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Friday, May 29, 2020

पिता आकांक्षाओं की उड़ान होता है (कविता)

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#poemonfather




















पिता आकांक्षाओं की उड़ान होता है

वह चिलचिलाती धूप सहता है,
वह मौसम की मार सहता है।
तूफानों का बिगड़ा रूप सहता है
वह बताश, बयार सहता है।
मजबूत अंगद का पाँव होता है।
पिता बरगद की छाँव होता है।

वह परिवार के लिए ही जीता है।
पिता सब फरमाइशें पूरी करता है
परिवार के लिए हर गम पीता है।
सब कुछ करता, जो जरूरी होता है।
पिता न जाने कहाँ कहाँ होता है,
पिता हमारा सारा जहाँ होता है।

पिता को मैंने हंसते ही देखा है,
पिता कभी अधीर नहीं होता है।
पिता को मैने हुलसते ही देखा है।
पिता कभी गंभीर नहीं होता है।
वह नीली छतरी का वितान होता है।
पिता परिवार का आसमान होता है।


जब पिता है, तो हम विस्तार होते हैं।
जब पिता है, तो हमारा अस्तिव है,
जब पिता हैं, तो हम साकार होते हैं,
जब पिता हैं, तो हमारा व्यक्तित्व है।
वह हमारी उपलब्धियों का प्रतिमान होता है,
वह हमारी आकांक्षाओं की उड़ान होता हैं।

वह नीली छतरी का वितान होता है।
पिता परिवार का आसमान होता है।
©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Wednesday, May 27, 2020

बच्चे जियें खुशहाली से

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बच्चों में खुशहाली

लड़का लटका डाल से
मचता रहा धमाल।
बाकी दोस्त ताकते
उसका देख कमाल।।

बच्चे करते तड़ाग में
जमकर जल विहार।
गरमी के इस जलन से
राहत मिलता यार।।

सूरज ऊपर तप रहा,
सोखे ताल तलैया ।
पानी की बूंदे दे दो,
फुदक रही गोरैया ।।

गर्म हवाओं से जल रहे
धरती और गगन।
बाहर निकलने के पहले
ढंके सिर और बदन।।

छाछ पियें, आमरस पीएं,
और पियें जल जीरा।
मस्त मेलन, तरबूज औ'
खाएँ ककड़ी खीरा।

सूखने दो समंदर को,
और बनने दो बादल।
दौड़ लगाएंगे पावस में,
बरसे बूंदे छल छल।।

पेड़ लगाओ धरा में
छा जाए हरियाली।
पर्यावरण निर्मल हो,
बच्चों में खुशहाली ।।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Saturday, May 23, 2020

भीड़ में कितने अकेले हैं (कविता) #life

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#poemonlife
#life









भीड़ में कितने अकेले हैं


इस जहाँ में बहुत कुछ झेले हैं।
पर वहाँ भी बहुत ही अकेले हैं।

शामें उतरती हैं कुछ इसतरह
जैसे भूल चुकी यादों के रेले हैं।

कई-कई रास्ते ऐसे मिलते गए
जहाँ फैले नागफणी  नुकीले हैं।

हर जगह स्वाद मीठे तो होंगें नहीं
चखता गया जैसे वक्त के करैले हैं।

ऊपर से मीठे दिखने वाले आम भी
अन्दर  घुलते, कितने लगे कसैले है।

झक सफेदी जो है उनके कुरते पर
झाँको, देखो, अंदर से कितने मैले हैं।

विशाल अजगर के फैलने के पहले
मिटा दो उन्हें तभी जब संपोले हैं।

आपके मुस्कराने में भी लगता है
छूटेंगें तीर जो खासे विषैले हैं।

उड़ाते चलो सच का परचम दोस्तों
'मर्मज्ञ' है जिन्दा तभी तो झमेले हैं।

©ब्रजेन्द्र नाथ 

(तस्वीर गूगल से साभार)

Wednesday, May 20, 2020

जीने की चाह करें (कविता) #streetchildren

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#streetchildren















(स्ट्रीट चिल्ड्रन पर लिखी एक कविता)

जीने की चाह करें 

सड़कें सुनसान हो गयी,
जिंदगियां परेशान हो गयी,
जिन गलियों में जीवन बीता,
आज कितनी वीरान हो गयी।

कोई हाथ बढ़ाने वाला,
क्या आएगा कभी यहाँ?
कोई हमें थामने वाला,
क्या आएगा कभी यहाँ?

चाह नहीं इसकी अब भी,
पहले भी कभी नहीं रही,
मस्ती में जीवन कटता है,
कभी कमी भी नहीं रही।

आओ दोस्तों, थोड़ी अपनी भी परवाह करें,
आओ खेलें, मेल बढ़ाएं, जीने की चाह करें।

ऐसे जीवन में मलंग भी
गीत जीत का गाता है,
कल का किसने देखा है,
आज सूरज से नाता है।

रातें कटती, करते बातें,
कभी चाँद, कभी सितारे,
आँखे झँपती, जगी हैं आंतें,
रिश्ते सारे स्वर्ग सिधारे।

मेरे मन में जगती आसें,
उड़ें गगन में पंख फुलाएं,
जंग जीतनी है, जीवन की,
क्षितिज पार से कोई बुलाये।

गोलू, भोलू, आओ, बैठो थोड़ी तो सलाह करें,
आओ खेलें, मेल बढ़ाएं, जीने की चाह करें।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Monday, May 18, 2020

बादल से विनती (कविता)

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#poembiharfamine1966









बादल से विनती

(यह कविता बिहार में 1966-67 के भीषण अकाल के समय जब मैं दसमी से ग्यारहवीं में गया था, उसी समय लिखी थी।। यही कविता बाद में मेरे स्कूल की पत्रिका और अन्य कई पत्रिकाओं में भी छपी थेी।)

धूप हाँफती,
बंजर में ठहरती, पूछती - सिसकती,
आहें भरती, उच्छ्वासें छोड़ती।
गर्म हवाओं से बातें करती--
ये मौसम तो था,
धरती की गोद में,
हरे - हरे शैशवों की किलकारियों का।
सोच भी नहीं सकती थी,
उतरने को, धरती को छूने को।
...रोक लेते,
बादल, उन्मत्त, पागल.
मिलन के आवेग में।
आँचल में लिपटने को,
आनन्दातिरेक में झूमने को।
खेतों में, बागों में,
मैदानों में, बागानों में,
पहाड़ों पर, चंचल झरनों में,
झीलों में, तालों में,
नहरों में, नालों में।

...लेकिन आज कोई टोकता नहीं,
कोई रोकता भी नहीं।
कहाँ गए बादल, उन्मत्त पागल?
उनका पागलपन कहाँ खो गया?
कहाँ गई वो आसक्ति?
आज क्यों रोकते नहीं?
विरक्त क्यों हो गए?
भागते कहाँ हो?
झूमते क्यों नहीं बागों में?
गाते क्यों नहीं, कजरी के गीत?

यक्ष कहाँ जाएगा?
जिसकी आशा में बैठा है
यहां इस दूरस्थ पर्वत पर?
प्रिया का सन्देशा, कौन ले जाएगा?
...तुम नहीं आओगे,
 तो कैसे रचेगा कोई कालिदास,
'मेघदूत'?
कल्पना का पंछी, बादल की खोज में
भटकता – भटकता, इसी बियावान में,
दम तोड़ देगा।

...जरा झांको तो
खेतों की छाती पर फटती बेवाई में,
अगर कोई बूँद नज़र आये
तो मत बरसो, चले जाओ यूं ही,
हम बूँदें बहा लेंगें
तुम्हारी बूँदों की याद में।
सूनी धरती की गोद में,
सूखी धूल की आंधी में।
बिलखते बच्चों को,
याद दिला किलकारियों की,
हँसती, लहलहाती क्यारियों की,
सुला देंगें लम्बी नींद में।
यादों को संजोकर,
कि तुम फिर आओगे,
फिर हरे होंगे, हमारे तन - मन।
धरती होगी सगर्भा,
आँचल होगा नम…
आँचल होगा नम… 


©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

कहाँ चली ओ कली? (कविता)

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कहाँ चली ओ कली?


वृंतों पर अरुण प्रभा जब थी बिहँस रही,
प्रात में, प्रभात में, जब निशा सिमट रही।

ओस-कण ढुलक रहे, विभावरी थी बीतती,
हवा थी मंद-मंद-सी, पराग-कण समेटती।

तब एक डाल पर, उषा-किरण के भाल पर,
झाड़ियों में सर उठाये, पत्तियों के थाल पर।

मलय सुगंध घोलती, हवा जब चली,
नेत्र-पट खोलती, निकल पड़ी इक कली।

देखती उजास से भरी मही,
हरी दूब दूर तक पसर रही।
तरु झूमते, कूक गूँज रही,
प्रकृति रस घोलती संवर रही।

साफ जल में मछलियाँ थी तैरती उमंग में,
सरोवर तल पर जलराशि उठ रही तरंग में।

हिमाच्छादित शिखरों से गिर रही धवल-धार,
सरिता अपने तटों बीच संवारती कण तुषार।

जब अरुण प्रभा की चादर में था लिपटा उपवन,
हवा लेके चादर उड़ चली विस्तीर्ण था नीला गगन।

पुष्प - लता थी पूछ रही, कहाँ चली ओ कली?
बावरी सी, पराग कण उछालती, कैसी है बेकली?

इस सुंदर प्रभात में, चलो मेरे साथ में, प्यारी सखी,
जग को निहारने, श्रृंगार-रस पसारने, मैं बढ़ चली।

तू नहीं जानती , अग जग को नहीं पहचानती,
भर के बहु पाश में, मसल न दे तुन्हें प्यारी कली।

कली सहम सहम गयी, चल पड़ी वापस उपवन में,
जहां पुष्प लता थी खड़ी उदास, जल भरे थे नैनन में।

मन में थी बेचैनी, नैनों में छाई विवशता की रेखाएं,
कली लिपट गयी, नयन निलय में बह चली जल धारायें।

मैं तेरे साथ में, झाड़ियों के बीच बिछे पत्तों की थाल में,
यहीं खेलूं, खिलूँ, तेरे अंक में सुरक्षित रहूँ हर हाल में।
तेरे अंक में सुरक्षित हूँ हर हाल में...
©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, May 13, 2020

थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा (कविता)

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थाम कर हाथ मेरा


थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

हर एक गम तुम्हारा, हँस के सह लेंगें,
साथ हो तुम तो, तूफानों में चल देंगें।

गर सफल न हों, करना नहीं किनारा।
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

पता होगा तुमको कि तुम मेरे क्या हो?
मेरे साथ चंलने का, तुम्हीं आसरा हो।

रखेंगे याद वो पल हमने कभी गुजारा।
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

पास होते हो, जिंदगी कटती है खुशी से,
पास हो तुम तो शिकवा नहीं किसी से।

इस जहाँ में कोई तुमसे नहीं है प्यारा।
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

साथ में हो तुम तो हमें खुशी है होती,
तुम बिन जीने की चाहत नहीं है होती।

नहीं दोगे साथ तो, कहाँ जाएगा बेचारा?
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Monday, May 11, 2020

सूरज जा रहा अपने गाँव (कविता) #poemonnature

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सूरज जा रहा अपने गाँव

सुबह हुयी, अम्बर में जैसे
छूटी हो इक आतिशबाजी।
किरणों की बौछार हो  रही
धरा नहाई,  हुयी वह ताजी।

पीला हुआ रंग क्षितिज का
पूर्व लाल , जलता अलाव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

ज्यों - ज्यों सूरज चढ़ता ऊपर
बचपन बीता आयी जवानी।
किरणों में तपिश बढ़ रही
यौवन में ज्यों आई रवानी।

सूखी  धरा पर चले अगर ,
सिर हो गरम, जलेंगे पाँव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

भास्कर जैसे एक जिश्म है
धूप बनी है उसकी छाया।
परछाईं कभी अलग नहीं है
स्थिति में है जब तक काया।

आत्मन मिलता परमात्मन में
तब आ जाता है ठहराव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

दोपहर बाद दिनकर भी
चलता पश्चिम मद्धम - मद्धम।
जब ढंकता बादल सूरज को
गरम धूप हो जाती नरम।

इतना चलकर, दौड़ भागकर
ढूढ़ रहा अपना पड़ाव ।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

प्रेमातुर हो वाट जोह रही
उनकी याद में अटकी आस।
संध्या रानी कुहनी टिकाये
मिलने को है खड़ी उदास।

आया प्रेमी, मधुर मिलन में,
आरक्त हो गए उसके गाल।
स्फुरण दौड़ गयी रोम- रोम में,
धूप हो गयी अरुणिम लाल।

विछुड़न के बाद विरहन ने
सुख के खोजे अपने ठाँव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

©ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र


Saturday, May 9, 2020

ऋषिवर तुझे मेरा प्रणाम (कविता) चित्र आधारित कविता

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चित्र आधारित सृजन

ऋषिवर तुझे मेरा प्रणाम


दो आशीष जगावें उनको,
घोर नींद में जो सोए हैं ।
खाओ, पीओ और जीओ
के भेड़ चाल में जो खोए हैं।

उनके अन्तर में जग जाए
स्फूर्ति और शक्ति अविराम।

दो आशीष जगावें उनको
घोर निराशा में हैं ठहरे।
जीवन में बढ़ जाने के
प्रयास पर, डाले हैं पहरे।

वे सतत संघर्ष रत हों,
कार्य पूर्ण कर लें आराम।

उनको समझा सकें यह
संकट विकट कोरोना काल के।
उनको मन मे बिठा सकें,
फन कैसे हैं कठिन व्याल के।

धीरज, शांति और संयम से,
बीत जाएगी विपत्ति तमाम।

दुश्मन थर-थर काँपेगा
रूधिर वेग प्रबल होगा।
युवा देश के जग जायेंगें,
राष्ट्र मुकुट उज्ज्वल होगा।

हर नारी होगी गार्गी, भारती,
युवक होगा अब्दुल कलाम।

जो लासरहित, निरानंदित हैं,
थकित, श्रमित और व्यथित हैं।
सेवा व्रत में आगे हों हम,
उनके काम में जो वंचित है।

दो आशीष कि हम आयें,
लोकहित में सबके काम।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Wednesday, May 6, 2020

घर से चुपचाप निकल (कविता) बुद्ध पूर्णिमा पर

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#poemmotivational
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मिटाने को संताप निकल
घर से चुपचाप निकल
दबाकर अपने पदचाप निकल,
अलख जगाने को मेरे मन,
मिटाने को संताप निकल।
गलियों को देख जहां
सोये है लोग सताए जाकर।
उनके लिए उम्मीदों के छत का
तू एक वितान खड़ा कर।
तू सूरज का एक कतरा
लाने को रवि ताप निकल।
अलख जगाने को मेरे मन
मिटाने को संताप निकल।।      
कोई नारा नहीं जो बदल दे
सूरत आज और कल में।
मुठ्ठियों को भींच, छलकाओ,
अमृत कलश जल थल  में।
सिसकियों में सोते हैं, उनके
मिटाने को विलाप निकल।
अलख जगाने को मेरे मन
मिटाने को संताप निकल।
जो बीमार सा चाँद दिखे
तो तू लेकर उपचार चलो।
जंगल में जब दावानल हो,
तू लेकर जल संचार चलो।
लेते हैं जो छीन निवाले
बन्द करने उनके क्रिया कलाप चल।
अलख जगाने को मेरे मन,
मिटाने को संताप निकल।
भेद डालकर अपनो में
जो विग्रह करवाते  है,
यहां लड़ाते, वहां भिड़ाते,
खून का प्यासा  बनाते हैं।
वहां प्रेम का विरवा रोपें,
करवाने को मिलाप चल।
अलख जगाने को मेरे मन
मिटाने को संताप निकल।
©ब्रजेंद्रनाथ
मेरी यह कविता मेरी आवाज में यूट्यूब चैनल marmagyanet के इस लिंक पर:
https://youtu.be/Bud394vqGDw

मतवाला हो झूम-झूम (कविता) मदिरालय के आगे लंबी लाइन पर

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परम स्नेही मित्रों,
कुछ दिन पहले लॉक डाउन को थोड़ा ढीला करने पर लोग मदिरा क्रय के लिए  लंबी लाइनों में लगे दिखे। उसी को मैंने अपनी कविता का विषय बनाया है। आप भी पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएं:








मतवाला हो झूम-झूम


लॉकडाउन के बाद आज
जब थोड़ी दी गयी ढील।
सोचे पीने वाले चलकर
कंठ थोड़ी करते हैं गील।

मधुशाला के बाहर बाहर
लोग पंक्ति में रहे खड़े।
बोतल मिलने की आस
में घाम, धूप में रहे अड़े।

पीने की खुशी इतनी कि
चलन, नियम भी गए भूल।
दूरी रखनी कितनी जरूरी
कोरोना क्षय होगा समूल।

घर वापसी की टिकट पर
कैसा घमासान है जारी?
मदिरालय में लगी पंक्ति पर
दिखा रहे अपनी लाचारी।

आतंकी से लड़ रहे जवान
प्राण कर रहे अपने अर्पण।
मदिरा की घूंट के पहले,
राष्ट्र-उन्नयन का हो प्रण।

राष्ट्र - भूमि, राष्ट्र- किरीट
इसको भी तू चूम - चूम।
देशप्रेम का प्याला लेकर,
मतवाला हो झूम झूम।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Monday, May 4, 2020

उन दिनों की है बात (कविता) रेडियो पर कविता

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यह उन दिनों की है बात


रेडियो में बजी शहनाई
बंदे मातरम से होती थी
सुबह की शुरुआत।
भक्ति संगीतोंका कार्यक्रम बन्दना,
उसके पश्चात।
अवगाहन करते भक्ति की सरिता में,
होता था प्रफुल्लित मन और गात।
यह उन दिनों की है बात।

जैसे ही पहुँचते बस्ता लेकर स्कूल,

पाठ तो जाते थे भूल।
बस याद रहता था
आज होगा रेडियो पर,
विद्यालय में समय दोपहर,
अंग्रेजी व्याकरण का प्रसारण,
फिर होता था उसी का मनन।
ऐसे रेडियो से होती रही मुलाकात।
यह उन दिनों की है बात।

रेडियो का बड़ा सा बॉक्स

सिमट कर हो गया ट्रांजिस्टर।
इसे कहीं भी ले जा सकते थे,
घर में, दालान में, खलिहान में,
या कहीं का हो सफर।
विविध भारती से सिनेमा की
गीतों भरी भरी कहानी।
मनपसंद फिल्मी गीतों से
गुलजार रहता रविवार का दोपहर।

फरमाइसें आती थी ज्यादा,

राजनांदगांव, अकोला
और झुमरीतिलैया से,
जैसे सारे संगीतप्रेमी
इन्हीं जगहों में जाकर हों बसे ।

हिंदी समाचार देवकीनंदन पांडे,

शाम को मुखिया जी की चौपाल,
और फाटक बाबा, खदेरन के मदर
लोहा सिंग का भैंसालोटन में धमाल।
बिनाका गीतमाला में अमीन सायनी
क्रिकेट की कमेंट्री,
सुरजीत सेन, विजय हजारे
और बापू नाडकर्णी।
समाचार विवेचन बी बी सी मार्क टली
और बातें ज्ञान विज्ञान की ।

संगीत और गीत की

होली, चैता, बिरहा
और आल्हा की झंकारों में।
बड़ा सुकून देता है,
गुजरते हुए उन गलियारों में।
खोकर रह जाए हम
होती रही यादों की बरसात,
यह उन दिनों की है बात!
यह उन दिनों की है बात!

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Friday, May 1, 2020

श्रम देवता बन धरती को जगाता हूँ (कविता)

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श्रम - देवता बन धरती को जगाता हूँ


बाजुओं का माँस औ' गठन गलाता हूँ,
श्रम-देवता बन, धरती को जगाता हूँ।

पर्वत के मस्तक पर फावड़ा चलाता हूँ,
चट्टानों को तोड़कर अपनी राह बनाता हूँ।

हाथ काले, उंगलियाँ खुरदरी बनाता हूँ,
उनपर लाल फफोलों के मोती उगाता हूँ।

रक्त वाष्पित कर पसीना जब गिराता हूँ,
वहीं उत्तुंग - शिखर हिमालय उठाता हूँ।।

वहाँ पर गगन को जो महल चूमता है,
उसकी कंक्रीट में श्रम- बिंदु मिलाता हूँ।

चीर हल से, धरा को उर्वर बनाता हूँ,
देता अन्नदान, मैं किसान कहलाता हूँ।

जो भी मिले, उससे संतुष्ट हो जाता हूँ,
कर्मयोगी बनकर मैं किस्मत जगाता हूँ।

बाजुओं का माँस औ' गठन गलाता हूँ,
श्रम-देवता बन, धरती को जगाता हूँ।


©ब्रजेंद्रनाथ

Tuesday, April 28, 2020

यमराज के नाम पत्र संख्या 2 (हास्य व्यंग्य)

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यमराज के नाम पत्र संख्या 2:


परम आदरणीय यमराज जी,
दूर से पाँव लागी!
मैं, एक भारतीय नागरिक, ने पिछले पत्र में आपसे दूर से नमस्कार का प्रयोजन कोरोना के कारण सोशल डिस्टेंसिंग बतलाया था। साथ ही कातर शब्दों में कोरोना नामक विषाणु द्वारा फैलाये जा रहे संक्रमण से त्राण दिलाने के लिए अनुनय-विनय किया था। हमलोग आपको यह बताना चाहते हैं कि हमारे प्रधान मंत्री के कुशल नेतृत्व में कोरोना से लड़ने के लिए उनके द्वारा दिए गए आदेशों और बताए गए नियमों का अच्छी तरह पालन कर रहे हैं। फिर भी यहाँ संक्रमण के मामलों में कमी नहीं आ रही है। कुछ सिरफिरे जामात के लोग स्थिति की गंभीरता को नहीं समझते हुए नियमों की अवहेलना कर रहे हैं। उनके लिए सद्बुद्धि जगाने की प्रार्थना आपसे करते हैं। आपकी गदा पड़ेगी तभी वे सभी रास्ते पर आयेंगें।
प्रभु आपसे मेरा एक विनम्र और करबद्ध निवेदन है। कृपया इसपर आप अवश्य ध्यान दें। हमारे यहाँ जो व्यक्ति या समूह अपने घर-बार, परिवार से दूर रहकर कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए, कोरोना मरीजों को ठीक करने के लिए , कोरोना संक्रमितों के परीक्षण के लिए और लॉक डाउन के नियमों के पालन करवाने के लिए, गरीबों - भूखों के लिए भोजन या भोजन सामग्री को उपलब्ध कराने के लिए जुटे हैं, जूझ रहे हैं, उनके पास आप अपने यमदूतों को नहीं भेजें। अर्थात डॉक्टरों, नर्सों, सफाई कर्मियों, लैब टेक्नीशियनों, पुलिस, आशा वर्करों, फ़ूड सप्लाई और उसके चेन में काम पर जाने वाले ट्रांसपोर्ट में लगे लोगों, कोरियर और दवा उपलब्ध कराने वालों के पास अपने यमदूत न भेजें। उन्हें शक्ति, धैर्य और कोरोना संक्रमण के विरुद्ध रोग-प्रतिरोधक क्षमता से संपन्न कर दें। हम अपनी लड़ाई लड़ लेंगें। हम इस संक्रमण काल से मुक्ति के बाद अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार लेंगें। उम्मीद है, थोड़े में लिखे खत को विस्तार कर आप स्वयं समझ लीजियेगा। आप तो अंतर्यामी हैं, प्रभु! मेरी आवश्यकताओं और जरूरतों को समझते हुए विवेक दीजिएगा, ताकि संसाधनों का समुचित उपयोग करें, उनका दोहन न करें।
आपका एक विश्वासी भक्त
ब्रजेन्द्र नाथ, जमशेदपुर, झारखंड, भारत।

पता:
सेवा में,
यमराज, यमदूत कॉलोनी।
बंगलो न 1,
स्वर्गलोक।

Thursday, April 23, 2020

जीवन रस बरसाती है (कविता) #environment

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#environmment#poemonprakriti
#worldearthday#22ndApril














प्रकृति जीवन रस बरसाती है

प्रकृति हमारी माता है
वह जीवन रस बरसाती है।

जबसे वह अस्तित्व में आई
उसने बाँटे जीवन अनन्त।
ब्रह्मांड में वह पाई विस्तार
उर्जा फ़ैली दिग दिगंत।
हम सब उसकी संतानें है
अमृत रस पिलाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

जीवन पोषित करने को
उसने दिए हवा और जल।
उसने दिए प्रकाश सूरज का,
उसने दिए अन्न और फल।
माँ का दूध दिया उसने
जो पुष्ट हमें कर पाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

सूरज की रोशनी उससे है
चन्दा में है धवल चांदनी।
बादल में तड़ित- प्रभा उससे
उससे ही है हरी धरिणी।
हमारी है अन्नपूर्णा माँ
वह लोरी गा हमें सुलाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

जल बन कभी बहा करती है,
सरिता की निर्झरणी - सी।
आगे बढ़ सरितायें मिलकर,
बहती प्रवाहमयी तटिनी - सी।
धरती को उर्वर करती वह,
सींचित कर सरस बनाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

क्या - क्या नहीं दिये उसने,
अगणित हैं उसके उपकार,
इसके बदले कुछ लिया नहीं,
कुत्सित हैं हमारे आचार।
हमने उसको दुःख दिए हैं,
वह सबको सहलाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

धरती का कलेजा चीर - चीर,
खनिज निकाले हमने कितने।
सागर की अतल गहराई से भी
तेल निकाले कितने हमने।
फिर भी सहती रही चुप चाप
हमारे जीवन सरस बनाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

बस्तियाँ बसाने में हमने
वन सारे उजाड़ दिए।
वन्य प्राणी अब जाएँ कहाँ
उनके बसेरे उखाड़ दिए।
वह चुपचाप हमारी करतूतों
पर आवरण डालती जाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

अपनी सुविधाओं के लिए
कल कारखाने बनाये हमने।
पर उनके अवशेषों से दूषित
कर दी धरा और जल कितने।
माफ़ किया माँ ने पापों को
बादल बनकर धो जाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

अब तो चेत ऐ मानव जन
कर आवृत हरियाली से।
पर्यावरण बचा ले धरा का
बच्चे जीयें खुशहाली से।
माता का फैला है आँचल
वरदान तुझे दे जाती है
वह जीवन रस बरसाती है।
वह जीवन सरस बनाती है।
©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक :
https://youtu.be/aEPQBYjfKBM

Sunday, April 19, 2020

उनकी आहट से शबरी विकल ही गयी(कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemspiritual#poemonshabari









विषय: शब्द आधारित सृजन
शब्द: आहट




यह कविता मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के नीचे दिए गए लिंक पर सुनें और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएँ:
https://youtu.be/YumN6rix6ds

उनकी आहट से शबरी  विकल हो गयी।

आते हैं इस दुखियारी के द्वार प्रभु,।
समझ न सकी कैसे करूँ मैं स्वागत?
देखती अपनी जीर्ण शीर्ण कुटिया को,
समझ न सकी अपने तन की हालत ।

उसको सुध ना रही विह्वल हो गयी।
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

जिनके लिए बुहारती रही वीथियों को
जिनके लिए हटाये पथ के शूलों को,
जिनके लिए चुने सुंदर सुंदर कलियाँ
जिनके लिए बिछाए पथ में फूलों को।

उन पाँवों की हलचल से चंचल हो गयी?
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

जिनके लिए रखती रही बैरों को चखकर,
स्वच्छ थालों में सुरक्षित और सजाए ।
जिनके लिए आंखें बरसती रही आस में,
जिनके लिए युग युग से वे बूंदे बरसाए।

अब वह बहती धार अविरल हो गयी।
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

आज मतंग ऋषि की वाणी साकार हो रही,
प्रभु के आने की आहट है सारे जलथल में,
शबरी के राम आज पधारे हैं कुटिया के आंगन
आज भरा उल्लास अवनि और अम्बर तल में।

आंसुओं से धोती पाँव शबरी निश्चल हो गयी।
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Thursday, April 16, 2020

छाँव के सुखभोग कहाँ (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonstruggle




विषय: चित्र आधारित सृजन
चित्र: सड़क के मोड़ पर पत्रविहीन पेड़ और क्षितिज से झांकती दो आंखें






छाँव के सुखभोग कहाँ

धूप से छाले सहे पर,
छाँव के सुखभोग कहाँ?

कल्पनाओं के क्षितिज पर,
जो सपन मैं बुन सका था।
नयन निलय के नर्तन में
हरीतिमा को चुन सका था।

वे सपन सब खो गए,
प्रकृति के भीषण प्रलय में।
विमूढ़ सा देखा किया,
विस्फोटों के वह्नि - वलय मे।

पथ पर सूर्य - किरणें,
तपिश - सी दे रही,
पाँव के छालों को
आराम का संयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

वेदना के शीर्ष पर
सब भाव पिघलते जा रहे।
आशाओं की आस में,
सब अर्थ धुलते जा रहे।

पोर - पोर पीर से
भर उठा है, क्या कहूं?
दर्द के द्वार पर,
उदगार रीते जा रहे।

छीजती इस जिंदगी को,
हँस - हँस कर जी सकूँ,
कोई कोई कर सके तो करे,
मेरे बस में ये प्रयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

दलदल भरी कछार में,
दरार होती नहीं।
बह गए वृक्षों पर,
कभी बहार होती नहीं।

चिड़ियों की चहचहाहट
अब यादों  में बसती है।
जड़ से जो उखड़ गए,
उनमें संवार होती नहीं।

जो खो चुके सबकुछ
इस सफर में उस सफर में।
उन्हें और कुछ भी
खोने का वियोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

(वह्नि-आग)
©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

मिला नव स्पर्श है (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonmaa




विषय: चित्र आधारित सृजन
चित्र: माँ बच्चे को चूमती हुई।








मिला नव स्पर्श है

शिशु - नयन की भाषा में,
माँ के उल्लसित हृदय में,
संचरित हो रही ममता की
अविचल धार निलय में।
माँ के जीवन की बगिया में छाया नव हर्ष है।
माँ का शिशु की साँसों को मिला नव स्पर्श है।

यह भाषा अलिखित सी,
मौन भी है मुखरित हुआ।
माँ के मुस्कानों में दिखता
शिशु प्रेम पल्लवित हुआ।
पुष्प खिला सुंदर, सर्वत्र आंगन में उत्कर्ष है।
माँ का शिशु की सांसों को मिला नव स्पर्श है।

बालक माँ की पढ़ लेता
प्यार ममत्व की भाषा को।
आनन पर छायी विश्रान्ति
थकान और निराशा को।
माँ के दुलार में ही हमारे जीवन का अर्श है।
माँ का शिशु की सांसों को मिला नव स्पर्श है।

कितना सुकून है माँ के
आँचल में बीते बचपन।
माँ तेरी ममता से सिंचित
हो मेरे प्राणों का पोषण ।
शिशु के सुदृढ आलय का माँ ही तो फर्श है।
माँ का शिशु की सांसों को मिला नव स्पर्श है।

माँ मेरे तू रहती पास
स्नेह की देती शीतल छाँह,
माँ मेरी विघ्नों पर देती,
समाधान की त्वरित सलाह।
माँ तू ही मेरे समस्त जीवन का निष्कर्ष है।
माँ का शिशु की साँसों को मिला नव स्पर्श है।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Tuesday, April 14, 2020

जीतेंगे हम शान से (कविता) #coronapoem

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#coronapoem









जीतेंगे हम शान से
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आज मचा जो हाहाकार,
नहीं दुखों का पारावार।
कोरोना के फैलाव से
ठप्प पड़े सब कारोबार।
इन विषम स्थितियों में
भी लगे हुए जी जान से
जीतेंगे हम शान से।

लक्ष्मण रेखा है देहरी
इसका रखेंगे ख्याल।
बाहर कही निकलेंगें
मुख पर रखेंगें रुमाल।
जीवन की रक्षा करेंगे,
हम जीतेंगे जहान से ।
जीतेंगे हम शान से।

बड़े बूढ़ों की सेवा को
अपना लक्ष्य बनाएं ।
उनपर हो ध्यान विशेष
संक्रमण दूर रख पाएँ।
ध्येय हमारा होगा पूरा,
बुजुर्गों के सम्मान से।
जीतेंगे हम शान से।

आसपास में देखें जाकर
छत है जिनका आसमान।
पेट में अन्न का दाना है या
हवा ही है उनका जलपान।
उन्हें जीने का मकसद दें
मुक्त हो वे अपमान से।
जीतेंगे हम शान से।

नए जीवन की नयी शोध है,
नव चिंतन की नयी पौध है,
मन में विचरण नई सोच है,
निरंतर कर रहे नई खोज है।
कोरोना को देंगें मात
हम नए विज्ञान से ।
जीतेंगे हम शान से।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक:
https://youtu.be/ksYNEz_G_uU

Friday, April 10, 2020

यमराज को कोरोना के लिए पत्र संख्या 1 (हास्य व्यंग्य)

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#satireoncorona
#coronasatire





यमराज को पत्र: (हास्य व्यंग्य)

आदरणीय यमराज जी,
दूर से नमस्ते!
हमसब यहाँ सकुशल नहीं हैं। पर आप तो गैरेज में अपने भैसें के साथ वहाँ कुशलपूर्वक ही होंगे।
आप सोच रहे होंगे कि इसबार के पत्र में मैने आपको दूर से नमस्ते क्यों लिखा? मैंने आपको सादर चरण स्पर्श क्यों नहीं लिखा? आप तो जानते हैं और आप को मालूम ही होगा कि आपके यमदूतों द्वारा धरती पर से आत्माओं को ले जाने की गतिविधि में अचानक इतनी वृद्धि कैसे हो गयी? आपके यमदूतों ने आपको रिपोर्ट दी होगी कि यहाँ एक कोरोना नाम के विषाणु का तेजी से फैलाव हो रहा है। यह स्पर्श से और छींकने, खाँसने से तेजी से फैला है।
मैं धरती पर के एक भारतीय होने के नाते दूसरों का भी ख्याल रखता हूँ। आप को कहीं संक्रमण ना हो जाय, इसीलिए मैंने आपको दूर से ही नमस्ते लिखा है।
परन्तु आपने ये क्या कर दिया है? क्या धरती पर से आप मानव सभ्यता को मिटाना चाहते हैं। मैं देवराज इंद्र और ब्रह्मा के पास नहीं गया हूँ। चाहता हूँ कि समस्या का समाधान आप ही निकाल दें। मैं मानता हूँ कि धरती पर के कुछ सिरफिरे लोग पशु - पक्षियों और समुद्री जीवों का शिकार कर अपनी स्वादेषणा (स्वाद पूर्ति की वृत्ति) की पूर्ति में लगे हुए हैं, जबकि प्रकृति ने वनस्पतियों का अपार भंडार दे रखा है। इस अपराध के लिए आप पूरी मानव जाति को क्यों दंडित कर रहे हैं, प्रभु? जिन्होंने अपराध किया है उन्हें अवश्य दंडित करें। परंतु जो निरपराध हैं, उन्हें किस दण्ड विधान के अंतर्गत आप सजा दे रहे हैं।
मैं एक भारतीय हूँ। आपसे ही मैने देवसंस्कारों को ग्रहण किया है। आपने देखा है कि इस विपत्ति में भी बिना कोई भेदभाव के हमने अन्य देशों के नागरिकों की मदद की है। वे इस विषाणु के फैलाव के केंद्र में फंसे थे, वहाँ से मैंने उन्हें हवाई जहाज द्वारा लाया और उनकी यथासंभव मदद की थी। अभी भी मैंने अपने को आर्थिक शक्ति समझने वाले देशों को दवा पहुँचा कर वहाँ के नागरिकों की सेवा की है। आप ही कहते हैं कि परमार्थ करने से पुण्यफल बढ़ता है। प्रभु इन सारे प्रयासों से अगर हमारे पुण्यफल बढ़े हों, तो वे सारे पुण्य जिन्होंने अपराध किया है उनके अपराधों को क्षमा करने में लगा दें। मानव जाति को इस त्रासदी से त्राण दिला दें प्रभु! एक भारतीय की इस कातर पुकार पर ध्यान दीजिए प्रभु! थोड़े में अपनी समस्या लिखी है। स्वयं विस्तार कर समझ लीजिएगा। सादर!
जन्म जन्म तक आपका हृदय तल से आभारी!
एक भारतीय नागरिक
जमशेदपुर, झारखंड, भारत।

पता:
श्री यमराज,
यमदूत कॉलोनो,
बंगलो नंबर 1,
स्वर्गलोक।

Tuesday, April 7, 2020

कोरोना, तेरे नुकीले तीरों को हम भी देखेंगें (कविता).#coronapoem

#BnmRachnaWorld
#coronapoem


परमस्नेही साहित्यान्वेषी  सुधीजनों,
आप शुद्ध साहित्यिक रचनाओं के अपने यूट्यूब चैनल "marmagya net" से जुड़ चुके हैं। मैं ब्रजेंद्रनाथ आपको याद दिलाना चाहता हूँ, उस हिम प्रलय का जिसमें एकमात्र मनु बचे थे और उन्होंने श्रद्धा और इड़ा के साथ मिलकत मानव सभ्यता का निर्माण किया था। जयशंकर प्रसाद जी की कामायनी की कुछ पंक्तियाँ:
"हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह, एक पुरुष, भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।"
उस भयंकर संकटकाल में मनु ने आशा का त्याग नहीं किया और मानव सभ्यता को खड़ा किया। आज भी कोरोना विषाणु के कारण एक घोर संकट आया हुआ है।
कल हमने आशा का दिया जलाया था। आज हम जीत का बिगुल बजाने न रहे हैं: सुनें:

कोरोना, तेरे चल रहे नुकेले तीरों को
हम भी देखेंगें
---------------------------------
ज्वालामुखी के विस्फोटों से धरा विकम्पित
जल का था विस्तार, भूमि समाई उसमें।
गगन गूंजता, रही धरा डोलती पल पल,
क्षण क्षण गर्जन ध्वनि समाई उसमें।

मानव सभ्यता का निर्माण किया मनु ने
जब धरती ध्वस्त हुई थी हिम प्रलय में।
वनस्पतियों को चुन चुन प्रभावी बनाया,
जब प्रचंड जंतु भरे थे नगर निलय में।

ऐ कोरोना, तेरे तप्त तासीरों को
हम भी देखेंगें।
तेरे चल रहे नुकीले तीरों को
हम भी देखेंगें।

माना तेरे खूनी पंजों का प्रहार है जारी,
माना तेरे चुभते खंजर का प्रहार है जारी।
तुमने मानी नहीं हमारी कोई भी विनती,
बढ़ती रही धरा पर ताज़ा लाशों की गिनती।

तू है अदृश्य और घुस जाता है शरीर में,
तू स्वसन तंत्र को छिन्न भिन्न करता है।
तू छींकने खाँसने से बढ़ता ही जाता है,
तू शारीरिक शक्ति को विछिन्न करता है।

तेरे फैलते लंबी जंजीरों को
हम भी देखेंगे।
तेरे चल रहे नुकेले तीरों को
हम भी देखेंगें।

रक्तबीज - सा छलता अनगिन रूपों में,
समझ नहीं आता, कहाँ छिप जाता है?
तू है अति सूक्ष्म, दिखाई नहीं पड़ता है,
तू अंदर ही अंदर घात किये जाता है।

तू नहीं छोड़ता है चाहे वो हो राजा या रंक
तू मानवता का शत्रु , यह युग याद रखेगा।
विश्व, विष के प्रभाव से पड़ा हुआ भूलुंठित,
शव गिरने होंगें बंद, यह युग याद रखेगा।

तेरे घाव गंभीरों को
हम भी देखेंगें।
तेरे चल रहे नुकेले तीरों को
हम भी देखेंगें।

ढूढ़ लिए, कुछ ऐसे व्यक्ति, समूहों को,
जो मनुजता के दुश्मन बने फिरते हैं।
जिन्हें क्वारंटाइन में जाना नहीं पसंद,
तेरे वाहक बनकर विष वमन किया करते है।

हम है प्रबल, अटल इन झंझावातों में,
प्रहार झेलते रहते है, प्रचंड संघातों में।
एक मरेंगे, दस वीर समर में आ जूझेंगें,
मानव बंदी होगा नहीं सिरफिरे जामातों में।

तेरे टेढ़े तिरछे शोख
शमशीरों को हम भी देखेंगें।
तेरे चल रहे नुकेले
तीरों को हम भी देखेंगें।

©ब्रजेंद्रनाथ
पूरी कविता मेरी आवाज में मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस लिंक पर देखें और सुनें:
Link: https://youtu.be/krnYuoAkkdA

Saturday, April 4, 2020

कोरोना होगा भस्मीभूत (कविता) हास्य व्यंग्य #coronapoem

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#coronapoem














कोरोना होगा भस्मीभूत

नवंबर 2019 के किसी दिन:
यमदूत आए यमराज के पास
यमराज पूछे क्यों हो वत्स उदास?
धरती पर अब मौतें होती कम
हम क्या करें आप बताएं श्रीमन।
हमलोगों में बहुतों को कोई नहीं है काम,
अब तो आउट ऑफ जॉब होंगे हम तमाम।
आप ही बताएं क्या तरकीब अपनाएं
कैसे हो हमलोगों के जॉब सुरक्षा का इंतजाम?

यमराज ने यमदूतों की सभा बुलाई,
किसी यमदूत को कोई भी तरकीब समझ न आई।
कोने में चुपचाप दिखा एक यमदूत,
यमराज ने उससे पूछा क्यों तुम हो चूप?
मैं डर रहा हूँ आपसे श्रीमान
अगर कहूँ मैं अपनी बात,
ऐसा न आप सब कर दे हमें बदनाम।

तुम हो जाओ निर्भीक,
पर बोलो जो भी बात सबों को लगे ठीक।
पर बात में अगर नहीं हुआ कोई भी तथ्य
तो तुमको दिखलायेंगे बाहर का पथ।
महाराज अगर बचानी है हमारी जॉब,
तो मैं जैसा कहता हूँ, वैसा करें आप।
बोलो भी अपने मन की बात
पर हो वह सभी नियमों के साथ।

मैं प्रभारी रहा हूँ,
मध्य एशिया के वुहान वन का
वहाँ पर जमीन है विषाणुओं
के निरंतर प्रजनन का।
मैं कहता हूँ, आप अगर दिखलायें साहस,
मैं इन्सर्ट कर दूँ कुछ वायरस।

क्या यह था नियमों के अधीन?
पर यमदूतों के जॉब की विकट थी स्थिति।
यमराज ने दुखी मन से
कुछ अंतराल के लिए दी इसकी स्वीकृति।

वहाँ से फैलने लगा वायरस कोरोना,
विश्व में व्याप्त हो गया यह कोना - कोना।
सभी यमदूत भागे आये दौड़े-दौड़े,
बेहाल, फटेहाल यमराज के पाँवों में गिर पड़े।
महाराज, रक्षा करे, रक्षा करे हम करते है विनती,
धरती पर शवों की बढ़ती जा रही गिनती।
आप करें उपाय कुछ, इसपर लगाए विराम,
धरती पर नहीं रहेगा मानवों का नामो निशान।
यमराज तुरंत गए इंद्र से करने को मंत्रणा,
उनके यमदूतों से ही ऐसा वातावरण बना।

यमराज आये यमदूतों को करने को आश्वस्त,
कुछ उपाय करेंगें देवराज कोरोना होगा ध्वस्त।
भारत की धरती पर भेजेंगे देवदूत,
वही करेगा कोरोना वायरस को भस्मीभूत।
भारत भूमि से ही कोरोना होगा भस्मीभूत।
©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Saturday, March 28, 2020

यह युद्ध कोरोना का रोकेगा विस्तार (कविता) #coronawarriors

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#coronawarriors




परमस्नेही आदरणीय साहित्यान्वेषी मित्रो,
आपको मैं शुद्ध साहित्यिक रचनाओं के चैनल "marmagya net" से जुड़ने का अनुरोध कर रहा हूँ, क्योंकि आजकी मेरी लिखी कविता "कोरोना योद्धाओं" की अग्रिम पंक्ति में जूझते लोगों के लिए है। कोरोना वायरस के कारण फैली इस वैश्विक महामारी में भारत में 21 दिनों के लॉक डाउन करके इसके विस्तार को रोकने की मुहिम में जो सबसे आगे यानि डॉक्टर,  पारामेडिकल स्टाफ, सफाईकर्मी, पुलिस, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में लगे दुकानदार, ट्रक चालक, पम्प ऑपरेटर और ऐसे तमाम कोरोना योद्धाओं के प्रति मेरी यह कविता समर्पित है।
कोरोना योद्धाओं के लिए:

यह युद्ध कोरोना का रोकेगा विस्तार


इसमें आप ही हैं योद्धा, आप ही हैं सारथी,
गली, मुहल्लों, सड़कों पर लड़ाई है जारी ।
विकट संकटकाल है, क्रुद्ध महाकाल है,
सारा विश्व बना रणक्षेत्र, फैली है महामारी।
यह युद्ध कोरोना का रोकेगा प्रहार।
यह युद्ध कोरोना का रोकेगा विस्तार।

कोरोना से इस लड़ाई में जो है आगे आगे,
जो जीत तय करते है सेवा से भाग्य जागे।
जो रात दिन लगे हैं जीवन बचाने को,
परहित में जुटे है, कोरोना को भगाने को।

डॉक्टर, पारा मेडिकल स्टाफ, पुलिस,
आवश्यक वस्तुओं के दुकानदार, वितरक।
पेट्रोल पम्प, गैस और सफाई कर्मी,
आपूर्ति श्रृंखला में लगे हुए ट्रक चालक।

इनके हौसलों को बढ़ाएं, रुकेगा अनाचार।
यह युद्ध कोरोना का रोकेगा विस्तार।

एक राह, एक लक्ष्य, एक प्रण
बढ़ चले, निरंतर कठिन सेवा व्रत।
छोड़ मोह माया को जूझ रहे अहर्निश
परहित प्राण रक्षा का ले सपथ, ले सपथ।

जो लगातार लगे है सेवा में रत है,
जान कर लगा रहे बाजी अपनी जान की,
संक्रमित मरीजों की जीवन रक्षा के लिए
परवाह नहीं कर रहे अपने प्राण की।

वे ही रोकेंगे कोरोना का अत्याचार,
यह युद्ध कोरोना का रोकेगा विस्तार।

कुछ कर सकते नहीं इस विकट काल में,
उनको तो दे सकते हैं थोड़ा सम्मान।
जब वे सेवा में जूझ रहे अस्पताल में
उनके परिजनों का थोड़ा तो रखे ध्यान।

समाज से इतना सा प्रेम चाहिए,
समाज से नही चाहिए कोई इनाम।
महान सेवा-रत-नायक- नायिकाओं को,
इज्जत मिले बस यही है अरमान।

उनके बारे में मत करें कोई दुष्प्रचार।
वे ही कोरोना का रोकेंगे विस्तार।

यह युद्ध कोरोना पर करेगा विकट प्रहार,
यह युद्ध कोरोना का रोकेगा विस्तार।
©ब्रजेंद्रनाथ
यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/XWKviW7N1Vg

Thursday, March 26, 2020

कोरोना को मात देंगें बदलकर आचरण (कविता)

#BnmRachnaWorld
#coronaafterlockdown


25-03-2020 के 0:00 घंटे के बाद पी एम द्वारा 21 दिन के लॉक डाऊन की घोषणा के बाद जोड़ा गया:
परम स्नेही मित्रों,
आज आपके अपने शुद्ध साहित्यिक रचनाओं के चैनल marmagya net से 101 से अधिक सब्सक्राइबर्स के जुड़ने के बाद सेलिब्रेशन का समय है। परंतु देश कोरोना के वैश्विक संक्रमण की चपेट में जिसतरह आ चुका है और उसे सीमित करने के लिए जूझ रहा है, उसके बाद सेलिब्रेशन तभी होगा जब लोकडौन यानि चिकित्सकीय आपातकाल का यह समय 14 अप्रील के बाद संक्रमण पर अपेक्षित नियंत्रण को प्रभावी बना सकेगा। अब यह कविता सुने जिसमें एक सीधा संदेश है...
कोरोना को मात देंगे बदलकर आचरण

24 मार्च से इक्कीस दिन का लॉक डाउन लागू हुआ,
घर में रहना है, परिवार के बीच परिवार के साथ साथ ।
स्वयं रहें सुरक्षित, दूसरे भी हों स्वस्थ और आनंदित,
देश, समाज, विश्व का हो कल्याण, सबों के साथ।
कोरोना के विषाणुओं का करें समूल भंजन।
कोरोना को मात देंगें बदल कर अपने आचरण।

आज हर व्यक्ति एक योद्धा है कोरोना के साथ मचा है युद्ध
हर सांस के लिए असि धार पर चलेंगे, विषाणु के विरुद्ध।
घर में एकांतवास, मौका है स्वयं से स्वयं के सहकार का,
लांघो मत देहरी की रेखा, डर है कोरोना से साक्षात्कार का।
कोने में रहने से भागेगा कोरोना, उखड़ेंगे उसके चरण।
कोरोना को मात देंगे, बदल कर अपने आचरण।

हथियार कुछ भी नही, खाली हाथ घर में रहें
बाहर निकलकर, मस्ती में बनें नहीं स्वार्थी।
इस युद्ध में हम ही हैं अर्जुन हम ही हैं कृष्ण,
सारे भारतीय हैं योद्धा, सारे ही हैं महारथी।
इस युद्ध में निष्क्रीयता ही है हमारा स्यन्दन,
कोरोना को हरायेंगें, बदल कर अपने आचरण।

बाहर निकलकर, भीड़ में चलकर मत हो भ्रमित,
कोरोना क्या बिगाड़ेगी, सोच को मत कर विचलित।
यह राजा और रंक को करती समान रूप से व्यथित,
जब यह घुस जाएगी, फेफड़े होंगे बेकार गिरोगे भूलुंठित।
सामुदायिक दूरी बनाकर कोरोना का नियत करें मरण।
कोरोना को हरायेंगें बदल कर अपने आचरण।

आप जतायें स्नेह अपनों से, जुड़ें सिर्फ दूरभाष से,
दिलों से दिलों को मिलने दे, रखें शारीरिक दूरी।
घरों से निकलो तभी, जब हो बहुत बहुत जरूरी,
इस रण में सब शामिल हों, वरना जीत है अधूरी।
कोरोना के विषाणु का करेंगें होलिका दहन।
कोरोना को हरायेंगें, बदल कर आचरण।

हैं तैयार हम कोरोना को देने के लिए मात,
हैं तैयार हम करने को भीषण आघात।
इस लड़ाई में कोरोना को करेंगें समूल नष्ट,
कोरोना के सुदृढ प्राचीर को भी करेंगे ध्वस्त।
विषाणु पर हमेशा के लिए लग जायेगा ग्रहण।
कोरोना को हरायेंगें, बदल कर अपने आचरण।
©ब्रजेंद्रनाथ

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/KJk6UQJKT2U

Wednesday, March 25, 2020

कोरोना रोकने के लिए लॉकडाउन पीरियड 25 मार्च से 14 अप्रील कैसे बिताएं

#BnmRachnaWorld
#coronalockdown





परम स्नेही साहित्यान्वेषी मित्रों,
आज (25-03-2020) से 21 दिनों यानि 14 अप्रील तक लॉक डाउन लागू कर दिया गया है। इसमें घर पर ही रहना है। इसलिए परिवार के साथ वक्त बिताने का समय है, साथ ही समय है खुद के साथ कुछ वक्त बिताने का, खुद से मिलने का। ऐसे में आप टीवी के सामने समय बिताएंगे, एंड्राइड पर फेसबुक, व्हाट्सएप्प पर समय देंगें।
 मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूँ। आप थोड़ा समय निकालें और इसे पढ़ें:
आप अपना क्वालिटी टाइम निकालकर थोड़ा साहित्य के अन्वेषण में लगाएं। आप मेरी कुछ किताबें जो अमेज़न किंडल पर हैं, डाउनलोड कर पढ़ें। डाउनलोड का तरीका मैने विस्तार से नीचे बताया है। आप जैसे सुधी साहित्यान्वेषी इस धुंध भरे वातावरण में तेज रोशनी की तरह है।
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2) ऊपर दिए गए किसी भी लिंक पर आप क्लिक करेंगें तो आपको अमेज़ॉन के App के साइट पर ले जाएगा।
3) वहाँ आप बुक का कवर पेज देखेंगे। किंडल प्राइस ₹... लिखा होगा। एक ऑरेंज पट्टी पर "read for free" लिखा होगा। यह kindle unlimited के members के लिए है, जो ₹169 प्रतिमाह देने से प्राप्त होता है। मैंअब दूसरे ऑरेंज स्ट्रिप के बारे में बताना चाहता हूँ जिसपर "Buy now with 1- click" लिखा है। इसपर जैसे ही क्लिक करेंगें, आपको पेमेंट ऑप्शन पर स्क्रीन खुलेगा। आप अपने क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, या वालेट जैसे paytm, फ़ोनपे, Google pay या amazon pay से जो भी amount हो पेमेंट कर डाऊनलोड कर सकते हैं। (स्क्रीन शॉट संलग्न है)।
4) अब आप किंडल app download कर लें। वहीं पर उस पुस्तक को "read now" पर क्लिक करने पर पूरी किताब पढ़ सकते हैं, कभी भी।
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मै जानता हूँ, इसमें हो सकता है कि दिक्कतें आएं। आप मुझे  e mail: brajendra.nath.mishra@gmail.com पर लिख भेजें।
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सादर! ब्रजेंद्रनाथ

Tuesday, March 24, 2020

कोरोना ने बदल दिए आचरण (कविता)

 BnmRachnaWorld
#coronapoem





परमस्नेही साहित्यान्वेषी मित्रों,
कृपया यह संदेश अवश्य पढ़ें:
एक लंबे अंतराल के बाद मैं, ब्रजेंद्रनाथ आपकी पसंद के शुद्ध साहित्यिक रचनाओं के चैनल marmagya net के द्वारा कोरोना के कहर और उससे छाए खौफ को थोड़ा कम करने के लिए हास्यात्मक अंदाज में एक कविता सुनाने जा रहा हूँ। कोरोना वायरस के फैलाव ने  हमारी आदतों को बदल दिया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है। इसके दूरगामी अच्छे प्रभाव हो सकते हैं, अगर इसे कायम रखा जाय। तो प्रस्तुत है:
"कोरोना ने बदल दिए सबों के आचरण"

कोरोना ने बदल दिए आचरण

जिन आदतों को अपनाने में झिझक होती थी,
जिन हाथों को जोड़कर कहते नहीं थे नमस्ते।
उन्हीं आदतों को जीवन में पुनः अपना रहे हैं,
अब तो हाथ मिलाते नहीं, जोड़ते, हंसते-हंसते।
कोरोना ने सिखाया, पूर्व परंपरा का अनुसरण।
कोरोना ने बदल दिए है सबों का आचरण।

जो हस्त पाद प्रक्षालन बिना प्रवेश कर जाते थे,
जो हाथों को धोए बिना चम्मच कांटे से खाते थे।
अब वे ही साबुन से हाथ धोते हैं मल मल कर,
अब वे ही कहते हैं, स्वयं से कभी मत छल कर।
कोरोना ने सिखला दिये, उत्तम गुणों का वरण।
कोरोना ने बदल दिए है सबों के आचरण।

जो मांसाहार के बिना एक दिन नहीं रह पाते थे,
जो चिकन पकाते, चटखारे ले लेकर खाते थे।
जो मीट स्टाल पर लाइन लगाकर खरीद करते थे,
पार्टियों में नॉन वेज के लूट को टूट टूट पड़ते थे।
कोरोना सिखलाये, शाक - भाजी खाने का चलन।
कोरोना ने बदल दिए हैं, सबों के आचरण।

जो प्यार जताने को, प्यार निभाने को, गले लगाने को,
मिलने जुलने को, दिल मिलाने को गले पड़ जाते थे।
आज वही दूर-दूर रहते है, देखते ही नजरें चुराते है,
अगर मिल भी जाए तो हँसकर ही प्यार जताते हैं।
कोरोना कह रही अब ऐसे ही करें मिलन।
कोरोना ने बदल दिए है सबों के आचरण।

ट्रेन के ए सी कोच में पर्दे हैं नहीं, न ही हैं कम्बल,
एयरपोर्ट पर उड़ाने हो सकती है बन्द,अब तो संभल।
आये हों विदेश से कराएं जांच, रहें क्वारएनटाइन में,
वीमारी फैलने से रोकें, भीड़भाड़, पार्टी में मत निकल।
कोरोना कह रही नियमों का मत करो उल्लंघन।
कोरोना ने बदल दिए हैं सबों के आचरण।
©ब्रजेंद्रनाथ
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पूरी कविता मेरे यूट्यूब चैनल 'marmagya net के इस लिंक पर सुनें, सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर करें। बेल आइकॉन भी दबा दें ताकि नया वीडियो अपलोड होने पर इसकी सूचना आपको मिल जाय।
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Link: https://youtu.be/GN0xc9ZmVZk
सादर! ब्रजेंद्रनाथ

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