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Saturday, April 13, 2019

यह चुनाव नहीं युद्ध, महायुद्ध है (कविता)


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भारत में लोकसभा के चुनाव के इस महापर्व का प्रथम चरण सम्पन्न हुआ। यह चुनाव कई मायनों  में पिछले चुनावों से भिन्न है। मेरी आवाज में मेरी लिखी इस कविता में आप उन मुद्दों या खतरों को जानेंगें, जिनसे यह देश आजकल जूझ रहा है। उन्हीं खतरों को पैदा करने वालों को जवाब देने के लिए यह चुनाव है। इसलिए "यह चुनाव नहीं युद्ध, महायुद्ध है" सुनिए यह कविता:


यह चुनाव नही युद्ध है।

एक तरफ आसुरी विनाश है खड़ा,
आतंकवाद, देशद्रोह है विहँस रहा।
भ्रष्टाचार, अवसरवाद का जोड़बंधन है,
दुश्मन जो थे, कर रहे मुख चुम्बन हैं।

वातावरण विष कंटकों से बिद्ध है।
यह चुनाव नही युद्ध, महायुद्ध है।

देश के विभाजन का षडयंत्र रच रहा,
सत्ता के लिए दुश्मन के साथ जा मिला।
सेना को बदनामियों में घेरने वालो के साथ
हाथ से हाथ मिलाकर है जा खड़ा।

लाशों की बोटियाँ नोचने वाला यह  गिद्ध है।
यह  चुनाव नहीं युद्ध , महायुद्ध है।

बंदे मातरम, जय हिंद में सवाल उठाने वालों,
भारत माता की जय में चुप रहने वालों,
आपनी धरा, अपनी हवा, धूल भी है अपनी,
उसे मलिन, लज्जित , दूषित करने वालों।

मिट जायेंगें वो जिनका राष्ट्रद्रोह स्वयं सिद्ध हैं,
यह चुनाव नहीं युद्ध, महायुद्ध है।

धर्मग्रंथों का झूठा दे देकर उद्धरण,
दे दिया अपने पड़ोसियों को निष्कासन।
नैतिकता, सत्यता, मानव अधिकारों का
हो रहा नहीं क्या निरंतर ही हनन?

तुम्हारा यह चलन कश्मीर और राष्ट्र के विरुद्ध है।
यह चुनाव नहीं युद्ध , महायुद्ध है।

एक वीर साहसी लेकर एक नई ढाल
निकल चुका है रण में दिखाने को कमाल।
कदम मिलाके  चलें आपका हो साथ,
शत्रुओं के समूह में मचा रहा बवाल।

उसके संकल्पों के एलान पर जनसमूह मुग्ध है।
यह चुनाव नही युद्ध, महायुद्ध है।

उठो तू वीर साहसी, आगे बढ़ो,
अपनी  ताकत को तू अब पहचान,
घर से निकलो,  घाम हो प्रखर,
केंद्र पर  जाओ, करो तू  मतदान।

इस चुनाव में सबों से आप ही प्रबुद्ध हैं।
यह चुनाव नहीं युद्ध, महायुद्ध है।

चुनाव के बाद भी सजग रहो,
देश हित के लिए नेताओं पर नजर रहे।
फिर न लिप्त हो जायें, सत्ता के मकड़जाल में,
देश का सम्मान न झुकने दें, ये खबर रहे।

नेता कोई भी हो, चरित्र तो संदिग्ध है।
यह चुनाव नहीं युद्ध, महायुद्ध है।

ब्रजेंद्रनाथ   

 लिंक जहाँ मेरी आवाज में मेरे यूट्यूब चैनल में मेरी कविता सुनी जा सकती है। आप मेरे टूट्यूबे चैनेल
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Saturday, March 30, 2019

कौंध: हिंदी कविता संग्रह पुस्तक


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#hindipoetrycollection



परमस्नेही साहित्यान्वेषी परिजन सदृश पुस्तक प्रेमी मित्रों,
बहुत हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाह रहा हूँ कि मेरा पहला कविता संग्रह "कौंध' नाम से अमेज़न के किंडल एडिशन पर प्रकाशित हो चुका है।
पुस्तक का अत्यंत संक्षिप्त विवरण:
This collection of poems in Hindi is created from the flash of imagination in the cloud of thoughts... so the name stands "Kaundh" (Flash). जब हमारे भाव - समुद्र में चिंतन की तपिश से भाप बनकर शब्दों के जलकण - समूह बादल बन जाते हैं, तो उनके संघर्षण से "कौंध" उत्पन्न होती है।
उसी "कौंध" के बाद शब्दों के घनीभूत बादल बरसते हैं और कविता की सरिता बह निकलती है। इस सरिता की वेगवान धार में किनारों से गतिरोध उत्पन्न करने वाले शैवालों को उखाड़ फेंकने का दम है, तो पत्थरों और चट्टानों पर लकीरें खींचने का ख़म भी है। इसमें अगर ऊपर-ऊपर धार की नीरव सतह है, तो उसके अंदर दाह भी छिपा है, उष्मा भी छिपी है।
इन कविताओं की सरिता प्रकृति और पर्यावरण के सन्दर्भ - बूंदों की यात्रा से लेकर मैदानी इलाकों में नदी के प्रवाह के रूप में जल संचय और जल सिंचन करती हुयी बही जा रही है। यहाँ वीर रस है, जहाँ सैनिकों की शौर्य गाथा और युवाओं को जगाने की कवितायें है, तो स्त्री विमर्श पर भी कवितायें हैं। महिलाओं को पहली बार भारतीय वायुसेना में पाइलट बनाये जाने पर भी कविता है। अंत में बहुआयामी सन्दर्भ में श्रृंगार रस की भी कवितायें हैं।
इसमें से कई कवितायें कविता समारोहों में सुनायी गयी हैं, जिसका वीडियो मैंने अपने यूट्यूब चैनल
maramagya net पर अपलोड किया है। मैंने अन्य कई कविताएं भी अपनी आवाज में अपने इस चैनल पर अपलोड किया है। आप इस चैनल को सब्सक्राइब करें, लाइक करें और शेयर भी करें।
तो आइये कविता की सरिता में अवगाहन करते हैं...
चंद्र रश्मियाँ सतह पर सरिता के,
बिखरती हैं, छलछल करते हुए|
शब्दों के जुगनू जाग जाते हैं,
राग सुनाते हैं, कलकल करते हुए|
आइये उसी राग को सुनते हैं, और गुनते हैं...
ब्रजेन्द्रनाथ
नीचे दिए गए लिंक पर आप क्लिक करेंगें तो आपको अमेज़ॉन के किंडल डायरेक्ट पब्लिशिंग के साइट पर ले जाएगा। वहाँ आप "Buy now with one click"पर जैसे ही क्लिक करेंगें, आपको पेमेंट ऑप्शन पर स्क्रीन खुलेगा। आप अपने क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, या वालेट जैसे paytm, फ़ोनपे या bheem app से भी ₹69 या विदेशी मुद्रा में $1 पेमेंट कर डाऊनलोड कर सकते हैं। इसके लिए आप अमेज़न का किंडल app डाउनलोड कर लें। डाउन लोड होते ही किंडल अप्प पर read now पर क्लिक करें और पूरी किताब कभी भी पढ़ें, lifelong के लिए ।
अगर आप को दिक्कत हो तो मेरे मेल आई डी brajendra.nath.mishra@gmail.com मुझे मेल करेें।
सादर आभार!
ब्रजेंद्रनाथ

कौंध: हिंदी कविता संग्रह (Hindi Edition) https://www.amazon.in/dp/B07Q4HTTPF/ref=cm_sw_r_cp_apa_i_A94NCbHC5GHGR

Thursday, February 14, 2019

14 फरवरी 2019 को पुलवामा आतंकी हमला पर कविता

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#patriotic#Hindipoem

पुलवामा आतंकी हमले पर मेरे आक्रोश की अभिब्याक्ति स्वरुप कुछ पन्क्तियाँ:

धरा पुकारती, गगन पुकारता
जलाओ आग सीने में, वतन पुकारता।
जो रच रहे षड्यंत्र देश के विखंडन का,
उनके मान- मर्दन को प्रण पुकारता।

जो छद्म युद्ध कर रहे, उन्हें दिखा दो।
छिप के वार कर रहे, उन्हें सिखा दो।
क्रुद्ध हिन्द कितना कराल होता है।
त्रिशूल पर सवार कैसे महाकाल होता है।

क्षत विक्षत लाशों की ढेर से
एक लिंग प्रकट होंगे ले मशाल लाल
लेलिह्य जिह्वा से रक्तपान के लिए
रणचंडी सजायेगी एक नया थाल।

देश के सब्र का टूट गया बाँध अब
बलिदानी जत्थो का समर्पण पुकारता।
जो रच रहे षडयंत्र देश के विखंडन का
उनके मान मर्दन को प्रण पुकारता।

ब्रजेन्द्रनाथ 


Sunday, February 3, 2019

कथा मंजरी तुलसी भवन में "और पर्स मिल गया" कहानी का मेरे द्वारा पाठ

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#story#social#inspiring



कल 03-02-2019 को अपराह्न 4 बजे से कथा मंजरी कार्यक्रम का आयोजन डा नर्मदेश्वर पाण्डेय जी की अध्यक्षता और आदरणीय श्रीराम पाण्डेय भार्गव जी के संचालन में स्थानीय तुलसी भवन में संपन्न हुआ। उसके पहले दिन में 10 बजे से पूर्व आयोजित "उरी" फिल्म का देखना कतिपय तकनीकी कारणों से नहीं हो पाया। लेकिन चुड़ा दही का सामुहिक भोज का आयोजन शानदार रहा।
कथा मंजरी कार्यक्रम के प्रारम्भ के पूर्व प्रसिद्ध कथाकार श्री जैनेंद्र कमार की तस्वीर पर पुष्प अर्पण कर उपस्थित साहित्यकारों ने श्रद्धांजलि दी। मेरी कहानी ,,"और पर्स मिल गया" से ही कार्यक्रम की शुरुआत हुयी। कहानी का सन्क्षिप्तीकरण किया हुआ प्रतिरूप यहाँ प्रस्तुत है।
अगर पूरी कहानी पढ़नी हो तो इस लिन्क पर पढ़ें:
मैं यहाँ उससमय ली गयी तस्वीरें भी दे रहा हूँ। 
और पर्स मिल गया
गाड़ी तेज गति से दक्षिण के तरफ भागी जा रही थी। उसी के साथ उसका विचार - क्रम भी तीव्र गति पकड़ रहा था। उसे अपने वे सारे दिन जो उसने स्कूल, कॉलेज, गाँव, गणपति पूजा में बिताये थे रह – रह कर याद आ रहे थे।अभी वह पूरी तरह प्रोफेशनल नहीं बना था इसीलिए उसके अंदर संवेदनाएं और विचारणाएँ हिलोरें मार रही थी। 'अगर मेरा शहर ही इतना विकसित होता तो मैं भी वहीं रहकर नौकरी करता। तब कितना अच्छा होता। गाँव  से जुड़ाव रहता और शहर में नौकरी रहती। अभी तो बड़े - बड़े शहर विकसित हो रहे हैं और फ़ैल रहे हैं। छोटे शहरों का विकास तो हो नहीं पा रहा है। जो शहर विकास के न्यूक्लियस बनकर आसपास के गावों के विकास में सहायक बन सकते थे, वे अभी आसपास के गाँवों के शोषण - बिंदु बनते जा रहे हैं।'
वह अपने विचार - यात्रा के क्रम को इस रेल यात्रा में भी ढोये जा रहा था। उसकी सोच कभी - कभी विचित्र दिशा पकड़ लेती थी। और वह उनमें फंसकर रह जाता था।
फिलहाल वह उनसे निकलना चाह रहा था । वह स्कूल, कॉलेज, गाँव,  गणपति के समय बिताये गये अनमोल पलों में खो जाना चाहता था।
नितिन ने एन आई टी, नागपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग किया था । चौथे साल में ही उसका प्लेसमेंट देश की मुख्य तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम में हो गया था। लेकिन उस समय ज्वाइनींग कहाँ  दिया जाएगा इसके बारे में कुछ नहीं बताया गया था । कहा गया कि ऑफर लेटर मिलने के बाद इसके बारे में पता चल जायेगा। अंततः ऑफरलेटर भी मिल गया था। उसका पदस्थापन कोयंबटूर में हुआ था। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। बहुत ही शांत और अच्छी जगह है, ऐसा लोगों ने कहा था। हालाँकि वह तो कहीं के लिए भी तैयार था।

वह बार बार अपने पीछे के पॉकेट में रखे पर्स को छूकर महसूस कर लेना चहता था, कि वह वहीं पर तो है। यह पर्स देविका से मुलाकात की पहली निशानी थी।
देविका उसे लगातार हो रही बरसात में बड़ी सी झील के आल पर मिली थी। वह रो रही थी क्योंकि उसका बैग हवा में उडकर झील में जा गिर था। तुरत उसने अपना वॉलेट और मोबाइल अपने रुमाल में लपेटकर लड़की के हाथ में थमाया था और कूद पडा था झील में। उसने तैरकर उस झील से उसका बैग लाकर उसे दे दिया था। तभी उस लड़की ने, उसके वालेट वापस करते हुए अपने बैग में से एक नया वालेट निकाल कर दिया था। और बैग लेकर तेजी से भागते हुए ही बोली थी, "मेरा नाम, देविका पाटणकर। …मैने आपको एक नया वॉलेट भी दिया है। …उसमे मेरी सारी डिटेल्स हैं। …"
…और वह लड़की भागती हुई आँखों से दूर होती गयी थी।

X X X X X
यह लड़की क्या थी, बिलकुल कोयंबटूर एक्सप्रेस थी। जब भी मिली, भागती हुयी ही मिली। वह वॉलेट और नयी वॉलेट तथा अपना स्मार्टफोन पुनः पाकर खुश था। अगले सोमवार ही कोयंबटूर में भारत पेट्रोलियम में ज्वाइनिंग थी।
एक दिन एक लड़की का फोन आया था, "दो दिन हो गए। आपका फोन नहीं आया। मन नहीं माना, इसलिए फोन कर रही हूँ।"
"आप कौन?"
"भूल गए इतनी जल्दी, वही लड़की जिसका बैग आपने झील में से तैर कर लाकर दिया था। आपका वॉलेट और मोबाइल फोन भी मै लौटाई थी।"
"अच्छा, देविका जी, सॉरी, मैं आपको फोन नहीं कर सका, यहाँ आकर इतना काम पेंडिंग था। उसी में उलझ गया था।"
"आप मुझे देविका ही कहें, अच्छा लगता है।"
"जैसी आपकी इच्छा, देविका जी।"
"देविका जी, नहीं देविका।"
"ओके, ओके। मुझे अगले सोमवार को कोयंबटूर में भारत पेट्रोलियम में ज्वाइन करना था, उसी की तैयारी चल रही थी। आप अपने बारे में कुछ बताइये।"
"उस बरसात के दिन आप जिस बस मन सफर कर रहे थे, मैं भी उसी बस में यवतमाल से चढ़ी थी। मैं एक इण्टर कॉलेज में लेक्चरर के लिए इंटरव्यू देकर आ रही थी। इसीलिये सारे ओरिजनल सर्टिफिकेट्स भी मेरे पास ही थे। उस आँधी - तूफान में कीचड़ से सने रास्ते में मैं सम्हलने में थोड़ी लड़खड़ा गयी थी। इतने में आंधी का तेज झोंका आया और मेरा बैग उड़कर झील में जा गिरा था।"
"....और उसके बाद आपकी कहानी में मेरी एंट्री हो जाती है।"
"आपका बहुत - बहुत शुक्रिया। आप तुरत एक्शन नहेीं लेते तो मेरे सारेओरिजिनल सर्टिफिकेट्स तो गए थे।"
देविका की हल्की हँसी  की आवाज में घुली उसकी खुशी से छनकर सवाल आया था, "क्या आपको मेरी दी गई वॉलेट पसंद आयी। "
"अरे वह तो बहुत अच्छी है। मैने अपने सारे डेबिट-क्रेडिट कार्ड्स उसी में रखे हैं और वह हमेशा मेरे साथ रहता है।"
उस तूफानी बरसात की मुलाकात के बाद मोबाइल पर इतनी ही बातें हुई थी।
पैंट्री के वेटर की 'चाय - चाय' की आवाज से उसकी नींद खुली थी। स्टेशन आनेवाला था,  लोग अपने सामानों को ठीक - ठाक, ब्यवस्थित करने में लग गए थे। वह भी उठ गया था। जाकर बेसिन में अपना चेहरा धोया था। ट्राली अटैची को बर्थ के नीचे से निकाला था। रेलवे के द्वारा दिए गए कम्बल , चादर को लपेटकर खिड़की के तरफ खिसका दिया था। सोने के पहले उसने वॉलेट को लैप टॉप वाले बैग में रख दिया था। उसी बैग से वॉलेट को निकाला था और पैंट के बैक पॉकेट में रखकर वह उतरने को तैयार हो गया था। कोयंबटूर स्टेशन पर ट्रेन रुकी थी।अटैची और बैग लेकर वह ट्रेन से नीचे उतर गया था। प्लेटफार्म पर जब वह थोड़ी दूर चल चुका था तो उसने अपने हाथ पैंट के पिछले पॉकेट में रखे वॉलेट को छूकर, महसूस कर देविका की यादों को भी एक तरह से छेड़ना चाहा था। ये लो,वॉलेट तो वहाँ  था ही नहीं। क्या हुआ ? उसने तो पैंट के उसी पॉकेट में रखा था। वहाँ  तो था ही नहीं। ट्रेन में ही छूट गया क्या? ट्रेन अभी तक रुकी हुई थी। वह जल्दी से भागकर जिस डिब्बे में वह सफर कर रहा था उसमें घुसा था। अपनी बर्थ पर उसने कम्बल, चादर सारा हटा कर अच्छी तरह खोजा था। ट्रेन लगभग खाली हो गयी थी। उसने बाकी बर्थ पर भी ढूढ़ा था। वह पागलों की तरह सारे कम्बल चादरों को उठाकर, फेंक कर अपने पर्स को ढूढ़ रहा था। लेकिन पर्स नहीं मिली थी।
उसके साथ ही हमेशा ऐसा क्यों होता रहता है? हालाँकि बहुत लोगों के साथ ऐसा होता होगा। उनके बारे में, उनके ऐसे दुखद प्रसंगों के बारे में वह थोड़े ही जानता है। लेकिन उसे लग रहा था कि उसके साथ ही ऐसा होता है। उसने तो बड़ी होशियारी से वॉलेट निकालकर अपने पैंट की पिछले पॉकेट में रखा था। वह बार- बार अपने पैंट के सारे जेब टटोल रहा था। कही दूसरी  जेब में तो नहीं रख दिया और ढूढ़ रहा है दूसरी जेब में। वॉलेट तो इतनी छोटी चीज है नहीं कि उसे महसूस नहीं किया जा सके। पैंट के सारे पॉकेट में हाथ डालकर फिर चेक किया। वहाँ भी वॉलेट कहीं नहीं था। हताश , निराश मन से वह ट्रेन से फिर उतरा था।कोई उपाय भी नहीं था। ट्रेन अपने आगे के गंतब्य की ओर प्रस्थान करने के लिए खुल चुकी थी। वह प्लेटफार्म के बेंच पर ही बैठ गया था। फिर अपने भाग्य , देव , किस्मत सबको एक साथ कोसने की कोशिश में जुटने ही वाला था कि उसके अंदर से किसी ने ढाढ़स दिलाया था।
"क्या हुआ? इतनी सी घटना से विचलित हो गए? एक वॉलेट के जाने से इतने उदास क्यों हो गये? क्या तुम्हारे लिए दुनिया ख़त्म हो गयी? कुछ पैसे गए थे। कुछ पैसे उसने चोर पॉकेट में सुरक्षित रखे हुए थे। उससे काम चलाओ। सारे कार्ड्सब्लॉक करवा दो। उसके बाद दूसरा कार्ड आ जायेगा। चिंता क्यों? चित्त में उल्लास भरो। चलो खुशी -खुशी मन से जॉब ज्वाइन करो।"
वह मन को दृढ कर प्लेटफार्म की बेंच से उठा था। बाहर में कंपनी की गाड़ी आयी थी। उसे ढूढने में कोई दिक्कत नहीं हुई थी। उसी गाड़ी से कंपनी के गेस्ट हाउस पहुँच गया था। गेस्ट हाउस में 15  दिनों तक रहा जा सकता था। इसी बीच एकोमोडेशन ढूढ़ लेना होता है ताकि गेस्ट हाउस खाली कर दिया जाय ।
वह गेस्ट हाउस पहुंचकर फ्रेश हुआ। वहाँ  से ऑफिस पहुँचा  और अपने ज्वाइनिंग की सारी औपचारिकताएं पूरी की। उसका इंडक्शन प्रोग्राम दे दिया गया और ट्रेनिंग -कम - इंडक्शन शेडूल दे दी गयी। दिन भर तो ऑफिस में मन कहीं - न - कहीं लगा रहा। शाम में अगर देविका का फोन आया तो उसे क्या कहेगा? उसके द्वारा दिया गया वॉलेट उसकी अपनी लापरवाही के कारण कहीं खो गया। माना कि वह कुछ नहीं कहेगी। पारिस्थिति की  गंभीरता को समझते हुए वह मुझे ही समझाने की कोशिश करेगी,"वॉलेट का क्या है फिर दूसरा लेकर दे दूंगी। आप बिलकुल चिंतित न हों। बस यही सबसे बड़ी बात है। " लेकिन उसके मन में तो एक कसक - सी कहीं - न - कहीं रह रहकर उठती ही रहेगी। इससे पार तो पाना ही होगा, सामान्य दीखने के लिए भी और सामान्य जीवन जीने के लिए भी। आई और बाबा से भी उसने बातें की। सब ठीक है,ऐसा ही कहा था उसने। फिर कल विस्तार से बात करने का वादा कर वह सो गया था।
दूसरे दिन फ्रेश होकर जब ऑफिस पहुँचा तो देखा कि लोग उसी का इंतजार कर रहे थे।ऐसा क्या हो गया कि लोगों की रूचि उसके आते ही उसमें बढ़ गयी थी।
"मिस्टर तलवारे एक ब्यक्ति आपका इन्तजार कर रहे हैं। वे बोल रहे हैं कि कल से ही उसे ढूढने में और फिर मिलने के लिए परेशान हैं।" ऑफिस के हेड क्लर्क ने उससे कहा था। नितिन खुद कल से परेशान था। वह तो यहाँ किसी को जानता भी नहेीं था। फिर उसे कोई क्यों ढूढ़ रहा है? वह अंदर गया। वे ब्यक्ति ऑफिस के लाउन्ज में उसका इंतज़ार कर रहे थे। वह अंदर घुसते ही बोला था, "मैं ही नितिन तलवारे हूँ। लेकिन क्या मैं आपको जानता हूँ?"
"आपने सही कहा - आप मुझे नहीं जानते हैं। मैं रामचंद्रन, मेरी कोयंबरुर में ज्वैलरी की दूकान है।"
"लेकिन मैं तो ज्वैलरी खरीदने में अभी बिलकुल ही इंटरेस्टेड नहीं हूँ।"
"नहीं, नहीं मैं ज्वैलरी की डील के लिए आपके पास नहीं आया हूँ। मैं आपकी एक खोयी हुयी चीज आपको देने आया हूँ।"
"मैं समझा नहीं।"
फिर उस ब्यक्ति ने अपने हैंड बैग से मेरा वॉलेट निकाला था।
"क्या यह आप  का ही है?"
उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, "कहाँ मिली यह आपको?”
"उसके बारे में मैं बता रहा हूँ। पहले आप इसे सम्हालिए।" रामचंद्रन जी ने वॉलेट मेरे हाथ में थमा दिया था।
उसके बाद उसने कहना शुरू किया था, " कल आप जिस ट्रैन से उतरे मैं भी उसी ट्रैन से उतरा था। आप उतरे उसके ठीक पीछे - पीछे मैं भी उतर रहा था। मैंने देखा कि एक बर्थ पर यह वॉलेट पड़ा हुआ था। अगर मैं छोड़ देता तो किसी और हाथों में यह पड़ जाता। इसलिए मैंने इसे उठा लिया। कल से मैं इस वॉलेट के ओनर को लोकेट करने में परेशान था।"
उसने एक साँस ली और फिर कहना शुरू किया , " मैंने दूकान पहुँचकर  वॉलेट खोला था। उसमें आपका नाम मिला था। लेकिन नाम मिलने से ही तो काम बनने वाला नहीं था। वॉलेट को देखने से लगा था,  यह किसी पढ़े - लिखे ब्यक्ति का ही हो सकताहै। फिर मैंने दूकान का कंप्यूटर ओन किया था। इंटरनेट कनेक्ट किया। फसेबूक पर मेरा भी अकाउंट हैं। मैंने खोला और आपके नाम से सर्च करना शुरू किया। आपका नाम एन आई टी , नागपुर में एक स्टूडेंट के रूप में दिखा था। "
वे कुछ क्षण के लिए रुके थे।
मैंने कहा था, "हाँ, मैंने जॉब मिलने के बाद उसे अपडेट नहीं किया है। कल ही तो मैंने यह जॉब ज्वाइन की है।"
उन्होंने फिर कहना शुरू किया, "फिर मैंने एन आई टी, नागपुर के साइट पर जाकर ऑफिस का फोन नंबर जाना, फिर ऑफिस में फोन किया था। काफी देर के बाद कई बार इन्क्वारी करने पर उन्होंने बताया था कि नितिन का कोयंबटूर में भारत पट्रोलियम से जॉइनिंग आया था। कहाँ ज्वाइन किया है कह नहीं सकते। इतना इनफार्मेशन लेते- लेते कल शाम हो गयी थी। इसीलिये मैंने सुबह आने का तय किया और आज मैं यहाँ हूँ, आपके वॉलेट के साथ।" उन्होने  हँसते हुए कहा था। मेरी तो आँखों में आंसू आ गए थे। एक आदमी दूसरे के लिए इतनी परेशानी उठा सकता है, मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा था। हमलोग अभी जिस सम्वेदना विहीन दौर से गुजर रहे हैं उसमे मिस्टर रामचंद्रन जैसे लोग एक फरिस्ते की तरह ही हैं।
मैंने उनके हाथों को थाम लिया था। मैं उस फरिस्ते को छूकर उसकी गर्माहट को महसूस करना चाहता था। काफी देर तक मैंने उनका हाथ थामे रहा था।
"मिस्टर तलवारे अब हम चलें।" उनकी आवाज से ही मेरा विचार - क्रम विराम पाया था। मैंने उनके पैर छू लिए थे। वे मरे लिए पिता - तुल्य ही थे। उन्होंने कहाथा,"मेरे हाथ और पैरों के स्पर्श करने से कहीं अच्छा होगा अगर आप अपने मेंदूसरे के लिए थोड़ा स्पेस दें यानि थोड़ा कष्ट उठाने के इस स्पिरिट (जज्बे) कोबनाये रखे. "इतना कहकर वे लाउन्ज से बाहर निकल गए थे। एक फ़रिश्ते के साथ की यह मुलाकातमुझे जिंदगी भर याद रहेगी।…।और इस तरह मेरा पर्स फिर मेरे स्पर्श - क्षेत्र में आ गया था। मेरा पर्स(वॉलेट) मुझे मिल गया था जैसे मुझे मेरी देविका फिर मुझे मिल गयी हो …

पूरी कहानी 33 मिनट की है। इस लिन्क पर पढ़ा जा सकता है:

"और पर्स मिल गया", को प्रतिलिपि पर पढ़ें :
https://hindi.pratilipi.com/story/UYPRzZzL8LMR?utm_source=android&utm_campaign=content_share
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Wednesday, January 16, 2019

अमेरिका डायरी, इरवाइन यू एस ए में 53 वाँ, 54 वाँ दिन (Day 53, 54)

#BnmRachnaWorld
#americatourdiary


(तस्वीरें विकिपिडिया से साभार)
परम स्नेही मित्रों, मेरी अमेरिका डायरी का जो छोर छूट गया था, उसे फिर से पकड़ते हुए आपको याद दिलाता चलूं कि हमलोग कैलिफोर्निया राज्य के ब्यस्ततम शहर San Franscisco के इतिहास में  झांकने की कोशिश कर रहे थे। दो क्रूर घटनाओं ने शहर को बर्बादी के कगार पर पटक दिया था। वहाँ से फिर से उठ खड़ा होने की कहानी है, San Francisco। यहाँ के लोगों की जीजिविषा और अदम्य्य उद्यम से इस शहर को विकसित शहर में तब्दील कर  देने की कहानी है, San Francisco ,,,,
25-08-2018, इरवाइन, यू एस ए में 53 वाँ दिन (Day 53):
गोल्डेन गेट पार्क, सन फ्रांसिस्को की तुलना अक्सर New York के सेंट्रल पार्क से की जाती है। परंतु यह आयताकार क्षेत्र में फैला हुआ 3 मील (4,8 की मी) पूरब- पश्चिम दिशा में लम्बाई में और आधा मील (,8 की मी), उत्तर-दक्षिण दिशा में चौड़ाई में फैलाव लिए हुए New York के सेंट्रल पार्क से 20% अधिक बड़ा है। करीब 13,000,00 (तेरह लाख) शैलानी हर वर्ष यहाँ आते हैं।
यह पार्क उसमय के शहर के बाहरी क्षेत्र में अनुपयोगी बालू की बड़ी ढेर से भरी जमीन, जो सामान्य जन की पहुंच से बाहर थे, को विकसित कर विभिन्न प्रजातियों के पौधों और घास को उगाकर बनाया गया है। यह क्षेत्र Richmond District और Sunset District के बीच पड़ता है। आज इस क्षेत्र को पूरी तरह विकसित कर Ocean Beach तक की जगह को अंदर ले लिया गया है। Ocean Beach, Bay के पश्चिमी तट का वह क्षेत्र है, जो Richmond और Sinset district के बीच पड़ता है। इसे Golden Gate Recreational Area में तब्दील कर दिया गया है। एक बड़ा सा Highway भी इसी के पास से गुजरता है। इस बीच(तट) का जल में उठने वाला तरंग, सर्फिंग करने वालों में नई उमंग भर देता है। अत: सर्फिंग के खेल के लिये यह सबसे माकूल जगह है।
1890 ई तक San Francisco की आबादी 300,000 तक पहुंच गयी, जिससे यह यू एस ए का आठवां सबसे बड़ा शहर बन गया था। 1901 ई तक यह चमक-दमक से भरा शहर बन चुका था, जहाँ आधुनिक आलिशान हॉटल, बड़ी -बड़ी इमारतें, खासकर Nob hill क्षेत्र में बन चुकी थी। इस क्षेत्र में कला और संस्कृति के भी केंद्र स्थापित हुए थे। यह शहर आधुनिकता और भौतिकता की तेज दौड़ में काफी आगे बढ़ चुका था कि दो अप्रत्याशित घटनाओं ने इसे हिलाकर रख दिया।
क्रमश:
26-08-2018, इरवाइन, यू एस ए में 54 वाँ दिन (Day 54):
दौ क्रूरतम घटनाओं ने San Francisco के इतिहास में विकास की गति को धीमा कर देने में बहुत बड़ा असर दिखाया:
1) 1900-1904 : उत्तरी अमेरिका में प्लेग की महामारी का प्रकोप
2) अप्रैल 18, 1906ई में 5:12 AM में आया भयंकर भूकम्प।
San Franscisco में फैले प्लेग की बात करते हैं। यह Bubonic Plague, San Francisco के China Town क्षेत्र से शुरु होआ बताया जाता है। United States में उससमय तक किसी भी स्थान में फैलने वाला पहला महामारी था। यह बीमारी March 1900 ई में ही पहचान में आ गई थी। परंतु California के Governor Henry Gage इसके अस्तित्व को हमेशा एक सिरे से नकारते रहे। उनका इस महामारी के अस्तित्व को नकारने के पीछे कैलिफ़ोर्निया और San Francisco की प्रसिद्धि को प्रभावित होने से बचाना और quarantine द्वारा लोगों को अलग किए जाने और प्रभावित लोगों के आने जाने पर रोक लगाने से ब्यवसाय के प्रभावित होने और अर्थ की हानि से बचाना उद्देश्य रहा होगा। परंतु एक बीमारी का अस्तित्व में आना और उसका महामारी के रूप में आकार ले लेना, कोई छिपाने की चीज नहीं हो सकती। इसे कवर अप करने से गवर्नर Henry Gage की विश्वसनीयता काफी कम हो गयी और उन्हें गवर्नर के पद से त्यागपत्र देना पड़ा।
उनके बाद आये गवर्नर George Pardee ने शान्तिपूर्वक और सूझबूझ पूर्वक एक चिकीत्सीय हल निकाला और महामारी 1904ई तक और फैलने से रुक गयी । 121 लोगों को इसने प्रभावित किया था और 119 लोगों की इससे मौत हुयी थी। कहा जाता है कि यह बीमारी 1855 ई में China में हुई थी। उसने वहां के 15 मिलियन ( 1.5 करोड़) लोगों की जान ले ली थी। इसने भारत में भी कई जानें ले ली थी। गाँव के गाँव लोगबाग छोड़कर भाग गए थे। 1894 ई में होंगकोंग में यह बीमारी फैली थी। अमेरिका और चीन के बीच ब्यापार का एक बड़ा बन्दरगाह होने के कारण यहाँ से भी इस बीमारी को अमेरिका आने का अन्देशा बताया जाता है।
1906 ई में भूकम्प के बाद San Francisci का काफी बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया हो गया था। उसी समय May और August 1907 ई प्लेग की बीमारी पुन: फैली थी। लेकिन इस बार यह China Town नामक मुहल्ले से नहीं फैली थी। इसके लक्षण छिटपुट कई स्थानों पर दिखे जो Oak Land Bay तक फैल गए थे। इस बार बीमारी को तुरंत नियन्त्रण में कर लिया गया था। इसके लिए काफी चूहों को, जो इस बीमारी के वाहक बताये जाते हैं, मार दिया गया था। क्रमश:

Sunday, January 6, 2019

तुलसी भवन में कथा मंजरी 06-01-2019, बिजली आती जाती रहने के फायदे


#BnmRachnaWorld
# Satire


कल ता 06-12-2019 को स्थानीय तुलसी भवन के प्रयाग कक्ष में सिंहभूम हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में "कथा मंजरी" कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डा नरमदेश्वर पाण्डेय जी ने की और संचालन आदरणीय श्रीराम पाण्डेय भार्गव जी ने किया। इसमें कई लघु और मध्यम कथाओं का पाठ और उनकी समीक्षा प्रस्तुत की गयी। मैने भी अपनी हास्य-ब्यंग्य पर आधारित रचना "बिजली आती जाती रहने के फायदे" पढ़कर सुनायी। इस रचना में विद्युत के अनियमित संचार से कटाक्ष का सृजन किया गया है। विद्युत की अनियमित उपलब्धता को कायम रखते हुए बिजली विभाग कैसे सृजनात्मकता के लिये लोगों को प्रेरित कर रहा है, ब्यंग्य का यह मुख्य बिन्दु था। मेरी रचना की समीक्षा आदरणीय अशोक पाठक स्नेही जी ने की। शायद काव्य पाठ के इतर, गद्य साहित्य पर निरंतर आयोजित किया जाने वाला यह सबसे अलग और सर्वोत्तम कार्यक्रम है। 


बिजली आती जाती रहने के फायदे


इसके पहले कि मैं बिजली 'आती जाती रहने' के फायदे गिनाऊँ, बिजली 'आती जाती रहने' का मतलब समझना जरूरी है।
यह उस क्षेत्र की शोभा है, जहां बिजली उसके तारों में एक बार दौड़ तो गई, लेकिन एक बार दौड़ लगाने के बाद इतनी थक गई है कि अब वह आती है, तो कब जाएगी, इसका इंतजार उपभोक्ताओं को ज्यादा देर नहीं करना पड़ता।
बिजली आती जाती रहने का सबसे अधिक फायदा बच्चों की पढ़ाई को लेकर होता है। बिजली रहने से छोटे बच्चे स्कूल से आते ही टीवी के सामने बैठकर कार्टून चैनेल देखना शुरु कर देते हैं। अब वहीं पर उन्हें लंच, डिनर सबकुछ चाहिये।
बन्द हो जाती है पढ़ाई,
मम्मी अगर टीवी बंद कर पढ़ने को कहती है,
तो शुरु हो जाती है लड़ाई।
शाम को बाहर खेलने भी नहीं जाते। आउटडोर खेल नहीं खेलने से मोटापा बढ़ता है। बढ़ा हुआ मोटापा अपने साथ कई बीमारियों का मूल कारण बनता है।
इन सबों से उबरने का सिर्फ एक उपाय, बस बिजली का प्रवाह निरन्तर नहीं हो।आती जाती रहे।
'आती जाती रहना' या 'आते जाते रहने' का एक और मतलब देखिये या समझिये:
बहुत गहरे अर्थ में यह कथन प्रयुक्त होता है।
जैसे आप किसी दोस्त के यहां जाते हैं। वह आपको अपने घर या फ्लैट की ओर जाने वाले रास्ते के उदगम स्थल यानी कि सीढ़ी या लिफ्ट के पास ही रोक ले, और कहे, "बहुत दिनों बाद मिले। मैं अभी फलाना काम निपटा कर आ रहा हूं। तुम आते-जाते रहना।"
इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि अभी तुम आ गये सो आ गये, आगे कभी मत आना।
और अगर आप उसके दरवाजे के पास पहुंच गये और इत्तेफाक से उसीने दरवाजा खोला, आप तो बहुत खुश हो जायेंगे, चलो, आज तो घर पर ही मिल गया। वह आत्मीयता दिखलाते तुरत बोलेगा, "मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था। अचानक एक अर्जेन्ट काम आ गया है। अच्छा मुझे अभी निकलना होगा। तुम आते जाते रहना।"
कहकर वह दरवाजा बन्द करने लगेगा या कर देगा। साफ जाहिर है कि वह आपको 'आते जाते रहना' कहकर इसपर जोर देना चाह रहा है कि इधर कभी नहीं आना या आने का रुख भी नहीं करना।
अब यह आप जैसे घड़ा मानुष के चिकनेपन पर निर्भर करता है कि आप उसके इसतरह दुत्कारने की शरहद तक पहुंचे शब्द सुनाने के बावजूद भी कितना ठहरता है। यानी आप वहां उसका इन्तजार करते हुये थेथरपन के किस हद तक जाते हैं।
बिजली आती जाती रहने से बिजली विभाग उपभोक्ताओं को यह सीधा सन्देश दे रहा होता है कि हम तो ऐसे ही आपूर्ति करेंगें। है आपके पास कोई उपाय तो करके देख लीजिये।
आजादी के बाद पिछले सत्तर सालों से उपभोक्ता इसका आनन्द उठा रहे हैं और आपको तकलीफ हो रही है।
उसका सन्देश साफ है, "बिजली रहेगी, टीवी खोलकर उलुल जलूल षडयंत्र से भरा सीरियल देखियेगा या न्यूज़ चैनलों में पैनल विचार विमर्श के नाम पर कुकुरहाव देखियेगा।
उससे अच्छा है कि स्वयं कुछ लिखिए पढिए, क्रिएटिव बनिये।"
मेरी समझ में इस दृष्टि से बिजली विभाग विद्युत के बाधित वितरण प्रणाली को कायम रखकर उपभोक्ताओं को रचनात्मक बनने का सन्देश दे रही है। इसतरह वह राष्ट्र हित में सबसे युगान्तकारी और क्रान्तिकारी कार्य कर रही है। हम भले उसे कोसें, लानत मलामत भेजें, परन्तु आने वाली नस्लें उसके रचनात्मक योगदान के लिये हमेशा याद करेगी।
आप याद करें महान विद्वान और समाज के दिशा निर्देशक इश्वर चन्द विद्यासागर को। वे बाहर के सडक पर स्थित लैम्प पोस्ट की रोशनी में पढ़ाई किये और विद्वता हासिल के। अगर उनके घर में बिजली होती तो क्या वे कभी इतना संघर्ष कर पाते? क्या उनकी रचनात्मकता इतनी विकसित हो पाती? वे घर में बिजली के पंखे में हवा खाते और आलस्य में अपना समय गुजार देते।
उनके संघर्ष के जज्बे को धार किसने दिया? उन्हें रचनात्मकता का पहला पाठ किसने पढाया? बिजली विभाग ने। उनके घर में बिजली की सप्लाई नहीं देकर।
उससमय अंग्रेजी सरकार थी। सबों को बिजली का कनेक्शन नहीं दिया जाता था। अगर अभी की कोई सरकार होती, जिसे वेलफेयर सरकार भी कहा जाता है, बिजली का मुफ्त कनेक्शन दे देती तो देश और समाज एक विद्यासागर से बंचित रह जाता। यह एक उदहारण है। मुझे समझ में आ गया है कि जहां बिजली की निरन्तर आपूर्ति की जा रही है, वहां कितनी प्रतिभायें विद्यासागर बनने से बंचित रह गयी हैं।
सरकार को फिर से सोचना चाहिये कि बिजली की लगातार सप्लाई राष्ट्र निर्माण के लिये कितना घातक है।
हमें जहाँ बिजली की निरन्तर आपूर्ति नहीं है और जहां बिजली की निरन्तर आपूर्ति की जा रही है, दोनों स्थानों में उभरते प्रतिभाओं की तुलना करनी चाहिये।
तुलना में अवश्य यह बात साफ हो जायेगी कि जहां बिजली की बाधित आपूर्ति है, उस क्षेत्र के रहवासियों में जुगाड़ पर अधारित प्रतिभा के धनी लोग, बालक और बालिकाएं अधिक है।
इसीलिये उर्जा मंत्रालय द्वारा यह आदेश तुरंत निर्गत किया जाना चाहिये की विद्युत की रुक रुक कर आपूर्ति करें। इससे उर्जा की बचत होगी। प्रतिभाओं के विकास में उर्जा विभाग का योगदान राष्ट्र के लिये गौरव की बात होगी।
इसके साइड इफेक्ट यानि अगल बगल या बामपृष्ठ प्रभाव भी दूर गामी और लाभ कारक हैं।
जैसे अगर बिजली आती जाती रहेगी तो उसकी निरन्तर उपलब्धता बनी रहे इसके लिये लोग इन्वर्टर खरीद लेंगें। इन्वर्टर वह यन्त्र है जो बिजली रहने पर बिजली से बैटरी को चार्ज करता है और बिजली चले जाने पर उसी बैटरी से बिजली की आपूर्ति होनी शुरु हो जाती है। इसतरह बिजली की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहती है।
इनवर्टर के बनाने से लेकर लगाने और उसके रखरखाव के लिये लोगों की नियुक्तियां होगी। इस तरह बेरोजगारी की समस्या को हल करने में बिजली विभाग का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
शर्त इतनी-सी है कि किसी भी स्थिति में बिजली आती जाती रहे, झलक दिखलती रहे, तो एक नई नवेली चन्द्रमुखी दुल्हन की तरह हमेशा ही दर्शनीय रहेगी वर्ना हमेशा बिजली के प्रकाश में अगर दिखती रहेगी तो चन्द्रमुखी से ज्वालामुखी दिखने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
इसीलिये मेरा उन उपभोक्ताओं को, जिन्हे लगातार बिजली मिलती रहती है, मेरा फ़्री या मुफ्त में सुझाव है कि वे उस क्षेत्र में अपना निवास बदल लें, जिधर बिजली आती जाती रह्ती है। उन्हें वे सारे फायदे अनायास ही प्राप्त हो जायेंगें, जिन्हें मैं ऊपर गिना चुका हूं।

-कापीरायट ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र



Friday, December 28, 2018

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की विशेष गोष्ठी, 27-12-18

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27-12-2018 की शाम मेरे लिए खास बन गयी जब मैंने हिन्दी साहित्य और हिन्दी काव्य के देदीप्यमान हस्ताक्षर , अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संगठन मंत्री आदरणीय डा संजय पंकज जी को अपनी कार में लेकर आदरणीया मन्जू ठाकुर जी के आदित्यपुर एस टाइप मोड़ स्थित निवास स्थान पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद की विशेष बैठक सह लिटि पार्टी सह काव्य गोष्ठी के लिये लेकर पहुँचा। वहाँ आ शैलेन्द्र पाण्डेय शैल जी की अध्यक्षता और अभय सावंत तथा हुलास के संस्थापक आ चावला जी की विशिष्ट उपस्थिति रही। आ मन्जू ठाकुर जी के आतिथ्य ने सबों को अभिभूत कर दिया। बैठक में आ डा संजय पंकज जी ने संगठन के उद्देश्यों और आगे के रोड मैप को रेखांकित करते हुए, झारसुगुड़ा में होने वाले सम्मेलन में भाग लेने का आहवान किया। इसी अवसर पर मैने भी अपनी रचना
"एकलव्य कह रहा,,," का पाठ किया। उसकी कुछ पन्क्तियाँ मैं नीचे दे रहा हूँ।
इसी अवसर पर मैने डा संजय पंकज जी को अपनी पुस्तक "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" भेंट की। उसी समय की कुछ तस्वीरें यहाँ पर देते हुए मुझे अपार हर्ष हो रहा है।
कविता की कुछ पंक्तियाँ:
मुक्त छन्द--------------------

एकलब्य कह रहा,
अपने गुरु से:
मैं समझता हूँ
उस गुरु की वेदना को,
अंतर्द्वंदों में छलनी होती
टूटते सिद्धान्तों और आचार संहिताओं की
विवशताओं से निर्धारित होती
जीवन यापन की परिकल्पना को।

जिस गुरु को अपनी ही संतान के लिए,
आंटे के घोल को रंग दे सफ़ेद
आभास देना पड़ा हो दुग्धपान के लिए।
जिस गुरु को सर्वश्रेष्ठ धनुर्विद्या में
निष्णात होने के उपरांत भी,
अपनी संतान को पिलाने को दूध,
मांगनी पड़ी हो अपने ही परम मित्र से,
कम - से - कम एक गाय की भिक्षा।
जिसे अपमान का दंश
विवशताओं के विषदंत
के बीच देनी पड़ी हो
परिवार के पालन की घोर परीक्षा।

उस गुरु के दरबारी गुरु
में बदल जाने में बहुत कुछ
भीतर - भीतर मरा है।
बहुत कुछ भीतर- भीतर
मारना पड़ा है।
×××××××××
पूरी कविता इस लिन्क पर पढें
marmagyanet.blogspot.com/2018/09/blog-post.html?m=1




Monday, December 17, 2018

अमेरिका डायरी, 51 वाँ और 52 वाँ दिन(Day 51,52)

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#americatourdiary




23-08-2018, इरवाइन, यू एस ए में 51 वाँ दिन (Day 51):
इस शहर का इतिहास इस क्षेत्र के "Gold Rush" (सोने के लिये दौड़) से शुरु होता है। विपुल वैभव और अकूत धन की खोज में 1849 ई में आये लोगों ने San Francisco के Banicia में अपना बसेरा बनाया था। उसी समय यहाँ की आबादी 1000 से 25000 हो गयी थी। अकूत अर्थ की चाहत इतनी अधिक थी कि समुद्री जहाजों से आये यात्रियों ने जहाजों को यूँ ही छोड़ दिया और सोने के खान की ओर सोना लूटने दौड़ पड़े थे। इस तरह SFO के बन्दरगाह पर करीब 500 जहाज वीरान छोड़ दिए, जिन्हें बाद में storeships hotel और Saloons के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। कई जहाजों के लिये वह स्थान कब्रगाह बन गया। बाद में जब वहाँ पर इमारतें खड़ी करने के लिए खुदाई होती थी, तो उन जहाजों का मलबा वहाँ पड़ा मिलता था। 1870 ई में Yerba Buena Cove क्षेत्र को भरकर, समुद्र के तट पर इमारतों कौ खड़े करने के लिए उस स्थान का नींव के रूप में उपयोग किया गया।
1850 ई में जब कैलिफोर्निया को राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ, तब US Golden Gate के दक्षिण में Sea Coast San Francisco Bay कीकी हिफाजत के लिए Fort Point का निर्माण किया गया था। यह किला American Civil War, जो US Army के द्वारा बाहर से आक्रमणकारी जहाजों से Bay Area की सुरक्षा के लिये हुआ था, के ठीक पहले बनकर तैयार हुआ ठा। अभी यह किला एक राश्ट्रीय ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित है। यहीं पर Golden Gate Recreational Area भी बना हुआ है।
San Francisco Bay की सुरक्षा के लिए समुद्र के बीच एक विशालकाय विस्तृत चट्टान नुमा Alcatrez Island पर भी एक किला बनाया गया।
Nevda राज्य के Comstock Lode में 1859 ई में Eastern Slope of Mount Davidson की ओर सिल्वर अयस्क (चांदी की खान), के मिलने पर यहाँ की आबादी में तेजी से इजाफा हुआ। इसतरह अपनी किस्मत आजमाने और उसे बुलंद बनाने वाले लोगों की बढ़ती भीड़ के कारण कानून ब्यवस्था की स्थितियाँ बिगड़ती चली गयीं। इस तरह शहर का Barbary Coast आपराधिक गतिविधियों, वेश्या और देह ब्यापार तथा जुआ का केन्द्र बन गया। क्रमशः

24-08-2018, इरवाइन, यू एस ए, 52 वाँ दिन (Day 52):
1849 ई में Gold Rush और 1859 ई में Nevda के Mount Davidson के पूर्वी ढलान से नीचे के क्षेत्र में चाँदी की खानों से इस क्षेत्र में जो समृद्धि आयी, उसे उद्योगपतियों ने ब्यापार के लिए नए मौके के रूप में देखा। शुरु के समय में बैंकिंग उद्योग ने इस क्षेत्र में पहलकदमी की। इसतरह Walls Fargo (1852 ई) और Bank of California (1864 ई) की स्थापना हुयी। 1869 ई में San Francisco बन्दरगाह US के रेल का महकमा Pacific Rail Road के बन जाने के बाद, रेल सुविधा से जुड़ने से यह क्षेत्र ब्यवसाय का मुख्य केंद्र बन गया। बढ़ती आबादी की और रुझान के अनुसार Levi Strauss नए एक Dry goods business और Doniango Ghiradalli ने चॉकलेट बनाने के लिये निर्माण केंद्र की स्थापना की।
बाहर से आये कामगारों से इस शहर में मिश्रित भाषी (polyglot) या बहुभाषीय संस्कृति का विकास हुआ। इसी के अन्तर्गत चाइना टाउन क्षेत्र का निर्माण हुआ। आज भी यह क्षेत्र उत्तरी आमेरिका में चाइनीज़ आबादी का सबसे बड़ा क्षेत्र है। 1870 ई तक यहाँ की एशियन आबादी करीब 8% हो गयी थी।
कहा जाता है कि 1893 ई मेँ यहाँ पहला केबल कार, clay street hill को तय करने के लिए सन 1873 ई में चलायी गयी थी। इसे किसने चलाया, इसके बारे में विवाद है, जिसकी चर्चा हम दूसरे दिन के पन्ने पर करेंगें।
उसी समय Victorian Houses जो रानी विक्टोरिया के समय में एक पंक्ति में  बने एक ही तरह के वास्तु के अनुसार बने घर थे, बनने शुरु हुए। आबादी जब बसनी शुरु हुयी तो स्थानीय नेताओं ने एक बड़े पार्क की माँग रखी। इसके बाद ही Golden Gate Park की योजना बनी।
क्रमशः  

Thursday, December 13, 2018

डा कमलकांत लाल से अविस्मरणीय मुलाकात, 13-12-2018

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#mulakaat#famous#personality


मित्रों, अपने ब्यस्ततम ब्यवसाय से भी कुछ समय को चुराकर पुस्तकों के प्रति अपने प्रेम, चाहे वह लेखन हो या पठन पाठन बहुत कुछ किया जा सकता है, इसे साबित कर दिखाया है, इसी जमशेद्पुर  शहर के प्रसिद्ध डाक्टर कमल कान्त लाल जी ने।  अपने आकाशदीप प्लाजा, गोलमुरी स्थित क्लिनिक में मरीजों का इलाज भी करते हैं और उसी क्लीनिक से सटे हुए संग्रहनीय साहित्यिक और वैचारिक पुस्तकों की लाइब्रेरी सह बिक्री केंद्र मे वे  मस्तिष्क के खुराक के लिये पुस्तकें भी उपलब्ध करवाते हैं। आज अपराह्न डेढ़ बजे अल्पावधि मुलाकात में ही  उनसे जो आत्मीयता स्थापित हुयी उसे स्थायी बनाने के लिये मैने इसी वर्ष जनवरी में दिल्ली पुस्तक मेले में लोकार्पित अपना उपन्यास " डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन"  उन्हें भेंट की, और उन्होने भी अपना लिखा उपन्यास "अपराध बोध"  मुझे दिया। उसी समय ली गयी सेल्फी साझा करते हुए मैं आहादित हूँ, आनंद विभोर  हूँ। सादर!

Monday, December 10, 2018

''कविता, कल आज कल" के लोकार्पण पर ता ९-१२-१८ को मुख्य वक्ता के रूप में मेरा वक्तब्य

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कविता, कल आज कल के लोकार्पण पर ता ९-१२-१८ को मुख्य वक्ता के रूप में मेरा वक्तब्य

सम्माननीय मंच पर  मौजूद अध्यक्ष श्री श्यामल सुमन जी, मुख्य अतिथि विशिष्ट पत्रकार डी  इस आनंद जी, आदरणीया मंजू ठाकुर जी, मंचस्थ विशिष्ट अतिथि आ ज्योत्सना अस्थाना जी, मंजू ठाकुर सम्मान से सम्मानित शिक्षाविद आ अनीता शर्मा जी, और मुख्य वक्ता के रूप में  मैं, डा आशा गुप्ता, डा मनोज आजीज, आ सीता सिंह जी और मंच संचालिका आ कल्याणी कबीर जी, तथा इस होटल बुलेवर्ड के सभागार में उपस्थित साहित्यान्वेषी बन्धुगण और मातृशक्ति:

तारिख 09-12-2018 को  मुकेश रंजन जी के द्वारा सम्पादित "कविता" पत्रिका के विमोचन और लोकार्पण में मुख्य वक्ता के रूप में मेरा अभिभाषण:
स्थान: बुलेवर्ड होटल, बिस्टुपुर, जमशेदपुर
सम्माननीय मंचस्थ.............

प्रिय मुकेश जी के भागीरथ प्रयत्न से "कविता" पत्रिका का महिला रचनाकारों पर यह विशेषांक आपके हाथों में है| यह पत्रिका पिछले नौ वर्षों से कभी अर्धवार्षिक और अभी वार्षिक रूप में प्रकाशित होकर अपना वजूद बनाये हुए है| किसी भी साहित्यिक पत्रिका की यह यात्रा, विभिन्न अवरोधों, मोड़ों और कुछ तीखे मोड़ों और ठहरावों से होती हुई अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कर रही है, यह मुकेश के अनवरत परिश्रम और उनके सार्ह जुड़ी साहित्यकारों की सम्पादक मण्डल के द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन को जाता है।
मुझे यह पत्रिका मुकेश जी ने एक सप्ताह पूर्व दी थी| मैंने इसके अतिसाधारण आवरण पृष्ठ को देखा| सहसा विशवास ही नहीं हुआ की यह पत्रिका है| मुझे तो यह लघु पुस्तिका जैसी लगी| आवरण की रूप सज्जा की यही सरलता इसे सहज और विशिष्ट बनाती है| इसका  पता मुझे तब  लगा जब मैंने इसके अंदर झांकने का क्रम शुरू किया| अंदर भी कोई तामझाम नहीं, कोई रंगीन तस्वीर नहीं| परन्तु इसके शब्दों और पंक्तियों से गुजरने पर जितने रंग उभरते हैं वो पन्नों के रंगीन बनाने से संभव नहीं थे| मुकेश जी ने अपने सम्पादकीय  वक्तव्य में इसे इंद्रधनुष का आठवां रंग कहा है| विज्ञान के लोग इंद्रधनुष के आठवें रंग की खोज करेंगें, पर साहित्य  की विधा में आठवे रंग की अभिब्यक्ति तो हो ही गयी है| अतिथि सम्पादक आदरणीया कल्याणी जी ने सही कहा है कि इसके पीछे यानि इस पत्रिका के आठवे रंग को उकेरने के पीछे खड़ा है, "मुकेश का बुलंद हौसला, साहित्य से जुड़े रहने की जिद और कुछ अलग करने की ख्याहिश|"
मुझे गुरु नानक जी के जीवन का एक प्रसंग याद आ रहा है:
एक बार गुरु नानकदेव जी अपने कुछ शिष्यों के साथ किसी गाँव में गए| वहाँ उन्होंने उपदेश दिए| गाँव के लोगों ने उनकी खूब आवभगत की| उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम यहीं पर खूब बढ़ो, तरक्की करो|
इसके बाद वे एक दूसरे गाँव में गए| वहाँ के लोगों ने उनकी गुरुवाणी सुनी| उसे जीवन में उतारने का संकल्प लिया| वे उनकी और उनकी मंडली का उतना  सत्कार नहीं कर सके जितना कि पिछले गाँव वालों ने किया था| जब वे वहां से चलने लगे, तो उस गाँव वालों को उन्होंने आशीर्वाद दिया कि तुमलोग बिखर जाओ| अब उनके शिष्यों को चौंकने की बारी थी| उनके एक शिष्य ने उनसे पूछा, "गुरु जी, जिन गाँव वालों ने आपके उद्देश्यों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया उसे आपने बिखर जाने का आशीर्वाद दिया जबकि उन गाँव वालों को जिन्होंने आपकी खूब आवभगत की और आपके उपदेशों  पर अमल करने का संकल्प नहीं ब्यक्त किया,  उसे आपने खूब बढ़ने का आशीर्वाद दिया| ऐसा क्यों, गुरूजी?"
गुरुनानक देव जी ने जवाब दिया, "मैंने पहले गाँव वालों को जिन्होंने सिर्फ आवभगत में ही रूचि दिखलाई,  उनको मेरे उपदेशों में कोई रूचि नहीं थी, उससे कोई मतलब नहीं था| उन्हें अपने गाँव में ही रहकर खूब बढ़ने का आशीर्वाद दिया| ऐसे लोगों को एक ही जगह पर सीमित रहना ज्यादा अच्छा है|
दूसरे गाँव वालों को, जो हमारी आवभगत उतनी नहीं कर सके जितनी पहली गाँव वाले ने की थी, परन्तु मेरे उपदेशों को आत्मसात किया और उन्हें अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया, उन्हें  मैंने बिखर जाने का आशीर्वाद दिया, क्योंकि अगर वे मेरे उपदेशों को आचरण में स्थापित करते हुए बिखर जायेंगें यानि फैलेंगे, तो वे मेरे उपदेशों को सारी दुनिया में फैलाएंगे|”
आप सभी रचनाकार अपनी - अपनी सीमा रेखाओं से परे साहित्य  की सुगंध फैलाने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं | यह बहुत बड़ी बात है| इसपर  अपनी लिखी कुछ पंक्तियों मैं उद्धृत करना चाहता हूँ:
लताओं पर कलियों को लचकने तो दो,
शाखों पर परिंदों को चहकने तो दो|
आज खुशबुओं को कैद मत करो,
उसे फिजाओं में फैलकर कर महकने तो दो|
कल की कल देखी जाएगी दोस्तों,
आज इस शाम चाहतों को मचलने तो दो|
आप सबों को इस कार्यक्रम के धागे में पिरोकर "कविता"पत्रिका के माध्यम से एक मंच पर लाकर खड़ा किया गया है| इसका श्रेय मुकेश का पूर्वाग्रह होना और सम्पादक मंडल के दिशा निर्देशन को जाता है | "कविता, कल आज कल" में आपका साक्षात्कार जमशेदपुर के सात महिला रचनाकारों और जमशेदपुर के बाहर मुजफ्फरपुर की एक रचनाकार से होगा| इन रचनाकारों की समीक्षा हिंदी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठ सख्शियतों  द्वारा की गयी है|
जैसे आ प्रेमलता ठाकुर के रचना संसार पर माधुरी  मिश्रा ने समीक्षा लिखी है| आ पद्मा मिश्रा के साहित्य संसार के  बारे में डा मनोज "आजिज" ने विश्लेषण किया है| आ अनीता शर्मा जी की रचनाओं पर डा कल्याणी कबीर की समीक्षा आयी है| आ अनीता सिंह "रूबी" के बारे में प्र प्रसिद्ध साहित्यविद डा सी भास्कर राव ने लिखा है | आ उमा सिंह "किसलय" के बारे में वीणा पांडेय "भारती" ने अपने उदगार ब्यक्त किये हैं|  मुजफ्फरपुर की आ मीनाक्षी मीनल और आ सोनी सुगंधा का परिचय प्रिय मुकेश रंजन ने करवाया है| आ सरिता सिंह के साहित्य संसार की समीक्षात्मक प्रस्तुति आ ज्योत्सना अस्थाना ने की है| सारे महिला रचनाकारों की प्रतिनिधि कविताओं को भी इसमें सम्मिलित किया गया है| आप अगर उन कविताओं को पढेंगें तो आपको कहीं रिश्तों की रिमझिम से,  तो कहीं रीतेपन से, समाज की विद्रूपताओं से कहीं स्त्री विमर्श के लिए तैयार आगे बढ़ती नारी से, कहीं नए आकाश की और उड़ान भरने को आतुर  नारी से,  तो कहीं अपने वजूद को पुन: परिभाषित करती नारी से परिचय पा सकेंगें| जैसे-जैसे आप इन कविताओं में रमते हैं, आप पाते हैं कि ''माँ, मैं जीना चाहती हूँ" की पुकार लगाती नारी "देह, देहरी से  बँधकर दंश" झेलने को तैयार नहीं है, वह लक्ष्मी, इंदिरा, टेरेसा, तस्लीमा और मलाला  युसुफजाई बनकर आसमान छूना चाहती है| इसलिए
"जब ‘विद्या बालन' की देह
संभाल रही होती - 'डर्टी  पिक्चर की कमान'
और दर्शक सीटियाँ मारते नहीं,
सिसकियाँ भरते सिनेमाघरों से बाहर निकलते हैं
तो पहली बार लगता है
औरत का मतलब 'एंटरटेनमेंट' नहीं होता |"
इन कविताओं में बरसाती नदी का उफान नहीं है, एक नीरव बहती धार है| लेकिन इस धार के अंदर उष्मा है, धाह है, गर्मी है| मुझे याद आता है  "बंदिनी" और "आनंद" फ़िल्में देखकर खामोशी से, चुपचाप बाहर आते दर्शक| ये कवितायें भी उसी प्रकार की है| ये  मंचीय कवितायें नहीं कही  जा सकती, जहां कविताओं के शब्दों को तोड़ा और मोड़ा जाता है, ताकि तालियाँ बटोरी जा सके| इन कविताओं से गुजरने के बाद आप कुछ कुछ खामोश हो जाते हैं, अंतर्मुखी हो जाते है, चुपचाप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं| 
अब मैं इसमें कुछ स्वकथन को जोड़ना चाहूँ तो कहूंगा:
'नहीं होता औरत माने 'बोल्ड और बेवाक' रूप में चित्रित या प्रस्तुत किया जाना | इसे सती - विमर्श से नहीं जोड़ा जा सकता| चली आ रही दस्तूरे, रवायतें, दकियानूसीपन ही नहीं होती | अब वह युग फिर आएगा जब हम इंटरनेट पर बिखरे पोर्न में सौंदर्य को न ढूँढ़कर 'कामायनी, उर्वशी और अभिज्ञान शाकुंतलम' में श्रृंगार ढूढ़ेंगें | इसका दायित्व समाज को दिशा देने वाले हम साहित्यकारों पर आ जाता है| समाज की विद्रूपताओं को हमेशा आवरणहीनता से ही जोड़कर नहीं दिखाया जाना चाहिए| यह मशहूर हो जाने एक फार्मूला भले ही लगे, लेकिन यह साहित्य को दिशा देना नहीं कहा जा सकता|

धन्यवाद|



अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld  #story #affection#GovernmentOfficer अधिकारी की आत्मीयता  ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद ...