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Wednesday, July 18, 2018

अमेरिका यात्रा, 04-07-2018, होंग कोन्ग से लॉस एन्ँजल्स (दूसरा दिन)

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ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग से लॉस ऐंजल उड़ान पर:







ता: 04-07-2018, होन्ग्कोन्ग विमान तल पर लॉस ऐंजल के लिये उड़ान पर:
पिछले पोस्ट में मैने होन्ग्कोन्ग विमान तल के लाउंज में मोगा, पंजाब की आदरणीया किरणबाला जी के साथ बातचीत के दौरान उनकी जिन्दगी के संघर्षो से रुबरु करवाया।
लाउंज का ए सी इतना इफेक्टिव था कि मुझे थोड़ी ठंढ भी लग रही थी। मुझे अपना जैकेट ले लेना चाहिये था। परन्तु L A में रह रहे मेरे लडके ने कहा कि वहाँ अभी गर्मी का मौसम चल रहा है। इसलिये जैकेट लेने की कोई जरूरत नहीं है। मैने जैकेट नहीं ली। लेकिन यहां जब ठंढ नाकाबिलेबर्दास्त होने लगा, तब मुझे अपने जैकेट नहीं लेने का अफसोस जरूर होने लगा। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ, जब इस कम तापमान में भी कई यात्री कम कपड़ों में दिखी। ऐसी ही एक यात्री अपने मैस्कुलिन जेंडर के साथ मेरे बाजू वाली कुर्सी पर आकर बैठी। ना चाहकर भी कभी - कभी मेरी नजर उधर उठ जाती थी। इसे मेरे पास कुछ करने के लिये कुछ नहीं होने के खालीपने के हावी होने का असर भी मान सकते है। मुझे एक लेखक की पक्तियाँ याद आने लगीं: "ईश्वर की सृष्टि पर अगर आपकी दृष्टि जाती है, तो यह उन्हीं के द्वारा प्रदत्त स्वभावजन्यता के कारण है। वही दृष्टि, ब्यष्टि में डूबते हुए, समष्टि में विस्तार ग्रहण करती है। उस दृष्टि को बनाये रखना चाहिये।" उस लेखक का नाम पता करने की कोशिश में लगा हूँ। पता होते ही पता दूंगा। इस बार नजर घूमी तो उन मोहतरमा ने अपने खुले हिस्से को बड़े तौलिया से ढँका हुआ था। ऐसा उन्होने घूरती हुयी बुरी नजरों से खुद को महफूज रखने के लिये तो नहीं ही किया था। इससे यह साबित होता है कि अगर छोटे- छोटे कपड़ों में भी आप फैशन परेड की तरह घूमते रहते हैं, तो दर्शनार्थी नजरों की गर्माहट भी ए सी की नर्माहट को कम कर देता है।
स्थानीय समय के अनुसार करीब 2 बज चुके थे। मैने डिस्प्ले बोर्ड पर देखा कि हमारी फ्लाइट की गेट संख्या दी जा चुकी है। हालाँकि उड़ान समय 4:55PM स्थानीय समय के अनुसार था, फिर भी हमलोगों ने चलकर बाकी के इन्तजार का समय बोर्डिंग गेट के पास ही बिताना उचित समझा। आदरणीया किरणबाला जी ने इस थोडी देर के साथ के लिये आभार प्रकट किया। इन्तजार का वक्त बिना बोर हुये कट गया, या कहें कि कैसे कट गया पता ही नहीं चला।
वहाँ से उसी तल पर मैं और मेरी पत्नी अपने हैण्ड लगेज़ के साथ सुरक्षा जांच के लिये बढे। वहाँ से गुजर चुकने के बाद उसके नीचे तल पर एलिभेटर से गये। वहाँ एक टनेल ट्रेन, यानि चार डब्बों की मैट्रो ट्रेन हमलोगों को लेकर 40-80 गेट के सामने खड़ी हो गयी। वहाँ उतर गये। सिस्टम ऐसा था कि मैट्रो ट्रेन का गेट खुलता था, तभी ट्रेन के बाहर का गेट भी खुलता था। हमलोग बाहर आ गये। वहाँ से ऊपर की ओर जाने वाली स्वचालित सीढियों से ऊपर आ गये। वहाँ आकर डिस्प्ले बोर्ड पर देखने लगे, तो पाया कि हमारी उड़ान संख्या के सामने कोई गेट नम्बर नहीं दिख रहा था। हमें पता चल गया कि यहाँ भी भारतीय रेल में जैसे पूर्व घोषणा को कभी-कभी अन्तिम समय में ट्रेन आने के ठीक पहले बदलकर प्लेटफॉर्म संख्या बदल दी जाती है, वैसे ही यहाँ भी हो सकता है।
या हो सकता है कि मेरे जैसे भारतीय के उड़ान में बैठने की सीट तो आबंटित हो गयी, परन्तु अन्तिम समय तक कुछ तो ऐसा होना चाहिये ताकि हमें यहां भी थोड़ा भारतीय सिस्टम की फीलिंग हो। हमलोग सजग थे, क्योंकि अन्तिम समय के उलट फेर को अपनी रेल यात्रा के दरम्यान भारत में झेल चुके थे। लेकिन हमारी यह गलतफहमी ज्यादा देर नहीं कायम रह सकी। 20 मिनट के इन्तजार के बाद ही गेट संख्या प्रदर्शन पट (डिस्प्ले बोर्ड ) पर आ गयी। हमने 47 नम्बर गेट के तरफ अपना रुख किया। अभी भी उड़ान के लिये सवा घन्टे बाकी थे। वहाँ हमलोग इन्तजार करते हुये, शीशे से घिरे पूरे हाल के बाहर देखने लगे। कैथे पैसिफिक लिखा एक बडा-सा विमान दिखाई दिया। शायद यही विमान हो, जिसमें हमें एल ए (लॉस ऐंजल) की उड़ान के लिये स्थान ग्रहण करना हो। मैने तुरत उस विमान की तस्वीर उतारी। कुछ देर बाद बिना कोई घोषणा के मैने देखा कि वहाँ के स्टाफ यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवा रहे हैं। मैने पूछा कि उड़ान संख्या CX 822 के यात्रियों को पन्क्तिबद्ध करवाया जा रहा है, क्या। उसने जवाब दिया, 'यह लाईन बिसिनेस क्लास के लिये है। अभी एकोनोमी क्लास के लिये लाईन लगनी शुरु नहीं हुयी है।'
यहाँ भी वर्ग विभाजन ? हम उस देश में हैं, जहां माउ त्से तुन्ग ने वर्ग विहीन समाज व्यवस्था के सपने देखे थे और चीन को उसकी प्रयोग स्थली बनायी थी। आज पाश्चात्य देश ब्रिटेन से उन्हें होन्ग कोन्ग क्या मिला, उनकी आत्मा को घायल करने वाली एक व्यवस्था सौप दी, जिसमें ब्यापार और बाजार मुख्य था, जिसमें वर्गों में वर्गीकृत करना व्यवस्था के चलाये जाने के लिये जरूरी था। माओ की आत्मा को लहुलुहान कर आज चीन को आधुनिक रंग देकर बाजार से जोड़ने का काम उन्हीं के महारथी कर रहे हैं। माओ की कब्र पर चीन बाजारवाद की बदलाव स्थली बन रहा है।
थोड़ी देर बाद इकोनामि क्लास के लिये भी लाईन लगनी शुरु हो गयी थी। हमलोग ऐसी किसी घोषणा का इन्तजार कर रहे थे, जैसे कोलकता में की गयी थी। इसी इन्त्ज़ार में जब लाईन काफी लम्बी हो गयी, तब हमलोग पूछकर लाईन में लगे। कोलकता की तरह यहां घोषणा शायद इसलिये नहीं की गयी हो कि एक तो दिन का समय था, इसलिये यात्रियों के जागे रहने की अपेक्षा की जा रही होगी। दूसरे अगर घोषणा करने की सोची भी जाय तो किस भाषा में की जाय। यहाँ तो दुनिया के हर हिस्से से यात्री आये हुये है। कोई जरूरी नहीं कि जैसे हम भारतीयों को अन्ग्रेजी समझने में सुविधा और बोलने से प्यार है, सबों को ऐसा ही हो।
धीरे-धीरे हमारी लाईन भी आगे की ओर खिसकने लगी। गुफानुमा रास्ते से गुजरते हुए, हम जैसे ही विमान में अन्दर घुसने वाले थे, हमलोगों का बैग खोलवाया गया, और फिर सुरक्षा जांच हुयी। हैण्ड लगेज खोलवाकर देख रहे थे। जिनके हैण्ड लगेज़ में पानी की बोतल भी थी उसे गिराकर खाली कर दिया गया। कोई भी द्रव पदार्थ अन्दर ले जाना वर्जित था। प्लेन के प्रवेश द्वार पर ओठों पर लाली लगाई हुयी आतिथ्य बालिका ने मधुर मुस्कान के साथ विमान के अन्दर आने का स्वागत किया। सुरक्षा जांच के खुरदरे अनुभव से गुजरने के बाद यह व्यवहार मुलायम मरहम की तरह सुकून देने वाला था।
यह विमान काफी बड़ा था। हालाँकि विमान एक ही तल में फैला था। पर एकोनोमी वर्ग में 3-3-3 सीटों का रो था। यानी एक क्षैतिज कतार में नौ सीटें थी। विमान में संभवतः यात्री और क्रू मेम्बर मिलकर साढ़े तीन सौ की संख्या होगी। हमारी सीट 69 B (मध्य) और C (किनारे, aisle ) थी। खिड़की वाली सीट पर एक लड़की आकर बैठी। वह मलेशिया से आ रही थी। इस विमान में संभवतः मलेशिया, इन्दोनेशिया, सिंगापुर के अलावा कोरिया, फिलीपीन और चीन या होंग कोन्ग के यात्री अधिक थे। कुछ अक्सर विमान यात्रा करने वाले या वाली भी थे, क्योंकि वे कपड़े वाली चप्पलों, टैब और आंखों पर बांधी जाने वाली पट्टियों  और गर्दन को सहारा देने वाले अतिरिक्त कुशन के साथ थे। विमान की यात्रा करीब साढ़े तेरह घन्टे की थी, इसलिये सारे इंतजामात के साथ यात्रा को सुखद बनाने का प्रयास सही ही था।
यह विमान काफी आधुनिक लगा। पूरी तरह साउंड प्रूफ। विमान के उड़ान भरने के समय इंजन के कर्ण बेधक स्वर की कर्कशता सुनाई नहीं पड़ी। विमान ने करीब 20 मिनट विलम्ब से उड़ान भरी। कुछ ही मिनटों में हमलोग समुद्र तल से 35000 फीट से अधिक की उंचाई पर पहुंच गये। विमान के बाहर का तापमान -54 डिग्री सेंटीग्रेड बताया गया।
इस विमान में सीट के सामने ही छोटी सी सतह-स्पर्श -चालित (टच स्क्रीन) टीवी लगी थी। इससे विमान की स्थिति का पता लगाया जा सकता था। साथ ही मनपसन्द गाने या मूवी का आनन्द उठाया जा सकता था। हमलोग तो नीन्द से जूझ रहे थे। विमान के स्थिर होते ही, विमान आतिथ्य बालाओं ने पहले एप्पल जुस और उसके बाद पैक में हमलोगों के लिये शाकाहारी नास्ता या रात्रि भोजन के रूप में पास्ता, आइस्क्रीम, चोकोलेट, फ्रुट सलाद आदि लाया गया। उसका आनन्द लिया गया।
हमलोग अपराह्न उड़ान भरे और तेरह घन्टे से अधिक हवा में उड़ने के बाद भी अपराह्न ही पहुंचने वाले थे। रात तो होनी ही नहीं थी। पूर्व से पश्चिम की यात्रा में दिन की तारीख वही रहती है, क्योंकि टाईम जोन पीछे हो जाता है, घड़ी पीछे करनी होती है।
विमान अपनी गति करीब 574 मील प्रति घन्टे की रफ्तार से उड़ा जा रहा था। जब भी विमान के पथ में किसी व्यवधान के कारण कभी-कभी ज्यादा हिलना डुलना होता था, तो सीट बेल्ट बान्धने की घोषणा होती या सिग्नल आ जाता।
हमलोग विमान से उड़े जा रहे थे। विमान का पथ सीट के सामने के छोटे स्क्रीन पर दिखता था। विमान प्रशान्त महासागर के ऊपर के आसमान को चीरता हुआ बढ़ता जा रहा था। नीचे अथाह समुद्र का नीला जल और ऊपर नीले असमान का असीम, अनन्त विस्तार। हमलोग इस महान सृष्टि में कीड़े से भी छोटे हैं। अपनी लघुता को ही भूलने की भूल करके अहंकार को व्यापक बनाते रहते हैं। उस अनन्त के अनन्त वितान में आश्रय लेने के प्रति कृतज्ञता के भाव को भी भूलते जाते हैं।
काफी देर उड़ चुकने के बाद, इजाजत के बगैर भी खिडकी के पास बैठी लड़की से अनुरोध करके खिड़की खोलकर खिड़की के पार जो हमलोगों ने झाँका तो एक दूसरा ही नज़ारा खुला था, कि हमारी आंखें खुली रह गयीं। ऐसा लगा जैसे लिहाफ  की सफेद रुई  किसी ने बिखरा दी  हो। वही सफेद रुई बादल के रूप में फैल गयी  हो और हमारा विमान उसके ऊपर टंगा हो और बादल उसे उड़ाये ले जा रहा हो।
हमलोग बीच बीच में एप्पल जुस लेते रहे। मदिरा के चाहकों के लिये विभिन्न तरह के गर्म पेय उपलब्ध थे। उसका लाभ उन्होने उठाया। लॉस ऐंजल्स के समय के अनुसार करीब 3 बजे हमलोगों के लिये एक और भोज्य पदार्थ पेश किया गया। इस बार खिचड़ी थी और सलाद, चाकलेट भी थे। साथ साथ एप्पल जुस या कोक जो चाहे ले सकते थे। मेरी पत्नी करीब दो घन्टे पहले चाय, जो नेचुरल टी जैसी थी, बगल में ही कीचेन से माँगकर ले आई थी।
इसतरह विमान आतिथ्य सेवा का लाभ उठाते हुये ठीक समय यानि 4:10 PM, स्थानीय समय के अनुसार विमान लॉस ऐंजल्स विमान तल पर उतरा। कैसा आश्चर्य है, हमलोग 4:55 PM होन्ग्कोन्ग समय के अनुसार वहां से चले और उसी दिन यहां 4:10PM पर पहुँच गये। समय की गति के कोड को डिकोड करने की कोशिश कर रहे थे।
विमान से बाहर निकलकर हमलोग एक बस में सवार हो गये। बस से हमें विमान तल के मुख्य परिसर में लाया गया। वहाँ हमें एक बार फिर सिक्योरिटी और इम्मिग्रेसन चेक से गुजरना था। हमलोग पंक्ति बद्ध होकर अपने पासपोर्ट हाथ में लिये हुये, बढते हुये एक ए टी एम की तरह मशीन के पास पहुंचे। वहां अपने पासपोर्ट के वीसा पेज को खोलते हुये जैसे ही निर्धारित स्लॉट मे डाले, कुछ प्रश्नों के उत्तर कम्प्युटर स्क्रीन पर देने थे। उन्हें सही सही देने के बाद एक पर्ची निकली जिसपर हमारी वीसा वाली तस्वीर थी। इसे लेकर हम आगे बढ़े तो सुरक्षा कर्मचारी ने इमिग्रेशन अधिकारी के पास जाने को कहा। उसने पासपोर्ट और हाथ की पर्ची देखकर अपने रिकॉर्ड से मिलाया, कुछ प्रश्न पूछे कि आपलोग कहां ठहरेन्गें, यहां कबतक रहेन्गें आदि, आदि। हमारे जवाब से संतुष्ट होने के बाद उसने पर्ची पर अपनी मुहर लगायी। हमलोग आगे लगेज़ क्लेम के लिये CX 822 फ्लाइट वाले कन्वेयर की ओर बढे। वहाँ हमारे सारे सूटकेस मिल गये। उन्हें हमने ट्रॉली पर सजाया और बाहर निकलने के लिये लगी लम्बी लाईन में लग गये। बाहर निकलने के गेट पर पर्ची ले ली गयी। बाहर निकलते ही मैने अपने लड़के चिन्मय को इन्तजार करते पाया। साथ में मेरी पुत्रवधु और मेरा पोता भी आया हुआ था। पारिवारिक मिलन सम्पन्न हुआ। स्थानीय समय के अनुसार करीब 5:45 PM का समय हो चुका था।
क्रमश:

अमेरिका यात्रा, होंग कौंग हवाई अड्डे पर, 04-07-2018 (प्रथम दिन आगे)

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04-07-2018, होंग कोन्ग हवाई अड्डे पर लॉस ऐंगल के प्लेन पर चढने तक इन्तजार:

विमान टर्मिनल 1 पर उतर गया था। हमलोग विमान से जैसे ही बाहर निकलकर गुफानुमा रास्ते से बाहर निकल कर एयर पोर्ट के भवन में आये, यहां की विशालता का आभास हो गया। हमलोगों को बिना बाहर निकले दूसरी फ्लाइट का इन्तजार करना था, इसलिये हमलोग ट्रांसफर यात्री के वर्ग में आते हैं। हमें लॉस ऐंगल के फ्लाइट के लिये करीब आठ घन्टे इन्तजार करना था।
होंग कोन्ग अन्तरार्ष्ट्रीय विमान स्थल करीब 1,255 हेक्टेयरमें फैला हुआ है। इस एअरपोर्ट पर 90 बोर्डिंग पॉइन्ट हैं। इनमें 78 जेट ब्रिज गेट हैं औरं 12 गेट अस्सेम्ब्ली पॉइन्ट हैं। इस विमान तल को चेक -लैप- कोक एअरपोर्ट भी कहा जाता है। पुराने एअरपोर्ट का नाम काई-टाक एअरपोर्ट था। यह नया एअरपोर्ट 1998 में चालू हुआ था। इसे 1997 में ही ब्रिटेन के द्वारा होन्ग कोन्ग द्वीप को चायना को सौंपे जाने के पहले ही इसे पूरा किया जाना था, लेकिन किसी कारण वश इस प्रोजेक्ट के पूरा होने में विलम्ब हुआ और 1998 में इसे पूरा किया जा सका।
टर्मिनल 1 करीब 5,70,000 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ( दुबई और बीजिंग के बाद) टर्मिनल है। इस एअरपोर्ट की काफी जमीन समुद्र से हासिल की हुयी है। यहां कैथे पैसिफिक एयर लाइन्स का हेड क्वार्टर भी है।
मैं अपना बैक पैक लिये हुये पत्नी के साथ इस टरमिनल के इस तल से उस तल पर निरुद्देश्य चलते रहे। यह टर्मिनल 7 लैवल का बना हुआ है। हमलोग पूछते हुये एक स्थान पर पहुंचे जहाँ फ्लाइट के बारे में कुछ सूचनाएँ दी जाती थी। यहाँ E 1 लिखा था। यहाँ पर कैथे पैसिफिक के अतिरिक्त अन्य फ्लाइट के बारे में सूचनाएँ उपलब्ध थीं। वहाँ पूछने पर पता चला कि कैथे पसिफिक के बारे में सूचना E 2 डेस्क पर उपलब्ध थी। मैंने उस डेस्क पर सेवा रत डेस्क बाला से पूछा कि मेरा लॉस ऐंंजल के लिये 4:55 PM में उड़ान है, तो उसके लिये सेक्युरिटी चेक और बोर्डिंग आदि किस गेट पर होगा। मैने अन्ग्रेजी में पूछा था। उसने चायनीज ऐकसेन्ट में जिस तरह से जवाब दिया, उसमें से अन्ग्रेजी के शब्दों को चुनना पड़ा और खुद से अर्थ खोजना पड़ा।
वहां पर करीब 7 घन्टे का ठहराव था, तो हमलोगों को कोई सुविधाजनक कोना ढूढना था, जहाँ से प्रसाधन और पान- साधन (जल पान साधन) दोनों नजदीक हो। एक वैसा ही कोना ढूढकर हम आराम दायक कुर्सी पर विराजमान हो गये। नींद धीरे - धीरे हावी हो रही थी। बस झपकियां ही ले सकते थे। पैर फैलाकर आरामदेह स्थिति प्राप्त करना मुश्किल था।
कहा जाता है कि इतने बड़े विमान विश्रामागार को चलाने और साफ-सफाई पर ध्यान रखने के लिये करीब 65000 लोग काम पर दिन रात लगे रहते है। इतने लोग लगे हैं, इसीलिये यह पूरा स्थल साफ है या इतने लोग अपने काम के प्रति समर्पित ढंग से लगे हैं, इसलिये यह स्थान साफ सुथरा है, यह हमलोग जैसों के लिये, जो अत्यधिक और निरन्तर सफाई देखकर असहज होने लगते हैं, चिन्तनीय विषय हो सकता है, परन्तु यहाँ तो जैसे सबकुछ किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा स्वप्रेरणा से सहज ही सम्पन्न होता दिख रहा था। सफाई के स्तर की तुलना अगर की जाय तो कोलकता का भी हवाई अड्डा कोई कम नहीं था। अब यहाँ पर यह सोचने पर विवश हो जाना पड़ता है कि हमलोग वही भारतीय हैं, जो विमान स्थल को इतनी सुन्दरता से रख रखाव करते हैं। वही अपने शहर, गली, मुहल्ले के रखरखाव पर इतने उदासीन क्यों हो जाते हैं? क्या अंतरराष्ट्रीय अतिथियो के स्वागतार्थ, पलक पांवड़े बिछाये हुये "अतिथि देवोभव" की भवना से ओतप्रोत विमान स्थल को टिप टौप रखना हमें अच्छा लगता है? और वही जब स्वयं जीने के लिये अपने गली, मुहल्ले, शहर में रहना होता है, तो वे सारे मानक ताक पर रख दिये जाते हैं।
हमलोग अपने विश्राम के स्थान पर बनी आरामदेह कुर्सियों पर विराजमान हो गये। रात की कच्ची नींद, झपकियाँ आनी शुरु हो गयीं। इतने में मेरी पत्नी की बगल वाली सीट पर सलवार सूट में एक महिला बैठी। कफ़ी देर तक इन्तजार किया, तो भी उन महिला के साथ किसी पुरुष को नही देखा। अब थोडा आश्चर्य होना स्वाभाविक था। पत्नी ने संवाद स्थापित करने की पहल की। दो भरतीय स्त्रियां अगर पास पास बैठी हो और उनमें अगर कोई संवाद नहीं हो, तो समझ लेना चाहिये कि या तो दोनों गूँगी है, या एक गूँगी और दूसरी बहरी हैं।
स्वभावतः कहां से हैं, से शुरु होकर बच्चे कितने है, कहां-कहां हैं, घर में और कौन- कौन है, और अंत में हस्बेन्ड क्या करते हैं?
तक बातें बढती ही जाती है और खत्म होने का नाम नहीं लेती। मैं भी ये बातें सुन रहा था जो उनमें हो रही थी। वो मोगा पंजाब की थी। न्यू ज़ीलैण्ड से लौट रही थीं। दिल्ली के फ्लाइट का इन्तजार कर रही थी, जो छ: बजे थी। धीरे-धीरे उन्होने अपनी कहानी के बिन्दुओं को सामने लाना शुरु किया, तो मुझे लगा कि हर शख्स की जिन्दगी यहां एक कहानी लिख रही हौ। उन्होने उस समय अपने पति को एक आकस्मिक दुर्घटना में खो दिया था, जब उनके बच्चे छोटे-छोटे थे। क्या किया जाय कुछ समझ नहीं आ रहा था? जब विपत्ति आती है तो रिश्तेदार भी किनारे हो जाते हैं। कोई खबर भी नहीं लेना चाहता, डर से कि ऐसा ना कुछ मांग बैठे। उन्होने अपने को दिलासा दिया, मजबूती दी।
सिलाई का काम शुरु किया। जो कुछ पैसे बचे थे, उससे लुधियाना से सुबह ही स्वयं जाकर सिलाई के सामान खरीदती। लोगों के कपड़े लाती, दिनभर घर का काम करते हुए ही, बच्चों को संभालते हुये सिलाई करती। धीरे-धीरे उनके इस हुनर में निखार आता चला गया। पैसे भी आने शुरु हो गये। पति के हिस्से की प्रॉपर्टी पर जेठ कुन्डली मारकर बैठ गया। उन्होने उसके प्राप्त करने के लिये जरूरी संघर्ष को स्थगित कर किनारे रखा और अपने बच्चों की पढाई पर ध्यान दिया।
बच्चे पढ़ने में अच्छे निकले। बड़ा लड़का चण्डीगढ से आई टी में डिग्री लेकर अभी न्यू ज़ीलैण्ड में कार्यरत है। वहीं से वह आ रही थी। मोगा में अपना बूतिक बना लिया था। सिलाई सिखाने की कक्षायें भी चलाती थी। छोटी बेटी कनाडा में पढाई कर रही थी। इतनी कहानी सुनते-सुनते हमलोगों को उनका नाम पूछना भी याद नहीं रहा। फिर मैने अपना विज़िटिंग कार्ड देते हुये उनका नाम पूछा। किरणबाला नाम था उनका। हमलोगों ने अपना कूकिज उनके साथ साझा किया। इन्तजार का वक्त इतनी संवेदना से ओतप्रोत अनुभवों से गुजरते हुये बीतेगा, सोचा ना था।
(होंग कोन्ग विमान तल पर बिताये गये कुछ और पलों के अनुभवों और वहां से उड़ान भरकर लॉस ऐंगल पहुंचने का वृतान्त अगले पोस्ट में )
क्रमशः 

Tuesday, July 17, 2018

अमेरिका यात्रा 04-07-2018, मिड नाइट 01:15 AM (पहला दिन)

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04-07-2018, मिड नाइट, 01:15 (पहला दिन)


इतने में करीब 12 बजकर 30 मिनट में रात्रि में घोषणा हुई कि कतार संख्या 40 से 50 तक प्लेन में प्रवेश के लिये आगे बढ़ें।
हमलोग नींद से जगे और एक दूसरे को झकझोर कर जगाये। तब पूरी तरह हावी नीन्द को अनहावी कर सके। मैं जल्दी से कोलकता के अन्तरार्ष्ट्रीय हवाई अड्डे के प्रसाधन का उपयोग करके आया। यह जरूरी था, क्योंकि इस सुविधा के प्रयोग का मूल्य भी टिकट के मूल्य में निहित होता है, इस विचार से नहीं, बल्कि जरूरत के कारण होकर आया। उसी तरफ उंची धार से निकलने वाले झरनेनुमा नल से पेय जल का भी पान किया। हमलोग कोई खाली बड़ी या छोटी बोतल साथ में नहीं रख सके, इसका अफसोस होने लगा। पूरे लाउंज में स्थित दूकानों में शराब की बोतलें नजर आईं, मगर पानी की बोतल उतनी जल्दी कहीं नहीं मिली। खुद को इस आश्वासन के साथ कि प्लेन में तो पीने के लिये बोतलें मिलेगीं, उसी को आगे प्रयोग के लिये रख लिया जायगा, आगे बढ़ चले।
इसके बाद हमलोग गेट संख्या 8 से अन्दर के तरफ घुसे। वहाँ से तिरछी ढलान पर आदम कद गुफा से होकर गुजरने जैसा अनुभव हो रहा था। लेकिन यह गुफा आधुनिकतम विद्युत सज्जा से सुसज्जित था और नीचे कार्पेट भी बिछा हुआ था। मैने दरी के स्थान पर कार्पेट शब्द का खासतौर पर प्रयोग किया, क्योंकि प्लेन में जब धरती से ऊपर उठने की तैयारी कर रहे हों, तो 'दरी' जैसे शब्द को जुबान पर लाकर और प्लेन में साथ ले जाकर देशीपने से क्या बँधकर घुसेन्गें? हमलोगों में यह इच्छा रहती है और अभी यह ट्रेंड जोर पकड़ता जा रहा है, कि जब धरती से उपर उठने की तैयारी होती है, तो देशीपन को एक केंचुल की तरह समझा जाता है, और उतार कर फेंक देने से ही उड़ने का मज़ा आता है। यही नहीं कहीं विदेश या देश में ही किसी जगह प्लेन से उड़कर अगर आये हों, तो और लोगों के सामने इसका कई बार जिक्र करने से नहीं चूकते मसलन 'अपनी अमेरिका यात्रा या फलां जगह जब मैं विमान से नहीं कहकर प्लेन से गया था, तो,,,आगे ब्ला ब्ला,,,। यानि हर वाक्य के आगे या पीछे इस वाक्य को प्रसंगवश या अप्रसांगिक तरीके से भी लगाना नहीं भूलते, ताकि अपनी विशिष्टता को लोगों के सामने प्रमाणित कर सकें। यह एक रोग की तरह अपना फन फैलाते जा रहा है। मेरे एक मित्र हैं। अगर मैने कहा कि फलाँ जगह मैं राजधानी या दुरन्तो जैसे विशिष्ट रेल सेवा से यात्रा की थी, तो वे पहले पूछेन्गें कि किस दर्जे में मैने यात्रा की थी? अगर मैने कहा कि मैं तो थर्ड ए सी में था, तो उनका झट से उत्तर होगा,
"अच्छा, आप थर्ड ए सी से गये थे, मैं तो सेकेन्ड या फर्स्ट ए सी से नीचे यात्रा करता ही नहीं हूँ। "
अगर मैने कहा कि फर्स्ट ए सी से यात्रा की थी, तो वे कहेंगे, "अच्छा, आप सेकण्ड या फर्स्ट ए सी से गये थे, मैं तो प्लेन से ही आता जाता हूँ। "
अगर मैने कहा कि मैं तो प्लेन से वहाँ गया था। तो वे झट से पूछेन्गें, " एकोनोमी क्लास में गये थे या बिसिनेस क्लास में।"
अगर मैने कह दिया कि मैं तो ईकोनॉमी क्लास में गया था।
उनका त्वरित उत्तर होगा, " मैं तो बिसिनेस क्लास में ही आता जाता हूँ।" इसके बाद तो न मेरे पास कुछ कहने को रह जाता और न उनके पास कुछ बढ़ा चढाकर बताने को। कहाँ मैं भी आपको उलझाने लगा। चलिये ले चलता हूँ, कैथे ड्रैगन की उड़ान में। कोलकता से होन्ग्कोन्ग के कैथे पसिफिक उड़ान को कैथे ड्रैगन नाम दिया गया है।
विमान के प्रवेश द्वार पर ओठों पर सुर्खियों सहित मोहक मुस्कान बिखेरतीं विमानआतिथ्य बाला (Air hostess), ने विमान में स्वागत किया।  एयर होस्तेस्स के लिये परम्परागत तौर से प्रयुक्त शब्द, विमान परिचारिका की जगह मैने विमान आतिथ्य बाला का प्रयोग किया है। मुझे परिचारिका शब्द पर ही आपत्ति है। परिचारिका शब्द से दासता की भनक आती है। आतिथ्य दासत्व नहीं है। यद्यपि यात्री ऐसा अतिथि होता है , जिसकी तिथि तय होती है, फिर भी वह देव स्वरूप होता है। जब हम अतिथि देवोभव कहते है, तो हम ईश्वर का कार्य ही कर रहे होते हैं। ईश्वर का कार्य करने वाला महान होता है, और उसके लिये दास, दासी या परुचारिका शब्द उसके इस महती भूमिका को छोटा कर देता है। मैने विमान के अन्दर आतिथ्य रत बालाओं के लिये इस शब्द का प्रयोग कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।
यह विमान हर कतार में तीन - तीन सीटों की ब्यवस्था सहित एक मध्यम या हो सकता है कि अन्तरार्ष्ट्रीय मानकों के अनुसार कम क्षमता वाला विमान है। अन्दर जाने पर मैने देखा कि हर दस क्षैतिज कतार के बाद एक विमान बाला खड़ी थी। उनके मोहक चेहरे पर करीने से संवारी हुई केश राशि और स्लिम फिट मिडी पर स्कर्ट उसकी पतली कमर और नितम्बों को दर्शनीय बना रही थी। उसकी टाँगें एक अर्ध पारदर्शी लेग्गिन्ग से त्वचा के साथ एकाकार होते हुये, त्वचा के दर्शनार्थ ध्यान आकृष्ट कराने में सफल हो रही थीं। अगर लेगिन्ग पर ध्यान डाला जाय, तो उसे अ - पारदर्शी होते हुये भी उसके आर -पार देखने के लिये अपार- दर्शन की ललक जगा जाता था। सभी बालाएँ चाइनीज़ या मन्गोलियन मूल की थी। विमान के अन्दर पहुंचने पर लगा कि एक लम्बी - सी बस यात्रियों के बैठने का इन्तजार कर रही है। सीट खोजने में कोई दिक्कत नहीं हुयी। साइड में सीटों के ऊपर जहां हैण्ड बैग रखते है, उसी पर सीटों की संख्या भी लिखी थी। धीरे-धीरे पूरा विमान यात्रियों से भर गया। सभी के चेहरों पर हवाई यात्रा की खुशी का रोमांच चेहरे पर नज़र आ रहा था। उनमें से कुछ यात्री बंगाल के परम्परागत पोशाक धोती - कुर्ता और साड़ी में भी थे।
बिमान के उड़ान भरने के पूर्व यात्रियों के स्वागत में घोषणा हुयी। इसके बाद सुरक्षा से सम्बन्धित घोषणा: जैसे आक्सीजन मास्क आपके उपर है। उसे कैसे लगाया जायेगा, उसकी सूचनाएं, सीट बेल्ट कैसे लगाना है, सीट के नीचे लाइफ जैकेट रखा है। ये सारी घोषणाएं अन्ग्रेजी, चाइनीज़ और बंगला में हो रही थी। अन्ग्रेजी का उच्चारण ऐसा था कि कुछ भी पल्ले नहीं पड़ रहा था। बंगला में हो रही घोषणा से ही हमलोग समझने की कोशिश में सफल हो रहे थे। विमान अपने पड़ाव स्थान से धीरे-धीरे घूमकर दौड़ पथ (रन वे) पर आ गया। हमलोगों ने अपने-अपने सीट बेल्ट बाँध लिये। ठीक समय यानि 1:15AM पर विमान ने उड़ान भरी। लगता है कि करीब तीन सौ यात्रियों और बिमान परिचारिकाओं और पायलट सहित अन्य कर्मियों के साथ विमान कुछ ही पलों में धरती से ऊपर उठने लगा। बादलों के पार जो कोई संसार है, करीब 35000 फीट और -50 डिग्री फारेनहाइट के तापमान पर , वहां पहुंचकर 550मील प्रति घन्टे की रफ्तार पकड़कर विमान निर्धारित दिशा में, होन्ग कौंग की ओर उड़ चला।
विमान के स्थिर होते ही आतिथ्य में सैंडविच के साथ सलाद और जुस दिया गया। इसके बाद जैसे ही थोडा सुकून जैसा महसूस हुआ कि झपकी आई और गहरी नींद में डूबती चली गयी। कितना समय बीता, इसका भान भी नहीं रहा। पत्नी मध्य सीट पर थी। खिडकी के पास की सीट पर कोई यात्री नही था, इसलिये वे आराम से पैर फैलाकर अधलेटी मुद्रा में विमान यात्रा के आननद में नीन्द को घोलती चली गयी। जब उन्होने खिड़की खोली तो उपर नीला आसमान और सूर्य की रश्मियाँ सीधे विमान के अन्दर आ रही थी। हमें लगा कि अभी ही तो रात में चले थे, ये सुबह कब हो गयी? थोडा मस्तिष्क पर जोर देने से समझ आया कि जब आप पश्चिम से पूर्व की ओर यात्रा करेंगें, तो समय आगे की ओर खिसक जायेगा। इसीलिये हमें लगा कि सूर्योदय जल्दी हो गया। बादलों के उपर से सूर्य की फैलती धूप में धरती का नज़ारा विलक्षण था। यहां से देखने पर लगता है कि सृष्टि का विस्तार कितना अपार है। हमलोग अपनी छोटी सी दुनिया को ही संसार मान बैठकर कैसे कैसे भ्रम पाल लेने में अपने अहं को संतुष्ट करते रहते हैं। प्लेन से ली गयी तस्वीरें नयनाभिराम  है।
हमलोगों का विमान निर्धारित समय, स्थानीय समय के अनुसार 7:50 AM पर होन्ग कोन्ग के विमान तल पर उतर गया। उतरने के ठीक पहले बेल्ट बांध लेने की घोषणा हुयी थी।
सकुशल उतरने के बाद हमलोग विमान से बाहर निकले।

क्रमशः

अमेरिका यात्रा 03-07-2018, रात्रि 10:00 बजे (पूर्व प्रथम दिन)

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03-07-2018ं, रात्रि 10:00 बजे

हमलोग के उड़ान का समय रात्रि 1 बजकर 15 मिनट पर है। कैथे पैसिफिक के एक मध्यम क्षमता वाले यान से हमलोगों को हौन्ग कौंग जाना था। यह उड़ान करीब साढ़े चार घन्टे का है। मैं अपने लगेज़ के साथ दो दिन पहले ही कलकता चला आया था। साथ में पत्नी भी थी। कोलकाता में मेरा निवास निजाम पैलेस के सेन्ट्रल पी डब्लू ड़ी द्वारा बनाये गये एक्सेक्युटिव फ्लैट में रहा, जो मेरे साले जी को आयुध निर्मात्री बोर्ड के निदेशक मण्डल में होने के कारण मिला हुआ है। कोलकता से कुछ छोटी मोटी चीजों की अन्तिम खरीददारी भी हुयी, जो अमेरिका में मुश्किल से मिलती हैं।
आखिर 3 जुलाई का दिन भी आ गया। सारे खरीदे गये सामानों को विभिन्न ट्रॉली सुट केस में वितरित किया गया ताकि वजन की सीमा के अन्दर ही सूट केस का वजन हो। वजन की सीमा 23 किलो के दो सूट केस प्रति टिकट होती है। शाम को मैं वॉश रुम से फ्रेश हो कर आ गया। उड़ान के निर्धारित समय यानी 1 बजकर 15 मिनट से तीन घन्टे पहले यानि करीब 10 बजकर 15 मिनट (रात्रि) से चेक इन शुरु हो जाता है। निजाम पैलेस, भवानीपुर, कोलकता से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अन्तरराष्ट्रीय उड्डयन स्थल तक पहुंचने में करीब 1 घन्टा तो लग ही जाता है। शाम को हल्की बारिश भी शुरु हो गयी थी। मैं और मेरी पत्नी दोनों ने साढ़े आठ बजे रात्रि में दो रोटियाँ और थोड़ी सब्जी के साथ हल्का खाना खाया। खाने में रुचि और स्वाद तो उतना नहीं लगा। मन में कौतूहल, अनिश्चितिता भरा डर और उत्सुकता लिये हुये सारे लगेज के साथ लिफ्ट से धरातल पर उतरे, जहां कार इन्तजार कर रहा था। मेरी अन्तरार्ष्ट्रीय उड़ान की इतनी लम्बी पहली यात्रा थी। प्रिय रामकुमार जी (मेरे साले) और उनकी पत्नी हमें नीचे तक छोड़ने आये। चार ट्रॉली सूट केस जो हमारे पास थे, उनमें से तीन ही डिकी में आया। एक थोड़ा बड़ा वाला सूट केस आगे की सीट पर रखना पड़ा।
निजाम पैलेस से नौ बजकर दस मिनट पर निकलकर मा फ़्लाई ओवर से होते हुए, नजरुल इस्लाम एवेन्यू होते हुये, भी आई पी रोड पकड़कर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अन्तरराष्ट्रीय विमान तल पहुंचने में करीब एक घन्टे लग गये। वहाँ पहुंचकर हमने ड्राईवर की मदद से अपने लगेज निकाले। लगेज को ट्रॉली पर रखा और अंतरराष्ट्रीय टर्मिनल के तरफ खुले इन्टरी गेट के तरफ बढ़े। वहां सिक्योरिटी पर्सनल पासपोर्ट देखकर ही लोगों को प्रवेश करने दे रहे थे। हमलोगों ने भी अपना पासपोर्ट दिखाया और लगेज सहित अन्दर हाल में प्रवेश कर गये।
हाल में एअरपोर्ट के मदद मित्रों से पूछने पर कैथे पेसिफिक की उड़ान के लिये बोर्डिंग पास और लगेज़ देने के लिये काउंटर H की तरफ इशारा किया गया। वहाँ काउंटर पर पूछा गया कि क्या मैने ऑन लाईन सीट बुक की थी? मेरे हां कहने पर प्रक्रिया सरल हो गयी। उन्होने अपना रिकॉर्ड चेक कर उसकी पुष्टि कर दी। 43 नम्बर कतार की B और C सीटें। C सीट Aisle यानि किनारे की और B यानी बीच वाली सीट थी।
हमारे लगेज़ का वजन किया गया। वह निर्धारित सीमा के अन्दर था। उसपर कम्प्युटर से निकले स्र्तीप को टैग किया। हमें गेट नम्बर 8 की ओर जाने को कहा गया। काउंटर पर की बाला ने मुस्कान के साथ हैप्पी जर्नी कहा। हमलोग सिक्योरिटी चेक की तरफ बढ़ गये। हैण्ड लगेज़ की वजन सीमा 7 किलो होती है। हां उसमें किसी तरह का कोई धातु का सामान, नुकीला कोई भी समान, कोई द्रव पदार्थ आदि नहीं होना चाहिये। इसका ध्यान रखना जरूरी है की ऐसी कोई चीज गलती से भी ना रहे। मेरा पुरुष काउंटर के तरफ और पत्नी का महिला काउंटर के तरफ हैण्ड लगेज़ चेक किया गया। उससे सकुशल गुजर जाने के बाद हमलोगों ने काउंटर नम्बर 8 के तरफ रुख किया।
उससमय तक रात्रि के करीब साढे ग्यारह बज चुके थे। हमलोग गेट नम्बर 8 के पास पहुंचकर इन्तजार में झपकियां लेने में मशगूल हो गये। 


अमेरिका यात्रा, 07-09 मई, (वीसा के लिये)

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अमेरिका यात्रा, 07-09 मई, (वीसा का दिन)

पूर्वाभास 07-09 मई
अमेरिका यात्रा के लिये मेरी तैयारी मेरे और मेरी पत्नी के वीसा के लिये आवेदन करने के साथ ही शुरु हो गयी थी। हमलोगों ने वीसा के लिये दिल्ली को चुना। इसके लिये निर्धारित शुल्क अमेरिका में रहने वाले मेरे लडके ने ही जमा कर दिया था। 7 मई को नेहरु प्लेस मैट्रो के पास ही इंटरनेशनल प्लाजा या अमेरिकन ट्रेड सेन्टर में हमलोगों का फोटोग्राफ और बायो मेट्रिक्स, यानि उंगलियों के निशान और चेहरे की बिना चश्मा लगाये हुये तस्वीर ली गयी। यहां जाने के पूर्व ड़ी एस 12 फॉर्म की प्रिंट कापी और आपका पासपोर्ट के लिये निर्धारित फोटोग्राफ साथ में होना जरूरी था।
यहाँ हाल में प्रवेश के पहले मोबाईल, पर्स में किसी तरह का क्वायन, बेल्ट आदि अलग रखवा लिया गया था। ध्यान इसपर था कि बायोमेट्रिक्स के लिये निर्धारित हाल में प्रवेश करने वाले लोगों के पास मोबाइल, कैमरा या मेटल डिटेक्टर से पकड़ में आने वाली कोई भी चीज नहीं हो। सिस्टम बहुत ही साफ, सरल और त्रुटिविहीन ढंग से कार्य कर रहा था।
इसके बाद 9 मई को हमलोगों को वीसा साक्षात्कार के लिये चाणक्यपुरी स्थित अमेरिकन एम्बैसी जाना हुआ। समय 11 बजे का दिया गया था। इस समय का स्लॉट इसलिये लिया गया था कि सुबह तैयार होकर, सारे पत्रों-प्रपत्रों को अरेंज करना और पत्नी को तैयार होने के लिये समुचित समय देना, इन सबों में समय तो लगेगा ही। प्रपत्रों को एक साथ करके रखने का कार्य पिछले कई दिनों से चल रहा था। इसमें मुख्यतः ड़ी एस 12 फॉर्म में भरी गयी जानकारियों को स्थापित करने वाले सारे प्रपत्र रहने जरूरी थे। उनमें मेरी शिक्षा के रिकॉर्ड के सारे डोकुमेंट के मूल प्रमाण पत्र और उनकी प्रतिलिपि, मेरे सर्विस बुक , मेरे नाम कोई जमीन या घर के होने के प्रमाण के मूल प्रमाण पत्र और उसकी प्रतिलिपि और एक फैमिली का फोटोग्राफ जिसमें आप जिसके पास जा रहे हों, उसकी और आपकी और आपकी पत्नी, जिनके साथ आपकी तस्वीर जरूर हो।
इसके अतिरिक्त आप जिसके पास जा रहे हों, उसका पासपोर्ट और वीसा, अगर वह नौकरी में है, तो उसका सैलरी स्टेटमेन्ट की दो कॉपी प्रिंटआउट ले लेना अच्छा रहता है।
इन सारे प्रपत्रों को मैने रात में ही ब्यवस्थ्ति करके, हर प्रपत्र पर स्टिकर लगकर उपर में लिख भी दिया था, ताकि वहाँ पर अगर दिखाने की जरूरत पड़ी, तो यह सब निकालने में आसानी हो।
अपनी तैयारी के लिये, आप अमेरिका अगर पहली बार जा रहे हों, तो आपको यह मालूम होना चाहिये कि आप कहाँ रहेंगे और कितने समय तक रहेन्गें। साथ ही आपके परिवार के अन्य लोग अगर यहाँ भारत में हैं और आपकी प्रॉपर्टी भी यहाँ है, तो अपके भारत वापस लौटने के उपयुक्त, यथेष्ट और पर्याप्त प्रमाण हैं।
B1 वीसा, जो बिसिनेस और टुरिस्म वीसा कहलाता है, उसे देने में वीसा अधिकारी यही सुनिश्चीत करना चाहते हैं कि आप वापस अपने देश अवश्य लौट जायेंगें।
हमलोग ने समय पर पहुंचने के लिये कैब लेकर वीसा इंटरव्यू के लिये चाणक्यपूरी स्थित अमेरिकन एम्बस्सी जाने की अपेक्षा मैट्रो से ही जाना बेहतर समझा। वैशाली से ही लोक कल्याण मार्ग का टिकट लिया। मैं, मेरी पत्नी, नाती ओजेश और बेटी करुणा सभी वैशाली से मैट्रो द्वारा रजीव चौक उतर गये। वहाँ से येलो लाईन मैट्रो पकड़ कर लोक कल्याण मार्ग स्टेशन उतार गये। वहाँ से हमलोगों ने औटौ लिया और चाणक्यपुरी स्थित अमेरिकन एम्बैसी करीब 10 बजकर 15 मिनट तक पहुंच गये।
मैने और मेरी पत्नी ने अपने मोबाइल, पैसे, पर्स, वालेट आदि सबकुछ करुणा को रखने के लिये दे दिया। वे लोग बाहर रह गये। हमलोग डोकुमेंट के साथ पहले चेक पॉइन्ट पर पहुंचे। वहाँ सुरक्षा जाँच के पश्चात करीब 200 कदम चलने के बाद एक दरवाजे से अन्दर गये। वहाँ पचास से अधिक लोग पन्क्तिबद्ध थे।
हमलोग कतार में लग गये। जाते हुये एक और सुरक्षा जांच के उपरान्त पास्स्पोर्ट पर फोटोग्राफ के समय चिपकाये गये बार कोड को मैच कराया गया। आगे बढते गये। एक ऐसे हाल में पहुंचे, जहाँ करीब बीसियो खिड़कियों पर वीसा साक्षात्कार लिया जा रहा था। यहाँ साक्षात्कार लेने वाले अमरीकन दूतावास के ही अधिकारी थे।
पद्धतियाँ यहां भी साफ, सरल और त्रुटिविहीन लगीं। हमें खिडकी संख्या 12 आबंटित किया गया। उसपर किसी का साक्षात्कार जारी था, इसलिये हमे खिडकी के सामने 10 फीट की दूरी पर खींची गयी पीली रेखा के पास खड़ा रहने के लिये कहा गया। चार-पांच मिनट बाद खिडकी पर खडे बन्दे का साक्षात्कार जब समाप्त हो गया, तो मैं और मेरी पत्नी खिडकी पर पहुँचे। मन में कई सवाल उठ रहे थे। उधेड बुन, ऊहापोह की स्थिति के साथ ऐसे समय में जो सबसे बडा नकारात्मक विचार आता रहता है, वह है कि अगर वीसा साक्षात्कार में विफल रहे तो क्या होगा? तो होगा क्या? फिर आवेदन किया जायगा। अगर दोनों में से किसी एक का ही वीसा अनुमोदित हुआ, तो क्या होगा? मन एक कोने में इस ड़र का प्रति उत्तर मन के दूसरे कोने से आया। अगर एक का वीसा अनुमोदित हुआ तो दूसरे के लिये पुनः आवेदन दिया जायेगा।
इसी तरह के सारे उहपोहों से उमडते घुमडते मन लिये हुये, और धड़कते हुए दिल लिये हुये खिडकी पर पहुन्चे। खिड़की के उस पार एक गोरी महिला अधिकारी उपस्थित थी। मैने अपना और पत्त्नी का पासपोर्ट खिडकी के ठीक नीचे बने खाँचे से सरका दिया। उन्होने कुछ सीधे और सरल प्रश्न मुझसे पूछे। मसलन:
आप क्यों जा रहे हैं? किस वीसा के लिये आपने आवेदन किया है? आपकी फेमिली के अन्य लोग कहाँ है?
इस प्रश्न में महिला द्वारा अन्ग्रेजी में पूछे गये प्रश्न का अमेरिकन ऐकसेण्ट कुछ ऐसा था कि मेरी समझ में नहीं आने के कारण, मैने आई बेग यौर पार्डन जब कई बार बोला, तो उन अधिकारी ने एक हिन्दी दुभाषिये को बुलाया। इसके बाद तो सारे प्रश्नों का मैने और भी आसानी से जवाब दे दिया।
इसमे मुख्य प्रश्न थे: आप का अमेरिका कौन रहता है? किस वीसा पर वहां रहते हैं? वे किस पते पर रहते हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर से संतुष्ट होने के बाद उन्होने कहा, आपका वीसा ग्रांट हो गया है। मैं आप दोनों का पास्स्पोर्ट रख रही हूँ। इसके कलेक्सन सेन्टर से आप दो दिनों के बाद पासपोर्ट ले लीजियेगा। पत्नी से कोई प्रश्न नहीं पूछा गया। इसतरह हमलोगों का वीसा स्वीकृत हो गया। दो दिनों के बाद हमलोगों ने नेहरु प्लेस के अमेरिकन प्लाजा से अपना वीसा stamping किया हुआ पासपोर्ट प्राप्त कर लिया।
क्रमशः 




Saturday, July 14, 2018

गूंज नहीं तुम बनो किसी की (कविता)

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#poetry#motivational


गूँज नहीं तुम बनो किसी की,
खुद की ही आवाज़ बनो तुम।

जो बेबस, लाचार, बंचित हैं,
जिनका सूरज कहीं छुपा है।
प्रभु अवदानों की वारिश से,
नहीं उन्हें इक बूँद मिला है।
उनकी पेशानी पर आये
स्वेद-कणों का अलफ़ाज़ बनो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनो तुम।

झंझावातों को पार करो तुम
भंवरजाल से नहीं डरो तुम।
पर्वत शिखर के पार है मंजिल,
कठिन डगर, पर बढ़े चलो तुम।
तोड़ मिथों को आगे बढ़कर
एक नया आगाज़ करो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनों तुम।

निपट अकेले, साथ न कोई,
फिर भी जो चल देते हैं।
वे ही चीर चट्टानों को
राह बनाते चलते हैं।
दुनिया के लिए अनुकरणीय
एक नया सरताज बनो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनों तुम।

विफलता उसको नहीं डिगाती
कदम बढ़ गए, उस पथ से,
एकाकी जुट जाता प्रयास में,
नहीं मांगता कुछ भी जगत से।
जूझ जाये जो अरि से अभिमन्यु सा
वैसा ही जांबाज़ बनो तुम।
खुद की ही आवाज़ बनो तुम।
-ब्रजेन्दनाथ।
तुलसी भवन के पारिवारिक मिलन समारोह में सुनाई गयी मेरी इस कविता का यूट्यूब लिंक:
https://youtu.be/j3Bz-jNWytg

Monday, July 9, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा 30-08-2018, शंकराचार्य शिव ंंमंदिर, श्रीनगर

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शंकराचार्य मन्दिर, श्रीनगर

शंकराचार्य मन्दिर, जिसे जेष्ठेस्वरा मन्दिर या बुद्धों द्वारा पास पहाड़ मन्दिर भी कहा जाता है, जबर्वान पहाडों के विस्तार में शंकराचार्य पहाड़ी पर स्थित पवित्र शिव मन्दिर है। यह मन्दिर शहर के तल से करीब 1000 फीट पर स्थित है। वहाँ से सर्पिल बहती झेलम नदी के दोनों किनारे पर फैलाव लिये शहर के विहन्गम दृश्य को देखा जा सकता है। यह मन्दिर 200 साल इस पूर्व में बना था। उसके वर्तमान स्वरुप में 9 वीं शताब्दी में आदि शकराचार्य के आगमन के बाद पुनर्निमित एवं स्थापित किया गया। यह बौद्धों द्वारा भी पवित्र स्थल के रूप में पूज्य है। पारसी और यहूदी इसे बाग-ए-सुलेमान या राज सूलेमान का बाग भी कहते हैं।
जानकार पण्डित आनन्द कौल (1924) के अनुसार यह मन्दिर मूल रूप में हिन्दु राजा संदीपन, जिसने कश्मीर में 2629 B C से 2564 BC तक राज्य किया था, के द्वारा बनाया गया था। इसके बाद इस मन्दिर की मरम्मत नृप गोपादित्य (426-365 BC) और नृप ललितदित्य (697-734 AD ) के द्वारा की गयी। विश्व विजय पर निकले सिकन्दर (यूनान) ने भी इसे किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाने की जुर्रत नहीं की।
जैनुल-आबिदीन ने भूकम्प के कारण जर्जर हो गये इसकी छत की मरम्मत करवायी थी। सन् 1841-46 में सिख राजा रणजीत सिंह के शासन काल में गवर्नर शेख गुलाम मोइयुद्दीन ने इसकी छत की पुनः मरम्मत करवायी थी।
इस पहाड़ी का जिक्र संस्कृत विद्वान और कवि कल्हण जिन्होने प्रसिद्ध काब्य "राजतरन्गिणी" की रचना की थी, के ग्रन्थों में मिलता है।
(सन्दर्भ: राजतरंगिणी, कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है। 'राजतरंगिणी' का शाब्दिक अर्थ है - राजाओं की नदी, जिसका भावार्थ है - 'राजाओं का इतिहास या समय-प्रवाह'। यह कविता के रूप में है। इसमें कश्मीरका इतिहास वर्णित है जो महाभारत काल से आरम्भ होता है। इसका रचना काल सन ११४७ से ११४९ तक बताया जाता है। भारतीय इतिहास-लेखन में कल्हण की राजतरंगिणी पहली प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है। इस पुस्तक के अनुसार कश्मीर का नाम "कश्यपमेरु" था जो ब्रह्मा के पुत्र ऋषि मरीचि के पुत्र थे।

राजतरंगिणी के प्रथम तरंग में बताया गया है कि सबसे पहले कश्मीर में पांडवों के सबसे छोटे भाई सहदेव ने राज्य की स्थापना की थी और उस समय कश्मीर में केवल वैदिक धर्म ही प्रचलित था। फिर सन 273 ईसा पूर्व कश्मीर में बौद्ध धर्म का आगमन हुआ।

१९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में औरेल स्टीन (Aurel Stein) ने पण्डित गोविन्द कौल के सहयोग से राजतरंगिणी का अंग्रेजी अनुवाद कराया।

राजतरंगिणी एक निष्पक्ष और निर्भय ऐतिहासिक कृति है। स्वयं कल्हण ने राजतरंगिणी में कहा है कि एक सच्चे इतिहास लेखक की वाणी को न्यायाधीश के समान राग-द्वेष-विनिर्मुक्त होना चाहिए, तभी उसकी प्रशंसा हो सकती है-

श्लाध्यः स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता।भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती॥ (राजतरंगिणी, १/७))

कल्हण ने एक जगह लिखा है कि राजा गोपादित्य ने आर्यावर्त से आनेवाले वाले ब्राहमणों को पहाड़ी की तलहटी में बसने के लिये जमीन दी थी। इस भूमि दान को "गोपाग्रहार" कहा गया। इस क्षेत्र को अभी भी 'गुपाकर' नाम से जाना कहा जाता है।
कहा जाता है की एक बार कुछ ब्राह्मणों ने अज्ञानतावश या गलती से लहसुन खा लिया था। इसलिये उन्हें उस गाँव से अलग दूसरे गाँव में बसाया गया, जिसका नाम भुक्षीरवाटिका (आज का बुचवोर) पड़ा। कल्हण ने यह भी लिखा है कि उस पहाड़ की चोटी पर जेष्ठेस्वरा (शिव जेष्ठरुद्र) के श्राईन के रूप में नृप गोपादित्य ने ही मन्दिर का निर्माण करवाया था।

क्रमशः


Sunday, July 1, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतांत, 29-05-2018, आठवाँ दिन, Day 8 (आगे)

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29-05-2018, मंगलवार, आठवाँ दिन, Day 8
आज दोपहर के पहले स्थानीय बाज़ार से कुछ खरीददारी करने का कार्यक्रम था। होटल के द्वारा ही बस का इन्तजाम कर दिया गया। हमलोगों में जिन्हें खरीददारी में रुचि थी, या सामान देखने में रुचि थी, वे बस पर सवार हो गये। मेरी पत्नी भी सवार हो गयी, तो मैं कैसे पीछे रहता। शायद होटल वाले का ही रिटेल आउटलेट होगा या उसी के सम्बन्धी का होगा, "कश्मीर हट" नामक दूकान में हमलोगों को छोड़ दिया गया।
अब देखने, समझने और सम्झाइस बढ़ाने का सिलसिला चला तो चलता ही चला गया। लोग खरीदने के साथ कश्मीर में बनी चीजों को देखने का लाभ उठा रहे थे, और मेरी सोच कुछ दूसरी दिशा पकड़ रही थी।
कितनी अजीब बात है कि सबों को हिन्दु बहुल बाज़ार तो चाहिये लेकिन हिन्दु पडोसी अगर अल्पमत में है, तो उसे उसके जमीन से उखाड़े जाने की धमकी अगर कोई आतंक वादी समूह वैमनस्य फैलाने लिये, नस्लीय सामुहिक नर संहार की धमकी देता हो, तो वे चुपचाप बैठे रहेन्गें। यही सोचकर कि यह मेरे ऊपर तो नहीं बीतने जा रहा है। यही कश्मीर घाटी में नब्बे के दशक में हुआ था। यही हिन्दुओं के साथ पकिस्तान में हुआ और बंगला देश में हुआ। लेकिन यहां सरकार को रोहिन्ग्या के साथ मानवीय चेहरा दिखाने के लिये कहा जाता है। खैर मैं कहाँ आपको यात्रा संस्मरण सुनाते- सुनाते विचारों के वृत्त में उलझा रहा हूँ।
आगे बढते हैं। करीब एक बजे तक खरीददारी का दौर चला। उसके बाद होटल द्वारा दिये गये निर्धारित छोटी बस से वापस होटल आ गये। रास्ते में मैने जम्मु और कश्मीर बैंक के एटीएम से पैसे निकालने गये, तो वह 100रु के नोट ही दे रहा था। उसकी सीमा 4000 रु तक ही थी। उतना ही निकालकर सन्तोष करना पड़ा। खरीददारी का पेमेंट मैन्र कार्ड से किया था। वहीं केसर की दो डिबिया भी खरीदी। दूकान के मालिक ने दो कप कश्मीरी कहवा, जो वे लोग केसर डालकर बनाते हैं, पिलाई। इस पूरे खरीद में आदिल का ब्यवहार प्रशंसनीय रहा। मैने उन्हें अपना विज़िटिंग कार्ड भी दिया।

दोपहर बाद श्रीनगर में स्थानीय मुख्य आकर्षक स्थलों के भ्रमण का कार्यक्रम था।
इसी के तहत हमलोग सबसे पहले चश्मेशाही पहुंचे।
चश्मे साही एक सुन्दर झरने के चारो ओर विकसित बाग है। यहां के झरने ज़बर वान पहाडियों से घिरे जंगलों से नीचे की ओर बहते है और डल झील में समा जाते है। पास ही जम्मु कश्मीर सरकार के गवर्नर का निवास स्थान राजभवन है, इसलिये यहां हमारी बस को एक जगह पर सुरक्षा के चेक से गुजरने के बाद ही उस क्षेत्र में प्रवेश मिल सका।
कहा जाता है की इस झरने की खोज कश्मिरी पण्डितों के साहिब पंथ के एक महिला सन्त रूपा भवानी के द्वारा की गयी थी। रूपा भवानी का पारिवारिक नाम साहिब था। झरना को कश्मीरी में चश्मा कहा जता है। इसलिये झरने का नाम "चश्मे साहिबी" पड़ा जो कालक्रम में बदलकर "चश्मे साही" हो गया।
इसे बाद में मुगल कालीन शासक शाहजहां के काल में यहाँ के उससमय के गवर्नर अली मर्दान खान ने 1632 A D के आसपास इसका सौन्दर्यीकरण किया। शह्जाहां ने इसे अपने सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह को भेंट स्वरूप दिया। उसके बाद से इसका नाम " चश्मे शाही" यानि रॉयल स्प्रिंग पड़ गया। इस बाग के पूर्व में परि महल स्थित है, जहां दारा शिकोह ज्योयिष और और अन्तरिक्ष विज्ञान की बरीकियाँ, कश्मीरी पण्डितों और हिन्दु ज्योतिषाचार्यों से जाना और समझा करते थे। कहा जता है कि इसी परीमहल में औरंगजेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह की हत्या की थी।
यहां के भूखंड के ढलान ही पानी के बहाव में गति प्रदान करते हैं। सबसे प्रमुख इस बाग में बहता हुआ झरना है जो टेरेस से गुजर कर तीन भागों में बंट जाता है। एक नहर की शक्ल में, दूसरा झरने की शक्ल में और तीसरा फौब्बारे की शक्ल में होता है। पहले टेरेस एक दोमन्ज़िला कश्मीरी हट के डिजाइन का है, जिसमें ईरानी और पारसी कला शिल्प का समन्वय देखा जा सकता है। यहां जल का एकत्रीकरण होता है। यहां से नीचे के तरफ जल चादर की शक्ल में दूसरे टेरेस की तरफ बहता है। दूसरे टेरेस पर जमा किया हुआ जल नीचे के बड़े फौब्बारे को विस्तार प्रदान करता है। इसके बाद बहता हुआ जल तीसरे टेरेस पर जमा होता है। वहां से चादर की शक्ल में बहता हुआ जल चौकोर शक्ल के फौब्बरों को गति प्रदान करता है। यह फौब्बारा प्रवेश द्वार के समीप है। शैलानी दोनो तरफ की सीढियों से होकर उपर चढ़ते हुये फौब्बारों और झरनों का लुत्फ उठाते हुए मुख्य उदगम स्थल यानी प्रथम टेरेस तक पहुंचते है। कहा जता है कि यहां के जल में औषधीय गुण है। इस जल को पहले प्रधान मन्त्री जवाहरलाल नेहरु दिल्ली मंगवाकर पीने मे उपयोग किया करते थे।
यह बाग जिस स्थल पर बस ने हमलोगों को छोड़ा, वहाँ से उंचाई पर है। कई सीढियां चढने के बाद हमलोग झरने और बाग तक पहुच सके। सुन्दर फूलों से सजा बाग और बीच में बहता झरना, हल्की- हल्की हवा के थपेडों में झूमते रंग बिरंगे फूलों की क्यारियाँ और दर्ख्तों पर सफेद मैग्नोलिया के फूल वातावरण को सूफियाना संगीत का अहसास दे रहे थे। एक अध्यात्मिक आनन्द चारो तरफ ब्याप्त लग रहा था।
किसी भी शिला पट्ट पर इस बाग के अन्वेषक का नाम नहीं होना और साथ ही इस बाग को विकसित कर दारा शिकोह को भेंट किये जाने का जिक्र नहीं होना, कुछ अजीब सा लगा। कहीं तो इस बाग का पूरा इतिहास होना चाहिये जो हिन्दु और सूफी संस्कृति के मेल से बनी कश्मीरियत को दर्शाता हो।

क्रमश:

Saturday, June 30, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 28-05-2018, सोमवार, सातवां, Day 7

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जम्मु कश्मीर यात्रा वृतांत, 28-05-2018, सोमवार, सातवां दिन, Day 7
आज का कार्यक्रम काफी विशिष्ट था, क्योकि आज सोनमर्ग जाकर बर्फ का विस्तार देखना था।
आज सुबह चार बजे ही उठकर मैं और श्रीमति जी 5 बजकर 30 मिनट पर तैयार हो गये। हमलोगों को बस से सोनमर्ग के लिये नो इन्टरी से पहले ही अल्ल्सुबह निकल जाना था।
7 बजे प्रस्थान किये। रास्ते में ही टूर आयोजक द्वारा पोहा (चूड़ा से) और केला नाश्ते में दिया गया। हवाएँ काफी तेज बह रही थी। ठंढ भी ब्याप्त थी।। मैं अह्तियात के तौर पर शर्ट के अन्दर इनर थर्मल वीयर पहने था, इसलिये करीब 12 डिग्री तापक्रम होने के बावजूद भी ठंढ लग रही थी। मौसम जमशेदपुर में दिसम्बर जनवरी जैसा था। हमलोग वहां से आगे बढते हुये, सोनमर्ग के बेस तक पहुँच गये। यहां से बस का आगे जाना निषिद्ध था।
हमारे टूर आयोजक के अनुसार यहाँ से बस छोड़ देनी है। यहाँ  से जीरो पॉइन्ट तक जाने के लिये छोटी गाड़ी या एस यू भी करनी होती है। छोटी गाड़ी के लिये भाडा का तोल मोल करना होता है।
मुझे यहां पर शैलानियों की मदद के लिये किसी भी स्थापित पद्धति का अभाव दिखा। यहां पर जे ऐण्ड के टूरिज़्म की अनुपस्थिति और उसके द्वारा किसी पद्धति का स्थापित नहीं किया जाना बहुत खला। क्या ऐसा अनौपचारिक ढंग से लोकल लोगों के असन्गठित क्षेत्र को नौकरी के अवसर उप्लब्ध कराये जाने के लिये किया गया है? या जम्मु कश्मीर सरकार की शैलानियों के प्रति उदासीनता उसकी कार्य शैली का एक अंग है, कहा नहीं जा सकता। यहां आकर अतुल्य भारत, कहीं - न - कहीं असम तुल्य होकर बिखरता नज़र आया।
हमलोग आस पास बिखरे घास के मैदान, (meadows)और सामने बर्फ के सफेद लिहाफ में लिपटे गिरि शिखरों के दर्शन का लाभ लिये।
यहां पर टैक्सी ओनर का एक नेक्सस है, जो शैलनियों को भ्रमित करने में ही अपनी कुशलता दिखाने का कर्तब्य निभाते नजर आते हैं। उदहारण के लिये हमलोग 4 एस यू वी 4000रु में लिए, जो जीरो पॉइन्ट यानि पर्वत के शिखर पर, जहां बर्फ ही बर्फ है, वहां तक ले जाने की बात हुयी थी। बालटाल (अमरनाथ यात्रा के पथ में अन्तिम गांव, जहां अभी टेंट आदि का निर्माण किया जा रहा था, क्योंकि यात्रा जून में आरम्भ होने वाली है) से थोडा आगे तक सडक से ले जाने के बाद ड्राईवर ने ज़ोज़िल्ला पास पर पहुंचने के पहले ही कहा कि मेरा मलिक ने यहीं तक ले जाने को कहा है। हमलोगों के बहुत तर्क वितर्क के बाद भी वह आगे ले जाने को तैयार नहीं हुआ। निराश होकर तीनों गाड़ियाँ वापस आ गयीं। फिर वहां टैक्सी क्षेत्र के एजेंट से वाद विवाद शुरु हुआ, तो तय हुआ कि जिसे भी जाना हो, 6000रु में ज़िरो पॉइन्ट तक ले जायेगा। आखिर हम 6 लोग, एक एस यू वी पर चले। एक घन्टे के बाद जोज़िल्ला पास से होते हुये गुजरने लगे। जोजिल्ला पास के पास पहाड भयानक रूप से सीधे खडे, जगह - जगह पहाड़ से मिट्टी और गिट्टी सडक पर पसर हुआ, पिच सड़क बिल्कुल नहीं, एक तरफ ऊँचा पहाड़ और दूसरी तारफ अनन्त खाई, सड़क के किनारे कोई क्रैश बैरियर नहीं और सडक पर अनन्त जाम। स्थिति की भयन्करता में घने काले बादलों के घिरने की प्रबल सम्भावना ने अपूर्व योगदान दिया। उस समय 4 बज चुके थे। वहां से 12 कि मी चढ़ाई और बाकी थी। ड्राईवर के अनुसार इसमे एक घन्टा भी लग सकता था, दो घन्टे भी लग सकते थे। बारिश शुरु होने ही वाली थी। अब यह निर्णय लेना था कि क्या कच्छप गति से रेंगने वाले ट्रैफिक में शामिल रहते हुये अनिश्चितता की स्थिति में रहा जाय या यहाँ से लौट चला जाय।
ललन जी जो मेरे पड़ोसी भी हैं उन्हें मैने निर्णय लेने में मदद दी, वापस लौटने का अन्तिम निर्णय ले लिया गया। बारिश शुरु हो चुकी थी। बर्फ से ढंके पहाडों के उंची चोटियाँ, जो कुछ देर पहले सूर्य की रोशनी में चांदी के मुकुट के तरह चमक रही थीं, अब भयंकर दैत्य की तरह दिखने लगी थीं। हमलोग साढ़े पांच बजे तक बेस तक पहुंच चुके थे। बिना ज़िरो पॉइन्ट तक पहुँचे पेमेन्ट करते हुए दुख तो हुआ, परन्तु जोजिल्ला पास को पास से देखने और उस उंचाई से कहीं अधिक उंचाई पर कारगिल युद्ध में हथियार और रशद पहुंचाने की कलपना से ही हमें अपने सेनानियों पर गर्व महसूस करने का अहसास हुआ। ज्ञात हो कि कारगिल तक जाने का वही एकमात्र रास्ता है। इस राश्ते के भी रखरखाव में ऐसी उदासीनता के कारण ही कारगिल युद्ध के पहले पकिस्तान के सैनिक कई दिनों से पहाडों पर बंकर बनाते रहे और हमें खबर तक नहीं हुई। होटल की ओर वापसी की यात्रा करीब 7 बजे आरम्भ हुयी। 9 बजे तक वापस श्रीनगर होटल पहुन्च चुके थे।

आगे की यात्रा में श्रीनगर और गुलमर्ग के संस्मरण है, अवश्य पढकर अपने विचार दें:
क्रमशः

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 27-05-2018, रविवार, 6ठवाँ दिन, Day 6

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जम्मु कश्मीर यात्रा वृतांत, 27-05-2018, रविवार, 6 ठवाँ दिन (Day 6),
आज सुबह नाश्ते के बाद करीब 9 बजे हमलोग श्रीनगर के लिये निकल गये। रास्ते में बैट फैक्टरी देखने को मिला। यहाँ हल्का बैट बनाने वाली लकड़ी पायी जाती है। उसी से बैट बनता है। यहां कई लोगों ने सस्ते बैट लिये, जो अपने रिश्तेदारों को भेंट स्वरूप भी दे सकते हैं। 
रास्ते में अनन्तनाग शहर भी मिला। यहाँ से गुजरते हुये 1990 में हिन्दुओं के पलायन का मंजर सामने आ गया। आजाद भारत में हिन्दुओं को पलायन का सन्त्रास झेलना पड़े, इससे शर्मनाक और क्या बात हो सकती है।
इस ब्यथा को मन में समेटे हमलोग आगे बढें। बस को श्रीनगर से बाहर ही छोड़ देना पड़ा। क्योंकि दिन में बड़ी गाड़ियों का नगर में प्रवेश वर्जित था। मिनी बस से हमलोग होटल Four seasons पहुन्चे। 
दिन का भोजन 2 बजे हुआ। थोडा विश्राम कर हमलोग 5 बजे चाय लिये। चाय के बाद डल झील में नौका विहार, जिसे यहाँ शिकारा कहा जाता है, के लिये हमलोग चल पड़े। 
वहाँ पहुँचकर पेरिस ब्यूटी नामक नौका पर हमलोग सवार हो गये। वहीं पर आदरणीया शीला श्रीवास्तव, सेवा निवृत्त शिक्षिका, चिन्मया विद्यालय, जमशेदपुर से हुआ। डल झील करीब 22वर्ग किलो मीटर में फैली हुयी एक प्राकृतिक झील है। इसकी सतह पर नौकायन एक नये अनुभव से गुजरना था। शाम के पहले का उजाला और उसमें हमारी नौका जल के सतह पर धीरे-धीरे बढती रही। हमलोगों ने वीडियो लिये। तस्वीरें भी लीं। 
मैने अपनी एक ताजी कविता सुनाई, जिसका विडियो श्रीमती श्रीवास्तव ने लिया। बीच में नौका रोकी गयी और हमलोग नेहरु पार्क में प्रवेश किये। यह पार्क झील के बीच में बना हुआ है। शाम के धुन्धलके के उतरने के ठीक पहले झील के बीच इस छोटे से पार्क का सौन्दर्य कुछ निखर गया है। यहां भी फूलों के बीच तस्वीरें ली गयीं। इसके बाद झील पर शाम धीरे-धीरे उतरने लगी। 
आखिरी तस्वीर नेहरु पार्क के पास की छोटी सी पुलिया के नीचे फैलते शैवाल शरीखे घास की गन्दगी का है जो झील को घेरने पर उतारू है। झील के अस्तित्व को बचाने के लिये इन शैवालों को उखाड़ना होगा।
हमलोग नौका पर पुन: सवार हुये। शाम में रोशनी के बीच झील में दोनो ओर सजे हुये मीना बाज़ार से होकर नौका पर गुजरना अच्छा लगा। हालांकि हमलोगों ने कोई खरीददारी नहीं की। सीधे निर्धारित मिनी बस से वापस होटल आ गये।

क्रमश:

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 26-05-2018, पाँचवाँ दिन, Day 5

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जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 26-05-2018, शनिवार ,पांचवा दिन (Day 5) पहलगाम
 पहलगाम मेरी कश्मीर घाटी की यात्रा का पहला पड़ाव था। पता नहीं पहला पड़ाव था इसलिये या कुछ खास है इसकी निशब्द वादियों में, यह मेरा पहला प्यार भी बन गया। मैं बाद में सोनमर्ग, गुलमर्ग और श्रीनगर भी गया, लेकिन हर जगह प्रकृति के खुलापन में कुछ-न-कुछ बनावटीपन घुला हुआ लगा। यहाँ की प्रकृति अभी तक बिल्कुल अपने वास्तविक स्वरुप में है।
मैं जहाँ ठहरा हूँ, वह लिद्दर नदी के किनारे का एक रेसोर्ट है। मुझे संयोगवश वह कमरा मिला हुआ है, जहाँ से लिद्देर नदी का कल-कल स्वर सुनाई देता है। स्फटिक-सा साफ जल पत्थरों पर लगातार बहते-बहते उन्हें गोल बना देता है। उन्हीं पर फिसलती हुई नदी, एक रूहानी संगीत को स्वर देती हुयी बही जा रही है। यह घाटी, जो उँचे-उँचे पहाड़ों से घिरी है, उनके शिखरों पर इस मौसम में (मई के उत्तरार्ध) भी बर्फ की चादर देखी जा सकती है। यही बर्फ पिघलती है और झरनों की शक्ल में पहाड़ों से नीचे उतरती है और एक साथ मिलकर नदी का आकार ले लेती है। इस स्थान पर यह नदी बिल्कुल स्वच्छ और अप्रदूषित है, इसीलिये इसका सौन्दर्य अभी भी शास्व्त है, रूहानी है, आत्मिक है। मुझे रात में नदी के किनारे-किनारे जल को निहारते हुए कुछ दूर चलने का मन हुआ, परन्तु रात में पहाडों से होकर बहने वाली बर्फीली हवा के जोर के कारण तापमान 5 डिग्री के करीब गिर गया। मेरे पास जैकेट और मफलर रहने के बाव्हूद भी नदी के किनारे रात्रि भ्रमण का लोभ संवरण करना पड़ा।
सुबह नाश्ते के बाद, पहलगाम से सटे हुये कुछ स्थानों पर भ्रमण का कार्यक्रम निर्धारित था। इसलिये हमलोग नाश्ता करने के बाद होटल रिसेप्सनिस्ट की मदद से तीन स्थानों अरु घाटी, बेताब घाटी और चन्दन बाड़ी का भ्रमण के लिये तवेरा गाड़ी ठीक किया गया। हमारी यात्रा 9 बजकर 30 मिनट पर आरम्भ हुयी। हमलोग लिद्दर नदी के किनारे - किनारे सड़क मार्ग से होते हुये आगे बढने लगे। ठंढी हवा और पहाडियों से घिरी वादियों से गुजरते हुये नजारों के एक - एक पन्ने खुलते चले गये। पहाडों के शिखर बादलों को छूने के लिये एक दूसरे से होड़ में लगे हुये से दिखे। हमारी गाड़ी अरु घाटी की ओर बढ़ रही थी। रास्ते में कही - कहीं भेडों-बकरियों के झुण्ड की वजह से गाड़ी को धीमा रखते हुये सड़क के किनारे से गुजरना होता है। शायद आज भी भेड़ों के मालिक उन्हें चराते हुये दूर पहाडों के तरफ निकल जाते हैं। इसी के वे किसान हैं, और यही इनकी किसानी हैं। इनकी पूरी खेती चलायमान रहती है यानि भेड़ बकरियों की खेत और ये इसके किसान। सुना है ऐसे ही एक किसान ने अमरनाथ गुफा में स्थित बर्फ से बने शिवलिंग की खोज की थी।
अरु घाटी जो करीब 7500 फीट उंची है, एक सुरक्षित वन क्षेत्र है। इस वन क्षेत्र में हिरण, शेर और भालू बहुतायत में पाये जाते हैं। यहाँ के जंगलों में हाथी नहीं पाये जाते हैं। यहाँ पर दूर गिरि श्रिंगों पर सफेद बर्फ की चादर सूर्य की रोशनी में चमकती चांदी की तरह दिखाई देती है। हर ओर से बहते झरनों का संगीत, ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से होकर झांकती सूर्य की किरणें पहाडों की खामोशी को संगीत से भर दे रहे थे। मुझे कुछ पक्तियों को रचने का मन करने लगा, जो इसतरह बाहर आ गया:

गिरि श्रिंगों  पर बर्फ की चादर
देवदार के पेड़ो की हरियाली
बहते झरनों का शोर छल छल
बुला रही है, थोडी बैठ तो आली।

उँचे- उँचे शिखरों से
खिंची है बर्फ की रेखा
रुई के फाहों से सनी
हवाओं में समय देखा।

ये कौन भर रहा कल कल उमंग है।
ये पत्थरों में उकेरता तरंग है।

ये कौन मचा रही नित धमाल है।
खुशियाँ दूँ सबको ये मेरे लाल हैं।

कैसे धरा को बुहार दूँ।
कैसे धरा को संवार दूँ।

अरु वैली के बाद हमलोग चन्दन बाड़ी गये। यह स्थान अमरनाथ यात्रा का पावर व्हीकल द्वारा तय किये जाने वाला अन्तिम पड़ाव है। इसके बाद की यात्रा पैदल या घोड़े पर तय की जाती है। यह समुद्र से 9500 फीट पर है। वहां बर्फ की मटमैली चादर बिछी थी। रुई के फाहों जैसी बर्फ एक-पर-एक जमा होकर बर्फ का लिहाफ बन गयी है। हमलोग उसपर कुछ दो कदम चले भी। कहीं-कहीं बर्फ पांव तले पड़ कर कीच बन गयी । प्रकृति को मानव जब पैरों तले रौंदने लगता है, तो वह मैली हो जाती है। उसे वैसे ही रहने देना चाहिये, जैसी वह है। कहीं कहीं बर्फ के छाते जैसे जमाव के नीचे से पानी का झरना नि:सृत हो रहा है। झरना ढलान पर वेगवान हो जाता है।
यही सारे झरने एक साथ मिलकर नदी का जल श्रोत बन जाते हैं। इतना कुछ प्रकृति ने जीवन को पोषित करने के लिये दिया हुआ है, फिर मानव ही और अधिक पाने के लिये, वह भी कम समय में, उसका बेपरवाह, बेहिसाब दोहन करने लगता है।
वहां से लौटते हुये बेताब वैली का विहन्गम दृष्टि से अवलोकन किया। नीचे जाकर देखने का समयाभाव था। सन्नी देवल, अमृता सिंह अभिनीत फिल्म "बेताब" का फिल्मांकन यहीं पर हुआ था।
इसे अब ब्यवसायिक रेसोर्त में बदल दिया गया है, जहां अन्दर जाने के लिये प्रति ब्यक्ति 100रु के टिकट लगते हैं। यह ब्यवसाय सरकार चला रही है या सरकार ने पट्टे पर किसी को दे दिया है, यह पता नहीं चल सका।
शाम तक हमलोग होटल आ गये।

क्रमश:



जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 25-05-2018, शुक्रवार, चौथा दिन, Day 4

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जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 25-05-2018, शुक्रवार, चौथा दिन, Day 4,

पत्नी सीधे तैयार होने चली गयी। वे तैयार होकर निकली, तो मैं तैयार हो हुआ। हमलोगों की पहलगाम की यात्रा 9 बजे सुबह से शुरु हुयी। हमलोग एक तवेरा suv पर सवार होकर उधमपुर, कज़ीगुन्ड से होते हुये पहलगाम शाम 6 बजे शाम को पहुंचे।
इस यात्रा में नयी बनी सुरंग, चेननी- नसरी के पास , करीब नौ किलोमीटर लम्बी, को पार करना एक नये तरह के अनुभव से गुजरना था। इस सुरंग ने जम्मु से श्रीनगर की 300 किमी दूरी को कम करके 250 किलोमीटर कर दिया है। हिमालय पर्वत के अन्दरूनी पहाडों को बेधकर इतनी बडी दो सुरंगों का निर्माण, तकनीक और निवेश के साथ दृढ़ इच्छा शक्ति का भी परिचायक है। ये दोनों सुरंगें हर 300मीटर के बाद गुफाओ से आपस में जुडी हुयी है। शायद यह एसिया की अबतक की सबसे बड़ी सुरंग है। रामबाण जिले में यह सुरंग पटनी टॉप आदि सुन्दर परिदृश्यों वाले स्थानों को बिना प्रभावित किये बनाई गयी हैं।
इस सुरंग से करीब 44 एव्लान्च और लैन्ड स्लाईड वाले क्षेत्रों में आसन्न खतरों से भी बचाव हो सकेगा।
चेनाब नदी के किनारे-किनारे उंचे पहाडों को काटकर बने सर्पीले सडक मार्ग से गुजरना भी नये ऐडवेंचर की तरह था। अभी इस सडक को फ़ॉर लेन बनाने का कार्य जोरों पर है। इससे ड़ायवरसन की भरमार है। धूल उड़ाती हुयी तवेरा लेकर हमारे चालक तारिक भट्ठ सुकून के साथ गाड़ी आगे बढ़ाते रहे।
इसी में बनीहाल पास की जवाहर टनेल छोटी सुरंग (ढाई कीलो मीटर) को भी हमने पार किया। कहा जाता है कि सर्दियों में इस सुरंग का प्रवेश द्वार बर्फ से ढंक जाता है, जिसे हमेशा साफ करने के लिये मशीने लगी होती हैं। यह सुरंग कश्मीर घाटी का प्रवेश द्वार है। बनिहाल अब रेल लिन्क से श्रीनगर से भी जुड़ गया है। काज़िगुन्ड कश्मीर घाटी का पहला छोटा शहर है।
इसी सड़क से होते हुये आगर सीधे चलें तो अनंतनाग, 20 किलोमीटर और श्रीनगर करीब 60 किलो मीटर है। अगर दाहिने मुड़ जाएँ, तो 40 किलो मीटर पर पहलगाम है।
हमलोग कटरा से 8 घन्टे की यात्रा के बाद शाम में पहलगाम पहुँचे। यह अनंतनाग जिले का एक तहसील है। इसकी समुद्र तल से उंचाई करीब 7200 फीट है। लिद्देर नदी का स्फटिक की तरह साफ जल ने हमलोगों का स्वागत किया।
वहां हमलोग लिद्देर नदी से सटे हुये एक रेसोर्ट में ठहरे। वहां मैं जिस कमरे में ठहरा था उसके ठीक पूर्व में उंचा पहाड़ था। सामने कल कल, छल छल करते हुये लिद्देर नदी बह रही है।
वैसे यह मंजर बहुत सुन्दर है, लेकिन एक चिन्ता की बात है। इस नदी के स्फटिक जैसे स्वच्छ जल में जब इन रेसोर्ट से निकले कचरे के अवशेष नदी में घुलेन्गें तो क्या नदी की स्वच्छता शाश्वत रह पायेगी?
पहलगाम के पड़ाव पर भ्रमण का वृतान्त अगले पोस्ट में अवश्य पढें।
क्रमश:





Friday, June 29, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 24-05-2018, बृहस्पतिवार, तीसरा दिन, Day 3

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जम्मु कश्मिर यात्रा वृतान्त, 24-05-2018, बृहस्पतिवार, तीसरा दिन, Day 3
आज सुबह पांच बजे ही मैं और ललन जी वहां पहुँचे जहां पर्ची कटती थी, पुराने बस स्टैंड के पास। वहाँ हमारे समूह से कुछ और लोग भी लाईन में थे। हमलोग उनके साथ जुड़ गये। करीब साढे 9 बजे यह घोषणा हुई कि अभी तक यात्रा शुरु होने की कोई समय सीमा नहीं दी गयी है, इसलिये आप लोग लाईन में नहीं में अनावश्यक नहीं खड़े रहे।
वहां पर मेरे साथ पिछले 21-22 अप्रील को मेरे साथ जम्मु कश्मीर अध्ययन केन्द्र के workshop में भाग ले रहे, गोरखपुर के महेश कुमार सिंह जी से मुलाकात हुई। वे पेशे से शिक्षक हैं। वे अपने पूरे परिवार यानी पत्नी, बच्चों और माता पिता के साथ आये हुये थे। आग लगने के कारण और यात्रा के रुक जाने के कारण कई लोग जो दूर दराज जगहों से आये हुये थे, बच्चों और बुजुर्गों के साथ काफी कष्ट में पड़ गये हैं। वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड अनजान दिख रहा है या अनजान बने रहने में अपनी पीठ की थपथपाई कर रहा है। श्राईन बोर्ड के तरफ से ना कोई घोषणा, ना कोई अह्तियात बरतने का सुझाव लोकल न्यूज़ पेपर में या स्टेशन पर ही कोई घोषणा, कुछ नहीं देखा गया। हालाँकि यह उनके लिये हमेशा होते रहने वाली छोटी सी घटना हो सकती है, लेकिन आम आदमी जो एक-एक पैसे धर्मार्थ के लिये बचाकर या कहीं से उधार लेकर ही अपने पूरे परिवार के साथ माता रानी के दर्शन के लिये यहाँ आते है, उनकी बढी हुई परेशानियों से बेखबर सरकार और श्राईन बोर्ड उन यात्रियों के प्रति अपनी जिम्मेवरियों से किनारा कैसे कर सकती हैं?
हमलोग वहां से वापस अपने ठहरने के स्थान पर आ गये। वहां नाश्ता किये। नाश्ते के बाद सोचे कि चलें थोड़ा देख आयें कि क्या स्थिति है। वहाँ पहुँचते ही पता चला कि पर्ची मिलनी शुरु हो गयी है। काफी भीड़ इकट्ठी होनी शुरु हो गयी। वहाँ काऊंटर तक पहुंचने के काफी पहले से सिर्फ एक ही लाईन में घुसना था। उस जगह से लेकर पीछे एक किलो मीटर तक पहले दो लाईन, फिर चार - चार पन्क्तियाँ बन गयीं। उपर सूरज लग रहा था कि आज आग बरसाने में कोई कमी नहीं रखनी है। बच्चे, बूढे सबों की फिजिकल उपस्थिति जरूरी थी, इसलिये सारे पक्तिबद्ध थे। इतने में देखा गया कि एक बच्चा बेहोश हो गया। जो पुलिस सबों को डण्डे दिखाकर पन्क्तिबद्ध करने में अपने ड्यूटी का मुश्तैदीपना दिखा रही थी, उसे उस बच्चे का बेहोश हो जाना दिख नहीं रहा था। हमारे प्रधान मन्त्री देश को स्वच्छता से लेकर देशभक्ति का मन्त्र पूरे देश को दे रहे हैं लेकिन तन्त्र अपने पुराने अंदाज में ही काम कर रहा है। मेरा सुझाव है कि देश की सारी पुलिस को कुछ दिन मिलिट्री कैम्प में ट्रेनिंग दी जानी चाहिये और उनकी बॉर्डर पर पोस्टिंग भी दी जानी चाहिये, तभी शायद उनमें देश भावना की समझ आ जाये। अन्यथा वे आम जन को वैसे ही समझते रहेन्गें जैसे अंग्रेजों के जमाने की ब्रिटिश पुलिस फोर्स आम भरतीय को समझते रहे थे।
हमलोग अखिकार दो घन्टे लाईन में खड़े रहने के बाद करीब बारह बजे अपनी - अपनी पर्चियां लेकर डेरे पर आ गये। तय हुआ कि हमलोग तुरत नहा- धोकर यहीं से तैयार होकर तुरत वैष्णो देवी भवन की यात्रा शुरु करेंगें। मैने अपनी पत्नी और ग्रुप के साथ बाण गंगा प्रवेश द्वार तक पहुंचकर अपनी यात्रा करीब एक बजे अपराह्न शुरु कर दिये।
यात्रा की चढ़ाई मेरे जैसे 65 वर्ष के थोडे कमजोर घुटने वाले ब्यक्ति के लिये कठिन थी। मेरी पत्नी ने अन्य लोगों के साथ पैदल ही यात्रा करने की ठानी। मैं भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर करीब दो घन्टे चला होगा। इतने में मेरे घुटने जवाब देने लगे। मैने पत्नी को कहा, "क्या किया जाय?"
उन्होने कहा, "आप घोड़ा ले लीजिये।"
मैने पूछा, "आप क्या पैदल जायेंगीं? "
उन्होने कहा, "जब तक चल सकूं, पैदल चलून्गी। नहीं, तो घोड़ा ले लूंगी।"
शायद वे समूह के अन्य लोगों के साथ देने की अहमियत से भी बंधी हुयी साथ चलने के निर्णय पर चल रही हों। या धर्मार्थ कार्यों में कष्ट सहन करने के सन्स्कारगत मान्यताओं से बन्धे हुये भी उन्होने माता रानी के चरणों तक चरणों से ही जाने की कठिन व्रत पालन करने के प्रति प्दतिबद्धता का निरर्वहण कर रही हो। अर्धकुमारी से चढाई सीधी थी। उसमें थकावट ज्यादा महसूस होती है।
इसतरह हम सभी लोगों को भवन के करीब 7 बजकर 30 मिनट शाम में पहुँच गये होन्गे। समान जिसमें मोबाइल आदि रखने जरूरत के लिये लॉकर रुम के लिये कोशिश में लगे तो पता चला कि उसके लिये लम्बी लाईन लगी है। और शायद यह भी खबर आयी कि लॉकरों की संख्या भी खत्म हो गयी है। श्राईन बोर्ड की अब्यवस्था या ऐसी स्थिति को सम्भाल सकने की अक्षमता साफ - साफ दिख गयी। अब हमलोगों को अपनी योजना बदलने की जरूरत आ पड़ी।
निर्णय यह हुआ कि मैं और ललन जी सामान के साथ इन्तजार करेंगें और बाकी लोग पक्तिबद्ध हो गेट न 3 से प्रवेश करेंगें। इसी में मेरी पत्नी भी थी। इतने में देवी जी की आरती का समय हो गया। पूरी की पूरी पंक्ति का मूवमेंट भी रुक गया। पीछे के तरफ भीड भी बढ़ती जा रही थी। यह भीड अब्यवस्थित हो रही थी। पुलिस बल भी तैनात थी। लेकिन उससे ऐसी अब्यवस्था से निबटने के लिये पुलिस बल और श्राईन बोर्ड की किसी कार्य योजना का नहीं होना हमलोगों बहुत खला।
जब हमलोग इन्तजार कर रहे थे, उससमय कुछ लोग अपनी परेशानी का बयान कर रहे थे, वहीं पर बैठे हुये एक बुजुर्ग जैसे सज्जन ने कहा, " भैया, जबतक आप यहां हैं, परेशानियों के बावजूद भी दर्शन किये, वह यहीं तक याद रहेगा। जब यहां से निकल जाओगे, यहां की सारी परेशानियाँ भूल जाओगे और सिर्फ याद रह जायेगा की माता रानी के दर्शन हमने कर लिया है।" मुझे उनका यह वक्तब्य काफी सकारात्मक लागा।
हमलोगों के कफ़ी इन्तजार के बाद रात के 11 बजे वे लोग दर्शन के बाद वापस आये। आते ही पहली खबर मिली कि पत्नी के कान के एक तरफ का कर्णफूल किसी ने खींच लिया। इसके बाद  करीब 45 मिनट में घुमावदार मार्ग से होते हुये देवी जी की पुरानी गुफा से होते हुये टनेल मार्ग पर जा पहुंचे। वहां दर्शन का लाभ लेकर हमलोग अपने समूह से आकर मिल गये।
अब डेरे लौटने की जल्दी थी। हमलोगों को सुबह सात बजे ही पहलगाम के लिये प्रस्थान करना था। मैने तो घोडा लेने का निर्णय ले लिया। पत्नी ने पुन: अपने धर्मार्थ कष्ट सहन में पुण्य अर्जन करने में प्रतिबद्ध दिखी। वे भी समूह के साथ पैदल उतरने का निर्णय लिया। मैं 4 सुबह बजे तक बाण गंगा के पास पहुंचा। वहां से औटो लेकर मैं अपने ठहरने के स्थान तक आ पहुंचा।
आते ही मैं थोड़ी नीन्द ले लेनी चाहिये, सोचकर मैं सो गया। पत्नी करीब 6 बजे पहुंची। फिर उनका निर्णय मुझे कुछ अविवेक पूर्ण लगा था। आखिर उनलोगों को अर्धकुमारी यानी आधी उतरायी के बाद घोडा लेना ही पड़ा, अन्यथा सवेरे प्रस्थान में उनके कारण विलम्ब हो सकता था।

क्रमशः


जम्मु कश्मीर यात्रा वृतान्त, 23-05-2018, दूसरा दिन, Day 2

#BnmRachnaWorld
#Tourtojammukashmir

23-05-2018, बुधवार, यात्रा का दूसरा दिन, Day 2

सुबह कटरा स्टेशन पर उतरने के बाद एलेवेटर से सामान सहित उपर टैक्सी स्टैंड तक पहुँचकर टैक्सी से वरुण होटल में 2 घन्टा इन्तजार के बाद कमरा ना, 407 आबंटित हुआ। कमरे की सफाई हो ही रही थी कि हमलोग अपने सामान के साथ कमरे में घुस गये। सफाई कर्मचारी ने कहा कि सभी लोग 414 नम्बर कमरे की सफाई में ब्यस्त है, क्योंकि वहां कोई बड़े पुलिस अधिकारी के रिस्तेदार आने वाले हैं। यह VIP culture को पोषित करना उस देश में कब बंद होगा?
आखिर हमारे सामान को हटा हटा कर सफाई हुआ। बैड रोल पहले ही बदल दिया गया था। हमलोग नहा धोकर तरो ताजा होने के बाद यात्रा को ओर्दिनेटोर के अपने कूक मण्डली से बनाया खाना हमलोगों ने लिया। कार्यक्रम के अनुसार आज विश्राम के बाद हमलोगों को वैष्णो देवी के दर्शन के लिये पर्वत पर जाना था।
हमलोग विश्राम कर ही रहे थे कि समाचार आया कि यात्रा बंद कर दी गयी है। उपर पर्वत पर आरोहण पथ में कही आग लग गयी थी। हमलोगों ने अपने होटल के कमरे की खिडकी से ही झांक कर देखा यो पर्वत के ऊपरी धरातल पर धुआं उठता हुआ दिखाई दिया। हमलोगों की उत्सुकता बढी, तो फिर नीचे जाकर सडक पर जैसे हे बढे, धुआँ और आग दोनों दिख पड़ा। अब तो लगने लगा कि वैष्नो देवी श्राईन की यात्रा असम्भव है। हमलोग माँ का नाम लेते हुये, शाम को हमलोग निकले और नज़दीक के काऊंटर न 2 के पास जाकर देखा। लोग अपने सारे सामान के साथ इन्तजार करते दिखे। लाईन लगाना बेकार था। सुबह 5 बजे काउन्टर खुलता था। उससमय भी पर्ची कटेगी या नहीं, इसकी कोई निश्चितता नहीं थी। विचार हुआ की कल अल्ल्सुबह ही आकर कोशिश की जायेगी।

नोट: मैं कतरा स्टेशन की तस्वीर भी दे रहा हूँ। इसकी तुलना एक आधुनिक स्टेशन से की जा सकती है।
क्रमश:

Sunday, June 17, 2018

कैसे धरा को संवार दूँ?(कविता)

# BnmRachnaWorld
#poems#nature

फूलों में रंग कौन भरता है?
पत्तियों में रंग कौन भरता है?
बादलों के संग कौन घिरता है?
हवाओ के संग कौन उड़ता है?

ये वसुंधरा लेकर नयी नयी
रूप राशि, नित सजा रही।

ये किसकी कूचियों से खींचे चित्र हैं।
ये किसके वितान पर मेले विचित्र हैं।

ये कौन कर रही नित शृंगार है।
शृन्गों पर बैठी कर रही विचार है।

कैसे धरा को संवार दूं,
कैसे धरा को संवार दूँ?

गिरि शृन्गों पर बर्फ की चादर
देवदार के पेड़ो की हरियाली
बहते झरनों का शोर छल छल
बुला रही है, थोडी बैठ तो आली।

उँचे- उँचे शिखरों से
खिंची है बर्फ की रेखा
रुई के फाहों से सनी
हवाओं में समय देखा।

ये कौन भर रहा कल कल उमंग है।
पत्थरों में कौन उकेरता तरंग है।

ये कौन मचा रही नित धमाल है।
खुशियाँ दूँ सबको ये मेरे लाल हैं।

कैसे धरा को बुहार दूँ।
कैसे धरा को संवार दूँ।

मैं आ गया हूँ कश्मीर में,
जहाँ वदियाँ विहंस रही हैं।
जहाँ चिनार, खुबानी के पेड़ों में,
जिन्दगी झांकती हुलस रही है।

जहाँ के लोगों में तहजीब है
जहाँ के लोग बांटते हैं खुशियाँ ।
जहाँ प्यार लुटाना जानते हैं
जहाँ नहीं है कोई भी कमियाँ।

जहाँ हर पल साँस लेती है
जीवन खुलने को आतुर है।
जहाँ हर मोड़ पर है चाहतें
जहाँ सौगात लुटाने को नेहातुर हैं।

फिर कौन है जो
वादियों में बारूद बुनता है।
वो कौन है जो
हरियाली में चिंगारियां चुनता है।

जब जानते हो यह सब
खामोश क्यों हो?
क्यों डरे से सहमे हुए
बेहोश क्यों हो?

तुम बुला लो, तुम सम्हाल लो
उन पडोसियों को जिन्हें निष्कासन दिया है।
उठो खडे हो, सत्य के लिये लड़ो
उनके लिये ढाल बनो जिन्हें आश्वासन दिया है।

ये जवाब होगा, जो चाहते हैं बांटना,
ये जवाब होगा, जो चाहते हैं खून चाटना।
चलो धरा को मनुहार दूँ।
चलो धरा को संवार दूँ।
- ब्रजेन्दनाथ
 ता: 01-06-2018
 जम्मु कश्मीर की 10 दिनों की यात्रा से लौटने के बाद 
तुलसी भवन में सुनाई  गयीं इस कविता का यूट्यूब लिंक:
https://youtu.be/_kxSrU4tiHY

Friday, June 1, 2018

जम्मु कश्मीर यात्रा वृतांत, 22-05-2018, मंगलवार, प्रथम दिन, Day 1)

#BnmRachnaWorld
#TourtoJammuKashmir
जम्मु कश्मीर यात्रा संस्मरण, 22-05-2018,मंगलवार, प्रथम दिन, Day 1)
मित्रों, मैं अभी जम्मु कश्मीर की यात्रा पर हूँ। इस यात्रा के दौरान जिन अनुभवों से गुजर रहा हूँ, उसे मैं लिपिबद्ध करने की कोशिश कर रहा हूँ। जम्मु कश्मीर में डाटा जाम कर दिये जाने के कारण आज पहला पोस्ट डाल रहा हूँ, जो श्रीनगर के होटल के वाईफाई के मार्फत सम्भव हो पाया है। प्रस्तुत है पहले दिन का  यात्रा वृतांत:




22-05-2018, मंगलवार (प्रथम दिन, Day 1)
ऊँ हौं जुं स:। ऊँ भूर्भव: स्व:।
ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम।
उर्वारुकम बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।
स्व: भूर्भव: ऊँ। स: जुं हौं ऊँ।
जम्मु कश्मीर की यात्रा मेरे वर्तमान निवास स्थान वैशाली सेक्टर 4 से 2बजकर 46 मिनट अपराह्न से आरम्भ हुई। ओला कैब से नयी दिल्ली स्टेशन आकर जमशेदपुर से आये अन्य यात्रा के पथिकों के समूह में, मैं अपनी पत्नी के साथ शामिल हो गया। वे सभी करीब 1 बजे अपराह्न ही पहुंच चुके थे। उनसे ज्ञात हुआ कि उनकी यात्रा कल ही शुरु हो चुकी है। वे जमशेदपुर से बस द्वारा रांची आये और वहां से गरीब रथ ट्रेन से दिल्ली आ गये। ट्रेन दो घन्टे लेट थी। उनका लंच यहीं स्टेशन पर हुआ। मेरे जमशेदपुर निवास सुन्दर गार्डेन कैंपस से श्री ललन प्रसाद सिंह जी अपनी पत्नी, अपनी बहन और जीजा जी के साथ आये हैं। उन सबों से यहीं दिल्ली स्टेशन पर मुलाकात हुयी। मेरी इस यात्रा का उद्देश्य समूह में यात्रा का आनन्द लेना है। दूसरा अभी जब जम्मु कश्मीर में रमजान के महीने में सेना का आतक वादियों के विरुद्ध ओफ्फेन्सिव कार्य कलाप बंद है, तब स्थिति को करीब से जानना! इस यात्रा में यात्रा कोओर्दिनेटर हॉलिडे त्रैवेल्स के श्री उत्तम चौधरी का सहयोग प्राप्त हो रहा है। उन्होने 6 बजे शाम के करीब मिक्चर और पेस्ट्री रोल के पैकेट पेश किया। इसके साथ हमलोगों ने चाय का आनन्द लिया।
आज आठ बजे जो यात्रा पर्ची प्रमाण परीक्षक आये, वे बहुत ही सजग दिखे। उन्होने टिकट का परीक्षण ही नहीं किया बल्कि सबों के आई डी प्रमाण पत्र की भी परीक्षा की। सामान्यत: ट्रेनों में हमलोग जैसे वरिष्ट नागरिकों से यात्रा प्रमाण पर्ची पर आबंटित सीटो की जानकारी लेकर आगे बढ़ जाते हैं। साथ ही अगर मेरी और मेरी पत्नी का एक ही पी एन आर में यात्रा पर्ची(टिकट) है, तो मेरा परिचय प्रमाण पत्र देखकर ही संतुष्ट हो जाते है। इन्होने मेरा और मेरी पत्नी दोनों का परिचय प्रमाण पत्र का परीक्षण किया। यह उनके कर्तब्य निरवहण के प्रति निष्ठा को दर्शाता है। ऐसे कर्तब्य परायण परीक्षक भारतीय रेल के प्रकाश स्तम्भ हैं। हाँ, बहुत से लोग होंगें जो उनके इस ब्यवहार को उनके पदाधिकारी जन्य अहंकार से जोड़ सकते हैं।
बड़ी विचित्र स्थिति है। जब कोई सरकारी पदाधिकारी या कर्मचारी अपने कर्तब्य का निर्वाह चुस्ती से करता है, तो वह आम जन की नजरों में पद का अहंकार दिखा रहा होता है। जब वह ऐसा नहीं करता है तो लोग उसे ढीला ढाला घोषित कर देते हैं।
रात्रि यात्रा तृतीय श्रेणी के शयन स्थान पर श्री शक्ति एक्सप्रेस/मेल से यात्रा करते हुये सम्पन्न हुयी। पूरी ट्रेन लगभग भरी हुयी थी। इससमय स्कूलों में छुट्टियां होने के कारण कफ़ी यात्री वैश्नोदेवी यात्रा के साथ कस्मीर की यात्रा की भी योजना बनाते हैं। हमारे समूह में करीब 31 यात्री और 4 -5 को ओर्दिनेटोर के स्टाफ हैं। जम्मु से कतरा की यात्रा एक नया अनुभव साबित होती अगर यह दिन में होती। इस रेल खण्ड का निर्माण खुद मे एक तकनीक और अभियंत्रण के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। दिन में यात्रा करने पर रेल का पहाडों पर वादियों और सुरंगों को पार करते हुये देखना एक रोमांचकारी अनुभव होता।
क्रमश:,,,

Thursday, May 17, 2018

बेवाकीपन या बेहयापन (विचारोत्तेजक लेख)

#BnmRachnaWorld
#Essay#thoughtprovoking


नोट : यह लेख ' प्रतिलिपि हिन्दी' में अगस्त 2016 में प्रकाशित हुआ था, जिसे पाठकों को अपार स्नेह मिला था। यह "बोलो कि लब आजाद है"  नाम से आयोजित प्रतियोगिता में 4था स्थान प्राप्त कर सकी थी। उसके नामों की सूची नीचे दे  रहा हूं:
साथ ही इस लेख को प्रतिलिपी के साइट के इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है:
"बेवाकीपन या बेहयापन", को प्रतिलिपि पर पढ़ें :
https://hindi.pratilipi.com/story/d06p8vm4esz5?utm_source=android&utm_campaign=content_share
भारतीय भाषाओमें अनगिनत रचनाएं पढ़ें, लिखें और सुनें, बिलकुल निःशुल्क!
प्रतियोगिता में प्राप्त पुरस्कार की घोषणा का स्क्रीन शॉट इस प्रकार है:


बेवाकीपन या बेहयापन 

आज कल एक अजीब चलन चल गया है। शिष्टता की सीमा लांघना, बेवाकीपन और बोल्ड कहा जाने लगा है। अगर उसे कोई स्त्री, स्त्री विमर्श से जोड़कर उसे महिमामंडित करे तो वह बड़ी खबर बन जाती है। उसे वैश्विक स्तर पर भी स्वागत किया जाने लगा है। आप जन लेखक या जनसंवाद स्थापित करने वाले रचनाकार कहलाने लगते हैं, अगर आप ब्यवस्था को इतनी गालियां देते है कि पिछले कई दशकों तक नहीं दी गई होगी। आप लानत मलामत भेजने की होड़ में काफी आगे निकल पाते हैं। रातों रात मशहूर होने के बड़े आसान समीकरण का प्रचलन चल पड़ा है। चली आ रही दस्तूरें, दकियानूसियों से नवाज़ी जाने लगी हैं। मातृभूमि को गाली देना समाचार बन जाता है। मातृभूमि के लिए गोली खाना कोई समाचार नहीं बन पाता। हमें पोर्न अच्छा लगता है, क्योंकि इंटरनेट पर पोर्न 70 प्रतिशत से अधिक छाया हुआ है। अब साहित्य में अश्लीलता की चर्चा ही बेकार है। अब कामायनी, उर्वशी या शाकुन्तलम् में हम श्रृंगार नहीं ढूढते। हम पेटीकोट और dopadi में श्रृंगार ढूढते है। अफ़सोस तब होता है जब समाज को दिशा देने वाले साहित्यकार या प्रबुद्ध वर्ग भी सस्ती लोकप्रियता की चाह में हवा के उसी रुख में उड़ते हुए दीखते हैं। समाज की विद्रूपताओं को स्त्री के अंतरवस्त्रों(मैं यहाँ उनके नाम गिनाने से परहेज़ कर रहा हूँ) से जोड़कर स्त्री रचनाकारों के द्वारा प्रस्तुत किया जाना उन कतिपय तथाकथित लोगों को भले ही चटपटा, तीखा और स्वादिष्ट लगता हो, लेकिन स्त्री विमर्श की वकालत करने वालों को भी शिष्ट तो नहीँ ही लगता होगा। हाल में एक कविता चर्चित हो गई। उसके भाव कुछ इसतरह थे- उसने दरोगा के कहने पर पेटीकोट नहीं उतारा, उसकी दुधमुंही बच्ची अपनी बूढ़ी दादी के सूखे स्तनों को चूसती रही...वगैरह, वगैरह... यहां साहित्य बेवाकीपन का आवरण लिए जनसंवाद स्थापित करने को बेचैन दीखता है, ऐसा ही सन्देश देने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें इसतरह का तथाकथित बेवाकीपन किस हदतक बेहयापन के करीब पहुँच गया लगता है, इसका आभास बहुतों को होते हुए भी वे सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने के प्रयास में उस हद तक अपने को गिरने - गिराने में कोई भी संकोच करना नहीं चाहते। इसमें वे बोल्ड, बेवाक का ख़िताब भी हासिल करने में सफल हो ही जाते हैं।

साहित्य अगर न भी कहें तो आजकल का लेखन इस बात में होड़ करने में लगा है कि किसने सेक्स की रोशनाई में अपनी कलम कितनी डुबाई है और उसके बाद उसे कितने बोल्ड ढंग से कागजों पर उतारा है। आज का श्रृंगार रस, श्रृंगार से उतना अलंकृत नहीं होता जितना इरोटिका के रस से ओतप्रोत होता है। मैंने हाल में लिखी अपनी एक श्रृंगार रस की कविता की कुछ पंक्तियों को सोशल साइट FB पर डाली, यह देखने के लिए कि कैसी प्रतिक्रिया मिलती है । पक्तियां थी..

अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें। उत्कंठित मनसे, उद्वेलित तन से, उर्जा के प्रबलतम आवेग के क्षण से, यौवन से जीवन का अविचारित यात्री बन, अंतर में टूटते तटबंध को टटोंलें। अभिसार के क्षणों को यादों में पिरो लें।

इसपर बहुत कम लोगों की प्रतिक्रिया आई। शायद मैंने भारी भरकम शब्दों में कसकर श्रृंगार को ब्यक्त करने की कोशिश की थी जो इस समय की ग्रहणशीलता के अनुरूप नहीं है। अगर मैं उसे ब्यक्त करने के स्तर को थोडा नीचे ले आकर सॉफ़्ट पोर्न के आसपास रखता, तो शायद ज्यादा स्वीकार किया जा सकता था। बड़ी अजीब बात है जहां अभिज्ञान शाकुन्तलम्, कामायनी, उर्वशी जैसे श्रृंगार रस से सराबोर उत्तम रचनाएँ रची गई हों वहां आज का पाठक वर्ग श्रृंगार रस की कतिपय पन्क्तियों के प्रति भी ग्रहणशील नहीं है। इस समय अगर आदरणीय जयशंकर प्रसाद भी अपनी कामायनी को पुनर्मुद्रित करवाने को आएं तो प्रकाशक उन्हें अपने काम सर्ग और वासना सर्ग का नाम बदलकर पोर्न सर्ग और एरोटिक सर्ग करने कहेंगें, तभी उनका काब्य छापने लायक समझा जायेगा। जयशंकर प्रसाद उतने बोल्ड नहीं हो सके न। उर्वशी से राजा पुरुरवा के प्रणय दृश्यों को दिनकर जी खुलकर नहीं लिख सके न। मैंने हाल ही में एक कहानी में BHMB शब्द लिखा देखा जो किसी लड़की पर कसी गई फब्तियों का एक हिस्सा था। बाद में जब लड़की ने अपने सूत्रों से इसका मतलब जानना चाहा तो पता लगा कि इसका मतलब होता है, " बड़ा होकर मॉल बनेगी", और यह मतलब जानने के बाद लड़की शर्मिंदा नहीं महसूस कर , खुश होती है। ...और ऐसी कहानियाँ और किस्से खूब पढी जाती हैं। यह वैसे ही होता है जैसे अगर कहा जाय कि इसे मत देखो, या इसे मत पढ़ो, तो उसे लोग जरूर देखते या पढ़ते हैं। उसी तरह का है बोल्ड लेखन। बेवाकीपन अब बेहयापन की हद पार करने लग गया है। रचनाकर्मियों का भी कोई दायित्व होता है, उसे समझने की जरूरत है। तो इसे आप क्या कहेंगें, " बेवाकीपन या बेहयापन"। बोल्डनेस, फूहड़पन और बेहयापन की सीमा न लाँघ दे इसका खयाल रखा जाय, तो रचनाकार अपने सामाजिक दायित्व के निर्वहन में भी समुचित योगदान दे सकेंगे।
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- ब्रजेन्दनाथ

Thursday, May 10, 2018

एक रैली और निकाली जाये (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poem#patriotic

मैने कुछ दिनों पहले शायद 23/24 अप्रील को एक वीडियो देखा था, जिसमें कुछ भयानक किस्म के बुद्धिजीवी अन्ग्रेजी में शेम शेम के नारे लगा रहे थे। यह स्थान लगता है कि मुंबई का गेटवे औफ इंडिया वाला चौराहा रहा होगा।
उससमय आसिफा वाला काण्ड भी सुर्खियों में था। ये बिल्कुल मेरे अन्दर के स्वप्रेरित भाव हैं। मैं किसी भी वाद के विवाद से दूर रहता हुआ,  कुछ कहने की कोशिश की है।
अभी तक अप्रकाशित कविता है।





आइये एक रैली और निकाली जाये


कसाब, दाउद, हाफिज को
सर कहकर आदर भाव देने वालों!
आओ लाखो कश्मीरी हिन्दुओं के घर बार छोड़
शरणार्थी की बदहाल जिन्दगी जीने वालों
के लिये भी थोड़ी करुणा दिखाई जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।

कल्बुर्गी, व्ल्मुल्ला, गौरी लंकेश, पर
कैन्डील जला-जला अश्रुधार बहाने वालों!
एक बार बस्तर, दान्तेवाड़ा, गढ़चिरौली में
शहीद हुये सुरक्षा बलों के नौजवानों
के लिये भी थोड़ी नेत्रों में नमी लायी जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।

मक़बूल बट्ट, बानी, गुरु अफजल, अजादी गैंग को
नारे लगा - लगा महिमामंडित करने वालों!
एक बार शहीद फैयाज़ और युसुफ पण्डित
के घरों में कोहराम के बाद पसरे सन्नाटे के
लिये भी थोड़ी सान्त्वना दिखाई जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।

भारत के विभाजन के सूत्रधार
मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगा उच्चासन देने वालों!
एक बार विभाजन के समय लाखों परिवारों
के घर बार उजड़ने पर रोते बिलखते, लाशें ढोते
लोगों के लिये भी दिल में संवेदना जगायी जाये।
आइये उनके लिये भी एक रैली और निकाली जाये।


उन्नीस सौ सैन्तलीस में कबायली के वेश में
पाकिस्तानी सेना द्वारा मारे गये हिन्दु मुसलमां के परिवार वालों!
इस बार उनके लिये मुट्ठियाँ बांधो, हाथों से हाथ मिलाकर
आओ जम्मु कश्मीर की मिट्टी की सौगन्ध ले,
पाक अधिकृत क्षेत्र को वापस लेने की कसम दुहराई जाये।
आइये इस कसम के नाम एक रैली और निकली जाये।

-ब्रजेन्द्रनाथ, तिथि 05/05/2018
दिल्ली एन सी आर, वैशाली।

Tuesday, May 1, 2018

कविता निकलकर आ रही है (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemmotivational



कविता निकलकर आ रही है

कोई कविता निकल कर आ रही है।

प्रसव वेदना की पीर सी
चुभ रही है नुकीली तीर सी
बाहर निकलने को देखो तो
वह कितनी छटपटा रही है।
कोई कविता निकलकर आ रही है।

अंतरावेगों को संवारती सी,
वाह्य-आवेगों को विचारती सी।
बाहर निकलने को देखो तो,
वह कितनी अकुला रही है।
कोई कविता निकलकर आ रही है।

कहीं चुपके से झांकती सी,
उस पार की पीर को आन्कती सी।
गुमसुम सी हुई देखो तो
वह कितनी पिघलती जा रही है।
कोई कविता निकलकर आ रही है।

गौरैया की चोंच की नोक सी
कुन्जों में कोयल की कूक सी
कौऔं के कांव कांव के मध्य भी
कितनी चहकती जा रही है।
कोई कविता निकलकर गा रही है।

वह विशिख-दन्त-कराल-ब्याल सी
कुन्डली कसती जा रही महाकाल सी
दुश्मनों को झपटने दबोचने को
देखो अपना फ़न फैला रही है।
मेरी कविता निकल कर गा रही है।

वह रण मत्त हो विषवाण सी
रक्त-दन्त-रंजित विषपाण सी
सीमा पर अरि मर्दन करने को
शोणित थाल देखो सजा रही है।
मेरी कविता रण राग सुना रही है।
मेरी कविता निकलकर गा रही है।

-ब्रजेन्द्रनाथ।
कोलकता, भवानीपुर, निजाम पैलेस
ता: 24-03-2017,

नोट:  दिनांक 29-04-2018, दिन रविवार को अपराह्न 5 बहे से स्थानीय दिल्ली एन सी आर, वैशाली सेक्टर 4 स्थित हरे भरे मनोरम सेन्ट्रल पार्क में "पेड़ों की छाँव तले रचना पाठ" की 43वीं गोष्ठी में रचना पाठ का सुअवसर प्राप्त हुआ।
यह अनौपचारिक साहित्यिक गोष्ठी प्रिय अवधेश कुमार सिंह, असिस्टेंट जनरल मैनेजर बी एस एन एल, दिल्ली, जो ब्यवसाय से भले ही तकनीकी प्रबन्धन से जुड़े हों, पर हृदय से कवि हैं, के संयोजन में पिछले तीन वर्षों से अधिक से निरन्तर आयोजित किया जा रहा है। यह गोष्ठी संवेदनात्मक, कोमल, भावपूर्ण अनुभूति की अभिब्यक्ति को प्रस्तुत करने का वह नैसर्गिक, प्राकृतिक मंच है, जो आज अपने मासिक आयोजन के 43वें पायदान पर सभी नियमित रचनाकारों और श्रोता बंधुओं का एक पारिवारिक आयोजन सा लगने लगा है।
इस रचना का पाठ मैने इसी आयोजन में किया है।
इस गोष्ठी में मेरे द्वारा किये गये कविता पाठ के विडियो का यू टयूब लिन्क:
link: https://youtu.be/4NW4CME5XEw
इस लिंक को कॉपी करें, गूगल सर्च ंंमें पेस्ट करे  सर्च बटन दबायें, आप ंंमेरे youtube चैनेल पर जायेंगे। आप विडियो का आनन्द लें। इसके बाद ंंमेरे यूट्यूब चैनेल BnmRachnaWorld को लाइक करे और subscribe भी करें।

Saturday, April 14, 2018

पूर्वाग्रह(कविता)

#BnmRachnaWorld
#poem#social

ओपन बुक्स ऑनलाइन साहित्य मर्मज्ञों के द्वारा संचालित एक वेबसाइट है। इसी में इसके ओ बी ओ लाइव उत्सव 90 में  "पूर्वाग्रह" शब्द पर रचनाएँ आमंत्रित की गयी थीं। रचना डालने की समय सीमा थी, 13 से 14 2018 अप्रील तक। मेरी यह रचना काफी चर्चित रही और सराही भी गयी। उस साइट पर सभी रचनाओं का संकलन जारी है।
अगर आपको तुकान्त आधुनिक  के रूप में लिखी गयी यह कविता अच्छी लगती है तो इसे पढें, अपने कमेन्ट दें और शेयर करें:



पूर्वाग्रह

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बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है-

सजाये हुये घर को यूं ना बर्बाद करो।
बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

एक महल जो दे रहा चुनौती
उंचे गगन में सिर उठाये तना है।
उसकी नीवं में पलीता लगाओ मत
कितनों की पसीने की बूंद से बना है।
उसको हवाले मत करो आग के,
जलाना आसान है, बुझाना कठिन है।

सम्बन्धों की सेज पर खुशबुओं को
सुगन्ध भरे फूलों से खूब महकाना है।
पूर्वाग्रहो के हर्फों से उकेरी गयी चादर को
सरहद के पार कहीं दूर फेंक आना है।
रिश्तों की डोर को, हवाले मत करो गांठ के
कि तोड़ना आसान है, जोड़ना कठिन है।

पेड़ की डालों को ऐसे झुकाओ मत
फलों से लदे हैं, सुस्वाद से सराबोर हैं।
लचक गयी डाल तो फल टपक जायेंगे
बांटते हैं स्नेह और ममता पोर पोर हैं।
जड़ों को सींचना कभी ना छोड़ना
सोखना आसान है, सींचना कठिन है।

वातावरण में ब्याप्त हो रहा कोलाहल है,
विष वमन हो रहा, फैल रहा हलाहल है।
क्या हो गया है, हर ओर क्यों शोर है?
कोई तो हो, जो सोचे, क्या फलाफल है?
इस यज्ञ में, दें अपनी आहुति, मिट जाएं,
अब मिटना आसान है, जीना कठिन है।

सजाये हुए घर को यूं ना बिखराओ
कि बिखेरना आसान है, समेटना कठिन है।

c@ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र
ता: 12/04/2018, बैशाख कृृष्ण एकादशी
वैशाली सेक्टर 4, दिल्ली एन सी आर।



अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld  #story #affection#GovernmentOfficer अधिकारी की आत्मीयता  ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद ...