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Tuesday, February 18, 2020

छूटता छोर अंतिम मोड़ (समीक्षा) #उपन्यास #अमेज़न किंडल पर)

#BnmRachnaWorld
#novelromantic



मैं अपने हाल ही में amazon kindle पर प्रकाशित अपने उपन्यास के कुछ अंश यहाँ दे रहा हूँ। आपको अच्छा लगे तो उस उपन्यास को इस लिंक से डाऊनलोड कर अवश्य पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएँ। आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं।
Link: Chhootata Chhor Antim Mod (Hindi Edition) https://www.amazon.in/dp/B08286BH1W/ref=cm_sw_r_cp_apa_i_mQs-Db2FSS5GS




छूटता छोर
अंतिम मोड़
(उपन्यास)


ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र







प्रकाशक: Kindle Direct Publishing

पहला संस्करण: 2019

©कॉपीराईट: ब्रजेंद्रनाथ मिश्र




डिस्क्लेमर:
इस पुस्तक में वर्णित स्थान, पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं। इससे किसी तरह की समानता संयोग - मात्र हो सकता है। इससे लेखक या प्रकाशक का कोई लेना देना नहीं हैं। इस पुस्तक का किसी भी तरह से अनुकरण,  मुद्रण या प्रकाशन का सर्वाधिकार लेखक के अधीन है।                                                                                                                    

          


























ललिता को:
जिसने मेरे 45 से अधिक वसंतों  को सुषमा, सुगंध और सुप्रसन्नता से परिपूर्ण रखा ताकि पतझड़ों के मौसम में भी मेरी सृजन-ऊर्जा स्थिर और गतिमान रहे !














आत्मकथ्य
इस उपन्यास का कथानक मुझे कहाँ मिला, पता नहीं। पर शायद मैं इसे लिखना शुरू कर चुका था, उसके बाद ही पारुल, मिसेज डे से मुलाकात हुई। पात्र मिलते गए, चरित्रों में आकार ग्रहण करते गए और कथानक में जुड़ते चले गए। कहानियाँ जो हमारे आसपास पड़ीं है,  उनमें से कई ऐसी हैं, जो हमें गुदगुदाती हैं, हँसाती है, कुछ लोरी गाकर सुलाती हैं, तो कुछ रुलाती भी हैं। उन्हें ही पात्रों में गढ़ने की कोशिश कर एक सम्पूर्ण जीवन को शब्द देने के प्रयास में यह उपन्यास आपके समक्ष है। 
इसमें सहज, सरल प्रसंगों की अभिव्यक्ति है, तो अन्तर्द्वन्दों से गुजरते पलों का प्रसरण भी है, आत्मस्वीकारोक्तियों की निश्छलता है, तो सच को छुपाने के अंतराल की अनिवार्यता का दीर्घकालिक हो जाने की विवशता भी है। परिस्थितियों के परवश हुआ प्राणी क्या कर बैठता है, कभी-कभी उसे खुद पता नहीं होता। इन्हीं सब अंतर्विरोधों से हर पात्र गुजरते हुए जब अंतिम मोड़ पर पहुँचता है, तो जो भी छोर उसे मिलता है, उसे जोरो से पकड़ लेता है, कहीं ये छोर भी छूट  न जाय।
इस पुस्तक में मैंने कथानक को गति और कथ्य को सौंदर्य प्रदान करने के लिए कविता के छंदों का भी प्रयोग किया है। उम्मीद है पाठक मेरे इस प्रयोग को स्वीकार करेंगे। पाठकों ने जैसे मेरी दो पुस्तको "छाँव का सुख" (कहानी संग्रह) और "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" तथा मेरे अमेज़न किंडल पर हाल में प्रकाशित तीन प्रेम कहानियों की लघु पुस्तिका "आई लव योर लाइज" को प्यार दिया है,  उससे अधिक प्यार इस पुस्तक के किंडल एडिशन को भी देंगें, इसका मुझे पूरा विस्वास है।
मैं अमेज़न किंडल सेलेक्ट प्लेटफार्म की भूरी - भूरी प्रसंशा करने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ, जिन्होंने पुस्तकाकार रूप में अपनी कृतियों को प्रकाशित न कर पाने वाले लेखकों को डिजिटल प्लेटफार्म देकर उनकी रचनाओं को पाठकों के लिए सुलभ बना दिया है। 
                                                         ब्रजेंद्रनाथ







प्रवाह - क्रम
उठती गिरती साँसों से एक छन्द लिखें 
घटना का घटना 
कोच या डिबौच: एक सपने का अंत 
एक और अहसान 
एक और अहसान तले: मिसेज डे से मुलाकात 
पारुल से मुलाकात 
पागल लड़की से मुलाकात 
पागल लड़की से मुलाकात के बाद
अमल की स्वीकारोक्ति या कुछ और 
निर्मोही कहीं का 
अपराधिनी माँ 
अब यहाँ से कहाँ
छूटता छोर जाएँ किस ओर
कामना छन्द      



उठती गिरती साँसों से एक छंद लिखें








उसने अपनी उनींदीं पलकें खोली। अपने पूरे बेड पर नज़र डाली। बेड पर पड़ी सलवटें, कहीं - कहीं किनारे से बेडशीट के खींचाव से झांकता बेड का हिस्सा, रात में बेड पर मचे मस्तीसेशन की कहानी खुद कबूल कर रहे थे। उसे हँसी भी आई, थोड़ा शरमाई और आँखों को बंद कर पुनः उस मस्ती को अपने पूरे वजूद में सनसनाती हुई महसूस करने लगी। उसकी नाइटी के बंद खुले थे। उसे वह ऐसे ही रखना चाहती थी। उसके स्तन - भार को संभालने वाले स्तन - बंध कहाँ पड़े थे, उसे पता नहीं। वह तो उन उँगलियों को अपने बदन पर रेंगती हुई - सी देख रही थी, जिन्होंने उसके स्तनों को बंधन - मुक्त कर दिया था, जिन्होंने उसके  बदन को भी आवरण - मुक्त कर दिया था।  
उसने अंदर से उठती हँसी की हिलोर को ओठों पर लाकर, तकिये को अपने स्तनों और जांघों के बीच रखकर निचोड़ा ही था कि एक पन्ना फड़फड़ाकर उड़ा और उसकी गोद में आ गिरा। वह उस पन्ने पर उकेरे गए हर्फ़ों को पढने लगी:

उठती गिरती साँसों से एक छंद लिखें,
ओठों के मधु - रस  से कोई बंद लिखें।
तेरी पलकों की नींदों से, उनींदे पलों को
नेह निमंत्रण देकर, एक निबंध लिखें।

तू उद्दीप्त यौवन का वेगवान प्रवाह,
ले चलूँ  तुझे, शैवालिनी की धारा बन जाऊं।
उज्जवल, धवल, शुभ्र, फेनिल बूंदे बन
लिपटूं, तेरी बाहों मेंकिनारा बन जाऊं।

देह तेरी उल्लसित, उत्कण्ठित, आलोड़ित,
कम्पित है गात और मुदित हास आनन पर।
यामिनी है जाग रही, सो गए विहग सारे
आँखों में नींद नहीं, ओठों के कम्पन पर।

ओठों को रखने दो, घोलने दो अमृत-रस,
मन की पाखी उड़ी, थोड़ा तो बहकने दो।
बाहों में समेटने दो, खोल दो बाहों को,
रात की रानी को रातभर महकने दो।

तेरे उरोजों पर उग आये सावन को,
बारिश की बूंदों से इतना भींगो दूं।
जलप्लावन हो जाये सारी दिशाओं में,
तेरे कटिप्रदेश तक को उसी में डुबो दूं।

पत्तों पर बूँदें जैसे सरकती हैं,
उँगलियों को स्तनों पर वैसे ही फिसलने दो।
त्वचा का रोम - रोम, त्वचा से घर्षण कर,
चांदनी को बदन पर झिर् झिर् बरसने दो।

वह समझ गई, यह किसकी लिखावट है। उसे हिंदी पढ़नी भी आ गई थी और हिंदी बोलनी भी आ गई थी। इसे पढ़ने के बाद उसका तन मन गीला हो गया, वह भींग गई, बिना वारिश के। उसने तकिये को अपने स्तनों और जांघों के बीच जोड़ से भींचा, लगा कि उससे रूहानी रस निःसृत हो रहा है, उस रस को वह अपने बदन में लपेट ले रही है, उसी तरह वह काफी देर तक तकिये को समेटे हुए बैठी रही।
उसे खिड़कियों के पास जाने का मन हुआ। क्यों जाने का मन हुआ? यह भी कोई प्रश्न है। खिड़कियों के पास खड़े होकर उसे हवाओं को अपने चेहरे पर छूते हुए बिखर जाना अच्छा लगता है। और आज दिसंबर के अंतिम सप्ताह में सुबह की सर्द हवाएं जब उसके चेहरे को छू रही हैं तो उसे लग रहा है कि किसी की हथेलियाँ उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर सहला रही हैं। उसने पूरी खिड़की खोल दी है। खिड़की के सारे परदे भी हटा दिए हैं। बिल्डिंग के चौथे माले पर जिस फ्लैट में वह रह रही है, पूरी प्रावेसी है और सुरक्षा भी। इस शहर में फ्लैट का आसमान की ओर उठान चार पांच माले से अधिक नहीं होता। फ्लैट कल्चर तो अभी आया है, अन्यथा लोग जमीन पर ही घर बनाकर रहना अधिक पसंद करते  हैं। फ्लैट में रहने से उस जैसी सिंगल लड़की को काफी सुरक्षा महसूस होती है।
उसने खिड़कियों के पार नीले आसमान के तरफ झाँका। कहीं - कहीं रुई के फाहों जैसे तैरते बादल के टुकड़े दीख रहे थे। कई तो दूर फ़ैली पर्वतमाला के शिखरों पर टिके हुए से लग रहे थे और कहीं बिजली के बड़े ऊँचें टॉवरों पर लटके हुए लग रहे थे। उन्हीं फाहों को वह खिड़की से अंदर लाना चाह रही थी। उसे लग रहा था कि उसमें अवश्य विद्युत आवेश का प्रवेश हो गया होगा। उसे वह अपने बदन पर मलते हुए उसके हलके आवेशित झटकों को महसूस करना चाह रही थी। उसने अपने नाइटी के खुले हुए बंद को और भी ढीला किया। नाइटी को अपने बदन से सरककर पावों पर गिरने दिया। अपनी उँगलियों से अपने रोम के हर हिस्से को स्पर्शित किया। अपने तन के रोमवालियों को रोमांच की हद तक उद्वेलित होने दिया। वह अपने हाथों को कप जैसा बनाकर अपने स्तन भार को संतुलित करते हुए पता नहीं आईने के सामने कब खड़ा हो गई, उसे खुद भी पता नहीं हुआ। कभी - कभी हमें पता नहीं होता है और जिंदगी में वह सब घटने लगता है या घट चुका होता है, जिसका न घटते हुए पता लगता है और न घटने पर पता लगता है।

कल रात वैसा ही हुआ। कोई योजना या प्री अरेंजमेंट जैसा नहीं था। जाड़े की छुट्टियों के लिए क्रिसमस से लेकर नववर्ष को लेते हुए यह इण्टर कॉलेज करीब पंद्रह दिनों के लिए बंद हो रहा था। उसका मन हुआ था कि आज विशाखा को फ्लैट के बाहर ही या फिर कॉलेज में ही छोड़कर माला बन जाऊं। उसका बचपन का नाम माला था। लेकिन वह बचपन में क्यों लौटना चाह रही थी? बचपन से तो उसे नफ़रत थी। यों कहें तो बचपन को वह भूलने की चेष्टा करती रहती थी। लेकिन यह बचपन की जो माला थी, वह उससे ऐसे चिपकी रहती जैसे छत से छिपकिली या चन्दन के छाल से केंचुल वाला सर्प।
वह अपने बदन को ठंडे स्पर्श से घेरकर रखना चाहती थी, और अतीत था कि उसे छालों से गर्म रखना चाहता था। इन्ही छालों से निजात पाने के लिए, इन्ही सर्पों को केंचुल सहित नोंच फेंकने के लिए, इसी छिपकिली को छत से क्षत विक्षत कर नोंचने के लिए आज उसने निश्चय कर लिया था कि माला को वह मुक्त करके रहेगी।
कैसे मुक्त होगी माला? माला तो अस्तित्वविहीन हो नहीं सकती। उसका वजूद तो मिट नहीं सकता। उसके अतीत को खरोंचकर उससे अलग करना होगा। क्या  वह खुद इतनी सक्षम है कि वह सबकुछ अलग कर सके? यह प्रश्न बार - बार उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है, जब भी वह अपने अतीत से लड़ती रहती है या लड़ना शुरू करती है।  परंतु बिना अलग किये वह हँसती, खिलखिलाती, हवाओं से बातें करती, मस्ती फैलाती, खुशियाँ बिखेरती माला को कैसे पुनर्जीवित कर सकती है?
 शायद इसीलिये,  इस माला को पुनर्जीवित करने के लिए उसे जिस संघर्ष की जरूरत थी, उसने अमल को बुलाया था। अमल को भी उसने अमल के रूप में ही आने को कहा था। प्रद्युम्न को इण्टर कॉलेज में ही छोड़ कर आने को कहा था। प्रद्युम्न से लगता है कोई गंभीर ब्यक्तित्व या गंभीरता ओढ़े हुए ब्यक्ति से परिचय होने वाला है। उसने जब विशाखा के रूप में जिस दिन इण्टर कॉलेज ज्वाइन किया था, उसी दिन, हाँ, उसी दिन प्रद्युम्न तिवारी जी से इत्तेफाक से उसका सामना हुआ था। एक घटना जैसी ही घटी थी, उसके साथ...
क्रमशः







Sunday, February 16, 2020

केजरीवाल का चरित्र चित्रण(कविता)

#BnmRachnaWorld
#satirepolitical















केजरीवाल का चरित्र चित्रण
राजनीति में आये तुम, पैदा करने एक बवाल।
अन्ना को सीढ़ी बनाकर चढ़ गए ऊपर केजरीवाल।

तुम दिल्ली में थे बने मुख्य मंत्री जब पहली बार,
मंच पर खड़े हो गए लालू संग क्या मिटाने भ्रष्टाचार?
भ्रष्टाचार उन्मूलन की प्रतिबद्धता तुम्हारी उघड़ गयी,
आम जन की आशाओं की बगिया पूरी उजड़ गयी।

बालाकोट वायु सेना प्रहार के प्रमाण चाहिए थे तुमको?
सैनिकों के अद्भुत पराक्रम के प्रमाण चाहिए थे तुमको?
है हिम्मत तो सेना में भेजों अपनी कोई संतान,
दूर हो जायेगा, सैन्य - बल - जीवन का तेरा अज्ञान।

तुमने मुल्लों को दिया एक बड़ी राशि का मानदेय,
हिंदुओं के मंदिर पुजारी, हो गए तुम्हारे लिए हेय।
फिर जीतने पर क्यों गए आशीष मांगने मंदिर हनुमान?
लाज नहीं आयी तुमको, कद बढ़ाकर बन गए शैतान।

तुम्हारे दल के नेता, के हैं बड़े- बड़े दुष्टाचार,
इनकी मदद से दिल्ली के दूर करोगे भ्रष्टाचार!
तुम कपट मुनि एकतनु जैसा षड्यंत्र रचाते हो,
जनता को प्रतापभानु सा ठगते हो, विष फैलाते हो।

तुम्हारे कुकृत्यों का इतिहास भूल गयी जनता,
तुम्हारे फ्रीबी के फरेब में, छली गयी सीधी जनता।
कितने शाहीन बागों को पोषित करोगे केजरीवाल?
कितने अफ़ज़ल गैंग को मंडित करोगे केजरीवाल?

मनीष सिसोदिया की मेहनत से दिल्ली में जो हुए काम
उसका श्रेय खुद लेकर तुम चमकाए अपने नाम
जामिया, जे एन यू की घटनाओं पर चुप्पी साध
समय लिखेगा तेरे सारे कुकृत्यों का अपराध।
©ब्रजेंद्रनाथ

YouTube Link: Link: https://youtu.be/gJwq1-jF5LA

Thursday, January 23, 2020

अपने अहसास धीमे-धीमे सुनाना चाहता हूँ (कविता)

#BnmRachnaWorld
#romanticpoem



19 जनवरी 2020 को अखिल भारतीय साहित्य परिषद की जमशेदपुर इकाई के द्वारा हुडको लेक पार्क, गोविंदपुर, जमशेदपुर के पास घोड़ाबांधा थीम पार्क में आयोजित कवि - सम्मेलन - सह - पारिवारिक- मिलन समारोह में भाग लेने का अवसर मिला। सारे कवियों और कवियित्रियों का काव्य पाठ करते हुए छवि मैं इस पिक्चर गैलरी में दे रहा हूँ। इसके बाद लीक से थोड़ा हटकर अपने द्वारा एक रोमांटिक कवितानुमा गजल सुनाने का वीडियो भी मैंने अपलोड किया है। आप मेरे इस चैनल marmagyanet को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करें। अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य डालें। आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं।

अपने अहसास सुनना चाहता हूँ

अपने अहसास, धीमें धीमें सुनाना चाहता हूं।
तुम अगर कह दो, तो कुछ गुनगुनाना चाहता हूँ।

सुर मेरे  टूटे हुए हैं, लय भी   रूठे हुए हैं।
फिर भी जिद है कि तराना बनाना चाहता हूँ।

नींद भी आई न थी कि सुबह दस्तक देने लगी,
तेरी जुल्फों के बादलों में भींग जाना चाहता हूं।

तेरी आँखों में एक समन्दर का फैलाव है
उसी में डूबकर अपनी थाह पाना चाहता हूँ।

वैसे तो जिंदगी में गमों की गिनती नहीं है,
उन्हीं में से हंसी के कुछ पल चुराना चाहता हूं।

तेरे हँसने से छा जाती है जर्रे जर्रे में खुशी
उन्हीं में से थोड़ी  हर ओर लुटाना चाहता हूं।

तेरे वज़ूद में  कशिश की किश्ती सी तैरती है
उसी में इस पार से उस पार जाना चाहता हूं।

मैने चाहा है, तुम भी चाहो ये जरूरी तो नहीं,
इस तरफ से उस तरफ तक पुल बनाना चाहता हूं।

YouTube link:
https://youtu.be/pPTjc9bSOA0
©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, January 15, 2020

सूरज का निकलना जरूरी है (कविता)

#BnmRachnaWorld
#patrioticpoem



यह कविता मैंने ता 12-01-2020 को सिंहभूम हिंदी साहित्य सम्मेलन, तुलसी भवन, जमशेदपुर के तत्वावधान में गांधी घाट, स्वर्णरेखा नदी के किनारे, आयोजित "काव्य पाठ सह पारिवारिक एकत्रीकरण समारोह" में सुनायी। तस्वीरों सहित इसका वीडियो आप देखें, मेरे चैनल marmagya net को सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर करें। आप अपने विचार भी दें, आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं। कविता की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:

सूरज का निकलना जरूरी है

जब कोहरा होने लगा हो घनेरा
रश्मियों को तम ने आकर के घेरा
शाखों पे उल्लुओं का हो गया हो डेरा
तिमिगनों का आसमां पर हो बसेरा।

हवा में घुल रही तमिस्रा को
शुभ्र ज्योत्स्ना से धोना जरूरी है।
विभावारी की कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।

भ्रम के भंवर में अर्थ गौण हो गए,
स्वार्थ के शीर्ष पर विचार मौन हो गए
चीख कौन सुनता, घोर इस अरण्य में,
शोर के प्रायोजन में सच कहीं खो गए।

तान कर मुट्ठियाँ, आसमाँ की ओर,
सत्यघोष के लिए जुटना जुटाना जरूरी है।
विभावरी की कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।

दुलार के लिए दुलार ही दुलार है,
प्रेम के लिए मनुहार की संवार है।
पर अगर भाषा के शब्द बदल जाएं
तो प्रहार के लिए विकल्प भी प्रहार है।

सामना हो जाये जो दुष्ट दुरात्माओं से
अहिंसा की परिभाषा त्यागना जरूरी है।
विभावरी के कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।

जो आग्रही हो, राष्ट्र के उन्नयन के लिए,
जो हठी हों, दुश्मनों के विभंजन के लिए,
उनके लिए हिमालय की ऊँचाई भी कम है,
हो जाएं तैयार, अंतिम आक्रमण के लिए।

अग्नि की ज्वालाओं के बीच खोजता पथ,
वीथियों में क्रांति की मशाल बालना जरूरी है।
विभावरी की कोख को चीरकर
सूरज का निकलना जरूरी है।
©ब्रजेंद्रनाथ
YouTube link: https://youtu.be/aLRP2YVLqwc

Thursday, January 9, 2020

पात पात बिहँस रहा प्रात (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poetryonnature



अरुणोदय!
प्रकृति के पूर्व क्षितिज से झाँकते अरुण के आगमन को शब्दों में बाँधने का प्रयास :
पूरी कविता इस प्रकार है:
इस कविता को सिंहभूम हिंदी साहित्य सम्मेलन, तुलसी भवन,  के तत्वावधान में 13 जून 21 को ऑनलाइन आयोजित "काव्य कलश" 
कार्यक्रम में मैंने सुनाया। इसे मेरी आवाज में मेरे यूटुब चैनल marmagya net के इस लिंक पर जाकर सुनें, चैनल को सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर करें। सादर!

लिंक: https://youtu.be/wW6I93dHJik

 पात पात बिहँस रहा प्रात

व्योम की नीलिमा में खोजता पथ,
कौन आ रहा, चढ़ा वह रश्मिरथ।
लालिमा में लुप्त हो रही रात,
पात-पात बिहँस रहा प्रात।

तरु-शैशवों से फूट रहीं कोंपलें,
क्यारियाँ में केसर के सिलसिले।
कामिनी जाग रही, सो रही रात।
पात -पात बिहँस रहा प्रात।

अरुणोदय में खुले कमल-दल-पट,
कैद भ्रमर सांस लेने निकला झट।
हरीतिमा में स्वर्णिमा आत्मसात।
पात-पात बिहँस रहा प्रात।

पर्वतों से सरक रही धवल-धार,
प्रकृति नटी कर रही नित श्रृंगार।
शिखरों से झाँकता अरुण स्यात,
पात-पात बिहँस रहा प्रात।

वृक्षो से लिपट रही लतायें,
संवाद में रत तरु शाखाएं।
अरुनचूड़ बोल उठा बीत गयी रात।
पात पात बिहँस रहा प्रात।

©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, January 1, 2020

नव वर्ष अभिनन्दन (कविता)

#BnmRachnaWorld
#2020greetingspoem




परमस्नेही मित्रों,
मैं शुद्ध साहित्यिक रचनाओं के अपने चैनल "marmagya net" के इस एक वर्ष के सफल सफर के लिए अपने सभी श्रोताओं और दर्शकों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। आपका स्नेह और जुड़ाव बना रहे यही मेरी कामना है। आज, 2019 में किये अपने शुभकार्यों का विश्लेषण और उपलब्धियों पर आनन्दित होने का दिन है तो आगे आने वाले वर्ष के लिए नए लक्ष्यों और ध्येयों के लिए संकल्पित होने का दिन है। 
नव वर्ष के अभिनंदन के लिए मेरी यह कविता प्रस्तुत है:
नव वर्ष अभिनन्दन!

नवीन कल्पना, नवीन साधना
नवीन प्रेरणा, नवीन स्पंदन।
नव वर्ष अभिनन्दन।

नव प्रीत हो, नव मीत हो,
मुस्कान हो हर होठ पर,
और ख़ुशी के गीत हो।
नव उपासना, नवीन प्रार्थना,
नव प्रभात का हो नवीन वंदन,
नव वर्ष अभिनन्दन।

नव स्पर्श हो, नव हर्ष हो
नए शिखर कि ओर, नवीन उत्कर्ष हो
नयी फुहार हो, नयी बहार हो ,
नयी पौध का हो नवीन सिंचन।
नव वर्ष अभिनन्दन।

नए क्षितिज की  ओर नयी उड़ान हो
नए आयाम के लिए
प्रण महान हो
किसी गली में न हो
उदास बचपन।
नव वर्ष अभिनन्दन।

न मन निराश हो, न दिल हताश हो,
स्फूर्ति हो तन में, नवीन स्वांश हो,
न हो अत्याचार, न हो बलात्कार,
न खौफ हो मन में,
न लगे कहीं ग्रहण।
नव वर्ष अभिनन्दन।

न आक्रोश हो, न विध्वंश हो,
न अग्नि की ज्वाला हो, न विभेद का दंश हो।
न युवाओं को दिग्भमित करने का षडतंत्र हो,
न राष्ट्र चेतना में विष का अंश हो।
देश निर्माण के लिए सजग हों सभी,
विजय पथ पर हो, सतत ऊर्ध्व गमन।
नाव वर्ष अभिनंदन! नव वर्ष अभिनन्दन!
©ब्रजेंद्रनाथ
आज रात्रि 2019 के कैलेंडर का अंतिम पृष्ठ उतरते ही 2020 के नए पृष्ठ का उजास झांकता नजर आएगा। इस नए वर्ष के अभिनन्दन के लिए आप मेरी कविता मेरी आवाज में YouTube चैनल के इस लिंक पर सुनें:
Link: https://youtu.be/vg2QltoOXdY

Sunday, December 22, 2019

बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है (कविता)

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#poeminspirational



बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है

सजाये हुये घर को यूं ना बर्बाद करो।
बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।


एक महल जो दे रहा चुनौती
उंचे गगन में सिर उठाये तना है।
उसकी नींव में पलीता लगाओ मत
कितनों की पसीने की बूंद से बना है।
उसको हवाले मत करो आग के
जलाना आसान है, बुझाना कठिन है।


सम्बन्धों की सेज पर खुशबुओं को
सुगन्ध भरे फूलों से खूब महकाना है।
पूर्वाग्रहो के हर्फों से उकेरी गयी चादर को
सरहद के पार कहीं दूर फेंक आना है।
रिश्तों की डोर को, हवाले मत करो गांठ के
कि तोड़ना आसान है, जोड़ना कठिन है।


पेड़ की डालों को ऐसे झुकाओ मत
फलों से लदे हैं, सुस्वाद से सराबोर हैं।
लचक गयी डाल तो फल टपक जायेंगे
बांटते हैं स्नेह और ममता पोर पोर हैं।
जड़ों को सींचना कभी ना छोड़ना
सोखना आसान है, सींचना कठिन है।

वातावरण में ब्याप्त हो रहा कोलाहल है,
विष वमन हो रहा, फैल रहा हलाहल है।
क्या हो गया है, हर ओर क्यों शोर है?
कोई तो हो, जो सोचे, क्या फलाफल है?
इस यज्ञ में, दें अपनी आहुति, मिट जाएं,
अब मिटना आसान है, जीना कठिन है।

सजाये हुए घर को यूं ना बिखराओ 
कि बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

©ब्रजेंद्रनाथ

Thursday, December 5, 2019

तलवारों से खेलो बेटियों (कविता)

#BnmRachnaWorld
#womenempoermentpoem














हैदराबाद में हाल में हुए रेपकांड और उसके बाद जलाए जाने की घटना से व्यथित हूँ। यह सरकार और समाज संवेदना विहीन हो गया है, तभी ऐसी घटनाओं पर विराम नहीं लग पा रहा है। अब बेटियों को ही खड़ग उठाना पड़ेगा। इसी ललकार की अभिव्यक्ति है, मेरी यह कविता, "तलवारों से खेलो बेटियों" सुनें:


तलवारों से खेलो बेटियों

नमन, वंदन, क्रंदन, विलपन, अब छोड़ो बेटियों,
खड्ग थामो, भुजा उठा, तलवारों को तोलो बेटियों!

पौरुषविहीन यह समाज, घाव तुम कबतक झेलोगी,
रणभेरी बजा, रणचंडी बन, वारों से खेलो बेटियीं।

जो नापाक हाथ बढ़े, उसको विलग करो कबंध से,
जो कुदृष्टि पड़े तुम पर, नोंच आंखों को, खेलो बेटियों।

क्रोध का मत करो शमन, ज्वाला को धधकाओ,
गर काल सामने आ जाये, संहारों से खेलो बेटियों।

बीते दिन जब कैंडिल लेकर मार्च किया करते थे,
आज के महासमर में, हथियारों से खेलो बेटियों।

ललकार रही यह कायनात, लांघो देहरी बनो प्रलय,
अत्याचारी, बलात्कारी के नरमुंडों से खेलो बेटियों।

तुम बन जा विद्युत - वज्र, गिरो उनको झुलसा दो,
व्यभिचारियों के अंगों के शतखंडों से खेलो बेटियों।

दमन, विष वमन, विभेदन, उत्पीड़न का अंत करो,
शेष नहीं अब समर, मत वारों को झेलो बेटियों।

जबतक न मिटे अनाचार अभियान नहीं रुकने देना,
जबतक जागे न जगत, ललकारों से खेलों बेटियों।

क्रंदन, विलपन, नमन, वंदन अब छोड़ो बेटियों,
भुजा उठा, खड्ग उठा, तलवारों से खेलो बेटियों!

©ब्रजेंद्रनाथ

इस कविता को मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के नए है दिए गए लिंक पर मेरी आवाज में सुनें और अपने विचार अवश्य दें। आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं।

Link: https://youtu.be/c9ojBIFms-s


Friday, November 22, 2019

वंचितों की दुनिया (कविता)

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#poemdowntrodden





गत रविवार, 17 नवम्बर को नरवा पहाड़, जादूगोड़ा माइंस के शिव मंदिर परिसर में सिंहभूम हिंदी साहित्य सम्मेलन, तुलसी भवन जमशेदपुर और साहित्य संगम जादूगोड़ा के संयुक्त तत्वावधान में कवि सम्मेलन सह वनभोज का आयोजन किया गया। इसी दिन बच्चों, महिलाओं और पुरुषों के लिए खेल भी आयोजित किये गए। आप उसी समय ली गयी तस्वीरों का अवलोकन करें। इसमें प्राकृतिक छटा का दर्शन भी करें। इसमें आयोजित कार्यक्रम में पधारे गण्यमान्य अतिथियों और भाग लेने वाले कवियों एवं कवित्रियों के साथ उनके परिजनों को भी वन विहार में भाग लेते हुए देख सकते हैं।

मैंने जो कविता सुनायी उसके कुछ अंश यहाँ दे रहा हूँ। उस समय का वीडियो भी यहाँ देखें और अपने विचार अवश्य दें।

वंचितों की दुनिया
वंचितों की दुनिया में जिंदगी सहमी हुई है।
नीम अंधेरों में जैसे कोई रोशनी ठहरी हुई है।

गले में तूफ़ान भर लो, चीखें सुनाने के लिए,
शोर में दब जाती है,  गूंज भी गूंगी  हुई है।

मगरमच्छ हैं पड़े हुए उस नदी  में हर तरफ,
जो  खुशियों के समन्दर तक पसरी हुई है।

आह उठती है यहाँ, और पत्थरों से बतियाती है।
लहरों से टकराते हुए,  ये नाव जर्जर सी हुई है।

रेगिस्तां की आंधियों में इक  दिया टिमटिमाता है,
लौ थी थरथराती हुई, अब जाकर स्थिर हुयी है।

खुशबुएँ सिमट कर,  किसी  कोने में  नज़रबंद  थीं, 
उड़ेंगीं अब, हवाओ के  पंख में हिम्मत भरी हुई है।

उम्मीदों के फ़लक पर  आ गयी है जिंदगी,
सपनों के जहाँ की नींद भी सुनहरी हुयी है।

वंचितों की दुनिया भी अब है उजालों से भरी,
नीम अंधेरों  में भी अब  रोशनी पसरी हुयी है।
©ब्रजेंद्रनाथ
यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/7zEqv_jNu0I

Tuesday, November 12, 2019

भारत भूमि की एकता के सूत्रधार (कविता)

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#poem#patriotic#sardarpatel





03-10-19 को जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र की बैठक सरस्वती शिशु मंदिर, कदमा में हुई थी। उसमें कश्मीर का विलय दिवस, जो 26 अक्टूबर को मनाया जाता है, और 31 अक्टूबर, सरदार पटेल के जन्मदिन को एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है, और इसी दिन जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के पुनर्गठन की आधिकारिक घोषणा भी हुई, सारे दिवसों को सम्मिलित रूप से मनाया गया। मैंने सरदार पटेल पर लिखी अपनी कविता सुनाई, जिसे आप सरदार पटेल के जीवन वृत्तों का अवलोकन करते हुए सुनें।

सरदार पटेल पर कविता!

हे भारतभूमि की एकता के सूत्रधार,
है नमन तुझे मेरा शतबार!

कर्मपथ पर सजग,
जन की ब्यथा को अंदर समेटे,
यह कौन है, जो सुन रहा लोगो को,
लोगों के बीच जाकर ,
सेवा का समभाव, समरसता,
स्नेहसिक्तता को लपेटे।

वह कर्मयोगी,  लक्ष्य का  संधान करता
वह लोकसेवी रूप धर है प्राण भरता।
वह जहां जाता, एक नव संसार रचता,
वह जनहित की समस्याओं का निरंतर निदान करता।

हे निष्काम सेवा व्रती,
हे मानवता के ध्वजा वाहक,
हे जन जन के ह्रदय वासी,
हे वीर वसुंधरा के जननायक।

हे स्वातंत्र्य वीर, किसान आंदोलन का किया आयोजन
अंग्रेजों के दमन कानूनों के खिलाफ खड़ा किया संगठन।

अंग्रेजो को झुकाया, खेड़ा के किसानों का कर माफ करवाया,
आजादी के संघर्ष में अपना दे योगदान, देश का फर्ज निभाया।

हे लौह पुरुष, हे निर्णायक,
भारत के भाग्य - विधायक।
तूने रियासतों का किया भारत भूमि में विलय,
तेरी दृढ़ता से भारत बना अखंड, अजय।

जम्मू कश्मीर का विलय रह गया था अधूरा,
जिसे वर्तमान में मोदी सरकार ने किया पूरा।

यह सरदार की प्रेरणा ही हुई आज साकार,
भारत माता पुत्रों पर बरसा रही स्नेह धार।

आज हम विनयावनत हो, याद करते आपका प्यार,
अपनी आग जगाने को, समर्पित करते हैं उद्गार।
आपकी सद्प्रेरणा से आलोकित रहे हमारा संसार!
भारत रहे अखंड अभेद बने विश्व का खेवनहार।

हे सरदार, है नमन तुझे मेरा शतबार!
है नमन तुझे मेरा शतबार!

©ब्रजेंद्रनाथ

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/3B0zdsWbwsY

Friday, November 1, 2019

जगाने आ रहा हूँ (कविता)

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 गत मंगलवार तारीख 29 अक्टूबर 2019 को अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जमशेदपुर के तत्वावधान में एस टाइप आदित्यपुर स्थित सिंहभूम ब्यॉयज क्लब के काली पूजा पंडाल के प्रांगण में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में शहर के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यान्वेशी शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता मैने की और संचालन दीपक वर्मा जी ने किया। अन्य साहित्यकारों में आदरणीया उमा सिंह किसलय, सोनी सुगंधा, डॉ कुमारी मनिला, माधुरी मिश्रा, उमारानी पांडेय, सूरज सिंह राजपूत, बसंत कुमार, मनीष सिंह वंदन, सोनू पांडेय और जादूगोड़ा से आये बालकृष्ण आजमगढ़ी ने भी मंच की शोभा बधाई।
परिषद की संरक्षिका आदरणीया मंजू ठाकुर व संरक्षक जयंत श्रीवास्तव जी के साथ शशि प्रकाश, प्रकाश मेहता, संजीव सिंह, नीरू सिंह टुडू, संजय चाचरा और उपस्थित आयोजक मंडल के सदस्यगणऔर सुधी श्रोताओं ने कार्यक्रम को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की।
मैंने जो कविता सुनाई उसमें युवाओं को जागने का आह्वान किया गया है। कविता की कुछ पंक्तियाँ मैं दे रहा हूँ। पूरी कविता मेरे यूट्यूब चैनल के इस लिंक पर जाकर सुने और चैनेल को सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर करें। आपके विचार बहुमूल्य है, इसलिए कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य दें। सादर!
ब्रजेंद्रनाथ

जगाने आ रहा हूँ…

लोरियाँ सुन - सुन कर, सो चुके बहुत तुम,
रास के सपनों में, खो चुके बहुत तुम।
जवानियाँ उठो तुझे, जगाने आ रहा हूँ।
जागरण के गीत, सुनाने आ रहा हूँ।


मैं एक हाथ से उठाके, सूर्य को उछाल दूँ।
मैं चाँद को भींचकर, पीयूष को निकाल दूँ।
धरती की काया है प्यासी,
फैलती जा रही घोर उदासी।
अमृत - रस कण - कण में, बहाने आ रहा हूँ।
जवानियाँ उठो तुझे, जगाने आ रहा हूँ।
जागरण के गीत, सुनाने आ रहा हूँ।


सावधान, मिलावटी, मुनाफाखोरों,
सावधान, बेईमानों, रिश्वतखोरों।
शोणित भरे थाल से, काल के कपाल से,
लाल - लाल रक्त – कण, बहाने आ रहा हूँ।
जवानियाँ उठो तुझे, जगाने आ रहा हूँ,
जागरण के गीत, सुनाने आ रहा हूँ।


कौन टोक सकता है, सत्य - सपथ मेरा?
कौन रोक सकता है, विजय - रथ मेरा?
ले मशाल हाथ में, अग्नि - पुंज साथ में,
क्रांति का प्रयाण गीत, गाने आ रहा हूँ।
जवानियाँ उठो तुझे, जगाने आ रहा हूँ।
जागरण के गीत, सुनाने आ रहा हूँ।

अनाचार, अत्याचार देख, जो भी चुप रहता है,
उसकी रगों में रक्त नहीं, ठंढा - जल बहता है।
तेरी शिराओं में खून का,
उबाल उठाने आ रहा हूँ।
जवानियाँ उठो तुझे, जगाने आ रहा हूँ।
जागरण के गीत, सुनाने आ रहा हूँ।


तेरी नसों में खून, शिवा का महान है।
सोच ले, दबोच ले, यहाँ जो भी शैतान है।
उठा खड्ग तू छेदन कर, ब्यूह का तू भेदन कर।
तेरे साथ शौर्य - गान, गाने आ रहा हूँ।
जवानियाँ उठो तुझे, जगाने आ रहा हूँ।
जागरण के गीत, सुनाने आ रहा हूँ।

तेरी   लेखनी से, सिर्फ प्रेम - रस ही झरता।
तुझे वेब जाल पर, सिर्फ पोर्न ही है दिखता।
जवानी के दिनों को, मत यूँ ही निकाल दो,
मांसपेशियों को कसो तुम, फौलाद - सा ढाल दो।
तुझे मैं सृजनधर्मा, बनाने आ रहा हूँ।
जवानियाँ उठो तुझे, जगाने आ रहा हूँ।
जागरण के गीत सुनाने आ रहा हूँ।
©ब्रजेंद्रनाथ
यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/x5F773eHvJ0

Saturday, October 26, 2019

पहले अंतस का तमस मिटा लूँ (कविता )

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अंतस का तमस मिटा लूँ

पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।
गम का अँधेरा घिरा आ रहा है,
काली अंधेरी निशा क्यों है आती?
कोई दीपक ऐसा ढूँढ लाओ कहीं से,
नेह के तेल में  जिसकी डूबी हो बाती।
अंतर में प्रेम की कोई बूँद डालूं,
तब बाहर का दरिया बहाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।
इस दीवाली कोई घर ऐसा न हो,
जहां कोई दीया न हो टिमटिमाता।
इस दीवाली कोई दिल ऐसा न हो,
जहाँ दर्द का कोई कण टिक पाता।
गले से लगा लूँ, शिकवे मिटा लूँ,
तब बाहर की दुश्मनी मिटाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।
क्यों नम है आंखें, घिर आते हैं आँसू,
वातावरण में क्यों  छायी उदासी?
घर में एक भी अन्न का दाना नहीं है
क्यों गिलहरी लौट जाती है प्यासी?
अंत में जो पड़ा है, उसको जगाकर,
उठा लूँ,   गले  से लगाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।
तिरंगे में लिपटा आया  लाल जिसका
कि पुंछ गयी हो, सिन्दूर - लाली।
दुश्मन से लड़ा, कर गया प्राण अर्पण
घर में कैसे सब मनाएं दीवाली?
घर में घुसकर अंदर तक वार करके
दुश्मन को लगाकर ठिकाने चलूँ ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ,
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।
धुंआ उठ रहा है, अम्बर में छाया,
तमस लील जाये न ये हरियाली।
बंद हो आतिशें, सिर्फ दीपक जलाओ,
प्रदूषण - मुक्त हो, मनाएं दीवाली।
स्वच्छता, शुचिता, वात्सल्य, ममता
को दिल में गहरे बसाने चलूँ।
पहले अंतस का तमस मिटा लूँ
तब बाहर का दीपक जलाने  चलूँ।


तिथि : 18-10-2016
वैशाली, दिल्ली, एन सी आर।

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/ckW_IQ-EgbQ

अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld  #story #affection#GovernmentOfficer अधिकारी की आत्मीयता  ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद ...