#BnmRachnaWorld
#americatourdiary
ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग से लॉस ऐंजल उड़ान पर:
ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग विमान तल पर लॉस ऐंजल के लिये उड़ान पर:
पिछले पोस्ट में मैने होन्ग्कोन्ग विमान तल के लाउंज में मोगा, पंजाब की आदरणीया किरणबाला जी के साथ बातचीत के दौरान उनकी जिन्दगी के संघर्षो से रुबरु करवाया।
लाउंज का ए सी इतना इफेक्टिव था कि मुझे थोड़ी ठंढ भी लग रही थी। मुझे अपना जैकेट ले लेना चाहिये था। परन्तु L A में रह रहे मेरे लडके ने कहा कि वहाँ अभी गर्मी का मौसम चल रहा है। इसलिये जैकेट लेने की कोई जरूरत नहीं है। मैने जैकेट नहीं ली। लेकिन यहां जब ठंढ नाकाबिलेबर्दास्त होने लगा, तब मुझे अपने जैकेट नहीं लेने का अफसोस जरूर होने लगा। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ, जब इस कम तापमान में भी कई यात्री कम कपड़ों में दिखी। ऐसी ही एक यात्री अपने मैस्कुलिन जेंडर के साथ मेरे बाजू वाली कुर्सी पर आकर बैठी। ना चाहकर भी कभी - कभी मेरी नजर उधर उठ जाती थी। इसे मेरे पास कुछ करने के लिये कुछ नहीं होने के खालीपने के हावी होने का असर भी मान सकते है। मुझे एक लेखक की पक्तियाँ याद आने लगीं: "ईश्वर की सृष्टि पर अगर आपकी दृष्टि जाती है, तो यह उन्हीं के द्वारा प्रदत्त स्वभावजन्यता के कारण है। वही दृष्टि, ब्यष्टि में डूबते हुए, समष्टि में विस्तार ग्रहण करती है। उस दृष्टि को बनाये रखना चाहिये।" उस लेखक का नाम पता करने की कोशिश में लगा हूँ। पता होते ही पता दूंगा। इस बार नजर घूमी तो उन मोहतरमा ने अपने खुले हिस्से को बड़े तौलिया से ढँका हुआ था। ऐसा उन्होने घूरती हुयी बुरी नजरों से खुद को महफूज रखने के लिये तो नहीं ही किया था। इससे यह साबित होता है कि अगर छोटे- छोटे कपड़ों में भी आप फैशन परेड की तरह घूमते रहते हैं, तो दर्शनार्थी नजरों की गर्माहट भी ए सी की नर्माहट को कम कर देता है।
स्थानीय समय के अनुसार करीब 2 बज चुके थे। मैने डिस्प्ले बोर्ड पर देखा कि हमारी फ्लाइट की गेट संख्या दी जा चुकी है। हालाँकि उड़ान समय 4:55PM स्थानीय समय के अनुसार था, फिर भी हमलोगों ने चलकर बाकी के इन्तजार का समय बोर्डिंग गेट के पास ही बिताना उचित समझा। आदरणीया किरणबाला जी ने इस थोडी देर के साथ के लिये आभार प्रकट किया। इन्तजार का वक्त बिना बोर हुये कट गया, या कहें कि कैसे कट गया पता ही नहीं चला।
वहाँ से उसी तल पर मैं और मेरी पत्नी अपने हैण्ड लगेज़ के साथ सुरक्षा जांच के लिये बढे। वहाँ से गुजर चुकने के बाद उसके नीचे तल पर एलिभेटर से गये। वहाँ एक टनेल ट्रेन, यानि चार डब्बों की मैट्रो ट्रेन हमलोगों को लेकर 40-80 गेट के सामने खड़ी हो गयी। वहाँ उतर गये। सिस्टम ऐसा था कि मैट्रो ट्रेन का गेट खुलता था, तभी ट्रेन के बाहर का गेट भी खुलता था। हमलोग बाहर आ गये। वहाँ से ऊपर की ओर जाने वाली स्वचालित सीढियों से ऊपर आ गये। वहाँ आकर डिस्प्ले बोर्ड पर देखने लगे, तो पाया कि हमारी उड़ान संख्या के सामने कोई गेट नम्बर नहीं दिख रहा था। हमें पता चल गया कि यहाँ भी भारतीय रेल में जैसे पूर्व घोषणा को कभी-कभी अन्तिम समय में ट्रेन आने के ठीक पहले बदलकर प्लेटफॉर्म संख्या बदल दी जाती है, वैसे ही यहाँ भी हो सकता है।
या हो सकता है कि मेरे जैसे भारतीय के उड़ान में बैठने की सीट तो आबंटित हो गयी, परन्तु अन्तिम समय तक कुछ तो ऐसा होना चाहिये ताकि हमें यहां भी थोड़ा भारतीय सिस्टम की फीलिंग हो। हमलोग सजग थे, क्योंकि अन्तिम समय के उलट फेर को अपनी रेल यात्रा के दरम्यान भारत में झेल चुके थे। लेकिन हमारी यह गलतफहमी ज्यादा देर नहीं कायम रह सकी। 20 मिनट के इन्तजार के बाद ही गेट संख्या प्रदर्शन पट (डिस्प्ले बोर्ड ) पर आ गयी। हमने 47 नम्बर गेट के तरफ अपना रुख किया। अभी भी उड़ान के लिये सवा घन्टे बाकी थे। वहाँ हमलोग इन्तजार करते हुये, शीशे से घिरे पूरे हाल के बाहर देखने लगे। कैथे पैसिफिक लिखा एक बडा-सा विमान दिखाई दिया। शायद यही विमान हो, जिसमें हमें एल ए (लॉस ऐंजल) की उड़ान के लिये स्थान ग्रहण करना हो। मैने तुरत उस विमान की तस्वीर उतारी। कुछ देर बाद बिना कोई घोषणा के मैने देखा कि वहाँ के स्टाफ यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवा रहे हैं। मैने पूछा की उड़ान संख्या CX 822 के यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवाया जा रहा है, क्या। उसने जवाब दिया, 'यह लाईन बिसिनेस क्लास के लिये है। अभी एकोनोमी क्लास के लिये लाईन लगनी शुरु नहीं हुयी है।'
यहाँ भी वर्ग विभाजन ? हम उस देश में हैं, जहां माउ त्से तुन्ग ने वर्ग विहीन समाज ब्यवस्था के सपने देखे थे और चीन को उसकी प्रयोग स्थली बनायी थी। आज पाश्चात्य देश ब्रिटेन से उन्हें होन्ग कोन्ग क्या मिला, उनकी आत्मा को घायल करने वाली एक ब्यवस्था सौप दी, जिसमें ब्यापार और बाजार मुख्य था, जिसमें वर्गों में वर्गीकृत करना ब्यवस्था के चलाये जाने के लिये जरूरी था। माओ की आत्मा को लहुलुहान कर आज चीन को आधुनिक रंग देकर बाजार से जोडने का काम उन्हीं के महारथी कर रहे हैं। माओ की कब्र पर चीन बाजारवाद की बदलाव स्थली बन रहा है।
थोड़ी देर बाद इकोनामि क्लास के लिये भी लाईन लगनी शुरु हो गयी थी। हमलोग ऐसी किसी घोषणा का इन्तजार कर रहे थे, जैसे कोलकता में की गयी थी। इसी इन्त्ज़ार में जब लाईन काफी लम्बी हो गयी, तब हमलोग पूछकर लाईन में लगे। कोलकता की तरह यहां घोषणा शायद इसलिये नहीं की गयी हो कि एक तो दिन का समय था, इसलिये यात्रियों के जागे रहने की अपेक्षा की जा रही होगी। दूसरे अगर घोषणा करने की सोची भी जाय तो किस भाषा में की जाय। यहाँ तो दुनिया के हर हिस्से से यात्री आये हुये है। कोई जरूरी नहीं कि जैसे हम भारतीयों को अन्ग्रेजी समझने में सुविधा और बोलने से प्यार है, सबों को ऐसा ही हो।
धीरे-धीरे हमारी लाईन भी आगे की ओर खिसकने लगी। गुफानुमा रास्ते से गुजरते हुए, हम जैसे ही विमान में अन्दर घुसने वाले थे, हमलोगों का बैग खोलवाया गया, और फिर सुरक्षा जांच हुयी। हैण्ड लगेज खोलवाकर देख रहे थे। जिनके हैण्ड लगेज़ में पानी की बोतल भी थी उसे गिराकर खाली कर दिया गया। कोई भी द्रव पदार्थ अन्दर ले जाना वर्जित था। प्लेन के प्रवेश द्वार पर ओठों पर लाली लगाई हुयी आतिथ्य बालिका ने मधुर मुस्कान के साथ विमान के अन्दर आने का स्वागत किया। सुरक्षा जांच के खुरदरे अनुभव से गुजरने के बाद यह ब्यवहार मुलायम मरहम की तरह सुकून देने वाक था।
यह विमान काफी बड़ा था। हालाँकि विमान एक ही तल में फैला था। पर एकोनोमी वर्ग में 3-3-3 सीटों का रो था। यानी एक क्षैतिज कतार में नौ सीटें थी। विमान में संभवतः यात्री और क्रू मेम्बर मिलकर साढ़े तीन सौ की संख्या होगी। हमारी सीट 69 B (मध्य) और C (किनारे, aisle ) थी। खिड़की वाली सीट पर एक लड़की आकर बैठी। वह मलेशिया से आ रही थी। इस विमान में संभवतः मलेशिया, इन्दोनेशिया, सिंगापुर के अलावा कोरिया, फिलीपीन और चीन या होंग कोन्ग के यात्री अधिक थे। कुछ अक्सर विमान यात्रा करने वाले या वाली भी थे, क्योंकि वे कपडे वाली चप्पलों, टैब और आंखों पर बांधी जाने वाली पट्टियों और गर्दन को सहारा देने वाले अतिरिक्त कुशन के साथ थे। विमान की यात्रा करीब साढ़े तेरह घन्टे की थी, इसलिये सारे इंतजामात के साथ यात्रा को सुखद बनाने का प्रयास सही ही था।
यह विमान काफी आधुनिक लगा। पूरी तरह साउंड प्रूफ। विमान के उड़ान भरने के समय इंजन के कर्ण बेधक स्वर की कर्कशता सुनाई नहीं पड़ी। विमान ने करीब 20 मिनट विलम्ब से उड़ान भरी। कुछ ही मिनटों में हमलोग समुद्र तल से 35000 फीट से अधिक की उंचाई पर पहुंच गये। विमान के बाहर का तापमान -54 डिग्री सेंटीग्रेड बताया गया।
इस विमान में सीट के सामने ही छोटी सी सतह-स्पर्श -चालित (टच स्क्रीन) टीवी लगी थी। इससे विमान की स्थिति का पता लगाया जा सकता था। साथ ही मनपसन्द गाने या मूवी का आनन्द उठाया जा सकता था। हमलोग तो नीन्द से जूझ रहे थे। विमान के स्थिर होते ही, विमान आतिथ्य बालाओं ने पहले एप्पल जुस और उसके बाद पैक में हमलोगों के लिये शाकाहारी नास्ता या रात्रि भोजन के रूप में पास्ता, आइस्क्रीम, चोकोलेट, फ्रुट सलाद आदि लाया गया। उसका आनन्द लिया गया।
हमलोग अपराह्न उड़ान भरे और तेरह घन्टे से अधिक हवा में उड़ने के बाद भी अपराह्न ही पहुंचने वाले थे। रात तो होनी ही नहीं थी। पूर्व से पश्चिम की यात्रा में दिन की तारीख वही रहती है, क्योंकि टाईम जोन पीछे हो जाता है, घड़ी पीछे करनी होती है।
विमान अपनी गति करीब 574 मील प्रति घन्टे की रफ्तार से उड़ा जा रहा था। जब भी विमान के पथ में किसी ब्यवधान के कारण कभी-कभी ज्यादा हिलना डुलना होता था, तो सीट बेल्ट बान्धने की घोषणा होती या सिग्नल आ जाता।
हमलोग विमान से उड़े जा रहे थे। विमान का पथ सीट के सामने के छोटे स्क्रीन पर दीखता था। विमान प्रशान्त महासागर के ऊपर के आसमान को चीरता हुआ बढ़ता जा रहा था। नीचे अथाह समुद्र का नीला जल और ऊपर नीले असमान का असीम, अनन्त विस्तार। हमलोग इस महान सृष्टि में कीड़े से भी छोटे हैं। अपनी लघुता को ही भूलने की भूल करके अहंकार को ब्यापक बनाते रहते हैं। उस अनन्त के अनन्त वितान में आश्रय लेने के प्रति कृतज्ञता के भाव को भी भूलते जाते हैं।
काफी देर उड़ चुकने के बाद, इजाजत के बगैर भी खिडकी के पास बैठी लडकी से अनुरोध करके खिड़की खोलकर खिड़की के पार जो हमलोगों ने झाँका तो एक दूसरा ही नज़ारा खुला था, कि हमारी आंखें खुली रह गयीं। ऐसा लगा जैसे लिहाफ की सफेद रुई किसी ने बिखरा दी हो। वही सफेद रुई बादल के रूप में फैल गयी हो और हमारा विमान उसके ऊपर टंगा हो और बादल उसे उड़ाये ले जा रहा हो।
हमलोग बीच बीच में एप्पल जुस लेते रहे। मदिरा के चाहकों के लिये विभिन्न तरह के गर्म पेय उपलब्ध थे। उसका लाभ उन्होने उठाया। लॉस ऐंगल के समय के अनुसार करीब 3 बजे हमलोगों के लिये एक और मील पेश किया गया। इस बार खिचड़ी थी और सलाद, चाकलेट भी थे। साथ साथ एप्पल जुस या कोक जो चाहे ले सकते थे। मेरी पत्नी करीब दो घन्टे पहले चाय, जो नेचुरल टी जैसी थी, बगल में ही कीचेन से माँगकर ले आई थी।
इसतरह विमान आतिथ्य सेवा का लाभ उठाते हुये ठीक समय यानि 4:10 PM, स्थानीय समय के अनुसार विमान लॉस ऐंगल विमान तल पर उतरा। कैसा आश्चर्य है, हमलोग 4:55 PM होन्ग्कोन्ग समय के अनुसार वहां से चले और उसी दिन यहां 4:10PM पर पहुँच गये। समय की गति के कोड को डिकोड करने की कोशिश कर रहे थे।
विमान से बाहर निकलकर हमलोग एक बस में सवार हो गये। बस से हमें विमान तल के मुख्य परिसर में लाया गया। वहाँ हमें एक बार फिर सिक्योरिटी और इम्मिग्रेसन चेक से गुजरना था। हमलोग पंक्ति बद्ध होकर अपने पासपोर्ट हाथ में लिये हुये, बढते हुये एक ए टी एम की तरह मशीन के पास पहुंचे। वहां अपने पासपोर्ट के वीसा पेज को खोलते हुये जैसे ही निर्धारित स्लॉट मे डाले, कुछ प्रश्नों के उत्तर कम्प्युटर स्क्रीन पर देने थे। उन्हें सही सही देने के बाद एक पर्ची निकली जिसपर हमारी वीसा वली तस्वीर थी। इसे लेकर हम आगे बढ़े तो सुरक्षा कर्मचारी ने इमिग्रेशन अधिकारी के पास जाने को कहा। उसने पासपोर्ट और हाथ की पर्ची देखकर अपने रिकॉर्ड से मिलया, कुछ प्रश्न पूछे कि आपलोग कहां ठहरेन्गें, यहां कबतक रहेन्गें आदि, आदि। हमारे जवाब से संतुष्ट होने के बाद उसने पर्ची पर अपनी मुहर लगायी। हमलोग आगे लगेज़ क्लेम के लिये CX 822 फ्लाइट वाले कन्वेयर की ओर बढे। वहाँ हमारे सारे सूटकेस मिल गये। उन्हें हमने ट्रॉली पर सजाया और बाहर निकलने के लिये लगी लम्बी लाईन में लग गये। बाहर निकलने के गेट पर पर्ची ले ली गयी। बाहर निकलते ही मैने अपने लडके चिन्मय को इन्तजार करते पाया। साथ में मेरी पुत्रवधु और मेरा पोता भी आया हुआ था। पारिवारिक मिलन सम्पन्न हुआ। स्थानीय समय के अनुसार करीब 5:45 PM का समय हो चुका था।
क्रमश:
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ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग से लॉस ऐंजल उड़ान पर:
ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग विमान तल पर लॉस ऐंजल के लिये उड़ान पर:
पिछले पोस्ट में मैने होन्ग्कोन्ग विमान तल के लाउंज में मोगा, पंजाब की आदरणीया किरणबाला जी के साथ बातचीत के दौरान उनकी जिन्दगी के संघर्षो से रुबरु करवाया।
लाउंज का ए सी इतना इफेक्टिव था कि मुझे थोड़ी ठंढ भी लग रही थी। मुझे अपना जैकेट ले लेना चाहिये था। परन्तु L A में रह रहे मेरे लडके ने कहा कि वहाँ अभी गर्मी का मौसम चल रहा है। इसलिये जैकेट लेने की कोई जरूरत नहीं है। मैने जैकेट नहीं ली। लेकिन यहां जब ठंढ नाकाबिलेबर्दास्त होने लगा, तब मुझे अपने जैकेट नहीं लेने का अफसोस जरूर होने लगा। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ, जब इस कम तापमान में भी कई यात्री कम कपड़ों में दिखी। ऐसी ही एक यात्री अपने मैस्कुलिन जेंडर के साथ मेरे बाजू वाली कुर्सी पर आकर बैठी। ना चाहकर भी कभी - कभी मेरी नजर उधर उठ जाती थी। इसे मेरे पास कुछ करने के लिये कुछ नहीं होने के खालीपने के हावी होने का असर भी मान सकते है। मुझे एक लेखक की पक्तियाँ याद आने लगीं: "ईश्वर की सृष्टि पर अगर आपकी दृष्टि जाती है, तो यह उन्हीं के द्वारा प्रदत्त स्वभावजन्यता के कारण है। वही दृष्टि, ब्यष्टि में डूबते हुए, समष्टि में विस्तार ग्रहण करती है। उस दृष्टि को बनाये रखना चाहिये।" उस लेखक का नाम पता करने की कोशिश में लगा हूँ। पता होते ही पता दूंगा। इस बार नजर घूमी तो उन मोहतरमा ने अपने खुले हिस्से को बड़े तौलिया से ढँका हुआ था। ऐसा उन्होने घूरती हुयी बुरी नजरों से खुद को महफूज रखने के लिये तो नहीं ही किया था। इससे यह साबित होता है कि अगर छोटे- छोटे कपड़ों में भी आप फैशन परेड की तरह घूमते रहते हैं, तो दर्शनार्थी नजरों की गर्माहट भी ए सी की नर्माहट को कम कर देता है।
स्थानीय समय के अनुसार करीब 2 बज चुके थे। मैने डिस्प्ले बोर्ड पर देखा कि हमारी फ्लाइट की गेट संख्या दी जा चुकी है। हालाँकि उड़ान समय 4:55PM स्थानीय समय के अनुसार था, फिर भी हमलोगों ने चलकर बाकी के इन्तजार का समय बोर्डिंग गेट के पास ही बिताना उचित समझा। आदरणीया किरणबाला जी ने इस थोडी देर के साथ के लिये आभार प्रकट किया। इन्तजार का वक्त बिना बोर हुये कट गया, या कहें कि कैसे कट गया पता ही नहीं चला।
वहाँ से उसी तल पर मैं और मेरी पत्नी अपने हैण्ड लगेज़ के साथ सुरक्षा जांच के लिये बढे। वहाँ से गुजर चुकने के बाद उसके नीचे तल पर एलिभेटर से गये। वहाँ एक टनेल ट्रेन, यानि चार डब्बों की मैट्रो ट्रेन हमलोगों को लेकर 40-80 गेट के सामने खड़ी हो गयी। वहाँ उतर गये। सिस्टम ऐसा था कि मैट्रो ट्रेन का गेट खुलता था, तभी ट्रेन के बाहर का गेट भी खुलता था। हमलोग बाहर आ गये। वहाँ से ऊपर की ओर जाने वाली स्वचालित सीढियों से ऊपर आ गये। वहाँ आकर डिस्प्ले बोर्ड पर देखने लगे, तो पाया कि हमारी उड़ान संख्या के सामने कोई गेट नम्बर नहीं दिख रहा था। हमें पता चल गया कि यहाँ भी भारतीय रेल में जैसे पूर्व घोषणा को कभी-कभी अन्तिम समय में ट्रेन आने के ठीक पहले बदलकर प्लेटफॉर्म संख्या बदल दी जाती है, वैसे ही यहाँ भी हो सकता है।
या हो सकता है कि मेरे जैसे भारतीय के उड़ान में बैठने की सीट तो आबंटित हो गयी, परन्तु अन्तिम समय तक कुछ तो ऐसा होना चाहिये ताकि हमें यहां भी थोड़ा भारतीय सिस्टम की फीलिंग हो। हमलोग सजग थे, क्योंकि अन्तिम समय के उलट फेर को अपनी रेल यात्रा के दरम्यान भारत में झेल चुके थे। लेकिन हमारी यह गलतफहमी ज्यादा देर नहीं कायम रह सकी। 20 मिनट के इन्तजार के बाद ही गेट संख्या प्रदर्शन पट (डिस्प्ले बोर्ड ) पर आ गयी। हमने 47 नम्बर गेट के तरफ अपना रुख किया। अभी भी उड़ान के लिये सवा घन्टे बाकी थे। वहाँ हमलोग इन्तजार करते हुये, शीशे से घिरे पूरे हाल के बाहर देखने लगे। कैथे पैसिफिक लिखा एक बडा-सा विमान दिखाई दिया। शायद यही विमान हो, जिसमें हमें एल ए (लॉस ऐंजल) की उड़ान के लिये स्थान ग्रहण करना हो। मैने तुरत उस विमान की तस्वीर उतारी। कुछ देर बाद बिना कोई घोषणा के मैने देखा कि वहाँ के स्टाफ यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवा रहे हैं। मैने पूछा की उड़ान संख्या CX 822 के यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवाया जा रहा है, क्या। उसने जवाब दिया, 'यह लाईन बिसिनेस क्लास के लिये है। अभी एकोनोमी क्लास के लिये लाईन लगनी शुरु नहीं हुयी है।'
यहाँ भी वर्ग विभाजन ? हम उस देश में हैं, जहां माउ त्से तुन्ग ने वर्ग विहीन समाज ब्यवस्था के सपने देखे थे और चीन को उसकी प्रयोग स्थली बनायी थी। आज पाश्चात्य देश ब्रिटेन से उन्हें होन्ग कोन्ग क्या मिला, उनकी आत्मा को घायल करने वाली एक ब्यवस्था सौप दी, जिसमें ब्यापार और बाजार मुख्य था, जिसमें वर्गों में वर्गीकृत करना ब्यवस्था के चलाये जाने के लिये जरूरी था। माओ की आत्मा को लहुलुहान कर आज चीन को आधुनिक रंग देकर बाजार से जोडने का काम उन्हीं के महारथी कर रहे हैं। माओ की कब्र पर चीन बाजारवाद की बदलाव स्थली बन रहा है।
थोड़ी देर बाद इकोनामि क्लास के लिये भी लाईन लगनी शुरु हो गयी थी। हमलोग ऐसी किसी घोषणा का इन्तजार कर रहे थे, जैसे कोलकता में की गयी थी। इसी इन्त्ज़ार में जब लाईन काफी लम्बी हो गयी, तब हमलोग पूछकर लाईन में लगे। कोलकता की तरह यहां घोषणा शायद इसलिये नहीं की गयी हो कि एक तो दिन का समय था, इसलिये यात्रियों के जागे रहने की अपेक्षा की जा रही होगी। दूसरे अगर घोषणा करने की सोची भी जाय तो किस भाषा में की जाय। यहाँ तो दुनिया के हर हिस्से से यात्री आये हुये है। कोई जरूरी नहीं कि जैसे हम भारतीयों को अन्ग्रेजी समझने में सुविधा और बोलने से प्यार है, सबों को ऐसा ही हो।
धीरे-धीरे हमारी लाईन भी आगे की ओर खिसकने लगी। गुफानुमा रास्ते से गुजरते हुए, हम जैसे ही विमान में अन्दर घुसने वाले थे, हमलोगों का बैग खोलवाया गया, और फिर सुरक्षा जांच हुयी। हैण्ड लगेज खोलवाकर देख रहे थे। जिनके हैण्ड लगेज़ में पानी की बोतल भी थी उसे गिराकर खाली कर दिया गया। कोई भी द्रव पदार्थ अन्दर ले जाना वर्जित था। प्लेन के प्रवेश द्वार पर ओठों पर लाली लगाई हुयी आतिथ्य बालिका ने मधुर मुस्कान के साथ विमान के अन्दर आने का स्वागत किया। सुरक्षा जांच के खुरदरे अनुभव से गुजरने के बाद यह ब्यवहार मुलायम मरहम की तरह सुकून देने वाक था।
यह विमान काफी बड़ा था। हालाँकि विमान एक ही तल में फैला था। पर एकोनोमी वर्ग में 3-3-3 सीटों का रो था। यानी एक क्षैतिज कतार में नौ सीटें थी। विमान में संभवतः यात्री और क्रू मेम्बर मिलकर साढ़े तीन सौ की संख्या होगी। हमारी सीट 69 B (मध्य) और C (किनारे, aisle ) थी। खिड़की वाली सीट पर एक लड़की आकर बैठी। वह मलेशिया से आ रही थी। इस विमान में संभवतः मलेशिया, इन्दोनेशिया, सिंगापुर के अलावा कोरिया, फिलीपीन और चीन या होंग कोन्ग के यात्री अधिक थे। कुछ अक्सर विमान यात्रा करने वाले या वाली भी थे, क्योंकि वे कपडे वाली चप्पलों, टैब और आंखों पर बांधी जाने वाली पट्टियों और गर्दन को सहारा देने वाले अतिरिक्त कुशन के साथ थे। विमान की यात्रा करीब साढ़े तेरह घन्टे की थी, इसलिये सारे इंतजामात के साथ यात्रा को सुखद बनाने का प्रयास सही ही था।
यह विमान काफी आधुनिक लगा। पूरी तरह साउंड प्रूफ। विमान के उड़ान भरने के समय इंजन के कर्ण बेधक स्वर की कर्कशता सुनाई नहीं पड़ी। विमान ने करीब 20 मिनट विलम्ब से उड़ान भरी। कुछ ही मिनटों में हमलोग समुद्र तल से 35000 फीट से अधिक की उंचाई पर पहुंच गये। विमान के बाहर का तापमान -54 डिग्री सेंटीग्रेड बताया गया।
इस विमान में सीट के सामने ही छोटी सी सतह-स्पर्श -चालित (टच स्क्रीन) टीवी लगी थी। इससे विमान की स्थिति का पता लगाया जा सकता था। साथ ही मनपसन्द गाने या मूवी का आनन्द उठाया जा सकता था। हमलोग तो नीन्द से जूझ रहे थे। विमान के स्थिर होते ही, विमान आतिथ्य बालाओं ने पहले एप्पल जुस और उसके बाद पैक में हमलोगों के लिये शाकाहारी नास्ता या रात्रि भोजन के रूप में पास्ता, आइस्क्रीम, चोकोलेट, फ्रुट सलाद आदि लाया गया। उसका आनन्द लिया गया।
हमलोग अपराह्न उड़ान भरे और तेरह घन्टे से अधिक हवा में उड़ने के बाद भी अपराह्न ही पहुंचने वाले थे। रात तो होनी ही नहीं थी। पूर्व से पश्चिम की यात्रा में दिन की तारीख वही रहती है, क्योंकि टाईम जोन पीछे हो जाता है, घड़ी पीछे करनी होती है।
विमान अपनी गति करीब 574 मील प्रति घन्टे की रफ्तार से उड़ा जा रहा था। जब भी विमान के पथ में किसी ब्यवधान के कारण कभी-कभी ज्यादा हिलना डुलना होता था, तो सीट बेल्ट बान्धने की घोषणा होती या सिग्नल आ जाता।
हमलोग विमान से उड़े जा रहे थे। विमान का पथ सीट के सामने के छोटे स्क्रीन पर दीखता था। विमान प्रशान्त महासागर के ऊपर के आसमान को चीरता हुआ बढ़ता जा रहा था। नीचे अथाह समुद्र का नीला जल और ऊपर नीले असमान का असीम, अनन्त विस्तार। हमलोग इस महान सृष्टि में कीड़े से भी छोटे हैं। अपनी लघुता को ही भूलने की भूल करके अहंकार को ब्यापक बनाते रहते हैं। उस अनन्त के अनन्त वितान में आश्रय लेने के प्रति कृतज्ञता के भाव को भी भूलते जाते हैं।
काफी देर उड़ चुकने के बाद, इजाजत के बगैर भी खिडकी के पास बैठी लडकी से अनुरोध करके खिड़की खोलकर खिड़की के पार जो हमलोगों ने झाँका तो एक दूसरा ही नज़ारा खुला था, कि हमारी आंखें खुली रह गयीं। ऐसा लगा जैसे लिहाफ की सफेद रुई किसी ने बिखरा दी हो। वही सफेद रुई बादल के रूप में फैल गयी हो और हमारा विमान उसके ऊपर टंगा हो और बादल उसे उड़ाये ले जा रहा हो।
हमलोग बीच बीच में एप्पल जुस लेते रहे। मदिरा के चाहकों के लिये विभिन्न तरह के गर्म पेय उपलब्ध थे। उसका लाभ उन्होने उठाया। लॉस ऐंगल के समय के अनुसार करीब 3 बजे हमलोगों के लिये एक और मील पेश किया गया। इस बार खिचड़ी थी और सलाद, चाकलेट भी थे। साथ साथ एप्पल जुस या कोक जो चाहे ले सकते थे। मेरी पत्नी करीब दो घन्टे पहले चाय, जो नेचुरल टी जैसी थी, बगल में ही कीचेन से माँगकर ले आई थी।
इसतरह विमान आतिथ्य सेवा का लाभ उठाते हुये ठीक समय यानि 4:10 PM, स्थानीय समय के अनुसार विमान लॉस ऐंगल विमान तल पर उतरा। कैसा आश्चर्य है, हमलोग 4:55 PM होन्ग्कोन्ग समय के अनुसार वहां से चले और उसी दिन यहां 4:10PM पर पहुँच गये। समय की गति के कोड को डिकोड करने की कोशिश कर रहे थे।
विमान से बाहर निकलकर हमलोग एक बस में सवार हो गये। बस से हमें विमान तल के मुख्य परिसर में लाया गया। वहाँ हमें एक बार फिर सिक्योरिटी और इम्मिग्रेसन चेक से गुजरना था। हमलोग पंक्ति बद्ध होकर अपने पासपोर्ट हाथ में लिये हुये, बढते हुये एक ए टी एम की तरह मशीन के पास पहुंचे। वहां अपने पासपोर्ट के वीसा पेज को खोलते हुये जैसे ही निर्धारित स्लॉट मे डाले, कुछ प्रश्नों के उत्तर कम्प्युटर स्क्रीन पर देने थे। उन्हें सही सही देने के बाद एक पर्ची निकली जिसपर हमारी वीसा वली तस्वीर थी। इसे लेकर हम आगे बढ़े तो सुरक्षा कर्मचारी ने इमिग्रेशन अधिकारी के पास जाने को कहा। उसने पासपोर्ट और हाथ की पर्ची देखकर अपने रिकॉर्ड से मिलया, कुछ प्रश्न पूछे कि आपलोग कहां ठहरेन्गें, यहां कबतक रहेन्गें आदि, आदि। हमारे जवाब से संतुष्ट होने के बाद उसने पर्ची पर अपनी मुहर लगायी। हमलोग आगे लगेज़ क्लेम के लिये CX 822 फ्लाइट वाले कन्वेयर की ओर बढे। वहाँ हमारे सारे सूटकेस मिल गये। उन्हें हमने ट्रॉली पर सजाया और बाहर निकलने के लिये लगी लम्बी लाईन में लग गये। बाहर निकलने के गेट पर पर्ची ले ली गयी। बाहर निकलते ही मैने अपने लडके चिन्मय को इन्तजार करते पाया। साथ में मेरी पुत्रवधु और मेरा पोता भी आया हुआ था। पारिवारिक मिलन सम्पन्न हुआ। स्थानीय समय के अनुसार करीब 5:45 PM का समय हो चुका था।
क्रमश:
1 comment:
यात्रा का वृत्तांत बहुत ही साफ़ और स्पष्ट रूप में लिखा गया है। लेखक को साधुवाद!
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