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Friday, June 26, 2020

छोड़ महल चले वीराने को (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonramvanvaas
#रामवनगमन #ramvangaman

परम स्नेही मित्रों, 
पिच्छले २९ सितम्बर को डॉ राधानंदन सिंह जी के आमंत्रण पर मैं मारुती सत्संग मंडल पुणे के वेबिनार से जुड़ा।  डॉ राधा बाबू के कर्मफल सिद्धांत पर दिए गए प्रेरक वक्तव्य के बाद मैंने अपनी दो भक्तिपूर्ण रचनाएँ प्रस्तुत की।  एक योगेश्वर श्री कृष्ण पर और दूसरी भगवान राम के वन गमन पर। इसी का यूट्यूब वीडियो  लिंक मैं दे रहा हूँ। आपके बहुमूल्य विचारों का स्वागत है। सादर:
--ब्रजेंद्र नाथ
यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/fJES-jIN7cw























छोड़ महल चले वीराने को

पिता का वचन निभाने को
रघुकुल का मान बचाने को।
राम, लखन सीता समेत
छोड़ महल, चले वीराने को।

पुष्प सभी थे विस्मित
रोये अश्व, रोयी मैना।
चेतन की कौन कहे वहाँ
बहे नीर जड़ के नैना।

चेतना शून्य, दौड़ी जनता,
रोती रह गयी माँ की ममता।
करुणा का बादल बरस पड़ा,
यह हाहाकार नहीं थमता।

हमें छोड़, मुंह को न मोड़,
हे प्रभु राम, अयोध्यानाथ।
हमने किया कोई अपराध ?
तो क्यों कर रहे हमें अनाथ?

गर है अपराध नहीं मेरा
क्यों दंडित किये जाते हो?
नैनों के अमृत वर्षण से,
क्यों वंचित किये जाते हो?

क्या परिवार के वचनों का है
अधिक महत्व, पूछे जनता?
क्या जनता के लिए कर्तव्यों
का कोई महत्व नहीं होता?

हे राम, अवध की प्रजा से
बड़ा नहीं कोई भी वचन।
जनता के लिए रुकना होगा,
तोड़ तुम्हें सारे बंधन।

प्रजा का मत सबसे ऊपर
हम साथ चलेंगे जग होगा।
जहां चलेंगें अवधनाथ
जनता का वहीं अवध होगा।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Thursday, June 25, 2020

इरादों को जगाता हूँ (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonlife'sphilosophy
















इरादों को जगाता हूँ

जिंदगी की पलकों पर सपने सजाता हूँ।
यादों को सुलाकर, इरादों को जगाता हूँ।

उन सायों के पीछे, छोड़ आया था जिन्हें,
उनके हाथों की छुवन, हंसकर मिटाता हूँ|

वक्त तो अनसुलझी रेशों का घेरा है यहाँ,
उन्हीं रेशों से जिंदगी की राहें सजाता हूँ |

एक पेड़ जिसपर पखेरू सो रहे थे रात भर,
उस छाँव में हर दोपहर मैं भी सो आता हूँ।

सीधे सच कहने से मैंने किनारा कर लिया,
अब झूठ से संवादों का सिलसिला चलाता हूँ|

शाहंशाह का है महल दरिया के किनारे पर,
वहाँ गुम झोपड़ियों की फरियादे सुनाता हूँ। 

एक नदी जो बहती जा रही छल - छल कर,
उसे समन्दर तक पहुँचने की कहानी बताता हूँ।

---ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Tuesday, June 23, 2020

ममता की गोद (कविता) #vatsalya

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#poemonmother'slove
#vatsalya

















ममता की गोद

बालक का तन,
माता का लगा मन,
आँचल है नम
ममता पोर पोर है।
आनन पर स्वेद कण,
काम में उलझा तन,
बोझ नहीं होता कम,
स्नेह सराबोर है।

ठुमक-ठुमक चलता,
उंगली पकड़ लेता,
मन की भाषा ,
खोजती परिभाषा है।
आँखे हैं चंचल,
चित्त है चपल
माँ की बंधी आशा,
जगाती अभिलाषा है।

स्थिर हुआ मन
खुलता वातायन
हवाओं में सुधियाँ
आयीं संग संग है।
तन है थकित, पर
हृदय पुलकित,
उमंगों की तटिनी में
उठती तरंग है।

आजा मेरे कान्हा,
माँ को न तू सता,
ममता की गोद सूनी
मेरी सौगंध है।
मैया सौगंध ना दे
वापस इसे ले ले
तेरी गोद से ही मेरा
जीवन-संबंध है।

©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

Sunday, June 21, 2020

राही तू चलता जा (कविता) #motivational

#BnmRachnaWorld
#motivationalpoem




















राही तू  चलता जा


राही तू  चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

राहों पर कंकड़ - पत्थर,
टूट - टूटकर धूल बन गए।
वे सहलाती राही के
पैरों के नीचे फूल बन गए।

नहीं रहेगी थकन,
छाँव के नीचे बना है रास्ता।
राही  तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

चिलचिलाती  धूप खिली हो,
सर पर आग है बरस रहा।
तू रुकना मत, तू थकना मत,
तेरी आहट को कोई तरस रहा।

बाधाओं, अवरोधों से तुम,
जोड़ चलो एक रिश्ता।
राही  तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

आंधी में, तूफानों में,
नीरव वन में, सिंह - गर्जन हो।
साथी रुकना नहीं तुम्हें,
भले तड़ित-वाण वर्षण हो।

यादें अपने परिजनों की,
लाद चलो ना जैसा बस्ता।
राही तू चलता जा,
चलने से तेरा वास्ता।

सत्य शपथ  ले, चले चलो तुम,
विजयपथ पर बढे चलो तुम।
अशुभ संकेतों से निडर हो,
रश्मिरथ पर चढ़े चलो तुम।

तन बज्र -सा, मन संकल्पित,
झंझावातों में समरसता।
राही तू चलता जा
चलने से तेरा वास्ता।


©ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र
   जमशेदपुर, तिथि : मई, 2016.


इस कविता को मेरी आवाज में मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के इस लिंक पर सुनें। कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य लिखें। आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं।

Link: https://youtu.be/zxdTXPQfEQM




Wednesday, June 17, 2020

गलवान घाटी (लद्दाख) में गतिरोध पर (कविता) #galwanvalley#indochinesestandoff

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#galwanvalley
#indochinesestandoff#laddakhstandoff











चीन के साथ गलवान में गतिरोध 

बर्फीली घाटी को तुमने स्याह किया
बहती शांत नदी को तुमने दाह दिया।
मेरे अंदर जगा दिया भीषण तूफानों को,
बदला लूंगा जितना तुमने आह दिया।

लद्दाख सीमा पर दुस्साहस दिखलाया
निशा-प्रहर में घुसने का साहस दिखलाया।
चौकस था मैं, भाँप रहा तेरी चालों को,
सिंह - गुफा में जाकर अनायास जगाया।

अब तू देखेगा हिंदी तोप - दहानों को,
तू देखेगा पवि से घहराते उड़ानों को।
बीस सैनिकों को तुमने है शहीद किया,
अब मारूंगा तेरे अगनित जवानों को।

युद्ध के बादल घन मंडल में मंडरायेंगे,
नक्षत्र, गगन भी लाल, दिशाएं टूटेंगी।
भीषण आयुध का होगा वर्षण तुम पर,
तेरी हठधर्मी से तकदीर धरा की फूटेगी।

चोटी का सूरज दिखेगा लाल वहां
नीले अम्बर में टूटेंगे तारे अनगिन।
तब महाविनाश का नाचेगा काल वहां,
तू बैठ बिताएगा रण में लाशें गिन गिन।

मैं अपनी कलम से श्रृंगार नहीं लिखूँगा,
मैं अपनी कलम का आचार बदल दूँगा।
आज से प्रेम का व्यापार नहीं लिखूंगा,
मैं अपनी कलम का व्यवहार बदल दूँगा।

रचनाओं में कलम को अंगार बनाऊंगा।
सेनानी के लिये इसे हथियार बनाऊंगा।
बून्द लहू की गिरी वहां जिस चोटी पर
गाड़ तिरंगा जीत का त्यौहार मनाऊंगा।

शोणित की स्याही में चलकर
सृजन का आकाश बदलता है।
जब आग कलम को लगती है,
तब ही इतिहास बदलता है।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र
पवि-वज्र, thunder bolt 

मेरे यूट्यूब चैनल marmagya net के इस लिंक पर जाकर पूरी कविता मेरी आवाज में सुनें। चैनल को सब्सक्राइब करें, यह निःशुल्क है। कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य दें, आपके विचार मेरे लिए बहुमूल्य हैं। सादर!
Link: https://youtu.be/L8l0nCNcqNg

Saturday, June 13, 2020

शृंगार के छः छंद हाइकू के (कविता)

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#hikuchhand













शृंगार के छः छन्द: हाइकु

हाइकु सृजन:

भींगा बदन
सुलगाये अगन
तपता मन ।

छनती धूप
खिला इंद्रधनुष
जैसा आनन ।

कर शृंगार
निहारती दर्पण
चंचल मन ।

लतिका गात
अरुणिम प्रभात
भटका मन ।

नवीन पल
उड़ रहा आँचल
बहका मन ।

तेज रफ्तार
घड़ी की टिक टिक
छोटा मिलन ।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र
(तस्वीर गूगल से साभार)


Thursday, June 11, 2020

युद्ध बड़ा भीषण होगा (कविता) #mahabharat

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#mahabharatpoem
#mahabharatkekrishn













युद्ध बड़ा भीषण होगा

(अद्भुत रस)

कृष्ण सभा में खड़े हुए,
कौरव सभी थे अड़े हुए।
कृष्ण ने एक सलाह बतायी,
रण रोकने की राह दिखायी।

दे दो पांडवों को गाँव पांच,
तेरे राज्य पर आए न आंच।
दुर्योधन था मद में चूर,
कृष्ण को देख रहा घूर।

प्रस्ताव नहीं उसको भाया,
दुर्योधन अपने पर आया।
पकड़ो भागे नहीं ग्वाल,
चल ना दे ये कोई चाल।

बांध इसे कारा में डालो,
इसकी सारी युक्ति निकालो।
जानता है यह इंद्रजाल,
कर दो इसका बुरा हाल।

कृष्ण का क्रोधानल दीप्त हुआ,
उठी भुजाएं मुख प्रदीप्त हुआ।
उनका प्रकट हुआ विराट रूप,
सभा तपने लगी ज्यों तेज धूप।

सारे सभासद हुए अचम्भित,
भीष्म, द्रोण, भी थे विस्मित।
भुजा उठा, किया उदबोधन,
आ मुझे बांध, तू दुर्योधन।

मैं दिखलाता हूँ परिणाम,
जब युद्ध चलेगा अविराम।
जब लाशें बिछी होंगी सर्वत्र,
ढूढेंगे अपनों को यत्र तत्र।

तुम कहाँ गिरे हो पहचानो
तुम कहाँ पड़े हो अब जानो।
मैं उद्घोष किये जाता हूँ,
गति काल की बतलाता हूँ।

महाविनाश जब छायेगा,
तब तू कैसे बच पायेगा?
रणचंडी थाल सजायेगी,
आहुति तेरी पड़ जाएगी। 


कौरवों में कोई नहीं होगा,
जो नहीं हुआ, यहीं होगा।
संधि नहीं अब रण होगा,
युद्ध बड़ा भीषण होगा।

आसुरी शक्तियाँ भूलुंठित होंगी,
सद वृत्तियाँ संगठित होंगी।
सत्य सनातन धर्म ही रह जायेगा,
विश्व में शांति पर्व मनाया जाएगा।
शांति पर्व मनाया जायेग।
(महाभारत युद्ध के बात इसकी कल्पना की गई होगी)

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

इस कविता को मैंने मारुति सत्संग, पुणे के वेबिनार में 8 दिसंबर को सुनाया। इसका यूट्यूब वीडियो/ ऑडीयो लिंक मैं दे रहा हूँ:
https://youtu.be/sIgZSmh79ao


Monday, June 8, 2020

चीर नापने नभ को(कविता) #patriotic

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#patriotichindipoem
#womenpilot













चीर नापने नभ को

(भारतीय वायुसेना में तीन महिलाओं, अवनि चतुर्वेदी, मोहना सिंह जितवाल, भावना कंठ  को 2016 में पहली बार पायलट बनने पर।)

चल पड़ी वह लाँघ देहरी,
चीर नापने नभ को,
अग्नि-दाह से भस्म करने
अरि-समूह-शलभ को।

पहन वेश सेनानी का 
वह बनी देश की शान है।
धूल चटाने दुश्मन को
छिड़ा समर - अभियान है।

देखो वह नीले पथ पर,
गगन में भर रहा उडान।
घहरात पवि - सा विराट
स्वर ध्वनित गुंजायमान।

वह वायु-युद्ध की सेनानी,
बरसाएगी अग्निवाण। 
भयाक्रांत विवर्ण शत्रु का
मर्दन करेगी मिथ्या मान। 

अम्बर में गरजा विमान,
घिर गया गिद्धों का झुंड।
ध्वस्त हुए आतंक - शिविर
बिखर गये उनके नर मुंड ।

शत्रु की छाती का शोणित
रण चंडी बन पान करेगी।
भारत माँ की बिन्दी को
पुत्रियाँ प्रभावान करेगी।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Sunday, June 7, 2020

तू बाँटता चल अपनी मुस्कराहटें (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemmotivational










तू बाँटता चल अपनी मुस्कराहटें

जो ना मिला तुझे उसका गिला न कर,
जो कुछ मिले किसी से लेता चला चल।

तू बांटता चल सबों से अपनी मुस्कराहटें,
हो सके तो आंसुओं को छुपाता चला चल।

जो लेता दूसरों से याद रख उम्र भर,   
जो देता है तू उसे भुलाता चला चल।

तू कुछ दे सका है, ये उसकी नेमत है,
शकून बांटता चल, सौगातें लुटाता चल।

जिंदगी कि परतें कुछ गीत लिख गयीं,
तू राही  है उसे गुनगुनाता चला चल।

एक राग - सी फाग  में उभर के उठी है,
एक उत्सव है जिंदगी मनाता चला चल।

मिलना बिछड़ना,  बिछड़ना  फिर मिलना,
सफर का सिलसिला है, भुलाता चला चल।

धुंध छँटी, उग रहा सूरज क्षितिज पर
तमस के कुहे को मिटाता  चला चल।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/c3wMNDRYiyE

Friday, June 5, 2020

जल से जीवन परिपूरित कर (कविता)#enviroment

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#environmentpoem
#savewater













जल से जीवन परिपूरित कर 
(जल की यात्रा पर आधारित)

उष्ण ताप वाष्पित होता है,
जलवाष्प बादल बनता है।
अल्हड शोख जवानी जैसी,
झूमता, दौड़ता छा जाता है।

पर्वतों पर आच्छादित हो
नाचता गाता,  शोर मचाता।
तरु - शाखों को नहलाता,
शिला छोड़, है राह बनाता।

उतरता है नीचे मैदानों में,
जीवन - जल बन जाता है
अमृत - पावन - संचित घट,
उड़ेलता, सरस बनाता है।

जल यौवन - राग सुनाता,
गाता, मृदंग, बजाता है।
शहनाई की टेर सुनाता,
यमुना- तट पर लहराता है।

कदम्ब की छाओं में सुस्ताता,
कृष्ण की वंशी सुनने आता। 
दुकूलों को आप्लावित करता,
कृषक - कार्य में हमें लगाता।

धरा अन्न से परिपूर्ण हो,
धानी हो माता का आँचल।
मानव - जीवन पोषित हो,
पर्व मने जीवन में अविरल।

हृषिकेश में गंगा - जल बन,
हर की पौड़ी को है धोता,
प्रयाग - राज में बनी त्रिवेणी,
बनारस के घाटों पर सोता।  

आगे बढ़ता पाटलिपुत्र हो,
सुल्तानगंज में उत्तरायण ।
बढ़ता जाता, मस्त चाल में,
सगर-पुत्रों का उद्धारक बन।

यह जल क्यों दूषित हो चला,
मानव तूने क्या कर डाला?
अमृत का घट तेरे पास था,
तूने उसमें विष भर डाला?

अपना कचरा न सका संभाल,
डाल दिया इस पावन तट पर।
सूखती जा रही धार अमृतमयी,
कंकड़ - कीचड़ घाटों में भर । 

सूख गयी  जो  धार नदी की,
पसर गयी कचरे में फँस कर,
कैसे विहंग की चोंच चखेगी?
तृषित  
रहेगा हर उर अंतर।

धार बूँद बन पसर जाएंगी
क्या चोंच में समां पाएंगी ?
क्या प्यास बुझा पाएंगी ?
जीवन सरस बना पाएंगी?

क्या अम्बु-अस्तित्व धरा पर,
अतीत के पन्नो में ही दिखेगा?
यह पातक मानव तू सहेगा,
तुझ पर भीषण वज्र गिरेगा। 

अब भी बचा ले इस अमृत को,
अग्रिम जीवन को सिंचित कर।
पीयूष आपूरित अभ्यंतर हो,
जल से जीवन परिपूरित कर।
जल से जीवन परिपूरित कर।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

नोट: तस्वीर मेरे बड़े लडकें शुभेंदु (सर एच एन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल, मुम्बई में कार्यरत) द्वारा बनायी गयी है।

Monday, June 1, 2020

लॉक डाउन खुला (कविता)

#BnmRachnaWorld
#coronaunlockdown












लॉक डाउन खुला

लॉक डाउन खुला
तो हुए नहीं स्वच्छंद,
बस थोड़े ढीले हुए हैं,
नियमों के प्रतिबंध ।

अभी भी छोड़े नहीं,
दूरी और सजगता।
मास्क लगाकर घूमें
निभाये आत्मीयता।

महामारियों के काल में
कोरोना काल है विकट
याद करेगी सदी इसे
मानव करता छटपट।

जाएँ कहाँ, निभाएं कैसे,
उन रिश्तों के अनुबंध।
जिनसे हमारे अस्तिव
का जुड़ा हुआ संबंध।

नदी दुकूल निर्मल हुआ,
नीर हुआ उज्ज्वल।
गगन वितान निरभ्र हुआ,
चाँद हुआ चंचल।

आनंद पर्व मनाने का
नहीं मुहूर्त विशेष।
कोरोना विषाणु तैर रहा
कब कर जाए प्रवेश?

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक: https://youtu.be/2JwtPUy4u_M 

Friday, May 29, 2020

पिता आकांक्षाओं की उड़ान होता है (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonfather




















पिता आकांक्षाओं की उड़ान होता है

वह चिलचिलाती धूप सहता है,
वह मौसम की मार सहता है।
तूफानों का बिगड़ा रूप सहता है
वह बताश, बयार सहता है।
मजबूत अंगद का पाँव होता है।
पिता बरगद की छाँव होता है।

वह परिवार के लिए ही जीता है।
पिता सब फरमाइशें पूरी करता है
परिवार के लिए हर गम पीता है।
सब कुछ करता, जो जरूरी होता है।
पिता न जाने कहाँ कहाँ होता है,
पिता हमारा सारा जहाँ होता है।

पिता को मैंने हंसते ही देखा है,
पिता कभी अधीर नहीं होता है।
पिता को मैने हुलसते ही देखा है।
पिता कभी गंभीर नहीं होता है।
वह नीली छतरी का वितान होता है।
पिता परिवार का आसमान होता है।


जब पिता है, तो हम विस्तार होते हैं।
जब पिता है, तो हमारा अस्तिव है,
जब पिता हैं, तो हम साकार होते हैं,
जब पिता हैं, तो हमारा व्यक्तित्व है।
वह हमारी उपलब्धियों का प्रतिमान होता है,
वह हमारी आकांक्षाओं की उड़ान होता हैं।

वह नीली छतरी का वितान होता है।
पिता परिवार का आसमान होता है।
©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Wednesday, May 27, 2020

बच्चे जियें खुशहाली से

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#poemonchildren












बच्चों में खुशहाली

लड़का लटका डाल से
मचता रहा धमाल।
बाकी दोस्त ताकते
उसका देख कमाल।।

बच्चे करते तड़ाग में
जमकर जल विहार।
गरमी के इस जलन से
राहत मिलता यार।।

सूरज ऊपर तप रहा,
सोखे ताल तलैया ।
पानी की बूंदे दे दो,
फुदक रही गोरैया ।।

गर्म हवाओं से जल रहे
धरती और गगन।
बाहर निकलने के पहले
ढंके सिर और बदन।।

छाछ पियें, आमरस पीएं,
और पियें जल जीरा।
मस्त मेलन, तरबूज औ'
खाएँ ककड़ी खीरा।

सूखने दो समंदर को,
और बनने दो बादल।
दौड़ लगाएंगे पावस में,
बरसे बूंदे छल छल।।

पेड़ लगाओ धरा में
छा जाए हरियाली।
पर्यावरण निर्मल हो,
बच्चों में खुशहाली ।।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Saturday, May 23, 2020

भीड़ में कितने अकेले हैं (कविता) #life

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#poemonlife
#life









भीड़ में कितने अकेले हैं


इस जहाँ में बहुत कुछ झेले हैं।
पर वहाँ भी बहुत ही अकेले हैं।

शामें उतरती हैं कुछ इसतरह
जैसे भूल चुकी यादों के रेले हैं।

कई-कई रास्ते ऐसे मिलते गए
जहाँ फैले नागफणी  नुकीले हैं।

हर जगह स्वाद मीठे तो होंगें नहीं
चखता गया जैसे वक्त के करैले हैं।

ऊपर से मीठे दिखने वाले आम भी
अन्दर  घुलते, कितने लगे कसैले है।

झक सफेदी जो है उनके कुरते पर
झाँको, देखो, अंदर से कितने मैले हैं।

विशाल अजगर के फैलने के पहले
मिटा दो उन्हें तभी जब संपोले हैं।

आपके मुस्कराने में भी लगता है
छूटेंगें तीर जो खासे विषैले हैं।

उड़ाते चलो सच का परचम दोस्तों
'मर्मज्ञ' है जिन्दा तभी तो झमेले हैं।

©ब्रजेन्द्र नाथ 

(तस्वीर गूगल से साभार)

Wednesday, May 20, 2020

जीने की चाह करें (कविता) #streetchildren

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#hindipoemstreetchildren
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(स्ट्रीट चिल्ड्रन पर लिखी एक कविता)

जीने की चाह करें 

सड़कें सुनसान हो गयी,
जिंदगियां परेशान हो गयी,
जिन गलियों में जीवन बीता,
आज कितनी वीरान हो गयी।

कोई हाथ बढ़ाने वाला,
क्या आएगा कभी यहाँ?
कोई हमें थामने वाला,
क्या आएगा कभी यहाँ?

चाह नहीं इसकी अब भी,
पहले भी कभी नहीं रही,
मस्ती में जीवन कटता है,
कभी कमी भी नहीं रही।

आओ दोस्तों, थोड़ी अपनी भी परवाह करें,
आओ खेलें, मेल बढ़ाएं, जीने की चाह करें।

ऐसे जीवन में मलंग भी
गीत जीत का गाता है,
कल का किसने देखा है,
आज सूरज से नाता है।

रातें कटती, करते बातें,
कभी चाँद, कभी सितारे,
आँखे झँपती, जगी हैं आंतें,
रिश्ते सारे स्वर्ग सिधारे।

मेरे मन में जगती आसें,
उड़ें गगन में पंख फुलाएं,
जंग जीतनी है, जीवन की,
क्षितिज पार से कोई बुलाये।

गोलू, भोलू, आओ, बैठो थोड़ी तो सलाह करें,
आओ खेलें, मेल बढ़ाएं, जीने की चाह करें।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Monday, May 18, 2020

बादल से विनती (कविता)

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#poembiharfamine1966









बादल से विनती

(यह कविता बिहार में 1966-67 के भीषण अकाल के समय जब मैं दसमी से ग्यारहवीं में गया था, उसी समय लिखी थी।। यही कविता बाद में मेरे स्कूल की पत्रिका और अन्य कई पत्रिकाओं में भी छपी थेी।)

धूप हाँफती,
बंजर में ठहरती, पूछती - सिसकती,
आहें भरती, उच्छ्वासें छोड़ती।
गर्म हवाओं से बातें करती--
ये मौसम तो था,
धरती की गोद में,
हरे - हरे शैशवों की किलकारियों का।
सोच भी नहीं सकती थी,
उतरने को, धरती को छूने को।
...रोक लेते,
बादल, उन्मत्त, पागल.
मिलन के आवेग में।
आँचल में लिपटने को,
आनन्दातिरेक में झूमने को।
खेतों में, बागों में,
मैदानों में, बागानों में,
पहाड़ों पर, चंचल झरनों में,
झीलों में, तालों में,
नहरों में, नालों में।

...लेकिन आज कोई टोकता नहीं,
कोई रोकता भी नहीं।
कहाँ गए बादल, उन्मत्त पागल?
उनका पागलपन कहाँ खो गया?
कहाँ गई वो आसक्ति?
आज क्यों रोकते नहीं?
विरक्त क्यों हो गए?
भागते कहाँ हो?
झूमते क्यों नहीं बागों में?
गाते क्यों नहीं, कजरी के गीत?

यक्ष कहाँ जाएगा?
जिसकी आशा में बैठा है
यहां इस दूरस्थ पर्वत पर?
प्रिया का सन्देशा, कौन ले जाएगा?
...तुम नहीं आओगे,
 तो कैसे रचेगा कोई कालिदास,
'मेघदूत'?
कल्पना का पंछी, बादल की खोज में
भटकता – भटकता, इसी बियावान में,
दम तोड़ देगा।

...जरा झांको तो
खेतों की छाती पर फटती बेवाई में,
अगर कोई बूँद नज़र आये
तो मत बरसो, चले जाओ यूं ही,
हम बूँदें बहा लेंगें
तुम्हारी बूँदों की याद में।
सूनी धरती की गोद में,
सूखी धूल की आंधी में।
बिलखते बच्चों को,
याद दिला किलकारियों की,
हँसती, लहलहाती क्यारियों की,
सुला देंगें लम्बी नींद में।
यादों को संजोकर,
कि तुम फिर आओगे,
फिर हरे होंगे, हमारे तन - मन।
धरती होगी सगर्भा,
आँचल होगा नम…
आँचल होगा नम… 


©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

कहाँ चली ओ कली? (कविता)

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#poemonnature
#poemonflowerbud









कहाँ चली ओ कली?


वृंतों पर अरुण प्रभा जब थी बिहँस रही,
प्रात में, प्रभात में, जब निशा सिमट रही।

ओस-कण ढुलक रहे, विभावरी थी बीतती,
हवा थी मंद-मंद-सी, पराग-कण समेटती।

तब एक डाल पर, उषा-किरण के भाल पर,
झाड़ियों में सर उठाये, पत्तियों के थाल पर।

मलय सुगंध घोलती, हवा जब चली,
नेत्र-पट खोलती, निकल पड़ी इक कली।

देखती उजास से भरी मही,
हरी दूब दूर तक पसर रही।
तरु झूमते, कूक गूँज रही,
प्रकृति रस घोलती संवर रही।

साफ जल में मछलियाँ थी तैरती उमंग में,
सरोवर तल पर जलराशि उठ रही तरंग में।

हिमाच्छादित शिखरों से गिर रही धवल-धार,
सरिता अपने तटों बीच संवारती कण तुषार।

जब अरुण प्रभा की चादर में था लिपटा उपवन,
हवा लेके चादर उड़ चली विस्तीर्ण था नीला गगन।

पुष्प - लता थी पूछ रही, कहाँ चली ओ कली?
बावरी सी, पराग कण उछालती, कैसी है बेकली?

इस सुंदर प्रभात में, चलो मेरे साथ में, प्यारी सखी,
जग को निहारने, श्रृंगार-रस पसारने, मैं बढ़ चली।

तू नहीं जानती , अग जग को नहीं पहचानती,
भर के बहु पाश में, मसल न दे तुन्हें प्यारी कली।

कली सहम सहम गयी, चल पड़ी वापस उपवन में,
जहां पुष्प लता थी खड़ी उदास, जल भरे थे नैनन में।

मन में थी बेचैनी, नैनों में छाई विवशता की रेखाएं,
कली लिपट गयी, नयन निलय में बह चली जल धारायें।

मैं तेरे साथ में, झाड़ियों के बीच बिछे पत्तों की थाल में,
यहीं खेलूं, खिलूँ, तेरे अंक में सुरक्षित रहूँ हर हाल में।
तेरे अंक में सुरक्षित हूँ हर हाल में...
©ब्रजेंद्रनाथ

Wednesday, May 13, 2020

थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा (कविता)

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थाम कर हाथ मेरा


थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

हर एक गम तुम्हारा, हँस के सह लेंगें,
साथ हो तुम तो, तूफानों में चल देंगें।

गर सफल न हों, करना नहीं किनारा।
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

पता होगा तुमको कि तुम मेरे क्या हो?
मेरे साथ चंलने का, तुम्हीं आसरा हो।

रखेंगे याद वो पल हमने कभी गुजारा।
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

पास होते हो, जिंदगी कटती है खुशी से,
पास हो तुम तो शिकवा नहीं किसी से।

इस जहाँ में कोई तुमसे नहीं है प्यारा।
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

साथ में हो तुम तो हमें खुशी है होती,
तुम बिन जीने की चाहत नहीं है होती।

नहीं दोगे साथ तो, कहाँ जाएगा बेचारा?
थाम कर हाथ मेरा, देना तुम सहारा।
पर्वतों के पार है, कहीं घर हमारा।।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Monday, May 11, 2020

सूरज जा रहा अपने गाँव (कविता) #poemonnature

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सूरज जा रहा अपने गाँव

सुबह हुयी, अम्बर में जैसे
छूटी हो इक आतिशबाजी।
किरणों की बौछार हो  रही
धरा नहाई,  हुयी वह ताजी।

पीला हुआ रंग क्षितिज का
पूर्व लाल , जलता अलाव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

ज्यों - ज्यों सूरज चढ़ता ऊपर
बचपन बीता आयी जवानी।
किरणों में तपिश बढ़ रही
यौवन में ज्यों आई रवानी।

सूखी  धरा पर चले अगर ,
सिर हो गरम, जलेंगे पाँव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

भास्कर जैसे एक जिश्म है
धूप बनी है उसकी छाया।
परछाईं कभी अलग नहीं है
स्थिति में है जब तक काया।

आत्मन मिलता परमात्मन में
तब आ जाता है ठहराव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

दोपहर बाद दिनकर भी
चलता पश्चिम मद्धम - मद्धम।
जब ढंकता बादल सूरज को
गरम धूप हो जाती नरम।

इतना चलकर, दौड़ भागकर
ढूढ़ रहा अपना पड़ाव ।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

प्रेमातुर हो वाट जोह रही
उनकी याद में अटकी आस।
संध्या रानी कुहनी टिकाये
मिलने को है खड़ी उदास।

आया प्रेमी, मधुर मिलन में,
आरक्त हो गए उसके गाल।
स्फुरण दौड़ गयी रोम- रोम में,
धूप हो गयी अरुणिम लाल।

विछुड़न के बाद विरहन ने
सुख के खोजे अपने ठाँव।
सूरज जा रहा अपने गाँव।

©ब्रजेन्द्रनाथ मिश्र


Saturday, May 9, 2020

ऋषिवर तुझे मेरा प्रणाम (कविता) चित्र आधारित कविता

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चित्र आधारित सृजन

ऋषिवर तुझे मेरा प्रणाम


दो आशीष जगावें उनको,
घोर नींद में जो सोए हैं ।
खाओ, पीओ और जीओ
के भेड़ चाल में जो खोए हैं।

उनके अन्तर में जग जाए
स्फूर्ति और शक्ति अविराम।

दो आशीष जगावें उनको
घोर निराशा में हैं ठहरे।
जीवन में बढ़ जाने के
प्रयास पर, डाले हैं पहरे।

वे सतत संघर्ष रत हों,
कार्य पूर्ण कर लें आराम।

उनको समझा सकें यह
संकट विकट कोरोना काल के।
उनको मन मे बिठा सकें,
फन कैसे हैं कठिन व्याल के।

धीरज, शांति और संयम से,
बीत जाएगी विपत्ति तमाम।

दुश्मन थर-थर काँपेगा
रूधिर वेग प्रबल होगा।
युवा देश के जग जायेंगें,
राष्ट्र मुकुट उज्ज्वल होगा।

हर नारी होगी गार्गी, भारती,
युवक होगा अब्दुल कलाम।

जो लासरहित, निरानंदित हैं,
थकित, श्रमित और व्यथित हैं।
सेवा व्रत में आगे हों हम,
उनके काम में जो वंचित है।

दो आशीष कि हम आयें,
लोकहित में सबके काम।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Wednesday, May 6, 2020

घर से चुपचाप निकल (कविता) बुद्ध पूर्णिमा पर

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मिटाने को संताप निकल
घर से चुपचाप निकल
दबाकर अपने पदचाप निकल,
अलख जगाने को मेरे मन,
मिटाने को संताप निकल।
गलियों को देख जहां
सोये है लोग सताए जाकर।
उनके लिए उम्मीदों के छत का
तू एक वितान खड़ा कर।
तू सूरज का एक कतरा
लाने को रवि ताप निकल।
अलख जगाने को मेरे मन
मिटाने को संताप निकल।।      
कोई नारा नहीं जो बदल दे
सूरत आज और कल में।
मुठ्ठियों को भींच, छलकाओ,
अमृत कलश जल थल  में।
सिसकियों में सोते हैं, उनके
मिटाने को विलाप निकल।
अलख जगाने को मेरे मन
मिटाने को संताप निकल।
जो बीमार सा चाँद दिखे
तो तू लेकर उपचार चलो।
जंगल में जब दावानल हो,
तू लेकर जल संचार चलो।
लेते हैं जो छीन निवाले
बन्द करने उनके क्रिया कलाप चल।
अलख जगाने को मेरे मन,
मिटाने को संताप निकल।
भेद डालकर अपनो में
जो विग्रह करवाते  है,
यहां लड़ाते, वहां भिड़ाते,
खून का प्यासा  बनाते हैं।
वहां प्रेम का विरवा रोपें,
करवाने को मिलाप चल।
अलख जगाने को मेरे मन
मिटाने को संताप निकल।
©ब्रजेंद्रनाथ
मेरी यह कविता मेरी आवाज में यूट्यूब चैनल marmagyanet के इस लिंक पर:
https://youtu.be/Bud394vqGDw

मतवाला हो झूम-झूम (कविता) मदिरालय के आगे लंबी लाइन पर

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परम स्नेही मित्रों,
कुछ दिन पहले लॉक डाउन को थोड़ा ढीला करने पर लोग मदिरा क्रय के लिए  लंबी लाइनों में लगे दिखे। उसी को मैंने अपनी कविता का विषय बनाया है। आप भी पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएं:








मतवाला हो झूम-झूम


लॉकडाउन के बाद आज
जब थोड़ी दी गयी ढील।
सोचे पीने वाले चलकर
कंठ थोड़ी करते हैं गील।

मधुशाला के बाहर बाहर
लोग पंक्ति में रहे खड़े।
बोतल मिलने की आस
में घाम, धूप में रहे अड़े।

पीने की खुशी इतनी कि
चलन, नियम भी गए भूल।
दूरी रखनी कितनी जरूरी
कोरोना क्षय होगा समूल।

घर वापसी की टिकट पर
कैसा घमासान है जारी?
मदिरालय में लगी पंक्ति पर
दिखा रहे अपनी लाचारी।

आतंकी से लड़ रहे जवान
प्राण कर रहे अपने अर्पण।
मदिरा की घूंट के पहले,
राष्ट्र-उन्नयन का हो प्रण।

राष्ट्र - भूमि, राष्ट्र- किरीट
इसको भी तू चूम - चूम।
देशप्रेम का प्याला लेकर,
मतवाला हो झूम झूम।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Monday, May 4, 2020

उन दिनों की है बात (कविता) रेडियो पर कविता

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यह उन दिनों की है बात


रेडियो में बजी शहनाई
बंदे मातरम से होती थी
सुबह की शुरुआत।
भक्ति संगीतोंका कार्यक्रम बन्दना,
उसके पश्चात।
अवगाहन करते भक्ति की सरिता में,
होता था प्रफुल्लित मन और गात।
यह उन दिनों की है बात।

जैसे ही पहुँचते बस्ता लेकर स्कूल,

पाठ तो जाते थे भूल।
बस याद रहता था
आज होगा रेडियो पर,
विद्यालय में समय दोपहर,
अंग्रेजी व्याकरण का प्रसारण,
फिर होता था उसी का मनन।
ऐसे रेडियो से होती रही मुलाकात।
यह उन दिनों की है बात।

रेडियो का बड़ा सा बॉक्स

सिमट कर हो गया ट्रांजिस्टर।
इसे कहीं भी ले जा सकते थे,
घर में, दालान में, खलिहान में,
या कहीं का हो सफर।
विविध भारती से सिनेमा की
गीतों भरी भरी कहानी।
मनपसंद फिल्मी गीतों से
गुलजार रहता रविवार का दोपहर।

फरमाइसें आती थी ज्यादा,

राजनांदगांव, अकोला
और झुमरीतिलैया से,
जैसे सारे संगीतप्रेमी
इन्हीं जगहों में जाकर हों बसे ।

हिंदी समाचार देवकीनंदन पांडे,

शाम को मुखिया जी की चौपाल,
और फाटक बाबा, खदेरन के मदर
लोहा सिंग का भैंसालोटन में धमाल।
बिनाका गीतमाला में अमीन सायनी
क्रिकेट की कमेंट्री,
सुरजीत सेन, विजय हजारे
और बापू नाडकर्णी।
समाचार विवेचन बी बी सी मार्क टली
और बातें ज्ञान विज्ञान की ।

संगीत और गीत की

होली, चैता, बिरहा
और आल्हा की झंकारों में।
बड़ा सुकून देता है,
गुजरते हुए उन गलियारों में।
खोकर रह जाए हम
होती रही यादों की बरसात,
यह उन दिनों की है बात!
यह उन दिनों की है बात!

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Friday, May 1, 2020

श्रम देवता बन धरती को जगाता हूँ (कविता)

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श्रम - देवता बन धरती को जगाता हूँ


बाजुओं का माँस औ' गठन गलाता हूँ,
श्रम-देवता बन, धरती को जगाता हूँ।

पर्वत के मस्तक पर फावड़ा चलाता हूँ,
चट्टानों को तोड़कर अपनी राह बनाता हूँ।

हाथ काले, उंगलियाँ खुरदरी बनाता हूँ,
उनपर लाल फफोलों के मोती उगाता हूँ।

रक्त वाष्पित कर पसीना जब गिराता हूँ,
वहीं उत्तुंग - शिखर हिमालय उठाता हूँ।।

वहाँ पर गगन को जो महल चूमता है,
उसकी कंक्रीट में श्रम- बिंदु मिलाता हूँ।

चीर हल से, धरा को उर्वर बनाता हूँ,
देता अन्नदान, मैं किसान कहलाता हूँ।

जो भी मिले, उससे संतुष्ट हो जाता हूँ,
कर्मयोगी बनकर मैं किस्मत जगाता हूँ।

बाजुओं का माँस औ' गठन गलाता हूँ,
श्रम-देवता बन, धरती को जगाता हूँ।


©ब्रजेंद्रनाथ

Tuesday, April 28, 2020

यमराज के नाम पत्र संख्या 2 (हास्य व्यंग्य)

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#satireoncorona










यमराज के नाम पत्र संख्या 2:


परम आदरणीय यमराज जी,
दूर से पाँव लागी!
मैं, एक भारतीय नागरिक, ने पिछले पत्र में आपसे दूर से नमस्कार का प्रयोजन कोरोना के कारण सोशल डिस्टेंसिंग बतलाया था। साथ ही कातर शब्दों में कोरोना नामक विषाणु द्वारा फैलाये जा रहे संक्रमण से त्राण दिलाने के लिए अनुनय-विनय किया था। हमलोग आपको यह बताना चाहते हैं कि हमारे प्रधान मंत्री के कुशल नेतृत्व में कोरोना से लड़ने के लिए उनके द्वारा दिए गए आदेशों और बताए गए नियमों का अच्छी तरह पालन कर रहे हैं। फिर भी यहाँ संक्रमण के मामलों में कमी नहीं आ रही है। कुछ सिरफिरे जामात के लोग स्थिति की गंभीरता को नहीं समझते हुए नियमों की अवहेलना कर रहे हैं। उनके लिए सद्बुद्धि जगाने की प्रार्थना आपसे करते हैं। आपकी गदा पड़ेगी तभी वे सभी रास्ते पर आयेंगें।
प्रभु आपसे मेरा एक विनम्र और करबद्ध निवेदन है। कृपया इसपर आप अवश्य ध्यान दें। हमारे यहाँ जो व्यक्ति या समूह अपने घर-बार, परिवार से दूर रहकर कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिए, कोरोना मरीजों को ठीक करने के लिए , कोरोना संक्रमितों के परीक्षण के लिए और लॉक डाउन के नियमों के पालन करवाने के लिए, गरीबों - भूखों के लिए भोजन या भोजन सामग्री को उपलब्ध कराने के लिए जुटे हैं, जूझ रहे हैं, उनके पास आप अपने यमदूतों को नहीं भेजें। अर्थात डॉक्टरों, नर्सों, सफाई कर्मियों, लैब टेक्नीशियनों, पुलिस, आशा वर्करों, फ़ूड सप्लाई और उसके चेन में काम पर जाने वाले ट्रांसपोर्ट में लगे लोगों, कोरियर और दवा उपलब्ध कराने वालों के पास अपने यमदूत न भेजें। उन्हें शक्ति, धैर्य और कोरोना संक्रमण के विरुद्ध रोग-प्रतिरोधक क्षमता से संपन्न कर दें। हम अपनी लड़ाई लड़ लेंगें। हम इस संक्रमण काल से मुक्ति के बाद अपनी आर्थिक स्थिति को सुधार लेंगें। उम्मीद है, थोड़े में लिखे खत को विस्तार कर आप स्वयं समझ लीजियेगा। आप तो अंतर्यामी हैं, प्रभु! मेरी आवश्यकताओं और जरूरतों को समझते हुए विवेक दीजिएगा, ताकि संसाधनों का समुचित उपयोग करें, उनका दोहन न करें।
आपका एक विश्वासी भक्त
ब्रजेन्द्र नाथ, जमशेदपुर, झारखंड, भारत।

पता:
सेवा में,
यमराज, यमदूत कॉलोनी।
बंगलो न 1,
स्वर्गलोक।

Thursday, April 23, 2020

जीवन रस बरसाती है (कविता) #environment

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#environmment#poemonprakriti
#worldearthday#22ndApril














प्रकृति जीवन रस बरसाती है

प्रकृति हमारी माता है
वह जीवन रस बरसाती है।

जबसे वह अस्तित्व में आई
उसने बाँटे जीवन अनन्त।
ब्रह्मांड में वह पाई विस्तार
उर्जा फ़ैली दिग दिगंत।
हम सब उसकी संतानें है
अमृत रस पिलाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

जीवन पोषित करने को
उसने दिए हवा और जल।
उसने दिए प्रकाश सूरज का,
उसने दिए अन्न और फल।
माँ का दूध दिया उसने
जो पुष्ट हमें कर पाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

सूरज की रोशनी उससे है
चन्दा में है धवल चांदनी।
बादल में तड़ित- प्रभा उससे
उससे ही है हरी धरिणी।
हमारी है अन्नपूर्णा माँ
वह लोरी गा हमें सुलाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

जल बन कभी बहा करती है,
सरिता की निर्झरणी - सी।
आगे बढ़ सरितायें मिलकर,
बहती प्रवाहमयी तटिनी - सी।
धरती को उर्वर करती वह,
सींचित कर सरस बनाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

क्या - क्या नहीं दिये उसने,
अगणित हैं उसके उपकार,
इसके बदले कुछ लिया नहीं,
कुत्सित हैं हमारे आचार।
हमने उसको दुःख दिए हैं,
वह सबको सहलाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

धरती का कलेजा चीर - चीर,
खनिज निकाले हमने कितने।
सागर की अतल गहराई से भी
तेल निकाले कितने हमने।
फिर भी सहती रही चुप चाप
हमारे जीवन सरस बनाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

बस्तियाँ बसाने में हमने
वन सारे उजाड़ दिए।
वन्य प्राणी अब जाएँ कहाँ
उनके बसेरे उखाड़ दिए।
वह चुपचाप हमारी करतूतों
पर आवरण डालती जाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

अपनी सुविधाओं के लिए
कल कारखाने बनाये हमने।
पर उनके अवशेषों से दूषित
कर दी धरा और जल कितने।
माफ़ किया माँ ने पापों को
बादल बनकर धो जाती है।
वह जीवन रस बरसाती है।

अब तो चेत ऐ मानव जन
कर आवृत हरियाली से।
पर्यावरण बचा ले धरा का
बच्चे जीयें खुशहाली से।
माता का फैला है आँचल
वरदान तुझे दे जाती है
वह जीवन रस बरसाती है।
वह जीवन सरस बनाती है।
©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक :
https://youtu.be/aEPQBYjfKBM

Sunday, April 19, 2020

उनकी आहट से शबरी विकल ही गयी(कविता)

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#poemspiritual#poemonshabari









विषय: शब्द आधारित सृजन
शब्द: आहट




यह कविता मेरे यूट्यूब चैनल "marmagya net" के नीचे दिए गए लिंक पर सुनें और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएँ:
https://youtu.be/YumN6rix6ds

उनकी आहट से शबरी  विकल हो गयी।

आते हैं इस दुखियारी के द्वार प्रभु,।
समझ न सकी कैसे करूँ मैं स्वागत?
देखती अपनी जीर्ण शीर्ण कुटिया को,
समझ न सकी अपने तन की हालत ।

उसको सुध ना रही विह्वल हो गयी।
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

जिनके लिए बुहारती रही वीथियों को
जिनके लिए हटाये पथ के शूलों को,
जिनके लिए चुने सुंदर सुंदर कलियाँ
जिनके लिए बिछाए पथ में फूलों को।

उन पाँवों की हलचल से चंचल हो गयी?
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

जिनके लिए रखती रही बैरों को चखकर,
स्वच्छ थालों में सुरक्षित और सजाए ।
जिनके लिए आंखें बरसती रही आस में,
जिनके लिए युग युग से वे बूंदे बरसाए।

अब वह बहती धार अविरल हो गयी।
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

आज मतंग ऋषि की वाणी साकार हो रही,
प्रभु के आने की आहट है सारे जलथल में,
शबरी के राम आज पधारे हैं कुटिया के आंगन
आज भरा उल्लास अवनि और अम्बर तल में।

आंसुओं से धोती पाँव शबरी निश्चल हो गयी।
उनकी आहट से शबरी विकल हो गयी।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Thursday, April 16, 2020

छाँव के सुखभोग कहाँ (कविता)

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#poemonstruggle




विषय: चित्र आधारित सृजन
चित्र: सड़क के मोड़ पर पत्रविहीन पेड़ और क्षितिज से झांकती दो आंखें






छाँव के सुखभोग कहाँ

धूप से छाले सहे पर,
छाँव के सुखभोग कहाँ?

कल्पनाओं के क्षितिज पर,
जो सपन मैं बुन सका था।
नयन निलय के नर्तन में
हरीतिमा को चुन सका था।

वे सपन सब खो गए,
प्रकृति के भीषण प्रलय में।
विमूढ़ सा देखा किया,
विस्फोटों के वह्नि - वलय मे।

पथ पर सूर्य - किरणें,
तपिश - सी दे रही,
पाँव के छालों को
आराम का संयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

वेदना के शीर्ष पर
सब भाव पिघलते जा रहे।
आशाओं की आस में,
सब अर्थ धुलते जा रहे।

पोर - पोर पीर से
भर उठा है, क्या कहूं?
दर्द के द्वार पर,
उदगार रीते जा रहे।

छीजती इस जिंदगी को,
हँस - हँस कर जी सकूँ,
कोई कोई कर सके तो करे,
मेरे बस में ये प्रयोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

दलदल भरी कछार में,
दरार होती नहीं।
बह गए वृक्षों पर,
कभी बहार होती नहीं।

चिड़ियों की चहचहाहट
अब यादों  में बसती है।
जड़ से जो उखड़ गए,
उनमें संवार होती नहीं।

जो खो चुके सबकुछ
इस सफर में उस सफर में।
उन्हें और कुछ भी
खोने का वियोग कहाँ?
धूप से छाले सहे पर
छाँव के सुखभोग कहाँ?

(वह्नि-आग)
©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

मिला नव स्पर्श है (कविता)

#BnmRachnaWorld
#poemonmaa




विषय: चित्र आधारित सृजन
चित्र: माँ बच्चे को चूमती हुई।








मिला नव स्पर्श है

शिशु - नयन की भाषा में,
माँ के उल्लसित हृदय में,
संचरित हो रही ममता की
अविचल धार निलय में।
माँ के जीवन की बगिया में छाया नव हर्ष है।
माँ का शिशु की साँसों को मिला नव स्पर्श है।

यह भाषा अलिखित सी,
मौन भी है मुखरित हुआ।
माँ के मुस्कानों में दिखता
शिशु प्रेम पल्लवित हुआ।
पुष्प खिला सुंदर, सर्वत्र आंगन में उत्कर्ष है।
माँ का शिशु की सांसों को मिला नव स्पर्श है।

बालक माँ की पढ़ लेता
प्यार ममत्व की भाषा को।
आनन पर छायी विश्रान्ति
थकान और निराशा को।
माँ के दुलार में ही हमारे जीवन का अर्श है।
माँ का शिशु की सांसों को मिला नव स्पर्श है।

कितना सुकून है माँ के
आँचल में बीते बचपन।
माँ तेरी ममता से सिंचित
हो मेरे प्राणों का पोषण ।
शिशु के सुदृढ आलय का माँ ही तो फर्श है।
माँ का शिशु की सांसों को मिला नव स्पर्श है।

माँ मेरे तू रहती पास
स्नेह की देती शीतल छाँह,
माँ मेरी विघ्नों पर देती,
समाधान की त्वरित सलाह।
माँ तू ही मेरे समस्त जीवन का निष्कर्ष है।
माँ का शिशु की साँसों को मिला नव स्पर्श है।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

Tuesday, April 14, 2020

जीतेंगे हम शान से (कविता) #coronapoem

#BnmRachnaWorld
#coronapoem









जीतेंगे हम शान से
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आज मचा जो हाहाकार,
नहीं दुखों का पारावार।
कोरोना के फैलाव से
ठप्प पड़े सब कारोबार।
इन विषम स्थितियों में
भी लगे हुए जी जान से
जीतेंगे हम शान से।

लक्ष्मण रेखा है देहरी
इसका रखेंगे ख्याल।
बाहर कही निकलेंगें
मुख पर रखेंगें रुमाल।
जीवन की रक्षा करेंगे,
हम जीतेंगे जहान से ।
जीतेंगे हम शान से।

बड़े बूढ़ों की सेवा को
अपना लक्ष्य बनाएं ।
उनपर हो ध्यान विशेष
संक्रमण दूर रख पाएँ।
ध्येय हमारा होगा पूरा,
बुजुर्गों के सम्मान से।
जीतेंगे हम शान से।

आसपास में देखें जाकर
छत है जिनका आसमान।
पेट में अन्न का दाना है या
हवा ही है उनका जलपान।
उन्हें जीने का मकसद दें
मुक्त हो वे अपमान से।
जीतेंगे हम शान से।

नए जीवन की नयी शोध है,
नव चिंतन की नयी पौध है,
मन में विचरण नई सोच है,
निरंतर कर रहे नई खोज है।
कोरोना को देंगें मात
हम नए विज्ञान से ।
जीतेंगे हम शान से।

©ब्रजेंद्रनाथ मिश्र

यूट्यूब लिंक:
https://youtu.be/ksYNEz_G_uU

अधिकारी की आत्मीयता (कहानी)

 #BnmRachnaWorld  #story #affection#GovernmentOfficer अधिकारी की आत्मीयता  ऑफिस में यह खबर फ़ैल गई थी कि साहब ज्वाइन करने आ रहे हैं। इस जनपद ...