंक कॉलेज मैगज़ीन का निकलता था उसमें सिर्फ उनकी अप्रकाशित कविताओं का विशेषांक ही निकले।  परन्तु कॉलेज की प्रशासनात्मक सभा के पत्रिका निकालने के कुछ दिशा - निर्देश दिए गए थे जिनका पालन आवश्यक था।  इसलिए प्रभाष जी की एक या दो कविताओं को ही उसमें स्थान मिलता था।
            अब ऐसे कवि को जिसे न कवि - सम्मेलनों के आयोजक कविताएँ सुनाने के लिए बुलाते और न कोई प्रकाशक ही प्रकाशन के लायक समझता,  उसके लिए विद्यर्थियों के ब्याख्यान लेने के समय अपनी कविता सुनाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा था। विद्यार्थियों को हिन्दी विषय के बर्ग की ब्याख्यान माला में उपस्थिति का न्यूनतम प्रतिशत अनिवार्य था।  इसलिए  वे सभी  प्रभाष जी की दुरूह, अबोधगम्य  और सर के ऊपर से निकल जाने वाली कविताओं को सुनने के लिए मजबूर थे।







Sunday, October 15, 2017

अन्तस का तमस मिटा लूं (दिवाली पर कविता)

#poetry#diwali
#BnmRachnaWorld

अन्तस का तमस मिटा लूं
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पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।

गम का अँधेरा घिरा आ रहा है,
काली अंधेरी निशा क्यों है आती?
कोई दीपक ऐसा ढूँढ लाओ कहीं से,
नेह के तेल में  जिसकी डूबी हो बाती।

अंतर में प्रेम की कोई बूँद डालूं,
तब बाहर का दरिया बहाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।

इस दीवाली कोई घर ऐसा न हो,
जहां ना कोई दिया टिमटिमाये।
इस दीवाली कोई दिल ऐसा न हो,
जहाँ दर्द का कोई कण टिक पाये।

गले से लगा लूँ, शिकवे मिटा लूँ,
तब बाहर की दुश्मनी मिटाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।

क्यों नम है आंखें, घिर आते हैं आँसू,
वातावरण में क्यों  छायी उदासी?
घर में एक भी अन्न का दाना नहीं है
क्यों गिलहरी लौट जाती है प्यासी?

अंत में जो पड़ा है, उसको जगाकर,
उठा लूँ,   गले  से लगाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।

तिरंगे में लिपटा आया  लाल जिसका
कि पुंछ गयी हो, सिन्दूर - लाली।
दुश्मन से लड़ा, कर गया प्राण अर्पण
घर में कैसे सब मनाएं दीवाली?

घर में घुसकर अंदर तक वार करके
दुश्मन को लगाकर ठिकाने चलूँ ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।

धुंआ उठ रहा है, अम्बर में छाया,
तमस लील जाये न ये हरियाली।
बंद हो आतिशें, सिर्फ दीपक जलाओ,
प्रदूषण - मुक्त हो, मनाएं दीवाली।

स्वच्छता, शुचिता, वात्सल्य, ममता
को दिल में गहरे बसाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।

@ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
ता: 15-10-2017


Tuesday, October 10, 2017

कुछ गुनगुनाना चाहता हूँ


#poetry #romantic
#BnmRachnaWorld

अपने अहसास, धीमें धीमें सुनाना चाहता हूं।
तुम अगर कह दो, तो कुछ गुनगुनाना चाहता हूँ।

सुर मेरे  टूटे हुए हैं, लय भी   रूठे हुए हैं।
फिर भी जिद है कि तराना बनाना चाहता हूँ।

नींद भी आई न थी कि सुबह दस्तक देने लगी,
तेरी जुल्फों के बादलों में भींग जाना चाहता हूं।

तेरी आँखों में एक समन्दर का फैलाव है
उसी में डूबकर अपनी थाह पाना चाहता हूँ।

वैसे तो जिंदगी में गमों की गिनती नहीं है,
उन्हीं में से हंसी के कुछ पल चुराना चाहता हूं।

तेरे हँसने से छा जाती है जर्रे जर्रे में खुशी
उन्हीं में से थोड़ी  हर ओर लुटाना चाहता हूं।

तेरे वज़ूद में  कशिश की किश्ती सी तैरती है
उसी में इस पार से उस पार जाना चाहता हूं।

मैने चाहा है, तुम भी चाहो ये जरूरी तो नहीं,
इस तरफ से उस तरफ तक पुल बनाना चाहता हूं।

@ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
  ता: 10-10-2017
  वैशाली, दिल्ली एन सी आर।




डिवाईडर पर कॉलेज जंक्शन (अध्याय एक से सात तक)

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