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Thursday, January 23, 2020

अपने अहसास धीमे-धीमे सुनाना चाहता हूँ (कविता)

#BnmRachnaWorld
#romanticpoem



19 जनवरी 2020 को अखिल भारतीय साहित्य परिषद की जमशेदपुर इकाई के द्वारा हुडको लेक पार्क, गोविंदपुर, जमशेदपुर के पास घोड़ाबांधा थीम पार्क में आयोजित कवि - सम्मेलन - सह - पारिवारिक- मिलन समारोह में भाग लेने का अवसर मिला। सारे कवियों और कवियित्रियों का काव्य पाठ करते हुए छवि मैं इस पिक्चर गैलरी में दे रहा हूँ। इसके बाद लीक से थोड़ा हटकर अपने द्वारा एक रोमांटिक कवितानुमा गजल सुनाने का वीडियो भी मैंने अपलोड किया है। आप मेरे इस चैनल marmagyanet को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करें। अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य डालें। आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं।

अपने अहसास सुनना चाहता हूँ

अपने अहसास, धीमें धीमें सुनाना चाहता हूं।
तुम अगर कह दो, तो कुछ गुनगुनाना चाहता हूँ।

सुर मेरे  टूटे हुए हैं, लय भी   रूठे हुए हैं।
फिर भी जिद है कि तराना बनाना चाहता हूँ।

नींद भी आई न थी कि सुबह दस्तक देने लगी,
तेरी जुल्फों के बादलों में भींग जाना चाहता हूं।

तेरी आँखों में एक समन्दर का फैलाव है
उसी में डूबकर अपनी थाह पाना चाहता हूँ।

वैसे तो जिंदगी में गमों की गिनती नहीं है,
उन्हीं में से हंसी के कुछ पल चुराना चाहता हूं।

तेरे हँसने से छा जाती है जर्रे जर्रे में खुशी
उन्हीं में से थोड़ी  हर ओर लुटाना चाहता हूं।

तेरे वज़ूद में  कशिश की किश्ती सी तैरती है
उसी में इस पार से उस पार जाना चाहता हूं।

मैने चाहा है, तुम भी चाहो ये जरूरी तो नहीं,
इस तरफ से उस तरफ तक पुल बनाना चाहता हूं।

YouTube link:
https://youtu.be/pPTjc9bSOA0
©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, January 15, 2020

सूरज का निकलना जरूरी है (कविता)

#BnmRachnaWorld
#patrioticpoem



यह कविता मैंने ता 12-01-2020 को सिंहभूम हिंदी साहित्य सम्मेलन, तुलसी भवन, जमशेदपुर के तत्वावधान में गांधी घाट, स्वर्णरेखा नदी के किनारे, आयोजित "काव्य पाठ सह पारिवारिक एकत्रीकरण समारोह" में सुनायी। तस्वीरों सहित इसका वीडियो आप देखें, मेरे चैनल marmagya net को सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर करें। आप अपने विचार भी दें, आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं। कविता की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:

सूरज का निकलना जरूरी है

जब कोहरा होने लगा हो घनेरा
रश्मियों को तम ने आकर के घेरा
शाखों पे उल्लुओं का हो गया हो डेरा
तिमिगनों का आसमां पर हो बसेरा।

हवा में घुल रही तमिस्रा को
शुभ्र ज्योत्स्ना से धोना जरूरी है।
विभावारी की कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।

भ्रम के भंवर में अर्थ गौण हो गए,
स्वार्थ के शीर्ष पर विचार मौन हो गए
चीख कौन सुनता, घोर इस अरण्य में,
शोर के प्रायोजन में सच कहीं खो गए।

तान कर मुट्ठियाँ, आसमाँ की ओर,
सत्यघोष के लिए जुटना जुटाना जरूरी है।
विभावरी की कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।

दुलार के लिए दुलार ही दुलार है,
प्रेम के लिए मनुहार की संवार है।
पर अगर भाषा के शब्द बदल जाएं
तो प्रहार के लिए विकल्प भी प्रहार है।

सामना हो जाये जो दुष्ट दुरात्माओं से
अहिंसा की परिभाषा त्यागना जरूरी है।
विभावरी के कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।

जो आग्रही हो, राष्ट्र के उन्नयन के लिए,
जो हठी हों, दुश्मनों के विभंजन के लिए,
उनके लिए हिमालय की ऊँचाई भी कम है,
हो जाएं तैयार, अंतिम आक्रमण के लिए।

अग्नि की ज्वालाओं के बीच खोजता पथ,
वीथियों में क्रांति की मशाल बालना जरूरी है।
विभावरी की कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।
©ब्रजेंद्रनाथ
YouTube link: https://youtu.be/aLRP2YVLqwc

Thursday, January 9, 2020

पात पात बिहँस रहा प्रात (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poetryonnature



अरुणोदय!
प्रकृति के पूर्व क्षितिज से झाँकते अरुण के आगमन को शब्दों में बाँधने का प्रयास :
पूरी कविता इस प्रकार है:
इस कविता को सिंहभूम हिंदी साहित्य सम्मेलन, तुलसी भवन,  के तत्वावधान में 13 जून 21 को ऑनलाइन आयोजित "काव्य कलश" 
कार्यक्रम में मैंने सुनाया। इसे मेरी आवाज में मेरे यूटुब चैनल marmagya net के इस लिंक पर जाकर सुनें, चैनल को सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर करें। सादर!

लिंक: https://youtu.be/wW6I93dHJik

 पात पात बिहँस रहा प्रात

व्योम की नीलिमा में खोजता पथ,
कौन आ रहा, चढ़ा वह रश्मिरथ।
लालिमा में लुप्त हो रही रात,
पात-पात बिहँस रहा प्रात।

तरु-शैशवों से फूट रहीं कोंपलें,
क्यारियाँ में केसर के सिलसिले।
कामिनी जाग रही, सो रही रात।
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

अरुणोदय में खुले कमल-दल-पट,
कैद भ्रमर सांस लेने निकला झट।
हरीतिमा में स्वर्णिमा आत्मसात।
पात-पात बिहँस रहा प्रात।

पर्वतों से सरक रही धवल-धार,
प्रकृति नटी कर रही नित श्रृंगार।
शिखरों से झाँकता अरुण स्यात,
पात-पात बिहँस रहा प्रात।

वृक्षो से लिपट रही लतायें,
संवाद में रत तरु शाखाएं।
अरुनचूड़ बोल उठा बीत गयी रात।
पात पात बिहँस रहा प्रात।

©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, January 1, 2020

नव वर्ष अभिनन्दन (कविता)

#BnmRachnaWorld
#2020greetingspoem




परमस्नेही मित्रों,
मैं शुद्ध साहित्यिक रचनाओं के अपने चैनल "marmagya net" के इस एक वर्ष के सफल सफर के लिए अपने सभी श्रोताओं और दर्शकों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। आपका स्नेह और जुड़ाव बना रहे यही मेरी कामना है। आज, 2019 में किये अपने शुभकार्यों का विश्लेषण और उपलब्धियों पर आनन्दित होने का दिन है तो आगे आने वाले वर्ष के लिए नए लक्ष्यों और ध्येयों के लिए संकल्पित होने का दिन है। 
नव वर्ष के अभिनंदन के लिए मेरी यह कविता प्रस्तुत है:
नव वर्ष अभिनन्दन!

नवीन कल्पना, नवीन साधना
नवीन प्रेरणा, नवीन स्पंदन।
नव वर्ष अभिनन्दन।

नव प्रीत हो, नव मीत हो,
मुस्कान हो हर होठ पर,
और ख़ुशी के गीत हो।
नव उपासना, नवीन प्रार्थना,
नव प्रभात का हो नवीन वंदन,
नव वर्ष अभिनन्दन।

नव स्पर्श हो, नव हर्ष हो
नए शिखर कि ओर, नवीन उत्कर्ष हो
नयी फुहार हो, नयी बहार हो ,
नयी पौध का हो नवीन सिंचन।
नव वर्ष अभिनन्दन।

नए क्षितिज की  ओर नयी उड़ान हो
नए आयाम के लिए
प्रण महान हो
किसी गली में न हो
उदास बचपन।
नव वर्ष अभिनन्दन।

न मन निराश हो, न दिल हताश हो,
स्फूर्ति हो तन में, नवीन स्वांश हो,
न हो अत्याचार, न हो बलात्कार,
न खौफ हो मन में,
न लगे कहीं ग्रहण।
नव वर्ष अभिनन्दन।

न आक्रोश हो, न विध्वंश हो,
न अग्नि की ज्वाला हो, न विभेद का दंश हो।
न युवाओं को दिग्भमित करने का षडतंत्र हो,
न राष्ट्र चेतना में विष का अंश हो।
देश निर्माण के लिए सजग हों सभी,
विजय पथ पर हो, सतत ऊर्ध्व गमन।
नाव वर्ष अभिनंदन! नव वर्ष अभिनन्दन!
©ब्रजेंद्रनाथ
आज रात्रि 2019 के कैलेंडर का अंतिम पृष्ठ उतरते ही 2020 के नए पृष्ठ का उजास झांकता नजर आएगा। इस नए वर्ष के अभिनन्दन के लिए आप मेरी कविता मेरी आवाज में YouTube चैनल के इस लिंक पर सुनें:
Link: https://youtu.be/vg2QltoOXdY

कइसे खेलब होली (कविता)

 #BnmRachnaWorld  #magahikavita  कइसे खेलब होली   ------------------------------- कागा न आइल मुंडेर हो, कइसे खेलब होली? सजना जबसे गेलन विदे...