Followers

Saturday, April 14, 2018

पूर्वाग्रह

#BnmRachnaWorld
#poem#social

ओपन बुक्स ऑनलाइन साहित्य मर्मज्ञों के द्वारा संचालित एक वेबसाइट है। इसी में इसके ओ बी ओ लाइव उत्सव 90 में  "पूर्वाग्रह" शब्द पर रचनाएँ आमंत्रित की गयी थीं। रचना डालने की समय सीमा थी, 13 से 14 2018 अप्रील तक। मेरी यह रचना काफी चर्चित रही और सराही भी गयी। उस साइट पर सभी रचनाओं का संकलन जारी है।
अगर आपको तुकान्त आधुनिक  के रूप में लिखी गयी यह कविता अच्छी लगती है तो इसे पढें, अपने कमेन्ट दें और शेयर करें:



पूर्वाग्रह

--------------
बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है-

सजाये हुये घर को यूं ना बर्बाद करो।
बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

एक महल जो दे रहा चुनौती
उंचे गगन में सिर उठाये तना है।
उसकी नीवं में पलीता लगाओ मत
कितनों की पसीने की बूंद से बना है।
उसको हवाले मत करो आग के,
जलाना आसान है, बुझाना कठिन है।

सम्बन्धों की सेज पर खुशबुओं को
सुगन्ध भरे फूलों से खूब महकाना है।
पूर्वाग्रहो के हर्फों से उकेरी गयी चादर को
सरहद के पार कहीं दूर फेंक आना है।
रिश्तों की डोर को, हवाले मत करो गांठ के
कि तोड़ना आसान है, जोड़ना कठिन है।

पेड़ की डालों को ऐसे झुकाओ मत
फलों से लदे हैं, सुस्वाद से सराबोर हैं।
लचक गयी डाल तो फल टपक जायेंगे
बांटते हैं स्नेह और ममता पोर पोर हैं।
जड़ों को सींचना कभी ना छोड़ना
सोखना आसान है, सींचना कठिन है।

वातावरण में ब्याप्त हो रहा कोलाहल है,
विष वमन हो रहा, फैल रहा हलाहल है।
क्या हो गया है, हर ओर क्यों शोर है?
कोई तो हो, जो सोचे, क्या फलाफल है?
इस यज्ञ में, दें अपनी आहुति, मिट जाएं,
अब मिटना आसान है, जीना कठिन है।

सजाये हुए घर को यूं ना बिखराओ
कि बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

c@ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र
ता: 12/04/2018, बैशाख कृृष्ण एकादशी
वैशाली सेक्टर 4, दिल्ली एन सी आर।



Monday, February 19, 2018

फागुन अब आ गईल (भोजपुरी कविता)

#poetry#bhojpuri
#BnmRachnaWorld

फागुन अब आ गईल
---------------------------

अरगनी पर धूप अँटक गईल
पछुआ चलत-चलत बौरा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

गेंदा पीअर पीअर फुला गईल,
पलाश के टेसू रन्ग छा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

कोयल अमवां के बगिया में,
कुहू -कुहू के शोर मचा गईल।
लगताs कि फागुन अब आ गईल।

कंत जबसे गईले परदेस में,
मन के झरोखा में याद के हवा
झरझरा गईल।
लगताs कि फागुन अब आ गईल।

इनार पर पनिहारिन के बतिया में,
ननदी के ठिठोली भौजी के भा गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

कबूतर अब पंतियो पहुन्चावत नईखे,
एतने में कौआ मुंडेर पर आ गईल।
लग ताs कि फागुन अब आ गईल।

का का कहीं ई मौसम के बतियां,
मर्मज्ञ के कलम में इन्दृधनुश के रंग छा गईल।
लगताs की फागुन अब आ गईल।

--मर्मज्ञ





Thursday, January 25, 2018

इस गण तन्त्र सुलगता सवाल (कविता)

#poem#patriotic
#BnmRachnaWorld





इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।


सांसदों का टास्क था,
बनायेन्गें एक आदर्श ग्राम।
जहाँ होगी स्वच्छता, सम्पन्नता,
मिट जायेगी गरीबी तमाम।
आज तो उसकी ना कोई पड़ताल है।
इस गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

आज भी बन रही, सड़कें कई नई
विद्यालयों में बन रहीं नई दीवारे हैं।
एक वर्ष बीतते-बीतते ही उनमें
क्यों दिख रहीं तिरछी दरारें हैं?

सांसदों के मद की राशि-भत्ता बढता रहे,
वे ही होते रहें निरन्तर मालामाल हैं।
इस गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

गलियों में, सडकों पर,
सरकारी जमीनों पर।
दबन्गों का कब्जा है।
हरतरफ मज़ा ही मज़ा है।

फिर भी सब कह रहे
अच्छा है, ठीक हाल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।

नोटबन्दी के समय लगी कतार में,
दिखा नहीं कोई भी नेता।
कोई भी उद्योगपति, ब्यवसायी
या कोई भी सेलिब्रिटी अभिनेता।

जनता तो बनी है, उठाने को परेशानी
नेताजी आराम में हैं, देश खुशहाल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।

आज भी कुछ बच्चे हैं
बीन रहे क्यों कचरे हैं?
कचरा का कैसे हो प्रबन्धन
चल रहा है, चिन्तन-मनन।

फिर भी नहीं समाधान मिल रहा
लोग कहते है, समस्या विकराल है।
इस गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।


जी एस टी गर समाधान है,
तो ब्यापारी क्यों परेशान हैं?
ग्राहक के पॉकेट में सेंध लगी
कीमतो पर क्यों नहीं लगाम है?

आम उपयोग की चीजो के
मूल्य में फिर क्यों इतना उछाल है?
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

संसद, विधान सभाओं में
लोकनीति कहीं पिस रही।
भाई-भतीजों और दागी हैं नेता,
भ्रष्टनीति हर तरफ बिहंस रही।

भ्रष्टाचार मुक्त भारत होगा कब?
इसी सवाल पर मच रहा बवाल है।
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

काला धन कहाँ था?
आया अभी क्यों नहीं?
जनता बाट जोह रही,
बुरे दिन फिरेन्गें कभी?

इन सभी मुद्दों पर जरूरी पड़ताल है।
इस गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

जनसंख्या नियन्त्रण जरूरी है,
देशहित के लिये यह सर्वोपरी है।
तो सरकार क्यों मौन है?
उसे रोक रहा कौन है?

लागू हो सख्ती से राष्ट्र नीति
चुप हो जाएं जो भी वाचाल हैं।
इस गणतन्त्र ये जलता मशाल है।
हल हो जाएं ये सारे सवाल है।
अगला गणतन्त्र ये सुलगता सवाल है।
अगला गणतंत्र ये सुलगता सवाल है।

हर मनुष्य का जीवन स्तर
क्यों नही समान है?
क्यों है इतना कोलाहल
क्यों मच रहा घमासान है?
आओ सुलझाएं ये सारे जलते प्रश्न
सोचें हर नागरिक, तो मिट जाये मलाल है।
अगला गण तन्त्र ये सुलगता सवाल है।

तिथि: 25-01-2018
वैशाली, ग़ज़ियाबाद!























Sunday, January 21, 2018

बसन्त-सा मौन

#poems#nature
#BnmRachnaWorld




बसन्त-सा मौन, जीवन जिनका सेवा-व्रत है

आज की इस बसन्त पंचमी में, जिस दिन महाप्राण निराला जी का जन्म दिन है, शृंगार, सेवा और शौर्य के मिले जुले रंगों में शब्दों को रंगकर इस कविता का सृजन किया गया है। आप सबों के स्नेह और आशीर्वचन दोनों की अपेक्षा है। सादर!


वे बसन्त - सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है!

वृन्तों पर फूलों का उत्सव,
धरती पहने साड़ी धानी ।
आम्र-पत्र ढँके मन्जरियों से,
भौरें गुन्जाये प्रेम-कहानी।

प्रकृति दे रही है वरदान
कण-कण पसर रहा अमृत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा - व्रत है।

पीली सरसों की क्यारियों से,
झांक रहा, कौन रन्ग बन।
गेंदे के फूलों में विहन्सता,
बरस रहा जीवन-तरंग बन।

धरती जिसका बनी बिछौना,
विस्तार यह सम्पूर्ण जगत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

कोयल बाग में कूक रही है,
गून्ज रही है ध्वनि दिगंत में।
जगा रही वह हूक हृदय में,
कंत दूर हैंं, इस बसन्त में।

अपने स्वभाव में मस्त मगन
अपनापन लुटा रहे सर्वत्र हैं।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

जो जूझ रहे दुश्मन से
सीमा पर सीना ताने।
उनका हर मौसम बसंत है,
वे रण-चंडी के दीवाने।

मौत से टकराने वालों के,
भाल सजा चन्दन, अक्षत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

राजनीति में देशनीति हो
आओ लें हम आज सपथ।
देश मान ना झूकने देंगें,
भले सजा हो अग्निपथ।

परमार्थ में जीवन अर्पण
स्वयं से उँचा ये जनमत है।
वे बसन्त-सा रहते मौन
जीवन जिनका सेवा-व्रत है।

ता: 22-01-2018
बसन्त पंचमी
स्थान: वैशाली, गाज़ियाबाद

माँ के सपूत

#poem#patriotic
#BnmRachnaWorld

माँ के सपूत

भूल गए हम सारी रस्में,
चरखा, तकली चलाने की।
बंदूकों को सिरहाने रख,
और तलवार गलाने की।

काल नाचता यहाँ - वहाँ,
और भैरव तांडव करता है।
सीमा पर जब   सेनानी,
गोली खाकर मरता है।

रणभैरवी रणचंडी,
नर्तन करती यहां - वहाँ।
लाशें बिछा दूँ दुश्मन की,
शपथ तेरे चरणों की माँ।

वार किया तुमने पीछे से,
हिम्मत है तो सीधे लड़।
कायर तेरे माँ ने तुझको,
मानव बनाया या विषधर।

सात को मारा है तुमने,
सत लाख लाशें बिछा दूंगा।
सीमा रेखा बदलेगी,
नई रेखा खींचा दूंगा।

बहुत हो चुका मान-मनौअल,
अब वार्ता नहीं रण होगा।
आर-पार के इस समर में,
विकट आयुधों का वर्षण होगा।

बीत चुका वो युग जिसमें,
कपोत उड़ाए जाते थे।
तलवारें तो चमकेंगी अब,
कभी शान्ति गीत हम गाते थे।

हाथ मिलाना छोड़ चुके हम,
कफ़न बाँध कर निकले हैं।
धूल चटाया नहीं तुझे तो,
माँ के सपूत नहीं सच्चे हैं।

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
  जमशेदपुर
  तिथि : 07-01-2016

नोट: यह कविता मैने पिछले वर्ष (2016 ) उरी में सेना की छावनी पर सोते हुए सैनिकों पर  पाकिस्तान के द्वारा भेजे गये आतंकियों द्वारा जब छुपकर वार किया गया था, उसी के बाद लिखी थी।

Thursday, January 18, 2018

वृहत सुख की हो चाह

#BnmRachnaWorld
#poem#motivational



ओ बी ओ (open books online) साहित्य मर्मज्ञों द्वारा संचालित अन्तरजाल है, जो हर महीने ऑन लाईन उत्सव आयोजित कर्ता है। इस बार यह उत्सव 12-13 जनवरी 2018 को आयोजित किया गया था।
यद्यपि उससमय मैं दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेले में अपने "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" नाम से लिखे उपन्यास के लोकार्पण की तैयारी में ब्यस्त था, तथापि मैने प्रदत्त विषय "सुख" पर अपनी तुकान्त कविता पोस्ट की थी। मैं विवेचना में भाग नहीं ले सका, इसका मुझे अफसोस रहेगा।
ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
विषय - "सुख"
आयोजन की अवधि- 12 जनवरी 2018, दिन शुक्रवार से 13 जनवरी 2018दिन शनिवार की समाप्ति तक
(यानि, आयोजन की कुल अवधि दो दिन)
वृहत सुख की हो चाह

वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

उलझा रहता है मानव - मन
कितने झन्झावातों में।
सुलझा कभी नहीं धागा जो,
अझुराया बातों- बातों में ।

अगर चित्त हो शांत, तो ही
इश्वर उसे  सुमति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

सूर्य बिखेरता रश्मियाँ, तभी
कण-कण ज्योतिर्मय होता है।
जो देने में सुख पाते हैं,
उनका सुख अक्षय होता है।

अगर करो विस्तार स्वयं का
चेतन - स्तर विरक्ति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

अपने सुख का देकर भाग
दूसरों में भी नव - संचार भरो।
उनके आंगन में उमंग हो,
सपने उनके साकार करो।

सुधियों को घोल उस समष्टि में
जीवन पावन परिणति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

फूलों को देखो, उसमें
सुगन्ध कौन भर देता है?
मधु संचय करती है मक्खी
पर स्वाद कौन भर देता है?

देने में जो सुख पाते हैं, उनका
जीवन विराट में  विस्मृति देता है।
वृहत सुख की हो चाह, तभी
वह जीवन को गति देता है।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Wednesday, January 17, 2018

उपन्यास "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" का दिल्ली पुस्तक मेले में लोकार्पण



#BnmRachnaWorld
#novel#social





उपन्यास "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" का  दिल्ली पुस्तक मेले में लोकार्पण

आज ही यानि १४ जनवरी को  दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले के हाल न. 12 और हिंद युग्म प्रकाशन के स्टाल न . 22, 23,24 में मेरे लिखे उपन्यास "डिभाईडर पर कॉलेज जंक्शन" का लोकार्पण अतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (नागपुर) से प्रकाशित "बहुवचन" पत्रिका के सम्पादक और वरिष्ट पत्रकार आदरणीय श्री अशोक मिश्र जी के कर कमलों द्वारा हुआ। इस समारोह का संचालन बी एस एन एल, दिल्ली में GM और रुचि से साहित्यकार तथा वैशाली के केन्द्रीय पार्क में हर महीने होने वाले "पेड़ों की छाँव तले रचना पाठ" के संयोजक और कवि आदरणीय श्री अवधेश कुमार सिंह जी ने किया। उस समारोह में हिंद युग्म के प्रकाशक श्री शैलेश भारतवासी, मेरे भगिना श्री नरेन्द्र तिवारी जो बल्लभगढ़ में सीमेन्ट और बिल्डिंग मटेरियल रिसर्च में GM हैं तथा मेरी पत्नी ललिता मिश्रा, मेरी बेटी करुणा, नाती ओजेश और नरेन्द्र की पत्नी भी शामिल हुए। 
श्री अशोक मिश्र जी ने पुस्तक में आंचलिक भाषा के प्रयोग की सराहना की। श्री अवधेश जी के कविता से उपन्यास की कठिन और दुरूह और परिवर्तित फ्रेम की यात्रा पर पूछे जाने वाले प्रश्न के उत्तर में रचनाकार ब्रजेन्द्रनाथ ने कहा कि यह एक मुश्किल काम था। परन्तु जब अन्दर का बहुत कुछ एक बडे कैनवास पर बाहर आने की अतुरता लिये होता है, तो उसे उपन्यास के फ्रेम में ही लाना पडता है। उन्होने यह भी कहा कि कालखण्ड जे पी आन्दोलन के आसपास होते हुये भी आज के वातावरण के साथ उसका साम्य है। उसी समय की कुछ तस्वीरें यहाँ दे रहा हूं। एक और तस्वीर साझा करनी रह गई थी। इस अन्तिम तस्वीर में मैं "परिंदे" पत्रिका के सम्पादक, श्री चौबे जी, जो अपने स्टाल नं 274 से यहां पधारे, उन्हें भी पुस्तक की एक प्रति दी गई। 
साथ ही पुस्तक की अमेज़ोन पर प्रि बूकिन्ग शुरु हो चुकी है, उसकी भी सूचना चस्पा की हुई है। 
इसके लिए इस लिंक पर जाएँ: http://amzn.to/2Ddrwm1


Monday, January 1, 2018

सदी का अट्ठारहवाँ साल ! (कविता)

#poem#newyear
#BnmRachnaWorld




सदी का अट्ठारहवाँ  साल !

इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।
उमंग है, उल्लास है,
छाया मधुमास है।
मधुर – रस सिंचित,
यहां हर सांस है।

प्रकृति रस घोल रही,
घूंघट – पट खोल रही।
रंग – बिरंगी फूलों से,
भरा हुआ थाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है.

सूर्य की किरणें भी,
ठंढ को शोध रहीं।
पथ को आलोकित कर,
जीवन को बोध रही।

कुहेलिका के पार भी,
खुला नव संसार भी,
नृत्य कर रहा है,
मचा रहा धमाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।

अंग – अंग में अनंग,
बज रहा जलतरंग।
निहारती घटाओं से,
ढूढती पिया का संग।

रस – रस बरस रहा,
अभ्यंतर भींग रहा।
शब्द – शब्द टांक दिए,
बिछा हुआ रुमाल है।
अट्ठारहवाँ साल है।

चंचल चितवन, नयन खंजन,
रमण करता, मानव- मन।
मस्ती लुटाती, मुस्कुराती,
सकुचाती, संवारती यौवन – धन।
दर्पण निहारती,
इतराती, बलखाती,
नव-पल्लवित लता – सी,
डोलती – सी चाल है।
अट्ठारहवाँ साल है।


श्रृंगार रस के पार भी,
जो विवश विस्तार है।
जहां भय है, भूख है,
जी रहा जीवन, एक लाचार है।
जीना मजबूरी है,
फिर मौत से क्यों दूरी है?

चारो ओर बिखरा, सुलगता सवाल है.
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।

शीर्ष पर जो स्थित हैं,
विवादों से ग्रसित हैं।
संसद में हलचल है,
जनमार्ग ब्यथित है।
कौन कितना बेशरम,
कितना चुराया धन?

इसी पर मचा हुआ,
शोर और बवाल है।
इस सदी  का अट्ठारहवाँ साल है।

क्यों मनुष्य  मानवता का,
बन बैठा ब्यापारी है?
क्या पशुता  का पहनना ताज़,
मनुजता की लाचारी है?

धारा प्रवाह रुक रहा,
अवसर है चुक रहा।
किनारे को घेरकर
फैलता शैवाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।

मन- विहंगम गगन – पथ में,
खोजता संसार है।
हो नहीं नफ़रत जहां पर,
प्यार ही  बस प्यार है।

सहज, सुलभ, विश्वास है,
सहकार है, उजास है।
ईर्ष्या, मद, मोह, मत्सर
का नहीं मकड़-जाल है।
इस सदी का अट्ठारहवाँ साल है।
***
–ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
जमशेदपुर

तिथि: 28-12-2015

Sunday, December 31, 2017

नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

#poem#newyear
#BnmRachnaWorld



नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

प्रकृति भी कर रही नव श्रिंगार  है,
दिशायें भी खोल रही नव पट द्वार हैं।
मधु बरस रहा, हेमन्त भी तरस रहा,
लताओं, पुष्पों से सजा बंदनवार है।

धुंध में घुल रहा सुगन्धित सा - मन ।
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

सांसो को आशों में बंद करने दो,
अहसासों को विश्वासों के छन्द रचने दो।
बारुदें बहुत बो चुके हो तुम सालों से,
हमें नेह- तुलसी के बीजों को भरने दो।

एक नया सन्देशा ला रहा पवन।
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

दिल पर दस्तक, यादों ने दिया,
तन की देहरी पर सांसो का दिया।
झुक गया सूरज लिये धूप सांझ की
पांती भी ना आई जलता रहा जिया।

नेह की बाती जलती रही प्रति क्षण
नव  वर्ष का कैसे करे अभिनन्दन?

जो नित्य असि धार पर चल रहे हैं,
जो प्रतिदिन  तूफानों में भी पल रहे हैं।
चीर कर रख देते अरि की छाती जो,
जो नरसिन्घावतार  बन उबल रहे हैं।

उन राष्ट्र के मतवालों का करते नमन।
नव वर्ष का करते है अभिननदन।

मनाओं उत्सव, तो कर लो याद उनको भी
जो खन्दकों में जीते, बन्दूक का खिलौना  है।
जिनकी सर्द रातें हैं, हवाएँ करती साँय -साँय,
जो ओढते हैं राष्ट्र प्रेम, बर्फ का बिछौना है।

राष्ट्र के उन  वीरों से गुलजार है चमन।
उनके लिये भी नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन।


बीते साल में जो रह गया अधूरा
जो सपने ना हो सके साकार।
आएं इस वर्ष में फिर से जगायें
आगे बढ़कर  दे उन्हें भी आकार।

योजनाओं को सतह पर उतारें
रुके नहीं कभी हमारे बढ़ते चरण!
नव वर्ष का करते हैं  अभिननदन!

ब्रजेन्द्र नाथ
जमशेदपुर




Tuesday, December 26, 2017

नमन है मेरा शतबार (कविता, मुरलिधर केडिया पर)

#poem#murlidharkedia
#BnmRachnaWorld





कल 25दिसम्बर को जमशेदपुर के प्रतिष्ठित अधिवक्ता, सुविख्यात समाज सेवी, तुलसी भवन, बिष्टुपुर के वर्तमान न्यासी और पूर्व मानद सचिव आदरणीय मुरलीधर केडिया जी के 75वर्ष पूरे होने परआदरनीय डा नर्मदेश्वर पाण्डेय जी के नेतृत्व मे  सिंहभूम जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से अमृत महोत्सव का आयोजन हुआ था। इसमें माननीय मन्त्री जी श्री सरयू राय जी विशिष्ट अतिथि के रूप में मन्चासीन थे। शहर के गन्य्मान्य नागरिकों, साहितीकों और सिंह भूम चैंबर के सदस्यों ने उन्के दीर्घ जीवन की कामना की। इस आयोजन में मैं भी शमील हुआ।
इस अवसर पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से अभिननदन ग्रन्थ के रूप में स्मारिका का विमोचन भी हुआ। उसमें मेरी कविता भी छपी है, जिसे मैं नीचे दे रहा हूं। कुछ तस्वीरें भी प्रस्तुत हैं :


श्री मुरली धर केडिया जी के अमृत महोत्सव ग्रन्थ के लिये लिखी गयी मेरी कविता :

नमन आपका है शतबार!

हे स्मितहास्य, हे मृदुभाषी।
हे सरल चित्त, हे सुखराशि।

हे स्वदेशी आन्दोलन के सूत्रधार।
केडिया जी, नमन आपका है शत बार!

आप तुलसी - भवन के दृढ़ स्तम्भ,
जहाँ साहित्य - सृजन लेता आकार।
आप सहज उप्लब्ध रहते सबको,
जो चाहे आपका        साक्षात्कार।
नमन आपका है       शतबार!

आप कर-प्रणाली-ज्ञान में निष्णात,
आप मानव-सूर्य के अरुण प्रभात।
आपसे आलोकित है पथ हमारा,
आपका निर्देशन हो हमें प्राप्त।

हे प्रेम, करुणा, सहिष्णुता, सेवा के विस्तार,
नमन आपका है शतबार!
हे स्वदेशी आन्दोलन के सूत्रधार,
नमन आपका है शतबार!
नमन आपका है शतबार!

-ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
 सुन्दर गार्डन, संजय पथ, डिमना रोड, मानगो।

पूर्वाग्रह

#BnmRachnaWorld #poem#social ओपन बुक्स ऑनलाइन साहित्य मर्मज्ञों के द्वारा संचालित एक वेबसाइट है। इसी में इसके ओ बी ओ लाइव उत्सव 90 में  ...