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Thursday, June 17, 2021

पाठकों से मन की बात भाग 1 (लेख)

 #BnmRachnaWorld

#pathakonse #mankibaat










"पाठकों से मन की बात" का यह सीरीज मैंने "प्रतिलिपि" हिंदी वेबसाइट पर पिछले 31 जुलाई 2020 से लिखना आरंभ किया था।

उसे  आज से मैं अपने ब्लॉग पर डालना शुरू कर रहा हूँ। आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा:

पाठकों से मन की बात भाग 1:

अश्लीलता या एंटरटेनमेंट वैल्यू:
 प्रबुद्ध पाठकों,
सहृदय नमस्कार!
आज हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार, उपन्यासकार प्रेमचन्द जी की जयंती है। मैंने आज का दिन ही आपसे अपने मन की बात की शुरुआत के लिए चुना। मैं आपसे हर सप्ताह इसी दिन यानि शुक्रवार को जुड़ा करूँगा। हमलोग अपने लेखन को मुंशी प्रेमचंद के दर्पण को सामने रखकर देखने की कोशिश करेंगे। अपना प्रतिबिम्ब उसमें कैसा नजर आता है?
पहले प्रेमचंद जी के बारे में कुछ बात करते हैं। मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियों, उपन्यासों में पात्रों, उससमय के परिवेश, आर्थिक सामाजिक विषमता, सामान्य जन की विवशता, नारी पात्रों के अंतर्मन का चित्रण या लेखिकीय स्पष्टता और पाठकों की रुचि के परिष्कार की प्रतिबद्धता के बारे में जो मानक उन्होंने स्थापित किये थे, क्या अभी का साहित्य लेखन से जुड़ा समाज और पाठक वर्ग उसका निर्वहण कर रहा है? यह विचारणीय विषय है।
प्रेमचंद जी घाटा सहकर भी "हंस" पत्रिका को प्रकाशित करते रहे। उसी घाटा की पाटने के लिए, जयशंकर प्रसाद के मना किये जाने के बावजूद भी उन्होंने सन 1934 में बम्बई (आज का मुम्बई) का रुख किया था। वहां के बारे में जैनेंद्र कुमार को लिखे एक पत्र में बताया था, " मैं जिन इरादों से आया था, उनमें एक भी पूरा होते नजर नहीं आते...वल्गरिटी को यह लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं...मैंने सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं, जिसे शिक्षित समाज भी देखना चाहे।"
एक लेखक के रूप में प्रेमचंद जी अपने दायित्व को समझते थे। वे सस्ते मनोरंजन के लिए नहीं लिखते थे। वे बिकने के लिए नहीं लिखते थे। समाज के परिदृश्य के चित्रण के द्वारा वे समाज में स्थापित गलत मूल्यों को चुनौती देते थे। उसके समाधान ढूढने की तड़प उनकी रचनाओं में साफ दिखती है। उन्होंने अपने मानकों और मूल्यों के साथ कभी समझौता नहीं किया। इसलिए उनका रचना संसार लेखकीय ईमानदारी का जीता जागता दर्पण है।
अगर पाठक या दर्शक अपनी रुचि को दूषित करना चाहता है, तो लेखक क्या उसे वैसे ही साहित्य परोस देगा? लेखक को सच्चाइयों के चित्रण के साथ समाज को दिशा देने का भी काम करना होता है, पाठकों की रुचि का परिष्कार भी करना होता है। इस दायित्व को जो पूरा नहीं करता है, जैसी धारा बह रही है, उसीमें बहता चला जाता है, तो वह लेखक की पात्रता रखता है या नहीं इसमें संदेह है।
आजकल एंटरटेनमेंट वैल्यू के नाम पर सिनेमा, शार्ट फ़िल्म और वेबसीरिज में सेक्स और अपराध के घालमेल को उघाड़कर प्रस्तुत करने की जो होड़ चल पड़ी है, वह हमारे चारित्रिक गिरावट को किस सीमा तक ले जाएगा, यह तो आने वाला समय ही बतलायेगा।
अभी तो कहानियों, उपन्यासों और वेबसीरीज़ों के भी नाम ऐसे रखे जा रहे हैं, जैसे पहले मस्तराम सीरीज में रखे जाते थे। हिंदी में अश्लील नामों को नहीं लिखकर उसका अंग्रेजी नाम लिख देने से अश्लीलता का मुलम्मा उतर नहीं जाता है। तर्क यह दिया जा सकता है कि क्या करें पाठक और दर्शक यहीं पसन्द करते हैं। आपके पड़ोसी तो आपके बेडरूम सीन में रुचि रखता है, तो क्या आप उसे सबकुछ देखने के लिए अपने बेडरूम की खिड़कियों के पर्दे हटा देंगे? ...और पड़ोसी का क्या कर्तव्य है ? वह दूसरे के बेड रूम में झांकता फिरे। इसपर आप विचार करें।
इन्हीं विचारों के प्रकाश में हमलोग प्रतिलिपि से जुड़े लेखकों के लेखन और पाठकों की प्रतिक्रियाओं का भी विश्लेषण करेंगें...इसी दिन अगले सप्ताह।
क्रमशः...



Saturday, June 5, 2021

रमजीता पीपर (कहानी) #पर्यावरण पर

 #BnmRaxhnaWorld

#storyonenvironment




रमजीता पीपर (कहानी):

रमजीता पीपर से गाँव की पहचान है या गाँव से इस पीपर के पेड़ की इसके बारे में दद्दा से ही पता लग सकता है। जब दद्दा से पूछते है कि यह रामजीता पीपल जिसका नाम थोड़ा बदलते हुए रमजीता पीपर पड़ गया है, कितना पुराना है, तो वे यादों में खो जाते हैं। वैसे दद्दा की उम्र बहुत अधिक नही है, यही 65-70 के लगभग, पर लोग उन्हें दद्दा कहने लगे हैं, शायद उनके दादानुमा कहानियों और बातों के कारण हो, या गाँव में जिसका नाम जो पड़ जाता है, उसे बूढ़े होने पर भी लोग उसी उपनाम से पुकारते चले जाते हैं। बचपन में अगर कोई बबुआ जी कहलाये तो बूढ़े हो जाने पर भी वे बबुआ ही कहलायेंगे। मुझे याद है कि गाँव में एक दामाद आकर बस गए थे। अब बड़े बूढ़े दामाद जी के पिता जी को मजाक के तौर पर फेटवाला चाप बुलाये होंगे। अब उनका भी पुकारु नाम फेटवाला चाप या छाप हो गया। और इसका वे बुरा भी नहीं मानते हैं।
दद्दा, दद्दा कबसे हो गए, यह किसी को नहीं मालूम। पर दद्दा जब 1971 की लड़ाई के बाद पूर्वी बॉर्डर से सही सलामत लौट आये थे, तो लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया था, जैसे वे बंगलादेश में पाकिस्तान के पूर्वी कमांड के सेना प्रमुख नियाज़ी को सरेंडर कराकर लौटे हों। गाँव के लोगों का अपार स्नेह देखकर वे भी फौज से सेवा निवृत्त होने के बाद अपने परिवार के साथ गाँव में ही रहने लगे।
रमजीता पीपर और गाँव के बीच में पइन है, जो बड़ी नहर से जुड़ा है, इसलिए उसमें हमेशा पानी रहता है। रमजीता पीपर के सामने बड़ा सा घास का मैदान है, जिसमें गाँव के जानवर दिनभर घास चरते हैं। घास के मैदान के पश्चिमी छोर पर देवी स्थान है। कहते हैं कि रमजीता पीपर की जड़ देवीस्थान तक पहुँच चुका है। वहाँ पर कोई पीपल का वृक्ष तो है नहीं, सिर्फ नीम का पेड़ है, इसलिए इसी पीपल की जड़ होगी जो देवी मंडप बनाये जाने में नींव खनन के समय मिली थी। अब दद्दा अनुमान लगाते हैं, कि पाँच सौ वर्ष पुराना तो होना ही चाहिए। हो सकता है कि इस पीपल को जब राम जी का रावण पर विजय प्राप्त हुआ था, यानि विजयादशमी के दिन इसे लगाया गया होगा, इसीलिए इसका नाम रामजीता पीपल पड़ा होगा, जो बाद में रमजीता पीपर हो गया। दद्दा के इस अनुमान में दम है, अतएव सभी लोग इसपर सहमत हो गए कि रमजीता पीपर पाँच सहस्त्र वर्ष पुराना अवश्य है। ऐसी विद्वत चर्चाएं इस पीपल वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर होती रहती थी। इन्हीं चर्चाओं में इसपर भी बात होती थी कि गाँव में किसका लड़का पढ़कर विदेश गया, और वहीं घर लेकर रहने की सोच रहा है। जब मोंट्रियल या सन जोसे में भी किसी को घर खरीदना होता था तो वहाँ से भी वह दद्दा से ही पूछता था कि दद्दा, घर का दरवाजा किस ओर खुलना चाहिए, उत्तर की ओर या पूरब की ओर। दद्दा का वास्तु ज्ञान भी सात समंदर पार तक प्रकाश बिखेर रहा होता था।
दद्दा हर दिन सवेरे पाँच बजे ही पीपर के सामने वाले मैदान पर आ जाते। गाँव के जो लड़के ज्यादा पढ़ाकू किस्म के नहीं थे पर शारीरिक गठन और डिल डौल ठीक था, उन्हें इस मैदान में वह दौड़ लगवाते और वे सारा प्रशिक्षण देते जो सेना में भर्ती के लिए जरूरी होता है। इसके परिणामस्वरूप गाँव के कई नवयुवक सेना और अर्ध सैनिक बलों में चयनित होकर अपनी सेवाएँ दे रहे थे।

अब तो गाँव भी सड़क मार्ग से शहर से जुड़ गया है। शहर के पाँव लंबे होते जा रहे हैं। गाँव सिकुड़ता जा रहा है। सड़क मार्ग से जब शहर गाँव के नजदीक आता है, तो वह अपने साथ शहर की सड़ांध भी लाता है। अब पइन के साफ पानी में शहर का कचरा भी घुलेगा और गाँव के रहवासियों के बीच रहस्यमय बीमारियाँ फ़ैलेगीं। गाँव का बाहरी वातावरण ही विषाक्त नहीं होगा, गाँव के लोगों के बीच का खुलापन भी एक अमूर्त, रहस्यमय चुप्पी में बदलने लगेगा। शहर अनाप - शनाप सूचनाओं का भंडार भी साथ लाता है। उनमें कौन सी सूचना कौन ग्रहण करता है, उस सूचना से अपना मस्तिष्क जागृत करता है या विकृत करता है, यह उसके विवेक पर निर्भर होता है।
उस दिन रमजीता पीपर के चबूतरे पर गाँव के लोग जुटे हुए थे। शिवपूरण के पास ऐसी-ऐसी सूचनाओं का पुलिंदा होता था कि लोग सुनकर दंग रह जाते थे। कहाँ से ऐसे समाचार लाता है। यह तो टी वी और समाचार पत्रों में भी नहीं है। उस दिन भी वह एक ऐसी ही सूचना लाया था। जब भी कोई बात यह कहेगा, तो बात की सच्चाई और अच्छाई को उसमें से चुनना पड़ता है।
नन्हकू बोला था, "देख रहे हैं ना दद्दा, शिवपूरणवा अभी बस से उतरकर इधर ही आ रहा है। जरुर कोई उल्टी- सीधी उटपटांग खबर लेकर आ रहा है।"
सबलोग सशंकित हो उठे थे।
दद्दा को संबोधित करते हुए और अन्य लोगों को सुनाने के लिए उसने कहा था,
"जानते हैं, दद्दा, यह रमजीता पीपर और सारा मैदान सहित सड़क तक की पूरी जमीन का बंदोबस्त सरकार एक भवन निर्माण के कार्य में संलग्न व्यवसायी के नाम करने जा रही है।"
"ये शिवपूरण, ऐसी मनहूस खबर तुम्हीं क्यों लाते हो? तुमने इन खबरों को फैलाने की एजेंसी ले रखी है, क्या?" घनश्याम ने व्यंग्यपूर्ण अंदाज में पूछा, तो शिवपूरण अकचका गया।
"दद्दा, देखिए हमारे बारे में क्या कह रहा है? हम गाँव की भलाई के लिए कुछ कहना चाहते है, तो इसे कुछ और समझा जा रहा है।"
इस बार धनेसर ने कहा था, "ए शिवपूरण भाई, अब गाँव की भलाई के लिए कुछ कहने का नहीं, करने का समय आ गया है। बोलो हमारे साथ मिलकर करने के लिए तैयार हो?"
"हाँ, हाँ तुम लोग योजना की रूपरेखा तैयार करो। हम भला पीछे रहने वाले हैं?" इतना कहते हुए शिवपूरण ने वहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी।
"तुम पीछे ही नहीं रहने वाले हो, पीछे से खिसक जाने वाले हो।" जोर से सुनाते हुए रोहन ने कहा था, ताकि उसके कानों में यह आवाज जरूर पहुँचे।
दद्दा ने सबको संबोधित करते हुए कहना शुरु किया, "देखो भाइयों, ईश्वर करें, शिवपूरण की इस खबर में कोई सत्यता नहीं हो। या किसी ने शिवपूरण को ऐसी खबर फैलाकर गाँव वालों की प्रतिक्रिया जाननी और समझनी चाही हो।"
"जी दद्दा, हमें इसपर विश्वास तो नहीं हो रहा, पर हमें सतर्क तो हो ही जाना चाहिए।" धनेसर ने भी सामुहिक कार्ययोजना बनाने की पहल पर अपनी मुहर लगाई थी।
दद्दा बोले, "कल सुबह आपमें से जितने लोग समय निकाल पाते हों, इसी पीपल वृक्ष के नीचे जमा हों और हमलोग सामुहिक एकजुटता के लिए क्या कर सकते हैं, इसकी योजना बनाएंगे।
सभी लोग अपने-अपने घरों को तो चले, पर दद्दा आज सचमुच व्यथित मन से लौट रहे थे।
◆◆◆◆◆
दद्दा को रात भर नींद नहीं आई थी। वे गाँव के वातावरण के लिए चिंतित थे। गाँव में शहर के उत्पादित विष के घुलने के प्रति आशंकित थे।
सुबह चार बजे ही वे रमजीता पीपर के पास पहुँच गए थे। वे चबूतरे पर चढ़ गए। उन्होंने दोनों हाथों को फैलाकर पीपल के मुख्य तने को अपनी छाती से लगा लिया। जोर-जोर से चिल्लाए, चिल्लाते रहे परंतु वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था। जब उनकी चिल्लाहट पूरे वातावरण में गूंज रही थी। इसके बाद वे फफककर रो पड़े। वे नहीं चाहते थे कि कोई उनकी व्यथा को देखे, उनके अरण्य रोदन को सुने, इसीलिए वे इतना सवेरे आ गए और अपने पूर्वज पीपल से बाते करते हुए रोते रहे।
पूर्व क्षितिज अरुणाभ होना ही चाहता था। पीपल वृक्ष पर पक्षियों का कलरव आरम्भ हो गया था। निशा का अवसान निकट था। पीपल के चिकने पत्तों की सरसराहट और पाखियों के समवेत ध्वनि में प्रकृति के आनंद - कण बिखर रहे थे। सूर्य रश्मियों के धरा पर अवतरण का समय हो रहा था। लोगों का रमजीता पीपर की ओर आना शुरू हो चुका था। नौजवान लोग, जो हर दिन दौड़ लगाकर अपनी ऊर्जा बढ़ाने के साथ-साथ पुलिस और सुरक्षा बलों में प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे थे, वे भी आ चुके थे।
सभी के आ चुकने के बाद दद्दा ने ही पहला संबोधन शुरू किया, "भाइयों एवं नौजवान साथियों, आप लोगों को तो मालूम होगा कि हमलोग यहाँ किसलिए एकत्रित हुए हैं?"
सबों ने समवेत स्वर में कहा, "हमें मालूम है, पर आप एक बार फिर विस्तार से बताइए।"
"तो आप सुनिए: हमारा गाँव शहर के विस्तारीकरण की चपेट में शीघ्र आने वाला है। हमें शहर के विस्तार से कोई आपत्ति नहीं है। किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन हर शहर अभी स्वयं असंतुलित विकास के दुष्परिणामों का दंश झेल रहा है। शहर के कचरे का कहाँ निष्पादन हो रहा है? शहर की नालियों से बहती गंदगी बड़े नालों में जमा होती हैं और उन्हें कहाँ छोड़ दिया जाता है, हम सब जानते हैं? कहाँ मिला दिया जाता है?"
सबों ने जवाब दिया, "नदियों या पास के नहरों में!"
"हम सबों को मालूम है। शहर का कचरा हमारे हरे - भरे मैदानों और खेतों में डंप कर दिया जाएगा। हमारे नहरों में शहर के नालों को छोड़ा जाएगा। आप बताएँ, क्या आप अपने गाँवों को शहर का मल-विसर्जन स्थल बनायेंगें।"
समवेत स्वर में आवाज आई, "कभी नहीं!"
"तो इसके लिए हमें जागरूकता अभियान चलाना होगा। क्या आप इसके लिए तैयार हैं?"
नौजवानों ने एक साथ कहा, "हम तैयार हैं।"
"चार नौजवानों के साथ एक बुजुर्ग या प्रौढ़ मिलकर के टोलियाँ बनायेंगें। ऐसे पर्यावरण संरक्षक दूतों की टोलियाँ शहर के चारों तरफ के हर गाँव में जाएगी। गाँव के निवासियों को जागरूक करेगी। शहर के फैलाव को हम रोकेंगे। इसतरह हम गाँव को शहर का डंपिंग ग्राउंड नहीं बनने देंगें।"
किसी नौजवान ने प्रश्न किया था, "क्या इससे विकास के गति धीमी नहीं हो जाएगी?"
"सही प्रश्न किया है, आपने। हमें विकास होने या विकास को गति देने से कोई डर नहीं है। हमें असंतुलित और अंधाधुंध विकास से डर है, जिससे समस्याएँ बढ़ती चली जाँय। सिर्फ कुछ लोगों की जेबें भरने के लिए क्या हम पूरे पर्यावरण को दूषित करना चाहेंगे?"
प्रश्न सारे नौजवानों की तरफ से ही आ रहे थे, "दद्दा, आखिर यह अभियान कबतक चलाएंगे?"
"आपका प्रश्न सही है, आखिर कबतक? हम यह अभियान तबतक चलाएंगे जबतक शहरों में समुचित कचरा प्रबंधन और निष्पादन की विधि विकसित नहीं होती, जबतक शहर के नाले के पानी का परिष्करण कर उसे शुद्धि की गुणवत्ता के मानकों पर सही नहीं पाया जाता। क्या आपलोग तैयार हैं?"
सभी लोग जोर से बोले, "हम सब तैयार हैं!"
"तो आइए हम सब इस पीपल के तने से लिपटकर यह शपथ लें कि शहरों का पर्यावरणीय संतुलन जबतक ठीक नहीं हो जाता, तबतक उसका गाँव की ओर विकास हम रोकेंगे।"
सभी लोग चबूतरे पर चढ़ गए और दोनों हाथों को फैलाकर पीपल के तने से लिपटकर यह सपथ ली।
यह समाचार तेजी से आग की तरह फैल गया। रमजीता पीपर की शपथ लेकर लोगों ने शहरों का गाँवों की ओर विकास होने की गति पर विराम लगाने की सपथ ली है।
व्यवसायी, जो सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर गाँव में कम भाव में जमीन खरीदकर उसपर गगनचुम्बी इमारतें बनाकर बेचने के सपने देख रहे थे, इस अभियान के कारण सकते में आ गए थे। अब क्या होगा?
उधर गाँव से पर्यावरण संरक्षण दूत दूसरे गाँव में जाकर जागरूकता फैलाने का काम करने लगे। गाँव के लोग पेड़ों के तने से लिपटकर गाँव में पर्यावरण को संरक्षित करते हुए, शहरों को गाँवों की ओर नहीं फैलने देने की शपथ लेने लगे।
भ्रष्ट तंत्र और व्यवसायियों के होश उड़े हुए थे। रमजीता पीपर के सामने के मैदान में मल्टीस्टोरी काम्प्लेक्स खड़े करने की योजना फलीभूत होती नजर नहीं आ रही थी।
उनमें से एक युवा व्यवसायी के प्रस्ताव रखा कि क्यों नहीं मैदान को छोड़कर गाँव के लोगों की जमीन ही खरीद ले जाय। कुछ दिनों के बाद उसका विकास किया जाएगा।
यह विचार बहुत अच्छा लगा। वे लोग इसी कार्ययोजना पर काम करने लगे।
इसके लिए एक ऐसे एजेंट की जरूरत थी जो लोगों के एक वर्ग को पैसे का लालच देकर लाये और उनका जमीन बेचवाये । जैसे-जैसे लोग आते जायेंगें, और अपनी जमीन की बिक्री करते जायेंगें, उस एजेंट का कमीशन भी बढ़ता जाएगा। इसके लिए इस गाँव का शिवपूरण सबसे उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है। उससे संपर्क किया गया। पैसे का तो लालची तो वह था ही। वह झट तैयार हो गया।
कुछ दिनों बाद शिवपूरण अपने प्रयास में सफल होने लगा। पहली बिक्री एक छोटे किसान ने की थी, अपनी लड़की की शादी के लिए उसे रुपयों की तत्काल जरूरत थी। जमीन बेचने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी। यह समाचार दद्दा के पास भी पहुँचा। दद्दा ने कुछ नौजवानों को किसानों से मिलकर जमीन नहीं बेचने की सलाह भी दिलवाई। पर जमीन खरीदने के लिए इतनी अधिक रकम दी जा रही थी कि लोग उसके प्रभाव में आते चले गए।
अंतिम कड़ी उस दिन टूट गयी, जब दद्दा के भाई ने ही अपनी जमीन व्यवसायी के हाथों बेच दी।
दद्दा का हिम्मत टूटने की कगार पर आ चुका था। जब अपने ही घर के लोग बात नहीं समझेंगे तो बाहरी लोग क्या समझेंगें?
जनवरी की कड़ाके की ठंढ पड़ रही थी। कुछ दूरी पर भी इस घने कोहरे में कुछ भी नहीं दिखता था। रात भींगती रही थी। दद्दा का दर्द बढ़ चुका था। सूरज उदास उगता था। उसकी किरणें बीमारी से ग्रस्त हो गयी थी। वे पेड़ - पौधों में भी कोई हलचल पैदा करने में असमर्थ थीं। पक्षियों का कलरव अब रमजीता पीपर पर देर से होता था। पत्ते अब चमकते नहीं थे। पीले होकर जल्दी गिर जाते थे। पत्तों का डालों से बिछड़ना एक शास्वत सत्य था, पर इस सत्य को अनदेखा करना मनुष्य की मति में बैठ चुका था।
ऐसा ही एक दिन था। दिन चढ़ चुका था पर सभी पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, ताल-तलैया अलसाये हुए थे। मनुष्य इससे अलग कैसे रह सकता था। घनश्याम परेशान - सा धनेसर से पूछता है, "अरे दद्दा को देखा क्या?"
"दद्दा सुबह-सुबह रमजीता पीपर के तरफ गए होंगे। चलो-चलो देखते है।"
रास्ते में रोहन और मदन भी मिल गए। उन्हें दूर से ही धुंध में कुछ दिखा था। वे निकट चले गए। जब चबूतरे के पास पहुँचे, तो उन्होंने पीपल के पेड़ के तने से एक कंबल लिपटा देखा था।
देखो किसी ने कम्बल यहाँ पसार दिया है और भूल गया है। चलो कम्बल को ले चलते हैं और जिसका होगा उसे दे देंगे। घनश्याम चबूतरे पर चढ़ गया। रोहन भी चढ़ा। जब दोनों ने मिलकर कम्बल हटायी, तो दद्दा को तने से लिपटा हुआ पाया। घनश्याम दद्दा को कंधे पर पकड़कर जैसे ही दद्दा से कहा, "दद्दा, दद्दा यहाँ अभी तक यहॉं क्या कर रहे हैं?" वैसे ही दद्दा का शरीर पीठ के बल गिरने लगा, तब रोहन ने भी दौड़ कर पकड़ा।
दद्दा का शरीर ठंढा हो चुका था। दद्दा ने रमजीता पीपर और मैदान को तो बचा लिया, परंतु गाँव को नहीं बचा सके!
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©ब्रजेंद्रनाथ



Sunday, May 30, 2021

कहानी लेखक का अंतर्द्वन्द्व और सृजनशीलता (लेख)

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कहानी लेखक का अन्तर्द्वन्द्व और सृजनशीलता

एक सफल रचनाकार अपनी चेतना के विविध स्तरों को जीते हुए, उन्हें अनुभव करते हुए  अपने भीतर के साहित्यकार  के समक्ष पूरी तरह से समर्पित, अहंकार-शून्य सिर्फ़ जब उसे भीतर-भीतर गुनता है तब स्वयं से निकली हुई उसकी रचनाएँ अब उसकी स्वयं की नहीं रह जातीं बल्कि पूरी मानवता की धड़कनें बन जाती हैं ।
साहित्यिक गोष्ठियों में उठती करतल ध्वनियों की अनुगूँज से बेखबर, आज के समय में लाइक्स और शेयर की भूलभुलैया से दूर अपने ही रचना-संसार में जीने की धुरी तलाशता रचनाकार भीड़ से दूर अपनी ही कहानियों, कविताओं से निकलती आवाजों को सुन सके जो उसके ही दिल की आवाजें हैं। ऐसे रचनाकार आज के समय में अपवाद ही कहे जाएंगे।
कभी - कहानीकार अपने पूर्व निर्धारित प्लाट को लेकर आगे बढ़ता है, कहानी से मिलती - जुलती उसके अपने जीवन का भोगा हुआ यथार्थ या अपने आसपास की स्थितियों और परिस्थितियों से बिखरती संवेदनाएं उसे घेर लेती हैं। वह जो कुछ लिखना चाहता था, उससे अलग वह खुद की कहानी गढ़ने लग जाता है।
कभी-कभी कहानी भी पहेली बन जाती है जबतक कलमकार होश में आता है तबतक उसके भोगे हुए पल बहुत पीड़ादायक बन जाते हैं और विडम्बना यह कि उसकी तमाम व्यथा अपरिभाषित रहकर भी अभिव्यक्ति की तड़प, छटपटाहट से भरी हुई अपने अस्तित्व का आकार ढूढने लग जाती है। इसी अपरिभाषित पीड़ा को कहानियों में अभिव्यक्त करने वाले कलमकार जिन्होंने बिम्बों, प्रतीकों का सहारा लेने की कोशिश की है वही  पूरे कथ्य के सत्य के प्रति एक कलकमकार की  व्यथा, उसकी अपनी तड़प, उसकी अपनी तलाश हमारी और आपकी तड़प और तलाश बन जाती है। कलमकार वहाँ सफल हो जाता है।
जो कहानी सहज रूप से आगे बढ़ रही थी, उसमें संवेदनाओं की आँच से उबाल आने लग जाता है। कहानी में अगर संवेदना नहीं हुई और उसका चित्रण नहीं हुआ, तो कहानी मात्र एक रिपोर्ट बनकर रह जाती है।
इसीलिए  कहानियाँ घटनाओं को जोड़ - तोड़कर, सिर्फ मनोरंजन के लिए न पढ़ी जानी चाहिए, न लिखी जानी चाहिए। पाठकों का ध्यान रखा जाना लेखक के मष्तिष्क में अवश्य होना चाहिए, लेकिन इससे लेखक को अगर अपनी उड़ान में बेड़ियाँ जैसा लगे, तो उसे उन बेड़ियों को तोड़ देना चाहिए। लेखक को अपने मन की करने और कहने की छूट होनी ही चाहिए। यह छूट लेखक को उनकी कल्पना के उड़ान के लिए पंख भी देते हैं और पंखों में ताकत भी। लेखक या कलमकार अगर अपने को शर्तों में आबद्ध कर लेता है, तो उसकी रचनाधर्मिता उसी समय मर जाती है। उसके सृजन का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। और जब भी कोई प्रवहमान जलराशि अवरुद्ध ही जाती है, तो उसमें सड़ांध पैदा होने लगती है, जो वैसे लेखकों की रचनाओं में दिखने लगता है। 

©ब्रजेंद्रनाथ

Saturday, May 8, 2021

कोरोना कनेक्शन, चीन के वुहान शहर पर आधारित उपन्यास(लेख)

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#Corona connection #Hindinovelbrajendranath











कोरोना कनेक्शन (उपन्यास)

चीन के वुहान शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित वर्तमान परिस्थितियों को रेखांकित करता, संभवतः यह हिंदी में पहला उपन्यास है। इस उपन्यास के पात्रों के नाम तिब्बती और चीनी हैं। मैं उन नामों का परिचय अपने इस आत्मनिवेदन के अंत में दे रहा हूँ। इस उपन्यास की कहानी तीन पीढ़ियों की कहानी है।
तिब्बत को चीन द्वारा अधिकृत कर लेने के बाद एक पीढ़ी अपनी पहचान को बचाये हुए चीन में जीने की मजबूरी से गुजर रही है। दूसरी पीढ़ी चीन में प्रतिष्ठित नौकरी करते हुए भी कई ऐसी परिस्थितियों को झेलती है, जहाँ हरसमय भय और अपमान के भंवर में खोते जाने का खतरा है। तीसरी पीढ़ी कोरोना के संक्रमण काल में जैसे ही जीना शुरू करती है, चीनी सरकार के वैश्विक महामारी फैलाने के षड्यंत्रों का पता चलता है। चीन के वुहान शहर से फैले कोरोना संक्रमण के बीच पनपती प्रेम कहानी, कोविड 19 के संक्रमण, जिसकी शुरुआत 2003 में ही चीन में हो गयी थी, उसके 2020 में वैश्विक विस्तार की कहानी के बीच पनपती प्रेम कहानी के अन्तर्द्वन्द्व के बीच तिब्बत को चीन के अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए पनपता विद्रोह, चीन के विस्तारवादी नीतियों के परोक्ष विरोध के रूप में भी परिलक्षित होता है। उसके बाद क्या होता है...? अवश्य पढ़ें और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएं...
पात्र:
★जिग्मे फेंग दोर्जी ( fear not Vajra) - -लड़का
वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट में साइंटिस्ट
★ डॉ चेंग उआँग (the morning glory) - जिग्मे फेंग की प्रेमिका- अस्पताल की एक लेडी डॉक्टर।
★डॉ फैंगसुक दोर्जी - पिता, वुहान के एक अस्पताल में डॉक्टर,
★ ली जुआन (beautiful and soft) -- डॉ फैंगसुक की पत्नी और जिग्मे फेंग की माँ।
★डॉ जिग्मे फेंग - दादा , तिब्बती मूल, दलाई लामा के स्वास्थ्य सलाहकार रह चुके थे।
★डॉ शी जिंगली- विरोलॉजी इंस्टिट्यूट की डाइरेक्टर

इस उपन्यास के साथ अपकी साहित्यिक यात्रा की शुभकामनाओं के साथ:
आपका शुभेक्षु
ब्रजेन्द्रनाथ
मेरा यह उपन्यास अमेज़ॉन किंडल के दिये गए लिंक से डाउनलोड कर पढ़ा जा सकता है। आप अपने डिजिटल लाइब्रेरी में इसका संग्रह कर अवश्य पढ़ें। सैंपल डाऊनलोड कर आप देख सकते हैं। यह बिल्कुल फ्री है।
संतुष्ट होने पर इस लिंक पर जाकर पूरी पुस्तक (387 पृष्ठ) डाउनलोड कर पढ़ें और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएं। सादर!
ब्रजेंद्रनाथ

लिंक: https://www.amazon.in/dp/B08Y64BNCQ/ref=cm_sw_r_wa_apa_8JHMVF56K296R4AJG41G
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Sortened link: amzn.to/3bXev3S


इसी उपन्यास का अंश...

डॉ शी ने आगे कहना जारी रखा, "जिग्में, मैं जब तुमसे यह सुना रही हूँ, तो मेरा शरीर कंपित हो रहा है, मेरा गात्र  अनिर्वचनीय आंनद और दर्द की अनुभूति से भर रहा है। 

मैंने अपने लंच बॉक्स से स्लाइस्ड ब्रेड और योगर्ट के साथ एक निवाला बनाया और उसके मुँह में रखा था। वह भूखों की तरह निवाला गटकता जा रहा था। वह बोल भी रहा था, 'तुम भी खाओ। मैंने इतना स्वादिष्ट भोजन आजतक नहीं खाया। तुम्हारे हाथों से होकर मेरे हृदय और आत्मा तक उतरता जा रहा है।'

वह आंखें मूंदे हुए भोजन के हर कण का आनंद ले रहा था।

मैंने कहा था, 'बॉक्स में वही सारी खाद्य सामग्री है, जो रहा करती है। तुम्हें इतनी जोरों की भूख लगी है कि इस भोजन का हर कण तुझे स्वादिष्ट लग रहा है। इसके प्रिपरेशन में कोई खास तकनीक का इश्तेमाल नहीं किया गया है।"

'परंतु इसमें खिलाने वाले के हाथों की सुगन्ध जो घुली है। इसीलिए इसका आनंद चिरस्थाई, शाश्वत हो गया है।'

"इसका अर्थ मैं बिल्कुल नहीं समझ पायी।" मेरी इस टिप्पणी पर वह हँसा था। उसकी यह हँसी मैं पहली बार देख रही थी। मैंने जब भी उसे देखा, गंभीरता ओढ़े हुए ही देखा था। 

लड़कियों की बेवकूफी भरी टिप्पणी पर लड़कों को हँसना अच्छा लगता है। उसने मुझे बुद्धू समझते हुए समझाना शुरू किया था, “इसका सीधा अर्थ यही है कि भोजन का स्वाद तुम्हारे हाथों की सुगंध के साथ मिलकर बढ़ गया है, और मैं अगर सच कहूँ तो तुम्हारे द्वारा दिए गए हर निवाले के साथ बढ़ता चला गया है।”

“तो स्वाद भोजन सामग्री में नहीं, मेरे हाथों की सुगंध में है। फिर तो मेरे ओठों के स्वाद का आनंद और भी…  तुमने अभी क्या कहा था .. ?”

“शाश्वत और चिरस्थायी।”

“हाँ, वही होगा।”

यह सुनते ही उसका चेहरा लाल हो गया था। उसका चेहरा दमकने लगा था। वैसी दीप्ति मैंने उसके चहरे पर नहीं देखी थी। 

उसने थोड़ा संयत होते हुए कहा था, “जिस गंध का स्वाद तुम्हारे ओठों में है, क्या वह शरीर की आसक्ति नहीं है?”

मैंने तर्क दिया था, “शरीर या कहें ठोस और सूक्ष्म प्रकृति की आसक्ति के खेल से यह सारा जगत भरा है। क्या नदी, अम्बुधि की ओर मिलनातुर हो वेगवान प्रवाहित नहीं हो रही है? क्या पादपों की फुनगियाँ हवा के झोंके से झूमते हुए एक - दूसरे का स्पर्श नहीं करते हैं, एक - दूसरे को चूमते नहीं हैं? क्या उन्मत्त बादल पहाड़ों की चोटियों के उभारों पर घिर नहीं जाते हैं? क्या उन्हें अपने आगोश में लेकर रस - सिंचन नहीं करते हैं? जिसे हम जड़ प्रकृति कहते हैं, जब वही प्रेमातुर हैं, तो हम चेतन जीवों की रसास्वादन वृत्ति तो और भी अधिक है। क्या हमें उस ओर नहीं बढ़ना चाहिए?”

मेरे इस तर्क पर  वह निरुत्तर हो गया था। परन्तु वह अभी भी संतुष्ट नहीं हुआ था। वह कायल नहीं हुआ था। मैंने कुछ और तर्क जोड़ने शुरू किये, “इस जगत में जो कुछ सुन्दर है, उसका नयनों से रसपान वर्जित नहीं है। तुम भी सुन्दर पुष्पों को, रंग - बिरंगी तितलियों को फूलों पर मंडराते हुए, इंद्रधनुष के रूप में क्यूपिड (कामदेव) की खिंची हुई प्रत्यंचा को देख सकते हो। यह सब प्रेम - निमंत्रण नहीं तो और क्या है? 

उसने अपने अंदर पड़े संस्कारों को अपने विचारों में पिरोते  हुए कहा था, “जो नेत्रों से दृष्टिगत होता है, वह रक्त के आवेग का सिंचन नहीं है, रूप की अर्चना का मार्ग आलिंगन नहीं है।”

मैं उसकी दार्शनिक विवेचना के आगे मौन होती जा रही थी। उसकी वाणी में सम्मोहन था और उसके विचारों में जीवन के नए अर्थ को उद्घाटित करता हुआ दर्शन था। इसी उम्र में इतनी परिपक्वता उसने कहाँ से प्राप्त कर ली थी?

उसने एक और विचार प्रस्तुत किया, “तन के मांसल आवरण को हटाकर, जैसे ही रूप के सागर में कोई उतरना  चाहता है, उसके सारे उद्देश्य उस भ्रमर की भांति निष्फल हो जाते हैं। भ्रमर मधु - संचयन के लिए पुष्पों की कोमल पंखुड़ियों पर डेरा जमाता है। जब मधु उसके पंखों में भर जाते हैं, वह उड़ान भरना चाहता है। 

उसके  मधु - सिक्त पंख खुल नहीं पाते हैं, और अगर खुल भी जाते हैं, तो पूरी शक्ति लगाकर वह उड़ान भरता है, परंतु मधुवन का आकर्षण उसे पुनः नीचे खींच लेता है। वह इसी सांसारिक कृत्य में बंधा रह जाता है और जीवन का पाथेय विस्मृत हो जाता है।”
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आगे और भी है....



Saturday, May 1, 2021

चलो इस कोरोना काल में अजनबी बन जाएं हमदोनों (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#coronapiem#parody#पैरोडी








फिल्मी गाने पर पैरोडी
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गीत के बोल: चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों
गीतकार: साहिर लुधियानवी
गायक: महेंद्र कपूर, संगीतकर -रवि, फ़िल्म: गुमराह

नज्म:
  इस कोरोना काल में अजनबी बन जाएं हम दोनों।

न मैं तुमसे मिलूं, ना नजदीक आऊं,
तुम मेरी तरफ देखो मगर कुछ दूर रहकर,
न तेरे अल्फाज लड़खड़ायें मास्क में फंसकर,
न लिपस्टिक वाले ओठ तुम्हारी उल्फत का राज खोले।

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पास आने से,
मुझे भी डर लगा रहता है, तुमसे दूर जाने से।
बचा लिया है, इस जमाने में कई आशिकों के
मुहब्बत को, इस कोरोना ने, बदनाम होंने से।

जब कोई रोग आकर हो खड़ा
तो दूर रहना बेहतर
दूरी बनाना जीने का दस्तूर बन जाये
तो दूर रहना अच्छा।
ये कहानी जिसे मुकम्मल करना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर भूलना अच्छा।

चलो इस कोरोना काल में अजनबी बन जाएं हम दोनों।
©ब्रजेन्द्रनाथ


Friday, April 9, 2021

मास्क लगाना जरूरी है (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#mask #masklaganajaruri









(फ़ोटो गूगल से साभार)

मास्क लगाना जरूरी है

जब कोहरा होने लगा हो घना,
तमिस्रा की फैलने लगी चादर।
टिड्डियों के दल घेरने लगे हो,
शाखों पर आने लगे चमगादड़।

कोई अपशकुन की आशंका से
स्वयं को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।

जब विष व्याप्त होने लगा हो,
नीले अम्बर में धुआँ - धुआँ हो।
कोई भी राह दिख नहीं रही,
उठ रही धूल भरी आँधियाँ हों।

ऐसे में धूल और धुआँ से,
स्वयं को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।

मानव ने किया है अतिक्रमण,
स्रोतों का करता रहा है दोहन।
धरती की कोख से फूटा लावा,
प्रकृति शुरू करेगी विष वमन।

ऐसे में व्याप्त विष प्रवाह से
स्वयं को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है ।

इस संकट काल में उलझन से,
कीटाणुओं के कटीले चुभन से।
कोरोना विषाणु के संक्रमण को,
स्व अनुशासन के अनुसरण से।

सोशल डिस्टेंसिनग रखते हुए
सबको को बचाना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।

कोरोना का बढ़ता संक्रमण,
सावधानी का भूले नहीं चलन।
भीड़- भाड़ से दूर- दूर ही रहें,
कोरोना को मत दें निमंत्रण।

हर रोज पांच मिनट भाप लें,
कोरोना को मात देना जरूरी है।
मास्क लगाना जरूरी है।


©ब्रजेन्द्रनाथ

Sunday, April 4, 2021

पात पात विहँस रहा प्रात (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#nature #poemonnature











पात - पात बिहँस रहा प्रात


व्योम की नीलिमा में खोजता पथ,
कौन आ रहा, चढ़ा वह रश्मिरथ।

लालिमा में लुप्त हो रही रात,
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

तरु-शैशवों से फूट रहीं कोंपलें,
क्यारियाँ में केसर के सिलसिले।

कामिनी जाग रही, सो रही रात।
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

अरुणोदय में खुले कमल-दल-पट,
कैद भ्रमर सांस लेने निकला झट।

हरीतिमा में स्वर्णिमा आत्मसात।
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

पर्वतों से सरक रही धवल-धार,
प्रकृति नटी कर रही नित श्रृंगार।

शिखरों से झाँकता अरुण स्यात,
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

वृक्षो से लिपट रही लतायें,
संवाद में रत तरु शाखाएं।

अरुनचूड़ बोल उठा बीत गयी रात।
पात - पात बिहँस रहा प्रात।

©ब्रजेंद्रनाथ


मेरी इस कविता का  मेरे  यूटुब चैनल  maramagya net का लिंक नीचे दे रहा हूँ:

 https://youtu.be/wW6I93dHJik


मेरी इस कविता पर, संस्कृत और हिंदी भाषा के उदभट विद्वान आदरणीय उमाकांत चौबे जी के व्हाट्सएप्प वाल से प्राप्त प्रतिक्रिया मैं यहाँ दे रहा हूँ:

मिश्र जी, यह प्रकृति से सम्बन्धित  अद्भुत रचना है |जिस तरह सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते है, उसी तरह आपने भी इस रचना में प्रकृति की विवेचना की है | सचमुच आप  काव्य प्रतिभा के धनी है |पात पात बिहॅऺस रहा प्रात, इस पंक्ति के माध्यम से आपने प्रकृति की प्रातःकालीन सुन्दरता का वर्णन किया है |मिश्र जी आप साहित्य जगत् के गौरव है | इस सतत साहित्य साधना के लिए मैं शुभकामना देता हूँ |

उमाकांत चौबे







Sunday, March 28, 2021

अलसाया तन बौराया मन.(कविता)

 #BnmRachnaWorld

#poemonholi




फागुनी  (नव)गीत  

अलसाया तन, बौराया मन,
कल्पना का नहीं ओर छोर.
कोयल भी कूक रही मीठी - सी धुन,
बगिया में गदराया अमवां का बौर।


लाल रंग फ़ैल गया यहां - वहाँ,
लहक गया, दहक गया पलाश वन।
आँखें टिकी हुई चौखट पर,
पिऊ संग कब होगा मिलन।


फाग का राग बन आ गई होली भी,
अब तो घर आ जा मेरे सजन।
बयार भी चुभ रही काँटा बन,
मन हुआ बावरा, बिसर गया तन।


आँगन में सास मेरी खाट डाले हुए,
देहरी पर है ससुर जी का पहरा।
मन तो लांघ जाता सारी हदें, 
मर्यादाएं  
कैसे तोडूँ,  पांव ठिठक ठहरा।


आँखे थी टकटकी लगाए हुए,
पड़ती रही ढोलक पर थाप पर थाप।
चुनरी भींगो गयी कोई सहेली मेरी,
पर न मिट पाया मन का संताप।

©ब्रजेंद्रनाथ


Monday, March 22, 2021

कैसी हो देशभक्ति (लेख)

 #BnmRachnaWorld

#patriotic essay










(तस्वीर गूगल से साभार)

कैसी हो देशभक्ति?

सीमा पर लड़ना देशभक्ति है। परंतु सिर्फ सीमा पर लड़ना ही देशभक्ति नहीं है। देश में रहते हुए देश के लिए जीना भी देशभक्ति है। कैसे?

अगर आप सामान्य जीवन जीते हुए निर्धारित नियमों का पालन करते हैं, तो आप देशभक्त हैं। अगर आप अपनी जरूरत के मुताबिक जल का उपयोग करते हैं, अगर आप अनावश्यक बिजली नहीं जलाते हैं, (जिसमें अनावश्यक टीवी देखना भी है), अगर आप छोटे-छोटे काम के लिए थोड़ा चलकर पेट्रोल बचाते हैं, अगर आप सारे पेमेंट डिजिटली करते हैं, अगर आप सरकारी कामों के लिए अतिरिक्त सेवा शुल्क नहीं देते हैं, अगर होटलों में टिप नहीं देते हैं, अगर आप राजधानी या अन्य प्रीमियम ट्रेनों में सर्विस देने वाले को टिप नहीं देते हैं, अगर आप किसी भी दफ्तर में भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध पी एल आई दाख़िल कर संघर्ष करते हैं, अगर आप किसी भी पद पर रहते हुए ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, अगर आप नेता के रूप में देश की सेवा करते हुए सरकारी सुविधाओं का कम से कम उपयोग करते हैं, अगर आप शिक्षक के रूप में अपने आचरण द्वारा विद्यर्थियों में अच्छे आचरण के बीज डालते हैं, अगर आप किसी भी गलत कार्य के विरुद्ध संघर्ष के लिए उठ खड़े होते हैं, अगर उच्च पद पर आप अपने कार्यों के निष्पादन में पारदर्शिता अपनाते हैं, अगर आप अपने व्यवसाय के किसी भी क्षेत्र में ग्राहकों का ख्याल रखते हुए ईमानदारी बरतते हैं, अगर आप देश के अंदर स्थित जयचंदों को समूल नष्ट करने का कड़ा कदम उठाते हैं, अगर आप देश में कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति के लिए सबकुछ करने को तैयार रहते हैं, तो आप देशभक्ति को ओढ़ने, सोने , बिछाने और  हृदय में उतारने वाले सबसे बड़े देशभक्त हैं।

©ब्रजेन्द्रनाथ

Tuesday, March 9, 2021

विश्व महिला दिवस पर (लेख)

 #BnmRachnaWorld

#worldwomenday













यह लेख विश्व महिला दिवस को समर्पित है।

सबसे पहले विश्व महिला दिवस की अशेष शुभकामनाएँ!

मैंने एक कविता लिखी थी जब तीन मगिलायें पहली बार पायलट बनी थीं। उसे साझा करना चाहता हूँ:

चीर नापने नभ को

(भारतीय वायुसेना में तीन महिलाओं, अवनि चतुर्वेदी, मोहना सिंह जितवाल, भावना कंठ  को 2016 में पहली बार पायलट बनने पर।)

चल पड़ी वह लाँघ देहरी,
चीर नापने नभ को,
अग्नि-दाह से भस्म करने
अरि-समूह-शलभ को।

पहन वेश सेनानी का 
वह बनी देश की शान है।
धूल चटाने दुश्मन को
छिड़ा समर - अभियान है।

देखो वह नीले पथ पर,
गगन में भर रहा उडान।
घहरात पवि - सा विराट
स्वर ध्वनित गुंजायमान।

वह वायु-युद्ध की सेनानी,
बरसाएगी अग्निवाण। 
भयाक्रांत विवर्ण शत्रु का
मर्दन करेगी मिथ्या मान। 

अम्बर में गरजा विमान,
घिर गया गिद्धों का झुंड।
ध्वस्त हुए आतंक - शिविर
बिखर गये उनके नर मुंड ।

शत्रु की छाती का शोणित
रण चंडी बन पान करेगी।
भारत माँ की बिन्दी को
पुत्रियाँ प्रभावान करेगी।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

"यंत्र नार्यस्तु पूज्यन्ति रमन्ते तंत्र देवता"
यह शास्त्रों में सिर्फ लिखा नहीं है, इसे मैंने महसूस किया है। भारतीय समाज की उन्नति को स्त्रियों के सम्मान के स्तर पर ही आंका जाता है। स्त्रियों के शोषण पर आधारित मान्यताओं को हमारे सामाज ने ही ध्वस्त किया है। यहां देवताओं का अवतरण भी माँ के गर्भ से ही हुआ है। गार्गी, लीलावती जैसी विदुषी नारियों की जन्मस्थली भी यह देश रहा है।
साहित्य के क्षेत्र में भी नारियों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। मीरा, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, ममता कालिया, कृष्णा सोबती, निर्मला सिन्हा, मालती जोशी आदि। नारियाँ "आँचल में दूध और आंखों में पानी" के युग से "चीर नापने नभ को" के युग में प्रवेश कर चुकी हैं। इस वास्तविकता से पुरूषों को शीघ्र ही अपनी समझ में सुधार, ( अगर जरूरत हो तो), करने की आवश्यकता है।
आपसी समझ से समरसता के विकास और पोषण के द्वारा ही हमारा समाज आगे बढ़ता रहा है। महिलाएँ, पुरुषों की सहभागिनी हैं, इसलिए उनके साथ संवेदना और सहानुभूति की नहीं, सहृदयता और सदाशयता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बढ़ने की जरूरत है।
नारियाँ जिस मंजिल को हासिल करने के लिए आगे बढ़ती हैं, उनकी उड़ान के लिए उन्हें सशक्त बनने की आश्यकता है, नए क्षितिज के नए आसमान स्वयं खुलते चले जायेंगें।

©ब्रजेंद्रनाथ


Monday, February 22, 2021

प्रकृति नटि कर रही श्रृंगार है (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#naturepoem










प्रकृति कर रही श्रृंगार है


सरस शुभ्र, फेनिल जल,
सरित - वारि प्रवाह अविरल
अरुण - किरणों का तरुओं
से हो रहा संवाद अविचल।

जीवनानंद ले रहा विस्तार है। 
प्रकृति नटी कर रही शृंगार है।

पादपों की लंबी कतारें,
गगन को चूमती फुनगियाँ।
धरा ओढ़े पीत चूनर
मगन ज्यों प्यारी दुल्हिनियाँ।

स्वयं समष्टि कर रही संवार है।
प्रकृति नटी कर रही श्रृंगार है।

एकत्र जलराशि अतल तल
ले रहा विस्तार झील ।
अम्बर झाँक रहा दर्पण में,
घुल गयी है जल में नील।

करूँ नर्तन, कर रही विचार है।
प्रकृति नटी कर रही शृंगार है।

मलय पवन, शान्त विचरण
मादक फैल रही गंध है।
भ्रमर स्वर गुंजित प्रतिपल
पुष्प पर शोभित मकरंद है।

सप्तरंगों की छा रही बहार है।
प्रकृति नटी कर रही शृंगार है।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र


मेरी इस कविता पर आदरणीय सुरेश दत्त पाण्डेय जी का फेसबुक पर लिखी गयी समीक्षा देने से मैं अपने को नहीं रोक पा रहा हूँ:

मेरे फेसबुक वाल  से 24 फरवरी 21को प्राप्त:

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जमशेदपुर द्वारा आयोजित "वासंती काव्य-गोष्ठी,"के आयोजन के लिए भाई वसंत जमशेदपुरी को साधुवाद।

कभी कथा-साहित्य के लिए पहचाने जाने वाले प्रियवर ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र इन दिनों शिद्दत के साथ काव्य-मंचों पर भी शिरक़त कर रहे हैं,यह सुखद है। वे वर्षों से साहित्य-साधना में लगे हुए हैं एवं नगर के वरिष्ठ रचनाकारों में शुमार होते रहने के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी जगह बनाने के लिए प्रयासरत हैं।

ब्रजेंन्द्र की  कविता "कर रही श्रृंगार", "वासंती-नवगीत की खुशबू  लिए हुए है।प्रथम चार पंक्तियां पढ़ते हुए ही अपनी लयात्मकता का परिचय दे देती है-

संरस-शुभ्र, फेनिल-जल,

सरित-वारि प्रवाह अविरल

अरुण किरणों के तरुओं से

हो रहे संवाद अविरल ।

स्वयं समष्टि कर रही संवार है,

प्रकृति-नटी कर रही श्रृंगार है।"

क्या खूब लिखा है ब्रजेंद्र जी ने। शब्द कोमल है, प्रकृति-प्रसंगो के संगत एवं अनुकूल अपनी रागात्मकता बनाए रखते हैं। तत्सम शब्दों के उपयुक्त प्रयोग से कविता जीवंत बन पाई है।निराला-जयंती के लगभग रची इस कविता द्वारा प्रकृति का अभिनन्दन करने के साथ-  साथ महाप्राण निराला को श्रृद्धांजलि अर्पित भी की है कविवर ने। बधाई ऐसी सुंदर कविता के लिए ब्रजेंन्द्र भाई को।

*सुरेश दत्त प्रणय।


Tuesday, February 9, 2021

कहानी पर टिप्पणी (लेख) संस्मरणात्मक

 #BnmRachnaWorkd

#laghukatha










कहानी पर टिप्पणी

" अरे भाई साहब, कोई ट्रेन छूट रही थी क्या जो कहानी को एकदम से पूरा कर दिया। क्या यार पता ही नहीं चला।"
हिंदी पाठकों द्वारा सबसे अधिक पढ़े जाने वाले वेबसाइट 'प्रतिलिपि' पर प्रकाशित मेरी कहानी "मुस्कान को घिरने दो" पर आई इस टिप्पणी को पढ़कर पहले मुझे बहुत गुस्सा आया। अभी तक किसी पाठक ने मेरी इस कहानी पर इस तरह की टिप्पणी नहीं दी थी। कुछ पलों बाद मैं संयत हुआ।
वैसे भी मेरी यह आदत है, जब बहुत गुस्सा आ रहा हो, तो न मैं मौखिक रूप से किसी को जवाब देता हूँ और न ही लिखित रूप में। कुछ पलों बाद मैं संयत हुआ और मैने उसका प्रतिउत्तर लिखना शुरू किया:

आदरणीय ........ जी, आपकी टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार! आपकी असंयत, अशिष्ट, असाहित्यिक और अनैतिक टिप्पणी से लगता है कि आपने हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ लेखकों को नहीं पढ़ा है। यह कहानी है, कोई उपन्यास या धारावाहिक सीरियल या वेबसीरिज नहीं है, कि वह रबर की तरह खिंचती जाएगी। कोई भी टिप्पणी करने के लिए आप निर्मल वर्मा, हिमांशु जोशी, नरेंद्र कोहली, आदि कहानीकारों को जरा पढ़ा कीजिये। मैं इन कहानीकारों के करीब भी नहीं हूँ। लेकिन उस ओर मार्ग पर चलने के लिए प्रयत्नशील हूँ। टाइम पास के लिए अगर कहानियाँ पढ़नी हो तो, और भी कई लेखक है। मैंने अपनी कहानी के अंत में नोट में लिख दिया है, कि आपके संयत, शालीन, शिष्ट, नैतिक और साहित्यिक प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। उसमें किसी भी मानक पर आपकी प्रतिक्रिया सही नहीं उतरती। इसलिए प्रतिक्रिया सोच समझकर दिया कीजिये। सादर!
--ब्रजेंद्रनाथ
इस टिप्पणी को लिखते हुए मेरे मन में कई विचार उठ रहे थे। मैं या मेरे जैसे अन्य सज्जन और सकारात्मक विचार रखने वाले लेखक इसे अनदेखा या नजरअंदाज कर सकते थे। परंतु इससे उन पाठक महोदय को इसका ज्ञान कैसे होता कि जब आप कोई साहित्यिक रचना पढ़ रहे हों, तो आपकी ग्रहणशीलता का भी एक स्तर होना चाहिए, जिससे आप रचनाकार की रचना के विभिन्न बिंदुओं को इंगित करते हुए रचना पर अपनी समीक्षा दे सकेें। इसके लिए आप रचना की मौलिकता, कथा-शिल्प, प्रस्तुति, भाव- भूमि, संदेश आदि पर लेखक से अपने संवाद कायम करते हुए, अपने विचार संयत, शालीन और शिष्ट भाषा में रख सकते थे। कविवर मैथिली शरण गुप्त ने अपने काव्य जयद्रथ बद्व में लिखा है:
अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है ।।

न्याय के अर्थ को सुदृढ करना आवश्यक था, इसीलिए इसकी चर्चा आवश्यक थी। परंतु अगर लेखक की सज्जनता और
संतत्व पर विचार किया जाय तो गोस्वामी तुलसी दास की यह चौपाई याद आती है,
"काटहिं परसु मलय सुनु भाई।
निज गुण देही सुगंध बसाई।।"
संत ऐसे होते हैं जैसे चंदन को काटने वाली कुल्हाड़ी में भी चंदन जैसा अपना सुगंध बसा देते हैं। इसके आगे तो यह भी प्रश्न शेष रह जाता है कि क्या कुल्हाड़ी उस गंध को अपने में समाकर रख पाता है? अगर ऐसा होता तो कोई भी कुल्हाड़ी फिर किसी चंदन के तने या डाल पर नहीं चलती। चंदन को कुल्हाड़ियों से अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी, आज के समय का यही युगधर्म है। संत को भी अगर अपने संतत्व को संभालना है, अपने स्वभाव के प्रभाव को सुस्थिर रखते हुए निरंतरता प्रदान करनी है तो राम की तरह पहले अनुनय-विनय और फिर महाप्रलय की तरह टूटना पड़ेगा:
विनय न माने जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होहि न प्रीत।
आगे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है:
शठ सन विनय कुटिल सन प्रीति।
सहज कृपण सन सुंदर नीति।।
ममता रत सन ज्ञान कहानी।
अति लोभी सन विरति बखानी
कामिहि क्रोधिहि सम हरिकथा।
ऊसर बीज बाए फल यथा।।
यही समय सापेक्ष युगधर्म है।
मैं ऐसे विचारों को धारण कर दृढ़ करते हुए उस टिप्पणी को पटल पर पोस्ट करने ही जा रहा था कि मेरे एक वरिष्ट लेखक मित्र का कॉल आया। वे कह रहे थे कि आजकल आपकी कहानियाँ कितनी भी सरल क्यों न हों पाठक का आपकी कहानियों को पढ़ना और पसंद करना आजकल के ट्रेंड पर निर्भर करता है। इसलिए कभी - कभी किसी पाठक की प्रतिक्रिया असंयत भी हो सकती है। इससे हम लेखकों को किंचित भी विचलित नहीं होना चाहिए। हमें पाठकों की रुचि के परिष्कार की भी जिम्मेवारी है। उन्हें समझाना भी हमारी जिम्मेवारी है। उनकी बातों ने लेखकों की जिम्मेवारियों का भी अहसास हमें करवाया। आज हम रचनाकार दोहरे उत्तरदायित्व - बोध से गुजर रहे हैं। हमें पाठकों की वृत्ति और प्रकृति को भी परिष्कृत और प्रक्षालित करते हुए आगे बढ़ना होगा। इस भाव के आते ही मैंने पूर्व लिखित टिप्पणी डिलीट कर दी, हटा दी।
©ब्रजेंद्रनाथ 


नोट: मेरी उक्त कहानी "मुस्कान को घिरने दो" मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस् लिंक पर जाकर मेरी आवाज में सुन सकते हैं:

भाग 1 : https://youtu.be/AAcrg_7O724

भाग 2: 

https://youtu.be/qYvMKDx5bW4

भाग 3:

https://youtu.be/ARNs-NVRrHI




Monday, February 1, 2021

नमन सशत्र बलों के धैर्य को (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#poempatriotic










ऐसे तत्वों का संकट काल आएगा


तिरंगे को लज्जित करने वाले,
तुझमें कोई भी संस्कार नहीं।
तुम अपने जो कुछ भी कह लो,
पर भारत से तुझको प्यार नहीं।

इस ध्वज की खातिर देश के
कितने वीरों ने दी थी कुर्बानी।
कितने माँओं की गोद हुई सूनी,
बहनों की सूनी सुहाग - निशानी।

तुझपे लज्जित होगी माता तेरी,
क्यों ऐसा पुत्र मैंने बड़ा किया?
तुझपे लज्जित होगी कायनात,
क्यों ऐसे शैतान को खड़ा किया?

तूने विदेशी पैसों की लालच में,
माँ का आँचल तार - तार किया।
तू अफीम, हेरोइन के नशे में चूर,
देशहित का सरेआम व्यापार किया।

जो देश का मान मिटाएगा,
जो देश की शान गँवायेगा।
देश के गौरव को गिरायेगा,
वह मिट्टी में मिल जाएगा।

आंदोलन की आड़ लेकर
देशद्रोह को पालने वाला है।
यह किसान नहीं हो सकता है,
उनको लांछित करनेवाला है।

जिसने पत्थर सहकर भी
अपना धैर्य नहीं खोया।
है नमन उन सशस्त्र बलों को
उनका शौर्य नहीं था सोया।

सिरफिरों पर वार नहीं करके,
वर्दी को नहीं किया कलंकित।
कायरों की गीदड़ भभकियों पर,
खामोश रहे, नहीं हुए विचलित।

उन वीरों की धैर्य परीक्षा को
शब्द - सुमन अर्पित करता हूँ।
उन धीर - वीर गंभीरों को अपनी
स्याही का शौर्य समर्पित करता हूँ।

यह देश अब ऐसे कृत्यों को
कभी माफ नहीं कर पायेगा।
ऐसे तत्वों का संकट - काल,
अब आएगा, अवश्य आएगा।

©ब्रजेंद्रनाथ

Monday, January 25, 2021

पराक्रम दिवस और 72 वाँ गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#patriotic poem
















पराक्रम दिवस और गणतंत्र दिवस पर कविता:

अब देश जाग्रत हो रहा,
नेताजी को जल्द बुलाओ।
सो रहा जो युवा आज,
उसे उठाओ, उसे जगाओ।

नई क्रांति की चलो बालो मशाल
इस गणतंत्र नहीं हैं कोई भी सवाल।

पराक्रम दिवस पर नेताजी के
तप को आत्मसात करो।
उस स्वतंत्रता के मतवाले का
युद्ध घोष ले साथ चलो।

जाग रहा है देश  
नाच रहा है अरि पर काल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬🇪🇬

भारत नही त्रिपिटक लेकर
अब शांति प्रस्ताव पढ़ता है।
देश सत्य के लिए जीत की
परिभाषा खुद गढ़ता है।

विश्व समझे भारत की दृष्टि विशाल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

जो रहे अब तक भ्रम में
गंगा- जमुनी तहजीब रटा करते थे।
जो रहे अब तक घात क्रम में,
देश को जर्जर किया करते थे।

उनकी पहचान हुई, टूटा भ्रमजाल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

अब वीर देश की जीत का
मुकुट धारण करता है।
प्रलय के मेघों का मुख मोड़
चट्टानों में राह बनाया करता है।

देश दुश्मनों की ताड़ चुका हर चाल।
इस गणतंत्र नही है कोई भी सवाल।

कुछ छद्म बुद्धिजीवी क्यों,
आस्थाओं पर करते हैं प्रहार?
उन्हें पता होना चाहिए,
नहीं देश को यह स्वीकार।

समझो हमारी भाषा वरना जाओगे पाताल।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल।

आओ देश के लिए जगाओ अंगार को,
आओ देश के लिए स्वर दो हुंकार को।
आओ देश के लिए गुंजाओ दहाड़ को।
आओ देश के लिए झुकाओ पहाड़ को,

जवानियों में धधक रहा है लाल - लाल ज्वाल ।
इस गणतंत्र नहीं है कोई भी सवाल ।

©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, January 13, 2021

स्वामी विवेकानंद (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#स्वामी विवेकानंद #swamivivekanand


स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी पर,

मेरे उदगार!







विवेकानंद

वेदांत का सूर्य था वह,
सनातन धर्म का तूर्य था वह।
उसके आनन पर था तेज मनस्वी ,
उसकी वाणी में था आवेग ओजस्वी।

उसने विश्व मंच पर
प्रकट किया भारत का तेज पुंज।
उसके उद्घोष से
सनातन धर्म की फैली थी गूंज।

सम्मोहक था रूप, आंखों में करुणा अपार,
विश्व धर्म संसद में फैला हृदय का विस्तार।

वह युवाओं का करते आह्वान,
भारत हमारा फिर से हो महान।
वह उद्दत थे काटने को
भारत माँ की जंजीरें।
वह ढाहने को सजग थे
गुलामी की खड़ी प्राचीरें।

वह योगी निर्लिप्त, निष्काम,
वह योगी समेटे करुणा तमाम।
वह सन्यास की अग्नि में
स्वयं को तपाया करते थे।
वह युवाओं में आगे बढ़ने को
विश्वास जगाया करते थे।

आएं उनके पद चिन्हों पर
अपना भी चरण बढ़े।
भारत का हो उत्कर्ष
फिर यह विश्व गुरु बने।
©ब्रजेंद्रनाथ √

यही कविता आप यूट्यूब पर मेरी आवाज़ में सुने :



Friday, January 1, 2021

नवर्षगामन पर विशेष (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#poemonnewyear








नव वर्षागमन पर विशेष कविता
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन!

प्रकृति भी कर रही नव श्रृंगार है,
दिशायें भी खोल रही नव पट-द्वार हैं।
मधु बरस रहा, हेमंत भी तरस रहा,
लताओं, पुष्पों से सजा बंदनवार है।

धुंध में घुल रहा सुगन्धित सा - मन ।
नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन!

साँसों को आशों में बंद करने दो,
अहसासों को विश्वासों के छन्द रचने दो।
बारुदें बहुत बो चुके हो तुम सालों से,
हमें नेह- तुलसी के बीजों को भरने दो।

एक नया सन्देशा ला रहा पवन।
नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन!

दिल पर दस्तक, यादों ने दिया,
तन की देहरी पर सांसो का दिया।
झुक गया सूरज लिये धूप सांझ की
पांती भी ना आई जलता रहा जिया।

नेह की बाती जलती रही प्रति क्षण
नव  वर्ष का कैसे करे अभिनंदन?

जो नित्य असि धार पर चल रहे हैं,
जो प्रतिदिन  तूफानों में भी पल रहे हैं।
चीर कर रख देते अरि की छाती जो,
जो नरसिंहावतार बन उबल रहे हैं।

उन राष्ट्र के मतवालों का करते नमन।
नव वर्ष का करते है अभिनंदन।

मनाओं उत्सव, तो कर लो याद उनको भी
जो खंदकों में जीते, बन्दूक का खिलौना  है।
जिनकी सर्द रातें हैं, हवाएँ करती साँय-साँय,
जो ओढ़ते हैं राष्ट्र प्रेम, बर्फ का बिछौना है।

राष्ट्र के उन  वीरों से गुलजार है चमन।
उनके लिये भी नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन।

बीते साल में जो रह गया अधूरा
जो सपने ना हो सके साकार।
आएं इस वर्ष में फिर से जगायें
आगे बढ़कर  दे उन्हें भी आकार।

योजनाओं को सतह पर उतारें
रुके नहीं कभी हमारे बढ़ते चरण!
नव वर्ष का करते हैं अभिनंदन!
------------
बीते वर्ष कोरोना के साथ जिये हम,
विषाणुओं का तिक्त विष पिये हम।
हम नीलकंठ बन गए, हमें डर नहीं,
इस वर्ष समूल नष्ट का लिए प्रण।

आएं विचारें, अपनाएँ स्व अनुशासन।
नव वर्ष का करते हैं अभिनन्दन।

भारत को विश्व का सिरमौर बनाएं,
देश हित के लिए जियें, देश जगाएं।
कर्तव्य -पथ पर नित कदम बढ़ाएं,
युवा- शक्ति में राष्ट्र प्रेम जगाएं।

जयचंदों का होगा मान - मर्दन।
नव वर्ष करते हैं अभिनंदन।
©ब्रजेंद्रनाथ

Tuesday, December 22, 2020

छिन्न - संशय (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#futility of war









यह कविता मैंने 6 दिसंबर 20 को मारुति सत्संग पुणे के वेबिनार में सुनाई जिसका यूट्यूब लिंक इसप्रकार है:

https://youtu.be/jF0XsqjvAaY

छिन्न – संशय

यह कौन बैठा नदी की तीर पर,
निश्चेष्ट, निश्चल देखता जल - प्रवाह।
टूटना, बिला जाना, तट से मृतिका - कणों का,
और डूब जाना पत्थरों का अतल - जल में।


पत्थर बने जो करते अलंकृत 
स्वयं को मिथ्या अहमन्यता से।
वे ही कहीं तो डूबते नहीं
प्रवाहमान जल के अतल - तल में?

परन्तु अपने उस अभिमान में 
हिंसा का तांडव किया करते हैं वे।
उससे विगलित समाज के तन्तु को,
किस तरह, झकझोर, तोड़ फेंकते अनल में।

ऐसे तत्व भी, (या) ही, इतिहास में स्थान पाते,
झोंक जन को और जग को।
एक भीषण युद्ध की विभीषिका में,
मानवता जहां मृत्यु – शवों को ढूढती विकल हो।


हिंसा का प्रत्युत्तर न दे,
चुपचाप रहकर सहे जाना।
उदारता, सदाशयता का ओढ़ आवरण,
क्लैब्य-दोष-मण्डित कर लेना नहीं तो और क्या है?


फिर क्या हिंसा का प्रत्युत्तर
प्रतिहिंसा के अग्नि-दहन में,
लाशों की अगणित बोटियाँ,
जब बिखर जाएँ धरा - गगन में?

तभी शूरता नियत करती रही है
मुकुट-मणि स्थान जन-जन में?
तभी नर-पुंगव पूजित हुआ है,
उच्च सिंहासन अवस्थित इस भुवन में?


तो क्या शांति हिंसा का ही
एक उप - उत्पाद हमेशा से रहा है?
मरघट पर जलती चिताओं की
आत्माएं विकल नहीं होती विजन में?

युद्ध बाहर का और अंतर का,
मांगता है लाशें रण-चण्डी बना।
सिन्दूर-पुंछी बहनों का भाल
और उनका क्रन्दन करुणा से सना।

या कि समय देना और सहते रहना
उदासीनता, विवशता अपनाना।
आँखें बंद, मुंह मोड़ खड़ा रहना,
चुपचाप ही हालाहल पीते जाना।

इससे नहीं कोई नीलकंठ कहलाता
क्लैब्य ही उसको आ घेरता है।
तांडव कर सकता नहीं, वह काल पर,
आसुरी शक्ति को जीत नहीं सकता है।

इन्हीं प्रश्नों में उलझा हुआ वह,
खड़ा है नदी - तीर पर प्रश्तर बना।
अपने में अनल - दाह पीते हुए
कृत्य गुरु-जनों का नश्तर - सा चुभा।

क्या चाणक्य ने अखण्ड-
भारत-स्थापन के लिए,
हिंसा का सहारा नहीं लिया,
विद्रोह-दमन के लिए?

या कृष्ण ने नहीं दी सीख
छल का प्रतिउत्तर दो छल से,
अगर साध्य है, दुर्भेद्य करना 
राष्ट्र को अरि से, खल से।

विजय का सूर्य अम्बर में
अगर होता देदीप्यमान है।
संत्रास से, अरि अनय से,
दिलाता जन को त्राण है।

तो अरि मर्दन करना
शांति स्थापन हेतु सुकर्म है।
धरा को दिलाकर मुक्ति,
लोकनीति - स्थापन हेतु सद्धर्म है।

प्रलय के बादलों से दिला
अवनि को त्राण है।
नींव रखेगा वह साम्राज्य का, जहां
जन - जन को मिलता मान है।

ब्यथित मन क्षुब्ध है,
गाँठ पड़ी, उलझ गयीं।
बुद्धि स्थिर है मगर,
गुत्थियाँ सुलझ गयीं।

ब्यक्ति कोई अगर शत्रु बना, स्वघोषित
न्याय - दण्ड - निर्धारक बनकर करता कुकर्म है।
उसका मस्तक - भंजन करना
शांति - स्थापन हेतु न्याय - धर्म है।

©ब्रजेंद्रनाथ




Monday, December 7, 2020

मित्रता (कविता) #friendship

 #BnmRachnaWorld

#friendship











मित्रता
मित्र बनाने के पहले विचारना
जरूरी है।
द्रोण और द्रुपद की गुरुकुल में मित्रता
कहाँ निभ पाई थी?
जब द्रोण गए थे,
माँगने सहायता राजा द्रुपद से।
द्रोण की गरीबी का
उड़ाया था मजाक।
इसी ने बो दी थी,
आपसी रंजिश के बीज।
महाभारत में वर्णित कुरुक्षेत्र के युद्ध में
निकली थी सारी खीज।
इसलिए दोस्त को पहचानना जरूरी है।
दोस्त बनाने के पहले विचारना जरूरी है।
----

मित्रता के मिलेंगे वैसे भी उदाहरण
जिन्होंने निभाये दिए हुए वचन।

राम सुग्रीव की मित्रता दृढ़ हुई
सुग्रीव ने सीता की खोज में
सभी दिशाओं में वानर भेजवाये।
राम सुग्रीव की मित्रता में
दृढ़ता थी आयी।
सीता की खोज की थी
सुग्रीव के मंत्री हनुमान ने,
ध्वस्त किये दुर्ग और लंका जलायी।

कृष्ण सुदामा की मित्रता
की दी जाती है मिशाल।
गरीब, दीन-दुखी सुदामा से
द्वारिकाधीश कृष्ण ने मित्रता निभायी।
दे दिए सबकुछ दो मुठ्ठी
चिउड़े के बदले में भाई।

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मित्रता होती नही है कोई अनुबंध।

अर्जुन के साथ धनुर्विद्या के
कौशल दिखाने को ।
जुटे थे कौरव और पांडव कुमार।
उसमें कर्ण ने किया प्रवेश,
जिसे भीष्म ने किया था अस्वीकार।
कर्ण को देकर अंग देश का राज्य,
दुर्योधन ने कर्ण को अपनी ओर किया था।
यह मित्रता नहीं थी, था स्वार्थ-संबंध।
मित्रता होती नहीं है कोई अनुबंध।

इसलिए मित्र बनाने से पहले
मित्रता निभाने की सोचिए।
बार-बार त्याग और तप
की लौ पर तप्त कीजिये।
फिर मित्र बनाने पर विचारिये।
एक बार मित्र बन जाने पर,
मित्रता निभाने की सोचिए।
©ब्रजेन्द्रनाथ

Saturday, November 14, 2020

झारखंड की मिट्टी में रवानी है (कविता)

 #BnmRachnaWorld

#Jharkhandparkavita









15 नवंबर को,

झारखंड दिवस पर झारखंड राज्य के प्रति कुछ उदगार

झारखंड की मिट्टी में रवानी है

स्वर्णरेखा, खरकई, दामोदर,
बराकर, कोयल, संख ,ब्राह्मणि।
नदियों का नित्य प्रवाहित जल
दलमा पहाड़ सा मुकुट मणि।

वसुंधरा की इसपर मेहरबानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।

देवघर में बाबा  बैजनाथ,
बुंडू में  रहती माता देउली।
रजरप्पा में छिन्नमस्तिका
पारसनाथ में जैन तपस्थली।

कण - कण में  माँ तेरी कहानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।

बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हो,
नील-पीताम्बर, मांझी तिलका ।
वीर बाँकुरों  की धरती यह,
तलवार तीर उनका चमका।

फूलो -झानो का कोई नहीं  सानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।।

कोयला, बॉक्साइट, ताम्र,
युरोनियम और लौह अयस्क।
अपार खनिज संपदा  यहाँ,
कुपोषित फिर भी  बच्चे - वयस्क।

समृद्धि है दूर, क्यों छायी वीरानी है?
झारखंड की मिट्टी में कहाँ रवानी है?

धोनी धुरंधर, कप्तान जयपाल,
इम्तियाज, महादेवन, अंजना।
कामिल बुल्के, सलिल सरीखे,
प्रबुद्धजनों से है यह  बना।

अल्बर्ट एक्का जैसा बलिदानी है।
झारखंड की मिट्टी में रवानी है।

आज मचा है भ्रष्टाचार,
नही प्रेम और सदाचार।
राजनेता  है स्वार्थ- लिप्त,
फैल रहा है मिथ्याचार।

हर राज्य की कमो बेस यही कहानी है।
यहां के  मिट्टी की सूख गयी रवानी है।

समृद्धि आएगी हर घर में,
फिर से होगा यहाँ विकास।
धरा गगन गूंजेगा जन गण
जनता का  यही विश्वास।

झारखंड हमारी अस्मिता की निशानी है।
यहाँ की मिट्टी में फिर आयी रवानी है।।
©ब्रजेन्द्रनाथ




Monday, November 2, 2020

अयोध्या में राम के रावण वध कर लौटने पर दिवाली(कहानी)


 #BnmRachnaWorld

#Ayodhyamendipawali




अयोध्या में दीपावली
शत्रुघ्न असमंजस में है। आज भैया राम आनेवाले हैं, भाभी सीता और भैया लक्ष्मण भी आने वाले है। सभी माएँ खुश हैं। प्रजा में उत्साह का समुद्र उमड़ पड़ा है। फिर भैया भरत ने नंदी ग्राम में अपनी कुटिया के सामने चिता क्यों सजाने का आदेश दिया है?
इस असमंजस का उत्तर तो भैया भरत ही दे सकते हैं। उनसे पूछूं तो कैसे? वह तो उनके आदेश का ही पालन करते रहै हैं। जबसे राम भैया की पादुका लेकर भैया भरत चित्रकूट से लौटे है, अयोध्या के महल से दूर, नंदीग्राम की इसी कुटिया में चरण पादुका को स्थापित कर स्वयं पादुका के सतह के सामने बने, नीचे के गड्ढे में सोते रहे हैं। मैं ही अयोध्या और नंदीग्राम के बीच दौड़ लगाता रहा हूँ। अब क्या किया जाय?
सूर्य का गोला पूर्व क्षितिज से धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था। उसकी रश्मियाँ कुटिया में प्रवेश कर रही थी। कुटिया का कोना-कोना आलोकित हो उठा था। इस समय अपने कुलदेव सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के लिए भरत भैया आसन से उठते थे। शत्रुघ्न सोच रहे थे, यही समय सबसे उपयुक्त होगा। यही सोचते हुए वह कुटिया के बाहर इसतरह खड़े हुए थे कि उसकी परछाईं कुटिया में दिख जाए। परछाईं देखकर ही भरत समझ गए थे कि बाहर शत्रुघ्न खड़ा है। कुटिया की सफाई भरत स्वयं करते थे। सफाई करने के पश्चात उन्होंने कुटिया के द्वार के तरफ देखा था। अभी भी वह प्रतिच्छाया वैसी ही स्थिर थी। वे बाहर निकले तो उन्होंने देखा, शत्रुघ्न खड़ा है।
"भैया शत्रुघ्न इतनी देर से यहाँ खड़े किसका इंतजार कर रहे हों?"
"भैया बहुत असमंजस में हूँ। मैं आपसे कुछ पूछने की धृष्टता कैसे कर सकता हूँ? परन्तु अगर नहीं पूछूँ, तो आज के उत्सव के लिए आपके द्वारा दिये गए दिशा निर्देशों का पालन उतने उत्साह से नहीं कर सकूँगा।"
"शत्रुघ्न, उत्साह में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। तुम्हारे उत्साह और जोश को कायम रखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। आज भैया राम आनेवाले हैं। लेकिन अभी तक इसकी कोई सूचना क्यों नहीं आयी?"
भरत व्यथित थे। उनका हृदय इतना बिलख रहा था कि करुणा के अश्रु- जलों से विशाल सागर का निर्माण हो चुका था। एक बार पहले भी उनका हृदय रोया था, जब उन्होंने राम के वन गमन का समाचार अयोध्या आने पर अपनी माँ कैकेयी से सुना था। तब भी वे चिंता की चिता की जलती लपटों के बीच में घिर गए थे। अपनी माता का त्याग कर  उन्होंने चित्रकूट जाने का निर्णय लिया था। उससमय भरत के चारों ओर फैली व्यथा, लोकोपवाद और आत्मग्लानि की भीषण ज्वाला की लपटों से राम ने बचा लिया था। उन्होंने ही अपनी चरण पादुका देकर भरत के जीवन को राममय बना दिया था। पादुकाएं उनके लिए राम का एक प्रतीक- मात्र नहीं है। वह उसमें अपने आराध्य का प्रतिदिन साक्षात्कार करते हैं। उन्होंने सत्ता से अलग रहते हुए, सत्ता के प्रति उत्तरदायित्वों का वहन किया, जिसका उदाहरण दुनिया के किसी भी कथानक और इतिहास में नहीं मिलता है।
शत्रुघ्न का असमंजस दूर नहीं हुआ था।
भरत ने शत्रुघ्न की ओर अपने अवसादग्रस्त हृदय की भावनाओं को छुपाते हुए, उसके असमंजस के कारणों को जानते हुए भी पूछा था, "पूछो, तुम्हारे मन में किस कारण असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई है?"
शत्रुघ्न ने संकोच करते हुए पूछा था, "भैया, इस उत्सव के समय आपने चिता सजाने का आदेश क्यों दिया?"
"मैं जानता था, तुम्हारे मन के असमंजस की स्थिति। बस थोड़ी देर और। तुम्हें इसका समाधान मिल जाएगा।"
राम को भी अवध और भरत की सुधी कभी नहीं विस्मृत हुयी थी। भरत के प्रति अपने प्रेम की प्रतीति राम एक क्षण भी नहीं भूले:
बीते अवध जाऊँ जौं, जियत न पावउँ बीर।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक शरीर।।
भरत मन में विचार कर रहे हैं, "राम के आने की कोई सूचना नहीं मिल रही है। प्रभु ने मुझे कपटी और कुटिल समझा, तभी अपने साथ वन को नहीं ले गए। लक्षमण कितना बड़भागी है, जो राम के चरणारविन्द से कभी अलग नहीं हुए। अगर भैया राम समय पर नहीं आते हैं, तो भरत इसी चिता में समाकर अपना अग्निसंस्कार कर लेगा।"
इसीलिए भरत ने चिता सजाने का भी आदेश दे दिया था।
उधर राम , सीता, लक्षमण विभीषण, सुग्रीव, अंगद और हनुमान सहित प्रयागराज पहुंचते हैं। बाल्मीकि रामायण के अनुसार राम जी हनुमान को निर्देश देते हैं, " तुम भरत को जाकर देखो। उनका मन यदि अयोध्या के राज्य में रम गया हो, तो तुम लौट आना। ऐसी स्थिति में मैं अयोध्या लौटकर नहीं जाऊँगा। भरत ही वहाँ राज्य करें।"
श्री भरत के संदर्भ में यह सत्य नहीं था। तुलसी के राम में क्षण भर के लिए भी संशय नहीं होता कि भरत राज्य पाकर उसमें आसक्त हो गए होंगें। बाल्मीकि जो कहते हैं वह मनुष्य - जाति के अनगिनत अनुभवों का ही परिणाम था। श्री भरत इससे अनभिज्ञ नहीं थे। सिंहासन पर पादुकाओं की प्रतिष्ठा और नंदीग्राम से राज्य का संचालन दोनों ही इस सजगता के परिणाम हैं। वे सत्ता और भोग के दोनों केंद्रों से दूर रहने का निश्चय कर चुके थे।
सत्ता का संबंध मन से है और भोगों का संबंध शरीर से है। मन और शरीर दोनों ही एक दूसरे के प्रति आसक्त हैं। एक का प्रभाव दूसरे पर पड़ता ही है। एक बार मन सत्ता की सुरा का अभ्यस्त होते ही भोग के अन्य उपकरणों की मांग करता है । और यदि शरीर एक बार भोगों का अभ्यस्त हो जाय तो इन भोगों की स्थिरता के लिए उसे सत्ता की आवश्यकता का अनुभव होता है। इस तरह शरीर और मन दोनों मिलकर ऐसा षड्यंत्र करते हैं कि विवेक खड़ा - खड़ा देखता रह जाता है। प्रारंभ में वह चेतावनी देता है, किंतु बाद में वह भी मौन हो जाता है और अंत में वह समर्थन की स्थिति में भी उतर सकता है। देखते ही देखतेे व्यक्ति इतना बदल नाता है कि विश्वास ही नहीं होता कि कभी यही व्यक्ति धर्मात्मा, सदाचारी और शीलवान था। यह इतिहास इतनी बार दुहराया गया है कि इसे सृष्टि का अकाट्य सत्य मान लिया गया-
नहीं कोउ अस जनमा जग माही, प्रभुता पाइ जाहि मद नाही।।
इससे बचने के लिए केवल विवेक ही यथेष्ट नहीं हैं। शरीर और मन पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। यह नियंत्रण वाह्य और आंतरिक दोनों ही रूपों में आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो अपने मन पर अत्यधिक विश्वास करने का धोखा खाये बिना नहीं रहता है।
राम - वियोग के सागर में भरत का मन डूब रहा है। उसी समय हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धरकर इस प्रकार आ गए मानों उस अथाह सागर में उन्हें डूबने से बचाने के लिए कोई पतवार सहित नाव आ गयी हो।
राम विरह सागर मँह भरत मगन मन होत।
विप्र रूप धरि पवनसुत आई गयउ जनु पोत।।
भारत के त्याग, तप, तितिक्षा, तपस्वी का तेज और राम -विरह में बहती अश्रु धारा को देखकर हनुमान जी का सारा संशय दूर हो गया । उन्हें समाचार सुनाने में कोई संकोच नही हुआ,
"रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।"
भरत के यह पूछने पर कि हे,तात तुम कहाँ से आये हो और इतना परम प्रिय वचन सुनाए हो, हनुमान जी अपने स्वरूप में आ जाते हैं ।भरत ने भाव विह्वल होकर उनसे कहा था,
"कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।।"

शत्रुघ्न के सारे संशय दूर हो जाते है।
राम के आने का सुसमाचार सारी अयोध्या में मीठी सुगंध की तरह व्याप्त हो जाती है।
-----★★★★----
आसमान में पुष्पक विमान दिख रहा है। सरयू के किनारे विशाल मैदान में गुरु वशिष्ठ सहित सभी ऋषि मुनि, भरत, शत्रुघ्न, माताएँ, बहुएँ, अयोध्या के वृद्ध पुरूष-स्त्रियाँ, युवा - युवतियाँ, किशोर - किशोरियाँ सबों का विशाल समूह प्रभु राम की प्रतीक्षा में अधीर हो रहे हैं।
विमान धरती पर उतरता है। राम गुरु के चरणों में शीश नवाकर, सबसे पहले माता कैकेयी से मिलते हैं।
"पग धरि कीन्ह प्रबोध बहोरी। काल कर्म विधि सिर धरि खोरी।।"
राम अपने इस व्यवहार से माता कैकेयी को ग्लानि मुक्त करने का प्रयास करते हैं। इसके लिए उन्होंने काल-कर्म के दार्शनिक सिद्धांत का आश्रय लिया। राम अपने स्वरूप का विस्तार कर सारी प्रजा से एक साथ मिलते है।
मिलते हुए उन्हें इतना आंनद आ रहा है, जैसे सरयू में आनंद की लहरें उठ रही हों। उन्हें अचानक एक बात मन में खटकती है। वे भरत से पूछते हैं,
"भैया भरत, अयोध्या की सारी प्रजा दिख रही है। किशोर और किशोरियाँ भी दिख रही है। क्या तुमने गोद के बालकों सहित माताओं को बाहर निकलकर आने से मना कर रखा है?"
भरत भाव -विह्वल हो प्रजा की ओर इंगित करते हुए कहते है, 
"भैया, आप के वन - गमन के पश्चात अयोध्या में कोई भी उत्सव  नहीं मनाया गया।  सभी अयोध्यावासी तपश्चर्या में लीन थे, किसी भी क्षण आपकी छवि अपने सामने से नहीं हटने देते थे। पुरुषों और स्त्रियों के बीच कभी संपर्क हुआ ही नहीं। सभी  इन चौदह वर्षों तक अखंड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए राक्षसों के साथ आपके रण में जीतने के लिए तप, त्याग, यज्ञ, दान में लीन रहे। भैया, इसीलिए आप अयोध्या की प्रजा के बीच चौदह वर्ष से कम आयु के किसी भी बालक -बालिका को नहीं देख पा रहे हैं।"
भरत का वक्तव्य समाप्त होते ही राम ने अयोध्यावासियों को संबोधित करते हुए कहा, "मेरे सर्व प्रिय अयोध्यावासी, अभी मुझे प्रतीत हो रहा है कि रावण और उसकी सेना से लड़ते हुए मुझे इतनी शक्ति, इतनी ऊर्जा कहाँ से मिल रही थी। वह सारी ऊर्जा मुझे आपके तप, त्याग, तितिक्षा से मिल रही थी। वहाँ दिख तो रहा था कि एक राम लड़ रहा है। वस्तुतः मैं आप सबों के अंदर बसे राम की ऊर्जा के साथ लड़ रहा था। रावण से राम नहीं, पूरी अयोध्या लड़ रही थी। जब पूरी अयोध्या किसी से लड़ेगी तो उसे कौन हरा सकता है। मैंने राक्षसों का नाश नहीं किया है, आपने उन्हें समूल, सपरिवार यमपुर पहुंचाया है। आपके इस तप से निकले तेज को नमन करता हूँ और गुरुजनों तथा भाई भरत की सम्मति से यह घोषणा करता हूँ, पूरी अयोध्या की हर वीथी, चौराहों, खेतों, खलिहानों, कुओ, तालाबों को दीपक के समूहों से और प्रकाश स्तंभों से आलोकित कर दिया जाय। ऐसी दीपावली मनायी जाय, जैसी पहले कभी नहीं मनाई गई हो।"
सारी प्रजा में उत्साह और उमंग की तरंग उठती रही।
©ब्रजेन्द्रनाथ






Monday, October 26, 2020

विजयादशमी राम को आना होगा (कविता)

 #BnmRachnaWrld

#vijayadashamipoem

25 अक्टूबर, विजयादशमी के दिन आ अवधेश कुमार सिंह जी, वैशाली, दिल्ली एन सी आर, द्वारा संचालित "पेड़ों की छाँव तले रचना पाठ" के अंतर्गत आयोजित 68 वीं गोष्ठी में वेबिनार के माध्यम से भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उसी समय ली गयी तस्वीरों के साथ सभी सहभागियों की रचनाओं का अंश सुनते हुए अंत में मेरी रचना का ऑडियो आप सुनेंगें। तो आइये तस्वीरों के माध्यम से उस दिन के गूगल मीट की साहित्यिक यात्रा पर चलते हैं , मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net " के साथ : इस चैनल को अवश्य सब्सक्राइब करें, यह बिलकुल फ्री है। सादर !

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/UA_npwoGaG0












विजयादशमी पर राम का आह्वान
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
जब -जब रावण की शक्ति बढ़ेगी,
राम को आना होगा।
आकाश के नक्षत्रों को मिलकर
विषम - काल सुलझाना होगा।

जब पाप और अनाचार का
राक्षस निर्बाध यूँ धूमेगा।
जब - जब ताकत के मद
में पागल हाथी - सा झूमेगा।

गांडीव उठा, कर संधान
जग को त्राण दिलाना होगा।
राम को आना होगा--2

जब - जब नारी सन्देहों
में घिर शापित होती रहेगी।
जब - जब मूक शिला बनकर
निरानंदित जीती रहेगी।

अपने चरणों के रजकण से
उनका उद्धार कराना होगा।
राम को आना होगा-2

जब - जब संस्कृति के पोषक
का अस्थि - समूह बन जायेगा।
जब - जब सभ्यता कराहेगी,
मानव असहाय बन जायेगा।

तब भुजा उठा प्रण कर
अरि- व्यूहों को ढहाना होगा।
राम को आना होगा, --2

राम इस धरा पर कभी
मानव का रूप नहीं लेंगें।
राम अब दसरथ नंदन बन,
कभी भी लीला नहीं करेंगें।

अब राम - भक्तों को जुटकर,
अंदर का राम जगाना होगा
हृदय में बस जाना होगा। 2

रावण तभी जलेगा , जब
हमारा अहंकार मिट जाएगा।
रावण तभी मिटेगा जब,
लोभ और मोह नहीं सताएगा।

राम भक्त बनने के लिए
मन शुद्ध बुद्ध बनाना होगा।
अंतर का राम जगाना होगा
राम को आना होगा--2

©ब्रजेन्द्रनाथ



'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख )

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