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Sunday, August 9, 2020

तुम्हारे झूठ से हमें प्यार है (कहानी ) रोमांटिक भाग 1

 #BnmRachnaWorld 

#storyromantic 

इस कहानी के दोनों भागों को संशोधित कर एक भाग में कर दिया गया है । इसे  मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस लिंक पर मेरी आवाज में सुने:

https://youtu.be/7J3d_lg8PME



तुम्हारे झूठ से मुझे प्यार है

(यु एस ए, कैलिफोर्निआ, इरवाइन से गुजरने वाली सन डिएगो क्रीक (छोटी नदी) की पृष्ठ भूमि पर जन्म लेती प्रेम कहानी!)

वह पार्क के फेंसिंग के पार गुजरती पतली सड़क को हमेशा देखा करता है। यह सड़क इरवाइन में सन डियागो क्रीक (छोटी नदी) के इस किनारे बनी है, जिसपर पैदल टहलने वाले या साइकिल चलाने वाले ही आते जाते हैं। क्रीक के उस किनारे पाइन और ओक के घने वृक्ष हैं। उसके पार वह नहीं जानता, क्या है? कल्पना से भी जानने की कोशिश नहीं की, उसने। वह सामने की सड़क और इसपर से गुजरते वाकर्स और साइकिल चलाते लड़के – लड़कियों को देखा करता। लोग चलते हुए या साइकिल चलाते हुए रफ्तार में अच्छे लगते हैं। जिन्दगी रफ्तार का ही नाम है। रफ्तार धीमी हो सकती है। जिन्दगी का रफ्तार विहीन हो जाना, जिन्दगी के थम जाने जैसा है। यही कहा था उसने केट से।
ऐसे ही वह उस दिन सामने की पतली सड़क पर गुजरते लोगों को देख रहा था। यहाँ गर्मियों में गर्मी रहती है। लेकिन लू नहीं चलती। शाम को पेड़ों की शाखों से होकर पत्तों से सरसराती हुई हवा ठंढा सुकून देती है। इस मौसम में शाम होने के ठीक पहले  लोग घरों से बाहर निकल जाते हैं। दिन में गर्मी होती है और धूप चिलचिलाती हुई खड़े हो धूप में, तो बदन जलता है। इसलिए दिन में लोग बाहर निकलने से परहेज करते हैं। पार्क में शाम में छिड़काव-पाइपों ( स्प्रिंकलर) से पानी छोड़ दिया जाता है। गर्म वातावरण से पानी के फब्बारे मिलकर वातावरण में सोंधी खुशबू के साथ ठंढा अहसास फैलाते हैं।
उस दिन भी वह सड़क के पार देखते हुए किन्हीं खयालों में खोया था। सूर्य का गोला सड़क को रोशनी से नहला रहा था धीरे-धीरे पश्चिम की ओर उतर रहा था। उस दिन भी वह लड़की साइकिल से उसी समय गुजरी जिस समय हर रोज गुजरती थी। वह शाम को अक्सर उस लड़की को तेजी से साइकिल से गुजरते हुए देखता। उसकी पोनी टेल जैसी चोटी उसके सर पर बंधे हेल्मेट से बाहर निकलकर भी हवा में लहराती हुई दिख जाती। वह ठीक उसी समय सड़क से गुजरती जब सूर्य का गोला धीरे-धीरे पश्चिम क्षितिज में गोते लगाने को होता। ठीक उसके पहले से ही वह सड़क पर टकटकी लगा देता। उसे क्यों उसके उस तरफ से गुजरने का इंतज़ार रहता, उसे भी नहीं मालूम। पर उसे उसके गुजर जाने से पानी के पाइप से फब्बारों का छिड़काव जैसा महसूस होता।
उस दिन गर्मी अधिक थी या वह महसूस कर रहा था, उसे ही मालूम  था। वह पार्क के फेन्स के अन्तिम छोर पर पहुँच गया था। वहाँ पर एक गेट था जो सान डिएगो क्रीक के दक्षिणी किनारे के समानांतर गुजरती पतली सड़क पर खुलता था। परंतु वह गेट हमेशा बन्द रहता था। उसमें ताला लगा रहता था। वहीं पर आकर वह उस लड़की के साइकिल से गुजरने का इन्तजार करता। वह तेज हवा के झोंके सी आती, हेल्मेट के नीचे से उसकी पोनी टेल चोटी हवा में लहराती और वह तेजी से निकल जाती। वह उसकी ओर देखती भी नहीं, लेकिन वह उसे देखता, देखता रहता जबतक हवा में लहराती उसकी पोनी टेल उसकी आंखों से ओझल नहीं हो जाती। उसके रोमरहित सुपुष्ट टांगों पर वह नजरें नहीं टिकाता। लेकिन उसकी साइकिल का हवा की तरह वहाँ से गुजर जाना उसे अच्छा लगता।
उस दिन भी वह ऐसे ही सूर्य के गोले को देख रहा था। हवा हल्की-हल्की चल रही थी। स्प्रिंकलर से फौब्बारे की शक्ल में पानी का छिड़काव जारी था। सूर्य के गोले का पश्चिम क्षितिज में डुबकी लगाने वक्त हो रहा था। वह इंतज़ार कर ही रहा था कि साइकिल से वह तेजी से उधर से गुजरी। वह उसे जाते हुए देखने के लिये ढलानों की तरफ देख ही रहा था। शायद उसे दूर तक जाते हुए देखने की उसकी इच्छा रही हो। इसके बाद उसकी आंखें खुलीं तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। वह लड़की उसे व्हील चेयर सहित खींचकर सड़क पर ला रही थी। क्या हुआ था, उसे? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
उस लड़की ने कहा था, "Why are you trying to go uphill on this wheelchair?"
उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। पीछे मुड़कर जब उसने देखा, तो पार्क का गेट खुला हुआ था। वह गेट तो अक्सर बन्द रहता था। इसीलिए वह पार्क से बाहर इस सड़क पर कभी आता ही नहीं था। आज वह इस तरफ कैसे आ गया? सूर्य को पश्चिम क्षितिज में गोते लगाते हुए देखना चाहता था क्या? सड़क पूरब से पश्चिम की ओर क्रीक के बहने की दिशा में ही पसरी थी। इसलिए सूर्य को पश्चिम में डूबते हुए देखने के लिये पार्क से सड़क पर आना जरूरी होता। उसके मन में सूर्य को गोते लगाते हुए देखने की इच्छा जरूर कहीं दबी थी। लेकिन वह पार्क से बाहर कैसे आ गया? शायद पार्क का गेट आज खुला हुआ था। उसमें तो ताला लगा रहता था, आज खुला क्यों था?
"
मैं आज जल्दी ही साइकिल पर वापस लौट  रही थी। तुम इस व्हील चेयर पर जोर-जोर से अपहिल, ऊपर की ओर आ रहे थे। मैंने वापस लौटते हुए अचानक देखा कि तुम वापस लुढ़कने लगे और सड़क के किनारे, क्रीक के किनारे बने रेलिंग के तरफ जाने लगे। मैने साइकिल फेंकी और तुम्हारे सहित व्हील चेयर को पकड़ लिया। ऐसे ऐडवेंचर करते हैं, क्या?"
वह चुपचाप ही रहा। उसने अपनी हेल्मेट उतारी।
"
कहाँ रहते हो?"

"पार्क के दूसरी तरफ की सोसायटी में"

चलो मैं तुझे छोड़ देती हूँ"

वह चुप ही रहा था

उसने अपनी साइकिल वहीं सड़क पर छोड़ दी उस लड़के को व्हील चेयर पर ठीक से बैठायी उसे उसके घर की ओर लेकर चली

वह नहीं चाहता था कि कोई उसकी इस तरह मदद करे लेकिन उसके अंदर यह चाहत भी किसी कोने में अंकुरित हो रही थी कि इसी बहाने कुछ देर तो साथ रहे

"केट नाम है मेरा"

"मुझे बाला सुब्रमण्यम कहते हैं"

"तुम इंडियन हो?"   

"हाँ"

कुछ देर तक खामोशी रही

"क्या तुम रोज ही पार्क में आते हो?"

"हाँ, शाम को मैं खुद ही इस 'मूविंग आर्म चेयर' पर सवार होकर पार्क चला आता हूँ"

उसने अपने व्हील चेयर को मूविंग आर्म चेयर (चलित आराम कुर्सी) कहा था इस पर उसकी प्रतिक्रिया सुनना चाहता था

 "आर्म चेयर...!" सुनकर वह खूब हँसी थी

उसका हँसना उसे अच्छा लगा वह भी धीमे से मुस्कुराया था

"तुम पार्क में आकर क्या देखते हो?"

"मुझे सूरज के गोले का पश्चिम क्षितिज में डुबकी लगाते देखना अच्छा लगता है लेकिन देख नहीं पाता हूँ पश्चिम क्षितिज सड़क की दूसरी छोर पर जो है"

पार्क का फैलाव उत्तर-दक्षिण दिशा में थासड़क और क्रीक दोनों ही पूरब- पश्चिम में समानांतर फैले हुए थे

"...और आज तुम उसी सूरज को पश्चिम क्षितिज में गोते लगाते हुए देखने के लिए पार्क से बाहर आ गए और खुद ही क्रीक में गोते लगाने को अपनी आर्म चेयर दौड़ा दी...!"

वह खूब जोर से हँसी उसका हँसना उसे अच्छा लगा अब तक उसका घर आ चुका था

"देखो मेरा घर आ गया..." मुझे यहीं छोड़ दो

".........." उसकी चुप्पी ने उसपर क्या प्रभाव डाला?  पता नहीं

अब तक लड़की के अंदर उसे फिर देखने की इच्छा जगती हुई - सी लगी

"कल फिर पार्क में आना परन्तु सूरज को पश्चिम क्षितिज में गोते लगाते हुए देखने के लिए खुद क्रीक में गोते लगाने मत दौड़ पड़ना...!"

...और वह इस बार और भी जोर से हँसीउसका हँसना उसे इस बार और भी अच्छा लगा

"ओके, बाए..." कहकर वह मुड़ी और वापस चली गयी


Wednesday, August 5, 2020

मन मंदिर में बस गए राम (कविता) #shriram

#BnmRachnaWorld 
#srirampoem#श्रीरामपरकविता



मन मंदिर में बस गए राम

अयोध्या में आयी पुण्य बेला,
साकार हुई जो बसी छवि।
दिशाएं सुरभित, देव मगन,
विस्मित, हर्षित है आज रवि।

भक्तों के सपने आकार ले रहे,
पीयूषवन्त छवि नयनाभिराम।
मन मंदिर में बस गए राम।

लंबे संघर्ष का विकट काल,
भूला नहीं रक्तिम इतिहास।
प्राणों की आहुतियाँ पड़ी यहाँ,
तब फलित हुआ यह दृढ़ प्रयास।

हे राम भक्त बजरंग बली,
पूरा करना यह पुण्य काम।
मन मंदिर में बस गए राम।

इस मंदिर के संघर्ष काल के
वर्षों को पल भर जीना।
राम भक्त की जली बोटियाँ,
गोलियों से छलनी हुआ सीना।

पग वही, जो रामपथ पर
बढ़े निरंतर, पाए विश्राम।
मन मंदिर में बस गए राम।

भव्य मंदिर, राम का होगा
भारत - संस्कृति का विस्तार।
विश्व में परस्पर विश्वास बढ़ेगा,
मानव मूल्य होंगे साकार।

रामराज्य की हो थापना,
जननायक, अभिराम राम।
मन मंदिर में बस गए राम।
©ब्रजेन्द्रनाथ

कविता मेरी आवाज में मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के इस लिंक पर सुनें। चैनल को सब्सक्राइब करें, यह बिल्कुल फ्री है:
यूट्यूब लिंक: 

https://youtu.be/SGKNaYPHZaA










Sunday, August 2, 2020

मेरी और कलम की दोस्ती (लेख) #reminiscences

#BnmRachnaWorld
#reminiscences#आत्मसंस्मरण
























मेरी और कलम की दोस्ती: सृजन यात्रा
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आज मन की बात में मैं अपनी कलम के साथ तय की गयी हमारी सृजन यात्रा के बारे में बात करूंगा। हमारा साथ विद्यालय के दिनों से ही हो गया था। मेरे बड़े भाई विद्यालय के प्रधानाध्यापक थे और वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों में एम ए थे, इसलिए साहित्यिक वातावरण घर में था। मैं विद्यालय में वर्तमान हिंदी की सारी पुस्तकें पढ़ गया था। विद्यालय में वाद विवाद और निबंध लेखन प्रतियोगिताओं में प्रथम होने के साथ-साथ प्रखंड स्तर पर निबंध लेखन में प्रथम हुआ था जब मैं नौवीं कक्षा में गया ही था। मुझे विज्ञान लेकर पढ़ना पड़ा, शायद उस समय की मांग थी। कॉलेज में भी मेरा लेखन कार्य जारी था। मेरी कविता कॉलेज की पत्रिका में छपती रही। मैं कविताएँ लिखकर दूसरे दोस्तों को भी देता था, ताकि उनका नाम भी कविता के साथ कॉलेज की पत्रिका में छप जाय।
कॉलेज के बाद विश्वविद्यालय में गया तो उसी समय जे पी आंदोलन शुरू हो गया। आंदोलन के समय वाराणसी से प्रकाशित आंदोलन की पत्रिका "तरुण मन" में भी लिखता रहा। उसके बाद टाटा स्टील में नौकरी के दरम्यान लेखन कार्य की निरंतरता बाधित हुई।
2014 में सेवा निवृत्ति के बाद पुनः साहित्य लेखन में सक्रियता बढ़ी। लिखना तो आरंभ हुआ पर छपना मुश्किल था। मैं स्थापित लेखक था नहीं कि बड़े - बड़े प्रकाशन संस्थान उसको छाप देते। ब्लॉग लेखन शुरू किया। भोपाल से युवा लोगों के लिए अंकिता जैन द्वारा प्रकाशित पत्रिका "रूबरू दुनिया " में मेरा लेख छपा। आत्मविश्वास बढ़ा। इसके उपरांत मैने एक नौजवान इंजीनियर शैलेश भारतवासी द्वारा संचालित प्रकाशन संस्थान "हिन्द युग्म प्रकाशन, दिल्ली" से संपर्क किया। 2015 के फरवरी में दी गई मेरी पांडुलिपि को अक्टूबर में उन्होंने स्वीकृत किया। नवंबर में मेरा पहला कहानी संग्रह हिन्द युग्म प्रकाशन, दिल्ली से "छाँव का सुख" प्रकाशित हुआ। पहली पुस्तक के पन्नों को छूना अपने नवजात शिशु के कोमल हाथों के स्पर्श जैसा लगता है, इसे मैने पहली बार जाना। इसके बाद मेरी सृजन यात्रा निरंतर जारी है। मेरी दूसरी पुस्तक "डिवाइडर पर कॉलेज जंक्शन" (उपन्यास) 2018 जनवरी में दिल्ली के पुस्तक मेले में प्रकाशित हुई। उसके बाद कविता संग्रह "कौंध", लघु उपन्यास "आई लव योर लाइज" और वृहत उपन्यास "छूटता छोर अंतिम मोड़" अमेज़ॉन किंडल पर ई बुक के रूप में प्रकाशित हुए है। आगे एक यात्रा संस्मरण और बच्चों के लिए साहित्य लेखन की योजना है। मेरी तिब्बत और वुहान शहर (चीन) पर आधारित धारावाहिक कहानी "कोरोना कनेक्शन" और वेब सीरीज के लिए लिखी कहानी " तीखा मोड़" प्रतिलिपि हिंदी पर प्रकशित हुयी है।
कलम का साथ है और शब्दों के मेघ कल्पना के बादल बनकर छाते रहे हैं। मेघों के वर्षण से सृजन की धारा सरिता के रूप में निरंतर प्रवाहित हो रही है। उम्मीद है यह प्रवाह निरंतर जारी रहेगा।
©ब्रजेंद्रनाथ
पुस्तकों के लिंक:



Thursday, July 30, 2020

बसाउंगी हिय के मधुवन में (कविता) #romantic

#BnmRachnaWorld
#romantic poem




















बसाउंगी हिय के मधुवन में
शृंगार के गीत (कविता)

अलसाया तन, बौराया मन,
कल्पना का नहीं ओर छोर है।
कोयल गा रही मीठी - सी धुन,
बाग में आया, अमवां का बौर है।

वासंती रंग फ़ैल गया यहां - वहाँ,
लहक गया, दहक गया पलाश वन।
आँखें निहारती चौखट पर क्षण - क्षण
आएंगे साजन और होगा मिलन।

फाग का राग बन आ गई होली भी,
अब तो घर आ जा मेरे सजन।
बयार भी चुभ रही काँटा बन,
मन हुआ बावरा, बिसर गया तन।

आँखे थी टकटकी लगाए हुए,
पड़ती रही ढोलक पर थाप पर थाप।
चुनरी भींगो गयी कोई सहेली मेरी,
पर न मिट पाया मन का संताप।

सावन भी आ गया बैरन बन,
बादल घिर आये नीले गगन में,
आयी नहीं नेह की एक पाती,
जल रिशते रहे कोरे नैनन में।

चैन आएगा होगी दस्तक जब,
आने की, सूने इस आंगन में।
सुध बुध खोकर खूब सताऊंगी
फिर बसाऊंगी हिय के मधुवन में।

@ब्रजेंद्रनाथ

Monday, July 27, 2020

आपातकाल (इमरजेंसी) 1974 का एक संस्मरण(लेख)

#BnmRachnaWorld
#myreminiscence#emergenyin1975











आपातकाल का मेरा संस्मरण:
(मार्च - अप्रील 1974)
उन दिनों मैं एम एस सी में मगध विश्वविद्यलय बोधगया में पढ़ाई कर रहा था। जी पी (जय प्रकाश नारायण) के आह्वान पर विद्यार्थी सड़क पर आ गए थे। मैं जे पी के तरुण शांति सेना में शामिल हो गया था। 18 मार्च 1974 को पटना में हुए गोलीकांड के विरोध में 8 अप्रील को जे पी ने फणीश्वर नाथ रेणु, सर्वोदय के सदस्यों और पटना के विद्यार्थियों के साथ मिलकर मुँह पर पट्टी बांधकर पटना में जो मार्च निकाला था, उसमें तरुण शांति सेना के स्वयंसेवक के रुप में मैंने भाग लिया था। इसी के बाद आंदोलन देश के अन्य शहरों और गांवों में तेजी से फैला था।विहार के पूर्व मुख्य मंत्री महामाया प्रसाद जी को हमलोगों ने वजीरगंज बुलाया था। वहाँ एक बड़ी सभा को उन्होंने संबोधित किया था। उससमय उन सभाओं की अध्यक्षता विद्यार्थी ही किया करते थे। उस दिन संयोगवश मुझे ही अध्यक्षता के लिए मौका मिला था।
उसके बाद 12 अप्रील को मखदुमपुर (गया-पटना रेल खण्ड में एक स्टेशन) में पटना से आ रहे विद्यार्थियों के साथ मुँह पर पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम था। उसी दिन सुबह से विद्यार्थी परिषद और अन्य संगठनों के साथ गया पोस्ट आफिस में रामधुन और धरना का कार्यक्रम था। मैंने सुबह में उसमें भाग लिया और उसके बाद ट्रेन पकड़कर मखदुमपुर चला गया। वहां हमलोग पंक्तिबद्ध होकर जुलूस में घूम ही रहे थे कि खबर आई कि गया में पोस्ट ऑफिस के पास प्रशासन के द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकरियों पर गोली चली है। कई विद्यार्थी और सामान्य लोग मारे गए हैं। कर्फ्यू लगा दिया गया है। रात में पटना से गया की ओर कोई ट्रेन नही आई। मेरे साथ उन दिनों मेरी माँ रहती थी। मैंने माँ से भी नहीं कहा था। रात में नहीं आने से यह आशंका विश्वास में बदल गयी कि मैं गोलीचालन में मारा गया। माँ का रो - रो के बुरा हाल था। मेरे एक ममेरे भाई पास में ही रहते थे। किसी ने कहा कि कुछ लाशें सिविल अस्पताल में आयीं है। अस्पताल ज्यादा दूर नहीं था।
गया कैंटोनमेंट से सेना बुलाकर पूरा शहर उसी को सौंप दिया गया था। देखते ही गोली मारने का आदेश जारी था। लोग कह रहे थे कि ऐसा हाल तो 1947 के दंगों के समय भी नहीं था। मेरे ममेरे भाई गली - गली से होकर सिविल अस्पताल पहुंच गए। वहाँ उन्होंने लाशों के चेहरे पर से चादर हटाकर मेरी पहचान करनी चाही। मैं उनमें नहीं था। इसका मायने मेरी लाश उनमें थी, जिसे कहीं फेंक दिया गया हो।
रात किसी तरह बीती। सुबह की ट्रेन से मैं गया स्टेशन पहुंचा था। बाहर कर्फ्यू होने से सारे लोग स्टेशन में ही जमे हुए थे। बहुत भारी भीड़ थी। मैं रेलवे लाइन के किनारे - किनारे होते हुए अपने डेरा पहुँचा। तब माँ की जान - में -जान आयी। इसी गोलीकांड के बाद जे पी ने बिहार विधान सभा के भंग किये जाने की मांग भी आंदोलन के मुद्दों में जोड़ दिया था।
©ब्रजेन्द्रनाथ

Sunday, July 26, 2020

दिलों में बसा लें (कविता) #kargilwar

#BnmRachnaWorld
#kargilwarpoem






















1999 में कारगिल में जीत को  "विजय दिवस" के रूप में मनाए जाने के उपलक्ष्य पर:

बसा ले दिलों में

जो बर्फ की चोटियों पर चढ़ गए,
जो अस्त्र शस्त्र लेकर भिड़ गए।

अरि जो बैठा था टाइगर हिल ऊपर
शस्त्र मशीन गन, छुपा बनाये बंकर।

यह युद्ध था मौसम के उठते तूफान से
यह युद्ध था, विकट तोपो की दहान से।

शत्रु अस्त्र सजाए था बैठा ऊंचाई पर,
सैनिकों पर बरस रहे गोले जब थे वे चढ़ाई पर।

यह युद्ध था लंबा खिंचता जा रहा,
सैनिकों का धैर्य सिमटता जा रहा।

वायु सेना ने बरसाए गोले ठिकानों पर,
दुश्मनों की व्यूह रचना आ गयी निशानों पर।

घेर कर, चढ़कर जीत ली सारी चोटियाँ,
दुश्मन की बिखर गई एक एक बोटियाँ।

पत्थरों पर बिछ गयीं, 
दुश्मन के लाशों की बोरियाँ,
सो गए कुछ वीर, देकर 
अपने प्राणों की आहुतियों।

उनकी शहादत का जश्न मना ले,
आग को सुलगाये रखने के लिये।
आओ उन्हें बसा ले दिलों में, 
देशप्रेम जगायें रखने के लिए।
©ब्रजेंद्रनाथ
इस कविता को मेरी आवाज में मेरे यूट्यूब
चैनल marmagya net के इस लिंक पर सुनें, चैनल को सब्सक्राइब करें, यह बिल्कुल फ्री है: 
https://youtu.be/1nt6MZpsOzg


Thursday, July 23, 2020

तू है मेरा दिलवर (कविता) #romantic#sawan

#BnmRachnaWorld
#sawanromantic
#romanric
























तू है मेरा दिलवर

आनन छुपा करों से,
चौकती हूँ क्षण - क्षण।
आहट पे तेरे पग की
चंचल हुआ है चितवन।

हाथों में सजाए मेंहदी,
प्रतीक्षा करूँ मैं साजन।
आ जाओ सजी धजी हूँ,
सींचित करो ये तन मन।

मेहंदी लगे हाथों को
तेरे हाथों में सौंपती हूँ।
जीवन मेरा है तेरा,
समर्पण मैं करती हूँ।

मेरी सांसों में तेरी ही
अब यादें बसा करेंगीं।
तू ही है मेरा रहबर 
तेरे संग चला करूंगी।

जीवन में आएंगे, कभी 
पतझड़ कभी बसंत।
मुझे उसकी नही परवाह
अब तू है मेरा कंत।

अगर कभी भी कुछ भी
गलती हो जाएगी।
इशारों में बता तू देना,
मैं खुद संभल जाऊंगी।

मन उचाट हो जाये,
कभी मैं रूठ जाऊँ।
मुझको मना लेना तू,
तेरे पास आ मैं जाऊँ।

मन में बसा लिया है,
दिल में समा लिया है।
अपने नाव की पतवार
तेरे हाथों में दे दिया है।

तुझपे है भरोसा
भगवान से भी ज्यादा।
अंतर में उतर गया तू
भगवान से भी ज्यादा।

मुझे साथ लेके चलना
मेरे प्यार मेरे दिलवर।
हम आगे बढ़ चलेंगें
जब तू है मेरा रहबर।

©ब्रजेंद्रनाथ














Saturday, July 18, 2020

शिव जी पर पांच दोहे (कविता) #shiva

#BnmRachaWorld
#shivapoem#lordshivadoha



















शिव जी पर पांच दोहे

शशि सुशोभित सिर पर है, आशुतोष भगवान।
माथे से गंगा बहे, मुनि जन करते ध्यान।। (1)

अरि का करते नाश हैं, ले कर हाथ त्रिशूल।
शिव करते उद्धार हैं, मिटता विघ्न समूल।। (2)

जाप करें कैलाश पर, ले कर प्रभु का नाम।
ओम-ओम होता रहे, गूँजे आठों याम।। (3)

शंकर भोलेनाथ हैं, जग के पालनहार।
अपने भक्तों का सदा, करते हैं उद्धार।। (4)

शिव का नाम जपे चलो, पास न आये काल।
करेंगें सुरक्षा सबकी, गणदेव महाकाल।। (5)

©ब्रजेन्द्रनाथ



Saturday, July 11, 2020

सावन में सहलाती झड़ी है (कविता) #nature

#BnmRachnaWorld
#poemnarure




















सावन की सहलाती झड़ी

सावन की सहलाती झड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।

मेघों का शामियाना तान,
सजने लगा है आसमान।
सूरज  छुपा ओट में कहीं,
इंद्रधनुष का फैला वितान।

धुल गए जड़ - चेतन, पुष्प,
सद्यःस्नाता लताएं खड़ी हैं।
सावन की सहलाती झड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।

धुल गई धूल -भरी पगडंडी,
चट्टानों पर बूंदें बिखर रहीं।
गूंज उठे कजरी के गीत,
पर्दे के पीछे गोरी संवर रही।

झूले पड़े, अमवाँ की डालों पर
पिक की कूक हूक सी जड़ी है।
सावन की सहलाती झड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।

यक्ष दूर पर्वत पर अभिशप्त
खोज रहा बादल का टुकड़ा।
भेजूं संदेश कैसे प्रिया को?
प्रतीक्षा-रत, म्लान है मुखड़ा।

कंपित है गात, तृषित है मन
आंगन के कोने में बेसुध पड़ी है।
सावन की सहलाती झड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।

मोर के शोर से गूंजित उपवन,
उमंगों का नहीं ओर छोर है।
कृषक चला खेतों की ओर,
बंध चली आशा की डोर है।

आनंद का मेला लगा है,
गाँव की ओर उम्मीदें मुड़ी है।
सावन की सहलाती झड़ी है।
बूंदों की लहराती लड़ी है।

--ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Friday, July 10, 2020

मास्क की हिंदी परिभाषा (कविता) हास्य व्यंग्य

#BnmRachnaWorld
#मास्क की हिंदी#hindiofmask
#कीटाणुबाधक#विषाणुरोधक#वस्त्रडोरियुक्त#मुखपट्टिका






















मास्क की हिंदी परिभाषा

मै मास्क लगाए,
मुँह छुपाए,
सोच रहा था,
क्या हो सकता है,
इसका हिंदी में अर्थ?
शब्दों से व्याकरण तक,
छन्दों से अलंकरण तक।
नहीं हो रहे समर्थ।

किसी ने मुँह खोला,
मास्क के अंदर ही अंदर,
शब्दों को तोला।
उसमें झंकार लगाया,
अलंकार का चमत्कार लगाया।
शब्दों को पान जैसा चबाकर,
ज्ञान की गगरी से,
बुद्धि की बूंदों को छलकाकर,
उन्हें संयोजित किया,
संदर्भानुसार समायोजित किया,
जुबान की जुम्बिश से,
शब्दों के दीपक में
जलाई बातों की वर्तिका,
बोला "मुख पट्टिका'।

मैंने पूछा
इसमें वस्त्र के साथ
एक और वस्तु लगी है
डोरी भी बंधी है।
यह परिभाषा ठीक नहीं बैठती
संपूर्णता का चित्र नहीं गढ़ती।
मस्तिष्क पर जोर और दें,
शोध को एक नई ठौर दें।

तब उन्होंने जो बताया
उससे नया कुछ निकलकर आया।
कीटाणुबाधक,
विषाणुरोधक,
वस्त्रडोरीयुक्त मुखपट्टिका।
मास्क का यह अनुवाद,
सबों को भाया।

अब साड़ी, या सलवार से मैच करती,
पेंट या शर्ट से कंट्रास्ट रखती।
शोभित हो रही साधिका,
कोरोना युग की आराधिका।
क्षण क्षण सजती है मल्लिका।
पल पल सँवरती है अम्बिका,
शर्मीली, छबीली अम्बालिका।
मुख पर सजाती, खुद को सँवारती,
कीटाणुबाधक, विषाणुरोधक,
वस्त्रडोरियुक्त मुखपट्टिका!
वस्त्रडोरियुक्त मुखपट्टिका।

©ब्रजेन्द्रनाथ




Wednesday, July 8, 2020

करते हैं शिव आराधना (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonLordShiva


















करते हैं शिव -आराधना

आशुतोष को अर्घ्य चढ़ाएं,
गंगाजल भर कांवर लाएं।
शिव सुनेंगे हमारी प्रार्थना।
करते है शिव -आराधना।

शिव जी, भोले नाथ हमारे,
चन्द्रमौलि भक्तों के प्यारे।
अर्पण चरणों में अर्चना।
करते हैं शिव - आराधना।

भक्तों की है भीड़ लगी,
नीलकंठ में लगन जगी।
पूर्ण हो हमारी साधना।
करते है शिव - आराधना।

सेनानी तुझमें दृढ़ता हो,
शस्त्रों में मारक - क्षमता हो।
तोपों से करें सिंह-गर्जना।
करते हैं शिव - आराधना।

महेश सुनो विनती मोरी,
इच्छा मेरी कर दो पूरी।
समूल नष्ट हो कोरोना।
करते हैं शिव - आराधना।
©ब्रजेन्द्रनाथ 

Friday, July 3, 2020

बच्चों में खुशहाली (कविता)

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#childrenpoem

















बच्चों में खुशहाली

लड़का लटका डाल से
मचता रहा धमाल।
बाकी दोस्त ताकते
उसका देख कमाल।।

बच्चे करते तड़ाग में
जमकर जल विहार।
गरमी के इस जलन से
राहत मिलता यार।।

सूरज ऊपर तप रहा,
सोखे ताल तलैया ।
पानी की बूंदे दे दो,
फुदक रही गोरैया ।।

गर्म हवाओं से जल रहे
धरती और गगन।
बाहर निकलने के पहले
ढंके सिर और बदन।।

छाछ पियें, आमरस पीएं,
और पियें जल जीरा।
मस्त मेलन, तरबूज औ'
खाएँ ककड़ी खीरा।

सूखने दो समंदर को,
और बनने दो बादल।
दौड़ लगाएंगे पावस में,
बरसे बूंदे छल छल।।

पेड़ लगाओ धरा में
छा जाए हरियाली।
पर्यावरण निर्मल हो,
बच्चों में खुशहाली ।।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

शृंगार के छः छंद (कविता)

#BnmRachnaWorld
#romanticpoem

















श्रृंगार के छः छंद

डूबती, उतराती है देह नाव पर,
मदमाती, बलखाती जाती उस पार है।
श्रृंगार सभी मौन, आवरण हुए गौण,
यौवन भार अपार, बंध - मुक्त संसार है।

उठती गिरती साँसों से एक छन्द लिखें।
ओठों के मधु - रस से कोई बंद लिखें।
तेरी पलकों के नींदों से, उनींदे पलों को,
नेह निमंत्रण देकर, एक निबंध लिखें।

तू उद्दीप्त यौवन का वेगवान प्रवाह!
ले चलूँ , तटिनी की धारा बन जाऊं।
उज्जवल, धवल सी  फेनिल बूँदें बन,
लिपटूँ बाहों में, किनारा बन जाऊं।

नदी ज्यों उफन रही,  किनारों को तोड़ती,
काष्ठ - पिंड - सा बहा, धारा के बहाव में।
आवरण हुए गौण,  सांसें हो गयी मौन?
उन्मत्त आचरण ज्यों मदिरा के प्रभाव में।

छा जा मुझपर, ज्यों बादल पर्वत पर,
मैं हूँ तुम्हारा वेग, तू वेगवती धारा।
तोड़कर बांधों को तभी तो बहेंगे हम,
प्लावित कर लेंगें, जीवन अपना सारा।

देह तेरी उल्लसित, उत्कंठित, आलोड़ित,
कम्पित -गात, औ' मुदित हास आनन पर।
यामिनी है जाग रही, सो गए विहग सारे।
आँखों में नींद नहीं, ओठों के कम्पन पर,

ओठों को रखने दो, घोलने दो अमृत - रस।
मन की पाखी उड़ी, थोड़ा तो बहकने दो।
बाहों  में समेटने दो, खोल दो बाहों को,
रात की रानी को रात भर महकने दो। 

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

आत्मनिर्भर (हास्य व्यंग्य)

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#BnmSatire

















आत्मनिर्भर 
(हास्य - व्यंग्य)
मैं समझता हूँ, कि आप दो समयों पर जितना आत्म निर्भर होते है, उतना कभी नहीं होने का मौका मिलता है - एक स्नानालय में और दूसरा सो(शौ) चालय में। इसलिए वहाँ अच्छे विचार आते है। कहा जाता है कि दुनिया के कई महानतम अविष्कारों और साहित्य सृजन का विचार कजरारे बादलों से घिरे घनमण्डल में बिजली की कौंध की तरह वहीं चमका था। अच्छा हुआ आर्कमिडीज को अपना समाधान जलाशय में मिला था और वहीं से वह बस्त्रविहीन दौड़ पड़ा था। अगर सोचालय में समाधान मिलता, तो पता नहीं क्या होता?
यह सब देखकर और समझकर इस कोरोना काल में कई लोग वहाँ ज्यादा समय बिताने लग गए। शायद कोई विचार सूत्र मिल जाय, जिससे कोरोना पर विजय प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ा जाय।
साथ ही दीपक जी जैसे हास्य - व्यंग्य के हस्ताक्षरों ने स्वयं को गृह कार्य में भी व्यस्त रहने की चर्चा इतनी व्यापकता और रचनात्मकता के साथ अपनी रचनाओं में किया, कि हमलोग जैसे सेवा निवृत्त कलमकारों को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए लोग पीछे ही पड़ गए। मेरे पड़ोस वाले सत्तर वर्षीय चचा तो एक दिन झाड़ू लगाने को झाड़ू लिए झुके ही थे कि झुके ही रह गए। अब कोरोना काल के बाद ही लगता है सीधे होंगें।
हमलोग आजादी के बाद सत्तर से अधिक वर्षों से परनिर्भरता के ही प्रावधानों पर चलते रहे। पहले पी एल 480 के तहत यहाँ गेहूं आता था। उससे मुक्ति का प्रयास हरित क्रांति द्वारा हुआ। इसके बाद हमने वर्ल्ड बैंक आदि से ऋण लेकर बड़े-बड़े कल कारखाने खड़े किए। ऋण लेकर घी पीने की आदत पड़ गयी। अपनी पूंजी जो भी इकठ्ठी हुई उसे ऋण की अदायगी ही होती रही। जब एकाएक मार्केट इकॉनोमी से जुड़े तब अपनी औकात का पता चल गया। अर्थ तंत्र को पटरी से गिराने में घोटालों ने अपना योगदान दिया।
अब थोड़ा संभल ही पाए थे कि कोरोना ने विश्व स्तर पर आक्रमण कर दिया है। प्रधानमंत्री ने इसे आत्मनिर्भर बनने के लिए एक मौके में बदलने का आह्वान किया है। हमलोग बदलेंगें कैसे? हमलोग तो अबतक सस्ते खरीदने के इतने आदि हो चुके हैं कि यह भी नहीं देखते कि समान हमारा बनाया हुआ है या दुश्मन के द्वारा। हमलोग दूसरों के लिए हाई टेक क्लर्की करते - करते व्हाट्सअप्पीये, फेसबुकिये, गूगलिये, विकिपीडिये, इंस्टाग्रामीये बन चुके हैं कि न अपना कोई अप्प बना सके और न अपना कोई प्रोडक्ट।
यहाँ से आत्मनिर्भरता की यात्रा है तो अगम पर पूरी करनी भी है अहम।
चलते हैं चुनौतियों को हथियार बनाते हैं,
आत्मनिर्भता का संस्कार जगाते हैं।

© ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Friday, June 26, 2020

छोड़ महल चले वीराने को (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonramvanvaas
#रामवनगमन #ramvangaman

परम स्नेही मित्रों, 
पिच्छले २९ सितम्बर को डॉ राधानंदन सिंह जी के आमंत्रण पर मैं मारुती सत्संग मंडल पुणे के वेबिनार से जुड़ा।  डॉ राधा बाबू के कर्मफल सिद्धांत पर दिए गए प्रेरक वक्तव्य के बाद मैंने अपनी दो भक्तिपूर्ण रचनाएँ प्रस्तुत की।  एक योगेश्वर श्री कृष्ण पर और दूसरी भगवान राम के वन गमन पर। इसी का यूट्यूब वीडियो  लिंक मैं दे रहा हूँ। आपके बहुमूल्य विचारों का स्वागत है। सादर:
--ब्रजेंद्र नाथ
यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/fJES-jIN7cw























छोड़ महल चले वीराने को

पिता का वचन निभाने को
रघुकुल का मान बचाने को।
राम, लखन सीता समेत
छोड़ महल, चले वीराने को।

पुष्प सभी थे विस्मित
रोये अश्व, रोयी मैना।
चेतन की कौन कहे वहाँ
बहे नीर जड़ के नैना।

चेतना शून्य, दौड़ी जनता,
रोती रह गयी माँ की ममता।
करुणा का बादल बरस पड़ा,
यह हाहाकार नहीं थमता।

हमें छोड़, मुंह को न मोड़,
हे प्रभु राम, अयोध्यानाथ।
हमने किया कोई अपराध ?
तो क्यों कर रहे हमें अनाथ?

गर है अपराध नहीं मेरा
क्यों दंडित किये जाते हो?
नैनों के अमृत वर्षण से,
क्यों वंचित किये जाते हो?

क्या परिवार के वचनों का है
अधिक महत्व, पूछे जनता?
क्या जनता के लिए कर्तव्यों
का कोई महत्व नहीं होता?

हे राम, अवध की प्रजा से
बड़ा नहीं कोई भी वचन।
जनता के लिए रुकना होगा,
तोड़ तुम्हें सारे बंधन।

प्रजा का मत सबसे ऊपर
हम साथ चलेंगे जग होगा।
जहां चलेंगें अवधनाथ
जनता का वहीं अवध होगा।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Thursday, June 25, 2020

इरादों को जगाता हूँ (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonlife'sphilosophy
















इरादों को जगाता हूँ

जिंदगी की पलकों पर सपने सजाता हूँ।
यादों को सुलाकर, इरादों को जगाता हूँ।

उन सायों के पीछे, छोड़ आया था जिन्हें,
उनके हाथों की छुवन, हंसकर मिटाता हूँ|

वक्त तो अनसुलझी रेशों का घेरा है यहाँ,
उन्हीं रेशों से जिंदगी की राहें सजाता हूँ |

एक पेड़ जिसपर पखेरू सो रहे थे रात भर,
उस छाँव में हर दोपहर मैं भी सो आता हूँ।

सीधे सच कहने से मैंने किनारा कर लिया,
अब झूठ से संवादों का सिलसिला चलाता हूँ|

शाहंशाह का है महल दरिया के किनारे पर,
वहाँ गुम झोपड़ियों की फरियादे सुनाता हूँ। 

एक नदी जो बहती जा रही छल - छल कर,
उसे समन्दर तक पहुँचने की कहानी बताता हूँ।

---ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Tuesday, June 23, 2020

ममता की गोद (कविता) #vatsalya

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#poemonmother'slove
#vatsalya

















ममता की गोद

बालक का तन,
माता का लगा मन,
आँचल है नम
ममता पोर पोर है।
आनन पर स्वेद कण,
काम में उलझा तन,
बोझ नहीं होता कम,
स्नेह सराबोर है।

ठुमक-ठुमक चलता,
उंगली पकड़ लेता,
मन की भाषा ,
खोजती परिभाषा है।
आँखे हैं चंचल,
चित्त है चपल
माँ की बंधी आशा,
जगाती अभिलाषा है।

स्थिर हुआ मन
खुलता वातायन
हवाओं में सुधियाँ
आयीं संग संग है।
तन है थकित, पर
हृदय पुलकित,
उमंगों की तटिनी में
उठती तरंग है।

आजा मेरे कान्हा,
माँ को न तू सता,
ममता की गोद सूनी
मेरी सौगंध है।
मैया सौगंध ना दे
वापस इसे ले ले
तेरी गोद से ही मेरा
जीवन-संबंध है।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Sunday, June 21, 2020

राही तू चलता जा (कविता) #motivational

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#motivationalpoem




















राही तू  चलता जा


राही तू  चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

राहों पर कंकड़ - पत्थर,
टूट - टूटकर धूल बन गए।
वे सहलाती राही के
पैरों के नीचे फूल बन गए।

नहीं रहेगी थकन,
छाँव के नीचे बना है रास्ता।
राही  तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

चिलचिलाती  धूप खिली हो,
सर पर आग है बरस रहा।
तू रुकना मत, तू थकना मत,
तेरी आहट को कोई तरस रहा।

बाधाओं, अवरोधों से तुम,
जोड़ चलो एक रिश्ता।
राही  तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

आंधी में, तूफानों में,
नीरव वन में, सिंह - गर्जन हो।
साथी रुकना नहीं तुम्हें,
भले तड़ित-वाण वर्षण हो।

यादें अपने परिजनों की,
लाद चलो ना जैसा बस्ता।
राही तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

सत्य शपथ  ले, चले चलो तुम,
विजयपथ पर बढे चलो तुम।
अशुभ संकेतों से निडर हो,
रश्मिरथ पर चढ़े चलो तुम।

तन बज्र -सा, मन संकल्पित,
झंझावातों में समरसता।
राही तू चलता जा
चलने से तेरा वास्ता।


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
   जमशेदपुर, तिथि : मई, 2016.


इस कविता को मेरी आवाज में मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के इस लिंक पर सुनें। कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य लिखें। आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं।

Link: https://youtu.be/zxdTXPQfEQM




Wednesday, June 17, 2020

गलवान घाटी (लद्दाख) में गतिरोध पर (कविता) #galwanvalley#indochinesestandoff

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#indochinesestandoff#laddakhstandoff











चीन के साथ गलवान में गतिरोध 

बर्फीली घाटी को तुमने स्याह किया
बहती शांत नदी को तुमने दाह दिया।
मेरे अंदर जगा दिया भीषण तूफानों को,
बदला लूंगा जितना तुमने आह दिया।

लद्दाख सीमा पर दुस्साहस दिखलाया
निशा-प्रहर में घुसने का साहस दिखलाया।
चौकस था मैं, भाँप रहा तेरी चालों को,
सिंह - गुफा में जाकर अनायास जगाया।

अब तू देखेगा हिंदी तोप - दहानों को,
तू देखेगा पवि से घहराते उड़ानों को।
बीस सैनिकों को तुमने है शहीद किया,
अब मारूंगा तेरे अगनित जवानों को।

युद्ध के बादल घन मंडल में मंडरायेंगे,
नक्षत्र, गगन भी लाल, दिशाएं टूटेंगी।
भीषण आयुध का होगा वर्षण तुम पर,
तेरी हठधर्मी से तकदीर धरा की फूटेगी।

चोटी का सूरज दिखेगा लाल वहां
नीले अम्बर में टूटेंगे तारे अनगिन।
तब महाविनाश का नाचेगा काल वहां,
तू बैठ बिताएगा रण में लाशें गिन गिन।

मैं अपनी कलम से श्रृंगार नहीं लिखूँगा,
मैं अपनी कलम का आचार बदल दूँगा।
आज से प्रेम का व्यापार नहीं लिखूंगा,
मैं अपनी कलम का व्यवहार बदल दूँगा।

रचनाओं में कलम को अंगार बनाऊंगा।
सेनानी के लिये इसे हथियार बनाऊंगा।
बून्द लहू की गिरी वहां जिस चोटी पर
गाड़ तिरंगा जीत का त्यौहार मनाऊंगा।

शोणित की स्याही में चलकर
सृजन का आकाश बदलता है।
जब आग कलम को लगती है,
तब ही इतिहास बदलता है।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र
पवि-वज्र, thunder bolt 

मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस लिंक पर जाकर पूरी कविता मेरी आवाज में सुनें। चैनल को सब्सक्राइब करें, यह निःशुल्क है। कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य दें, आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं। सादर!
Link: https://youtu.be/L8l0nCNcqNg

Saturday, June 13, 2020

शृंगार के छः छंद हाइकू के (कविता)

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#hikuchhand













शृंगार के छः छन्द: हाइकु

हाइकु सृजन:

भींगा बदन
सुलगाये अगन
तपता मन ।

छनती धूप
खिला इंद्रधनुष
जैसा आनन ।

कर शृंगार
निहारती दर्पण
चंचल मन ।

लतिका गात
अरुणिम प्रभात
भटका मन ।

नवीन पल
उड़ रहा आँचल
बहका मन ।

तेज रफ्तार
घड़ी की टिक टिक
छोटा मिलन ।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र
(तस्वीर गूगल से साभार)


Thursday, June 11, 2020

युद्ध बड़ा भीषण होगा (कविता) #mahabharat

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#mahabharatkekrishn













युद्ध बड़ा भीषण होगा

(अद्भुत रस)

कृष्ण सभा में खड़े हुए,
कौरव सभी थे अड़े हुए।
कृष्ण ने एक सलाह बतायी,
रण रोकने की राह दिखायी।

दे दो पांडवों को गाँव पांच,
तेरे राज्य पर आए न आंच।
दुर्योधन था मद में चूर,
कृष्ण को देख रहा घूर।

प्रस्ताव नहीं उसको भाया,
दुर्योधन अपने पर आया।
पकड़ो भागे नहीं ग्वाल,
चल ना दे ये कोई चाल।

बांध इसे कारा में डालो,
इसकी सारी युक्ति निकालो।
जानता है यह इंद्रजाल,
कर दो इसका बुरा हाल।

कृष्ण का क्रोधानल दीप्त हुआ,
उठी भुजाएं मुख प्रदीप्त हुआ।
उनका प्रकट हुआ विराट रूप,
सभा तपने लगी ज्यों तेज धूप।

सारे सभासद हुए अचम्भित,
भीष्म, द्रोण, भी थे विस्मित।
भुजा उठा, किया उदबोधन,
आ मुझे बांध, तू दुर्योधन।

मैं दिखलाता हूँ परिणाम,
जब युद्ध चलेगा अविराम।
जब लाशें बिछी होंगी सर्वत्र,
ढूढेंगे अपनों को यत्र तत्र।

तुम कहाँ गिरे हो पहचानो
तुम कहाँ पड़े हो अब जानो।
मैं उद्घोष किये जाता हूँ,
गति काल की बतलाता हूँ।

महाविनाश जब छायेगा,
तब तू कैसे बच पायेगा?
रणचंडी थाल सजायेगी,
आहुति तेरी पड़ जाएगी। 


कौरवों में कोई नहीं होगा,
जो नहीं हुआ, यहीं होगा।
संधि नहीं अब रण होगा,
युद्ध बड़ा भीषण होगा।

आसुरी शक्तियाँ भूलुंठित होंगी,
सद वृत्तियाँ संगठित होंगी।
सत्य सनातन धर्म ही रह जायेगा,
विश्व में शांति पर्व मनाया जाएगा।
शांति पर्व मनाया जायेग।
(महाभारत युद्ध के बात इसकी कल्पना की गई होगी)

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

इस कविता को मैंने मारुति सत्संग, पुणे के वेबिनार में 8 दिसंबर को सुनाया। इसका यूट्यूब वीडियो/ ऑडीयो लिंक मैं दे रहा हूँ:
https://youtu.be/sIgZSmh79ao


Monday, June 8, 2020

चीर नापने नभ को(कविता) #patriotic

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#patriotichindipoem
#womenpilot













चीर नापने नभ को

(भारतीय वायुसेना में तीन महिलाओं, अवनि चतुर्वेदी, मोहना सिंह जितवाल, भावना कंठ  को 2016 में पहली बार पायलट बनने पर।)

चल पड़ी वह लाँघ देहरी,
चीर नापने नभ को,
अग्नि-दाह से भस्म करने
अरि-समूह-शलभ को।

पहन वेश सेनानी का 
वह बनी देश की शान है।
धूल चटाने दुश्मन को
छिड़ा समर - अभियान है।

देखो वह नीले पथ पर,
गगन में भर रहा उडान।
घहरात पवि - सा विराट
स्वर ध्वनित गुंजायमान।

वह वायु-युद्ध की सेनानी,
बरसाएगी अग्निवाण। 
भयाक्रांत विवर्ण शत्रु का
मर्दन करेगी मिथ्या मान। 

अम्बर में गरजा विमान,
घिर गया गिद्धों का झुंड।
ध्वस्त हुए आतंक - शिविर
बिखर गये उनके नर मुंड ।

शत्रु की छाती का शोणित
रण चंडी बन पान करेगी।
भारत माँ की बिन्दी को
पुत्रियाँ प्रभावान करेगी।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Sunday, June 7, 2020

तू बाँटता चल अपनी मुस्कराहटें (कविता)

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#poemmotivational










तू बाँटता चल अपनी मुस्कराहटें

जो ना मिला तुझे उसका गिला न कर,
जो कुछ मिले किसी से लेता चला चल।

तू बांटता चल सबों से अपनी मुस्कराहटें,
हो सके तो आंसुओं को छुपाता चला चल।

जो लेता दूसरों से याद रख उम्र भर,   
जो देता है तू उसे भुलाता चला चल।

तू कुछ दे सका है, ये उसकी नेमत है,
शकून बांटता चल, सौगातें लुटाता चल।

जिंदगी कि परतें कुछ गीत लिख गयीं,
तू राही  है उसे गुनगुनाता चला चल।

एक राग - सी फाग  में उभर के उठी है,
एक उत्सव है जिंदगी मनाता चला चल।

मिलना बिछड़ना,  बिछड़ना  फिर मिलना,
सफर का सिलसिला है, भुलाता चला चल।

धुंध छँटी, उग रहा सूरज क्षितिज पर
तमस के कुहे को मिटाता  चला चल।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/c3wMNDRYiyE

Friday, June 5, 2020

जल से जीवन परिपूरित कर (कविता)#enviroment

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#environmentpoem
#savewater













जल से जीवन परिपूरित कर 
(जल की यात्रा पर आधारित)

उष्ण ताप वाष्पित होता है,
जलवाष्प बादल बनता है।
अल्हड शोख जवानी जैसी,
झूमता, दौड़ता छा जाता है।

पर्वतों पर आच्छादित हो
नाचता गाता,  शोर मचाता।
तरु - शाखों को नहलाता,
शिला छोड़, है राह बनाता।

उतरता है नीचे मैदानों में,
जीवन - जल बन जाता है
अमृत - पावन - संचित घट,
उड़ेलता, सरस बनाता है।

जल यौवन - राग सुनाता,
गाता, मृदंग, बजाता है।
शहनाई की टेर सुनाता,
यमुना- तट पर लहराता है।

कदम्ब की छाओं में सुस्ताता,
कृष्ण की वंशी सुनने आता। 
दुकूलों को आप्लावित करता,
कृषक - कार्य में हमें लगाता।

धरा अन्न से परिपूर्ण हो,
धानी हो माता का आँचल।
मानव - जीवन पोषित हो,
पर्व मने जीवन में अविरल।

हृषिकेश में गंगा - जल बन,
हर की पौड़ी को है धोता,
प्रयाग - राज में बनी त्रिवेणी,
बनारस के घाटों पर सोता।  

आगे बढ़ता पाटलिपुत्र हो,
सुल्तानगंज में उत्तरायण ।
बढ़ता जाता, मस्त चाल में,
सगर-पुत्रों का उद्धारक बन।

यह जल क्यों दूषित हो चला,
मानव तूने क्या कर डाला?
अमृत का घट तेरे पास था,
तूने उसमें विष भर डाला?

अपना कचरा न सका संभाल,
डाल दिया इस पावन तट पर।
सूखती जा रही धार अमृतमयी,
कंकड़ - कीचड़ घाटों में भर । 

सूख गयी  जो  धार नदी की,
पसर गयी कचरे में फँस कर,
कैसे विहंग की चोंच चखेगी?
तृषित  
रहेगा हर उर अंतर।

धार बूँद बन पसर जाएंगी
क्या चोंच में समां पाएंगी ?
क्या प्यास बुझा पाएंगी ?
जीवन सरस बना पाएंगी?

क्या अम्बु-अस्तित्व धरा पर,
अतीत के पन्नो में ही दिखेगा?
यह पातक मानव तू सहेगा,
तुझ पर भीषण वज्र गिरेगा। 

अब भी बचा ले इस अमृत को,
अग्रिम जीवन को सिंचित कर।
पीयूष आपूरित अभ्यंतर हो,
जल से जीवन परिपूरित कर।
जल से जीवन परिपूरित कर।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

नोट: तस्वीर मेरे बड़े लडकें शुभेंदु (सर एच एन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल, मुम्बई में कार्यरत) द्वारा बनायी गयी है।

Monday, June 1, 2020

लॉक डाउन खुला (कविता)

#BnmRachnaWorld
#coronaunlockdown












लॉक डाउन खुला

लॉक डाउन खुला
तो हुए नहीं स्वच्छंद,
बस थोड़े ढीले हुए हैं,
नियमों के प्रतिबंध ।

अभी भी छोड़े नहीं,
दूरी और सजगता।
मास्क लगाकर घूमें
निभाये आत्मीयता।

महामारियों के काल में
कोरोना काल है विकट
याद करेगी सदी इसे
मानव करता छटपट।

जाएँ कहाँ, निभाएं कैसे,
उन रिश्तों के अनुबंध।
जिनसे हमारे अस्तिव
का जुड़ा हुआ संबंध।

नदी दुकूल निर्मल हुआ,
नीर हुआ उज्ज्वल।
गगन वितान निरभ्र हुआ,
चाँद हुआ चंचल।

आनंद पर्व मनाने का
नहीं मुहूर्त विशेष।
कोरोना विषाणु तैर रहा
कब कर जाए प्रवेश?

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/2JwtPUy4u_M 

अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld  #story #affection#GovernmentOfficer अधिकारी की आत्मीयता  ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद ...