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Tuesday, July 31, 2018

अमेरिका डायरी 07-07-2018 (यु एस ए ंंमें चौथा दिन, Day 4)

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07-07-2018, शनिवार, इरवाइन में (यु एस ए में चौथा दिन):
आज सुबह से ही मेरी पुत्रवधु मेहमानों के लिये स्वादिष्ट और लजीज़ ब्यन्जन बनाने में जुटी है। मेनू में चॉवमीन, पूड़ी, छोले आदि तो बने ही थे। साथ में सॉफ़्ट ड्रिंक की भी ब्यवस्था थी।शाम को घर पर ही जन्मदिन मनाने का निर्णय ले लिया गया था। उसके अनुसार स्थल के परिवर्तन से सम्बन्धित सूचनाएं सारे आगन्तुकों को भेज दी गयी थी।
हमलोग 6 बजे शाम को करीब 5 किलोमीटर पर स्थित माल कोस्तिको से केक लाने के लिये निकले। वहां पहुंचे तो देखा कि माल बन्द हो रहा है। तब याद आया कि आज शनिवार होने के कारण माल 6 बजे शाम को ही बंद हो जाता है। तब प्रबन्धक से जाकर मेरे लडके ने बात की। अन्दर जाकर उसने केक की डिलीवरी ली। हमलोग वापस डेरे पर चले आये।
सभी लोग तैयार हुये। मेरी पुत्रवधु ने रिषभ, जिसका जन्मदिन है, उसे तैयार किया, खुद भी तैयार हुयी। मेरी पत्नी भी तैयार हुयी। हमलोग सभी सात बजे तक तैयार हो गये थे।
क्या आप जानते हैं कि बच्चों का जन्मदिन मनाना क्यों जरूरी है? जब बच्चा जन्म लेता है तो साथ - साथ एक माँ, एक पिता का भी जन्म होता है। और उसी के साथ जिम्मेदारियों के अहसास का जन्म होता है। जिम्मेदारियों में यह भी जिम्मेदारी निहित होती है कि आप अपने बच्चे को खूब प्यार दें, सारी खुशियाँ दें, साथ ही साथ आप जब भी कहीं बच्चों को देखें, तो उनमें भी अपने बच्चे का अक्स अगर देखते हैं, तो आपकी जिम्मेदारियों का विस्तार होता है और आप एक जिम्मेदार माता-पिता से जिम्मेदार नागरिक में तब्दील हो जाते है, जो बड़ी समाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए अपने को तैयार कर रहा होता है। यह एक पूरा सृजन का दर्शन है, जो आत्मिक से होता हुआ सार्वभौम सन्सकृति का निर्माण करता है। उसी से जुडते हुये आज मैं भी अपने दादा और मेरी पत्नी दादी बनने का दिन भी याद करते हैं। मुझे याद आ रहा है, रिषभ का पहला जन्मदिन जब मैने एक कविता लिखकर सबों को सुनाई थी:

ऋषभ के प्रथम जन्म दिन पर दादाजी के उदगार...

चुलबुली आँखों में झांकते सपने,
दुआएं दे रहे तुम्हारे अपने ।

तेरी मुस्कराहटें फैलाती रहे रोशनी,
तेरी चपलताएँ चटपटी चाशनी।

तुम अपने पांवों से मुझको भी चलना सिखला दे,
उठकर गिरना,गिरकर उठना,
और सम्भलना फिर चल देना,
सारी दुनिया को, जीने का
यही तो है फंडा बतला दे।

तुम सच करना अपने सपने,
ऐसे काज जहाँ में करना,
तेरे कर्मों के प्रकाश से,
फैले उजाले सबके अंगना।

इस जहाँ में निर्भीक बनो तुम,
सर्वत्र तुम्हारी जय हो,
जन्म दिन तुम्हारा मंगलमय हो !
जन्म दिन तुम्हारा मंगलमय हो !

--ब्रजेंद्र नाथ मिश्र
तिथि: 07-07-2015, इरवाइन, यू एस ए।
शाम 7 बजे से आमन्त्रितों का आना शुरु हो गया। उनमें अशीष, मधुबनी विहार के, फिलहाल माता -पिता पटना में निवास कर रहे है, हर्ष मेरठ के, प्रणव दिल्ली के और अमर आन्ध्र प्रदेश के अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आये। 9:00 बजे केक काटने की औपचारिकता के साथ हैप्पी बर्थ डे गीत गाये गये। कुछ और हिन्दी गाने जैसे "बार बार दिन ये आये, बार बार दिल ये गाये, तुम जियो हजारों साल, ये मेरी है आरजू,,,," और अन्य गीत भी बजाए गये। सॉफ़्ट ड्रिंक्स कोक के बाद चाऊमीन और मंचूरियन, पूड़ी, छोला और और फ्रायड राइस का भी ऑप्शन था। खाना समाप्त होते - होते करीब 10 बज गये। उसके बाद मेहमानों के धीरे धीरे जाने का समय हो गया। गिफ्ट देते हुये और रिटर्न गिफ्ट लेते हुए मेहमान सभी विदा हुये।
ज्ञातब्य हो कि एक और करीबी मित्र बाला जी अपनी पत्नी और बच्चे के साथ दो दिनों बाद आये। उस दिन उनकी बेटी को आंख में कन्जेच्टीवीटीज होने के कारण नहीं आ सके थे।
क्रमश:


Friday, July 27, 2018

अमेरिका डायरी 05-07 और 06-07-2018 (यु एस ए ंंमें दूसरा और तीसरा दिन)

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05-07-2018, दिन वृहस्पतिवार (यु एस ए में दूसरा दिन)
मेरे पोते का जन्मदिन परसो यानि 07 जुलाई को है। उसकी पूर्व तैयारियों की स्गुरुआत आज से ही हो जानी है। सुबह तो चिन्मय ऑफ़िस चला गया। 9 बजे ऑफिस पहुंचना होता है।
मैं जिस घर में और जिस परिसर में ठहरा हुआ हूँ, वहाँ की ब्यवस्था और रखरखाव का अवलोकन करने लगा। यहाँ करीब 1000 युनिट हैं। दो तरण ताल ( स्वीमिंग पूल), एक थोड़ा छोटा और दूसरा बडा। उसी बड़े ताल के बगल में लीजिन्ग ऑफ़िस, जो रखरखाव से लेकर आबंटन आदि की सारी बैधानिक प्रक्रिया को देखता है, स्थित है।
सारे युनिट निम्न तल, मध्य तल और उच्च तल, तीन ही तलों के हैं। सभी रिहायसी घर लकड़ी के बने हैं। बीच में पिलर भी होगा, लेकिन उन्हें भी लकड़ी से ढंक दिया गया है। इस लकड़ी के पैनल पर स्प्रे से ऐसा पेन्ट चढ़ाया गया है कि बाहर से लगता है कि सीमेन्ट की ही दीवार है। परन्तु ठोकने पर पता चलता है कि यह तो लकड़ी है। लकड़ी की दीवारों के बीच ही बिजली के तार हैं, डर लगने की तो बात है। मैं बताता चलूं कि यह क्षेत्र अनावृष्टि क्षेत्र (arid zone) में पड़ता है, फिर भी गरम और ठंढा दोनों तरह के जल की आपूर्ति प्रचुर मात्रा में है। यही नही, यहाँ चारो तरफ हरियाली है। देवदार के वृक्ष काफी संख्या में लगे हैं। बीच बीच में पार्क हैं। बच्चों के खेलने के लिये स्लाइड्स और स्विंग्स (झूले) लगे हैं। हर पार्क में चारों तरफ वृक्ष और बीच में हरा-भरा मैदान। पीने का पानी का भी इन्तजाम और प्रसाधन कक्ष भी हैं। किसी - किसी पार्क में बास्केट बाल और लॉन टेनिस के मैदान भी देखने को मिले।
मैं यहाँ की हरियाली का फैलाव देखकर मंत्रमुग्ध था। जिस क्षेत्र में औसतन 364 mm वारिश सिर्फ साल में 40 दिन ही होती हो, बाकी दिन बारिश बिल्कुल नहीं होती हो, वहाँ जल की आपूर्ति के लिये बारिश पर तो निर्भरता बिल्कुल नहीं हो सकती है। फिर इतनी हरियाली कैसे रह पाती है? इसकी पड़ताल हो जाने पर, मैं अपने आगे के दिनों की डायरी में लिखूंगा।
आज पूरा दिन सोने में बीता। शायद जेट लैग और कल की अनिद्रा के कारण हो।
शाम में, यहाँ 8:30 तक उजाला ही है। इसलिये उस समय तक शाम ही रहती है। रातें अभी छोटी हो रही हैं। हमलोग नजदीक के पार्क में गये, जिसे जन्मदिन के स्थल की उपयुक्तता के बारे में विचार करना था। मैने पूछा कि कितने लोग भाग लेंगें? तो उसने कहा कि दस परिवार, यानि 20 पुरुष-स्त्री मिलाकर और उनके छोटे बच्चे। जन्मदिन मनाने के लिये केक आदि और मेहमानों के लिये डिनर का सामान, सबकुछ कार में डालकर ले आयेन्गें, जन्मदिन मनायेन्गें और वापस चले जायेंगें। मुझे वैसे पार्क में मनाना कुछ अटपटा सा लगा , लेकिन फिर लगा कि लोग मनाते हैं, तो मनाने में कोई हर्ज नहीं।

क्रमशः

06-07-2018, शुक्रवार, इर्वाइन में (यु एस ए में तीसरा दिन)

आज चिन्मय ने छुट्टी ले रखी है। मौसम के अनुमान के अनुसार आज और कल तापमान 40 डिग्री तक रहने की सम्भावना है। ऐसे में कल क्या पार्क में जन्मदिन मनाना ठीक रहेगा? कुछ आगन्तुकों के 4 महीने के भी बच्चे है। इस भीषण गर्मी में क्या पार्क में वे अपने इतने छोटे बच्चों के साथ आ सकेंगें।? इसपर विचार कर ही रहे थे, कि इसके एक मित्र का फोन आ गया कि वह तो अभी न्यू यार्क में है। 4 जुलाई को अमेरिकी स्वतन्त्रता दिवस की छुट्टी इसके बाद 5 और 6 यानी बृहस्पतिवार और शुक्रवार को छुट्टी ले लेने पर शनिवार और रविवार को सप्ताहांत की छुट्टी के साथ, 5 दिनों की छुट्टियों में परिवार सहित जाया जा सकता है। सही है, ऐसे मौके कम ही मिलते हैं। उसमे चिन्मय के कई दोस्त जो जन्मदिन के अवसर पर आनेवाले थे, अनुपस्थित हो जायेंगें, इसकी सम्भावना प्रबल हो गयी। ऐसे में घर में ही ए सी चलाकर, गर्मी को मात देते हुये एक कृत्रिम खुशनुमा मौसम का निर्माण किया जा सकता है। तय हुआ की घर में ही मनाया जाय!
हमलोग पास के कोस्तिको और वल्ल्मार्ट मॉल गये। वहाँ से जन्मदिन के लिये आवश्यक सामानों, मसलन बैलून, उसे फुलाने वाला पम्प, और खाने के अन्य सामान्य के साथ, एक बडा क्रेट छोटे छोटे पकेज्द पानी बोतलों का लिया गया। एग्लेस्स केक की खोज करने पर कोस्तिको और वॉल मार्ट में निराशा ही हाथ लगी। हमलोगों ने वहाँ जाने के लिये रुख किया जहां इंडियन समान मिलते हैं। वहाँ पर भी एग्ग्लेस केक के छोटे साइज़ की भी कीमत कफ़ी थी। उसके लिये भी 4 दिन पहले ओर्डर किये जाने की बाध्यता थी, जिसके लिये अभी समय नहीं था। इसलिये अन्ततः हमलोगों ने कोस्तिको में ही जाकर ओर्डर किया, बडा सा केक। केक की डिलीवरी कल लेनी थी।
आज रात को जैसे ही गीत " हम भी अगर बच्चे होते, नाम भी मेरा होता गब्लू, बबलू,,," मेरा पोता रिषभ छूटकर डांस किया, जिसका वीडियो मैं यू टयूब पर डालूंगा। आनन्द आ गया। मैने अपने बच्चों का बचपन तो इतने करीब से देखा भी नहीं, या देखा भी होगा तो याद करने लायक जो भी रहा होगा, वह कुछ याद नहीं। यहाँ सचमुच आनन्द के क्षणों को जीने का मौका है, और उसके हर पल को मैं जीना चहता हूँ।
क्रमश:


Wednesday, July 18, 2018

अमेरिका यात्रा, 04-07-2018, होंग कोन्ग से लॉस एन्ँजल्स (दूसरा दिन)

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ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग से लॉस ऐंजल उड़ान पर:







ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग विमान तल पर लॉस ऐंजल के लिये उड़ान पर:
पिछले पोस्ट में मैने होन्ग्कोन्ग विमान तल के लाउंज में मोगा, पंजाब की आदरणीया किरणबाला जी के साथ बातचीत के दौरान उनकी जिन्दगी के संघर्षो से रुबरु करवाया।
लाउंज का ए सी इतना इफेक्टिव था कि मुझे थोड़ी ठंढ भी लग रही थी। मुझे अपना जैकेट ले लेना चाहिये था। परन्तु L A में रह रहे मेरे लडके ने कहा कि वहाँ अभी गर्मी का मौसम चल रहा है। इसलिये जैकेट लेने की कोई जरूरत नहीं है। मैने जैकेट नहीं ली। लेकिन यहां जब ठंढ नाकाबिलेबर्दास्त होने लगा, तब मुझे अपने जैकेट नहीं लेने का अफसोस जरूर होने लगा। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ, जब इस कम तापमान में भी कई यात्री कम कपड़ों में दिखी। ऐसी ही एक यात्री अपने मैस्कुलिन जेंडर के साथ मेरे बाजू वाली कुर्सी पर आकर बैठी। ना चाहकर भी कभी - कभी मेरी नजर उधर उठ जाती थी। इसे मेरे पास कुछ करने के लिये कुछ नहीं होने के खालीपने के हावी होने का असर भी मान सकते है। मुझे एक लेखक की पक्तियाँ याद आने लगीं: "ईश्वर की सृष्टि पर अगर आपकी दृष्टि जाती है, तो यह उन्हीं के द्वारा प्रदत्त स्वभावजन्यता के कारण है। वही दृष्टि, ब्यष्टि में डूबते हुए, समष्टि में विस्तार ग्रहण करती है। उस दृष्टि को बनाये रखना चाहिये।" उस लेखक का नाम पता करने की कोशिश में लगा हूँ। पता होते ही पता दूंगा। इस बार नजर घूमी तो उन मोहतरमा ने अपने खुले हिस्से को बड़े तौलिया से ढँका हुआ था। ऐसा उन्होने घूरती हुयी बुरी नजरों से खुद को महफूज रखने के लिये तो नहीं ही किया था। इससे यह साबित होता है कि अगर छोटे- छोटे कपड़ों में भी आप फैशन परेड की तरह घूमते रहते हैं, तो दर्शनार्थी नजरों की गर्माहट भी ए सी की नर्माहट को कम कर देता है।
स्थानीय समय के अनुसार करीब 2 बज चुके थे। मैने डिस्प्ले बोर्ड पर देखा कि हमारी फ्लाइट की गेट संख्या दी जा चुकी है। हालाँकि उड़ान समय 4:55PM स्थानीय समय के अनुसार था, फिर भी हमलोगों ने चलकर बाकी के इन्तजार का समय बोर्डिंग गेट के पास ही बिताना उचित समझा। आदरणीया किरणबाला जी ने इस थोडी देर के साथ के लिये आभार प्रकट किया। इन्तजार का वक्त बिना बोर हुये कट गया, या कहें कि कैसे कट गया पता ही नहीं चला।
वहाँ से उसी तल पर मैं और मेरी पत्नी अपने हैण्ड लगेज़ के साथ सुरक्षा जांच के लिये बढे। वहाँ से गुजर चुकने के बाद उसके नीचे तल पर एलिभेटर से गये। वहाँ एक टनेल ट्रेन, यानि चार डब्बों की मैट्रो ट्रेन हमलोगों को लेकर 40-80 गेट के सामने खड़ी हो गयी। वहाँ उतर गये। सिस्टम ऐसा था कि मैट्रो ट्रेन का गेट खुलता था, तभी ट्रेन के बाहर का गेट भी खुलता था। हमलोग बाहर आ गये। वहाँ से ऊपर की ओर जाने वाली स्वचालित सीढियों से ऊपर आ गये। वहाँ आकर डिस्प्ले बोर्ड पर देखने लगे, तो पाया कि हमारी उड़ान संख्या के सामने कोई गेट नम्बर नहीं दिख रहा था। हमें पता चल गया कि यहाँ भी भारतीय रेल में जैसे पूर्व घोषणा को कभी-कभी अन्तिम समय में ट्रेन आने के ठीक पहले बदलकर प्लेटफॉर्म संख्या बदल दी जाती है, वैसे ही यहाँ भी हो सकता है।
या हो सकता है कि मेरे जैसे भारतीय के उड़ान में बैठने की सीट तो आबंटित हो गयी, परन्तु अन्तिम समय तक कुछ तो ऐसा होना चाहिये ताकि हमें यहां भी थोड़ा भारतीय सिस्टम की फीलिंग हो। हमलोग सजग थे, क्योंकि अन्तिम समय के उलट फेर को अपनी रेल यात्रा के दरम्यान भारत में झेल चुके थे। लेकिन हमारी यह गलतफहमी ज्यादा देर नहीं कायम रह सकी। 20 मिनट के इन्तजार के बाद ही गेट संख्या प्रदर्शन पट (डिस्प्ले बोर्ड ) पर आ गयी। हमने 47 नम्बर गेट के तरफ अपना रुख किया। अभी भी उड़ान के लिये सवा घन्टे बाकी थे। वहाँ हमलोग इन्तजार करते हुये, शीशे से घिरे पूरे हाल के बाहर देखने लगे। कैथे पैसिफिक लिखा एक बडा-सा विमान दिखाई दिया। शायद यही विमान हो, जिसमें हमें एल ए (लॉस ऐंजल) की उड़ान के लिये स्थान ग्रहण करना हो। मैने तुरत उस विमान की तस्वीर उतारी। कुछ देर बाद बिना कोई घोषणा के मैने देखा कि वहाँ के स्टाफ यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवा रहे हैं। मैने पूछा की उड़ान संख्या CX 822 के यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवाया जा रहा है, क्या। उसने जवाब दिया, 'यह लाईन बिसिनेस क्लास के लिये है। अभी एकोनोमी क्लास के लिये लाईन लगनी शुरु नहीं हुयी है।'
यहाँ भी वर्ग विभाजन ? हम उस देश में हैं, जहां माउ त्से तुन्ग ने वर्ग विहीन समाज ब्यवस्था के सपने देखे थे और चीन को उसकी प्रयोग स्थली बनायी थी। आज पाश्चात्य देश ब्रिटेन से उन्हें होन्ग कोन्ग क्या मिला, उनकी आत्मा को घायल करने वाली एक ब्यवस्था सौप दी, जिसमें ब्यापार और बाजार मुख्य था, जिसमें वर्गों में वर्गीकृत करना ब्यवस्था के चलाये जाने के लिये जरूरी था। माओ की आत्मा को लहुलुहान कर आज चीन को आधुनिक रंग देकर बाजार से जोडने का काम उन्हीं के महारथी कर रहे हैं। माओ की कब्र पर चीन बाजारवाद की बदलाव स्थली बन रहा है।
थोड़ी देर बाद इकोनामि क्लास के लिये भी लाईन लगनी शुरु हो गयी थी। हमलोग ऐसी किसी घोषणा का इन्तजार कर रहे थे, जैसे कोलकता में की गयी थी। इसी इन्त्ज़ार में जब लाईन काफी लम्बी हो गयी, तब हमलोग पूछकर लाईन में लगे। कोलकता की तरह यहां घोषणा शायद इसलिये नहीं की गयी हो कि एक तो दिन का समय था, इसलिये यात्रियों के जागे रहने की अपेक्षा की जा रही होगी। दूसरे अगर घोषणा करने की सोची भी जाय तो किस भाषा में की जाय। यहाँ तो दुनिया के हर हिस्से से यात्री आये हुये है। कोई जरूरी नहीं कि जैसे हम भारतीयों को अन्ग्रेजी समझने में सुविधा और बोलने से प्यार है, सबों को ऐसा ही हो।
धीरे-धीरे हमारी लाईन भी आगे की ओर खिसकने लगी। गुफानुमा रास्ते से गुजरते हुए, हम जैसे ही विमान में अन्दर घुसने वाले थे, हमलोगों का बैग खोलवाया गया, और फिर सुरक्षा जांच हुयी। हैण्ड लगेज खोलवाकर देख रहे थे। जिनके हैण्ड लगेज़ में पानी की बोतल भी थी उसे गिराकर खाली कर दिया गया। कोई भी द्रव पदार्थ अन्दर ले जाना वर्जित था। प्लेन के प्रवेश द्वार पर ओठों पर लाली लगाई हुयी आतिथ्य बालिका ने मधुर मुस्कान के साथ विमान के अन्दर आने का स्वागत किया। सुरक्षा जांच के खुरदरे अनुभव से गुजरने के बाद यह ब्यवहार मुलायम मरहम की तरह सुकून देने वाक था।
यह विमान काफी बड़ा था। हालाँकि विमान एक ही तल में फैला था। पर एकोनोमी वर्ग में 3-3-3 सीटों का रो था। यानी एक क्षैतिज कतार में नौ सीटें थी। विमान में संभवतः यात्री और क्रू मेम्बर मिलकर साढ़े तीन सौ की संख्या होगी। हमारी सीट 69 B (मध्य) और C (किनारे, aisle ) थी। खिड़की वाली सीट पर एक लड़की आकर बैठी। वह मलेशिया से आ रही थी। इस विमान में संभवतः मलेशिया, इन्दोनेशिया, सिंगापुर के अलावा कोरिया, फिलीपीन और चीन या होंग कोन्ग के यात्री अधिक थे। कुछ अक्सर विमान यात्रा करने वाले या वाली भी थे, क्योंकि वे कपडे वाली चप्पलों, टैब और आंखों पर बांधी जाने वाली पट्टियों  और गर्दन को सहारा देने वाले अतिरिक्त कुशन के साथ थे। विमान की यात्रा करीब साढ़े तेरह घन्टे की थी, इसलिये सारे इंतजामात के साथ यात्रा को सुखद बनाने का प्रयास सही ही था।
यह विमान काफी आधुनिक लगा। पूरी तरह साउंड प्रूफ। विमान के उड़ान भरने के समय इंजन के कर्ण बेधक स्वर की कर्कशता सुनाई नहीं पड़ी। विमान ने करीब 20 मिनट विलम्ब से उड़ान भरी। कुछ ही मिनटों में हमलोग समुद्र तल से 35000 फीट से अधिक की उंचाई पर पहुंच गये। विमान के बाहर का तापमान -54 डिग्री सेंटीग्रेड बताया गया।
इस विमान में सीट के सामने ही छोटी सी सतह-स्पर्श -चालित (टच स्क्रीन) टीवी लगी थी। इससे विमान की स्थिति का पता लगाया जा सकता था। साथ ही मनपसन्द गाने या मूवी का आनन्द उठाया जा सकता था। हमलोग तो नीन्द से जूझ रहे थे। विमान के स्थिर होते ही, विमान आतिथ्य बालाओं ने पहले एप्पल जुस और उसके बाद पैक में हमलोगों के लिये शाकाहारी नास्ता या रात्रि भोजन के रूप में पास्ता, आइस्क्रीम, चोकोलेट, फ्रुट सलाद आदि लाया गया। उसका आनन्द लिया गया।
हमलोग अपराह्न उड़ान भरे और तेरह घन्टे से अधिक हवा में उड़ने के बाद भी अपराह्न ही पहुंचने वाले थे। रात तो होनी ही नहीं थी। पूर्व से पश्चिम की यात्रा में दिन की तारीख वही रहती है, क्योंकि टाईम जोन पीछे हो जाता है, घड़ी पीछे करनी होती है।
विमान अपनी गति करीब 574 मील प्रति घन्टे की रफ्तार से उड़ा जा रहा था। जब भी विमान के पथ में किसी ब्यवधान के कारण कभी-कभी ज्यादा हिलना डुलना होता था, तो सीट बेल्ट बान्धने की घोषणा होती या सिग्नल आ जाता।
हमलोग विमान से उड़े जा रहे थे। विमान का पथ सीट के सामने के छोटे स्क्रीन पर दीखता था। विमान प्रशान्त महासागर के ऊपर के आसमान को चीरता हुआ बढ़ता जा रहा था। नीचे अथाह समुद्र का नीला जल और ऊपर नीले असमान का असीम, अनन्त विस्तार। हमलोग इस महान सृष्टि में कीड़े से भी छोटे हैं। अपनी लघुता को ही भूलने की भूल करके अहंकार को ब्यापक बनाते रहते हैं। उस अनन्त के अनन्त वितान में आश्रय लेने के प्रति कृतज्ञता के भाव को भी भूलते जाते हैं।
काफी देर उड़ चुकने के बाद, इजाजत के बगैर भी खिडकी के पास बैठी लडकी से अनुरोध करके खिड़की खोलकर खिड़की के पार जो हमलोगों ने झाँका तो एक दूसरा ही नज़ारा खुला था, कि हमारी आंखें खुली रह गयीं। ऐसा लगा जैसे लिहाफ  की सफेद   रुई   किसी ने बिखरा दी  हो। वही सफेद रुई बादल के रूप में फैल गयी  हो और हमारा विमान उसके ऊपर टंगा हो और बादल उसे उड़ाये ले जा रहा हो।
हमलोग बीच बीच में एप्पल जुस लेते रहे। मदिरा के चाहकों के लिये विभिन्न तरह के गर्म पेय उपलब्ध थे। उसका लाभ उन्होने उठाया। लॉस ऐंगल के समय के अनुसार करीब 3 बजे हमलोगों के लिये एक और मील पेश किया गया। इस बार खिचड़ी थी और सलाद, चाकलेट भी थे। साथ साथ एप्पल जुस या कोक जो चाहे ले सकते थे। मेरी पत्नी करीब दो घन्टे पहले चाय, जो नेचुरल टी जैसी थी, बगल में ही कीचेन से माँगकर ले आई थी।
इसतरह विमान आतिथ्य सेवा का लाभ उठाते हुये ठीक समय यानि 4:10 PM, स्थानीय समय के अनुसार विमान लॉस ऐंगल विमान तल पर उतरा। कैसा आश्चर्य है, हमलोग 4:55 PM होन्ग्कोन्ग समय के अनुसार वहां से चले और उसी दिन यहां 4:10PM पर पहुँच गये। समय की गति के कोड को डिकोड करने की कोशिश कर रहे थे।
विमान से बाहर निकलकर हमलोग एक बस में सवार हो गये। बस से हमें विमान तल के मुख्य परिसर में लाया गया। वहाँ हमें एक बार फिर सिक्योरिटी और इम्मिग्रेसन चेक से गुजरना था। हमलोग पंक्ति बद्ध होकर अपने पासपोर्ट हाथ में लिये हुये, बढते हुये एक ए टी एम की तरह मशीन के पास पहुंचे। वहां अपने पासपोर्ट के वीसा पेज को खोलते हुये जैसे ही निर्धारित स्लॉट मे डाले, कुछ प्रश्नों के उत्तर कम्प्युटर स्क्रीन पर देने थे। उन्हें सही सही देने के बाद एक पर्ची निकली जिसपर हमारी वीसा वली तस्वीर थी। इसे लेकर हम आगे बढ़े तो सुरक्षा कर्मचारी ने इमिग्रेशन अधिकारी के पास जाने को कहा। उसने पासपोर्ट और हाथ की पर्ची देखकर अपने रिकॉर्ड से मिलया, कुछ प्रश्न पूछे कि आपलोग कहां ठहरेन्गें, यहां कबतक रहेन्गें आदि, आदि। हमारे जवाब से संतुष्ट होने के बाद उसने पर्ची पर अपनी मुहर लगायी। हमलोग आगे लगेज़ क्लेम के लिये CX 822 फ्लाइट वाले कन्वेयर की ओर बढे। वहाँ हमारे सारे सूटकेस मिल गये। उन्हें हमने ट्रॉली पर सजाया और बाहर निकलने के लिये लगी लम्बी लाईन में लग गये। बाहर निकलने के गेट पर पर्ची ले ली गयी। बाहर निकलते ही मैने अपने लडके चिन्मय को इन्तजार करते पाया। साथ में मेरी पुत्रवधु और मेरा पोता भी आया हुआ था। पारिवारिक मिलन सम्पन्न हुआ। स्थानीय समय के अनुसार करीब 5:45 PM का समय हो चुका था।
क्रमश:

अमेरिका यात्रा, होंग कौंग हवाई अड्डे पर, 04-07-2018 (प्रथम दिन आगे)

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04-07-2018, होंग कोन्ग हवाई अड्डे पर लॉस ऐंगल के प्लेन पर चढने तक इन्तजार:

विमान टर्मिनल 1 पर उतर गया था। हमलोग विमान से जैसे ही बाहर निकलकर गुफानुमा रास्ते से बाहर निकल कर एयर पोर्ट के भवन में आये, यहां की विशालता का आभास हो गया। हमलोगों को बिना बाहर निकले दूसरी फ्लाइट का इन्तजार करना था, इसलिये हमलोग ट्रांसफर यात्री के वर्ग में आते हैं। हमें लॉस ऐंगल के फ्लाइट के लिये करीब आठ घन्टे इन्तजार करना था।
होंग कोन्ग अन्तरार्ष्ट्रीय विमान स्थल करीब 1,255 हेक्टेयर (4.85 वर्ग मीटर) में फैला हुआ है। इस एअरपोर्ट पर 90 बोर्डिंग पॉइन्ट हैं। इनमें 78 जेट ब्रिज गेट हैं औरं 12 गेट अस्सेम्ब्ली पॉइन्ट हैं। इस विमान तल को चेक -लैप- कोक एअरपोर्ट भी कहा जाता है। पुराने एअरपोर्ट का नाम काई-टाक एअरपोर्ट था। यह नया एअरपोर्ट 1998 में चालू हुआ था। इसे 1997 में ही ब्रिटेन के द्वारा होन्ग कोन्ग द्वीप को चायना को सौंपे जाने के पहले ही इसे पूरा किया जाना था, लेकिन किसी कारण वश इस प्रोजेक्ट के पूरा होने में विलम्ब हुआ और 1998 में इसे पूरा किया जा सका।
टर्मिनल 1 करीब 5,70,000 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ( दुबई और बीजिंग के बाद) टर्मिनल है। इस एअरपोर्ट की काफी जमीन समुद्र से हासिल की हुयी है। यहां कैथे पैसिफिक एयर लाइन्स का हेड क्वार्टर भी है।
मैं अपना बैक पैक लिये हुये पत्नी के साथ इस टरमिनल के इस तल से उस तल पर निरुद्देश्य चलते रहे। यह टर्मिनल 7 लैवल का बना हुआ है। हमलोग पूछते हुये एक स्थान पर पहुंचे जहाँ फ्लाइट के बारे में कुछ सूचनाएँ दी जाती थी। यहाँ E 1 लिखा था। यहाँ पर कैथे पैसिफिक के अतिरिक्त अन्य फ्लाइट के बारे में सूचनाएँ उपलब्ध थीं। वहाँ पूछने पर पता चला कि कैथे पसिफिक के बारे में सूचना E 2 डेस्क पर उपलब्ध थी। मैंने उस डेस्क पर सेवा रत डेस्क बाला से पूछा कि मेरा लॉस ऐंंजल के लिये 4:55 PM में उड़ान है, तो उसके लिये सेक्युरिटी चेक और बोर्डिंग आदि किस गेट पर होगा। मैने अन्ग्रेजी में पूछा था। उसने चायनीज ऐकसेन्ट में जिस तरह से जवाब दिया, उसमें से अन्ग्रेजी के शब्दों को चुनना पड़ा और खुद से अर्थ खोजना पड़ा।
वहां पर करीब 7 घन्टे का ठहराव था, तो हमलोगों को कोई सुविधाजनक कोना ढूढना था, जहाँ से प्रसाधन और पान- साधन (जल पान साधन) दोनों नजदीक हो। एक वैसा ही कोना ढूढकर हम आराम दायक कुर्सी पर विराजमान हो गये। नींद धीरे - धीरे हावी हो रही थी। बस झपकियां ही ले सकते थे। पैर फैलाकर आरामदेह स्थिति प्राप्त करना मुश्किल था।
कहा जाता है कि इतने बड़े विमान विश्रामागार को चलाने और साफ-सफाई पर ध्यान रखने के लिये करीब 65000 लोग काम पर दिन रात लगे रहते है। इतने लोग लगे हैं, इसीलिये यह पूरा स्थल साफ है या इतने लोग अपने काम के प्रति समर्पित ढंग से लगे हैं, इसलिये यह स्थान साफ सुथरा है, यह हमलोग जैसों के लिये, जो अत्यधिक और निरन्तर सफाई देखकर असहज होने लगते हैं, चिन्तनीय विषय हो सकता है, परन्तु यहाँ तो जैसे सबकुछ किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा स्वप्रेरणा से सहज ही सम्पन्न होता दिख रहा था। सफाई के स्तर की तुलना अगर की जाय तो कोलकता का भी हवाई अड्डा कोई कम नहीं था। अब यहाँ पर यह सोचने पर विवश हो जाना पड़ता है कि हमलोग वही भारतीय हैं, जो विमान स्थल को इतनी सुन्दरता से रख रखाव करते हैं। वही अपने शहर, गली, मुहल्ले के रखरखाव पर इतने उदासीन क्यों हो जाते हैं? क्या अंतरराष्ट्रीय अतिथियो के स्वागतार्थ, पलक पांवड़े बिछाये हुये "अतिथि देवोभव" की भवना से ओतप्रोत विमान स्थल को टिप टौप रखना हमें अच्छा लगता है? और वही जब स्वयं जीने के लिये अपने गली, मुहल्ले, शहर में रहना होता है, तो वे सारे मानक ताक पर रख दिये जाते हैं।
हमलोग अपने विश्राम के स्थान पर बनी आरामदेह कुर्सियों पर विराजमान हो गये। रात की कच्ची नींद, झपकियाँ आनी शुरु हो गयीं। इतने में मेरी पत्नी की बगल वाली सीट पर सलवार सूट में एक महिला बैठी। कफ़ी देर तक इन्तजार किया, तो भी उन महिला के साथ किसी पुरुष को नही देखा। अब थोडा आश्चर्य होना स्वाभाविक था। पत्नी ने संवाद स्थापित करने की पहल की। दो भरतीय स्तियाँ अगर पास पास बैठी हो और उनमें अगर कोई संवाद नहीं हो, तो समझ लेना चाहिये कि या तो दोनों गूँगी है, या एक गूँगी और दूसरी बहरी हैं।
स्वभावतः कहां से हैं, से शुरु होकर बच्चे कितने है, कहां-कहां हैं, घर में और कौन- कौन है, और अंत में हस्बेन्ड क्या करते हैं?
तक बातें बढती ही जाती है और खत्म होने का नाम नहीं लेती। मैं भी ये बातें सुन रहा था जो उनमें हो रही थी। वो मोगा पंजाब की थी। न्यू ज़ीलैण्ड से लौट रही थीं। दिल्ली के फ्लाइट का इन्तजार कर रही थी, जो छ: बजे थी। धीरे-धीरे उन्होने अपनी कहानी के बिन्दुओं को सामने लाना शुरु किया, तो मुझे लगा कि हर शख्स की जिन्दगी यहां एक कहानी लिख रही हौ। उन्होने उस समय अपने पति को एक आकस्मिक दुर्घटना में खो दिया था, जब उनके बच्चे छोटे-छोटे थे। क्या किया जाय कुछ समझ नहीं आ रहा था? जब विपत्ति आती है तो रिश्तेदार भी किनारे हो जाते हैं। कोई खबर भी नहीं लेना चाहता, डर से कि ऐसा ना कुछ मांग बैठे। उन्होने अपने को दिलासा दिया, मजबूती दी।
सिलाई का काम शुरु किया। जो कुछ पैसे बचे थे, उससे लुधियाना से सुबह ही स्वयं जाकर सिलाई के सामान खरीदती। लोगों के कपड़े लाती, दिनभर घर का काम करते हुए ही, बच्चों को संभालते हुये सिलाई करती। धीरे-धीरे उनके इस हुनर में निखार आता चला गया। पैसे भी आने शुरु हो गये। पति के हिस्से की प्रॉपर्टी पर जेठ कुन्डली मारकर बैठ गया। उन्होने उसके प्राप्त करने के लिये जरूरी संघर्ष को स्थगित कर किनारे रखा और अपने बच्चों की पढाई पर ध्यान दिया।
बच्चे पढ़ने में अच्छे निकले। बड़ा लड़का चण्डीगढ से आई टी में डिग्री लेकर अभी न्यू ज़ीलैण्ड में कार्यरत है। वहीं से वह आ रही थी। मोगा में अपना बूतिक बना लिया था। सिलाई सिखाने की कक्षायें भी चलाती थी। छोटी बेटी कनाडा में पढाई कर रही थी। इतनी कहानी सुनते-सुनते हमलोगों को उनका नाम पूछना भी याद नहीं रहा। फिर मैने अपना विज़िटिंग कार्ड देते हुये उनका नाम पूछा। किरणबाला नाम था उनका। हमलोगों ने अपना कूकिज उनके साथ साझा किया। इन्तजार का वक्त इतनी संवेदना से ओतप्रोत अनुभवों से गुजरते हुये बीतेगा, सोचा ना था।
(होंग कोन्ग विमान तल पर बिताये गये कुछ और पलों के अनुभवों और वहां से उड़ान भरकर लॉस ऐंगल पहुंचने का वृतान्त अगले पोस्ट में )
क्रमशः 

Tuesday, July 17, 2018

अमेरिका यात्रा 04-07-2018, मिड नाइट 01:15 AM (पहला दिन)

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04-07-2018, मिड नाइट, 01:15 (पहला दिन)


इतने में करीब 12 बजकर 30 मिनट में रात्रि में घोषणा हुई कि कतार संख्या 40 से 50 तक प्लेन में प्रवेश के लिये आगे बढ़ें।
हमलोग नींद से जगे और एक दूसरे को झकझोर कर जगाये। तब पूरी तरह हावी नीन्द को अनहावी कर सके। मैं जल्दी से कोलकता के अन्तरार्ष्ट्रीय हवाई अड्डे के प्रसाधन का उपयोग करके आया। यह जरूरी था, क्योंकि इस सुविधा के प्रयोग का मूल्य भी टिकट के मूल्य में निहित होता है, इस विचार से नहीं, बल्कि जरूरत के कारण होकर आया। उसी तरफ उंची धार से निकलने वाले झरनेनुमा नल से पेय जल का भी पान किया। हमलोग कोई खाली बड़ी या छोटी बोतल साथ में नहीं रख सके, इसका अफसोस होने लगा। पूरे लाउंज में स्थित दूकानों में शराब की बोतलें नजर आईं, मगर पानी की बोतल उतनी जल्दी कहीं नहीं मिली। खुद को इस आश्वासन के साथ कि प्लेन में तो पीने के लिये बोतलें मिलेगीं, उसी को आगे प्रयोग के लिये रख लिया जायगा, आगे बढ़ चले।
इसके बाद हमलोग गेट संख्या 8 से अन्दर के तरफ घुसे। वहाँ से तिरछी ढलान पर आदम कद गुफा से होकर गुजरने जैसा अनुभव हो रहा था। लेकिन यह गुफा आधुनिकतम विद्युत सज्जा से सुसज्जित था और नीचे कार्पेट भी बिछा हुआ था। मैने दरी के स्थान पर कार्पेट शब्द का खासतौर पर प्रयोग किया, क्योंकि प्लेन में जब धरती से ऊपर उठने की तैयारी कर रहे हों, तो 'दरी' जैसे शब्द को जुबान पर लाकर और प्लेन में साथ ले जाकर देशीपने से क्या बँधकर घुसेन्गें? हमलोगों में यह इच्छा रहती है और अभी यह ट्रेंड जोर पकड़ता जा रहा है, कि जब धरती से उपर उठने की तैयारी होती है, तो देशीपन को एक केंचुल की तरह समझा जाता है, और उतार कर फेंक देने से ही उड़ने का मज़ा आता है। यही नहीं कहीं विदेश या देश में ही किसी जगह प्लेन से उड़कर अगर आये हों, तो और लोगों के सामने इसका कई बार जिक्र करने से नहीं चूकते मसलन 'अपनी अमेरिका यात्रा या फलां जगह जब मैं विमान से नहीं कहकर प्लेन से गया था, तो,,,आगे ब्ला ब्ला,,,। यानि हर वाक्य के आगे या पीछे इस वाक्य को प्रसंगवश या अप्रसांगिक तरीके से भी लगाना नहीं भूलते, ताकि अपनी विशिष्टता को लोगों के सामने प्रमाणित कर सकें। यह एक रोग की तरह अपना फन फैलाते जा रहा है। मेरे एक मित्र हैं। अगर मैने कहा कि फलाँ जगह मैं राजधानी या दुरन्तो जैसे विशिष्ट रेल सेवा से यात्रा की थी, तो वे पहले पूछेन्गें कि किस दर्जे में मैने यात्रा की थी? अगर मैने कहा कि मैं तो थर्ड ए सी में था, तो उनका झट से उत्तर होगा,
"अच्छा, आप थर्ड ए सी से गये थे, मैं तो सेकेन्ड या फर्स्ट ए सी से नीचे यात्रा करता ही नहीं हूँ। "
अगर मैने कहा कि फर्स्ट ए सी से यात्रा की थी, तो वे कहेंगे, "अच्छा, आप सेकण्ड या फर्स्ट ए सी से गये थे, मैं तो प्लेन से ही आता जाता हूँ। "
अगर मैने कहा कि मैं तो प्लेन से वहाँ गया था। तो वे झट से पूछेन्गें, " एकोनोमी क्लास में गये थे या बिसिनेस क्लास में।"
अगर मैने कह दिया कि मैं तो ईकोनॉमी क्लास में गया था।
उनका त्वरित उत्तर होगा, " मैं तो बिसिनेस क्लास में ही आता जाता हूँ।" इसके बाद तो न मेरे पास कुछ कहने को रह जाता और न उनके पास कुछ बढ़ा चढाकर बताने को। कहाँ मैं भी आपको उलझाने लगा। चलिये ले चलता हूँ, कैथे ड्रैगन की उड़ान में। कोलकता से होन्ग्कोन्ग के कैथे पसिफिक उड़ान को कैथे ड्रैगन नाम दिया गया है।
विमान के प्रवेश द्वार पर ओठों पर सुर्खियों सहित मोहक मुस्कान बिखेरतीं विमानआतिथ्य बाला (Air hostess), ने विमान में स्वागत किया।  एयर होस्तेस्स के लिये परम्परागत तौर से प्रयुक्त शब्द, विमान परिचारिका की जगह मैने विमान आतिथ्य बाला का प्रयोग किया है। मुझे परिचारिका शब्द पर ही आपत्ति है। परिचारिका शब्द से दासता की भनक आती है। आतिथ्य दासत्व नहीं है। यद्यपि यात्री ऐसा अतिथि होता है , जिसकी तिथि तय होती है, फिर भी वह देव स्वरूप होता है। जब हम अतिथि देवोभव कहते है, तो हम ईश्वर का कार्य ही कर रहे होते हैं। ईश्वर का कार्य करने वाला महान होता है, और उसके लिये दास, दासी या परुचारिका शब्द उसके इस महती भूमिका को छोटा कर देता है। मैने विमान के अन्दर आतिथ्य रत बालाओं के लिये इस शब्द का प्रयोग कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।
यह विमान हर कतार में तीन - तीन सीटों की ब्यवस्था सहित एक मध्यम या हो सकता है कि अन्तरार्ष्ट्रीय मानकों के अनुसार कम क्षमता वाला विमान है। अन्दर जाने पर मैने देखा कि हर दस क्षैतिज कतार के बाद एक विमान बाला खड़ी थी। उनके मोहक चेहरे पर करीने से संवारी हुई केश राशि और स्लिम फिट मिडी पर स्कर्ट उसकी पतली कमर और नितम्बों को दर्शनीय बना रही थी। उसकी टाँगें एक अर्ध पारदर्शी लेग्गिन्ग से त्वचा के साथ एकाकार होते हुये, त्वचा के दर्शनार्थ ध्यान आकृष्ट कराने में सफल हो रही थीं। अगर लेगिन्ग पर ध्यान डाला जाय, तो उसे अ - पारदर्शी होते हुये भी उसके आर -पार देखने के लिये अपार- दर्शन की ललक जगा जाता था। सभी बालाएँ चाइनीज़ या मन्गोलियन मूल की थी। विमान के अन्दर पहुंचने पर लगा कि एक लम्बी - सी बस यात्रियों के बैठने का इन्तजार कर रही है। सीट खोजने में कोई दिक्कत नहीं हुयी। साइड में सीटों के ऊपर जहां हैण्ड बैग रखते है, उसी पर सीटों की संख्या भी लिखी थी। धीरे-धीरे पूरा विमान यात्रियों से भर गया। सभी के चेहरों पर हवाई यात्रा की खुशी का रोमांच चेहरे पर नज़र आ रहा था। उनमें से कुछ यात्री बंगाल के परम्परागत पोशाक धोती - कुर्ता और साड़ी में भी थे।
बिमान के उड़ान भरने के पूर्व यात्रियों के स्वागत में घोषणा हुयी। इसके बाद सुरक्षा से सम्बन्धित घोषणा: जैसे आक्सीजन मास्क आपके उपर है। उसे कैसे लगाया जायेगा, उसकी सूचनाएं, सीट बेल्ट कैसे लगाना है, सीट के नीचे लाइफ जैकेट रखा है। ये सारी घोषणाएं अन्ग्रेजी, चाइनीज़ और बंगला में हो रही थी। अन्ग्रेजी का उच्चारण ऐसा था कि कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था। बंगला में हो रही घोषणा से ही हमलोग समझने की कोशिश में सफल हो रहे थे। विमान अपने पड़ाव स्थान से धीरे-धीरे घूमकर दौड़ पथ (रन वे) पर आ गया। हमलोगों ने अपने-अपने सीट बेल्ट बाँध लिये। ठीक समय यानि 1:15AM पर विमान ने उड़ान भरी। लगता है कि करीब तीन सौ यात्रियों और बिमान परिचारिकाओं और पायलट सहित अन्य कर्मियों के साथ विमान कुछ ही पलों में धरती से ऊपर उठने लगा। बादलों के पार जो कोई संसार है, करीब 35000 फीट और -50 डिग्री फारेनहाइट के तापमान पर , वहां पहुंचकर 550मील प्रति घन्टे की रफ्तार पकड़कर विमान निर्धारित दिशा में, होन्ग कौंग की ओर उड़ चला।
विमान के स्थिर होते ही आतिथ्य में सैंडविच के साथ सलाद और जुस दिया गया। इसके बाद जैसे ही थोडा सुकून जैसा महसूस हुआ कि झपकी आई और गहरी नींद में डूबती चली गयी। कितना समय बीता, इसका भान भी नहीं रहा। पत्नी मध्य सीट पर थी। खिडकी के पास की सीट पर कोई यात्री नही था, इसलिये वे आराम से पैर फैलाकर अधलेटी मुद्रा में विमान यात्रा के आननद में नीन्द को घोलती चली गयी। जब उन्होने खिड़की खोली तो उपर नीला आसमान और सूर्य की रश्मियाँ सीधे विमान के अन्दर आ रही थी। हमें लगा कि अभी ही तो रात में चले थे, ये सुबह कब हो गयी? थोडा मस्तिष्क पर जोर देने से समझ आया कि जब आप पश्चिम से पूर्व की ओर यात्रा करेंगें, तो समय आगे की ओर खिसक जायेगा। इसीलिये हमें लगा कि सूर्योदय जल्दी हो गया। बादलों के उपर से सूर्य की फैलती धूप में धरती का नज़ारा विलक्षण था। यहां से देखने पर लगता है कि सृष्टि का विस्तार कितना अपार है। हमलोग अपनी छोटी सी दुनिया को ही संसार मान बैठकर कैसे कैसे भ्रम पाल लेने में अपने अहं को संतुष्ट करते रहते हैं। प्लेन से ली गयी तस्वीरें नयनाभिराम  है।
हमलोगों का विमान निर्धारित समय, स्थानीय समय के अनुसार 7:50 AM पर होन्ग कोन्ग के विमान तल पर उतर गया। उतरने के ठीक पहले बेल्ट बांध लेने की घोषणा हुयी थी।
सकुशल उतरने के बाद हमलोग विमान से बाहर निकले।

क्रमशः

अमेरिका यात्रा 03-07-2018, रात्रि 10:00 बजे (पूर्व प्रथम दिन)

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03-07-2018ं, रात्रि 10:00 बजे

हमलोग के उड़ान का समय रात्रि 1 बजकर 15 मिनट पर है। कैथे पैसिफिक के एक मध्यम क्षमता वाले यान से हमलोगों को हौन्ग कौंग जाना था। यह उड़ान करीब साढ़े चार घन्टे का है। मैं अपने लगेज़ के साथ दो दिन पहले ही कलकता चला आया था। साथ में पत्नी भी थी। कोलकाता में मेरा निवास निजाम पैलेस के सेन्ट्रल पी डब्लू ड़ी द्वारा बनाये गये एक्सेक्युटिव फ्लैट में रहा, जो मेरे साले जी को आयुध निर्मात्री बोर्ड के निदेशक मण्डल में होने के कारण मिला हुआ है। कोलकता से कुछ छोटी मोटी चीजों की अन्तिम खरीददारी भी हुयी, जो अमेरिका में मुश्किल से मिलती हैं।
आखिर 3 जुलाई का दिन भी आ गया। सारे खरीदे गये सामानों को विभिन्न ट्रॉली सुट केस में वितरित किया गया ताकि वजन की सीमा के अन्दर ही सूट केस का वजन हो। वजन की सीमा 23 किलो के दो सूट केस प्रति टिकट होती है। शाम को मैं वॉश रुम से फ्रेश हो कर आ गया। उड़ान के निर्धारित समय यानी 1 बजकर 15 मिनट से तीन घन्टे पहले यानि करीब 10 बजकर 15 मिनट (रात्रि) से चेक इन शुरु हो जाता है। निजाम पैलेस, भवानीपुर, कोलकता से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अन्तरराष्ट्रीय उड्डयन स्थल तक पहुंचने में करीब 1 घन्टा तो लग ही जाता है। शाम को हल्की बारिश भी शुरु हो गयी थी। मैं और मेरी पत्नी दोनों ने साढ़े आठ बजे रात्रि में दो रोटियाँ और थोड़ी सब्जी के साथ हल्का खाना खाया। खाने में रुचि और स्वाद तो उतना नहीं लगा। मन में कौतूहल, अनिश्चितिता भरा डर और उत्सुकता लिये हुये सारे लगेज के साथ लिफ्ट से धरातल पर उतरे, जहां कार इन्तजार कर रहा था। मेरी अन्तरार्ष्ट्रीय उड़ान की इतनी लम्बी पहली यात्रा थी। प्रिय रामकुमार जी (मेरे साले) और उनकी पत्नी हमें नीचे तक छोड़ने आये। चार ट्रॉली सूट केस जो हमारे पास थे, उनमें से तीन ही डिकी में आया। एक थोड़ा बड़ा वाला सूट केस आगे की सीट पर रखना पड़ा।
निजाम पैलेस से नौ बजकर दस मिनट पर निकलकर मा फ़्लाई ओवर से होते हुए, नजरुल इस्लाम एवेन्यू होते हुये, भी आई पी रोड पकड़कर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अन्तरराष्ट्रीय विमान तल पहुंचने में करीब एक घन्टे लग गये। वहाँ पहुंचकर हमने ड्राईवर की मदद से अपने लगेज निकाले। लगेज को ट्रॉली पर रखा और अंतरराष्ट्रीय टर्मिनल के तरफ खुले इन्टरी गेट के तरफ बढ़े। वहां सिक्योरिटी पर्सनल पासपोर्ट देखकर ही लोगों को प्रवेश करने दे रहे थे। हमलोगों ने भी अपना पासपोर्ट दिखाया और लगेज सहित अन्दर हाल में प्रवेश कर गये।
हाल में एअरपोर्ट के मदद मित्रों से पूछने पर कैथे पेसिफिक की उड़ान के लिये बोर्डिंग पास और लगेज़ देने के लिये काउंटर H की तरफ इशारा किया गया। वहाँ काउंटर पर पूछा गया कि क्या मैने ऑन लाईन सीट बुक की थी? मेरे हां कहने पर प्रक्रिया सरल हो गयी। उन्होने अपना रिकॉर्ड चेक कर उसकी पुष्टि कर दी। 43 नम्बर कतार की B और C सीटें। C सीट Aisle यानि किनारे की और B यानी बीच वाली सीट थी।
हमारे लगेज़ का वजन किया गया। वह निर्धारित सीमा के अन्दर था। उसपर कम्प्युटर से निकले स्र्तीप को टैग किया। हमें गेट नम्बर 8 की ओर जाने को कहा गया। काउंटर पर की बाला ने मुस्कान के साथ हैप्पी जर्नी कहा। हमलोग सिक्योरिटी चेक की तरफ बढ़ गये। हैण्ड लगेज़ की वजन सीमा 7 किलो होती है। हां उसमें किसी तरह का कोई धातु का सामान, नुकीला कोई भी समान, कोई द्रव पदार्थ आदि नहीं होना चाहिये। इसका ध्यान रखना जरूरी है की ऐसी कोई चीज गलती से भी ना रहे। मेरा पुरुष काउंटर के तरफ और पत्नी का महिला काउंटर के तरफ हैण्ड लगेज़ चेक किया गया। उससे सकुशल गुजर जाने के बाद हमलोगों ने काउंटर नम्बर 8 के तरफ रुख किया।
उससमय तक रात्रि के करीब साढे ग्यारह बज चुके थे। हमलोग गेट नम्बर 8 के पास पहुंचकर इन्तजार में झपकियां लेने में मशगूल हो गये। 


अमेरिका यात्रा, 07-09 मई, (वीसा के लिये)

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अमेरिका यात्रा, 07-09 मई, (वीसा का दिन)

पूर्वाभास 07-09 मई
अमेरिका यात्रा के लिये मेरी तैयारी मेरे और मेरी पत्नी के वीसा के लिये आवेदन करने के साथ ही शुरु हो गयी थी। हमलोगों ने वीसा के लिये दिल्ली को चुना। इसके लिये निर्धारित शुल्क अमेरिका में रहने वाले मेरे लडके ने ही जमा कर दिया था। 7 मई को नेहरु प्लेस मैट्रो के पास ही इंटरनेशनल प्लाजा या अमेरिकन ट्रेड सेन्टर में हमलोगों का फोटोग्राफ और बायो मेट्रिक्स, यानि उंगलियों के निशान और चेहरे की बिना चश्मा लगाये हुये तस्वीर ली गयी। यहां जाने के पूर्व ड़ी एस 12 फॉर्म की प्रिंट कापी और आपका पासपोर्ट के लिये निर्धारित फोटोग्राफ साथ में होना जरूरी था।
यहाँ हाल में प्रवेश के पहले मोबाईल, पर्स में किसी तरह का क्वायन, बेल्ट आदि अलग रखवा लिया गया था। ध्यान इसपर था कि बायोमेट्रिक्स के लिये निर्धारित हाल में प्रवेश करने वाले लोगों के पास मोबाइल, कैमरा या मेटल डिटेक्टर से पकड़ में आने वाली कोई भी चीज नहीं हो। सिस्टम बहुत ही साफ, सरल और त्रुटिविहीन ढंग से कार्य कर रहा था।
इसके बाद 9 मई को हमलोगों को वीसा साक्षात्कार के लिये चाणक्यपुरी स्थित अमेरिकन एम्बैसी जाना हुआ। समय 11 बजे का दिया गया था। इस समय का स्लॉट इसलिये लिया गया था कि सुबह तैयार होकर, सारे पत्रों-प्रपत्रों को अरेंज करना और पत्नी को तैयार होने के लिये समुचित समय देना, इन सबों में समय तो लगेगा ही। प्रपत्रों को एक साथ करके रखने का कार्य पिछले कई दिनों से चल रहा था। इसमें मुख्यतः ड़ी एस 12 फॉर्म में भरी गयी जानकारियों को स्थापित करने वाले सारे प्रपत्र रहने जरूरी थे। उनमें मेरी शिक्षा के रिकॉर्ड के सारे डोकुमेंट के मूल प्रमाण पत्र और उनकी प्रतिलिपि, मेरे सर्विस बुक , मेरे नाम कोई जमीन या घर के होने के प्रमाण के मूल प्रमाण पत्र और उसकी प्रतिलिपि और एक फैमिली का फोटोग्राफ जिसमें आप जिसके पास जा रहे हों, उसकी और आपकी और आपकी पत्नी, जिनके साथ आपकी तस्वीर जरूर हो।
इसके अतिरिक्त आप जिसके पास जा रहे हों, उसका पासपोर्ट और वीसा, अगर वह नौकरी में है, तो उसका सैलरी स्टेटमेन्ट की दो कॉपी प्रिंटआउट ले लेना अच्छा रहता है।
इन सारे प्रपत्रों को मैने रात में ही ब्यवस्थ्ति करके, हर प्रपत्र पर स्टिकर लगकर उपर में लिख भी दिया था, ताकि वहाँ पर अगर दिखाने की जरूरत पड़ी, तो यह सब निकालने में आसानी हो।
अपनी तैयारी के लिये, आप अमेरिका अगर पहली बार जा रहे हों, तो आपको यह मालूम होना चाहिये कि आप कहाँ रहेंगे और कितने समय तक रहेन्गें। साथ ही आपके परिवार के अन्य लोग अगर यहाँ भारत में हैं और आपकी प्रॉपर्टी भी यहाँ है, तो अपके भारत वापस लौटने के उपयुक्त, यथेष्ट और पर्याप्त प्रमाण हैं।
B1 वीसा, जो बिसिनेस और टुरिस्म वीसा कहलाता है, उसे देने में वीसा अधिकारी यही सुनिश्चीत करना चाहते हैं कि आप वापस अपने देश अवश्य लौट जायेंगें।
हमलोग ने समय पर पहुंचने के लिये कैब लेकर वीसा इंटरव्यू के लिये चाणक्यपूरी स्थित अमेरिकन एम्बस्सी जाने की अपेक्षा मैट्रो से ही जाना बेहतर समझा। वैशाली से ही लोक कल्याण मार्ग का टिकट लिया। मैं, मेरी पत्नी, नाती ओजेश और बेटी करुणा सभी वैशाली से मैट्रो द्वारा रजीव चौक उतर गये। वहाँ से येलो लाईन मैट्रो पकड़ कर लोक कल्याण मार्ग स्टेशन उतार गये। वहाँ से हमलोगों ने औटौ लिया और चाणक्यपुरी स्थित अमेरिकन एम्बैसी करीब 10 बजकर 15 मिनट तक पहुंच गये।
मैने और मेरी पत्नी ने अपने मोबाइल, पैसे, पर्स, वालेट आदि सबकुछ करुणा को रखने के लिये दे दिया। वे लोग बाहर रह गये। हमलोग डोकुमेंट के साथ पहले चेक पॉइन्ट पर पहुंचे। वहाँ सुरक्षा जाँच के पश्चात करीब 200 कदम चलने के बाद एक दरवाजे से अन्दर गये। वहाँ पचास से अधिक लोग पन्क्तिबद्ध थे।
हमलोग कतार में लग गये। जाते हुये एक और सुरक्षा जांच के उपरान्त पास्स्पोर्ट पर फोटोग्राफ के समय चिपकाये गये बार कोड को मैच कराया गया। आगे बढते गये। एक ऐसे हाल में पहुंचे, जहाँ करीब बीसियो खिड़कियों पर वीसा साक्षात्कार लिया जा रहा था। यहाँ साक्षात्कार लेने वाले अमरीकन दूतावास के ही अधिकारी थे।
पद्धतियाँ यहां भी साफ, सरल और त्रुटिविहीन लगीं। हमें खिडकी संख्या 12 आबंटित किया गया। उसपर किसी का साक्षात्कार जारी था, इसलिये हमे खिडकी के सामने 10 फीट की दूरी पर खींची गयी पीली रेखा के पास खड़ा रहने के लिये कहा गया। चार-पांच मिनट बाद खिडकी पर खडे बन्दे का साक्षात्कार जब समाप्त हो गया, तो मैं और मेरी पत्नी खिडकी पर पहुँचे। मन में कई सवाल उठ रहे थे। उधेड बुन, ऊहापोह की स्थिति के साथ ऐसे समय में जो सबसे बडा नकारात्मक विचार आता रहता है, वह है कि अगर वीसा साक्षात्कार में विफल रहे तो क्या होगा? तो होगा क्या? फिर आवेदन किया जायगा। अगर दोनों में से किसी एक का ही वीसा अनुमोदित हुआ, तो क्या होगा? मन एक कोने में इस ड़र का प्रति उत्तर मन के दूसरे कोने से आया। अगर एक का वीसा अनुमोदित हुआ तो दूसरे के लिये पुनः आवेदन दिया जायेगा।
इसी तरह के सारे उहपोहों से उमडते घुमडते मन लिये हुये, और धड़कते हुए दिल लिये हुये खिडकी पर पहुन्चे। खिड़की के उस पार एक गोरी महिला अधिकारी उपस्थित थी। मैने अपना और पत्त्नी का पासपोर्ट खिडकी के ठीक नीचे बने खाँचे से सरका दिया। उन्होने कुछ सीधे और सरल प्रश्न मुझसे पूछे। मसलन:
आप क्यों जा रहे हैं? किस वीसा के लिये आपने आवेदन किया है? आपकी फेमिली के अन्य लोग कहाँ है?
इस प्रश्न में महिला द्वारा अन्ग्रेजी में पूछे गये प्रश्न का अमेरिकन ऐकसेण्ट कुछ ऐसा था कि मेरी समझ में नहीं आने के कारण, मैने आई बेग यौर पार्डन जब कई बार बोला, तो उन अधिकारी ने एक हिन्दी दुभाषिये को बुलाया। इसके बाद तो सारे प्रश्नों का मैने और भी आसानी से जवाब दे दिया।
इसमे मुख्य प्रश्न थे: आप का अमेरिका कौन रहता है? किस वीसा पर वहां रहते हैं? वे किस पते पर रहते हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर से संतुष्ट होने के बाद उन्होने कहा, आपका वीसा ग्रांट हो गया है। मैं आप दोनों का पास्स्पोर्ट रख रही हूँ। इसके कलेक्सन सेन्टर से आप दो दिनों के बाद पासपोर्ट ले लीजियेगा। पत्नी से कोई प्रश्न नहीं पूछा गया। इसतरह हमलोगों का वीसा स्वीकृत हो गया। दो दिनों के बाद हमलोगों ने नेहरु प्लेस के अमेरिकन प्लाजा से अपना वीसा stamping किया हुआ पासपोर्ट प्राप्त कर लिया।
क्रमशः 




Saturday, July 14, 2018

गूंज नहीं तुम बनो किसी की (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poetry#motivational


गूँज नहीं तुम बनो किसी की,
खुद की ही आवाज़ बनो तुम।

जो बेबस, लाचार, बंचित हैं,
जिनका सूरज कहीं छुपा है।
प्रभु अवदानों की वारिश से,
नहीं उन्हें इक बूँद मिला है।
उनकी पेशानी पर आये
स्वेद-कणों का अलफ़ाज़ बनो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनो तुम।

झंझावातों को पार करो तुम
भंवरजाल से नहीं डरो तुम।
पर्वत शिखर के पार है मंजिल,
कठिन डगर, पर बढ़े चलो तुम।
तोड़ मिथों को आगे बढ़कर
एक नया आगाज़ करो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनों तुम।

निपट अकेले, साथ न कोई,
फिर भी जो चल देते हैं।
वे ही चीर चट्टानों को
राह बनाते चलते हैं।
दुनिया के लिए अनुकरणीय
एक नया सरताज बनो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनों तुम।

विफलता उसको नहीं डिगाती
कदम बढ़ गए, उस पथ से,
एकाकी जुट जाता प्रयास में,
नहीं मांगता कुछ भी जगत से।
जूझ जाये जो अरि से अभिमन्यु सा
वैसा ही जांबाज़ बनो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनो तुम।
-ब्रजेन्दनाथ।
तुलसी भवन के पारिवारिक मिलन समारोह में सुनाई गयी मेरी इस कविता का यूट्यूब लिंक:
https://youtu.be/j3Bz-jNWytg

Monday, July 9, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा 30-08-2018, शंकराचार्य शिव ंंमंदिर, श्रीनगर

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शंकराचार्य मन्दिर, श्रीनगर

शंकराचार्य मन्दिर, जिसे जेष्ठेस्वरा मन्दिर या बुद्धों द्वारा पास पहाड़ मन्दिर भी कहा जाता है, जबर्वान पहाडों के विस्तार में शंकराचार्य पहाड़ी पर स्थित पवित्र शिव मन्दिर है। यह मन्दिर शहर के तल से करीब 1000 फीट पर स्थित है। वहाँ से सर्पिल बहती झेलम नदी के दोनों किनारे पर फैलाव लिये शहर के विहन्गम दृश्य को देखा जा सकता है। यह मन्दिर 200 साल इस पूर्व में बना था। उसके वर्तमान स्वरुप में 9 वीं शताब्दी में आदि शकराचार्य के आगमन के बाद पुनर्निमित एवं स्थापित किया गया। यह बौद्धों द्वारा भी पवित्र स्थल के रूप में पूज्य है। पारसी और यहूदी इसे बाग-ए-सुलेमान या राज सूलेमान का बाग भी कहते हैं।
जानकार पण्डित आनन्द कौल (1924) के अनुसार यह मन्दिर मूल रूप में हिन्दु राजा संदीपन, जिसने कश्मीर में 2629 B C से 2564 BC तक राज्य किया था, के द्वारा बनाया गया था। इसके बाद इस मन्दिर की मरम्मत नृप गोपादित्य (426-365 BC) और नृप ललितदित्य (697-734 AD ) के द्वारा की गयी। विश्व विजय पर निकले सिकन्दर (यूनान) ने भी इसे किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाने की जुर्रत नहीं की।
जैनुल-आबिदीन ने भूकम्प के कारण जर्जर हो गये इसकी छत की मरम्मत करवायी थी। सन् 1841-46 में सिख राजा रणजीत सिंह के शासन काल में गवर्नर शेख गुलाम मोइयुद्दीन ने इसकी छत की पुनः मरम्मत करवायी थी।
इस पहाड़ी का जिक्र संस्कृत विद्वान और कवि कल्हण जिन्होने प्रसिद्ध काब्य "राजतरन्गिणी" की रचना की थी, के ग्रन्थों में मिलता है।
(सन्दर्भ: राजतरंगिणी, कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है। 'राजतरंगिणी' का शाब्दिक अर्थ है - राजाओं की नदी, जिसका भावार्थ है - 'राजाओं का इतिहास या समय-प्रवाह'। यह कविता के रूप में है। इसमें कश्मीरका इतिहास वर्णित है जो महाभारत काल से आरम्भ होता है। इसका रचना काल सन ११४७ से ११४९ तक बताया जाता है। भारतीय इतिहास-लेखन में कल्हण की राजतरंगिणी पहली प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है। इस पुस्तक के अनुसार कश्मीर का नाम "कश्यपमेरु" था जो ब्रह्मा के पुत्र ऋषि मरीचि के पुत्र थे।

राजतरंगिणी के प्रथम तरंग में बताया गया है कि सबसे पहले कश्मीर में पांडवों के सबसे छोटे भाई सहदेव ने राज्य की स्थापना की थी और उस समय कश्मीर में केवल वैदिक धर्म ही प्रचलित था। फिर सन 273 ईसा पूर्व कश्मीर में बौद्ध धर्म का आगमन हुआ।

१९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औरेल स्टीन (Aurel Stein) ने पण्डित गोविन्द कौल के सहयोग से राजतरंगिणी का अंग्रेजी अनुवाद कराया।

राजतरंगिणी एक निष्पक्ष और निर्भय ऐतिहासिक कृति है। स्वयं कल्हण ने राजतरंगिणी में कहा है कि एक सच्चे इतिहास लेखक की वाणी को न्यायाधीश के समान राग-द्वेष-विनिर्मुक्त होना चाहिए, तभी उसकी प्रशंसा हो सकती है-

श्लाध्यः स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता।भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती॥ (राजतरंगिणी, १/७))

कल्हण ने एक जगह लिखा है कि राजा गोपादित्य ने आर्यावर्त से आनेवाले वाले ब्राहमणों को पहाड़ी की तलहटी में बसने के लिये जमीन दी थी। इस भूमि दान को "गोपाग्रहार" कहा गया। इस क्षेत्र को अभी भी 'गुपाकर' नाम से जाना कहा जाता है।
कहा जाता है की एक बार कुछ ब्राह्मणों ने अज्ञानतावश या गलती से लहसुन खा लिया था। इसलिये उन्हें उस गाँव से अलग दूसरे गाँव में बसाया गया, जिसका नाम भुक्षीरवाटिका (आज का बुचवोर) पड़ा। कल्हण ने यह भी लिखा है कि उस पहाड़ की चोटी पर जेष्ठेस्वरा (शिव जेष्ठरुद्र) के श्राईन के रूप में नृप गोपादित्य ने ही मन्दिर का निर्माण करवाया था।

क्रमशः


Sunday, July 1, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतांत, 29-05-2018, आठवाँ दिन, Day 8 (आगे)

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29-05-2018, मंगलवार, आठवाँ दिन, Day 8
आज दोपहर के पहले स्थानीय बाज़ार से कुछ खरीददारी करने का कार्यक्रम था। होटल के द्वारा ही बस का इन्तजाम कर दिया गया। हमलोगों में जिन्हें खरीददारी में रुचि थी, या सामान देखने में रुचि थी, वे बस पर सवार हो गये। मेरी पत्नी भी सवार हो गयी, तो मैं कैसे पीछे रहता। शायद होटल वाले का ही रिटेल आउटलेट होगा या उसी के सम्बन्धी का होगा, "कश्मीर हट" नामक दूकान में हमलोगों को छोड़ दिया गया।
अब देखने, समझने और सम्झाइस बढ़ाने का सिलसिला चला तो चलता ही चला गया। लोग खरीदने के साथ कश्मीर में बनी चीजों को देखने का लाभ उठा रहे थे, और मेरी सोच कुछ दूसरी दिशा पकड़ रही थी।
कितनी अजीब बात है कि सबों को हिन्दु बहुल बाज़ार तो चाहिये लेकिन हिन्दु पडोसी अगर अल्पमत में है, तो उसे उसके जमीन से उखाड़े जाने की धमकी अगर कोई आतंक वादी समूह वैमनस्य फैलाने लिये, नस्लीय सामुहिक नर संहार की धमकी देता हो, तो वे चुपचाप बैठे रहेन्गें। यही सोचकर कि यह मेरे ऊपर तो नहीं बीतने जा रहा है। यही कश्मीर घाटी में नब्बे के दशक में हुआ था। यही हिन्दुओं के साथ पकिस्तान में हुआ और बंगला देश में हुआ। लेकिन यहां सरकार को रोहिन्ग्या के साथ मानवीय चेहरा दिखाने के लिये कहा जाता है। खैर मैं कहाँ आपको यात्रा संस्मरण सुनाते- सुनाते विचारों के वृत्त में उलझा रहा हूँ।
आगे बढते हैं। करीब एक बजे तक खरीददारी का दौर चला। उसके बाद होटल द्वारा दिये गये निर्धारित छोटी बस से वापस होटल आ गये। रास्ते में मैने जम्मु और कश्मीर बैंक के एटीएम से पैसे निकालने गये, तो वह 100रु के नोट ही दे रहा था। उसकी सीमा 4000 रु तक ही थी। उतना ही निकालकर सन्तोष करना पड़ा। खरीददारी का पेमेंट मैन्र कार्ड से किया था। वहीं केसर की दो डिबिया भी खरीदी। दूकान के मालिक ने दो कप कश्मीरी कहवा, जो वे लोग केसर डालकर बनाते हैं, पिलाई। इस पूरे खरीद में आदिल का ब्यवहार प्रशंसनीय रहा। मैने उन्हें अपना विज़िटिंग कार्ड भी दिया।

दोपहर बाद श्रीनगर में स्थानीय मुख्य आकर्षक स्थलों के भ्रमण का कार्यक्रम था।
इसी के तहत हमलोग सबसे पहले चश्मेशाही पहुंचे।
चश्मे साही एक सुन्दर झरने के चारो ओर विकसित बाग है। यहां के झरने ज़बर वान पहाडियों से घिरे जंगलों से नीचे की ओर बहते है और डल झील में समा जाते है। पास ही जम्मु कश्मीर सरकार के गवर्नर का निवास स्थान राजभवन है, इसलिये यहां हमारी बस को एक जगह पर सुरक्षा के चेक से गुजरने के बाद ही उस क्षेत्र में प्रवेश मिल सका।
कहा जाता है की इस झरने की खोज कश्मिरी पण्डितों के साहिब पंथ के एक महिला सन्त रूपा भवानी के द्वारा की गयी थी। रूपा भवानी का पारिवारिक नाम साहिब था। झरना को कश्मीरी में चश्मा कहा जता है। इसलिये झरने का नाम "चश्मे साहिबी" पड़ा जो कालक्रम में बदलकर "चश्मे साही" हो गया।
इसे बाद में मुगल कालीन शासक शाहजहां के काल में यहाँ के उससमय के गवर्नर अली मर्दान खान ने 1632 A D के आसपास इसका सौन्दर्यीकरण किया। शह्जाहां ने इसे अपने सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह को भेंट स्वरूप दिया। उसके बाद से इसका नाम " चश्मे शाही" यानि रॉयल स्प्रिंग पड़ गया। इस बाग के पूर्व में परि महल स्थित है, जहां दारा शिकोह ज्योयिष और और अन्तरिक्ष विज्ञान की बरीकियाँ, कश्मीरी पण्डितों और हिन्दु ज्योतिषाचार्यों से जाना और समझा करते थे। कहा जता है कि इसी परीमहल में औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह की हत्या की थी।
यहां के भूखंड के ढलान ही पानी के बहाव में गति प्रदान करते हैं। सबसे प्रमुख इस बाग में बहता हुआ झरना है जो टेरेस से गुजर कर तीन भागों में बंट जाता है। एक नहर की शक्ल में, दूसरा झरने की शक्ल में और तीसरा फौब्बारे की शक्ल में होता है। पहले टेरेस एक दोमन्ज़िला कश्मीरी हट के डिजाइन का है, जिसमें ईरानी और पारसी कला शिल्प का समन्वय देखा जा सकता है। यहां जल का एकत्रीकरण होता है। यहां से नीचे के तरफ जल चादर की शक्ल में दूसरे टेरेस की तरफ बहता है। दूसरे टेरेस पर जमा किया हुआ जल नीचे के बड़े फौब्बारे को विस्तार प्रदान करता है। इसके बाद बहता हुआ जल तीसरे टेरेस पर जमा होता है। वहां से चादर की शक्ल में बहता हुआ जल चौकोर शक्ल के फौब्बरों को गति प्रदान करता है। यह फौब्बारा प्रवेश द्वार के समीप है। शैलानी दोनो तरफ की सीढियों से होकर उपर चढ़ते हुये फौब्बारों और झरनों का लुत्फ उठाते हुए मुख्य उदगम स्थल यानी प्रथम टेरेस तक पहुंचते है। कहा जता है कि यहां के जल में औषधीय गुण है। इस जल को पहले प्रधान मन्त्री जवाहरलाल नेहरु दिल्ली मंगवाकर पीने मे उपयोग किया करते थे।
यह बाग जिस स्थल पर बस ने हमलोगों को छोड़ा, वहाँ से उंचाई पर है। कई सीढियां चढने के बाद हमलोग झरने और बाग तक पहुच सके। सुन्दर फूलों से सजा बाग और बीच में बहता झरना, हल्की- हल्की हवा के थपेडों में झूमते रंग बिरंगे फूलों की क्यारियाँ और दर्ख्तों पर सफेद मैग्नोलिया के फूल वातावरण को सूफियाना संगीत का अहसास दे रहे थे। एक अध्यात्मिक आनन्द चारो तरफ ब्याप्त लग रहा था।
किसी भी शिला पट्ट पर इस बाग के अन्वेषक का नाम नहीं होना और साथ ही इस बाग को विकसित कर दारा शिकोह को भेंट किये जाने का जिक्र नहीं होना, कुछ अजीब सा लगा। कहीं तो इस बाग का पूरा इतिहास होना चाहिये जो हिन्दु और सूफी संस्कृति के मेल से बनी कश्मीरियत को दर्शाता हो।

क्रमश:

माता हमको वर दे (कविता)

 #BnmRachnaWorld #Durgamakavita #दुर्गामाँकविता माता हमको वर दे   माता हमको वर दे । नयी ऊर्जा से भर दे ।   हम हैं बालक शरण तुम्हारे, हम अ...